ममलूक सल्तनत की स्थापना, उनकी बहादुरी, और इस्लामी दुनिया में उनका प्रभाव।
Key Takeaways
- ममलूक गुलामों ने इस्लाम की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- मंसूरा की लड़ाई में ममलूकों ने क्रूसेडर्स को निर्णायक हार दी।
- रुकनुद्दीन बेबर्स ममलूकों के महान नेता थे जिन्होंने रणनीतिक युद्ध कौशल दिखाया।
- ममलूक सल्तनत ने इस्लामी दुनिया में राजनीतिक और सैन्य शक्ति स्थापित की।
- ममलूकों की तलवार से मोहब्बत ने उन्हें इतिहास में अमर बना दिया।
What the video covers
- ममलूक गुलाम थे जिन्हें बाजारों में बेचा गया लेकिन उन्होंने इस्लाम की रक्षा की।
- ममलूकों ने मंगोलों और क्रूसेडर्स से इस्लाम को बचाया और मिस्र में एक शक्तिशाली सल्तनत बनाई।
- सलाहाउद्दीन अयूबी ने ममलूकों को मिलिट्री इलीट बनाया और उन्हें घुड़सवारी, तीरंदाजी, तलवारबाजी में प्रशिक्षित किया।
- 1249 में क्रूसेडर्स ने मिस्र पर हमला किया, लेकिन ममलूकों ने मंसूरा की लड़ाई में उन्हें पराजित किया।
- रुकनुद्दीन बेबर्स ने गोरिल्ला युद्ध तकनीक अपनाकर क्रूसेडर्स को हराया और किंग लुई को बंदी बनाया।
- ममलूकों ने अबूबासी खलीफा की जगह सत्ता संभाली और इस्लामी दुनिया में अपनी ताकत स्थापित की।
- ममलूक सल्तनत ने व्यापार मार्गों और सैन्य ताकत के जरिए क्षेत्रीय शक्ति बनकर उभरी।
- उनकी तलवार से मोहब्बत ने उन्हें इस्लामी दुनिया के सबसे बड़े योद्धा बनाया।
- ममलूकों ने अपने मुसलमान भाइयों के हाथों अंत तक संघर्ष किया।
- ममलूक सल्तनत के इतिहास और उनके राजनीतिक-सैन्य संघर्षों को विस्तार से समझाया गया।
Chapters
- 00:00ममलूकों का परिचय और उनकी उत्पत्ति
- 02:36सलाहाउद्दीन अयूबी और ममलूकों की सैन्य भूमिका
- 04:46ममलूकों की ट्रेनिंग और उनकी तलवार से मोहब्बत
- 07:00मंसूरा की लड़ाई और क्रूसेडर्स की हार
- 09:12रुकनुद्दीन बेबर्स की रणनीति और किंग लुई की बंदी
- 11:17ममलूकों की सत्ता और इस्लामी दुनिया में उनका प्रभाव
- 15:43ममलूकों की सैन्य और राजनीतिक उपलब्धियां
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Speaker A
वह ना किसी शाही खानदान से थे, ना शहजादे थे, ना अमीरजादे। वह तो गुलाम थे जिन्हें बाजारों में जानवरों की तरह बेचा गया था। लेकिन वही थे जो मौत की आंखों में आंखें डालकर बात करना जानते थे। वो भी उस जमाने
Speaker A
में जब आलम इस्लाम यतीम था, बेबस था, निहत्ता था। उसके अजीम तरीन शहर राख का ढेर बन चुके थे। यहां तक के मरकज़ खिलाफत बगदाद भी और मंगोल दरिंदों और मक्का और मदीना के बीच सिर्फ एक छोटा सा इलाका बाकी
Speaker A
बचा था। मजाहमत का आखिरी मैदान फिलस्तीन जहां मंगोल तूफान टकराया उनसे जिनकी हार का सबको यकीन था। लेकिन तब वो इस्लाम [संगीत] के आखिरी मुहाफिज बनकर मैदान में आए और सिर्फ रीजन ही नहीं दुनिया की तारीख भी बदल दी। वह भी सिर्फ एक दिन में। यह थे
Speaker A
ममलूक। गुलामी की जंजीरों में पलने वाले जिन्होंने दुनिया-ए इस्लाम को आजाद करवाया। वो कि जिन्होंने बुखारा और समरकन ईरान और फारिस इराक ओ शाम की तबाही के बाद मिस्र में दुनिया की सबसे बड़ी और अमीर तरीन मुस्लिम एंपायर बनाई। इस्लाम को
Speaker A
मुसलमानों को जो जो खतरा लाहक था उन्होंने उसका डटकर [संगीत] मुकाबला किया बल्कि खात्मा ही कर दिया। चाहे मशरिक से आने वाले मंगोल हो या मगरिब से आने वाले क्रूशेडर्स। यह उनकी तलवार से मोहब्बत थी जिसने उन्हें इस्लामी दुनिया का सबसे बड़ा
Speaker A
[संगीत] हीरो बनाया। लेकिन यह तलवार से मोहब्बत ही थी जिसने उन्हें अपने ही मुसलमान भाइयों के हाथों खात्मे तक पहुंचा दिया। कैसे? यही कहानी आज हम दरीचा पर बताने जा रहे हैं। जहां हम उस्मानी मुगल और सफवी सल्तनत की तारीख पर [संगीत] पहले
Speaker A
ही बात कर चुके हैं। और आज बारी है ममलूकों की। जब दुनिया भर में बादशाहों का राज था। दी एज ऑफ किंग्स में सिर्फ एक ही काम होता था। हमेशा शहजादे ही तख्त पर बैठते थे। या फिर शाही खानदान का ही कोई बंदा। इसके
Speaker A
अलावा कोई तख्तो ताज के करीब [संगीत] भी नहीं भटकता था। लेकिन 13th सेंचुरी में कुछ अलग हुआ। ऐसा जो तारीख में बहुत कम देखा गया है। एक तरफ हिंदुस्तान में खानदान गुलामा की हुकूमत कायम हुई तो हजारों किलोमीटर दूर मिस्र की सरजमी पर भी
Speaker A
कुछ ऐसा ही हुआ। यहां ममलूक राज कायम हुआ। यह ममलूक कौन थे? मिस्र के अजीम हुक्मरान सलाहाउद्दीन अयूबी ने जब बैतुल मुकदस फतह किया तो यह कामयाबी तो शायद आसान [संगीत] थी लेकिन इसे बरकरार रखना बहुत ही मुश्किल। फिर फस्तीन और शाम के दूसरे
Speaker A
इलाकों में मौजूद [संगीत] काबिज क्रुसेडर्स को निकालने का काम भी बाकी था। तो इस काम के लिए मिस्र की अयूबी सल्तनत को एक बहुत ही बहादुर ताकतवर और वफादार फौज की जरूरत थी। एक ऐसी फौज जिसका सियासत [संगीत]
Speaker A
से कोई ताल्लुक ना हो। इस मसले का हल ढूंढा गया गुलामों की शक्ल में। जी हां, बिल्कुल अब्बासी सल्तनत की तरह कि जिसने बगदाद के दरबार में अरबी और फारसी इन्फ्लुएंस [संगीत] को कम करने के लिए तुर्क गुलाम भर्ती किए
Speaker A
थे, बिल्कुल वैसा ही अयूबी सुल्तानों ने भी किया। उन्होंने स्लेव मार्केट्स में मौजूद गुलाम खरीदना शुरू कर दिए। वो जो कोहे काफ, सेंट्रल एशिया के मुख्तलिफ इलाकों और दस्ते-ए किपचाक से पकड़ कर मिस्र और दूसरे इलाकों में लाए जाते थे।
Speaker A
उन्हें या तो अपने ही रिश्तेदार या मुखालिफ जंगजू पकड़ कर बेच देते थे या फिर वह मंगोल इन्वजन के दौरान गुलाम बनाकर मिस्रो शाम के बाजारों में बेच दिए गए। यही थे जिन्हें ममलूक कहा जाता था। मतलब [संगीत] खरीदे हुए गुलाम। लेकिन अयूबी
Speaker A
एंपायर में आते ही यह कोई आम गुलाम नहीं रहे। उनसे कोई आम खिदमत नहीं ली जाती थी। बल्कि उन्हें बनाया गया मिलिट्री इलीट। सुल्तान साले अय्यूब ने कायरा के करीब दरिया नील के साथ ही उनका एक अजीम मरकज
Speaker A
बनाया था जिसमें उनकी बैरिक्स भी थी, ट्रेनिंग ग्राउंड्स भी और वो ट्रेनिंग दी जाती थी जो ममलूकों को मिलिट्री इलीट बनाती थी। समझे यह तुर्की की यनीचेरी का मिश्री वर्जन थे। तो इस ट्रेनिंग सेंटर में ममलूकों को घुड़सवारी, [संगीत]
Speaker A
तीरंदाजी और तलवारबाजी की तरबियत दी जाती थी। और यही वह जगह थी कि जहां उनकी तलवार से मोहब्बत का आगाज भी हुआ। यह ममलू ट्रेनिंग इतनी कॉम्प्रिहेंसिव और जबरदस्त होती थी कि इसका बकायदा एक नाम है फ़ूसिया और पास आउट होने वाले का जज्बा एक ही होता
Speaker A
था अपने आका के लिए लड़ना और अपने साथियों के लिए कुर्बान हो जाना। लेकिन इस ट्रेनिंग में शामिल कई सिपाहियों को अंदाजा भी नहीं था कि वह वक्त जल्द आने वाला है जब तारीख में उनका किरदार कहीं बड़ा हो जाएगा।
Speaker A
तारीख का एक सिंपल रूल है। [संगीत] जब भी पावर वैक्यूम पैदा होगा, सबसे बड़ी पावर उसे फिल करने के लिए आगे बढ़ेगी। और साल 1249 में अचानक सेवंथ क्रूशेड के बीचोंबीच एक ऐसा मोमेंट आ गया जिसने ममलूकों का रोल
Speaker A
ही बदल दिया। फ्रांस का किंग लुई नहम वो कि जिसे यूरोप वाले अपने मजहबी जोशो जज्बे की वजह से सैंड लुई कहते थे। एक बहुत बड़ी और मॉडर्न फौज लेकर मिस्र पर हमलावर हो गया। लेकिन मिस्र पर क्यों? शामो फस्तीन
Speaker A
पर क्यों नहीं? क्योंकि लुई का कहना था कि [संगीत] क्रूसेडर्स को बैतुल मुकदस तब तक वापस नहीं मिल सकता जब तक मुसलमानों के अमीर तरीन और ताकतवर तरीन मुल्क मिस्र की फौजी ताकत को खत्म नहीं किया जाता। यानी
Speaker A
वो काहिरा [संगीत] के रास्ते बैतुल मुकद्दस जाना चाहता था और फिर वो 25,000 की एक जबरदस्त फौज लेकर मिस्र के साहिल पर पहुंच गया। दरिया नील के साहिल के साथ मौजूद मिस्र का अहम तरीन शहर दिमयात ज्यादा देर उनके सामने मजाहमत नहीं कर
Speaker A
पाया और ढेर [संगीत] हो गया। फॉल ऑफ दिमियाद के साथ ही अयूबी रैंक्स में अफरातफरी फैल गई। अब सलीबी लश्कर को रोकने का सिर्फ एक ही तरीका था कि दिफाई जंग लड़ी जाए। सिपा सलार फखुद्दीन इबने शेख ने
Speaker A
पसपाई इख्तियार की और तकरीबन 60 कि.मी. दूर मंसूरा शहर के किले में बंद हो गए। अब क्रूसडर्स को खुली छूट मिल चुकी थी। लेकिन उन्हें कोई जल्दी नहीं थी। वह 5 महीने तक दिम्यात ही में बैठे रहे। नई कुमक का
Speaker A
इंतजार किया। दरिया नील में सैलाब घटने का इंतजार किया और 20 नवंबर 1249 को एक जबरदस्त लश्कर के साथ मंसूरा की तरफ कदम बढ़ा दिए। और खुदा का करना देखें कि 22 नवंबर को सिर्फ दो दिन बाद मिस्र के बीमार
Speaker A
सुल्तान सालेह अय्यूब का इंतकाल [संगीत] हो गया। अब सल्तनत मुकम्मल तौर पर लावारिस थी। मिस्र के दरवाजे खुले हुए थे। हमलावर सलीबी मुल्क के अंदर मौजूद थे और लग रहा था कि मुमलिकत अपनी आखिरी सांसे लेने वाली है। और जब यह लश्कर मंसूरा पहुंचा तो उसे
Speaker A
रोकने वाला कोई नहीं था। किंग लुई के भाई रॉबर्ट द आर्टिक का लश्कर सबसे पहले नील के पार उतरा और इतना चार्ज था कि छूटते ही मुस्लिम आर्मी के कैंप पर हमला कर दिया। यह हमला इतना अचानक था कि मुस्लिम सिपा
Speaker A
सलार फखुद्दीन तक तैयार नहीं थे। उन्हें बगैर जिरा पहने ही घोड़े पर सवार होकर दुश्मन से लड़ने के लिए निकलना पड़ा और शहीद भी हो गए। समझे? पैनिकिक का नेक्स्ट लेवल शुरू होने वाला था। ना बादशाह, ना सिपा सलार और दुश्मन एक के बाद दूसरे शहर
Speaker A
की तरफ बढ़ता हुआ। लेकिन यहां फौज के ममलूक हिस्से में एक ऐसा बंदा मौजूद था जो पैनिक प्रूफ था। सिचुएशन जितनी गंभीर हो जाए वो कभी नहीं घबराता। ठंडे दिमाग से पूरी प्लानिंग के साथ लड़ता था और वो था
Speaker A
रुकनुद्दीन बेबर्स। जिसने इस नाजुक मरहले पर गोरिल्ला वॉरफेयर की टेक्निक अपनाई और सलीबियों को खुला मौका दिया कि वह शहर के अंदर दाखिल हो जाएं और इसकी तंग गलियों में फंस जाएं और उसके प्लान के ऐन मुताबिक रॉबिट इस जाल में फंस गया। ममलूकों ने शहर
Speaker A
के दरवाजे बंद करके उसके हरावल दस्ते को फंसा लिया। सलीबी लश्कर के तकरीबन तमाम 600 नाइट्स मंसूरा की गलियों में मारे गए। यहां तक कि खुद रॉबर्ट भी और उसके बाद आसमान से वह आग बरसी जिसने सलीबी लश्कर
Speaker A
में दहशत फैला दी। यह थी ग्रीक फायर। बकल एक नाइट जइन विल के यह आग आसमान में एक उड़ते हुए ड्रैगन की तरह नजर आती थी। जिसकी आवाज में एक जबरदस्त गरज थी। जिससे सलीबियों में दहशत फैल गई। सलीबी लश्कर की
Speaker A
सप्लाई लाइन कट चुकी थी। मौत हर तरफ मंडला रही थी। तब किंग लुई ने पसपाई का ऐलान किया। सलीबी लश्कर ने वापस दिमियाद का रुख कर लिया इस हाल में कि हर तरफ से उन पर हमले हो रहे थे और फिर दिमियाद से जरा
Speaker A
पहले फॉरेस्ट कोर के मकाम पर रुकनुद्दीन बैबर्स के लश्कर ने उन्हें घेर लिया। समझे यह मुकम्मल तौर पर वन साइडेड मैच था जिसमें अजीम सलीबी लश्कर का बहुत छोटा सा हिस्सा बच पाया। यहां तक के खुद किंग लुई
Speaker A
भी गिरफ्तार हो गया। [संगीत] वो जो मिस्र को खत्म करने आया था अब काहिरा की जेल में बंद था और फिर 8 लाख दीनार तावान और दिन शहर की वापसी के बदले रिहा किया गया। यह इतनी बड़ी रकम थी कि फ्रांस का टोटल
Speaker A
[संगीत] सालाना रेवेन्यू भी इतना नहीं था। यह अपने जमाने का सबसे बड़ा तावान था। बहरहाल अब मिस्र के चप्पे-चप्पे से स से सेलीबी निकाले जा चुके थे और यह ममलूकों की इतनी बड़ी कामयाबी थी कि उसने मिस्र ही
Speaker A
नहीं बल्कि पूरे रीजन के पावर डायनामिक्स बदल दिए। सबको नजर आ रहा था कि अब क्या होने वाला है। अयूबियों का ज़वाल शुरू हो चुका था और अब सबसे बड़ी ताकत ममलूक थे। वह जो साबित कर चुके थे कि वह किसी
Speaker A
सुल्तान के बगैर भी इस्लाम का मुसलमानों का बेहतरीन दफा कर सकते हैं। लेकिन सुल्तान साले अय्यूब का जानशी अल मुअज्जम तौरान शाह इस बात को समझ नहीं पाया। इतने बड़े कारनामे के बावजूद उसने ममलूकों को ड्यू रिस्पेक्ट नहीं दी [संगीत] बल्कि
Speaker A
उनकी पावर को कम करने और उन्हें दबाने की कोशिश करते हुए अपने फेवरेट लोगों को बड़े-बड़े ओदेना शुरू कर दिए। और यही वो मौका था जब ममलूकों ने तारीख का वो उसूल ही खत्म कर दिया कि बादशाह का बेटा ही
Speaker A
बादशाह बनेगा। उन्होंने फैसला किया कि हुक
Speaker A
यूं कि मई 1250 में ममलूकों ने तोरान शाह को कत्ल कर दिया और उसकी मां शजरुद को मलिकतुल मुस्लिमीन यानी मुसलमानों की मलिका के तौर पर मुंतखब किया। यह इस्लामी तारीख का मुफरद वाकया है कि एक खातून को
Speaker A
[संगीत] बकायदा हुक्मरान तस्लीम किया गया। बल्कि उसके नाम का खुतबा भी पढ़ा गया और सिक्के भी [संगीत] जारी हुए। जिन पर एक तरफ मलिका का नाम होता था और दूसरी तरफ बगदाद के अब्बासी खलीफा मुस्तासिम बिल्लाह का। लेकिन इसके बावजूद अब्बासी खलीफा ने
Speaker A
शजुद दुर्ग की हुक्मरानी मानने से इंकार कर दिया। बल्कि अहले मिस्र के नाम एक मशहूर खत भी लिखा [संगीत] कि अगर तुम्हारे यहां मर्द खत्म हो गए हैं तो हमें बताओ हम यहां से तुम्हें एक मर्द भेज [संगीत]
Speaker A
देंगे। जो कमी रह गई थी वह शाम में मौजूद अयूबी अमीरों की बगावत से पूरी हो गई। सुरते हाल नाजुक थी और सिचुएशन [संगीत] देखते हुए तकरीबन 80 दिन तक खुद मुखफ्तार रहने वाली मलिका ने ममलूक सिपासलार इज्जुद्दीन ऐबक से शादी [संगीत] कर ली और
Speaker A
तख्त उसके हवाले कर दिया। जुलाई 1250 में इज्जुद्दीन ऐबक तख्त पर बैठा और ऐलान कर दिया कि वो मिस्र में महज अब्बासी खलीफा का नुमाइंदा है। बस बल्कि अयूबी खानदान के एक बच्चे शरफ मूसा को शरीक सुल्तान भी बना
Speaker A
लिया। सिर्फ इसलिए ताकि खिलाफत की जानिब से परवाना मिल जाए। इससे यह भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि ममलूक अपनी असल रूट्स के हवाले से कितने इनसिक्योर [संगीत] थे। उन्हें अच्छी तरह अंदाजा था कि वह इख्तेदार पर काबिज हो भी जाए तो कोई
Speaker A
उन्हें हुक्मरान नहीं मानेगा। और यह बात सिर्फ इब्तदा में नहीं आखिर तक उनके साथ [संगीत] चिपकी रही जिसका जिक्र आगे चलकर होगा। बहरहाल कोई माने या ना माने चाहे या ना चाहे मिस्र पर ममलूक राज का बाकायदा आगाज हो चुका था। जिन्हें यह बात अच्छी
Speaker A
तरह मालूम थी कि यह तख्त [संगीत] फूलों की सेज बिल्कुल नहीं। कांटों का वह ताज है जो उन्होंने खुद अपनी मर्जी से पहना है। वह भी ऐसे [संगीत] वक्त में जब आलम इस्लाम को हर तरफ से खतरा लाक है। एक खतरे का तो
Speaker A
उन्होंने मुकाबला कर लिया लेकिन दूसरा कहीं बड़ा खतरा अभी बाकी है। मशरिक से उठने वाला मंगोल तूफान जो अपने पीछे पूरी दुनिया को तबाह बर्बाद करने के बाद अब मिस्र की तरफ बढ़ रहा था। [हौसला बढ़ाने की आवाज़]
Speaker A
सन 1258 आलम इस्लाम का दिल अब्बासी [संगीत] खिलाफत का मरकज बगदाद वो शहर कि जहां से पूरी दुनिया की मुस्लिम हुकूमतों को लेजिटिमेसी मिलती थी। जहां के खलीफा का खुतबा मराकिश से लेकर हिंदुस्तान [संगीत] तक हर मुस्लिम मुल्क में नमाज़ जुमा में
Speaker A
पढ़ा जाता था। मंगोलों के हाथों तबाहो बर्बाद हो गया। चंगेज़ खान के पोते हलाकू खान की वैशी फौजें इराक से शाम में दाखिल हो चुकी थी और उसे रौंदने के बाद उनके कदम मिस्र की तरफ थे। मिस्र वस्त एशिया,
Speaker A
[संगीत] ईरान, इराक और शाम की बर्बादी के बाद अब इस्लामी तहजीब का आखिरी मरकज था। वो सरजमी हिजाज का रखवाला था। [संगीत] मक्का और मदीना का निगेबान था। लेकिन अब उसे सलीबियों से भी बड़े खतरे का सामना था। तब ममलूक हुकूमत सुल्तान सैफुद्दीन
Speaker A
कुतुस के हाथ में थी कि जिसे एक दिन हलाकू खान का खत मिला। खत क्या? खुला डेथ वारंट समझें। लिखा था हम खुदा की जमीन पर खुदा का लश्कर हैं। दूसरों के अंजाम से सबक हासिल करो और अपनी हुकूमत हमारे हवाले कर
Speaker A
दो। क्योंकि हम रोने वालों पर रहम नहीं करते और ना ही फरियाद करने वालों पर नरमी दिखाते हैं। तुम्हारा काम भागना है और हमारा काम ताकुब करना। हमारी तलवारों से तुम्हें कोई नहीं बचा सकता। हमारे हथियारों के खौफ से कोई भाग नहीं सकता।
Speaker A
हमारे घोड़े ताकुब में बरक रफ्तार हैं। हमारे तीर दिलों को चीर देने वाले हैं। हमारी तलवारें बिजली की कड़क की मानिद है। हमारे दिल पत्थर की तरह सख्त हैं। और हमारी तादाद रेत के जर्रों की मानिंद बेशुमार है। मिस्र से कह दो कि हलाकू आ
Speaker A
गया है। नंगी और तेजधार तलवारों के साथ। इस तवील खत का एक-एक लफ्ज गुरूर, हैबत, वैशत और नालाकी तबाही को जाहिर करता है। और मंगोल सिर्फ कहते नहीं आए थे। उनका ट्रैक रिकॉर्ड सबके सामने था। उन्होंने किस तरह समरकंदो बुखारा को बर्बाद किया।
Speaker A
बल्क, खरात, निशापुर, इसहान, शिराज और बगदाद को तबाह करके आए थे। उसे देखते हुए सेफ साइड यही थी कि हथियार डाल दिए जाए और [संगीत] अपने आवाम को मुकम्मल तबाही से बचा लिया जाए। लेकिन नहीं सैफुद्दीन कुतुस कोई नाजों में पला हुआ बंदा नहीं था। वो
Speaker A
कोई शहजादा नहीं था। उसका तो ब्रॉट अप ही मुश्किलात में हुआ था। उसके लिए तो जिंदगी नाम ही खून और पसीने का था और मौत ऐसी थी जैसे रूटीन की कोई चीज और वो यह बात भी अच्छी तरह जानता था कि वो कुछ भी कर ले।
Speaker A
अब मंगोलों से बच नहीं सकता। इसलिए हमेशा की जिल्लत से बेहतर है एक बार इज्जत का रास्ता चुन ले। उसने हलाकू के खत का कोई जवाब नहीं दिया और मंगोल सफीरों को कत्ल करके उनके सर कायरा के बाबे जुबैला पर
Speaker A
लटका दिए। समझे खुला ऐलान जंग कर दिया और फिर सितंबर 1260 में हलाकू का जवाब आ गया। सरजमी फस्तीन में ऐन जालूद के मैदान पर मंगोल और ममलूक आमने-सामने आ गए। यह वही जगह है कि जिसके बारे में कहा जाता था कि
Speaker A
यहीं पर हजरत दाऊद अल सलाम ने जालूद को कत्ल किया था। समझे उसी जगह पर अब डेविड वर्सेस गोलाईत का एक नया मुकाबला था। [संगीत] मंगोलों की कमान खतरनाक कमांडर कतबुआ के हाथ में थी जिसे यकीन था कि वो
Speaker A
ममलूकों को भी कुचल देगा। उधर ममलूक रैंक्स में सैफुद्दीन कुतुस के साथ वही था जिसने सेवंथ कुरुसेड में फ्रेंच आर्मी का खात्मा कर दिया था। जी हां, रुकनुद्दीन बैबर्स जिसने एक कमाल का बैटल प्लान बनाया। अपनी आधी फौज पहाड़ियों [संगीत] के
Speaker A
पीछे छुपा दी और खुद थोड़ी सी फौज लेकर मंगोलों के सामने आ गया। वो दुनिया की खतरनाक तरीन फौज को हेड ऑन टैकल करने जा रहा था और जब जंग शुरू हुई तो मंगोल आर्मी को लगा कि ममलूकों की कुल फौज यही है।
Speaker A
इसलिए जीत के यकीन के साथ वो ममलूक फौज पर टूट पड़ी। बेवर्स की फौज ने कुछ देर डटकर मुकाबला किया और फिर अपने प्लान के मुताबिक पस्पा होने लगे। ममलूक पीछे होते गए, होते गए। यहां तक कि वो ऐन जालूद की
Speaker A
वादी के बीच में पहुंच गए और मंगोल फौज भी उनके पीछे-पीछे थी। और जैसे ही मंगोलों का आखिरी सिपाही वादी में दाखिल हुआ, पहाड़ियों के पीछे छुपी ममलूकों की बाकी फौज सामने आ गई। अब मंगोल चारों तरफ से
Speaker A
घिर चुके थे। वो पहली बार उसी झांसे में आ गए थे जिससे [संगीत] वह दूसरों को मारते आए थे और घुमसान की जंग हुई। एक ऐसा मौका आया कि खुद ममलूकों की सफे टूटने लगी। ऐसा लगा कि बस शिकस्त हो ही जाएगी। जब सुल्तान
Speaker A
कुतुज ने अपना हेलमेट उतार कर जमीन पर फेंका और तलवार हवा में लहराई और वो नारा लगाया जिसने सबका दिल दहला दिया। वाह इस्लामा वाह इस्लामा यानी हाय मेरा इस्लाम। हाय मेरा इस्लाम। क्योंकि वह जानता था कि आज अगर इस वादी में मुसलमानों
Speaker A
को शिकस्त हुई तो फिर मंगोलों को रोकने वाला कोई नहीं [संगीत] होगा। उनका अगला टारगेट सर जमीन हिजाज होगी। मक्का और मदीना होगा। चुनांचे यह कुतुस के लिए इस्लाम की बका की जंग थी। उसके सर्वाइवल की जंग थी। और फिर बगैर हेलमेट के अपने
Speaker A
घोड़े पर सवार होकर अकेले ही मंगोलों की सफों में घुस गया। और इस बहादुरी से लड़ा कि देखने वाले हैरान रह गए। अपने सुल्तान को यूं दुश्मन के घेरे में देखकर ममलूक फौज पर एक जुनून तारी हो गया। जिन्हें
Speaker A
[संगीत] अपने ट्रेनिंग सेंटर्स में यह तरबियत दी जाती थी कि अपने साथी पर कुर्बान होना है। उसके अमल का दिन आ चुका था। और कुछ ही देर बाद ऐन जालूद की वादी मंगोलों का कब्रिस्तान बन चुकी थी। तारीख
Speaker A
में पहली बार किसी मैदान पर मंगोलों को बाकायदा शिकस्त हुई थी। एक फैसला कुन शिकस्त। अगर आप ऐन जालूद की जंग के बारे में मजीद जानना चाहते हैं और मैं कहूंगा कि आपको लाजमन जानना चाहिए क्योंकि यह इस्लामी तारीख की अहम तरीन जंगों में से
Speaker A
है। बल्कि कई हिस्टोरियंस इसे तारीख की फैसला कुल तरीन जंगों में से एक समझते हैं। तो आप दरीशाचा की यह वीडियो जरूर देखें। तो कुतुज ने मुसलमानों को बचा लिया, मिस्र को बचा लिया, मक्का और मदीना को बचा लिया। लेकिन [संगीत] अफसोस की बात
Speaker A
यह है कि वह खुद को नहीं बचा पाया। वह अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी कामयाबी का जश्न मनाने भी जिंदा नहीं बचा। उसे काहिरा दोबारा देखना भी नसीब नहीं [संगीत] हुआ और वह वहां पहुंचने से पहले ही अपने साथियों
Speaker A
की एक साजिश के नतीजे में कत्ल हो गया और उसकी जगह तख्त पर बैठा वही कमांडर जिसके क्रेडिट पर दुनिया की दो सबसे बड़ी फौजों [संगीत] के खिलाफ कामयाबियां थी। अलमलिक जाहिर रुकनुद्दीन बैबर्स बंदूकदारी [संगीत] मंगोलों को रीजन से निकालने के बाद अब
Speaker A
बैबर्स की नजरें थी सर जमीन फस्तीन से सलीबियों [संगीत] के मुकम्मल खात्मे पर उसने एक-एक करके फस्तीन से शाम से लेबनान से हर जगह से उनका सफाया करना शुरू कर दिया। इस शानदार कैंपेन में जिस चीज को [संगीत] सबसे कम
Speaker A
क्रेडिट दिया जाता है, वह था रुकनुद्दीन बेबर्स का जासूसी का जबरदस्त नेटवर्क। जो बेबर्स को सिर्फ मैदान जंग का फाते नहीं बनाता [संगीत] बल्कि साबित करता है कि वो इंटेलिजेंस और साइकोलॉजिकल वॉरफेयर का भी माहिर था। उसके जासूस ताजिरों के रूप में
Speaker A
हर जगह घूमते रहते। यूरोप के दरबारों में, मंगोल इलाकों में और हर अहम मालूमात कायरा पहुंचाते। यह नेटवर्क इतना खुफिया था कि [संगीत] कोई जासूस दूसरे जासूस को नहीं जानता था बल्कि बेबर्स तो भेज बदलकर खुद भी अपने ओहदेदारों की जासूसी किया करता
Speaker A
था। जैसे एक बार जब सब समझ रहे थे कि वो अल करक में शिकार खेल रहा है। हकीकत यह थी कि वो खुफिया तौर पर मक्का पहुंचा था और वहां हज करके वापस भी आ गया। डेबर्स ने सिर्फ तलवार के जोर से नहीं अपनी जियाहानत
Speaker A
और इंटेलिजेंस के शानदार निजाम की वजह से सलीबियों को फिलिस्तीन से निकालना शुरू कर दिया। 1265 में कैसरिया और अरसूफ के मारके लड़े और दोनों अहम शहर फतह कर लिए। अगले साल सफद में टेंपलर नाइट्स के बहुत ही
Speaker A
मजबूत किले को फतह किया। 1268 में बेवर्स ने अपनी सबसे बड़ी कामयाबी हासिल की जब उसने [संगीत] सलीबियों की एक अहम तरीन रियासत अंताकिया को फतह कर लिया। यूं नॉर्दन सीरिया में सलीबियों की कमर तोड़ दी और फिर 1271 में दुनिया के मजबूत तरीन
Speaker A
किले हसन अल अकराद [संगीत] को फतह किया। यहां तक के जो इक्कादुक्का सलीबी ठिकाने रह गए थे बैबर्स के बाद खत्म कर दिए गए। और 1291 में ममलूक सुल्तान अल अशरफ खलील की जानिब से अक्का की फतह के साथ मिडिल
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ईस्ट पर 200 साल से कायम [संगीत] सलीबी साया हमेशा के लिए खत्म हो गया। वह काम जो नूरुद्दीन जंगी ने शुरू किया था। रुकनुद्दीन बेबर्स और उनके जानशीनों के हाथों अंजाम को पहुंचा। और सिर्फ जंग के मैदान में ही नहीं सियासत के मैदान में भी
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बेबर्स ने वो चाले चली कि ममलूक मुसलमानों की सबसे बड़ी ताकत बन गए। उसे अच्छी तरह पता था कि ममलूक असलन गुलाम है और इसकी वजह से मुसलमान उन्हें गासिब समझेंगे। अपनी हुकूमत को शरी और अखलाकी जवाज देने
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के लिए लेजिटिमिसी देने के लिए बेबर्स ने एक कमाल की चाल चली। बगदाद की तबाही के बाद अब्बासी खानदान के बाकी रह जाने वाले लोगों की तलाश करवाई और बिलिखिर एक शहजादा मिल गया जिसे काहिरा लाया गया और उसे
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बकायदा खलीफा डिक्लेअर कर दिया गया था तो वो नाम का ही खलीफा असल ताकत तो ममलूकों के पास थी लेकिन फिर भी बैबर्स के इस कदम ने ममलूकों को वो हैसियत दे दी जो उन्हें दरकार थी। अब ममलूक खादिम हरमैन शरीफैन
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थे। इस्लाम [संगीत] के मुहाफिज थे। खिलाफत के रखवाले थे और ज्यादा वक्त नहीं लगा। मिस्र अपने उरूस पर पहुंच गया। कायहिरा दुनिया का अमीर तरीन शहर बन गया और [संगीत] उसूल वही था। असल ताकत तलवार की है। अब यह रूल खत्म हो चुका था कि बादशाह का
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बेटा ही बादशाह बनेगा। लेकिन जब एक बार कुर्सी मिल जाए तो कौन छोड़ना चाहता है?
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सब चाहते हैं कि मेरे बाद भी तख्त उसी को मिले जिसे मैं चाहता हूं। तो ममलूकों में भी बिल्कुल स्टार्ट में ही औलादों को जानशीन बनाने का सिलसिला शुरू हो गया। खुद रुकनुद्दीन बेबर्स ने जीते जी अपने बेटे
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अस सईद बरका खान को जानशीन नामजद कर दिया था। उसकी वजह यही बताई कि इंतकाल इख्तेदार पुर अमन अंदाज में हो सके। लेकिन 1279 में यानी रुकनुद्दीन के मरने के सिर्फ 2 साल बाद [संगीत] जो बंदा ममलूक तख्त पर बैठा
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उसके खानदान का राज अगली एक सदी तक जारी रहा। नाम था सुल्तान [संगीत] सैफुद्दीन कलावून। लेकिन कैसे? आखिर ममलूकों ने एक खानदान की हुक्मरानी कुबूल कैसे कर ली? इसकी वजह है रियासत का इस्तेहकाम। जब तलवार को ताकत को सबसे बड़ा
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समझा जाएगा। मैरिटोक्रेसी ऑफ दी स्वर्ड होगी तो यकीनन हर बार इंतकाल इख्तेदार खूनी अंदाज में होगा। इससे बचने के लिए ममलूक अमीर भी हर सुल्तान के बाद उसके बेटे को ही तरजीह देने लगे। उन्हें इस सूरत में ऐसा कानूनी जवाज मिल जाता जिस पर
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ज्यादातर लोग मुत्तफिक होते। लेकिन इसके पीछे एक और चाल भी थी। तलावून के बाद ज्यादातर सुल्तान कम उम्र बेटे ही बने। जिनके पीछे असल ताकत उसी ममलूक इलीट की होती थी जो शहजादों को [संगीत] इस्तेमाल करते और असल में पर्दे के पीछे से खुद राज
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करते। बहरहाल कलाबून खानदान के बाद ममलूकों [संगीत] के दूसरे दौर में यह उसूल दोबारा सख्ती से लागू कर दिया गया कि बादशाहत की कोई नस्ल नहीं होती। इसके बाद सबसे तजुर्बाकार जनरल ही सुल्तान बनाया जाता। बल्कि सुल्तान के
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बेटों को उमूमन किसी आला फौजी ओदे के काबिल ही नहीं समझा जाता था क्योंकि वो अपने बाप की तरह सख्त फौजी तरबियत [संगीत] के मराहिल से नहीं गुजरे होते थे। यानी पूरी ममलूक तारीख में एक वाहिद एक्सेप्शन कलावून खानदान की थी जिसने 100 साल तक राज
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किया। इसके अलावा ममलूक निजाम की असल रूह उसकी काबिलियत और ताकत थी। मशहूर तारीखदान इबने खलदून जब काहिरा पहुंचे तो शहर देखकर हैरान रह गए। और उन्होंने एक हवाले से लिखा कि जिसने काहिरा नहीं देखा उसने इस्लाम की असल शानो [संगीत] शौकत नहीं
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देखी। इस शानो शौकत के पीछे थी असल में ममलूब तलवार। लेकिन सिर्फ ताकत के बलबूते पर सब कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। आपकी इकॉनमी को भी मजबूत होना चाहिए। और उस जमाने में मिस्र से ज्यादा पावरफुल कोई
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नहीं था। क्योंकि वह दुनिया की माशी शहरत पर बैठा था। यूरोप और एशिया के दरमियान तजारत का अहमतरीन रास्ता मिस्र और रेड सी से होकर गुजरता था। जिसे स्पाइस रूट कहा जाता है। हर किस्म के मसाले और रेशम जब तक
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ममलूक रीजन से नहीं गुजरते यह यूरोप तक नहीं पहुंच सकते थे। ममलूक सुल्तान [संगीत] इन ताजिरों पर भारी टैक्स लगाते और इससे हासिल होने वाली दौलत का को दुनिया का अमीर तरीन शहर बना देती। बगदाद की तबाही के बाद आलम इस्लाम में कायरे के
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अलावा और कौन सा शहर बचा था। यही इस्लाम का आखिरी किला था और क्या ही शानदार किला था। तजारत का मरकज मशरिक से आने वाली अहम चीजें, मसाले, रेशम, जवाहरात, रेड सी से काहिरा पहुंचते और यहां से अस्कंदरिया के
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जरिए यूरोप जाते। इस दौलत के साथ ममलूक सुल्तानों ने शहर को भी खूब बनाया। खुसूसन अन नानासिर मोहम्मद कलावून को तो इमारतें बनाने का जुनून था। काहिरा के किले से लेकर बीमारिस्ताने मंसूरी जैसे अस्पताल तक मरिसों, मस्जिदों और खानकाहों की तादाद
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में भी जबरदस्त इजाफा किया। यह इतनी शानदार [संगीत] इमारात थी कि आज भी कायरा शहर के पुराने हिस्से मिडिल एजेस के फने तामीर का सबसे बड़ा मरकज है। कायरा के हुक्मरानों को लगता था कि दुनिया हमेशा ऐसी ही रहेगी और वो हमेशा यूं ही अमीर और
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ताकतवर रहेंगे। लेकिन उम्र भर कौन जवान कौन हसीन रहता है। इंसान भी नहीं और बड़ी-बड़ी सल्तनतें भी नहीं। दुनिया हर वक्त बदलती रहती है और जो वक्त [संगीत] के साथ खुद को नहीं बदल पाते यह दुनिया उनकी नहीं है। 15वीं सदी के आखिर में दो ऐसे
Speaker A
[संगीत] ग्लोबल शिफ्ट्स आए जिन्हें ममलूक समझ नहीं पाए और यही उनके खात्मे की वजह बनी। उन्हें पहला झजका माशी मैदान में ही पहुंचा। यूरोप के ताजिर ममलूकों को भारी टैक्स दे देकर तंग आ चुके थे। वह हिंदुस्तान और मशरिक के दूसरे मुल्कों तक
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पहुंचने के लिए किसी नए रास्ते की तलाश में थे। और 1498 में पुर्तगाल के एक जहाजना वास्कोडि गामा [संगीत] ने नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया। वो अफ्रीका के गिर चक्कर काटकर इंडियन ओशियन के रास्ते हिंदुस्तान पहुंच गया और यूं एक ऐसा रूट
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ढूंढ लिया जो यूरोप के लिए नई लाइफ लाइन और ममलूक सल्तनत के लिए डेथ वारंट साबित हुआ। अब यूरोप ने ममलूकों को मुकम्मल तौर पर बायपास करते हुए एक नया रास्ता पा लिया था। पुर्तगाल के जंगी बहरी जहाज इंडियन
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ओशियन में आए और यहां तबाही फैला दी। मुसलमानों के सदियों पुराने ट्रेड रूट्स को बर्बाद करना शुरू कर दिया। रेड सी और इंडियन ओशियन में ममलूकों की मोनोपोली [संगीत] को खत्म करने के लिए ट्रेड रूट्स की नाकाबंदी कर दी। पुर्तगाल के पायरेट्स
Speaker A
मुसलमानों के जहाजों को लूटते तबाह करते और इस समंदर में अपनी इजारादारी कायम करते। यही वजह है कि मिस्र के रेवेन्यूस में बड़ी कमी आई और ममलूक सुल्तान कासू अलग गौरी जवाबी कारवाई करने पर मजबूर हो गया। उसने पुर्तगजियों के खिलाफ एक नई फौज
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तैयार की। लेकिन उनके पास जहाज बनाने के लिए लकड़ी और लोहे की कमी थी। तो इस काम के लिए उन्होंने उस्मानियों से मदद हासिल की। उसकी खुशकिस्मती थी कि तब उस्मानी तख्त पर एक बहुत सुलजू इंसान बैठा था।
Speaker A
सुल्तान बायजीद दोम बल्कि उसका बेटा सलीम अव्वल भी वही जो कुछ साल बाद ममलूक सल्तनत [संगीत] को सफाए हस्ती से मिटाने वाला था। उसी की मदद से ममलूक नेवी ने रेड सी में कभी पोर्तुगीज़ियों को हराया कभी उनसे
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हारे। जो भी हुआ ट्रेड रूट्स पर अब जंग हो रही थी। तजारती जहाज लुट रहे थे और जब ऐसा हो तो इकॉनमी के मुश्किल दिन शुरू हो जाते हैं। फिर ममलूकों को पहुंचा दूसरा झजका टेक्नोलॉजी के मैदान में। यह गन पाउडर
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रेवोल्यूशन का जमाना था। खुद ममलूक सल्तनत के पड़ोस में ऑटोमन एंपायर अपने मॉडर्न तोपखाने और बंदूकों से लेस फौज की वजह से अजीम कामयाबियां हासिल कर रही थी। लेकिन ममलूकों ने इससे कुछ नहीं सीखा। वो अपने गुरूर में अपनी ईगो में मस्त रहे। यह कहते
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कि मर्दों की जंग तो वो है जो घोड़े की पीठ पर बैठकर आमने-सामने तलवारों से लड़ी जाए। उनके नजदीक दूर से बंदूक चलाना या तोप का गोला फेंकना बुज़दिलों और नामर्दों का काम है। ममलूकों की जंगी तरबियत फ़ूसिया
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ने उन्हें तलवार से मोहब्बत करना सिखाया था। वही तलवार जिसने उन्हें गुलामी से आजाद करवाया। जिसने उन्हें सलीबियों के खिलाफ कामयाबी दिलवाई। मंगोलों के खिलाफ कामयाबी दिलाई। तो इसी तलवार की मोहब्बत में ऐसे हो गए कि बारूद से नफरत करने लगे।
Speaker A
जब उन्हें बंदूकें और तोपें इस्तेमाल करने का मशवरा दिया गया तो उन्होंने हकारिकत से जवाब दिया, "यह आग और धुएं का खेल हमारे शायनिशान नहीं। हम अपनी तलवारों से हर तोप का मुंह मोड़ देंगे। यह तकब्बुर था, अनाथी
Speaker A
या बेवकूफी। जो भी था ममलूकों के ज़वाल की असल वजह बन गया। यह इतना बड़ा फ्लॉ था कि जल्द ही उन्हें अपने सर्वाइवल की जंग लड़ना पड़ी। ऐसी जंग जिसमें नाकामी उनका मुकद्दर थी। सन 1516 मिडिल ईस्ट की दो बड़ी पावर्स
Speaker A
आमने-सामने थी। एक तरफ सल्तनत उस्मानिया और उसका भी सबसे खतरनाक बादशाह यावूज़ सुल्तान सलीम जिसकी फौज मॉडर्न टेक्नोलॉजी तोपखाने और बंदूकों से लेस थी। तो दूसरी तरफ था ममलूक सुल्तान कासो अलग गौरी और उसकी रिवायती घुड़सवार फौज जिसे अपनी
Speaker A
बहादुरी और अपनी तलवारों पर नाज था। लेकिन क्यों आखिर मुस्लिम वर्ल्ड की दो बड़ी पावर्स आमने-सामने क्यों आ रही थी? दोनों के दरमियान असल ट्रिगर पॉइंट था अनाोलिया की एक रियासत जुल कद्र। जब सुल्तान सलीम 1514 में शाह इस्माइल सफवी के खिलाफ जंगे
Speaker A
चाल देरान के लिए निकल रहा था तो उसने अपनी सप्लाई लाइंस को बहाल रखने के लिए जुलक के अमीर अलाउद से मदद मांगी जो ममलूकों का वाज गुजार था। अलाउद्दौला ने ना सिर्फ मदद से इंकार किया बल्कि उस्मानी
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सप्लाई लाइंस को नुकसान भी पहुंचाया। सलीम को जासूसों के जरिए इत्तला मिली कि अलाउद्दौला यह सब कांसो अलग गौरी के इशारे पर कर रहा है। इसलिए चालदेरान की फतह के बाद सलीम ने सबसे पहले जुलक पर हमला करके
Speaker A
अलाउद्दौला को कत्ल करवाया और उसका सर कायरा भेज दिया जो एक क्लियर मैसेज था कि अब अगली बारी ममलूकों की है और वजह सिर्फ जुल कद्र भी नहीं थी एक और रीजन भी था ममलूकों का सफवियों के साथ खुफिया दफाई
Speaker A
मुहदा कासोल गौरी ने शाह इस्माइल सफवी से कहा था कि मिलकर उस्मानियों का मुकाबला करते हैं। जब सलीम दोबारा ईरान पर हमले की तैयारी कर रहा था, तो कांसोल गौरी अपनी फौजे शिमाली शाम में उस्मानियों के साथ सरहद पर ले आया ताकि उन पर दबाव डाल सके।
Speaker A
[संगीत] और फैसला कुन मोड़ तब आया जब उस्मानियों ने ममलूकों का एक कासिद पकड़ लिया जो शाह इस्माइल के लिए खुफिया पैगाम ले जा रहा था। इस वाक्य ने सलीम को यकीन दिला दिया कि ममलूक अब उसके दुश्मन के साथ
Speaker A
मिल चुके हैं और उन्हें खत्म करना नागुजीर है। और यहीं पर एक मर्तबा फिर वही ताना सामने आ गया। उस्मानी खुद को तो इस्लाम का हकीकी गाजी समझते थे और ममलूकों को महज खरीदे हुए गुलाम। वो उनकी हुक्मरानी उनकी
Speaker A
लेजिटिमेसी को ही तनकीद का निशाना बना रहे थे। सलीम समझता था कि हरमैन शरीफैन की खिदमत का हक ऐसे बादशाह को मिलना चाहिए जो मौरूसी बादशाह हो। शाही खानदान से हो ना कि साबिक हो गुलामों को। और फिर शाम के
Speaker A
शहर हलब के करीब मर्ज दाबे के मकाम पर दोनों का आमनासामना हो गया। जंग शुरू हुई तो ममलूक अपने रिवायती अंदाज में एक तूफानी कैवलरी चार्ज के साथ आगे बढ़े ताकि उस्मानी सफों को चीर दें। लेकिन सलीम ने
Speaker A
अपनी तोपों को जंजीरों से बांधकर एक ऐसी दीवार बना रखी थी जिसे खत्म करना तो दूर की बात उस तक पहुंचना भी मुमकिन नहीं था और जैसे ही ममलूक करीब आए उन तोपों ने एक साथ फायर खोल दिया। बारूद की गरज के साथ
Speaker A
आसमान धुएं से भर गया। ममलूक चार्ज की पहली एक-दो सफें तो वहीं ढेर हो गई और पीछे वालों के घोड़े तोपों की आवाज से बिदक गए। ममलूकों की वो तलवारें जिन्होंने कभी मंगोलों के सर काटे थे। तोप के गोलों
Speaker A
के सामने बेअसर साबित हुई। टेक्नोलॉजी में कमजोरी ने ममलूकों का खात्मा कर दिया। सुल्तान कांसो अलग गौरी मैदान जंग में ही मारा गया। शाम उस्मानियों के कब्जे में चला गया। लेकिन मिस्र अभी बाकी था। जहां अब ममलूकों का आखिरी सुल्तान तो मानबे था।
Speaker A
जो जानता था कि जंग हारी जा चुकी है। लेकिन एक ममलूक के खून में हथियार डालना नहीं लिखा था। जनवरी 1517 में कायरा के बाहर रेदानिया के मकाम पर एक मारका हुआ। तो मानबे ने कायरा की गलियों और खंदकों
Speaker A
में आखिरी सांस तक लड़ने [संगीत] का फैसला किया। इस जंग में उन्होंने वो बहादुरी दिखाई कि उस्मानी भी दंग रह गए। खैर बारूद की ताकत के सामने जज्बों की कोई हैसियत नहीं होती। उस्मानी तोपों ने काहिरा के दफा को उड़ा कर रख दिया। शहर फतह हो गया
Speaker A
और तोमान बे ने फरार होकर गोरिल्ला जंग शुरू कर दी। लेकिन अपनों की गद्दारी की वजह से वह बिलिखिर पकड़ा गया और फिर कायहिरा ने वह मंजर देखा कि ढाई साला ताकतवर ममलूक सल्तनत का सूरज भूरूब हो गया। 14 अप्रैल 1517 कायरा का तारीखी
Speaker A
दरवाजा बाबेजुबेला। जी हां, यह वही दरवाजा था जहां कभी हलाकू खान के सफीरों के सर लटकाए गए थे। आज उसी दरवाजे पर आखिरी ममलूक सुल्तान तमान बे को तख्तेदार पर लटकाया जा रहा था। [संगीत] उस्मानी सुल्तान सलीम अव्वल को इस बात पर
Speaker A
गुस्सा था कि काहिरा के लोग यकीन नहीं कर रहे थे कि तमान बे गिरफ्तार हो गया है। इसलिए उसने हुक्म दिया कि आखिरी ममलूक सुल्तान को जंजीरों में जकड़ कर पूरे काहिरा में फिराया जाए ताकि आवाम अपनी आंखों से देख लें कि [संगीत] वो कैदी बन
Speaker A
चुका है। और जब तोमान बे को कायरा की उन्हीं गलियों में घुमाया गया जहां वह कभी सुल्तान बनकर राज करता था तो वह पूरे वकार के साथ [संगीत] लोगों को वैसे ही सलाम करता हुआ गुजरने लगा जैसे वो अब भी उनका सुल्तान [संगीत]
Speaker A
हो। जब तमान बे को फांसी के फंदे पर ले जाया जा रहा था तो उसके चेहरे पर कोई खौफ नहीं था। उसने वहां मौजूद लोगों से बा आवाज़ बुलंद कहा मेरे लिए तीन बार सूरह फातिहा पढ़ो। फिर अपने हाथ फैलाए और लोगों
Speaker A
के साथ मिलकर तीन बार सूर फातिहा पढ़ी और फिर मुड़कर जल्लाद से कहा अपना काम करो। यहां एक अजीब वाक्या पेश आया। जब जल्लाद ने उन्हें फांसी देने के लिए तख्ता खींचा तो रस्ता टूट गया। तोमान बे जमीन पर गिर
Speaker A
गया। रस्सा दोबारा डाला गया लेकिन वो दूसरी बार भी टूट गया। [संगीत] तीसरी कोशिश में फांसी मुकम्मल हो सकी। जब बाबे जुबैला पर तमान बे की लाश लटक रही थी तो काहिरा की गलियों में मातम का समा था।
Speaker A
वो कि जिन्हें महज गुलाम होने का ताना दिया गया। उन्हें उनकी बहादुरी और आखिरी दम तक मजाहमत की वजह से आज भीरो समझा जाता है। लेकिन हर बहादुरी शजात दरी के बावजूद [संगीत] यह 267 साल बाद ममलूक सल्तनत के बकायदा
Speaker A
खात्मे का ऐलान था। खादिम हरमैन शरीफैन का वो टाइटल जो सदियों से ममलूकों के पास था इस्तंबोल के उस्मानी सलातीन के पास चला गया। बल्कि उन्होंने काहरा में मौजूद अब्बासी शहजादे से खिलाफत भी हासिल कर ली। अब दानो खिलाफत कायरा नहीं इस्तंबोल था।
Speaker A
ममलूक सल्तनत मिट गई। लेकिन तारीख के सफात [संगीत] में आज भी जिंदा है और जब तक इंसान जिंदा है उन गुलामों को कभी [संगीत] भुलाया नहीं जा सकेगा। उनके सियासी निजाम में 100 खामियां होंगी। बिलाशुबा उनके हाथ अपने ही
Speaker A
भाइयों के खून सेंगे थे और उनकी अना उनकी मौत का सबब बनी। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मुसलमानों की तारीख के सबसे भयानक दौर में वही थे जो सीना तान कर खड़े हुए जिन्होंने मशरिक मगरिब हर तरफ से आने
Speaker A
वाले तूफानों का मुकाबला किया और इस्लामी दुनिया को मंगोलों और सलीबियों [संगीत] दोनों से बचाया। अगर वह ऐन जालूद के मैदान में ना डट जाते, अगर वह फस्तीन और शाम के मैदानों में नील की वादियों में बहरे रूम
Speaker A
के साहिलों पर ना लड़ते तो शायद आज मुस्लिम वर्ल्ड का नक्शा कुछ और होता। यह उनका एहसान है। और इस एहसान के लिए उम्मत हमेशा उन गुलाम बादशाहों की मकरूज रहेगी।
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