Speaker A
2 मार्च 2016, दिल्ली एयरपोर्ट, भारत। सुबह के करीब 6:00 बज रहे हैं। दिल्ली एयरपोर्ट के वीकेपी टर्मिनल पर हर दिन की तरह सामान्य हलचल है। कुछ बिजनेस ट्रैवलर्स अपने फोन पर बात करते हुए सिक्योरिटी चेक पार कर रहे हैं। एयरपोर्ट स्टाफ रोज की तरह पासपोर्ट स्कैन कर रहा है। कोई नहीं जानता कि अगले कुछ मिनटों में भारत के इतिहास का सबसे चर्चित आर्थिक भगोड़ा देश छोड़ने वाला है। काले रंग का ब्लेजर पहने एक आदमी धीरे-धीरे इमीग्रेशन की तरफ बढ़ता है। चेहरे पर कोई घबराहट नहीं, कोई डर नहीं। बस वही पुरानी मुस्कान, वही कॉन्फिडेंस जैसे पूरी दुनिया अब भी उसके कंट्रोल में हो। यह आदमी है विजय माल्या। उसके हाथ में छोटा सा बैग है। कोई भागदौड़ नहीं, कोई जल्दबाजी नहीं। वो एयरपोर्ट के हर कदम पर ऐसे चल रहा है जैसे यह सिर्फ एक और बिजनेस ट्रिप हो। लेकिन असलियत कुछ और थी क्योंकि उस सुबह भारत सिर्फ एक आदमी को नहीं खो रहा था। भारत अपना सबसे बड़ा बैंकिंग शर्मनाक सच खो रहा था और सबसे डरावनी बात उसे कोई रोक नहीं रहा। उस समय तक कई बैंक उसके खिलाफ कार्यवाही शुरू कर चुके थे। हजारों करोड़ रुपए फंसे हुए थे। जांच एजेंसियां सक्रिय थीं। मीडिया सवाल पूछने लगी थी। लेकिन इसके बावजूद वो आराम से देश छोड़ देता है। कुछ घंटों बाद टीवी चैनलों पर फ्लैश आता है। विजय माल्या हैज़ लेफ्ट इंडिया। पूरा देश सन रह जाता है। सोशल मीडिया फट पड़ता है। 9000 करोड़ लेकर भाग गया। सरकार सो रही थी क्या? बैंक क्या कर रहे थे? लेकिन असली सवाल इससे भी बड़ा था। क्या विजय माल्या अकेले इतना बड़ा खेल खेल सकता था? या फिर उसके पीछे वो पूरा सिस्टम खड़ा था? जिसने सालों तक उसकी चमक देखकर आंखें बंद रखी। क्योंकि कोई भी आदमी अकेले 9000 करोड़ लेकर नहीं भागता। उसके लिए चाहिए होता है सिस्टम का भरोसा। राजनीतिक संपर्क, कॉर्पोरेट नेटवर्क और वो भ्रम जो पूरे देश को सालों तक अंधा बनाए रखे और तभी कहानी पीछे घूमती है। उस दौर में जब विजय माल्या सिर्फ बिजनेसमैन नहीं बल्कि भारत के सपने का चेहरा बन चुका था। 1955, बेंगलुरु। विजय माल्या का जन्म पहले से अमीर परिवार में हुआ था। उसके पिता विट्ठल माल्या यूनाइटेड ब्रेविस ग्रुप के मालिक थे। यानी शराब का बड़ा कारोबार, पैसा और बिजनेस नेटवर्क पहले से मौजूद था। लेकिन विजय माल्या सिर्फ विरासत संभालने वाला आदमी नहीं बनना चाहता था। उसके अंदर अलग तरह की भूख थी। उसे सिर्फ पैसा नहीं चाहिए था। उसे स्टेटस चाहिए था। वो चाहता था कि लोग उसे देखकर सफलता की परिभाषा बदल दें। कम उम्र में ही उसने बिजनेस संभालना शुरू कर दिया। लेकिन बाकी बिजनेसमैन की तरह वो सिर्फ बोर्डरूम तक सीमित नहीं रहा। उसे कैमरे पसंद थे। उसे पता था कि भारत में लोग बैलेंस शीट नहीं देखते। लोग लाइफस्टाइल देखते हैं और यहीं से उसने खुद को एक ब्रांड बनाना शुरू किया। महंगी कारें, घोड़े, प्राइवेट जेट, यॉट, फैशन मॉडल्स, लग्जरी पार्टियां, जहां कैमरे जाते, वहां विजय माल्या दिखाई देता। धीरे-धीरे मीडिया ने उसे एक नया नाम देना शुरू किया। किंग ऑफ गुड टाइम्स। और सच कहें तो उस समय पूरा भारत उसकी चमक से प्रभावित था। 1991 के बाद भारत बदल रहा था। अर्थव्यवस्था खुल रही थी। विदेशी कंपनियां आ रही थीं। पहली बार भारतीय युवा बड़े बिजनेसमैन को फिल्म स्टार्स की तरह देखने लगे थे। और विजय माल्या इस नए द्वार का परफेक्ट चेहरा था। उसकी किंगफिशर और बीयर सिर्फ शराब नहीं थी। वो लाइफस्टाइल बन चुकी थी। टीवी विज्ञापनों में मॉडल्स, बीच, म्यूजिक, पार्टी, आजादी, यानी एक सपना। लोगों को लगने लगा कि विजय माल्या सफलता का दूसरा नाम है। लेकिन किसी ने यह नहीं देखा कि यह आदमी सिर्फ बिजनेस नहीं कर रहा था। वो एक भ्रम बेच रहा था। गुड टाइम्स और यही भ्रम आगे चलकर पूरे देश को बहुत महंगा पड़ने वाला था। 2003, मुंबई। भारत में एविएशन सेक्टर तेजी से बढ़ रहा था। मध्यम वर्ग पहली बार बड़ी संख्या में हवाई यात्रा कर रहा था। नई एयरलाइंस लॉन्च हो रही थी। बाजार खुल चुका था और तभी विजय माल्या एक ऐसा फैसला लेता है जिसने उसकी जिंदगी बदल दी। वो एयरलाइन बिजनेस में उतरने वाला था। लेकिन यहां एक समस्या थी। एयरलाइन इंडस्ट्री दुनिया की सबसे खतरनाक इंडस्ट्रीज में से एक मानी जाती है। बहुत ज्यादा खर्च, बहुत कम मुनाफा, फ्यूल महंगा, मेंटेनेंस महंगा, प्रतिस्पर्धा बेहद खतरनाक। कई विशेषज्ञ शुरुआत से कह रहे थे कि भारत में लग्जरी एयरलाइन मॉडल लंबे समय तक टिकना मुश्किल होगा। लेकिन विजय माल्या को सिर्फ बिजनेस नहीं चाहिए था। उसे आसमान चाहिए था। क्योंकि एयरलाइंस सिर्फ कंपनी नहीं थी। वो स्टेटस का सबसे बड़ा प्रतीक थी। 2005, किंगफिशर एयरलाइंस लॉन्च होती है और पूरा देश हैरान रह जाता है। एयर होस्टेस का ग्लैमरस प्रेजेंटेशन। लग्जरी सीट्स, इन फ्लाइट एंटरटेनमेंट, शानदार ब्रांडिंग। सब कुछ बाकी एयरलाइंस से अलग था। बाकी एयरलाइंस टिकट बेच रही थी। विजय माल्या एक्सपीरियंस बेच रहा था। मीडिया ने उसे भारतीय एविएशन का भविष्य घोषित कर दिया। लेकिन कैमरों के पीछे कहानी अलग थी। कंपनी जितनी तेजी से बढ़ रही थी, उतनी ही तेजी से पैसा जल रहा था। हर नया विमान करोड़ों का खर्च था। हर नया रूट जोखिम था। लेकिन विजय माल्या रुकना नहीं चाहता था क्योंकि अब यह बिजनेस नहीं रहा था। यह उसका ईगो प्रोजेक्ट बन चुका था और तभी विजय माल्या सबसे बड़ा दांव खेलता है। वो एयर डेक्कन खरीदने निकल पड़ता है। एयर डेक्कन उस समय भारत की सबसे बड़ी लो कॉस्ट एयरलाइन थी। लेकिन यहां सबसे खतरनाक बात यह थी कि किंगफिशर खुद पहले से आर्थिक दबाव में थी। फिर भी विजय माल्या एक्सपेंशन चाहता था। क्यों? क्योंकि अब यह सिर्फ बिजनेस नहीं रहा था। यह नंबर वन बनने की लड़ाई बन चुकी थी। एयर डेक्कन खरीदने के बाद खर्च और बढ़ गए। दो अलग बिजनेस मॉडल्स, दो अलग सिस्टम्स, दो अलग तरह के यात्री। पूरा ऑपरेशन अंदर से टूटने लगा। लेकिन बाहर अब भी सब कुछ चमकदार दिखाया जा रहा था। यहीं से शुरू होता है असली खेल। बैंक लगातार किंगफिशर को लोन देने लगते हैं। हजारों करोड़ रुपए एक के बाद एक। कुछ बैंक अधिकारियों को अंदर से शक था लेकिन विजय माल्या का नाम इतना बड़ा था कि लोग खतरे को नजरअंदाज कर देते। मीटिंग्स में वह आत्मविश्वास से भरा दिखाई देता। भविष्य के सपने दिखाता, नई योजनाएं बताता और धीरे-धीरे पूरा बैंकिंग सिस्टम उसके जाल में फंसता चला गया। कुछ जगह ब्रांड वैल्यू को आधार बनाया गया। यानी बैंक मान बैठे कि अगर कंपनी डूब भी गई तो किंगफिशर नाम बेचकर पैसा वापस मिल जाएगा। लेकिन यही सबसे बड़ी भूल थी क्योंकि ब्रांड भरोसे पर चलता है और जिस दिन भरोसा टूटता है ब्रांड खत्म हो जाता है। 2008, दुनिया आर्थिक संकट में थी। तेल की कीमतें ऊपर जा रही थीं। एयरलाइन इंडस्ट्री टूट रही थी। लेकिन भारत में विजय माल्या अब भी लग्जरी दिखा रहा था। यहीं से लोगों के मन में सवाल उठने शुरू हुए। अगर कंपनी घाटे में है तो मालिक की जिंदगी और ज्यादा आलीशान कैसे होती जा रही है? टीवी पर विजय माल्या पार्टी कर रहा था। दूसरी तरफ कर्मचारी सैलरी के लिए संघर्ष कर रहे थे। कुछ पायलट्स ने नौकरी छोड़ दी। एयरपोर्ट्स भुगतान मांगने लगे। लेकिन हर बार नया लोन आ जाता। पुराने कर्ज को बचाने के लिए नया कर्ज। यानी सिस्टम सिर्फ मरीज को जिंदा दिखा रहा था। इलाज कोई नहीं कर रहा था। किंगफिशर ऑफिस के अंदर माहौल बदल चुका था। कर्मचारी तनाव में थे। सैलरी महीनों से नहीं आई थी। कई लोग ईएमआई नहीं भर पा रहे थे। कुछ कर्मचारियों ने अपने बच्चों की फीस रोक दी। कुछ ने घर गिरवी रख दी है। लेकिन उसी समय टीवी चैनलों पर विजय माल्या की यॉट पार्टी दिखाई देती थी। यहीं से जनता का गुस्सा शुरू हुआ। क्योंकि भारत में लोग असफलता माफ कर देते हैं। लेकिन दिखावटी ऐशो आराम नहीं। और विजय माल्या शायद यही समझ नहीं पाया। दिल्ली और मुंबई के बोर्डरूम्स में लगातार मीटिंग्स हो रही थीं। कुछ बैंक अधिकारी कह रहे थे अब और पैसा देना खतरनाक है। लेकिन दूसरी तरफ डर भी था अगर इतनी बड़ी कंपनी डूबती है तो हजारों नौकरियां जाएंगी। बैंक का पैसा फंस जाएगा। सरकार पर सवाल उठेंगे और यही वजह थी कि हर बार नया रास्ता निकाला गया। कभी रिस्ट्रक्चरिंग, कभी रीपेमेंट एक्सटेंशन, कभी नया लोन। पुराने कर्ज को बचाने के लिए नया कर्ज। यानी बीमारी ठीक नहीं की जा रही थी। बस रिपोर्ट में मरीज को जिंदा दिखाया जा रहा था और यही सबसे खतरनाक हिस्सा था क्योंकि अब पूरा सिस्टम इस जाल में फंस चुका था। इस दौरान मीडिया का भी बड़ा रोल था। कई चैनल विजय माल्या की लाइफस्टाइल दिखाते रहे। उसकी पार्टियां, उसकी आईपीएल टीम, उसकी फार्मूला वन टीम, उसके कैलेंडर शूट। धीरे-धीरे जनता के दिमाग में एक भ्रम बैठ चुका था। इतना बड़ा आदमी कभी फेल नहीं हो सकता और यही भ्रम बैंकों के अंदर भी काम कर रहा था। अक्टूबर 2012, आखिर वो दिन आ जाता है। किंगफिशर एयरलाइंस का लाइसेंस सस्पेंड कर दिया जाता है। उड़ाने बंद, विमान खड़े, ऑफिस खाली, हजारों कर्मचारी बेरोजगार, पूरा सपना खत्म। लेकिन असली तूफान अब शुरू होने वाला था। क्योंकि अब सवाल सिर्फ बिजनेस फेलियर का नहीं था। अब सवाल था सो ₹9,000 करोड़ गए कहां? जो मीडिया कभी विजय माल्या को किंग ऑफ गुड टाइम्स कहती थी। अब वही चैनल उसे भगोड़ा कहने लगे। हर रात डिबेट्स होती। हर जगह गुस्सा था। बैंक दबाव में थे। सरकार दबाव में थी। लेकिन विजय माल्या अब भी आत्मविश्वास से बयान देता था। वो कहता मैंन पैसा नहीं चुराया। बिजनेस फेल हुआ है। लेकिन जनता अब यह बात मानने को तैयार नहीं थी। क्योंकि उनके सामने एक आदमी था जो हजारों करोड़ ड











