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How Tata Built India’s Most Powerful Business Empire | 2D Animation | Dokio

टाटा परिवार की शुरुआत से लेकर भारत के सबसे बड़े बिजनेस ग्रुप बनने तक की कहानी।

Key Takeaways

  • टाटा परिवार की शुरुआत पारसी समुदाय से हुई और उन्होंने व्यापार में विविधता लाई।
  • अफीम व्यापार से प्रारंभिक पूंजी जुटाई गई, जो आगे के विस्तार का आधार बनी।
  • मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में निवेश ने टाटा ग्रुप को मजबूत और स्थायी बनाया।
  • टाटा परिवार ने सामाजिक कल्याण योजनाओं के माध्यम से मजदूरों का समर्थन किया।
  • टाटा ग्रुप की सफलता में वैश्विक आर्थिक घटनाओं और नवाचारों की बड़ी भूमिका रही।

What the video covers

  • टाटा परिवार की शुरुआत फारस से हुई और पारसी समुदाय के रूप में भारत में बस गए।
  • शुरुआती व्यापार अफीम का था, जो ब्रिटिश साम्राज्य की ग्लोबल इकॉनमी का हिस्सा था।
  • जमशेदजी टाटा ने ट्रेडिंग से मैन्युफैक्चरिंग में कदम रखा और नागपुर में टेक्सटाइल मिल स्थापित की।
  • अमेरिकी सिविल युद्ध के दौरान कॉटन व्यापार में हुए बदलावों का टाटा परिवार ने फायदा उठाया।
  • टाटा परिवार ने ब्रिटिश शासन के दौरान कई चुनौतियों का सामना किया और अपने व्यापार को मजबूत किया।
  • टाटा ग्रुप ने धीरे-धीरे स्टील, मोटर्स, टेक्नोलॉजी, एयरलाइंस और होटल्स जैसे क्षेत्रों में विस्तार किया।
  • जमशेदजी टाटा की सोच और नवाचार ने टाटा ग्रुप को भारत का सबसे भरोसेमंद बिजनेस ग्रुप बनाया।
  • टाटा परिवार ने मजदूर कल्याण के लिए प्रोविडेंट फंड और हेल्थ इंश्योरेंस जैसी योजनाएं शुरू कीं।
  • टाटा ग्रुप की सफलता में युद्धकालीन सप्लाई और वैश्विक आर्थिक परिवर्तनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
  • वीडियो में टाटा ग्रुप की चुनौतियों, नाकामियों और सफलताओं का विस्तृत वर्णन है।

Answers

Questions about this video

टाटा परिवार की शुरुआत कहाँ से हुई थी?

टाटा परिवार की शुरुआत फारस (आज के ईरान) से हुई थी, जहाँ से पारसी समुदाय के लोग धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत के गुजरात में आकर बसे।

टाटा परिवार ने प्रारंभ में किस व्यापार से शुरुआत की थी?

टाटा परिवार ने प्रारंभ में अफीम के व्यापार से शुरुआत की थी, जो उस समय ब्रिटिश व्यापारियों के लिए सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाला कारोबार था।

जमशेदजी टाटा ने अपने व्यापार में क्या बड़ा बदलाव किया?

जमशेदजी टाटा ने ट्रेडिंग से मैन्युफैक्चरिंग में कदम रखा और नागपुर में आधुनिक टेक्सटाइल मिल स्थापित की, जिससे टाटा ग्रुप का आधार मजबूत हुआ।

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Speaker A
आज भारत में शायद ही कोई ऐसा परिवार हो जिसकी जिंदगी में Tata नाम की कोई चीज मौजूद ना हो। Tata Steel, Tata Motors, TCS, Air इंडिया, ताज होटल्स, Tata साt आज Tata हर इंडस्ट्री में फैला हुआ है। लेकिन
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Speaker A
कैसे एक अफीम बेचने वाला Tata परिवार आज भारत का इतना भरोसेमंद बिजनेस ग्रुप बन चुका है। इस ग्रुप [संगीत] ने अपने एक 155 साल के इतिहास में कई ऐसे मौके देखे, जब लगा कि सब कुछ खत्म हो जाएगा। पर हर बार T
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Speaker A
ग्रुप डट के खड़ा रहा और आज भारत का सबसे बड़ा बिजनेस ग्रुप बन चुका है। आइए जानते हैं टाटा ग्रुप की पूरी कहानी। [संगीत] टाटा परिवार की असली शुरुआत दरअसल भारत से नहीं बल्कि फारस यानी आज के ईरान से हुई
00:50
Speaker A
थी। आठवीं शताब्दी तक अरब देशों में इस्लाम का उदय हो चुका था। फारस जिसे आज ईरान कहा जाता है। वहां भी इस्लामी सेनाओं की जीत हो चुकी थी। इस वजह से फारस के पुराने धर्म यानी झठस्त्र [संगीत] धर्म को
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Speaker A
मानने वालों के लिए वहां रहना मुश्किल हो गया। धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए पारसी समुदाय के कई लोग ईरान छोड़कर भारत आ गए और गुजरात में आकर बस गए। इन्हीं शुरुआती पारसी परिवारों में से एक परिवार आज पिछली एक शताब्दी से भारत के बिजनेस
01:16
Speaker A
जगत पर राज कर रहा है। यह कहानी है टाटा परिवार की। टाटा परिवार गुजरात के नवसारी शहर में आकर बसा और अगली करीब 25 पीढ़ियों तक यह परिवार पुरोहित का काम करता रहा यानी धार्मिक कर्मकांड करवाने का काम।
01:29
Speaker A
लेकिन इसी परिवार में एक शख्स ऐसे थे जिन्होंने पुरोहित का पुश्तैनी काम छोड़कर बिजनेस में उतरने का फैसला किया। वह थे नूसरवाजी टाटा। यह फैसला उस दौर के लिए काफी अलग था। नूसरवान जी ने अपने बेटे जमशेद जी टाटा को अच्छी अंग्रेजी शिक्षा
01:44
Speaker A
दिलाई और खुद बॉम्बे आकर व्यापार में हाथ आजमाने लगे। नूर सरवान जी ने अपने साले दादा भाई टाटा के साथ मिलकर हांगकांग में एक बिजनेस शुरू किया जिसे टाटा एंड कंपनी कहा जाने लगा। अब यहां एक बात समझनी जरूरी
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Speaker A
है। दादा भाई टाटा असल में अफीम के कारोबारी थे। उनके देहांत के बाद उनके बेटे रतन जी दादा भाई टाटा यानी आर डी टाटा ने भी यही अफीम का व्यापार आगे बढ़ाया। अब सवाल यह उठता है भारतीय व्यापारी अफीम के धंधे में क्यों उतरे?
02:12
Speaker A
इसका जवाब समझने के लिए हमें उस दौर की ग्लोबल इकॉनमी को समझना होगा। उस वक्त अफीम ब्रिटिश व्यापारियों के लिए सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाला कारोबार था। इसकी असल कहानी चाय से जुड़ी है। ब्रिटिशर्स को चाय की भारी डिमांड थी और चाय का सबसे
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Speaker A
बड़ा प्रोड्यूसर था चीन। इसलिए चीन से चाय खरीदने के लिए ब्रिटिशर्स को हर साल करोड़ों पाउंड खर्च करने पड़ते थे। दिक्कत यह थी कि ब्रिटिशर्स के पास ना इतना सोना ना इतनी चांदी कि वो लगातार चीन को चाय के
02:38
Speaker A
बदले में दे सकें। तो ब्रिटिशर्स ने एक तरीका निकाला कि कोई ऐसी चीज चीन को बेची जाए जिसकी वहां की जनता को जरूरत हो और जिसके बदले में चाय ली जा सके। यहीं पर अफीम की एंट्री होती है। ब्रिटिशर्स ने
02:50
Speaker A
चीन को चाय के बदले अफीम देना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे चीन की एक बड़ी आबादी को अफीम की लत लग गई। यह देखकर चीन के शासकों ने अफीम पर बैन लगा दिए। [संगीत] लेकिन ब्रिटिश व्यापारी अवैध तरीकों से अफीम की
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Speaker A
स्मगलिंग चीन में करते रहे। इसी वजह से चीन और ब्रिटेन के बीच युद्ध शुरू हो गए। जिन्हें इतिहास में अफीम युद्ध यानी ओपियम वॉर्स कहा जाता है। आखिरकार ब्रिटेन ने यह युद्ध जीते और चीन से यह अधिकार ले लिया
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Speaker A
कि वह अफीम को चीन में बेच सकें। टाटा परिवार इसी सिस्टम का हिस्सा बनकर हांगकांग के रास्ते अफीम का व्यापार करता रहा। ओपीएम वॉर्स के दौरान भी और उसके [संगीत] बाद भी हांगकांग उस वक्त एक ब्रिटिश कॉलोनी थी। लेकिन जब वहां के
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Speaker A
प्रशासकों ने अफीम कारोबार पर लगाम कसने की कोशिश की तो आरडी टाटा ने बाकी व्यापारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश सरकार से हस्तक्षेप की अपील की ताकि उनका कारोबार जारी रह सके। उस दौर में अफीम का व्यापार सिर्फ टाटा परिवार तक सीमित नहीं
03:40
Speaker A
था। बॉम्बे के लगभग सभी बड़े व्यापारी घराने चाहे वह पारसी हो, गुजराती हो या मारवाड़ी इसी सिस्टम का हिस्सा थे। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने मालवा और बंगाल के इलाकों में अफीम की खेती को एक तरह से इंस्टीट्यूशनलाइज ऑन कर दिया था।
03:54
Speaker A
और बॉम्बे इस पूरे व्यापार का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट हब बन चुका था। इसलिए उस दौर में किसी भी बड़े व्यापारी परिवार के लिए इस कारोबार से पूरी तरह दूर रहना लगभग नामुमकिन था। यही वो आर्थिक व्यवस्था थी जिसमें टाटा परिवार ने अपनी शुरुआती पूंजी
04:08
Speaker A
जमा की। इसी दौर में टाटा परिवार ने अपना बिजनेस और भी फैलाना शुरू किया। यूरोप में कॉटन, चीन में अफीम और भारत में इलायची, चाय, सोना व कपड़े का इंपोर्ट, एक्सपोर्ट। इन सभी कारोबारों से जो मुनाफा जमा हुआ
04:22
Speaker A
वही आगे चलकर जमशेद जी टाटा के हाथों में एक ऐसी पूंजी बना जिसके दम पर वो मैन्युफैक्चरिंग जैसे बड़े रिस्की सेक्टर में उतरने की हिम्मत जुटा पाए। अब कहानी में एक नया मोड़ आता है जो टाटा के बिजनेस
04:34
Speaker A
को सीधा छूता है। 1861 में अमेरिका में 4 साल लंबा सिविल वॉर शुरू हो गया। अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने दास प्रथा को खत्म करने का फैसला लिया। जिसके विरोध में अमेरिका के कई दक्षिणी राज्यों ने विद्रोह कर दिया। यह राज्य दास प्रथा के जरिए ही
04:50
Speaker A
कॉटन की खेती करवाते थे और यही कॉटन इंग्लैंड की टेक्सटाइल फैक्ट्रियों में जाकर कपड़ा बनता था जो पूरी दुनिया में बिकता था। इस पूरे सिस्टम से अमेरिका और ब्रिटेन दोनों के व्यापारियों को भारी मुनाफा होता था। लेकिन जैसे ही अमेरिका
05:02
Speaker A
में सिविल वॉर छिड़ा अमेरिकी कॉटन की सप्लाई बुरी तरह गिर गई। इससे पूरी ग्लोबल टेक्सटाइल इंडस्ट्री में एक बड़ा डिसरप्शन आया और टाटा परिवार ने इस मौके का फायदा उठाया। उन्होंने अपने कॉटन प्रोडक्ट्स के लिए मार्केट रेट से दोगुना दाम वसूलना
05:16
Speaker A
शुरू कर दिया। इन्हीं दिनों टाटा ने एशिया के बाहर एक्सपैंड [संगीत] करने की सोची और लंदन में अपनी पहली ब्रांच खोलने के लिए जमशेद जी टाटा को भेजा। लेकिन यहीं से टाटा परिवार की पहली बड़ी नाकामी की कहानी
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Speaker A
शुरू होती है। जैसे ही अमेरिकी सिविल वॉर खत्म हुआ, अमेरिका फिर से इंग्लैंड को कॉटन सप्लाई करने लगा और टाटा का कारोबार भारी घाटे में जाने लगा। उनके इन्वेस्टर्स अपना पैसा वापस मांगने लगे। बहुत मिन्नतों के बाद इन्वेस्टर्स ने उन्हें पैसा चुकाने
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Speaker A
के लिए थोड़ा वक्त दिया लेकिन इतना भारी नुकसान हुआ कि जमशेद जी टाटा को अपना खुद का बंबई वाला घर तक बेचना पड़ा ताकि किसी तरह इन्वेस्टर्स का पैसा चुकाया जा सके। यह मोमेंट जमशेद जी की पूरी सोच को बदलने
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Speaker A
वाला साबित हुआ। इस नाकामी के बाद उन्होंने इंग्लैंड में ही रुककर मैन्युफैक्चरिंग को गहराई से समझने का फैसला किया। उन्हें एहसास हुआ अब तक वह सिर्फ कॉटन का व्यापार यानी ट्रेडिंग कर रहे थे। अगर वह मैन्युफैक्चरिंग पर ध्यान
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Speaker A
दें तो अपने बिजनेस को कहीं ज्यादा मजबूत और बड़ा बना सकते हैं। इसी दौर में एक और घटना हुई जो टाटा परिवार के लिए मुनाफे का जरिया बनी। 1868 में अबसीनिया यानी आज के इथियोपिया में एक विवाद सुलझाने के लिए
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Speaker A
भेजे गए ब्रिटिश दूतों को वहां के राजा ने जेल में डाल दिया। ब्रिटिशर्स इस बात से आग बबूला हो गए कि एक छोटे से देश का राजा उन्हें आंखें दिखा रहा है। उन्होंने राजा को सबक सिखाने के लिए 16,000 सैनिकों की
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Speaker A
एक फौज अभी सीनिया भेज दी। लेकिन इतनी बड़ी फौज को खाना, कंबल और बाकी जरूरी सामान चाहिए था। इसके लिए ब्रिटिशर्स ने नुसरवांजी टाटा से संपर्क किया। इतनी बड़ी फौज को अपनी तरफ आते देख अभी सीनिया के राजा ने आत्महत्या कर ली। लेकिन इस पूरे
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Speaker A
ऑपरेशन से नुसरवांजी टाटा ने भारी मुनाफा कमाया। यानी अफीम के कारोबार और युद्ध के समय की सप्लाई से टाटा परिवार के पास अब इतना पैसा जमा हो चुका था कि वह सिर्फ सामान बेचने पर नहीं बल्कि सामान बनाने पर
07:02
Speaker A
भी ध्यान दे सकते थे। लंदन में कपड़े के कारोबार को गहराई से समझने के बाद 1869 में जमशेद जी टाटा ने साउथ बॉम्बे के चिंचपोकली इलाके में एक बंद पड़ी हुई तेल की मिल को खरीद लिया और उसे कॉटन मिल में
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Speaker A
बदल दिया। उन्होंने इस मिल का नाम एलेक्जेंडर मिल रखा। यह मिल करीब 2 साल तक अच्छी तरह चली और 2 साल बाद जमशेद जी ने इसे एक लोकल कॉटन व्यापारी को मुनाफे में बेच दिया। पहली मिल बेचने के बाद 1873 में
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Speaker A
जमशेद जी टाटा ने सोचा जिस तरह की लेबर कल्चर और इंडस्ट्रियल प्रैक्टिस ब्रिटेन में है वैसी ही चीजें अगर भारत में लागू की जाएं तो यहां भी एक बड़ा टेक्सटाइल बिजनेस खड़ा किया जा सकता है। उस दौर में
07:37
Speaker A
कॉटन इंडस्ट्री के लिए बॉम्बे शहर को ही सबसे उपयुक्त माना जाता था। लेकिन जमशेद जी ने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने ऐसे शहर की तलाश की जहां कॉटन उगता हो, पानी की कमी ना हो। कोयला जैसा ईंधन आसानी से
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Speaker A
मिले और रेलवे नेटवर्क भी अच्छा हो। इस तलाश में उन्हें महाराष्ट्र का नागपुर शहर सबसे उपयुक्त लगा। उन्होंने वहां भारी निवेश करके अपनी खुद की मैन्युफैक्चरिंग मिल खोली जिसका नाम उन्होंने एम्रेस मिल रखा। 1 जनवरी 1877 के दिन यह मिल शुरू
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Speaker A
हुई। उन्होंने इंग्लैंड के मैनचेस्टर शहर से लेटेस्ट मशीनरी मंगवाई। लेकिन एक नई दिक्कत सामने आ गई। नागपुर का वर्क कल्चर बॉम्बे से बिल्कुल अलग था। नागपुर के मजदूर काफी ढीले ढाले तरीके से काम करते थे और छोटी-मोटी बातों पर छुट्टियां ले
08:18
Speaker A
लिया करते थे। इस समस्या को सुलझाने के लिए जमशेद जी ने एक इनोवेटिव तरीका अपनाया। उन्होंने एक प्रोविडेंट फंड स्कीम शुरू की। साथ ही काम के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं के लिए हेल्थ इंश्योरेंस भी शुरू किया। फैमिली डेज और स्प
08:30
Speaker A
जैसे इवेंट्स भी मनाए जाने लगे। जिनमें अच्छा परफॉर्म करने वाले मजदूरों को सोने की चैन, घड़ियां और नकद इनाम दिए जाते थे। यह तरीका काम आया। नागपुर के मजदूर अपने काम को गंभीरता से लेने लगे। इसके बाद जमशेद जी ने मुंबई के पास मौजूद कुरला की
08:46
Speaker A
एक मेल भी खरीद ली जिसे रेशम के व्यापार के लिए इस्तेमाल किया गया। 1880 के दशक से जमशेद जी का ध्यान आयरन और स्टील इंडस्ट्री की तरफ जाने लगा। इसके लिए उन्होंने भारत में कोयला उत्पादक इलाकों का सर्वे शुरू करवाया। स्टील बनाने के लिए
09:00
Speaker A
तीन चीजें जरूरी होती हैं। कोयला, लोहे का अयस्क यानी आयरन और पानी। इस इंडस्ट्री में हाथ आजमाने के लिए जमशेद जी दुनिया के मशहूर मेटलर्जिकल एडवाइजर जूलियन केनेडी से मिलने अमेरिका गए और वहां बर्मिंघम शहर में जाकर पूरी स्टील इंडस्ट्री को बारीकी
09:17
Speaker A
से समझा। उन्होंने भारत के अलग-अलग इलाकों से माइनिंग सैंपल्स इकट्ठा करके जर्मनी भेजे ताकि पता चल सके कि उनमें आयरन की मात्रा और क्वालिटी कैसी है। लेकिन शुरुआती सैंपल्स में काफी खराब क्वालिटी का लोहा मिला। अगले पूरे 17 साल जमशेद जी
09:31
Speaker A
पूरे भारत में घूमते रहे। जगह-जगह से सैंपल्स इकट्ठा करते रहे। बार-बार फेल होते हुए। इस पूरे सफर में उनके साथ उनके बेटे दोराबाजी भी शामिल थे। आखिरकार बंगाल में रहने वाले एक जियोलॉजिस्ट पीएन बोस से जमशेद जी को पता चला कि उड़ीसा के मयूरभंज
09:46
Speaker A
जिले में लोहे का भंडार है। वहां की जमीन में करीब 60% आयरन ओर मौजूद था। लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। स्टील प्लांट बनने और इस प्रोजेक्ट को असल में शुरू होते देखने से पहले ही जमशेद जी टाटा का
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Speaker A
देहांत हो गया। एक आदमी जिसने अपनी जिंदगी के आखिरी 17 साल एक ही सपने के पीछे लगा दिए। वो उस सपने को शुरू होते हुए भी नहीं देख पाया। जमशेद जी के देहांत के बाद टाटा ग्रुप की पूरी जिम्मेदारी उनके बेटे
10:10
Speaker A
दौराबाजी टाटा के कंधों पर आई। दोराबजी ने अपने पिता के अधूरे स्टील और बिजली दोनों प्रोजेक्ट्स को पूरा करने की ठानी। मयूरभंज में लोहे के भंडार की जानकारी मिलने के बाद दोराबाजी टाटा और सापुरजी सकलात वाला कुछ सर्वेयर्स के साथ प्लांट
10:24
Speaker A
के लिए सही जगह ढूंढने निकल पड़े। आखिरकार दिसंबर 1907 में मयूरभ जिले के पास मौजूद साक्षी नाम की जगह तय हुई क्योंकि यहां पास में ही दो नदियां स्वर्णरेखा और खरकई बहती थी और आसपास कोयले के भंडार भी मौजूद
10:39
Speaker A
थे। यानी कोयला, लोहा और पानी तीनों जरूरी चीजें यहां मौजूद थी। लेकिन अब सवाल था इतना बड़ा प्लांट बनाने के लिए पैसा कहां से आए? उस दौर में भारत में इतने बड़े स्तर का कोई प्रोजेक्ट नहीं हुआ था। इसलिए
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Speaker A
कोई भी बड़ा इन्वेस्टर इसमें पैसा लगाने को तैयार नहीं था। आखिरकार Tata ने आम जनता से पैसे जुटाने का फैसला किया। 26 अगस्त 1907 के दिन Tata ने अपनी नई कंपनी का एक बड़ा पब्लिक इशू जारी किया। यह
11:02
Speaker A
पब्लिक इशू जबरदस्त हिट रहा। सिर्फ तीन हफ्तों में करीब 8000 लोगों ने इसमें निवेश किया और पूरा जरूरी पैसा इकट्ठा हो गया। इस तरह 1907 में T आयरन एंड स्टील कंपनी यानी Tisco का जन्म हुआ। इसी के बाद
11:16
Speaker A
से T ग्रुप की सभी कंपनियों के नाम के आगे Tata नाम इस्तेमाल होना शुरू हुआ। 1912 में Tisco के प्लांट से पहला बार स्टील बनकर निकला। लेकिन जमशेद जी टाटा का एक और अधूरा सपना था। अपनी खुद की बिजली बनाकर
11:29
Speaker A
बेचना। जमशेद जी को लगता था कि कोयले से चलने वाली मैन्युफैक्चरिंग मिलें उनकी बिजली की सबसे बड़ी ग्राहक बन सकती है। उन्होंने गोवा के पास की एक नदी का इस्तेमाल करके बिजली बनाने और उसे ब्रिटिश शासित बॉम्बे को बेचने का प्लान बनाया था।
11:41
Speaker A
लेकिन उनकी मौत से पहले यह प्रोजेक्ट शुरू नहीं हो पाया। जमशेद जी की मौत के बाद बॉम्बे के नए गवर्नर बने लॉर्ड सिडनहम को यह प्रोजेक्ट पसंद आया। शुरुआत में सिर्फ दो क्लाइंट्स टाटा से बिजली खरीदने को तैयार हुए। लेकिन सिडनहम के प्रभाव से
11:55
Speaker A
टाटा को जरूरी पूंजी जुटाने में कामयाबी मिली। इस तरह 1911 में हाइड्रोइिक डैम प्रोजेक्ट पूरा हुआ और उसी साल के आसपास Tisco के प्लांट से भी स्टील बनना शुरू हो चुका था। टाटा को खुद नहीं पता था कि अगले
12:07
Speaker A
ही 3 साल में उनके स्टील बिजनेस को एक बहुत बड़ा उछाल मिलने वाला है। 1914 में पहला विश्व युद्ध शुरू हो गया। युद्ध के दौरान ब्रिटेन को टैंक्स, ट्रक्स और रेलवे लाइनों के लिए भारी मात्रा में स्टील की
12:18
Speaker A
जरूरत पड़ी। खासकर मेसोपोटामिया रीजन में यह सारी चीजें स्टील से बनती थी और टिस्को के लिए यह एक तरह की लॉटरी लग गई। एक तरीके से पहला विश्व युद्ध टिस्को का पहला बड़ा ग्राहक बना। कंपनी के मजदूरों ने कई
12:29
Speaker A
सालों तक दिन रात मेहनत करके इस डिमांड को पूरा किया और कंपनी को जबरदस्त तरक्की मिली। इसी योगदान को देखते हुए 1919 में भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड चेम्सफर्ड ने साक्षी का नाम बदलकर जमशेदपुर कर दिया। जमशेद जी टाटा के सम्मान में। लेकिन जिस
12:45
Speaker A
युद्ध ने टिस्को को आसमान पर पहुंचाया उसी युद्ध के खत्म होते ही कंपनी को अपनी सबसे भयंकर मुसीबत का सामना करना पड़ा। इतनी भयंकर कि खुद दोराबाजी को अपनी पत्नी के गहने तक गिरवी रखने पड़े। 1919 में पहला
12:58
Speaker A
विश्व युद्ध खत्म होते ही मार्केट की हालत अचानक बिगड़ने लगी। वर्क फोर्स जरूरत से ज्यादा बढ़ चुकी थी और टाटा स्टील का सबसे बड़ा ग्राहक जापान उन दिनों एक भयंकर भूकंप से जूझ रहा था। जिससे स्टील की डिमांड और गिर गई। इन सब वजहों से स्टील
13:12
Speaker A
का प्रोडक्शन इतना कम हो गया कि टाटा के मजदूरों को सैलरी देना तक मुश्किल हो गया। [संगीत] इसी बीच बैंकों ने भी टाटा स्टील का लोन बढ़ाने से मना कर दिया और कंपनी को बंद करने तक की नौबत [संगीत] आ गई। इस
13:23
Speaker A
मुसीबत से निकलने के लिए दोराबाजी टाटा को ना सिर्फ अपनी पर्सनल संपत्ति बेचनी पड़ी बल्कि अपनी पत्नी लेडी मेहरबाई टाटा के गहने तक गिरवी रखने पड़े। इस तरह दोराबाजी ने खुद कुछ करोड़ इकट्ठा किए और ग्वालियर के महाराजा से भी ₹1 करोड़ का लोन लिया।
13:38
Speaker A
लेकिन इस संकट से जूझते-जूझते ही Tata ग्रुप पर एक और मुसीबत आ गई। ब्रिटिश सरकार ने अपनी खुद की कंपनियों को बचाने के लिए भारतीय मार्केट का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। यानी भारतीय कंपनियों की जगह ब्रिटिश कंपनियों से स्टील खरीदना
13:51
Speaker A
शुरू किया जिससे टाटा स्टील पर दोहरी मार पड़ी। यहां एक दिलचस्प मोड़ आता है। मोहम्मद अली जिन्ना और जवाहरलाल नेहरू दोनों ने मिलकर टाटा की मदद की और ब्रिटिश सरकार से अनुरोध किया कि ब्रिटेन से भारत आने वाले स्टील पर ड्यूटी लगाई जाए ताकि
14:05
Speaker A
भारतीय स्टील कंपनियों को थोड़ी राहत मिल सके। शुरुआत में ब्रिटिश सरकार इसके खिलाफ थी। लेकिन आखिरकार उन्होंने नेहरू और जिन्ना की बात मान ली। शायद यही इकलौता ऐसा मामला था जिसमें अंग्रेजी सरकार ने किसी ब्रिटिश कंपनी के मुकाबले एक भारतीय
14:18
Speaker A
कंपनी को तरजीह दी। इस तरह जैसे तैसे टाटा स्टील अपनी पटरी पर वापस लौटी। 1920 के दशक में टाटा स्टील की हालत ज्यादा अच्छी नहीं थी। लेकिन दो राबजी बिजनेस को आगे बढ़ाते रहे। 1931 में उनकी पत्नी लेडी
14:30
Speaker A
मेहरबाई का निमोनिया की वजह से देहांत हो गया। अपनी पत्नी की याद में दोराबाजी ने कैंसर रिसर्च के लिए लेडी टाटा मेमोरियल ट्रस्ट बनाया। इसके सिर्फ एक साल बाद 1932 में लंदन जाते वक्त हार्ट अटैक से खुद दोराबाजी का भी देहांत हो गया। दोराबाजी
14:46
Speaker A
के बाद टाटा ग्रुप की कमान संभाली जमशेद जी के भतीजे नौरोजी सकलातवाला ने। नौरोजी जमशेद जी की बहन वीर बाई जी टाटा के बेटे थे। यानी दोराबाजी की बुआ के बेटे। इसी वजह से उनका सरनेम टाटा नहीं बल्कि
14:59
Speaker A
सकलातवाला था। लेकिन 1938 में नौरोजी सकलातवाला का भी देहांत हो गया और अब टाटा ग्रुप की पूरी जिम्मेदारी आई जहांगीर रतनजी दादा भाई टाटा यानी जेआरडी टाटा के पास जिस वक्त जेआरडी टाटा ने टाटा ग्रुप की कमान संभाली उस वक्त टाटा ग्रुप की
15:14
Speaker A
फाइनेंशियल हालत बहुत खराब थी 1924 के संकट का असर अभी भी बाकी था। [संगीत] इस गहरे गड्ढे से निकलने के लिए जेआरडी ने सबसे पहले वो सारे बिजनेस बंद करने शुरू किए जो घाटे में चल रहे थे। उन्होंने अपने
15:26
Speaker A
पिता आरडी टाटा के कई मकान भी बेच दिए। इस पूरे वक्त वह टाटा स्टील के एमडी जॉन पीटरसन से लगातार सीखते रहे जो आगे चलकर उनके मेंटर बन गए। जेआरडी का बचपन बाकी भारतीय बिजनेस लीडर्स से काफी अलग रहा था।
15:40
Speaker A
उनका जन्म पेरिस में हुआ था। उनकी मां फ्रेंच थी और उनकी शुरुआती परवरिश यूरोप के माहौल में हुई थी। शायद यही वजह थी कि जब उन्होंने टाटा ग्रुप की कमान संभाली तो उनका मैनेजमेंट स्टाइल उस दौर के बाकी
15:52
Speaker A
भारतीय बिजनेसमैन से अलग, कहीं ज्यादा प्रोफेशनल और सिस्टैटिक था। वह पहले भारतीय बिजनेस लीडर्स में से थे जिन्होंने प्रोफेशनल मैनेजरों को कंपनी चलाने की जिम्मेदारी दी। बजाय इसके कि हर फैसला सिर्फ फैमिली के हाथों में रखा जाए। जे
16:06
Speaker A
आरडी टाटा ने 1925 में ही टाटा ग्रुप ज्वाइन कर लिया था। लेकिन उनकी असली पहचान आसमान से जुड़ी थी। एक बार ब्रिटिश पायलट नेविल विंसेंट भारत में हवाई सफर को बढ़ावा देने आए हुए थे। उन्होंने जेआरडी को सुझाव दिया कि वह अपनी खुद की एयरलाइन
16:20
Speaker A
शुरू करें। जेआरडी ने इस सुझाव पर बहुत सोचा और विंसेंट के साथ पार्टनरशिप करके एक एिएशन कंपनी शुरू की। इस तरह 1932 में टाटा एिएशन सर्विस की शुरुआत हुई। पहली फ्लाइट कराची, बॉम्बे और मद्रास के बीच शुरू हुई और जैसे ही मुनाफा होने लगा तो
16:37
Speaker A
दिल्ली बॉम्बे रूट पर भी उन्होंने एक बड़ा प्लेन उतारा। 1938 में जेआरडी को टाटा सनंस का चेयरमैन बनाया गया और नवल टाटा को कंपनी का डायरेक्टर बनाया गया। 1939 में जब दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ तो एक बार
16:51
Speaker A
फिर स्टील की डिमांड बढ़ी और टाटा की फैक्ट्रियों के बनाए टैंक्स काफी लोकप्रिय हुए। लेकिन एयरलाइन बिजनेस को झटका लगा। ब्रिटिश सरकार ने सभी प्राइवेट विमान जब्त कर लिए। इस पर नेविल विंसेंट की सलाह पर टाटा ग्रुप ने जहाज उड़ाने की जगह जहाज
17:05
Speaker A
बनाने की योजना बनाई और इसके लिए पुणे में टाटा एयरक्राफ्ट लिमिटेड कंपनी बनाई। लेकिन सरकार ने अचानक इसकी अनुमति ही खारिज कर दी। इसलिए युद्ध के दौरान Tata का एयरक्राफ्ट बनाने का सपना पूरा नहीं हो सका। 1945 में दूसरा विश्व युद्ध खत्म
17:20
Speaker A
होने के बाद कमर्शियल एयरलाइंस दोबारा शुरू हुई। 1946 में Tata Airlines एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी बन गई और इसका नाम बदल कर रखा गया Air इंडिया। अब यहां एक बात ध्यान देने वाली है जो ज्यादातर लोग नहीं जानते 1948 में यानी भारत की आजादी
17:37
Speaker A
के ठीक [संगीत] बाद भारत सरकार ने एयर इंडिया में हिस्सेदारी ले ली। यह पूरी नेशनलाइजेशन की कहानी सिर्फ 1953 की नहीं है। इसकी शुरुआत तो आजादी मिलने के साल भर के भीतर ही हो चुकी थी। इसी दौर में एक और
17:49
Speaker A
दिलचस्प घटना हुई थी। आजादी के वक्त भारत में कॉस्मेटिक्स सिर्फ इंपोर्ट किए जाते थे, लेकिन डॉलर की बढ़ती कीमत की वजह से सरकार इनका इंपोर्ट कम कर रही थी। कई महिला संगठन इससे नाराज हुए और नेहरू से समाधान मांगा। सरकार ने टाटा ग्रुप को
18:03
Speaker A
कॉस्मेटिक्स बिजनेस शुरू करने के लिए कहा। एक तरफ सरकार Air India को नेशनलाइज करके अपने कब्जे में लेना चाहती थी जिससे Tata और सरकार के बीच खींचतान चल रही थी और दूसरी तरफ वही सरकार कॉस्मेटिक्स फैक्ट्री शुरू करने के लिए टाटा ग्रुप को पूरा
18:19
Speaker A
समर्थन देने को तैयार थी। सरकार के इसी समर्थन से टाटा ने लकमे की शुरुआत की जो जल्द ही घर-घर में मशहूर हो गया। आजादी के बाद टाटा ने और भी क्षेत्रों में हाथ आजमाया। जमशेदपुर में एक छोटी सी रेलवे
18:31
Speaker A
फैक्ट्री थी जिसे जेआरडी टाटा ने खरीदकर Tata लोकोमोटिव एंड इंजीनियरिंग कंपनी में बदल दिया। 1949 में सुमंत मूलगांवकर को इस नई कंपनी की जिम्मेदारी दी गई। 1950 में डेमलर बेंच कंपनी Tata के पास एक पार्टनरशिप का प्रस्ताव लेकर आई। लंबी
18:47
Speaker A
बातचीत के बाद दोनों पक्ष एक ड्राफ्ट पर सहमत हुए। लेकिन Tata को शक था कि सरकार इसकी मंजूरी नहीं देगी। क्योंकि उस दौर की सरकार का मानना था कि भारी उद्योग और बुनियादी वस्तुएं बनाने वाले उद्योग सरकार के नियंत्रण में ही होने चाहिए। प्राइवेट
19:02
Speaker A
हाथों में नहीं। हालांकि अंत में सरकार ने मंजूरी दे दी और इस तरह भारत की पहली बड़ी इंजीनियरिंग कंपनी बनी टेलको जिसकी पूरी जिम्मेदारी मूलगांवकर को दी गई। लेकिन मूलगांवकर का मानना था कि इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए टेलको का टाटा स्टील से
19:17
Speaker A
अलग होना जरूरी है। इसलिए महाराष्ट्र के पुणे शहर में टेलको का अलग प्लांट लगाया गया। Tata के ट्रक इंजन इतने हिट हुए कि थोड़े ही वक्त में कंपनी ने ट्रक मार्केट के करीब 70% हिस्से पर कब्जा कर लिया।
19:28
Speaker A
1960 के दशक में जेआरडी टाटा और मूलगांवकर ने पैसेंजर कार बनाने की सोची। सरकार को राजी करने के लिए उन्होंने बेंच से कुछ कारें मंगवाकर एक साल के लिए बड़े लोगों को इस्तेमाल के लिए दी। फीडबैक जबरदस्त मिला। लेकिन इसके बावजूद सरकार ने कार
19:43
Speaker A
निर्माण का लाइसेंस देने से इंकार कर दिया। Benz ने निराश होकर अपना ध्यान सिंगापुर की तरफ मोड़ लिया। जहां से भारत सालों तक महंगी कारें खरीदता रहा। Tata को पैसेंजर कार बनाने के लिए अभी और लंबा इंतजार करना था। इसी दौरान सरकार और JRD
19:57
Speaker A
Tata के बीच Air इंडिया को लेकर सालों से चल रही खींचतान आखिरकार एक बड़े फैसले में बदलने वाली थी और इस बार JRD को अपनी सबसे प्यारी कंपनी सचमुच खोनी थी। आजादी के बाद से ही सरकार और JRD टाटा के बीच Air
20:10
Speaker A
इंडिया को लेकर खींचतान चल रही थी। भारत सरकार एयर इंडिया को पूरी तरह अपने कब्जे में लेना चाहती थी और जे आरडी टाटा एक उचित मुआवजे की मांग कर रहे थे। [संगीत] वह चाहते थे कि एक मुआवजा समिति बनाई जाए
20:21
Speaker A
जो तय करें कि नेशनलाइजेशन के बदले टाटा ग्रुप को कितना मुआवजा मिलेगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस मांग के खिलाफ थे और उन्होंने संचार मंत्री बाबू जगजीवन राम को मुआवजा तय करने की जिम्मेदारी दी। लेकिन जगजीवन राम ने जो
20:35
Speaker A
मुआवजा तय किया वो बहुत कम था। आखिरकार 1953 में सरकार ने Air इंडिया को पूरी तरह अपने कब्जे में ले लिया। हालांकि नेहरू ने Air इंडिया को चलाने की जिम्मेदारी अब भी Tata ग्रुप को ही सौंपी। लेकिन उस दौर की
20:48
Speaker A
दुनिया की सबसे बेहतरीन एयरलाइंस में गिनी जाने वाली Air इंडिया सरकार के नियंत्रण में जाने के बाद धीरे-धीरे अपनी रैंकिंग खोने लगी। 1956 में सरकार एक इंडस्ट्रियल पॉलिसी रेजोल्यूशन लेकर आई जिसमें इंडस्ट्रीज को तीन हिस्सों में बांटा गया।
21:02
Speaker A
पहला वो जो पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में रहेंगी जैसे रेलवे, सिविल एिएशन और रक्षा दूसरा प्राइवेट कंपनियां और तीसरा वो प्राइवेट कंपनियां जिन्हें आगे नेशनलाइज किया जाना था जैसे इंश्योरेंस। [संगीत] इसी नीति के तहत सरकार ने Tata ग्रुप की
21:18
Speaker A
न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी को भी अपने कब्जे में ले लिया जो उस वक्त भारत की सबसे बड़ी इंश्योरेंस कंपनी थी। इस तरह सिर्फ 4 साल के भीतर Tata की तीन बड़ी कंपनियां एयर इंडिया, एयर इंडिया इंटरनेशनल और न्यू इंडिया असोरेंस सरकार
21:32
Speaker A
के पास चली गई। 1969 में सरकार मोनोपोलीज एंड रिस्ट्रिक्टिव ट्रेड प्रैक्टिसेस एक्ट यानी एमआरटीपी एक्ट लेकर आई जिसके दायरे में ₹20 करोड़ से ज्यादा नेटवर्थ वाली सभी कंपनियां आ गई। जिन कंपनियों का मार्केट के 1/3 से ज्यादा हिस्से पर कब्जा का था,
21:48
Speaker A
उन्हें मोनोपोली माना गया। और अब यह फैसला कि यह कंपनियां क्या और कितना उत्पादन करेंगी, कहां निवेश करेंगी, यह सब सरकार के हाथ में आ गया। इस एक्ट के बाद टाटा ग्रुप की अपनी कंपनियों के बारे में स्वतंत्र फैसला लेने की ताकत काफी हद तक
22:02
Speaker A
छीन गई। 1975 [संगीत] में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द किया तो जेआरडी टाटा ने इंदिरा गांधी का समर्थन किया। यहां तक कि उन्हीं के वकील ने इंदिरा गांधी का केस लड़ा। इसके लिए जेआरडी को काफी आलोचना झेलनी पड़ी। जब
22:15
Speaker A
इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई तब भी जेआरडी टाटा ने इसका समर्थन किया। यह कहते हुए कि जब तक इमरजेंसी देश में अनुशासन ला रही है, उन्हें इससे कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी की पार्टी चुनाव हार गई और मोरारजी देसाई
22:29
Speaker A
प्रधानमंत्री बने। मोरारजी देसाई और जे आरडी टाटा के रिश्ते पहले से ही जटिल थे। तो टाटा ग्रुप की मुश्किलें बढ़नी लगभग तय थी। प्रधानमंत्री बनते ही मोरारजी देसाई ने जे आरडी टाटा को एटॉमिक एनर्जी कमीशन से हटा दिया और पूर्व वायुसेना प्रमुख
22:44
Speaker A
पीटसी लाल को एयर इंडिया का हेड बना दिया। मतलब JRD Tata को उस कंपनी से ही बाहर कर दिया जिसे उन्होंने खुद शुरू किया था। JRD Tata इस सबसे गहरे तक आहत हुए लेकिन जानते थे कि अब वह कुछ नहीं कर सकते। हालांकि इस
22:58
Speaker A
दौर में सब कुछ खराब ही नहीं हुआ। उस वक्त के उद्योग मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस ने Tata की ACC सीमेंट कंपनी के विस्तार को मंजूरी दे दी। जिससे Tata केमिकल्स और Tata Motors को सीमेंट बिजनेस में उतरने का मौका मिला। Tata इलेक्ट्रिक कंपनियों की
23:11
Speaker A
क्षमता बढ़ाने के आवेदन को भी मंजूरी मिल गई। हालांकि यहां भी एक खतरा मंडरा रहा था। फर्नांडिस बहुत सारी प्राइवेट कंपनियों को नेशनलाइज करना चाहते थे और सारे ऑटो बिज़नेसेस को मिलाकर एक बड़ी नेशनलाइज्ड कंपनी बनाना चाहते थे। जिसका
23:24
Speaker A
हेड जेआरडी को ही बनाया जाना था। यानी Tata Steel को भी नेशनलाइज करने की योजना थी। लेकिन काफी आलोचना के बाद सरकार ने यह विचार त्याग दिया और Tata ग्रुप पर मंडरा रहा यह संकट टल गया। इस दौर तक T ग्रुप की
23:37
Speaker A
अलग-अलग कंपनियों को कई ताकतवर लोग स्वतंत्र रूप से चला रहे थे। एमआरटीपी एक्ट के बाद Tata की कंपनियां लिस्टेड थी जिन्हें कोई भी पब्लिक मार्केट से खरीद सकता था। टाटा स्टील के शेयर भी खुद टाटा से ज्यादा बिरला परिवार के पास थे। यानी
23:52
Speaker A
वो कभी भी टाटा स्टील पर दावा कर सकते थे। इसी वजह से जेआरडी टाटा ने अपने बिजनेस को मजबूत करने पर ध्यान देना शुरू किया। इन सबके अलावा जेआरडी ने 1962 की इंडो चाइना वॉर और 1965 की इंडोपाक वॉर के दौरान
24:07
Speaker A
सरकार को हर तरह का सपोर्ट दिया। टेलको में डिफेंस इक्विपमेंट की मैन्युफैक्चरिंग [संगीत] शुरू करवाई और भारतीय वायुसेना के लिए एक पूरा डिफेंस प्रिपयर्डनेस प्लान तैयार करवाया। इन्हीं योगदानों के चलते उन्हें ऑनरेरी एयर कमोडोर की उपाधि भी दी
24:20
Speaker A
गई। 1984 में JRD ने Titan Industries की भी शुरुआत करवाई। भारत की पहली क्वड्स वॉच कंपनी जो आगे चलकर Titan और तनिष्क जैसे ब्रांड्स में तब्दील होगी और आज ज्वेलरी सेक्टर में Tata ग्रुप की सबसे बड़ी पहचान बन चुकी है। समय के साथ जैडी की उम्र भी
24:36
Speaker A
ढल रही थी और अब Tata ग्रुप में सबसे बड़ा सवाल उठने लगा। उनका उत्तराधिकारी कौन होगा? जिस शख्स को पहले चुना गया उसने खुद इंकार कर दिया और यहीं से रतन टाटा की एंट्री होती है। जेआरडी टाटा शुरुआत में
24:48
Speaker A
नुसली वाडिया को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। नुसली वाडिया का रिश्ता भी टाटा परिवार से जुड़ा था। लेकिन नुसली वाडिया ने यह कहकर टाटा ग्रुप की जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया कि वह वाडिया हैं और कभी टाटा नहीं बन पाएंगे। इसके बाद जेआरडी ने
25:02
Speaker A
अपने परिवार के अंदर ही उत्तराधिकारी ढूंढना शुरू किया और उनकी नजर गई रतन टाटा पर। वही रतन टाटा जो नवल टाटा के बेटे थे। रतन टाटा 1981 से टाटा इंडस्ट्रीज संभाल रहे थे। जेआरडी को लगता था कि रतन टाटा को
25:15
Speaker A
अभी और एक्सपोज़र और अनुभव चाहिए लेकिन उनके पास ज्यादा वक्त नहीं था। जेआरडी की खुद की कोई संतान नहीं थी। इसलिए उन्होंने नवल टाटा के बेटे को ही अपना उत्तराधिकारी चुन लिया। इस तरह 1991 में रतन टाटा को
25:28
Speaker A
टाटा ग्रुप की पूरी जिम्मेदारी मिल गई। रतन टाटा जब चेयरमैन बने तब कागजों पर तो वह पूरे ग्रुप के मुखिया थे लेकिन असली सत्ता उन बादशाहों के हाथों में बंटी हुई थी। जिनका जिक्र हमने अभी किया। रूसी मोदी
25:40
Speaker A
टाटा स्टील को अजीत [संगीत] केयरकर इंडियन होटल्स को और दरबारी सेठ टाटा केमिकल्स को लगभग अपनी निजी जागीर की तरह चला रहे थे। रतन टाटा के लिए यह एक अजीब स्थिति थी। उन्होंने धीरे-धीरे लेकिन बेहद दृढ़ता से इस सिस्टम को बदलना शुरू
25:56
Speaker A
किया। रिटायरमेंट की उम्र से जुड़े नियम लागू करवाए। टाटा संस की हिस्सेदारी ग्रुप कंपनियों में बढ़ाई ताकि केंद्रीय नियंत्रण मजबूत हो और धीरे-धीरे इन पुराने दिग्गजों को साइडलाइन किया गया। यह कोई आसान या शांतिपूर्ण प्रोसेस नहीं था। इसमें सालों की खींचतान और आंतरिक राजनीति
26:12
Speaker A
शामिल थी। इस पूरे टकराव के दौरान रतन टाटा को कई बार सीधे तौर पर चुनौती भी दी गई। कंपनी के अंदर यह आम चर्चा थी कि रतन टाटा के पास सिर्फ पद है असली ताकत नहीं। लेकिन रतन टाटा ने ना तो जल्दबाजी दिखाई
26:24
Speaker A
ना ही सार्वजनिक टकराव किया। उन्होंने संस्थागत तरीके से बोर्ड स्तर पर नियम बदलकर धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत की। यह तरीका धीमा जरूर था, लेकिन आखिरकार कामयाब रहा। और अगले कुछ सालों में टाटा ग्रुप की हर बड़ी कंपनी सीधे टाटा संस की छत्रछाया
26:40
Speaker A
में आ गई। एक बार जब रतन टाटा ने पूरे ग्रुप पर असली नियंत्रण हासिल कर लिया तभी वह अपने विज़न को असल में लागू कर पाए। उन्हें साफ दिख रहा था कि Tata ग्रुप बाहर से भले ही मजबूत दिखे लेकिन हाई
26:51
Speaker A
टेक्नोलॉजी कंप्यूटिंग और इनोवेशन में वो दुनिया से बहुत पीछे रह गया है। अब आता है Tata ग्रुप की हिस्ट्री का वो दौर जिसमें एक ही समय पर सबसे बड़ी सफलताएं और सबसे बड़ी नाकामियां साथ-साथ आई और इसकी शुरुआत
27:05
Speaker A
होती है एक पूरी तरह भारतीय कार बनाने के सपने से। 1995 में रतन टाटा ने एक बड़ा फैसला लिया। एक ऐसी कार बनाई जाए जो पूरी तरह भारत में डिजाइन और मैन्युफैक्चर हो। इसके लिए जरूरी नए प्लांट की कॉस्ट करीब $
27:17
Speaker A
बिलियन थी। इसलिए Tata मोटर्स ने ऑस्ट्रेलिया में Nissan का एक पुराना बंद पड़ा प्लांट सिर्फ एक पांचवें दाम में खरीद लिया। उसे डिस्मेंटल करके पुणे में दोबारा असेंबल किया। 1998 में लॉन्च हुई। Tata Indica भारत की पहली पूरी तरह
27:32
Speaker A
स्वदेशी कार। शुरुआती क्वालिटी शिकायतों के बावजूद इंडिका जल्द ही एक सफल मॉडल के तौर पर स्थापित हो गई। इसके बाद रतन टाटा ने TCS पर ध्यान दिया। उन्होंने देखा कि TCS का ज्यादातर काम बेसिक डाटा एंट्री और बुक कीपिंग जैसी एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विज
27:48
Speaker A
तक सीमित था। ऐसा काम जिसमें ज्यादा वैल्यू एडिशन नहीं था। उन्होंने टीसीएस का पूरा फोकस शिफ्ट किया एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विज से हटाकर कस्टमाइज्ड सॉफ्टवेयर सॉलशंस की तरफ जो दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए बनाए जाते हैं। 2004 में TCS का आईपीओ ल्च हुआ जो उस दौर के भारतीय
28:06
Speaker A
बाजार के सबसे बड़े आईपीओ में गिना गया और इससे कंपनी को ग्लोबल स्केल पर एक्सपेंड करने के लिए भारी फंडिंग मिली। इन्हीं फैसलों की बदौलत आज TCS ना सिर्फ भारत की सबसे बड़ी आईटी कंपनी है बल्कि दुनिया की
28:17
Speaker A
सबसे वैल्यूुएबल आईटी सर्विज कंपनियों में भी गिनी जाती है और अकेले TCS ही Tata ग्रुप के कुल मुनाफे का एक बहुत बड़ा हिस्सा उठाती है। TCS की सफलता के बाद रतन टाटा ने फिर Tata Motors पर फोकस किया।
28:29
Speaker A
भारत की एक बड़ी मिडिल क्लास आबादी कार अफोर्ड नहीं कर पाती। इसीलिए पूरे परिवार को मजबूरी में एक [संगीत] स्कूटर पर बैठकर असुरक्षित तरीके से सफर करना पड़ता है। 2003 में उन्होंने ऐलान किया कि वह एक ऐसी कार बनाएंगे जिसकी कीमत सिर्फ ₹1 लाख हो।
28:44
Speaker A
इस कार को बनाने के लिए पश्चिम बंगाल के सिंघुर की जमीन चुनी गई। 2006 में लेफ्ट फ्रंट सरकार ने 1894 के पुराने कानून का इस्तेमाल करके करीब 997 एकड़ झरखेज खेती की जमीन एक्वायर कर ली। इस फैसले के खिलाफ
28:58
Speaker A
ममता बनर्जी की अगुवाई में भारी विरोध शुरू हुआ। किसानों का आरोप था कि उनकी जमीन जबरदस्ती छीनी जा रही है। दिसंबर 2006 में ममता बनर्जी ने 25 दिनों की भूख हड़ताल तक की जो तभी खत्म हुई जब राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने खुद
29:12
Speaker A
हस्तक्षेप किया। Tata मोटर्स तब तक प्लांट में ₹1000 करोड़ से ज्यादा निवेश कर चुकी थी। लेकिन हालात इतने बिगड़े कि 3 अक्टूबर 2008 को सिर्फ 4 दिनों के भीतर रतन टाटा ने सिंघुड़ू से बाहर निकलने का ऐलान कर
29:25
Speaker A
दिया। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने रतन टाटा को सिर्फ एक शब्द का एसएमएस भेजा। वेलकम। 4 दिनों में ही प्लांट सनंद शिफ्ट करने का फैसला हो गया और वहां प्लांट सिर्फ 14 महीनों में तैयार हुआ। सिंघुर [संगीत] के 28 महीनों के मुकाबले
29:38
Speaker A
आधे से भी कम वक्त में। यह सिर्फ एक बिजनेस फैसला नहीं था। यह पश्चिम बंगाल की राजनीति को हमेशा के लिए बदलने वाला मोमेंट बन गया। 2023 में एक आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल ने टाटा मोटर्स को ₹766 करोड़ का मुआवजा भी दिलवाया।
29:52
Speaker A
[संगीत] लेकिन इतनी बड़ी राजनीतिक लड़ाई जीतने के बाद भी जब नानो 2009 में लॉन्च हुई, तो वह बाजार में बुरी तरह फेल हो गई। वजह टेक्नोलॉजी नहीं थी। वजह थी भारत में कार को लेकर लोगों की सोच। भारत में कार एक
30:05
Speaker A
स्टेटस सिंबल मानी जाती है और नानो का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट उसका सस्ता दाम ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गया। लोगों ने इसे दुनिया की सबसे सस्ती कार कहकर मजाक बनाना शुरू कर दिया। जहां बाकी कार मालिक
30:18
Speaker A
गर्व महसूस करते थे। वहीं नानो मालिक शर्मिंदगीगी महसूस करने लगे। एक कार जो लाखों परिवारों की जिंदगी बदलने के लिए बनी थी। कंज्यूमर साइकोलॉजी को ना समझ पाने की वजह से डूब गई। और ठीक इसी दौर में जब नानो अपनी सबसे मुश्किल लड़ाई लड़
30:32
Speaker A
रही थी। Tata ग्रुप ने अपनी हिस्ट्री की सबसे बड़ी सबसे रिस्की विदेशी डील पर दस्तखत किए एक डील जिसका कर्जा सालों तक कंपनी को परेशान करता रहा। 2007 में टाटा स्टील ने ब्रिटेन की कोरस ग्रुप को खरीदने के लिए एक ब्राज़लियन कंपनी सीएसएन के
30:47
Speaker A
खिलाफ एक जबरदस्त बिडिंग वॉर लड़ी। टाटा स्टील जीत गई लेकिन भारी कीमत चुकाकर मार्केट प्राइस से करीब 34% [संगीत] ज्यादा प्रीमियम देकर जिससे कुल डील की वैल्यू पहुंची करीब 12 बिलियन तक जिसमें आधे से ज्यादा हिस्सा कर्ज था। टाटा स्टील
31:02
Speaker A
रातोंरात दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी स्टील कंपनी बन गई। लेकिन डील के सिर्फ 1 साल बाद 2008 में ग्लोबल फाइनेंसियल क्राइसिस आ गई। स्टील की डिमांड धड़ाम से गिर गई। कोरूस की पुरानी यूरोपियन फैक्ट्रीज भारी घाटे में जाने लगी और वह
31:16
Speaker A
भारी कर्जा सालों तक टाटा स्टील की बैलेंस शीट को दबाए रहा। कई एनालिस्ट्स ने इसे डील फ्रॉम हेल्थ तक कहा। ठीक इसी दौर में 2008 में ही रत्न Tata ने एक और बड़ा दांव खेला। Ford से Jaguar और Land Rover को
31:29
Speaker A
सिर्फ 2.3 बिलियन में खरीद लिया। शुरुआती साल मुश्किल रहे लेकिन Tata Motors ने धैर्य बनाए रखा। JLR के मैनेजमेंट को आजादी से काम करने दिया और नए मॉडल्स में निवेश जारी रखा। अगले कुछ सालों में JLR ने जबरदस्त टर्न अराउंड किया और Tata
31:44
Speaker A
Motors के मुनाफे का सबसे बड़ा सोर्स बन गया। बिल्कुल कोरस के उलट। एक ही समय पर Tata ग्रुप की सबसे बड़ी नाकामी और सबसे बड़ी सफलता साथ-साथ चल रही थी। नवंबर 2008 में मुंबई पर हुए आतंकी हमलों के दौरान
31:57
Speaker A
ताजमहल पैलेस होटल वही होटल जो जमशेद जी टाटा ने बनवाया था। सबसे बड़ा टारगेट बना। इस मुश्किल वक्त में टाटा ग्रुप का रिस्पांस पूरे देश के दिल को छू गया। रतन टाटा खुद पीड़ितों के परिवारों से मिले और
32:08
Speaker A
कंपनी ने होटल के हर स्टाफ मेंबर के परिवार की मदद की। चाहे वह नियमित एंप्लई हो या होटल के बाहर सामान बेचने वाला कोई छोटा वेंडर। इन्हीं सालों में रतन टाटा ने टेटली टी और आठों क्लॉक कॉफी जैसे
32:19
Speaker A
ब्रांड्स भी एक्वायर किए। जिससे आज टाटा ग्रुप का आधे से ज्यादा रेवेन्यू भारत के बाहर से आता है। 2012 में रतन टाटा रिटायर हुए। और 2012 में साइरस मिस्त्री को टाटा सनंस का नया चेयरमैन बनाया गया। चेयरमैन बनने के बाद मिस्त्री ने ग्रुप की कुछ
32:33
Speaker A
पुरानी घाटे में चल रही यूनिट्स जैसे यूरोपियन स्टील ऑपरेशंस और कुछ पुराने टेलीकॉम ओबीविएशन इन्वेस्टमेंट्स को लेकर सख्त फैसले लेने शुरू किए और इनमें से कई ऐसे प्रोजेक्ट्स थे जो रतन टाटा के द्वार में शुरू हुए थे। कहा जाता है कि इन्हीं
32:48
Speaker A
फैसलों को लेकर बोर्ड के अंदर और रतन टाटा के साथ मिस्त्री के मतभेद बढ़ने लगे। 4 साल तक मिस्त्री चेयरमैन रहे लेकिन 24 अक्टूबर 2016 को बिना किसी सार्वजनिक चेतावनी के बोर्ड ने उन्हें हटा दिया। नौ में से छह मेंबर्स ने उनके खिलाफ वोट
33:03
Speaker A
किया। रतन टाटा को अंतरिम चेयरमैन बनाया गया और जनवरी 2017 में एन चंद्रशेखरण को स्थाई चेयरमैन घोषित किया गया। मिस्त्री ने इस फैसले को स्वीकार नहीं किया और एनसीएलटी में केस दायर किया जो शुरुआत में खारिज हुआ। लेकिन दिसंबर 2019 में
33:19
Speaker A
एनसीएलएटी ने उनके पक्ष में फैसला दिया। आखिरकार 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने टाटा ग्रुप के पक्ष में फैसला सुनाया। 5 साल तक चली यह लड़ाई इंडिया के कॉर्पोरेट इतिहास की सबसे बड़ी हेडलाइन बनी। इस पूरी कहानी का सबसे दुखद हिस्सा 4 सितंबर 2022 को
33:35
Speaker A
आया। जब साइरस मिस्त्री की सिर्फ 54 साल की उम्र में मुंबई के पास एक सड़क हादसे में मौत हो गई। इस तूफान के बाद टाटा ग्रुप की कमान संभाली एक ऐसे इंसान ने जो टाटा फैमिली से बिल्कुल भी नहीं जुड़ा था।
33:47
Speaker A
तमिलनाडु के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे एन चंद्रशेखर ने 1987 में TCS में इंटर्न के तौर पर शुरुआत की और तीन दशकों में कंपनी में सबसे ऊपर तक पहुंचे। जनवरी 2017 में उन्हें Tata SS का चेयरमैन बनाया
34:01
Speaker A
गया। टाटा फैमिली के खून से बिना जुड़े ग्रुप का नेतृत्व करने वाले पहले चेयरमैन उन्होंने धीरे-धीरे कर्जा कम किया। गवर्नेंस मजबूत की और 2022 में वह हुआ जिसकी कल्पना शायद जेआरडी टाटा ने भी नहीं की होगी। सरकार ने घाटे में डूबी एयर
34:16
Speaker A
इंडिया को प्राइवेटाइज करने का फैसला किया और Tata SS ने करीब ₹18,000 करोड़ की डील में इसे वापस जीत लिया। 1953 में जो एयरलाइन छीनी गई थी वो 69 साल बाद वापस टाटा परिवार के पास लौट आई। अक्टूबर 2024
34:30
Speaker A
में 86 साल की उम्र में रतन टाटा का निधन हो गया। आज एन चंद्रशेखरन की लीडरशिप में Tata ग्रुप 30 से ज्यादा कंपनियों का एक विशाल नेटवर्क है। स्टील से सॉफ्टवेयर तक, कारों से एयरलाइंस तक, लाखों एंप्लाइजज़ के
34:44
Speaker A
साथ और दुनिया भर में फैला हुआ बिजनेस। तो यह थी Tata ग्रुप की पूरी अनकही कहानी पारसी परिवार के भारत आने से लेकर होते हुए आज के 365 लाख करोड़ के एंपायर तक। अगर आपको यह वीडियो पसंद आया हो तो लाइक
34:58
Speaker A
करें, चैनल को सब्सक्राइब करें और कमेंट में बताएं इस कहानी का कौन सा हिस्सा आपको सबसे ज्यादा चौंका गया। [संगीत]
Topics:टाटा परिवारभारत का बिजनेस ग्रुपअफीम व्यापारजमशेदजी टाटामैन्युफैक्चरिंगकॉटन व्यापारटाटा स्टीलटाटा मोटर्सटाटा टीसीएसभारतीय उद्योग

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