रतन टाटा ने बिल फोर्ड के अपमान का जवाब दिया और फोर्ड से जगुआर-लैंड रोवर खरीदकर भारतीय उद्योग की ताकत साबित की।
Key Takeaways
- अपमान को प्रेरणा में बदलना सफलता की कुंजी है।
- स्थिरता और धैर्य से किसी भी मुश्किल दौर को पार किया जा सकता है।
- स्वदेशी उत्पादों को मजबूत बनाने का सपना पूरा किया जा सकता है।
- सही समय पर सही निर्णय लेना व्यवसाय की दिशा बदल सकता है।
- भारतीय उद्योग विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकता है।
What the video covers
- 1999 में फोर्ड के हेडक्वार्टर में रतन टाटा और बिल फोर्ड के बीच एक महत्वपूर्ण मीटिंग हुई।
- बिल फोर्ड ने रतन टाटा को कार बनाने के लिए अनाड़ी बताया और टाटा मोटर्स का पैसेंजर कार बिजनेस खरीदने की पेशकश की।
- रतन टाटा ने अपमान सहा लेकिन कोई जवाब नहीं दिया और डील कैंसिल कर दी।
- टाटा मोटर्स घाटे में थी, लेकिन रतन टाटा ने इंडिका V2 मॉडल पर काम किया और कंपनी को सफल बनाया।
- 2008 की वैश्विक मंदी में फोर्ड को जगुआर और लैंड रोवर बेचने पड़े।
- रतन टाटा ने 3.3 बिलियन डॉलर में जगुआर और लैंड रोवर खरीदकर फोर्ड को जवाब दिया।
- बिल फोर्ड ने वही शब्द दोहराए जो उन्होंने 1999 में कहे थे, लेकिन किरदार बदल चुके थे।
- रतन टाटा ने ब्रिटिश कर्मचारियों को नौकरी की सुरक्षा का भरोसा दिया और ब्रांड की पहचान बनाए रखी।
- यह कहानी भारतीय उद्योग के जुनून और धैर्य की मिसाल है।
- रतन टाटा ने साबित किया कि भारतीय बिजनेस में आत्मविश्वास और मेहनत से बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है।
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Speaker A
साल 1999, अमेरिका के डेट्रॉयड शहर में बाहर कड़ाके की ठंड और बर्फ पड़ रही थी, लेकिन फोर्ड कंपनी के हेडक्वार्टर के अंदर माहौल उससे भी कहीं ज्यादा गर्म था। रतन टाटा जी अपनी टीम के साथ फोर्ड के हेडक्वार्टर में बिल फोर्ड के साथ मीटिंग रूम में एक डील के लिए बैठे थे, जो उस वक्त टाटा मोटर्स के घाटे को कम करने के लिए अपना पैसेंजर कार का बिजनेस बेचना चाहते थे। तीन घंटे तक मीटिंग चली। तभी उस मीटिंग रूम में कुछ ऐसा हुआ कि वह इतिहास के पन्नों में कैद हो गया। बिल फोर्ड ने रतन टाटा जी की आंखों में देखकर बड़े घमंड से कहा, "मिस्टर टाटा, जब आपको कारों के बारे में कुछ पता ही नहीं था तो आपने इस बिजनेस को शुरू ही क्यों किया? हम आपकी यह कंपनी खरीद कर आप पर एक बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं।" वो शब्द किसी तीर की तरह रतन टाटा जी के दिल में जाकर लगे। लेकिन रतन टाटा जी चुप रहे। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। वे उठे और चुपचाप मीटिंग रूम से बाहर चले गए। डील कैंसिल हुई। उस दिन दुनिया को लगा रतन टाटा हार गए। लेकिन दुनिया गलत थी। यह अपमान रतन टाटा की हार नहीं बल्कि भारतीय बिजनेस के इतिहास के सबसे बड़े पलटवार की शुरुआत थी। और ठीक नौ साल बाद, यानी साल 2008 में, भारत के सबसे शालीन बिजनेसमैन रतन टाटा जी ने बिल फोर्ड को इस अपमान का जवाब कुछ ऐसा दिया कि यह जानकर एक भारतीय होने के नाते आपका सीना भी गर्व से चौड़ा हो जाएगा। आखिर क्या हुआ था उस दिन और कैसे रतन टाटा जी ने बिल फोर्ड का घमंड तोड़ा? पूरी कहानी जानने के लिए चलिए शुरू करते हैं रतन टाटा जी की वो दास्तान, जिसमें दुनिया को दिखा दिया कि कभी किसी हिंदुस्तानी के जुनून को कम मत समझना। यह कहानी समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। साल 1990, टाटा मोटर्स जिसे तब टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव कंपनी यानी टेलको कहते थे, तब कंपनी एक मुश्किल दौर से गुजर रही थी। साल 1991 में जब रतन टाटा जी ने टाटा ग्रुप की कमांड संभाली, तब कंपनी सिर्फ ट्रक्स और कमर्शियल गाड़ियां बनाती थी। टाटा समूह उस समय अनगिनत क्षेत्रों में अपना परचम लहरा चुका था, नमक से लेकर रसायन तक। लेकिन उनके पास एक मिडिल क्लास परिवार के लिए बनाई गई कोई पैसेंजर कार नहीं थी। इसी कमी को भरने के लिए रतन टाटा जी के पास एक सपना था। वह एक ऐसी कार बनाना चाहते थे जो पूरी तरह भारतीय हो, जिसका डिजाइन भारतीय हो और जो भारतीय सड़कों के लिए बनी हो। साल 1998 में टाटा इंडिका लॉन्च हुई। यह भारत की पहली स्वदेशी पैसेंजर कार थी। लेकिन इंडिका की शुरुआत वैसी नहीं रही जैसी उम्मीद की गई थी। इंडिका कार में कई तकनीकी खामियां आने लगीं। सेल्स गिरने लगे। कस्टमर की कंप्लेंट्स आने लगीं और टाटा मोटर्स भारी घाटे में चली गई। आलोचकों ने रतन टाटा जी को घेर लिया। लेकिन उसे बनाने में जो श्रम लगा, जो पसीना बहा, जो सपने टूटे और जोड़े गए, वह सब किसी ने नहीं देखा। लोग कहने लगे कि टाटा ग्रुप को ट्रक ही बनाने चाहिए। मीडिया ने लिखना शुरू किया, कार बनाना टाटा के बस की बात नहीं है और कंपनी के अंदर प्रेशर बढ़ रहा था। बोर्ड में भी अलग-अलग तरह की बातें होने लगीं और रतन टाटा एक बड़े फैसले के सामने खड़े थे। उन्होंने सोचा कि शायद किसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनी के साथ साझेदारी की जाए या टाटा मोटर्स पैसेंजर कार बिजनेस बेच दिया जाए। यही वो दबाव था जिसने रतन टाटा जी को अमेरिका के डेट्रोइड शहर जाने पर मजबूर किया और उन्होंने एक ऑप्शन देखा, फोर्ड। दुनिया की सबसे बड़ी कार कंपनियों में से एक। डेट्रॉइड वो शहर था जिसे मोटर सिटी कहा जाता था, जहां हर गली में किसी न किसी लग्जरी कार के इंजन की आवाज गूंजती थी। यह अमेरिकी स्वाभिमान का केंद्र था और इस शहर में सबसे ऊंचा नाम था फोर्ड। फोर्ड कंपनी उस समय दुनिया की सबसे शक्तिशाली कार निर्माताओं में से एक थी। बिल फोर्ड उस समय कंपनी के चेयरमैन थे। उनके हाथों में एक ऐसी विरासत थी जो पीढ़ियों से चली आ रही थी और उस विरासत का बोझ कभी-कभी अहंकार का रूप भी ले लेता है। रतन टाटा अपनी टीम के साथ फोर्ड के हेड क्वार्टर में पहुंचे। वे एक सौदे की संभावना तलाशने आए थे। एक सम्मानजनक बातचीत होगी और एक व्यवसायिक विचार-विमर्श होगा। लेकिन जो हुआ वह इतिहास के उन पन्नों में दर्ज हो गया जिसे पढ़कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। रतन टाटा और बिल फोर्ड अपनी-अपनी टीम के साथ आमने-सामने मीटिंग रूम में बैठे थे। मीटिंग शुरू हुई। टाटा की टीम ने प्रेजेंटेशन दी, नंबर्स दिखाए, प्लान्स बताए, लेकिन फोर्ड की साइड से जो रिस्पांस आया, वह प्रोफेशनल नहीं था। तभी बिल फोर्ड ने रतन टाटा जी की आंखों में देखकर बड़े घमंड से कहा, "देखो मिस्टर टाटा, तुम्हें ऑनेस्टली बता देता हूं कि तुम्हें कारें बनानी नहीं आती। इंडिका में बहुत प्रॉब्लम्स हैं। तुम्हारा पैसेंजर कार बिजनेस एक फेलियर बिजनेस है।" और वह यहां तक ही नहीं रुके। उन्होंने आगे कहा, "जब आपको कारों के बारे में कुछ पता ही नहीं था तो आपने इस बिजनेस को शुरू ही क्यों किया? तुम यह बात समझ लो कि हम आपकी यह कंपनी खरीद कर आप पर एक बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं।" यह शब्द सुनकर पूरी भारतीय टीम निराश हुई। रतन टाटा, जो अपनी शांत तबीयत के लिए जाने जाते हैं, वह चुप रहे। उन्होंने कोई बहस नहीं की, ना किसी पर चिल्लाए, कोई जवाब नहीं दिया। बस सुना, उठे, फॉर्मली हाथ मिलाया और मीटिंग रूम से निकल गए। उस मीटिंग में जो बेइज्जती हुई वह रतन टाटा भूले नहीं। लेकिन उन्होंने उसे गुस्से में नहीं, मोटिवेशन में बदल दिया। यही फर्क होता है एक साधारण इंसान और एक असाधारण इंसान में। उस अपमान ने रतन टाटा जी के अंदर की आग को जगा दिया था। भारत वापस आकर उन्होंने अपनी पूरी टीम से कहा, "अब हमें किसी फोर्ड की जरूरत नहीं है। हम खुद अपनी तकदीर लिखेंगे।" अगले कुछ सालों तक रतन टाटा जी ने खुद फैक्ट्री में समय बिताया। एक-एक इंजीनियर से बात की और इंडिका के नए मॉडल पर अपनी पूरी जान लगाकर दिन-रात काम किया। और मेहनत रंग लाई। फरवरी 2001 में इंडिका V2 लॉन्च हुई और देखते ही देखते यह भारत की सबसे पसंदीदा कार बन गई। टाटा मोटर्स न केवल घाटे से बाहर आई बल्कि भारत की एक बड़ी ताकत बन गई। रतन टाटा जी का लोहा अब पूरी दुनिया मान रही थी। वही कार जिसके बारे में फोर्ड ने कहा था कि तुम्हें बनानी नहीं आती, और वही कार अब लंदन की सड़कों पर दौड़ रही थी। लेकिन रतन टाटा जी के मन में अभी भी एक काम अधूरा था। वह बिल फोर्ड के कहे गए शब्द भीतर कहीं गहरे दबे थे। जैसे कोयले के नीचे दबी आग दिखती नहीं लेकिन बुझती भी नहीं। वह बदला जो उन्होंने कभी शब्दों से नहीं बल्कि अपने काम से लेने का सोचा था। वक्त का पहिया घूमना शुरू हुआ। जहां टाटा मोटर्स ऊपर जा रही थी, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी दिग्गज फोर्ड कंपनी और उनके दो सबसे शानदार ब्रांड्स, जगुआर और लैंड रोवर, भयानक मुसीबत में फंस चुके थे। साल 2008 की उस ग्लोबल मंदी ने फोर्ड के साम्राज्य को हिला कर रख दिया था। अमेरिका का वो डेट्रॉयड का वो घमंडी ऑफिस अब सन्नाटे में था। फोर्ड दिवालिया होने की कगार पर थी। वह कंपनी जिसने कभी रतन टाटा को एहसान की भाषा में जवाब दिया था। किस्मत ने एक ऐसा मौका दिया जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था। फोर्ड कंपनी को बचाने के लिए बिल फोर्ड को अपने सबसे कीमती रत्न, जगुआर और लैंड रोवर को बेचना पड़ रहा था। दुनिया की कई बड़ी कंपनियां पीछे हट गई थीं। जगुआर और लैंड रोवर की वर्तमान स्थिति नाजुक थी। दोनों ब्रांड्स घाटे में चल रहे थे। फोर्ड उन्हें अरबों डॉलर का घाटा उठाकर बेच रहा था। लेकिन तब सिर्फ रतन टाटा जी ने हाथ आगे बढ़ाया। यह वही रतन टाटा थे जिन्हें नौ साल पहले बिल फोर्ड ने अनाड़ी कहा था। इस बार मीटिंग डेट्रॉयट में नहीं बल्कि मुंबई के बॉम्बे हाउस में फिक्स हुई। 26 मार्च 2008, वो तारीख जो इतिहास में दर्ज हो गई। फोर्ड की पूरी टीम रतन टाटा जी के चरणों में अपनी आबरू बचाने आई थी। रतन टाटा ने 3 अरब 30 करोड़ डॉलर में जगुआर और लैंड रोवर को फोर्ड से खरीद लिया। उस मीटिंग में बिल फोर्ड ने सबके सामने रतन टाटा जी से वह शब्द कहे जो इतिहास में दर्ज हो गए। उन्होंने कहा, "मिस्टर टाटा, जगुआर और लैंड रोवर को खरीद कर आप हम पर एक बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं।" वही शब्द, वही एहसान, बस किरदार बदल गए थे। रतन टाटा जी ने बिल फोर्ड को वही जवाब दिया जो उन्होंने 1999 में डेट्रॉयट में दिया था। उन्होंने सिर्फ एक विनम्र मुस्कान दी और हाथ मिलाया। उन्होंने बिल फोर्ड को नीचा नहीं दिखाया बल्कि उनके डूबते बिजनेस को सहारा दिया। जैसे ही यह खबर फैली कि एक भारतीय कंपनी ने जगुआर और लैंड रोवर को खरीद लिया है, इंग्लैंड के गलियारों में हड़कंप मच गया। ब्रिटिश कर्मचारियों के बीच एक खौफ पैदा हो गया। वहां के अखबारों में हेडलाइंस छपने लगीं कि क्या अब इंडियंस हमें सिखाएंगे कि लग्जरी कारें कैसे बनती हैं। कर्मचारियों को डर था कि अब उनकी नौकरियां चली जाएंगी। जगुआर और लैंड रोवर वहां के स्वाभिमान का प्रतीक थे और उन्हें लगा कि एक भारतीय मालिक उनकी विरासत को समझ नहीं पाएगा। लेकिन रतन टाटा जी ने स्पष्ट किया कि किसी की भी नौकरी नहीं जाएगी। कंपनी की पहचान बरकरार रहेगी। जगुआर जगुआर रहेगी और लैंड रोवर लैंड रोवर रहेगी। हम केवल वह समर्थन देंगे जो इन ब्रांड्स को अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने के लिए चाहिए। रतन टाटा के इस भरोसे ने वहां के हजारों परिवारों का दिल जीत लिया। दुनिया ने फिर से...
Speaker A
रूम में एक डील के लिए बैठे थे जो उस वक्त Tata मोटर्स के घाटे को कम करने के लिए अपना पैसेंजर कार का बिजनेस बेचना चाहते थे। 3 घंटे तक मीटिंग चली। तभी उस मीटिंग रूम में कुछ ऐसा हुआ कि वो इतिहास के
Speaker A
पन्नों में कैद हो गया। बिलफोर्ड ने रतन टाटा जी की आंखों में देखकर बड़े घमंड से कहा, मिस्टर टाटा जब आपको कारों के बारे में कुछ पता ही नहीं था तो आपने इस बिजनेस को शुरू ही क्यों किया? हम आपकी यह कंपनी
Speaker A
खरीद कर आप पर एक बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं। वो शब्द किसी तीर की तरह रतन टाटा जी के दिल में जाकर लगे। लेकिन रतन टाटा जी चुप रहे। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। वे उठे और चुपचाप मीटिंग रूम से बाहर चले गए।
Speaker A
डील कैंसिल हुई। उस दिन दुनिया को लगा रतन टाटा हार गए। लेकिन दुनिया गलत थी। यह अपमान रतन टाटा की हार नहीं बल्कि भारतीय बिजनेस [संगीत] के इतिहास के सबसे बड़े पलटवार की शुरुआत थी। और ठीक 9 साल बाद
Speaker A
यानी साल 2008 में भारत के सबसे शालीन बिजनेसमैन रतन टाटा जी ने बिलफोर्ड को इस अपमान का जवाब कुछ ऐसा दिया कि यह जानकर एक भारतीय होने के नाते आपका सीना [संगीत] भी गर्व से चौड़ा हो जाएगा। आखिर क्या हुआ
Speaker A
था उस दिन और कैसे रतन टाटा जी ने बिलफोर्ड [संगीत] का घमंड तोड़ा पूरी कहानी जानने के लिए चलिए शुरू करते हैं रतन टाटा जी की वो दास्तान जिसमें दुनिया को दिखा दिया कि कभी किसी हिंदुस्तानी के जुनून को कम मत समझना। यह कहानी को समझने
Speaker A
के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। साल 1990 Tata मोटर्स जिसे तब Tata इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव कंपनी यानी टेलको कहते थे तब कंपनी एक मुश्किल दौर से गुजर रही थी। साल 1991 में जब रतन टाटा जी ने टाटा ग्रुप की कमांड संभाली तो तब
Speaker A
कंपनी सिर्फ ट्रक्स और कमर्शियल गाड़ियां बनाती थी। टाटा समूह उस समय अनगिनत क्षेत्रों में अपना परचम लहरा चुका था। नमक से लेकर रसायन तक। लेकिन उनके पास एक मिडिल क्लास परिवार के लिए बनाई गई कोई पैसेंजर कार नहीं थी। इसी कमी को भरने के
Speaker A
लिए रतन टाटा जी के पास एक सपना था। वह एक ऐसी कार बनाना चाहते थे जो पूरी तरह भारतीय हो। जिसका डिजाइन भारतीय हो और जो भारतीय सड़कों के लिए बनी हो। साल 1998 में Tata इंडिका लॉन्च हुई। यह भारत की
Speaker A
पहली स्वदेशी पैसेंजर कार थी। लेकिन इंडिका की शुरुआत वैसी नहीं रही जैसी उम्मीद की गई थी। इंडिका कार में कई तकनीकी खामियां आने लगी। सेल्स गिरने लगे। कस्टमर की कंप्लेंट्स आने लगी और Tata मोटर्स भारी घाटे में चली गई। आलोचकों ने
Speaker A
रतन टाटा जी को घेर लिया। लेकिन उसे बनाने में जो श्रम लगा, जो पसीना बहा, जो सपने टूटे और जोड़े गए, वह सब किसी ने नहीं देखा। लोग कहने लगे कि टाटा ग्रुप को ट्रक ही बनाने चाहिए। मीडिया ने लिखना शुरू
Speaker A
किया, कार बनाना टाटा के बस की बात नहीं है और कंपनी के अंदर प्रेशर बढ़ रहा था। बोर्ड में भी अलग-अलग तरह की बातें होने लगी और रतन टाटा एक बड़े फैसले के सामने खड़े थे। उन्होंने सोचा कि शायद किसी बड़ी
Speaker A
अंतरराष्ट्रीय कंपनी के साथ साझेदारी की जाए या Tata मोटर्स पैसेंजर कार बिजनेस बेच [संगीत] दिया जाए। यही वो दबाव था जिसने रतन टाटा जी को अमेरिका के डेट्रोइड शहर जाने पर मजबूर किया और उन्होंने एक ऑप्शन देखा फोर्ड। दुनिया की सबसे बड़ी
Speaker A
कार कंपनियों में से एक। शायद वह टाटा की कार डिवीजन खरीद लेगी। डिट्रॉइ वो शहर था जिसे मोटर सिटी कहा जाता था। जहां हर गली में किसी ना किसी लग्जरी कार के इंजन की आवाज गूंजती थी। यह अमेरिकी स्वाभिमान का
Speaker A
केंद्र था और इस शहर में सबसे ऊंचा नाम था Ford। Ford कंपनी उस समय दुनिया की सबसे शक्तिशाली कार निर्माताओं में से एक थी। बिल Ford उस समय कंपनी के चेयरमैन थे। उनके हाथों में एक ऐसी विरासत थी जो
Speaker A
पीढ़ियों से चली आ रही थी और उस विरासत का बोझ कभी-कभी अहंकार का रूप भी ले लेता है। रतन टाटा अपनी टीम के साथ फोर्ड के हेड क्वार्टर में पहुंचे। वो एक सौदे की संभावना तलाशने आए थे। एक सम्मानजनक
Speaker A
बातचीत होगी और एक व्यवसायिक विचार विमच होगा। लेकिन जो हुआ वो इतिहास के उन पन्नों में दर्ज हो गया जिसे पढ़कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। रतन टाटा और बिलफोर्ड अपनी-अपनी टीम के साथ [संगीत] आमने-सामने मीटिंग रूम में बैठे थे।
Speaker A
मीटिंग शुरू हुई। टाटा की टीम ने प्रेजेंटेशन दी, नंबर्स दिखाए, प्लांस बताए, लेकिन फोर्ड की साइड से जो रिस्पांस आया, वह प्रोफेशनल नहीं था। तभी बिल फोर्ड ने रतन टाटा जी की आंखों में देखकर बड़े घमंड से कहा। देखो मिस्टर टाटा तुम्हें
Speaker A
ऑनेस्टली बता देता हूं कि तुम्हें कारें बनानी नहीं आती। इंडिका में बहुत प्रॉब्लम्स हैं। तुम्हारा पैसेंजर कार बिजनेस एक फेलियर बिजनेस है और वो यहां तक ही नहीं रुके। उन्होंने आगे कहा जब आपको कारों के बारे में कुछ पता ही नहीं था तो
Speaker A
आपने इस बिजनेस को शुरू ही क्यों किया? तुम यह बात समझ लो कि हम आपकी यह कंपनी खरीद कर आप पर एक बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं। यह शब्द सुनकर पूरी भारतीय टीम निराश हुई। रतन टाटा जो अपनी शांत तबीयत के लिए
Speaker A
जाने जाते हैं, वह चुप रहे। उन्होंने कोई बहस नहीं की। ना किसी पर चिल्लाए, कोई जवाब नहीं दिया। बस सुना उठे फॉर्मली हाथ मिलाया और मीटिंग रूम से निकल गए। उस मीटिंग में जो बेइज्जती हुई वह रतन टाटा
Speaker A
भूले नहीं। लेकिन उन्होंने उसे गुस्से में नहीं मोटिवेशन में बदल दिया। यही फर्क होता है। एक साधारण इंसान और एक [संगीत] असाधारण इंसान में। उस अपमान ने रतन टाटा जी के अंदर की आग को जगा दिया था। भारत
Speaker A
वापस आकर उन्होंने अपनी पूरी टीम से कहा, अब हमें किसी फोर्ड की जरूरत नहीं है। हम खुद अपनी तकदीर लिखेंगे। अगले कुछ सालों तक रतन टाटा जी ने खुद फैक्ट्री में समय बिताया। एक-एक इंजीनियर से बात की और
Speaker A
इंडिका के नए मॉडल पर अपनी पूरी जान [संगीत] लगाकर दिनरा काम किया और मेहनत रंग लाई। फरवरी 2001 में Indica V2 लॉन्च हुई और देखते ही देखते यह भारत की सबसे पसंदीदा कार बन गई। Tata Motors ना केवल
Speaker A
घाटे से बाहर आई बल्कि भारत की एक बड़ी ताकत बन गई। रतन टाटा जी का लोहा अब पूरी दुनिया मान रही थी। वही कार जिसके बारे में फोर्ड ने कहा था कि तुम्हें बनानी नहीं आती और वही कार अब लंदन की सड़कों पर
Speaker A
दौड़ रही थी। लेकिन रतन टाटा जी के मन में अभी भी एक काम अधूरा था। वह बिलफोर्ड के कहे गए शब्द भीतर कहीं गहरे दबे थे। जैसे कोयले के नीचे दबी आग दिखती नहीं लेकिन बुझती भी नहीं। वह बदला जो उन्होंने कभी
Speaker A
शब्दों से नहीं बल्कि अपने काम से लेने का सोचा था। वक्त का पहिया घूमना शुरू हुआ। जहां Tata Motors ऊपर [संगीत] जा रही थी, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी दिग्गज Ford कंपनी और उनके दो सबसे शानदार ब्रांड्स Jaguar और Land Rover भयानक मुसीबत में फंस चुके
Speaker A
थे। साल 2008 की उस ग्लोबल मंदी ने Ford [संगीत] के साम्राज्य को हिला कर रख दिया था। अमेरिका का वो डेट्रॉयड का वो घमंडी ऑफिस अब सन्नाटे में था। Ford [संगीत] दिवालिया होने की कगार पर थी। वो कंपनी
Speaker A
जिसने कभी रतन टाटा को एहसान की भाषा में जवाब दिया था। किस्मत ने एक ऐसा मौका दिया जिसके बारे [संगीत] में किसी ने सोचा भी नहीं था। Ford कंपनी को बचाने के लिए बिल Ford को अपने सबसे कीमती रत्न Jaguar और
Speaker A
Land Rover [संगीत] को बेचना पड़ रहा था। दुनिया की कई बड़ी कंपनियां पीछे हट गई थी। Jaguar और Land Rover की वर्तमान स्थिति नाजुक थी। दोनों ब्रांड्स घाटे में चल रहे थे। फोर्ड उन्हें अरबों डॉलर का घाटा उठाकर बेच रहा था। लेकिन तब सिर्फ
Speaker A
रतन टाटा जी ने हाथ आगे बढ़ाया। [संगीत] यह वही रतन टाटा थे जिन्हें 9 साल पहले बिलफोर्ड ने अनाड़ी कहा था। इस बार मीटिंग डिट्रॉयट में नहीं बल्कि मुंबई के बॉम्बे हाउस [संगीत] में फिक्स हुई। 26 मार्च 2008 वो तारीख जो इतिहास में दर्ज हो गई।
Speaker A
फोर्ड की पूरी टीम रतन टाटा जी के चरणों में अपनी आबरू बचाने आई थी। रतन टाटा ने $ अरब 30 करोड़ डॉलर में जगार और लैंड रोवर को फोर्ड से खरीद लिया। उस मीटिंग में बिलफोर्ड ने सबके सामने रतन टाटा जी से वह
Speaker A
शब्द कहे जो इतिहास में दर्ज हो गए। उन्होंने कहा मिस्टर टाटा जगवार और लैंड रोवर को खरीद कर आप हम पर एक बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं। वही शब्द वही एहसान [संगीत] बस किरदार बदल गए थे। रतन टाटा जी ने
Speaker A
बिलफोर्ड को वही जवाब दिया जो उन्होंने 1999 में डिट्रॉयड में दिया था। उन्होंने सिर्फ एक विनम्र मुस्कान दी और हाथ मिलाया। उन्होंने बिलफोर्ड को नीचा नहीं दिखाया बल्कि उनके डूबते बिजनेस को सहारा दिया। जैसे ही यह खबर फैली कि एक भारतीय
Speaker A
कंपनी ने Jaguar और Land Rover को खरीद लिया है, इंग्लैंड के गलियारों में हड़कंप मच गया। ब्रिटिश कर्मचारियों के बीच एक खौफ पैदा हो गया। वहां के अखबारों में हेडलाइंस छपने लगी कि क्या अब इंडियंस हमें सिखाएंगे कि लग्जरी कारें कैसे बनती
Speaker A
हैं। कर्मचारियों को डर था कि अब उनकी नौकरियां चली जाएंगी। Jaguar और Land Rover वहां के स्वाभिमान का प्रतीक थे और उन्हें लगा कि एक भारतीय मालिक उनकी विरासत को समझ नहीं पाएगा। लेकिन रतन टाटा जी ने स्पष्ट किया किसी की भी नौकरी नहीं
Speaker A
जाएगी। कंपनी की पहचान बरकरार रहेगी। Jaguar Jaguar रहेगी और Land Rover Land Rover रहेगी। [संगीत] हम केवल वह समर्थन देंगे जो इन ब्रांड्स को अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने के लिए चाहिए। रतन टाटा के इस भरोसे ने वहां के हजारों परिवारों का दिल
Speaker A
जीत लिया। दुनिया ने फिर से शक किया। लोगों ने कहा रतन टाटा ने अपना पैसा बर्बाद कर दिया। यह लग्जरी ब्रांड्स कभी मुनाफे में नहीं आएंगे। लेकिन रतन टाटा जी ने अपनी वैल्यूस के साथ काम शुरू किया। उन्होंने ब्रिटिश इंजीनियर्स को वो आजादी
Speaker A
और फंड्स दिए जिनकी उन्हें जरूरत थी। Tata ने Jaguar और Land Rover में भारी निवेश किया। नए मॉडल विकसित किए। अनुसंधान और विकास पर जोर दिया। F टाइप जैसी कारें बाजार में आई जो देखते ही दिल को छू लेती
Speaker A
थी। कुछ ही सालों [संगीत] में Jaguar Land Rover ना केवल मुनाफे में आ गई बल्कि Tata ग्रुप के रेवेन्यू का सबसे बड़ा हिस्सा बन गई। और 2015 में Jaguar और Land Rover ने Tata को 5 अरब पाउंड से अधिक का रेवेन्यू
Speaker A
कमा कर दिया। यह वो कंपनी थी जिसे Ford ने बोझ मानकर बेचा था। लेकिन दोस्तों वक्त के इस खेल में अभी एक और बड़ा मोड़ आना बाकी था। जिस फोर्ड ने कभी रतन टाटा जी से कहा था कि तुम्हें कारें बनानी नहीं आती। उसी
Speaker A
फोर्ड ने भारत के बाजार में टिकने के लिए 30 सालों तक संघर्ष किया। अरबों डॉलर निवेश करने के बाद भी फोर्ड कभी भारतीय ग्राहकों का दिल नहीं जीत सकी और फिर आया साल 2021। सितंबर का वो महीना जब Ford ने
Speaker A
एक ऐसी घोषणा की जिसने पूरी दुनिया के ऑटोमोबाइल सेक्टर को चौंका दिया। Ford ने भारत में अपनी कारों का प्रोडक्शन पूरी तरह से बंद करने का फैसला कर लिया। जिस कंपनी ने कभी Tata पर एहसान करने की बात
Speaker A
कही थी, आज वह खुद भारत में $ बिलियन यानी करीब ₹15,000 करोड़ का घाटा उठाकर अपना बोरिया बिस्तर [संगीत] समेट रही थी। लेकिन कहानी की सबसे बड़ी विडंबना तो अभी बाकी थी। Ford का गुजरात के सानंद में जो विशाल
Speaker A
मैन्युफैक्चरिंग प्लांट था उसे बेचने के लिए उन्हें फिर से Tata Motors के दरवाजे पर दस्तक देनी पड़ी और Tata Motors ने उसे भी खरीद लिया। जरा सोचिए जिस कंपनी को Ford ने कभी खरीदने के लायक नहीं समझा था,
Speaker A
[संगीत] आज उसी कंपनी ने Ford के अस्तित्व को भारत में बचाए रखा। आज Ford भारत से जा चुकी है। लेकिन Tata मोटर्स ना केवल भारत की सड़कों पर राज कर रही है बल्कि इलेक्ट्रिक व्हीकल्स के मामले में देश की
Speaker A
सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है। रतन टाटा जी ने दिखा दिया कि एक सच्चा लीडर वो नहीं है जो दुश्मन को खत्म कर दे बल्कि वो है जो दुश्मन की गलती को सुधार कर उसे एक नई जिंदगी दे दे। यह भी किसी बदले से कम नहीं
Speaker A
है। रतन टाटा जी की यह कहानी सिर्फ एक बिजनेस डील नहीं है। यह कहानी है संयम की, स्वाभिमान की और अटूट साहस की। उन्होंने हमें सिखाया कि जब दुनिया आपका अपमान करे तो चिल्लाने के बजाय खामोशी से अपनी
Speaker A
सल्तनत खड़ी करो। वक्त खुद आपका बदला ले लेगा। आज जब भी सड़कों पर कोई जगवार या लैंड रोवर निकलती है तो वह चीख-चीख कर कहती है कि इसके पीछे एक हिंदुस्तानी का वह जिगरा है जिसने घमंड को शालीनता से हरा
Speaker A
दिया था। रतन टाटा जी भले ही आज हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी यह जीत हर उस भारतीय को प्रेरित करती रहेगी जो बड़े सपने देखने की हिम्मत रखता है। अगर रतन टाटा जी की इस महान गाथा ने आपके दिल को छुआ हो तो इस
Speaker A
वीडियो को एक लाइक जरूर करें और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें ताकि ऐसी ही बिजनेस और फाइनेंस की कहानियां आप तक पहुंचती रहे। मिलते हैं अगली वीडियो में। तब तक के लिए अपनी काबिलियत पर भरोसा रखें।
Topics:रतन टाटाबिल फोर्डटाटा मोटर्सफोर्ड कंपनीजगुआरलैंड रोवरइंडिका कारभारतीय उद्योगकार व्यवसायव्यापार दस्तावेज











