1992 के हर्षद मेहता बैंक घोटाले की असली कहानी, जिसमें एसबीआई के आर सीतारमण की भूमिका और सुचेता दलाल की पत्रकारिता शामिल है।
Key Takeaways
- पुराने बैंकिंग सिस्टम की कमजोरियां बड़े घोटाले का कारण बनीं।
- इंसाइडर की भूमिका से फ्रॉड को अंजाम मिला।
- मीडिया की जांच ने घोटाले को सार्वजनिक किया।
- घोटाले ने भारतीय वित्तीय प्रणाली में सुधार की जरूरत दिखा दी।
- सिस्टम में पारदर्शिता और डिजिटलाइजेशन आवश्यक है।
What the video covers
- 1992 में हर्षद मेहता द्वारा ₹4000 करोड़ के बैंक फ्रॉड का खुलासा हुआ।
- एसबीआई के अधिकारी आर सीतारमण ने फर्जी सिक्योरिटीज रसीदों के जरिए फ्रॉड में मदद की।
- हर्षद मेहता ने बैंक से उधार लिए पैसे शेयर बाजार में लगाकर कीमतें बढ़ाईं।
- सुचेता दलाल ने इस घोटाले की जांच कर देश को सच बताया।
- बैंकिंग सिस्टम उस समय कागज आधारित था, जिससे फ्रॉड संभव हुआ।
- हर्षद मेहता की लग्जरी लाइफ और महंगी गाड़ियों ने शक को जन्म दिया।
- घोटाले में कई अन्य बैंक अधिकारी और कर्मचारी भी शामिल थे।
- ए एन बावडेकर ने काउंटर साइन किया लेकिन फ्रॉड की जानकारी नहीं थी।
- घोटाले के बाद बैंकिंग निगरानी व्यवस्था में सुधार किए गए।
- नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड जैसी संस्थाएं बनाई गईं।
Chapters
- 00:00घोटाले की शुरुआत और गुमनाम फोन कॉल
- 01:14आर सीतारमण और फ्रॉड की भूमिका
- 02:22बैंकिंग दस्तावेज़ और फ्रॉड का तरीका
- 03:28हर्षद मेहता की लाइफस्टाइल और घोटाले का विस्तार
- 05:33अन्य बैंक अधिकारी और घोटाले में उनकी भागीदारी
- 06:36ए एन बावडेकर की भूमिका और काउंटर साइनिंग
- 07:39सुचेता दलाल की जांच और खुलासा
- 08:40घोटाले के बाद की कार्रवाई और सुधार
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Speaker A
साल 1992 अप्रैल महीने की वह तपती दोपहर मुंबई के टाइम्स ऑफ इंडिया हेड क्वार्टर में रोज की तरह हलचल थी, लेकिन अचानक पत्रकार सुचेता दलाल के कैबिन में रखे फोन की घंटी बजती है। दूसरी तरफ स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का एक गुमनाम कर्मचारी था। उसकी
Speaker A
आवाज में खौफ था और शब्दों में एक ऐसी सच्चाई जो पूरे देश को हिलाने वाली थी। उसने धीरे से कहा, "सुचेता मैडम, क्या आपको पता है एसबीआई के साथ बहुत बड़ा फ्रॉड हुआ है। हर्षद मेहता बैंक के ₹4000 करोड़ डकार गया है।" उस दिन किसी को अंदाजा नहीं था कि
Speaker A
एक गुमनाम शख्स का वो एक फोन कॉल भारत की पूरी अर्थव्यवस्था की जड़े हिला कर रख देगा। इसी एक कॉल ने द बिग बुल हर्षद मेहता के पतन की कहानी लिख दी। लेकिन इस महाघोटाले में हर्षद अकेला नहीं था। उसके साथ एक और चेहरा था। एक ऐसा खिलाड़ी जो इस
Speaker A
[संगीत] पूरे स्कैम का असली खेल फाइलों के ढेर के पीछे छिप कर खेल रहा था। जिसके पास बैंक की तिजोरी की जादुई चाबी थी। हाल ही में आई फिल्म लकी भास्कर ने इस कहानी को पर्दे पर उतारा है। लेकिन क्या वो फिल्मी भास्कर वाकई इतना लकी था? आज हम उस असली
Speaker A
अनलकी भास्कर [संगीत] यानी आर सीतारमण की पर्दों को खोलेंगे। जिसने बैंक के भरोसे को देश के सबसे बड़े घोटाले में बदल दिया। आखिर कैसे सुचेता दलाल ने इन दोनों की जुगलबंदी [संगीत] को दुनिया के सामने बेनकाब किया। चलिए
Speaker A
शुरू करते हैं हर्षद मेहता और उस रहस्यमई अनलकी बैंकर के 4000 करोड़ के स्कैम की अनसुनी दास्तान। इस स्कैम की गहराई को समझने के लिए हमें पहले उस भारत को समझना होगा जहां कंप्यूटर एक लग्जरी चीज था और बैंकों का सारा काम कागजों और रजिस्टरों
Speaker A
पर चलता था। आज आप फोन से एक सेकंड में पैसा ट्रांसफर कर देते हैं, लेकिन तब एक बैंक से दूसरे बैंक तक पैसा पहुंचने में हफ्तों लग जाते थे। 1991 से 92 के उस दौर में बैंक आपस में एक दूसरे को थोड़े समय के लिए पैसा उधार देते थे। इसे कहते थे
Speaker A
रेडी फॉरवर्ड डील। जब एक बैंक दूसरे बैंक से सरकारी बॉन्ड या सिक्योरिटीज खरीदता तो उसे एक रसीद मिलती थी। एसजीएल रसीद [संगीत] यानी सिक्योरिटीज जनरल लेजर रसीद। यह रिजर्व बैंक जारी करता था और यह एक तरह की गारंटी होती थी कि बैंक के पास सरकारी
Speaker A
बॉन्ड्स सुरक्षित पड़े हैं। इसके अलावा एक और डॉक्यूमेंट भी इस्तेमाल होता था, बैंक रिसीप्ट यानी बीआर। यह भी लगभग वैसी ही एक रसीद थी जो बताती थी कि संबंधित बैंक के पास इतनी सिक्योरिटीज मौजूद हैं। लेकिन दिक्कत यह थी कि इन रसीदों को तुरंत चेक
Speaker A
करने का कोई सिस्टम नहीं था। कोई कंप्यूटर नहीं, कोई डेटाबेस नहीं, बस कागज पर भरोसा और यही वो जगह थी जहां से [संगीत] पूरा फ्रॉड शुरू हुआ। यहीं से एंट्री होती है बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के उस चमकते सितारे की जिसे लोग अमिताभ बच्चन [संगीत] ऑफ द
Speaker A
स्टॉक मार्केट कहते थे, हर्षद मेहता। गुजरात के एक साधारण परिवार से आने वाले हर्षद मुंबई आए। कई छोटी-मोटी [संगीत] नौकरियां की और फिर स्टॉक ब्रोकर बन गए। उनके पास मार्केट को पढ़ने की गजब की समझ थी। उनका तरीका सीधा था। बैंकों से पैसा
Speaker A
उधार लो। उसे शेयर बाजार में लगा दो। कीमतें ऊपर चढ़ाओ और मुनाफा कमाकर बैंक का पैसा वापस कर दो। ACC का शेयर जिसकी कीमत कुछ ही महीनों में ₹200 से बढ़कर करीब ₹9000 हो गई थी। इसी खेल का एक सबसे बड़ा उदाहरण है। लेकिन इतना बड़ा खेल चलाने के
Speaker A
लिए हर्षद को एक इंसाइडर [संगीत] चाहिए था। कोई ऐसा जो बैंक के अंदर बैठकर नियम तोड़ सके और वह बना स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के ट्रेजरी विभाग का एक अफसर आर सीतारमण। आर सीतारमन की निजी जिंदगी के बारे में ज्यादा जानकारी पब्लिक रिकॉर्ड में नहीं
Speaker A
है। लेकिन उनकी पोजीशन और उनका [संगीत] रोल कोर्ट के डॉक्यूमेंट्स में साफ दर्ज है। वो एसबीआई की सिक्योरिटीज डिवीजन में एक ऐसे पद पर थे जहां करोड़ों [संगीत] रुपए के इन्वेस्टमेंट का हिसाब रखा जाता था। यहां भरोसा बहुत ज्यादा था। लेकिन उसे
Speaker A
चेक करने वाला कोई नहीं था। जांच में सामने आया कि सीतारमण [संगीत] ने बिना पूरी सिक्योरिटीज के फर्जी या देरी से आई एसजीएल रसीदों के सहारे हर्षद मेहता के अकाउंट में करोड़ों रुपए ट्रांसफर कर [संगीत] दिए। अब सवाल यह उठता है कि इस
Speaker A
पूरे स्कैम से सीतारमन को खुद क्या मिला? सच बताएं तो इसका कोई साफ आंकड़ा पब्लिक रिकॉर्ड में मौजूद नहीं है। किसी रिपोर्ट में यह नहीं लिखा कि सीतारमन के अपने बैंक अकाउंट में कितना [संगीत] पैसा आया। कोर्ट के फैसले में सिर्फ इतना कहा गया कि
Speaker A
उन्होंने अपनी पोजीशन का गलत इस्तेमाल करके बैंक को सैकड़ों करोड़ का नुकसान [संगीत] पहुंचाया। यानी उनका असली मकसद पैसा था या सिर्फ हर्षद मेहता पर अंधा भरोसा, यह बात आज भी पूरी तरह साफ नहीं है। लेकिन हर्षद मेहता की कहानी में यह चीज
Speaker A
बिल्कुल अलग है। जैसे-जैसे पैसा आता गया, उनकी लाइफस्ट भी पूरी तरह बदल गई। वो मुंबई के सबसे पौश इलाके वरली में समंदर के सामने एक शानदार पेंट हाउस में रहने लगे। उनके पास एक Toyota Lexus गाड़ी थी जो उस दौर में सिर्फ इंटरनेशनल मार्केट
Speaker A
में मिलती थी। भारत में इसे लाना लगभग नामुमकिन था। दिलचस्प बात यह है कि यही गाड़ी देखकर सुचेता दलाल को पहली बार शक हुआ था कि आखिर एक बैंक अफसर के दोस्त के पास इतनी महंगी और दुर्लभ गाड़ी कहां से आई? इसके अलावा हर्षद के पास कई पोर्श
Speaker A
जैसी लग्जरी कारें भी थी। एक आम आदमी जो कभी सेल्समैन की नौकरी करता था, अब करोड़ों के साम्राज्य का मालिक बन चुका था। लेकिन इतना बड़ा खेल सिर्फ स्टेट बैंक ऑफ इंडिया तक सीमित नहीं था। सीतारमन तो बस एक रास्ता थे। हर्षद ने बैंक रिसीट के
Speaker A
जरिए देश के कई बड़े बैंकों में सेंध लगा दी थी। एसबी के अलावा नेशनल हाउसिंग बैंक से करीब ₹10 करोड़ का हेरफेर हुआ। इसके अलावा एएन जेड ग्रिंटलेज, यूको बैंक और बैंक ऑफ करार जैसे नाम भी इस लिस्ट में शामिल थे। इन सारे बैंकों का हिसाब जोड़ा
Speaker A
गया तो पूरा आंकड़ा 4000 करोड़ तक गया। [संगीत] हर्षद का तरीका बड़ा साफ था। एक बैंक से पैसा निकालो। उसे मार्केट में लगाओ और जब पहले बैंक को पैसा लौटाने का समय आए तो दूसरे बैंक से फर्जी बैंक रिसीप्ट के जरिए पैसा निकालकर पहला कर्ज चुका दो।
Speaker A
यह एक सर्कुलर फ्रॉड था जिसे तब तक कोई पकड़ नहीं सका जब तक मार्केट ऊपर जा रहा था। इसी बड़े जाल में यूको बैंक के दो और अफसर भी फंसे। विनायक देवस्थली जो असिस्टेंट मैनेजर थे और पीए कारखानिस जो सीनियर मैनेजर थे। साथ ही स्टेट बैंक ऑफ
Speaker A
सौराष्ट्र के फंड्स मैनेजर एम एस श्रीनिवासन भी इस खेल का हिस्सा बने। हर बैंक में हर विभाग में कोई ना कोई अफसर था जो या तो लालच में था या फिर सिस्टम पर इतना भरोसा करता था कि उसे शक करने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। इसी पूरी कहानी
Speaker A
में एक बहुत जरूरी नाम है ए एन बावडेकर। बावडेकर एसबीआई की मुख्य ब्रांच में तिजोरी के इंचार्ज थे। नियम के मुताबिक आर सीतारमन जो भी चेक जारी करते, उन पर बावडेकर के काउंटर साइन यानी दूसरे दस्तखत भी जरूरी थे ताकि कोई अकेला इंसान फ्रॉड
Speaker A
ना कर सके। लेकिन बावडेकर बार-बार यही कहते रहे कि उन्हें असल में पता नहीं कि इन कागजों के पीछे क्या चल रहा है। फिर भी वह साइन करते चले गए क्योंकि जब तक पैसा वापस आता रहा किसी ने सवाल नहीं उठाया। अब बारी थी उस पत्रकार की जिसका जिक्र हमने
Speaker A
इस कहानी की शुरुआत में किया था। सुचेता दलाल। वो अनजान फोन कॉल की आवाज जो सीधा टाइम्स ऑफ इंडिया के ऑफिस में गूंजी [संगीत] थी, वो सिर्फ एक टिप थी। लेकिन एक टिप पर भरोसा करना और उसे देश की सबसे बड़ी स्टोरी में बदलना यह आसान काम नहीं
Speaker A
था। भारतीय पत्रकारिता [संगीत] में सुचेता दलाल का नाम उन गिनी चुनी आवाजों में आता है जिन्होंने अपनी कलम की ताकत से सत्ता के गलियारों और शेयर बाजार के दिग्गजों [संगीत] की नींद उड़ा दी। 1992 में जब पूरा देश हर्षद मेहता को शेयर बाजार का
Speaker A
मसीहा मान रहा था, तब टाइम्स ऑफ इंडिया की इस इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट ने उस चमक-धमक के पीछे छिपे काले सच [संगीत] को भांपना शुरू कर दिया था। सुचेता ने उस कॉल पर आंख मूंदकर यकीन नहीं किया। उन्होंने खुद बैंकिंग सिस्टम की बारीकियां [संगीत]
Speaker A
समझनी शुरू की कि आखिर एक स्टॉक ब्रोकर के पास इतना पैसा आ कहां से रहा है। जबकि शेयर बाजार में उसका [संगीत] कोई डिक्लेयर्ड सोर्स ऑफ फंड नहीं था। उन्होंने बैंकों के बीच होने वाले पैसों के लेनदेन को खंगालना शुरू किया और
Speaker A
धीरे-धीरे [संगीत] यह कड़ियां जुड़ने लगीं कि हर्षद मेहता के अकाउंट में जो करोड़ों रुपए आ रहे थे, उनका सीधा रास्ता स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की सिक्योरिटीज डिवीजन से होकर गुजरता था। उन्होंने किसी भी जानकारी को तब [संगीत] तक नहीं छापा जब तक हर एक
Speaker A
कड़ी को खुद क्रॉस चेक करके पक्का नहीं कर लिया। और आखिरकार महीनों [संगीत] की इस खोजी पत्रकारिता के बाद 23 अप्रैल 1992 को टाइम्स ऑफ इंडिया के फ्रंट पेज [संगीत] पर वो खबर छपती है जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया। हेडलाइन थी ₹500 करोड़ SBI बैंक
Speaker A
से गायब। रातोंरात हर्षद मेहता का वो शानदार साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढहने लगा। स्टॉक मार्केट क्रैश हो गया। हजारों [संगीत] छोटे इन्वेस्टर्स का पैसा डूब गया। उधर बैंक के जांच अधिकारी सीतारमन को ढूंढने में जुट गए। पता चला कि
Speaker A
सीतारमण तमिलनाडु के एक छोटे शहर पलानी में अपने बेटे की एक धार्मिक रस्म में शामिल होने गए हैं। जरा सोचिए इस वक्त के इस मजाक को। एक तरफ सीतारमण अपने परिवार के साथ एक खुशी के मौके पर मौजूद थे और दूसरी तरफ उनकी उस एक कलम ने पूरे भारत की
Speaker A
इकॉनमी की जड़े हिला दी थी। अधिकारियों ने उन्हें वहीं से ट्रैक किया और गिरफ्तार कर लिया। उनके साथ ही बावड़ेकर, देवस्थली,
Speaker A
सीतारमन। साल 2000 में जिस दिन बावड़ेकर रिटायर होने वाले थे, उसी दिन बैंक ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया। इससे पहले वह कुछ दिन जेल में भी बिता चुके थे। बाद में कोर्ट ने उन्हें 5 साल की सजा सुनाई जो सीतारमन की सजा से भी ज्यादा थी। बैंक ने
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खुद अपने टर्मिनेशन लेटर में माना था कि बावड़ेकर की कोई बदनियती नहीं थी। उन्हें सीतारमण की प्लानिंग की कोई जानकारी नहीं थी। फिर भी सिर्फ काउंटर साइन करने की वजह से उन्हें अपनी नौकरी, अपनी इज्जत और अपनी आजादी तीनों की कीमत चुकानी पड़ी। लेकिन
Speaker A
इसके बाद जो हुआ वो भारतीय न्याय व्यवस्था की एक और कड़वी सच्चाई दिखाता है। केस दर्ज होने के 23 साल बाद 30 अक्टूबर 2015 को बॉम्बे हाईकोर्ट की स्पेशल कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। जस्टिस रोशन दलवी ने अपने करियर के आखिरी दिन सीतारमन और
Speaker A
श्रीनिवासन को दोषी करार दिया। दोनों को 4 साल की सजा और ₹5 लाख जुर्माना सुनाया गया। साथ ही ₹5 करोड़ कंपनसेशन भी। कोर्ट ने अपने फैसले में साफ लिखा कि इनके काम इतने गंभीर थे कि इन्हें देश विरोधी कहा जा सकता है। लेकिन इसी फैसले में एक और
Speaker A
सच्चाई भी छुपी थी। इस पूरे केस में 22 लोगों पर मुकदमा चला था। इनमें से तीन बड़ी हो गए। तीन की सुनवाई के दौरान ही मौत हो गई और सिर्फ सीतारमन और श्रीनिवासन को दोषी ठहराया गया। बाकी 16 को शक का फायदा मिल गया। जब तक फैसला आया सीतारमण
Speaker A
खुद बुढ़ापे के करीब पहुंच चुके थे। इंसाफ जो मिला वह बहुत देर से मिला। अब सवाल यह उठता है कि हर्षद मेहता का क्या हुआ? यह पूरा स्कैम सामने आने के बाद उन पर 27 से ज्यादा क्रिमिनल केसेस और सैकड़ों सिविल केसेस दर्ज हुए। सालों तक कोर्ट कचहरी के
Speaker A
चक्कर चलते रहे। साल 1999 में उन्हें Maruti उद्योग से जुड़े एक अलग फ्रॉड केस में भी दोषी ठहराया गया। लेकिन हर्षद अपने ज्यादातर मामलों का फैसला देखने के लिए जिंदा नहीं रह पाए। 31 दिसंबर 2001 की रात जब वह ठाणे जेल में बंद थे, उन्हें अचानक
Speaker A
सीने में तेज दर्द हुआ। उन्हें ठाणे सिविल हॉस्पिटल ले जाया गया लेकिन इलाज मिलने में देर हो गई। हार्ट अटैक से सिर्फ 47 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई। एक ऐसा आदमी जिसने कभी [संगीत] पूरे शेयर बाजार को अपनी उंगलियों पर नचाया था, वह आखिर
Speaker A
में एक अवार्ड में इलाज के इंतजार [संगीत] में दम तोड़ दिया। इस पूरे स्कैम ने भारत के पूरे फाइनेंशियल सिस्टम को हमेशा के लिए बदल दिया। पार्लियामेंट में हंगामा हुआ। एक जॉइंट पार्लियामेंट्री [संगीत] कमेटी बनाई गई ताकि पूरे मामले की तह तक
Speaker A
जाया जा सके। रिजर्व बैंक और सरकार को पूरी बैंकिंग निगरानी व्यवस्था [संगीत] नए सिरे से बनानी पड़ी। इसी स्कैम के बाद नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड जैसी संस्था बनाई गई ताकि शेयर और बॉन्ड्स कागज की जगह डिजिटल यानी डीममेट [संगीत] फॉर्म
Speaker A
में रखे जा सकें। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का दबदबा तोड़ने के लिए नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को [संगीत] मजबूत किया गया और स्क्रीन बेस्ड ट्रेडिंग शुरू हुई जिससे हर लेनदेन ट्रांसपेरेंट और तुरंत वेरीफाई होने लगा। आज जब हम अपने फोन से सेकंडों
Speaker A
में शेयर खरीदते हैं और हर ट्रांजैक्शन तुरंत वेरीफाई होता है तो हमें अंदाजा भी नहीं होता [संगीत] कि यह पूरा सिस्टम किस बड़े स्कैम के बाद बनाया गया। आर सीतारमण की कहानी [संगीत] एक वार्निंग है कि जब भरोसे को बिना जिम्मेदारी के दिया जाता है
Speaker A
तो एक अकेला इंसान भी पूरी इकॉनमी को घुटनों पर ला सकता है। हर्षद मेहता को लोग बिग बुल के नाम से याद करते हैं। लेकिन सीतारमन जैसे कई लोग जो बिना किसी सुर्खी के बैंक के दरवाजे अंदर से खोल देते हैं उनकी कहानी जानना उतना ही जरूरी है।
Speaker A
क्योंकि हर बड़े स्कैम के पीछे [संगीत] एक बंदूक नहीं बल्कि एक ऐसा दस्तखत होता है जिसे कभी वेरीफाई नहीं किया गया। तो दोस्तों, यह थी हर्षद मेहता और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के उस अफसर अनलकी भास्कर यानी आर सीतारमन की पूरी कहानी। अगर आपको यह
Speaker A
कहानी पसंद आई हो, तो इस वीडियो को एक लाइक जरूर करें। कमेंट में बताएं कि क्या आप 1992 के स्कैम से जुड़ी किसी और कहानी पर वीडियो देखना चाहते हैं? चैनल को सब्सक्राइब करना और नोटिफिकेशन बेल ऑन करना ना भूलें ताकि फाइनेंस और शेयर
Speaker A
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Topics:हर्षद मेहता1992 बैंक घोटालाआर सीतारमणसुचेता दलालएसबीआई फ्रॉडभारतीय शेयर बाजारबैंकिंग स्कैमफर्जी सिक्योरिटीजभारतीय अर्थव्यवस्थाइन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म











