मुकेश और अनिल अंबानी के बीच रिलायंस के बंटवारे और कॉर्पोरेट जंग की कहानी।
Key Takeaways
- रिलायंस का बंटवारा दो भाइयों के बीच गहरे मतभेदों का परिणाम था।
- मुकेश ने टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर देकर कंपनी को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।
- अनिल ने सनराइज सेक्टर्स में निवेश किया लेकिन बाद में आर्थिक संकट का सामना किया।
- राजनीतिक जुड़ाव और पारिवारिक विवाद ने कंपनी की छवि और संचालन को प्रभावित किया।
- परिवार के वरिष्ठ सदस्यों के हस्तक्षेप से विवाद का समाधान संभव हुआ।
What the video covers
- 2019 में अनिल अंबानी को कोर्ट ने एररिक्सन को 453 करोड़ चुकाने का आदेश दिया, नहीं तो जेल की सजा।
- धीरूभाई अंबानी ने रिलायंस साम्राज्य की नींव रखी, बाद में उनके दो बेटे मुकेश और अनिल के बीच विवाद हुआ।
- मुकेश ने Reliance Infocom लॉन्च की, जिसने मोबाइल फोन को आम जनता तक पहुंचाया।
- धीरूभाई की मौत के बाद दोनों भाइयों के बीच मैनेजमेंट और शेयरहोल्डिंग को लेकर मतभेद बढ़े।
- अनिल का राजनीतिक जुड़ाव और कंपनी के अंदर आरोप-प्रत्यारोप से विवाद और गहरा हुआ।
- 2005 में परिवार की मां कोकिला बैन के हस्तक्षेप से दोनों भाइयों के बीच आधिकारिक बंटवारा हुआ।
- मुकेश को पुरानी इकॉनमी (तेल रिफाइनिंग, पेट्रोकेमिकल्स) और अनिल को सनराइज सेक्टर्स (टेलीकॉम, पावर, फाइनेंस) मिले।
- अनिल को Reliance Infocom (बाद में Reliance Communication) मिला, जो शुरुआत में सफल रहा।
- दोनों के बीच 10 साल तक एक-दूसरे के क्षेत्र में न आने का समझौता हुआ।
- यह कहानी भारत के कॉर्पोरेट इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है जो दो भाइयों की किस्मत को अलग कर गई।
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Speaker A
साल 2019 फरवरी की एक तपती दोपहर नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के बाहर सड़कों पर गाड़ियों का शोर था। लेकिन एक काली Mercedes के अंदर पिछली सीट पर भारत का वो आदमी बैठा था जिसने कभी दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने का सपना देखा था। नाम था अनिल अंबानी। तभी उनके सेलफोन की घंटी बजती है। दूसरी तरफ से उनके वकील की आवाज आती है। सर कोर्ट ने आखिरी फैसला सुना दिया है। 4 हफ्ते का समय है। अगर 453 करोड़ एररिक्सन को नहीं चुकाए तो आपको 3 महीने के लिए जेल जाना होगा। अचानक Mercedes के अंदर सन्नाटा सा छा जाता है। वो आदमी जो कभी दुनिया का छठा सबसे अमीर इंसान था। आज अपनी इज्जत और आजादी बचाने के लिए चंद करोड़ रुपयों का मोहताज था। यह कहानी सिर्फ एक बिजनेस के डूबने की नहीं है। यह कहानी है दो भाइयों के बीच की उस अनकही जंग की जिसने भारत के कॉर्पोरेट इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया। आज की इस डॉक्यूमेंट्री में हम इन दोनों भाइयों के बीच हुए उस बंटवारे की गहराई में उतरेंगे, जहां एक भाई हार कर भी आसमान की बुलंदियों पर पहुंच गया। और दूसरा जो इस बंटवारे में सब कुछ जीत कर भी अर्श से फर्श पर आ गिरा। आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक ही घर में पले बड़े दो भाइयों की किस्मत इतनी अलग हो गई? क्या यह सिर्फ गलत फैसलों का नतीजा था? या इसके पीछे कोई बहुत बड़ी सोची समझी रणनीति थी? आज हम मुकेश और अनिल अंबानी के उस युद्ध के एक-एक पन्ने को खोलेंगे जिसने पूरे कॉर्पोरेट जगत को हिला दिया। चलिए शुरू करते हैं मुकेश अंबानी बनाम अनिल अंबानी की यह पूरी दास्तान। इस खेल को समझने के लिए हमें वक्त के पहिये को पीछे घुमाना होगा। उस दौर में जब Reliance सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि करोड़ों भारतीयों का भरोसा हुआ करता था। धीरूभाई अंबानी ने यमन के अदन शहर में एक क्लर्क की नौकरी से शुरुआत करके भारत की सबसे बड़ी प्राइवेट कंपनी खड़ी की। टेक्सटाइल से पेट्रोकेमिकल्स तक फैला यह साम्राज्य लाखों छोटे निवेशकों का भरोसा बन चुका था। कहा जाता है कि धीरूभाई हमेशा कहते थे कि एक दिन ऐसा आएगा जब फोन कॉल की कीमत एक पोस्ट कार्ड से भी सस्ती होगी। ऐसी बात जिस पर उस दौर में लोग हंसते थे क्योंकि 1998 में मोबाइल से एक आउटगोइंग कॉल का रेट करीब ₹16 प्रति मिनट हुआ करता था और इनकमिंग कॉल का भी अलग से पैसा लगता था। यानी मोबाइल फोन उस वक्त सिर्फ अमीरों का शौक था। 1986 में धीरूभाई को एक स्ट्रोक आया। जिसके बाद उन्होंने अपने सपने को पूरा करने की जिम्मेदारी बड़े बेटे मुकेश अंबानी को सौंप दी। लेकिन 90 के दशक में एक नई टेलीकॉम कंपनी खड़ी करना किसी पहाड़ को तोड़ने जैसा था। हर सर्कल के लिए अलग लाइसेंस, हर राज्य सरकार और नगर निगम से फाइबर बिछाने की अनुमति और ऊपर से नियम भी लगातार बदलते रहते थे। क्योंकि टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया की स्थापना ही 1997 में हुई थी। फिर भी मुकेश अंबानी ने यह चुनौती स्वीकार की। हजारों युवा इंजीनियरों की एक नई टीम बनाई गई। जिसका पहला काम था सबसे किफायती तकनीक चुनना। दूसरी कंपनियां जहां जीएसएम तकनीक पर काम कर रही थी, वहीं मुकेश की टीम ने सीडीएमए को चुना क्योंकि इसका इंफ्रास्ट्रक्चर लगाना सस्ता पड़ता था। 600 से ज्यादा शहरों में 60 हजार किमी से ज्यादा फाइबर बिछाई गई। राज्य सरकारों की अनुमतियों से लेकर जमीन अधिग्रह तक दर्जनों अड़चनें आई। लेकिन प्रोजेक्ट आखिरकार पूरा हुआ। लेकिन लॉन्च से कुछ महीने पहले जुलाई 2002 में धीरू भाई का निधन हो गया। यानी जिस सपने को पूरा करने के लिए यह कंपनी बनाई गई थी, उसे देखने के लिए वह खुद मौजूद नहीं थे। धीरू भाई की 70वीं जयंती यानी 28 दिसंबर 2002 को मुकेश अंबानी ने इस कंपनी को Reliance Infocom के नाम से लॉन्च किया। टैगलाइन थी कर लो दुनिया मुट्ठी में। कुछ ही समय में ₹501 में फोन के साथ ₹100 का मुफ्त टॉक टाइम मिलने लगा और जो चीज कुछ साल पहले तक अमीरों का खिलौना थी, वह अब रिक्शा चलाने वालों और मजदूरों तक पहुंच गई। शोरूम के बाहर लाखों की भीड़ लगी रहती थी। मुकेश अंबानी ने इस पूरे कारोबार की नींव अपने हाथों से रखी थी। अब यहीं से इस कहानी का दूसरा और सबसे अहम मोड़ आता है। धीरूभाई ने कोई वसीयत नहीं छोड़ी थी। यानी इतने बड़े साम्राज्य का भविष्य अब दो ऐसे भाइयों के हाथ में था जो स्वभाव से एकदम अलग थे। मुकेश अंबानी पर्दे के पीछे रहने वाले, आगरों पर भरोसा करने वाले और फैक्ट्रियों में ज्यादा वक्त बिताने वाले इंसान थे। दूसरी तरफ अनिल अंबानी की छवि ज्यादा आउटगोइंग और मीडिया फ्रेंडली थी। वे मैराथन दौड़ते थे और अखबारों के पेज थ्री पर अक्सर नजर आते थे। शुरुआत में दोनों भाई किसी तरह साथ मिलकर कंपनी चलाते रहे। लेकिन धीरे-धीरे मैनेजमेंट को लेकर मतभेद सतह पर आने लगे। कहा जाता है कि इसी दौर में Reliance Infocom को लेकर भी एक विवाद पनप रहा था। नवंबर दिसंबर 2003 में मुकेश अंबानी ने कंपनी में Reliance के प्रेफरेंस शेयर्स को ₹50 प्रति शेयर के भाव पर इक्विटी में बदलने का प्रस्ताव रखा। जिस पर अनिल अंबानी ने आपत्ति जताई। अप्रैल 2004 में यह भाव बढ़ाकर ₹96.20 प्रति शेयर कर दिया गया। इसी बीच अनिल के गुट ने आरोप लगाया कि मुकेश अंबानी को इस कंपनी में ₹1 प्रति शेयर की दर पर पर्सनल स्वेट इक्विटी मिली हुई है जो करीब 12% हिस्सेदारी के बराबर थी और यह आरोप लगाया गया कि यह हिस्सेदारी बेहद कम कीमत पर दी गई थी। इसी दौरान 16 जून 2004 को अनिल अंबानी ने समाजवादी पार्टी के समर्थन से उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सदस्य बनने के लिए फॉर्म भरा और 5 जुलाई 2004 को वे एक स्वतंत्र सदस्य के तौर पर राज्यसभा पहुंच गए। कहा जाता है कि मुकेश अंबानी को यह कदम पसंद नहीं आया क्योंकि Reliance हमेशा हर राजनीतिक दल से बराबर दूरी बनाए रखने की नीति पर चलती आई थी और अनिल के इस राजनीतिक जुड़ाव से Reliance की उस साफसुथरी इमेज पर सवाल उठ सकते थे। लेकिन इस सबसे परे असली टकराव कंपनी के भीतर बढ़ता जा रहा था। दिसंबर 2004 में अनिल अंबानी ने कंपनी के एक शेयर बायबैक प्रस्ताव पर वोट देने से खुद को अलग रखा यह कहते हुए कि यह सही समय नहीं है और उन्होंने ग्रुप की अनलिस्टेड कंपनियों के आर्थिक प्रदर्शन का पूरा ब्यौरा मांगा। उनके गुट ने खुलेआम आरोप लगाया कि Reliance Infocom में हिस्सेदारी जानबूझकर कम कीमत पर मुकेश के पक्ष में समेटी जा रही है। यह पूरा मामला अब सिर्फ बोर्डरूम तक सीमित नहीं रहा। मीडिया में भी यह खबर आम हो गई कि Reliance के भीतर मालिकाना हक को लेकर कुछ गंभीर मतभेद चल रहे हैं। और फिर 3 जनवरी 2005 को यह लड़ाई एक नए मोड़ पर पहुंच गई। अनिल अंबानी ने इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी आईपीसीएल के वाइस चेयरमैन और डायरेक्टर पद से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे की वजह बताई गई आनंद जैन का उसी बोर्ड में होना जिन्हें मुकेश अंबानी का बेहद करीबी माना जाता था। अनिल ने कहा कि उस बोर्ड में बैठना उनकी गरिमा, आत्मसम्मान और स्वाभिमान के खिलाफ है और साथ ही यह भी आरोप लगाया कि आनंद जैन परिवार को बांटने की साजिश रच रहे हैं। इसी महीने अनिल अंबानी ने Reliance के डायरेक्टरों को 500 पन्नों का एक नोट भी भेजा। जिसमें उन्होंने कंपनी के भीतर मैनेजमेंट के तौर-तरीकों से जुड़ी खामियां गिनाई थी। कल्पना कीजिए उस दौर के Reliance के दफ्तर का माहौल। हर तरफ वकीलों की भागदौड़। दोनों भाइयों के करीबी अधिकारी मीडिया को अलग-अलग कहानियां लीक कर रहे थे और हर हफ्ते कोई ना कोई नया आरोप अखबार की सुर्खी बन रहा था। जब मामला इतना बढ़ गया तो आखिरकार परिवार की मां को आगे आना पड़ा। कहा जाता है कि उस कमरे में कोकिला बैन ने कहा तुम दोनों मेरे बेटे हो। तुम्हारे पिता ने जो बनाया वह तुम दोनों की मेहनत से बना है। अब फैसला यह नहीं होना चाहिए कि कौन जीता। फैसला यह होना चाहिए कि दोनों आगे बढ़ सकें। ऐसा कहा जाता है कि इसी एक बात ने बातचीत की दिशा बदल दी। इसके बाद हफ्तों तक वकीलों और सलाहकारों की टीमें कागजी कारवाही में जुटी रही। 18 जून 2005 को कोकिला बैन ने आधिकारिक तौर पर बंटवारे का ऐलान किया। 30-40 के सरल फार्मूले के साथ मुकेश अंबानी को मिला Reliance Industries यानी पुराने जमाने का तेल रिफाइनिंग और पेट्रो केमिकल्स का कारोबार जिसे उस दौर में ओल्ड इकॉनमी कहा जाता था। दूसरी तरफ अनिल अंबानी को मिला टेलीकॉम, पावर और फाइनेंशियल सर्विस। यानी वह हर सेक्टर जिसे उस वक्त सनराइज सेक्टर कहा जा रहा था। और इसी बंटवारे में वो टेलीकॉम कंपनी भी अनिल के हिस्से आई जिसे मुकेश अंबानी ने अपने हाथों से खड़ा किया था। यानी Reliance Infocom। इस समझौते में एक शर्त भी जोड़ी गई। 10 साल तक एक दूसरे के कारोबार में ना उतरने का समझौता। जिसका मतलब था कि जिस मुकेश अंबानी ने कभी ₹500 के फोन से करोड़ों लोगों तक पहुंच बनाई थी, वह अगले 10 साल तक किसी भी टेलीकॉम कंपनी में कदम नहीं रख सकते थे। उस वक्त मीडिया में यह चर्चा आम थी कि मुकेश को घाटे का सौदा मिला और अनिल के हिस्से आया भविष्य और अगले कुछ सालों में यह बात सच होती भी दिखी। बंटवारे के बाद Reliance Infocom का नाम बदलकर Reliance Communication रखा गया और 2006 में स्टॉक मार्केट में लिस्ट होते ही इसकी वैल्यू ₹35,000 करोड़ से ऊपर पहुंच गई। लाखों लोग आरकॉम का सिम खरीद रहे थे। अनिल
Speaker A
अपनी मुट्ठी में करने का सपना देखा था। नाम था अनिल अंबानी। तभी उनके सेलफोन की घंटी बजती है। दूसरी तरफ से उनके वकील [संगीत] की आवाज आती है। सर कोर्ट ने आखिरी फैसला सुना दिया है। 4 हफ्ते का समय
Speaker A
है। अगर 453 करोड़ एररिक्सन को नहीं चुकाए तो आपको 3 महीने के लिए जेल जाना होगा। अचानक Mercedes के अंदर सन्नाटा [संगीत] सा छा जाता है। वो आदमी जो कभी दुनिया का छठा सबसे अमीर इंसान था। आज अपनी इज्जत और
Speaker A
आजादी बचाने के लिए चंद करोड़ रुपयों का मोहताज था। यह कहानी सिर्फ एक बिजनेस के डूबने की नहीं है। यह कहानी है [संगीत] दो भाइयों के बीच की उस अनकही जंग की जिसने भारत के कॉर्पोरेट इतिहास को हमेशा के लिए
Speaker A
बदल दिया। आज की इस [संगीत] डॉक्यूमेंट्री में हम इन दोनों भाइयों के बीच हुए उस बंटवारे की गहराई में उतरेंगे, [संगीत] जहां एक भाई हार कर भी आसमान की बुलंदियों पर पहुंच गया। और दूसरा जो इस बंटवारे में
Speaker A
सब कुछ जीत कर भी अर्श से फर्श पर आ गिरा। आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक ही घर में पले बड़े दो भाइयों [संगीत] की किस्मत इतनी अलग हो गई? क्या यह सिर्फ गलत फैसलों का नतीजा था? या इसके पीछे [संगीत] कोई बहुत
Speaker A
बड़ी सोची समझी रणनीति थी? आज हम मुकेश और अनिल अंबानी के उस युद्ध के एक-एक पन्ने को खोलेंगे [संगीत] जिसने पूरे कॉर्पोरेट जगत को हिला दिया। चलिए शुरू करते हैं मुकेश अंबानी बनाम अनिल अंबानी की यह पूरी दास्तान।
Speaker A
इस खेल को समझने के लिए हमें वक्त के पहहिए को पीछे घुमाना होगा। उस दौर में जब Reliance सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि करोड़ों भारतीयों का भरोसा हुआ करता था। धीरूभाई अंबानी ने यमन के अदन शहर में एक क्लर्क
Speaker A
की नौकरी से शुरुआत करके भारत की सबसे बड़ी प्राइवेट कंपनी खड़ी की। टेक्सटाइल से पेट्रोकेमिकल्स तक फैला यह साम्राज्य लाखों छोटे निवेशकों का भरोसा बन चुका था। कहा जाता है कि धीरूभाई हमेशा कहते थे कि एक दिन ऐसा आएगा जब फोन कॉल की कीमत एक
Speaker A
पोस्ट कार्ड से भी सस्ती होगी। ऐसी बात जिस पर उस दौर में लोग हंसते थे क्योंकि 1998 में मोबाइल से एक आउटगोइंग कॉल का रेट करीब ₹16 प्रति मिनट हुआ करता था और इनकमिंग कॉल का भी अलग से पैसा लगता था।
Speaker A
यानी मोबाइल फोन उस वक्त सिर्फ अमीरों का शौक था। 1986 में धीरूभाई को एक स्ट्रोक आया। जिसके बाद उन्होंने अपने सपने को पूरा करने की जिम्मेदारी बड़े बेटे मुकेश अंबानी को सौंप दी। लेकिन 90 के दशक में एक नई टेलीकॉम कंपनी खड़ी करना किसी पहाड़
Speaker A
को तोड़ने जैसा था। हर सर्कल के लिए अलग लाइसेंस, हर राज्य सरकार और नगर निगम से फाइबर बिछाने की अनुमति और ऊपर से नियम भी लगातार बदलते रहते थे। क्योंकि टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया की स्थापना ही 1997 में हुई थी। फिर भी मुकेश अंबानी
Speaker A
ने यह चुनौती स्वीकार की। हजारों युवा इंजीनियरों की एक नई टीम बनाई गई। जिसका पहला काम [संगीत] था सबसे किफायती तकनीक चुनना। दूसरी कंपनियां जहां जीएसएम तकनीक पर काम कर रही थी, वहीं मुकेश की टीम ने सीडीएमए को चुना क्योंकि इसका
Speaker A
इंफ्रास्ट्रक्चर लगाना सस्ता पड़ता था। 600 से ज्यादा शहरों में 60 हजार किमी से ज्यादा फाइबर बिछाई गई। राज्य सरकारों की अनुमतियों से लेकर जमीन अधिग्रह तक दर्जनों अड़चनें आई। लेकिन प्रोजेक्ट आखिरकार पूरा हुआ। लेकिन लॉन से कुछ महीने
Speaker A
पहले जुलाई 2002 में धीरू भाई का निधन हो गया। यानी जिस सपने को पूरा करने के लिए यह कंपनी बनाई गई थी, उसे देखने के लिए वह खुद मौजूद नहीं थे। धीरू भाई की 70वीं जयंती यानी 28 दिसंबर 2002 को मुकेश
Speaker A
अंबानी ने इस कंपनी को Reliance infoकम के नाम से लॉन्च किया। टैगलाइन थी कर लो दुनिया मुट्ठी में। कुछ ही समय में ₹501 में फोन के साथ ₹100 का मुफ्त टॉक [संगीत] टाइम मिलने लगा और जो चीज कुछ साल पहले तक
Speaker A
अमीरों का खिलौना थी, वह अब रिक्शा चलाने वालों [संगीत] और मजदूरों तक पहुंच गई। शोरूम के बाहर लाखों की भीड़ लगी रहती थी। मुकेश अंबानी ने इस पूरे [संगीत] कारोबार की नींव अपने हाथों से रखी थी। अब यहीं से
Speaker A
इस कहानी का दूसरा और सबसे अहम मोड़ आता है। धीरूभाई ने कोई वसीयत नहीं छोड़ी थी। यानी इतने बड़े साम्राज्य का भविष्य अब दो ऐसे भाइयों के हाथ में था जो स्वभाव से एकदम अलग थे। मुकेश अंबानी पर्दे के पीछे
Speaker A
रहने वाले आगरों पर भरोसा करने वाले और फैक्ट्रियों में ज्यादा वक्त बिताने वाले इंसान थे। दूसरी तरफ अनिल अंबानी की छवि ज्यादा आउटगोइंग और मीडिया फ्रेंडली थी। वे मैराथन दौड़ते थे और अखबारों के पेज थ्री पर अक्सर नजर आते थे। शुरुआत में
Speaker A
दोनों भाई किसी तरह साथ मिलकर कंपनी चलाते रहे। लेकिन धीरे-धीरे मैनेजमेंट को लेकर मतभेद सतह पर आने लगे। कहा जाता है कि इसी दौर में Reliance Infoक को लेकर भी एक विवाद पनप रहा था। नवंबर दिसंबर 2003 में
Speaker A
मुकेश अंबानी ने कंपनी में Reliance के प्रेफरेंस शेयर्स को ₹50 प्रति शेयर के भाव पर इक्विटी में बदलने का प्रस्ताव रखा। [संगीत] जिस पर अनिल अंबानी ने आपत्ति जताई। अप्रैल 2004 में यह भाव बढ़ाकर ₹96.20 प्रति शेयर कर दिया गया। इसी बीच अनिल के
Speaker A
गुट ने आरोप लगाया कि मुकेश अंबानी को [संगीत] इस कंपनी में ₹1 प्रति शेयर की दर पर पर्सनल स्वेट इक्विटी मिली हुई है जो करीब 12% हिस्सेदारी के बराबर थी और यह आरोप लगाया गया कि यह हिस्सेदारी बेहद कम
Speaker A
कीमत पर दी गई थी। इसी दौरान 16 जून 2004 को अनिल अंबानी ने समाजवादी पार्टी के समर्थन से उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सदस्य बनने के लिए फॉर्म भरा और 5 जुलाई 2004 को वे एक स्वतंत्र सदस्य के तौर पर राज्यसभा
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पहुंच गए। कहा जाता है कि मुकेश अंबानी को यह कदम पसंद नहीं आया क्योंकि Reliance हमेशा हर राजनीतिक दल से बराबर दूरी बनाए रखने की नीति पर चलती आई थी और अनिल के इस राजनीतिक जुड़ाव से Reliance की उस
Speaker A
साफसथरी इमेज पर सवाल उठ सकते थे। लेकिन इस सबसे परे असली टकराव कंपनी के भीतर बढ़ता जा रहा था। दिसंबर 2004 में अनिल अंबानी ने कंपनी के एक शेयर बायबैक प्रस्ताव पर वोट देने से खुद को अलग रखा
Speaker A
यह कहते हुए कि यह सही समय नहीं है और उन्होंने ग्रुप की अनलिस्टेड कंपनियों के आर्थिक प्रदर्शन का पूरा ब्यौरा [संगीत] मांगा। उनके गुट ने खुलेआम आरोप लगाया कि Reliance Infoक में हिस्सेदारी जानबूझकर [संगीत] कम कीमत पर मुकेश के पक्ष में
Speaker A
समेटी जा रही है। यह पूरा मामला [संगीत] अब सिर्फ बोर्डरूम तक सीमित नहीं रहा। मीडिया में भी यह खबर आम हो गई कि Reliance के भीतर मालिकाना हक को लेकर कुछ गंभीर [संगीत] मतभेद चल रहे हैं। और फिर 3
Speaker A
जनवरी 2005 को यह लड़ाई एक नए मोड़ पर पहुंच गई। अनिल अंबानी ने इंडियन पेट्रोकेमिकल्स [संगीत] कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी आईपीसीएल के वाइस चेयरमैन और डायरेक्टर पद से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे की वजह बताई गई आनंद जैन का उसी बोर्ड में
Speaker A
होना [संगीत] जिन्हें मुकेश अंबानी का बेहद करीबी माना जाता था। अनिल ने कहा कि उस बोर्ड में बैठना उनकी [संगीत] गरिमा, आत्मसम्मान और स्वाभिमान के खिलाफ है और साथ ही यह भी आरोप लगाया कि आनंद जैन परिवार को बांटने की [संगीत] साजिश रच रहे
Speaker A
हैं। इसी महीने अनिल अंबानी ने Reliance के डायरेक्टरों को 500 पन्नों का एक नोट भी भेजा। जिसमें उन्होंने कंपनी [संगीत] के भीतर मैनेजमेंट के तौर-तरीकों से जुड़ी खामियां गिनाई थी। कल्पना कीजिए उस दौर के Reliance के दफ्तर का माहौल। हर तरफ
Speaker A
वकीलों की भागदौड़। दोनों भाइयों [संगीत] के करीबी अधिकारी मीडिया को अलग-अलग कहानियां लीक कर रहे थे और हर हफ्ते कोई ना कोई नया आरोप अखबार की सुर्खी बन रहा था। जब मामला इतना [संगीत] बढ़ गया तो आखिरकार परिवार की मां को आगे आना पड़ा।
Speaker A
कहा जाता है कि उस कमरे में कोकिला बैन ने कहा तुम दोनों मेरे बेटे हो। तुम्हारे पिता ने जो बनाया वह तुम दोनों की मेहनत से बना है। अब फैसला यह नहीं होना चाहिए कि कौन जीता। फैसला यह होना चाहिए कि
Speaker A
दोनों आगे बढ़ सकें। ऐसा कहा जाता है कि इसी एक बात ने बातचीत की दिशा बदल दी। इसके बाद हफ्तों तक वकीलों और सलाहकारों की [संगीत] टीमें कागजी कारवाही में जुटी रही। 18 जून 2005 कोकिला बैन ने आधिकारिक
Speaker A
तौर पर बंटवारे का ऐलान किया। 30-40 [संगीत] के सरल फार्मूले के साथ मुकेश अंबानी को मिला Reliance Industries यानी पुराने जमाने का तेल रिफाइनिंग और पेट्रो केमिकल्स का कारोबार जिसे उस दौर में ओल्ड इकॉनमी कहा जाता था। दूसरी तरफ अनिल
Speaker A
अंबानी को मिला टेलीकॉम, पावर और फाइनेंशियल सर्विज। यानी वह हर सेक्टर जिसे [संगीत] उस वक्त सनराइज सेक्टर कहा जा रहा था। और इसी बंटवारे में वो टेलीकॉम कंपनी भी अनिल के हिस्से आई जिसे मुकेश अंबानी ने अपने हाथों से खड़ा किया था।
Speaker A
यानी [संगीत] Reliance infoकमcom। इस समझौते में एक शर्त भी जोड़ी गई। 10 साल तक एक दूसरे के कारोबार में ना उतरने का समझौता। जिसका मतलब [संगीत] था कि जिस मुकेश अंबानी ने कभी ₹500 के फोन से करोड़ों लोगों तक पहुंच बनाई [संगीत] थी,
Speaker A
वह अगले 10 साल तक किसी भी टेलीकॉम कंपनी में कदम नहीं रख सकते थे। उस वक्त मीडिया में यह चर्चा आम थी कि [संगीत] मुकेश को घाटे का सौदा मिला और अनिल के हिस्से आया भविष्य और अगले कुछ सालों में [संगीत] यह
Speaker A
बात सच होती भी दिखी। बंटवारे के बाद Reliance Infoक का नाम बदलकर Reliance Comunication रखा गया और 2006 [संगीत] में स्टॉक मार्केट में लिस्ट होते ही इसकी वैल्यू ₹35,000 करोड़ से ऊपर पहुंच गई। लाखों लोग आरकॉम का सिम खरीद रहे थे। अनिल
Speaker A
[संगीत] अंबानी की हर कंपनी का शेयर आसमान छू रहा था। चाहे वह फाइनेंस में Reliance कैपिटल हो या पावर सेक्टर में Reliance एनर्जी। 2008 तक Rक का शेयर 2 साल में चार गुना बढ़ चुका था। इसी उभार के साथ अनिल
Speaker A
अंबानी ने एडलेब्स नाम की कंपनी खरीदकर एंटरटेनमेंट सेक्टर में कदम [संगीत] रखा। बिग सिनेमाज़ के नाम से सैकड़ों स्क्रीन, बिग एफएम के नाम से रेडियो स्टेशन और बिग टीवी के नाम से डीटीएच सेवा पूरे देश में [संगीत] फैल गई। अनिल और टीना अंबानी
Speaker A
बॉलीवुड के हर बड़े प्रीमियर की पहली कतार में नजर आने लगे। 2008 आते-आते अनिल अंबानी स्टीवन स्टीलबर्ग [संगीत] की कंपनी ड्रीम वर्क्स में $825 मिलियन का निवेश कर रहे थे। जरा सोचिए। एक तरफ बड़ा भाई जामनगर की रिफाइनरी [संगीत] में पाइप
Speaker A
लाइनों के बीच खड़ा था और दूसरी तरफ छोटा भाई हॉलीवुड की फिल्मों को फाइनेंस कर रहा था। इस दौरान अनिल अंबानी ने अपना सबसे बड़ा दांव खेला। [संगीत] Reliance पावर का आईपीओ। यह कंपनी सिर्फ कागज पर थी। एक भी
Speaker A
प्लांट शुरू नहीं हुआ था। [संगीत] लेकिन नाम अंबानी का था। आईपीओ खुलते ही पहले मिनट में पूरी तरह भर गया और कागज पर मौजूद यह कंपनी एक ही मिनट में 11563 करोड़ तक पहुंच गई। मार्च 2008 मेंब्स की
Speaker A
सूची में अनिल अंबानी दुनिया के छठे सबसे अमीर व्यक्ति के तौर पर दर्ज हुए। उनकी संपत्ति करीब [संगीत] ₹42 अरब डॉलर आकी गई। इसका मतलब यह नहीं कि मुकेश अंबानी का कारोबार खराब चल रहा था। लेकिन मीडिया की
Speaker A
[संगीत] रोशनी उस वक्त पूरी तरह अनिल अंबानी पर थी। लेकिन इसी दौर में दो ऐसी घटनाएं हुई जिन्होंने अनिल अंबानी के इस सपने भरे सफर पर पहला बड़ा [संगीत] ब्रेक लगाया। दक्षिण अफ्रीका की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी एमटीn के साथ आरकॉम के
Speaker A
मर्जर की बातचीत [संगीत] मई 2008 में शुरू हो चुकी थी। अगर यह डील पूरी हो जाती तो [संगीत] मिलीजुली कंपनी की वैल्यू करीब 70 अरब डॉलर तक पहुंच जाती और अनिल अंबानी एक [संगीत] झटके में एक सीमित दायरे वाली
Speaker A
टेलीकॉम कंपनी के मालिक से ग्लोबल प्लेयर बन जाते। लेकिन जैसे ही यह डील पक्की होने वाली थी, मुकेश अंबानी की Reliance Industries की तरफ से एमटीए को एक कानूनी पत्र भेजा गया। जिसमें दावा [संगीत] किया गया कि बंटवारे के समय हुए समझौते के
Speaker A
मुताबिक अगर कोई भाई अपनी कंपनी में नियंत्रण वाला हिस्सा बेचता है तो उसे खरीदने का पहला अधिकार परिवार [संगीत] के दूसरे सदस्य को है यानी Reliance को। अनिल के गुट ने इसे मीनिंगलेस करार देते [संगीत] हुए कंपनी कानून के प्रावधानों का
Speaker A
हवाला दिया। लेकिन विवाद इतना बढ़ गया [संगीत] कि जुलाई 2008 में यह डील पूरी तरह टूट गई। इसी दौर में अनिल अंबानी के गुट ने मुकेश [संगीत] अंबानी के एक मीडिया बयान को लेकर उन पर ₹100 करोड़ की मानहानि
Speaker A
[संगीत] का मुकदमा भी दायर कर दिया। यह अनिल अंबानी के 10 साल के दबदबे को लगा पहला बड़ा झटका था। दूसरा झटका आया गैस को लेकर। मुकेश अंबानी की Reliance Industries के पास कृष्णा गोदावरी बेसिन में केजी नाम का एक गैस फील्ड था। 2005 के
Speaker A
फैमिली एमओयू के मुताबिक अनिल की कंपनी को यहां से $2.34 प्रति एमएमबीटीयू की सस्ती दर पर गैस मिलनी थी। जो सरकार द्वारा तय की गई $4.20 की दर से करीब आधी थी। अनिल अंबानी ने इसी सस्ती गैस के भरोसे उत्तर प्रदेश के दादरी
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में दुनिया के सबसे बड़े गैस आधारित पावर प्लांट की योजना [संगीत] बना ली थी। जो उन्हें भारत का पावर किंग बना सकता था। लेकिन जब गैस खरीदने का वक्त आया मुकेश अंबानी के गुट ने साफ कहा कि गैस देश की
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संपत्ति है। इसकी कीमत परिवार के निजी कागजों से नहीं सरकार से तय होती है। अनिल अंबानी इस मुद्दे को अदालत ले गए। अखबारों में पूरे पन्ने के विज्ञापन छपवाए खुले पत्र लिखे और यह मुद्दा संसद तक पहुंचाया। एक बयान में उन्होंने कहा, "मुझे दुख है
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कि मेरे आदरणीय बड़े भाई के नेतृत्व में Reliance अब भी गैस सप्लाई करने की अपनी कानूनी वादे से पीछे हटने की हर मुमकिन [संगीत] कोशिश कर रही है। जून 2009 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने अनिल के पक्ष में फैसला दिया।
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लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और [संगीत] 7 मई 2010 को सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से फैसला सुनाया कि गैस की कीमत सरकार तय करेगी। फैमिली एमओयू का इसमें कोई कानूनी वजन नहीं है। नतीजा [संगीत] यह हुआ कि दादरी का वो प्लांट जो अनिल को
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पावर किंग बनाने वाला था कभी बना ही नहीं। वो जमीन खाली की खाली रह गई। अब यहां से कहानी एक दिलचस्प मोड़ [संगीत] लेती है। 23 मई 2010 को गैस विवाद खत्म होने के ठीक कुछ हफ्तों बाद दोनों भाइयों ने अचानक एक
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साझा बयान जारी किया। 2006 में हुए 10 साल तक एक दूसरे के कारोबार में ना उतरने का समझौते को पूरी तरह रद्द करने का फैसला। अब दोनों गुट किसी भी सेक्टर में कदम रख सकते थे। बाजार में इसे भाइयों के बीच
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सुलह का संकेत माना गया लेकिन असल तस्वीर कुछ और थी। ठीक 1 महीने बाद जून 2010 में देश में 4G स्पेक्ट्रम की नीलामी हो रही थी और इस नीलामी में देश के सारे सर्कलों का स्पेक्ट्रम एक अनजान सी कंपनी ने जीत
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लिया। नाम था इंफोटेल ब्रॉडबैंड। पूरी इंडस्ट्री हैरान थी कि यह इंफोटेल है कौन? जल्द ही [संगीत] खुलासा हुआ कि मुकेश अंबानी ने इस कंपनी को करीब ₹4,800 करोड़ [संगीत] में खरीद लिया है। यानी जिस टेलीकॉम सेक्टर से मुकेश अंबानी को 10 साल
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के लिए दूर रखा गया था, समझौता खत्म होते ही उन्होंने सबसे पहला कदम उसी सेक्टर में रखा। कुछ जानकार इसे महज एक कारोबारी फैसला मानते हैं, तो कुछ इसे 2005 के बंटवारे का देर से आया जवाब भी कहते
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[संगीत] हैं। सच्चाई शायद इन दोनों नजरियों के बीच कहीं है क्योंकि टेलीकॉम मुकेश अंबानी का पुराना जुनून था और आर्थिक नजरिए से भी यह सेक्टर उस वक्त सबसे तेज बढ़ता हुआ बाजार था। लेकिन इस नए नेटवर्क के लिए हजारों करोड़ रुपए चाहिए
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थे। और यह पैसा उसी बोरिंग पुराने कारोबार से आया जो 2005 में मुकेश को मिला था। जामनगर की दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी से हर साल अरबों डॉलर की कमाई हो रही थी और अब यही पैसा नए नेटवर्क में लगाया जाना
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था। दिलचस्प बात यह है कि इसी दौर में यानी 2013 में अनिल अंबानी की आरकॉम और मुकेश अंबानी की उभरती हुई कंपनी Reliance Jio के बीच व्यापारिक साझेदारी भी शुरू हो गई। अप्रैल 2013 में दोनों कंपनियों ने ₹1,000 करोड़ का इंटरसिटी फाइबर शेयरिंग
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समझौता किया और अगस्त 2013 में ₹45,000 टावरों को शेयर करने के लिए करीब ₹1,000 करोड़ का एक और समझौता हुआ। यानी वही आरकॉम जिसे भविष्य में Jio के हाथों सबसे बड़ी चुनौती मिलने वाली थी, उसी Jio को अपने टावर और फाइबर किराए पर देकर कमाई कर
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रही थी। यह पूरी कहानी की एक और परत है जो बताती है कि दोनों भाइयों के बीच रिश्ता [संगीत] सिर्फ दुश्मनी का नहीं बल्कि जरूरत पड़ने पर सहयोग का भी रहा। इसी बीच अनिल अंबानी ने कई गलतियां भी की।
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उन्होंने कर्ज लेकर एक साथ कई सेक्टरों में निवेश शुरू कर दिया। ड्रीम वक्स, बिग सिनेमाज़, डीटीएच, म्यूचल फंड्स, इंश्योरेंस, सड़कें, मुंबई मेट्रो और डिफेंस हर जगह एक साथ पैसा लगाया जा रहा था और वह भी बैंकों से कर्ज लेकर। 2002
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में जब मुकेश अंबानी ने सीडीएमए तकनीक चुनी थी वो उस वक्त सही फैसला था। लेकिन 2008 में iPhone लॉन्च होने के बाद पूरी दुनिया जीएसएम तकनीक की तरफ बढ़ रही थी और [संगीत] सीडीएम में हैंडसेट बनने बंद हो
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रहे थे। अनिल अंबानी ने बदलते वक्त को देखते हुए जीएसएम में भी कदम रखा। लेकिन अब उन्हें दो-दो नेटवर्क चलाने पड़ते थे। जिसमें मेंटेनेंस का खर्च कहीं ज्यादा था। 2009 से 10 आते-आते अनिल अंबानी ग्रुप का कुल कर्ज ₹25,000 करोड़ तक पहुंच चुका था।
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और इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाई आरकॉम के नेटवर्क ने क्योंकि नेटवर्क को अपग्रेड करने की जगह [संगीत] वही कमाई बाकी कारोबारों को चलाने और बैंकों के कर्ज चुकाने में इस्तेमाल हो रही थी। ऊपर से 2010 में सामने आए ₹1,76,000 करोड़ के 2G
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स्पेक्ट्रम घोटाले में आरकॉम से जुड़े कई नाम उछले। जिसकी वजह से कंपनी के शेयर बुरी तरह गिर गए। अनिल अंबानी को खुद अप्रैल 2011 में संसद की पब्लिक अकाउंट्स कमेटी के सामने पेश होकर करीब 2 घंटे तक सवालों के [संगीत] जवाब देने पड़े। अब आते
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हैं उस पल पर जिससे हमने यह कहानी शुरू की थी। सितंबर 2016 की शुरुआत में 1 सितंबर को Reliance की एजीएम में मुकेश अंबानी ने ऐलान किया कि 5 सितंबर से Jio की सेवाएं शुरू होंगी। वॉइस कॉल हमेशा के लिए मुफ्त,
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डाटा लगभग मुफ्त और शुरुआती 6 महीने सब कुछ फ्री। इस बार मुकेश अंबानी ने सस्ती तकनीक नहीं बल्कि उस दौर की सबसे नई और जोखिम भरी तकनीक [संगीत] चुनी वोल्टी यानी वॉइस ओवर एलटीई जिसमें वॉइस कॉल भी इंटरनेट डाटा की तरह भेजी जाती है। ढाई
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लाख किलोमीटर फाइबर बिछाई गई। 90 हजार से ज्यादा टावर लगाए गए और इतना खर्च देखकर कई विश्लेषक खुलकर लिख रहे थे कि यह मुकेश अंबानी का अब तक का सबसे महंगा और सबसे जोखिम [संगीत] भरा जुआ साबित होगा। लेकिन
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जब 5 सितंबर 2016 को Jio लॉन्च हुआ तो असर तुरंत और जबरदस्त था। पहले ही महीने में 1.5 करोड़ से ज्यादा सब्सक्राइबर्स जुड़ गए। यह दुनिया के किसी भी टेलीकॉम ऑपरेटर के लिए अब तक की सबसे तेज ग्रोथ थी।
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Facebook और WhatsApp [संगीत] जैसी कंपनियों से भी तेज। सिर्फ 170 दिनों में 10 करोड़ से ज्यादा [संगीत] लोग Jio से जुड़ चुके थे। भारत रातोंरात दुनिया का सबसे सस्ता डाटा बाजार बन गया। लेकिन यह Jio क्रांति पुराने खिलाड़ियों के लिए
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किसी आपदा से कम नहीं थी। खासकर उस आरकॉम के लिए जो पहले से भारी कर्ज तले दबी हुई थी। जिस कंपनी की 70% कमाई वॉइस कॉल से आती थी उसके सामने अब मुफ्त कॉल वाला प्रतिद्वंदी खड़ा था। कहा जाता है कि
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इंडस्ट्री के जानकार इसे विडंबना मानते हैं। एक भाई की टेलीकॉम सफलता दूसरे भाई की टेलीकॉम कंपनी की तबाही की एक बड़ी वजह [संगीत] बन गई। हालांकि यह भी उतना ही सच है कि आरकॉम का कर्ज संकट Jio के आने से
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पहले से ही गहरा चुका था। इसलिए इसे [संगीत] पूरी तरह सिर्फ एक वजह मानना ठीक नहीं होगा। यह कोई सीधी बदले की कार्रवाई भी नहीं थी। Jio एक स्वतंत्र और बड़ी कारोबारी रणनीति थी। लेकिन इसका सबसे गहरा असर उसी भाई की कंपनी पर पड़ा जो पहले से
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नाजुक हालत में थी। 2017 आते-आते आरकॉम पर करीब $4 अरब डॉलर का कर्ज हो चुका था। दिसंबर 2017 में आरकॉम ने कर्ज घटाने के लिए मुकेश अंबानी की Jio के साथ ₹25,000 करोड़ का एक बड़ा एसेट सेल समझौता भी
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किया। जिसमें अपने वायरलेस एसेट्स Jio को और कुछ रियलस्टेट एसेट्स कनाडा की ब्रुक फील्ड को बेचने की [संगीत] योजना थी। लेकिन दिसंबर 2018 में डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकॉम ने इस स्पेक्ट्रम ट्रेडिंग डील को मंजूरी देने से इंकार कर दिया। जिससे
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आरकॉम के शेयर एक ही दिन में 12% तक गिर गए। इसी बीच स्वीडन की टेलीकॉम इक्विपमेंट कंपनी एरिक्सन का मामला सामने आ चुका था। एरिक्सन ने 2014 में आरकॉम के नेटवर्क को मैनेज करने का करार किया था। लेकिन भुगतान
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में लगातार देरी होती रही। मई 2017 में एक सेटलमेंट हुआ लेकिन आरकॉम उसकी शर्तें भी [संगीत] पूरी नहीं कर पाई। दिसंबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि 4 हफ्ते के भीतर 50 करोड़ 50 लाख चुकाए जाएं। वरना अनिल अंबानी को 3 महीने जेल
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जाना होगा। कंपनी ने कुछ हिस्सा भुगतान किया लेकिन पूरी रकम नहीं जुटा पाई। 20 फरवरी 2019 को सुप्रीम [संगीत] कोर्ट ने अनिल अंबानी और दो अन्य अधिकारियों सतीश सेठ और छाया वीरानी को कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट का दोषी [संगीत] करार दिया। 4 हफ्ते के
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भीतर ₹453 करोड़ चुकाने का आदेश वरना 3 महीने जेल। इस खबर के आते ही Reliance ग्रुप की कंपनियों के शेयर बुरी तरह गिर गए। यह वही पल था जिससे हमने इस कहानी की शुरुआत की थी। अब वापस चलते हैं उसी दृश्य
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में। समय बीतता जा रहा है। समय सीमा नजदीक आ रही है। कंपनी के पास पहले से ₹18 करोड़ जमा थे। बाकी रकम कहां से आएगी यह साफ नहीं था। और फिर समय सीमा खत्म होने से ठीक 1 दिन पहले 18 मार्च 2019 को खबर आती
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है कि पूरा बकाया चुका दिया गया है। अनिल अंबानी ने एक सार्वजनिक बयान जारी करते हुए कहा अपने आदरणीय बड़े भाई मुकेश और भाभी नीता का इन मुश्किल दिनों में साथ खड़े रहने और यह टाइमली सपोर्ट देने के
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लिए मैं दिल की गहराइयों से आभार व्यक्त करता हूं। यह हमारे परिवार के संस्कार की सच्ची मिसाल है। पूरे देश में यह खबर एक भावुक कहानी की तरह फैली। [संगीत] वही भाई जिसके खिलाफ कभी अखबारों में पूरे पन्ने
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के विज्ञापन छपवाए गए थे। वही भाई अब जेल से बचाने वाला सहारा बन गया। लेकिन इस कहानी में एक ऐसा मोड़ भी है जो बहुत कम लोगों तक पहुंचा। करीब डेढ़ साल बाद जब अनिल अंबानी का मामला लंदन की एक अदालत
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में चीनी बैंकों के खिलाफ चल रहा था, तो वहां कोर्ट में जमा किए गए कानूनी दस्तावेजों से एक अलग ही तस्वीर सामने आई। इन दस्तावेजों के मुताबिक एरिक्सन को चुकाई गई रकम मुकेश अंबानी की निजी मदद से नहीं आई थी बल्कि आरकॉम ने अपने कुछ
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कॉर्पोरेट एसेट्स Reliance Industries के ही एक ग्रुप की कंपनी को लीज़ पर देकर करीब ₹460 करोड़ जुटाए थे। यानी यह एक प्योरली प्रोफेशनल लेनदेन था। दान या व्यक्तिगत एहसान नहीं। अनिल अंबानी के प्रतिनिधि ने बाद में इस पर सफाई भी दी कि एरिक्सन का
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मामला एक कॉर्पोरेट देनदारी से जुड़ा था और इसके लिए जरूरी रकम एसेट्स लीज पर देकर एक कॉर्पोरेट लेनदेन के जरिए जुटाई गई थी। तो जो कहानी उस वक्त पूरे देश ने एक भावुक भाईचारे की मिसाल की तरह पढ़ी थी। असल में
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वो एक कॉर्पोरेट डील थी जिसे शायद जानबूझकर परिवार की एकता की भाषा में पेश किया गया। यह इस पूरी कहानी की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है। दो भाइयों के बीच का रिश्ता चाहे हकीकत में जो भी हो मीडिया
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और जनता के सामने हमेशा एक खास तरीके से गढ़ा जाता रहा। लेकिन यह भुगतान भी अनिल अंबानी [संगीत] के डूबते साम्राज्य को बचा नहीं पाया। 2019 में ही आरकॉम ने औपचारिक [संगीत] रूप से बैंक एफटीसी प्रोसीडिंग्स के लिए अर्जी दी। कुल कर्ज ₹45,000 करोड़
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से ज्यादा था। इसके साथ ही ग्रुप की बाकी कंपनियां भी एक के बाद एक मुश्किल में फंसती गई। Reliance नेवल एंड इंजीनियरिंग जिस पर करीब ₹9000 करोड़ का कर्ज था। जनवरी 2020 में इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया में चली गई। आरकॉम की समुद्र के नीचे केबल
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बिछाने वाली कंपनी GCX ने भी अमेरिका के डेलावेयर कोर्ट में बैंक अपटेसी प्रोटेक्शन के लिए अर्जी दी। 2019 के अंत तक अनिल अंबानी ग्रुप की कंपनियों पर कुल मिलाकर ₹43,800 करोड़ से ज्यादा के लोन डिफॉल्ट दर्ज हो चुके थे। जून 2019 [संगीत] में इन छह
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ग्रुप कंपनियों का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन करीब ₹6,196 [संगीत] करोड़ था। और फरवरी 2020 आते-आते यह घटकर सिर्फ ₹1645 करोड़ के आसपास रह गया। और फिर आया वह पल जिसे भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास का शायद सबसे नाटकीय क्षण कहा जा सकता है। तीन
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चीनी बैंकों ने लंदन की एक अदालत में अनिल अंबानी के खिलाफ मुकदमा दायर किया। दावा था कि 2012 में इन बैंकों ने आरकॉम को करीब 925 मिलियन का कर्ज दिया था और अनिल अंबानी ने खुद इस कर्ज की व्यक्तिगत
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गारंटी दी थी। फरवरी 2020 में लंदन हाईकोर्ट में सुनवाई [संगीत] के दौरान अनिल अंबानी खुद अदालत में मौजूद नहीं थे। उनकी तरफ से वकीलों की टीम पेश हुई और अदालत के सामने उनका एक लिखित बयान रखा गया जो पहले ही कोर्ट फाइलिंग में [संगीत]
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दर्ज हो चुका था। उस बयान में लिखा था मेरे निवेशों की कीमत गिर चुकी है। मेरी देनदारियों को हिसाब में रखते हुए मेरा नेटवर्थ अब शून्य है। सीधे शब्दों में कहूं तो मेरे पास ऐसी कोई बड़ी संपत्ति नहीं बची है जिसे इन कार्यवाहियों के लिए
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भुनाया जा सके। बैंकों के वकीलों ने अदालत में यह भी कहा कि अनिल अंबानी की लाविश लाइफस्ट [संगीत] इस दावे से मेल नहीं खाती। जज डेविड वैक्समैन ने यह दलील पूरी तरह स्वीकार नहीं [संगीत] की और अनिल अंबानी को 6 हफ्ते के भीतर $ मिलियन अदालत
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में जमा करने का आदेश दिया। इसी मामले में कुछ महीनों बाद सितंबर 2020 में अनिल अंबानी खुद [संगीत] वीडियो लिंक के जरिए लंदन कोर्ट के सामने पेश हुए। जहां करीब 3 घंटे तक उनकी संपत्ति, खर्चों और जीवन शैली को लेकर सवाल [संगीत] जवाब हुए।
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उन्होंने अदालत को बताया कि जनवरी से जून 2020 के बीच अपने वकीलों की फीस चुकाने के [संगीत] लिए उन्होंने अपने निजी गहने बेचे जिनसे उन्हें करीब 9 करोड़ 90 लाख [संगीत] मिले और अब उनके पास कोई निजी गहना नहीं
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बचा। जरा सोचिए इस बदलाव की गहराई को। 2008 में फोर्बs की [संगीत] लिस्ट में अनिल अंबानी दुनिया के छठे सबसे अमीर इंसान थे। 42 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ और 12 साल बाद [संगीत] 2020 में वही इंसान
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लंदन की अदालत में अपनी संपत्ति शून्य बता रहे थे और यह कहानी 2020 के बाद भी नहीं थमी। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने [संगीत] 2020 में ही अनिल अंबानी के खिलाफ पर्सनल गारंटर के तौर पर एक याचिका दायर की थी।
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आरकॉम और Reliance infrael के कर्ज से जुड़ी करीब ₹853 करोड़ की देनदारी को लेकर। यह मामला सालों तक अदालतों में चलता रहा और हाल ही में जून 2026 में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने इस याचिका को स्वीकार करते हुए अनिल अंबानी के खिलाफ
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व्यक्तिगत दिवालियापन यानी पर्सनल इनसॉल्वेंसी की प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दे दिया। अनिल अंबानी के प्रतिनिधि ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि यह गारंटी 2016 में दी गई थी। यानी पर्सनल इनसॉल्वेंसी से जुड़े कानून बनने से भी
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पहले और उन्हें उस रकम से कोई व्यक्तिगत [संगीत] फायदा नहीं हुआ था। अनिल अंबानी ने इस आदेश के खिलाफ एपिलेट ट्रिब्यूनल का रुख भी किया है। यानी यह लड़ाई आज भी अदालतों में जारी है। इसके अलावा कहा जाता है कि
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2025 में [संगीत] केंद्रीय जांच एजेंसियों ने भी स्टेट बैंक की एक शिकायत पर अनिल अंबानी और उनकी तत्कालीन कंपनी से जुड़े कथित फंड डायवर्जन के मामले में जांच शुरू की। हालांकि इस जांच [संगीत] का पूरा ब्यौरा और अंतिम नतीजा अभी सार्वजनिक तौर
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पर स्पष्ट नहीं है। इसलिए इसे लेकर पक्की भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी। आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो यह कहानी सिर्फ कौन जीता कौन हारा तक सीमित नहीं रह जाती। [संगीत] मुकेश अंबानी ने कर्ज को संतुलित रखते हुए विस्तार किया। जबकि अनिल अंबानी
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की कंपनियां [संगीत] आक्रामक विस्तार के दौरान भारी कर्ज के बोझ तले दब गई। कुछ इसे किस्मत का खेल कहते हैं तो कुछ कहते हैं कि 2005 का बंटवारा शुरू से ही असंतुलित था। सच्चाई शायद इन सबका मिश्रण है और यह भी दिखाती है कि जो भाई कोर्ट
Speaker A
रूम में अखबारों में शेयर बाजार में एक दूसरे को चुनौती देते [संगीत] रहे वही भाई एक फोन कॉल की दूरी पर एक दूसरे के लिए खड़े भी [संगीत] हो गए जब बात जेल की सलाखों की आई। अगर आपको यह कहानी दिलचस्प
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लगी हो तो इसे एक लाइक जरूर करें और कमेंट में बताएं कि [संगीत] आप और कौन-कौन सी वीडियो देखना चाहते हैं। चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें। अपनी रिसर्च मजबूत [संगीत] रखें और अपने इन्वेस्टमेंट का ख्याल रखें। मिलते हैं अगली हिस्टोरिकल
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डॉक्यूमेंट्री में।
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