Speaker A
साल 2019 फरवरी की एक तपती दोपहर नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के बाहर सड़कों पर गाड़ियों का शोर था। लेकिन एक काली Mercedes के अंदर पिछली सीट पर भारत का वो आदमी बैठा था जिसने कभी दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने का सपना देखा था। नाम था अनिल अंबानी। तभी उनके सेलफोन की घंटी बजती है। दूसरी तरफ से उनके वकील की आवाज आती है। सर कोर्ट ने आखिरी फैसला सुना दिया है। 4 हफ्ते का समय है। अगर 453 करोड़ एररिक्सन को नहीं चुकाए तो आपको 3 महीने के लिए जेल जाना होगा। अचानक Mercedes के अंदर सन्नाटा सा छा जाता है। वो आदमी जो कभी दुनिया का छठा सबसे अमीर इंसान था। आज अपनी इज्जत और आजादी बचाने के लिए चंद करोड़ रुपयों का मोहताज था। यह कहानी सिर्फ एक बिजनेस के डूबने की नहीं है। यह कहानी है दो भाइयों के बीच की उस अनकही जंग की जिसने भारत के कॉर्पोरेट इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया। आज की इस डॉक्यूमेंट्री में हम इन दोनों भाइयों के बीच हुए उस बंटवारे की गहराई में उतरेंगे, जहां एक भाई हार कर भी आसमान की बुलंदियों पर पहुंच गया। और दूसरा जो इस बंटवारे में सब कुछ जीत कर भी अर्श से फर्श पर आ गिरा। आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक ही घर में पले बड़े दो भाइयों की किस्मत इतनी अलग हो गई? क्या यह सिर्फ गलत फैसलों का नतीजा था? या इसके पीछे कोई बहुत बड़ी सोची समझी रणनीति थी? आज हम मुकेश और अनिल अंबानी के उस युद्ध के एक-एक पन्ने को खोलेंगे जिसने पूरे कॉर्पोरेट जगत को हिला दिया। चलिए शुरू करते हैं मुकेश अंबानी बनाम अनिल अंबानी की यह पूरी दास्तान। इस खेल को समझने के लिए हमें वक्त के पहिये को पीछे घुमाना होगा। उस दौर में जब Reliance सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि करोड़ों भारतीयों का भरोसा हुआ करता था। धीरूभाई अंबानी ने यमन के अदन शहर में एक क्लर्क की नौकरी से शुरुआत करके भारत की सबसे बड़ी प्राइवेट कंपनी खड़ी की। टेक्सटाइल से पेट्रोकेमिकल्स तक फैला यह साम्राज्य लाखों छोटे निवेशकों का भरोसा बन चुका था। कहा जाता है कि धीरूभाई हमेशा कहते थे कि एक दिन ऐसा आएगा जब फोन कॉल की कीमत एक पोस्ट कार्ड से भी सस्ती होगी। ऐसी बात जिस पर उस दौर में लोग हंसते थे क्योंकि 1998 में मोबाइल से एक आउटगोइंग कॉल का रेट करीब ₹16 प्रति मिनट हुआ करता था और इनकमिंग कॉल का भी अलग से पैसा लगता था। यानी मोबाइल फोन उस वक्त सिर्फ अमीरों का शौक था। 1986 में धीरूभाई को एक स्ट्रोक आया। जिसके बाद उन्होंने अपने सपने को पूरा करने की जिम्मेदारी बड़े बेटे मुकेश अंबानी को सौंप दी। लेकिन 90 के दशक में एक नई टेलीकॉम कंपनी खड़ी करना किसी पहाड़ को तोड़ने जैसा था। हर सर्कल के लिए अलग लाइसेंस, हर राज्य सरकार और नगर निगम से फाइबर बिछाने की अनुमति और ऊपर से नियम भी लगातार बदलते रहते थे। क्योंकि टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया की स्थापना ही 1997 में हुई थी। फिर भी मुकेश अंबानी ने यह चुनौती स्वीकार की। हजारों युवा इंजीनियरों की एक नई टीम बनाई गई। जिसका पहला काम था सबसे किफायती तकनीक चुनना। दूसरी कंपनियां जहां जीएसएम तकनीक पर काम कर रही थी, वहीं मुकेश की टीम ने सीडीएमए को चुना क्योंकि इसका इंफ्रास्ट्रक्चर लगाना सस्ता पड़ता था। 600 से ज्यादा शहरों में 60 हजार किमी से ज्यादा फाइबर बिछाई गई। राज्य सरकारों की अनुमतियों से लेकर जमीन अधिग्रह तक दर्जनों अड़चनें आई। लेकिन प्रोजेक्ट आखिरकार पूरा हुआ। लेकिन लॉन्च से कुछ महीने पहले जुलाई 2002 में धीरू भाई का निधन हो गया। यानी जिस सपने को पूरा करने के लिए यह कंपनी बनाई गई थी, उसे देखने के लिए वह खुद मौजूद नहीं थे। धीरू भाई की 70वीं जयंती यानी 28 दिसंबर 2002 को मुकेश अंबानी ने इस कंपनी को Reliance Infocom के नाम से लॉन्च किया। टैगलाइन थी कर लो दुनिया मुट्ठी में। कुछ ही समय में ₹501 में फोन के साथ ₹100 का मुफ्त टॉक टाइम मिलने लगा और जो चीज कुछ साल पहले तक अमीरों का खिलौना थी, वह अब रिक्शा चलाने वालों और मजदूरों तक पहुंच गई। शोरूम के बाहर लाखों की भीड़ लगी रहती थी। मुकेश अंबानी ने इस पूरे कारोबार की नींव अपने हाथों से रखी थी। अब यहीं से इस कहानी का दूसरा और सबसे अहम मोड़ आता है। धीरूभाई ने कोई वसीयत नहीं छोड़ी थी। यानी इतने बड़े साम्राज्य का भविष्य अब दो ऐसे भाइयों के हाथ में था जो स्वभाव से एकदम अलग थे। मुकेश अंबानी पर्दे के पीछे रहने वाले, आगरों पर भरोसा करने वाले और फैक्ट्रियों में ज्यादा वक्त बिताने वाले इंसान थे। दूसरी तरफ अनिल अंबानी की छवि ज्यादा आउटगोइंग और मीडिया फ्रेंडली थी। वे मैराथन दौड़ते थे और अखबारों के पेज थ्री पर अक्सर नजर आते थे। शुरुआत में दोनों भाई किसी तरह साथ मिलकर कंपनी चलाते रहे। लेकिन धीरे-धीरे मैनेजमेंट को लेकर मतभेद सतह पर आने लगे। कहा जाता है कि इसी दौर में Reliance Infocom को लेकर भी एक विवाद पनप रहा था। नवंबर दिसंबर 2003 में मुकेश अंबानी ने कंपनी में Reliance के प्रेफरेंस शेयर्स को ₹50 प्रति शेयर के भाव पर इक्विटी में बदलने का प्रस्ताव रखा। जिस पर अनिल अंबानी ने आपत्ति जताई। अप्रैल 2004 में यह भाव बढ़ाकर ₹96.20 प्रति शेयर कर दिया गया। इसी बीच अनिल के गुट ने आरोप लगाया कि मुकेश अंबानी को इस कंपनी में ₹1 प्रति शेयर की दर पर पर्सनल स्वेट इक्विटी मिली हुई है जो करीब 12% हिस्सेदारी के बराबर थी और यह आरोप लगाया गया कि यह हिस्सेदारी बेहद कम कीमत पर दी गई थी। इसी दौरान 16 जून 2004 को अनिल अंबानी ने समाजवादी पार्टी के समर्थन से उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सदस्य बनने के लिए फॉर्म भरा और 5 जुलाई 2004 को वे एक स्वतंत्र सदस्य के तौर पर राज्यसभा पहुंच गए। कहा जाता है कि मुकेश अंबानी को यह कदम पसंद नहीं आया क्योंकि Reliance हमेशा हर राजनीतिक दल से बराबर दूरी बनाए रखने की नीति पर चलती आई थी और अनिल के इस राजनीतिक जुड़ाव से Reliance की उस साफसुथरी इमेज पर सवाल उठ सकते थे। लेकिन इस सबसे परे असली टकराव कंपनी के भीतर बढ़ता जा रहा था। दिसंबर 2004 में अनिल अंबानी ने कंपनी के एक शेयर बायबैक प्रस्ताव पर वोट देने से खुद को अलग रखा यह कहते हुए कि यह सही समय नहीं है और उन्होंने ग्रुप की अनलिस्टेड कंपनियों के आर्थिक प्रदर्शन का पूरा ब्यौरा मांगा। उनके गुट ने खुलेआम आरोप लगाया कि Reliance Infocom में हिस्सेदारी जानबूझकर कम कीमत पर मुकेश के पक्ष में समेटी जा रही है। यह पूरा मामला अब सिर्फ बोर्डरूम तक सीमित नहीं रहा। मीडिया में भी यह खबर आम हो गई कि Reliance के भीतर मालिकाना हक को लेकर कुछ गंभीर मतभेद चल रहे हैं। और फिर 3 जनवरी 2005 को यह लड़ाई एक नए मोड़ पर पहुंच गई। अनिल अंबानी ने इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी आईपीसीएल के वाइस चेयरमैन और डायरेक्टर पद से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे की वजह बताई गई आनंद जैन का उसी बोर्ड में होना जिन्हें मुकेश अंबानी का बेहद करीबी माना जाता था। अनिल ने कहा कि उस बोर्ड में बैठना उनकी गरिमा, आत्मसम्मान और स्वाभिमान के खिलाफ है और साथ ही यह भी आरोप लगाया कि आनंद जैन परिवार को बांटने की साजिश रच रहे हैं। इसी महीने अनिल अंबानी ने Reliance के डायरेक्टरों को 500 पन्नों का एक नोट भी भेजा। जिसमें उन्होंने कंपनी के भीतर मैनेजमेंट के तौर-तरीकों से जुड़ी खामियां गिनाई थी। कल्पना कीजिए उस दौर के Reliance के दफ्तर का माहौल। हर तरफ वकीलों की भागदौड़। दोनों भाइयों के करीबी अधिकारी मीडिया को अलग-अलग कहानियां लीक कर रहे थे और हर हफ्ते कोई ना कोई नया आरोप अखबार की सुर्खी बन रहा था। जब मामला इतना बढ़ गया तो आखिरकार परिवार की मां को आगे आना पड़ा। कहा जाता है कि उस कमरे में कोकिला बैन ने कहा तुम दोनों मेरे बेटे हो। तुम्हारे पिता ने जो बनाया वह तुम दोनों की मेहनत से बना है। अब फैसला यह नहीं होना चाहिए कि कौन जीता। फैसला यह होना चाहिए कि दोनों आगे बढ़ सकें। ऐसा कहा जाता है कि इसी एक बात ने बातचीत की दिशा बदल दी। इसके बाद हफ्तों तक वकीलों और सलाहकारों की टीमें कागजी कारवाही में जुटी रही। 18 जून 2005 को कोकिला बैन ने आधिकारिक तौर पर बंटवारे का ऐलान किया। 30-40 के सरल फार्मूले के साथ मुकेश अंबानी को मिला Reliance Industries यानी पुराने जमाने का तेल रिफाइनिंग और पेट्रो केमिकल्स का कारोबार जिसे उस दौर में ओल्ड इकॉनमी कहा जाता था। दूसरी तरफ अनिल अंबानी को मिला टेलीकॉम, पावर और फाइनेंशियल सर्विस। यानी वह हर सेक्टर जिसे उस वक्त सनराइज सेक्टर कहा जा रहा था। और इसी बंटवारे में वो टेलीकॉम कंपनी भी अनिल के हिस्से आई जिसे मुकेश अंबानी ने अपने हाथों से खड़ा किया था। यानी Reliance Infocom। इस समझौते में एक शर्त भी जोड़ी गई। 10 साल तक एक दूसरे के कारोबार में ना उतरने का समझौता। जिसका मतलब था कि जिस मुकेश अंबानी ने कभी ₹500 के फोन से करोड़ों लोगों तक पहुंच बनाई थी, वह अगले 10 साल तक किसी भी टेलीकॉम कंपनी में कदम नहीं रख सकते थे। उस वक्त मीडिया में यह चर्चा आम थी कि मुकेश को घाटे का सौदा मिला और अनिल के हिस्से आया भविष्य और अगले कुछ सालों में यह बात सच होती भी दिखी। बंटवारे के बाद Reliance Infocom का नाम बदलकर Reliance Communication रखा गया और 2006 में स्टॉक मार्केट में लिस्ट होते ही इसकी वैल्यू ₹35,000 करोड़ से ऊपर पहुंच गई। लाखों लोग आरकॉम का सिम खरीद रहे थे। अनिल











