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The Story Behind India's Biggest Stock Market Scam | Scam 1992 Explain | 2D Animation

यह वीडियो हर्षद मेहता के जीवन और 1992 के भारत के सबसे बड़े स्टॉक मार्केट स्कैम की कहानी बताता है।

Key Takeaways

  • हर्षद मेहता ने स्टॉक मार्केट में इंसाइडर ट्रेडिंग और पंप एंड डंप जैसी रणनीतियों से सफलता पाई।
  • उनकी कहानी संघर्ष, जज्बा और बड़े सपनों की मिसाल है।
  • 1992 का स्कैम भारत के वित्तीय इतिहास का सबसे बड़ा फाइनेंशियल घोटाला था।
  • सही जानकारी और समय पर निर्णय लेना स्टॉक मार्केट में सफलता की कुंजी है।
  • मुंबई जैसे शहर में टिकने के लिए काबिलियत और मेहनत जरूरी होती है।

What the video covers

  • साल 1992 में हर्षद मेहता पर ₹4000 करोड़ के फाइनेंशियल स्कैम का आरोप लगा।
  • हर्षद मेहता का जन्म रायपुर में एक मध्यमवर्गीय गुजराती परिवार में हुआ था।
  • मुंबई आकर उन्होंने प्लास्टिक स्क्रैप बेचना और सीमेंट की ट्रेडिंग से अपने करियर की शुरुआत की।
  • बीकॉम की डिग्री के बाद न्यू इंडिया एश्योरेंस में क्लर्क की नौकरी मिली, लेकिन उनके सपने बड़े थे।
  • 1980 में हर्षद ने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में जॉबर बनकर ट्रेडिंग की दुनिया में कदम रखा।
  • उन्होंने इंसाइडर ट्रेडिंग और पंप एंड डंप जैसी रणनीतियों से बड़ी दौलत कमाई।
  • हर्षद ने लेबर यूनियन नेताओं से नेटवर्क बनाया जिससे उन्हें कंपनियों की प्रोडक्शन की जानकारी मिलती थी।
  • 1982 तक वह मुंबई के स्टॉक मार्केट में एक जाना माना नाम बन गए थे।
  • उन्होंने ग्रो मोर कंसलटेंट्स नाम से एक फर्म बनाई जो दूसरे लोगों का पैसा स्टॉक मार्केट में लगाती थी।
  • 18 मार्च 1982 को ब्लैक थर्सडे आया जिसने मार्केट को हिला दिया और हर्षद की कहानी में नया मोड़ लाया।

Answers

Questions about this video

हर्षद मेहता कौन थे?

हर्षद मेहता एक भारतीय स्टॉक मार्केट प्लेयर थे जिन्होंने 1992 के सबसे बड़े फाइनेंशियल स्कैम में हिस्सा लिया था। वे रायपुर के एक मध्यमवर्गीय परिवार से थे और मुंबई में स्टॉक मार्केट की दुनिया में अपनी पहचान बनाई।

1992 का स्टॉक मार्केट स्कैम क्या था?

1992 का स्टॉक मार्केट स्कैम हर्षद मेहता द्वारा ₹4000 करोड़ के फाइनेंशियल घोटाले को कहा जाता है, जिसमें उन्होंने गलत तरीकों से शेयर मार्केट को प्रभावित किया था।

हर्षद मेहता ने स्टॉक मार्केट में कैसे सफलता पाई?

हर्षद ने इंसाइडर ट्रेडिंग और पंप एंड डंप जैसी रणनीतियों का इस्तेमाल किया। उन्होंने सही जानकारी और समय का फायदा उठाकर शेयरों में मुनाफा कमाया।

Full Transcript — Download SRT & Markdown

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Speaker A
साल 1992 मुंबई की सुबह हमेशा की तरह भागती-दौड़ती थी। लोकल ट्रेनों में भीड़, चाय की टपरियों पर शोर और अखबार वालों की आवाजें। लेकिन उस दिन अखबार वालों की आवाज थोड़ी अलग थी। टाइम्स ऑफ इंडिया एसबी के 500 करोड़ गायब। बिग बुल हर्षद मेहता का हाथ। जिस आदमी को पूरा देश अपना हीरो मानता था, जिसके एक इशारे पर शेयर मार्केट ऊपर-नीचे होता था, जिसकी एक झलक पाने के लिए लोग घंटों इंतजार करते थे। उसी आदमी पर आज इंडिया का सबसे बड़ा फाइनेंशियल स्कैंडल का इल्जाम था। ₹4000 करोड़, उस जमाने में जब एक आम आदमी की सैलरी करीब ₹3000 महीना थी। लेकिन यह कहानी सिर्फ एक स्कैम की नहीं है। यह कहानी है एक ऐसे इंसान की जो रायपुर की गलियों से निकल कर मुंबई के सबसे ऊंचे पेंट हाउस तक पहुंचा। जिसने प्लास्टिक के स्क्रैप बेचे, सीमेंट की बोरियां उठाई और फिर एक दिन इंडिया का सबसे अमीर और सबसे ताकतवर स्टॉक मार्केट प्लेयर बन गया। यह कहानी है हर्षद शांति लाल मेहता की, इंडिया के बिग बुल की। साल 1955 मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर रायपुर में एक मध्यमवर्गीय गुजराती परिवार में एक बच्चे का जन्म होता है। नाम हर्षद शांति लाल मेहता। बचपन बिल्कुल सामान्य था। ना कोई बड़ी तकलीफ, ना कोई बड़ी सुविधा। पिताजी का छोटा सा कारोबार था। मां घर संभालती थी। हर्षद पढ़ने में ठीक-ठाक था। लेकिन एक चीज उसमें बचपन से ही अलग थी। वो हमेशा बड़ा सोचता था। बहुत बड़ा। जब उसके दोस्त किसी छोटी नौकरी के सपने देखते थे, हर्षद किसी बड़े बिजनेस की बात करता था। जब बाकी बच्चे क्रिकेट की बात करते थे, हर्षद पैसे और कारोबार की बातें करता था। रायपुर की उन गलियों में उस छोटे से घर में एक बड़ा सपना पल रहा था। लेकिन 1973 में सब कुछ बदल गया। हर्षद की उम्र महज 18 साल थी और उसी वक्त उसके पिता का बिजनेस धीरे-धीरे टूटने लगा। पैसों की तंगी बढ़ने लगी और ऊपर से पिताजी की सेहत भी साथ नहीं दे रही थी। घर में एक अजीब सी बेचैनी थी। हर्षद के लिए यह वो मोड़ था जब वह दो रास्तों में से एक चुन सकता था। या तो हार मान ले या फिर अपनी किस्मत खुद बनाए। उसने दूसरा रास्ता चुना। मुंबई, सपनों का शहर। वो शहर जो हर आने वाले को एक मौका देता है। लेकिन उसी के साथ एक चेतावनी भी। यह शहर रहम नहीं करता। यहां सिर्फ वही टिकता है जो सच में काबिल होता है। हर्षद मुंबई पहुंचा तो उसके पास सिर्फ एक छोटा सा बैग, कुछ ₹100 और एक जबरदस्त जज्बा था। मुंबई में उसे बीकॉम का दाखिला लाला लाजपत राय कॉलेज ऑफ कॉमर्स में मिल गया। लेकिन हर्षद सिर्फ किताबें पढ़ने नहीं आया था। उसे पता था कि पढ़ाई के साथ-साथ पैसे भी कमाने होंगे और इसीलिए उसने वो किया जो उस वक्त उसके लिए मुमकिन था। उसने प्लास्टिक के स्क्रैप को कलेक्ट करके बेचना शुरू किया। सोचिए जरा। वो लड़का जो आगे चलकर 29 लग्जरी कारों का मालिक बनेगा, वह अभी प्लास्टिक के टुकड़े उठाकर बेच रहा था। फिर उसने सीमेंट की ट्रेडिंग शुरू की। कई बार पैसे बचाने के लिए खुद ही सीमेंट की बोरियां उठाकर डिलीवरी देने जाता था। यह ज़िद और भूख हर्षद को बाकियों से अलग बनाती थी। कॉलेज के दिनों में ही उनके भाई अश्विन मेहता भी मुंबई आ गए और धीरे-धीरे पूरी फैमिली रायपुर छोड़कर मुंबई में बस गई। 1977 में जब कॉलेज खत्म हुआ तो हर्षद के पास बीकॉम की डिग्री थी और इस डिग्री के दम पर उन्हें न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी में क्लर्क की नौकरी मिली। ₹600 महीना। उस वक्त के हिसाब से यह बुरी नहीं थी। लेकिन हर्षद के सपने बहुत बड़े थे। इसलिए उसको यह बहुत छोटी लग रही थी। उनके भाई अश्विन को ICICI में नौकरी मिल गई। दोनों भाई दिन में नौकरी करते और शाम को मिलकर कोई न कोई साइड बिजनेस ढूंढते। दोनों के मन में एक ही ख्याल था, कुछ बड़ा करना है, कुछ ऐसा जो इन्हें इस साधारण जिंदगी से निकाल दे। 2 साल बीत गए। कई बिजनेस आइडियाज ट्राई किए। कुछ काम किया, कुछ नहीं। लेकिन वो बड़ा ब्रेक नहीं आया जिसका दोनों को इंतजार था। और फिर एक दिन 1980 में हर्षद पहली बार बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज गया। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज, दलाल स्ट्रीट। मुंबई का वो हिस्सा जहां हर रोज करोड़ों रुपए बनते और डूबते थे। जब हर्षद पहली बार उस ट्रेडिंग रिंग में गया तो उसने जो देखा वो उसके लिए किसी जादू से कम नहीं था। बड़ा सा हॉल, सैकड़ों लोग। चिल्लाना, हाथ हिलाना, नंबर चीखना। ऐसा लग रहा था जैसे बड़े से जंग के मैदान में लड़ रहे हो। लेकिन इस लड़ाई का हथियार था दिमाग और इनाम था पैसा। हर्षद को उसी पल समझ आ गया, यही जगह है। यहीं उसकी किस्मत बदलेगी। उस वक्त बीएसई में ट्रेडिंग का तरीका आज से बिल्कुल अलग था। कोई कंप्यूटर नहीं, कोई इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम नहीं। सब कुछ मैनुअल होता था। ट्रेडिंग रिंग में जाकर शेयर्स खरीदे और बेचे जाते थे। और इस रिंग में सिर्फ दो तरह के लोग जा सकते थे। ब्रोकर और जॉबर। जॉबर का काम होता था ब्रोकर्स और क्लाइंट्स के बीच में बिचौलिये का काम करना। शेयर्स खरीदना-बेचना। हर ट्रांजैक्शन पर थोड़ी-थोड़ी कमाई। हर्षद ने ठान लिया, मुझे जॉबर बनना है। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। जॉबर बनने के लिए एक सीनियर ब्रोकर की सिफारिश चाहिए थी। हर्षद ने पी अंबालाल नाम के एक ब्रोकर से संपर्क किया। काफी मिन्नतें की, काफी कोशिशें की। आखिरकार उसे जॉबर का बैज मिल गया। पहला दिन हर्षद ट्रेडिंग रिंग में उतरा। जोश था, उत्साह था। लेकिन ट्रेडिंग रिंग उत्साह से नहीं चलती। वहां चलती है समझदारी और चतुराई। पहले ही दिन ₹2000 का नुकसान। उस जमाने में ₹2000 कोई छोटी रकम नहीं थी। एक झटके में एक महीने की कमाई गायब हो गई। अगर कोई और होता तो हार मान लेता। लेकिन हर्षद के लिए यह एक सबक था। उसने उस नुकसान को एनालाइज किया। आखिर कहां गलती हुई? कहां चूक हुई? अगले कई हफ्तों तक उसने बस यही किया। देखना, सीखना, समझना, ट्रेडिंग रिंग के पुराने खिलाड़ियों को ऑब्जर्व करना, उनकी चालें समझना। और धीरे-धीरे हर्षद को समझ में आने लगा कि यह गेम सिर्फ नंबर्स का नहीं है। यह इंफॉर्मेशन का गेम है। जिसके पास सही जानकारी है, वह सही वक्त पर मुनाफा बना लेता है। और यहीं से शुरू हुई हर्षद मेहता की असली जर्नी। हर्षद को बहुत जल्दी समझ में आ गया कि स्टॉक मार्केट में पैसे बनाने के लिए आपको दो चीजें चाहिए। सही इंफॉर्मेशन और सही टाइमिंग। सही इंफॉर्मेशन मतलब किसी कंपनी के बारे में वो बात जो मार्केट को अभी पता नहीं है। और सही टाइमिंग मतलब उस जानकारी के आधार पर बाकियों से पहले शेयर खरीदना या बेचना। आज इसे इंसाइडर ट्रेडिंग कहते हैं और यह इललीगल है। लेकिन 1980 के दशक में यह ना सिर्फ लीगल था बल्कि मार्केट में यही तरीका चलता था। हर्षद ने एक बहुत ही चालाक नेटवर्क बनाना शुरू किया। उसने लेबर यूनियन के नेताओं से दोस्ती की क्योंकि लेबर यूनियन के नेताओं को पता होता था कि किसी फैक्ट्री में प्रोडक्शन कितना चल रहा है। अगर किसी कंपनी का प्रोडक्शन बढ़ रहा है तो मतलब उसका मुनाफा बढ़ने वाला है। और अगर प्रोडक्शन घट रहा है या लेबर स्ट्राइक होने वाली है तो शेयर का भाव गिरने वाला है। हर्षद को यह जानकारी बाकी सबसे पहले मिलती थी क्योंकि हर्षद ने ऐसा नेटवर्क बना लिया था। अगर प्रोडक्शन बढ़ता, हर्षद शेयर खरीद लेता। अगर लेबर स्ट्राइक पर जाने वाली होती, हर्षद पहले ही शेयर बेच देता। यह था इंसाइडर ट्रेडिंग और हर्षद इसमें माहिर हो गया। लेकिन हर्षद यहीं नहीं रुका। उसने एक और तरीका खोजा। पंप एंड डंप। यह कैसे काम करता था? ध्यान से सुनिए। हर्षद किसी ऐसे शेयर को ढूंढते जो अपेक्षाकृत छोटा हो, जिसका मार्केट कैप बड़ा ना हो। फिर वह उस शेयर की बहुत बड़ी मात्रा में खरीदारी करता। जब कोई एक ही शेयर को इतनी बड़ी मात्रा में खरीदने लगे तो मार्केट में उसकी सप्लाई कम हो जाती है। यानी डिमांड ज्यादा, सप्लाई कम तो उस शेयर का भाव अपने आप बढ़ने लगता है। जैसे-जैसे भाव बढ़ता है, बाकी लोग सोचने लगते हैं कि यह शेयर क्यों बढ़ रहा है। जरूर कोई खबर होगी और वह भी खरीदने लगते हैं जिससे भाव और बढ़ जाता है। और जब भाव काफी ऊपर चला जाता है तो हर्षद अपनी होल्डिंग बेच देता और बहुत बड़ा मुनाफा कमा लेता। और बाकी लोग ऊपर खरीद कर फंस जाते। जब हर्षद अपने शेयर बेचने लगता तो भाव गिरने लगता और आम निवेशक नुकसान में रोते हैं। यह था पंप एंड डंप और हर्षद इसे बड़ी कुशलता से करता। 1980 से 1982 के बीच इन दोनों तरीकों से हर्षद ने काफी पैसे कमाए। इतने पैसे कि वह एक बड़े और आलीशान घर में शिफ्ट हो गया। जिंदगी बदलने लगी थी। लेकिन अभी असली खेल शुरू होना बाकी था। 1982 तक हर्षद मुंबई के स्टॉक मार्केट में एक जाना माना नाम बन चुका था। इंसाइडर ट्रेडिंग और पंप एंड डंप की बदौलत उसके पास अब अच्छी खासी दौलत आ गई थी। उसने एक बड़ा फ्लैट लिया। एक अच्छी गाड़ी खरीदी। परिवार के लिए बेहतर जिंदगी का इंतजाम किया। यह वो हर्षद नहीं रहा था जो कभी प्लास्टिक स्क्रैप बेचता था। लेकिन हर्षद के लिए यह तो बस शुरुआत थी। उसके सपने इससे कई गुना बड़े थे। उनके मन में एक ख्याल आया। क्यों ना एक ऐसी फर्म बनाई जाए जो दूसरे अमीर लोगों का पैसा स्टॉक मार्केट में लगाए और उन्हें बड़े रिटर्न दे। यही सोच आगे जाकर ग्रो मोर कंसलटेंट्स की नीव बनी। लेकिन किस्मत ने एक बड़ा झटका देने का प्लान बना रखा था। 18 मार्च 1982, यह तारीख हर्षद मेहता की जिंदगी में हमेशा के लिए दर्ज हो गई। इतिहास ने इसे नाम दिया ब्लैक थर्सडे। उस दिन सुबह मार्केट बिल्कुल नॉर्मल खुला। कोई खतरे का संकेत नहीं था। लेकिन दोपहर करीब 2:00 बजे अचानक कुछ ऐसा हुआ जो किसी ने नहीं सोचा था। मार्केट अचानक से गिरने लगा। पहले धीरे-धीरे।
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Speaker A
500 करोड़ गायब। बिग बुल हर्षद मेहता का हाथ जिस आदमी को पूरा देश अपना हीरो मानता था। जिसके एक इशारे पर शेयर मार्केट ऊपर नीचे होता था। जिसकी एक झलक पाने के लिए लोग घंटों इंतजार करते थे। उसी आदमी पर आज
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Speaker A
इंडिया का सबसे बड़ा फाइनेंशियल स्कैंडल का इल्जाम था। ₹4000 करोड़ उस जमाने में जब एक आम आदमी की सैलरी करीब ₹3000 महीना थी। लेकिन यह कहानी सिर्फ एक स्कैम की नहीं है। यह कहानी है एक ऐसे इंसान की जो
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Speaker A
रायपुर की गलियों से निकल कर मुंबई के सबसे ऊंचे पेंट हाउस तक पहुंचा। जिसने प्लास्टिक के स्क्रैप बेचे, सीमेंट की बोरियां उठाई और फिर एक दिन इंडिया का सबसे अमीर और सबसे ताकतवर स्टॉक मार्केट प्लेयर बन गया। यह कहानी है हर्षद शांति
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Speaker A
लाल मेहता की इंडिया के बिग बुल की। साल 1955 मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर रायपुर में एक मध्यमवर्गीय गुजराती परिवार में एक बच्चे का जन्म होता है। नाम हर्षद शांति लाल मेहता। बचपन बिल्कुल सामान्य था। ना कोई बड़ी तकलीफ, ना कोई बड़ी
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Speaker A
सुविधा। पिताजी का छोटा सा कारोबार था। मां घर संभालती थी। हर्षद पढ़ने में ठीक-ठाक था। लेकिन एक चीज उसमें बचपन से ही अलग थी। वो हमेशा बड़ा सोचता था। बहुत बड़ा। जब उसके दोस्त किसी छोटी नौकरी के सपने देखते थे। हर्षद किसी बड़े बिजनेस की
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Speaker A
बात करता था। जब बाकी बच्चे क्रिकेट की बात करते थे। हर्षद पैसे और कारोबार की बातें करता था। रायपुर की उन गलियों में उस छोटे से घर में एक बड़ा सपना पल रहा था। लेकिन 1973 में सब कुछ बदल गया। हर्षद
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Speaker A
की उम्र महज 18 साल थी और उसी वक्त उसके पिता का बिजनेस धीरे-धीरे टूटने लगा। पैसों की तंगी बढ़ने लगी और ऊपर से पिताजी की सेहत भी साथ नहीं दे रही थी। घर में एक अजीब सी बेचैनी थी। हर्षित के लिए यह वो
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Speaker A
मोड़ था जब वह दो रास्तों में से एक चुन सकता था। या तो हार मान ले या फिर अपनी किस्मत खुद बनाए। उसने दूसरा रास्ता चुना। मुंबई सपनों का शहर वो शहर जो हर आने वाले को एक मौका देता है। लेकिन उसी के साथ एक
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Speaker A
चेतावनी भी यह शहर रहम नहीं करता। यहां सिर्फ वही टिकता है जो सच में काबिल होता है। हर्षद मुंबई पहुंचा तो उसके पास सिर्फ एक छोटा सा बैग, कुछ ₹100 और एक जबरदस्त जज्बा था। मुंबई में उसे बीकॉम का दाखिला
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Speaker A
लाला लाजपत राय कॉलेज ऑफ कॉमर्स में मिल गया। लेकिन हर्षद सिर्फ किताबें पढ़ने नहीं आया था। उसे पता था कि पढ़ाई के साथ-साथ पैसे भी कमाने होंगे और इसीलिए उसने वो किया जो उस वक्त उसके लिए मुमकिन था। उसने प्लास्टिक के स्क्रैप को कलेक्ट
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Speaker A
करके बेचना शुरू किया। सोचिए जरा। वो लड़का जो आगे चलकर 29 लग्जरी कारों का मालिक बनेगा, वह अभी प्लास्टिक के टुकड़े उठाकर बेच रहा था। फिर उसने सीमेंट की ट्रेडिंग शुरू की। कई बार पैसे बचाने के लिए खुद ही सीमेंट की बोरियां उठाकर
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Speaker A
डिलीवरी देने जाता था। यह ज़िद और भूख हर्षद को बाकियों से अलग बनाती थी। कॉलेज के दिनों में ही उनके भाई अश्विन मेहता भी मुंबई आ गए और धीरे-धीरे पूरी फैमिली रायपुर छोड़कर मुंबई में बस गई। 1977 में
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Speaker A
जब कॉलेज खत्म हुआ तो हर्षद के पास बीकॉम की डिग्री थी और इस डिग्री के दम पर उन्हें न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी में क्लर्क की नौकरी मिली। ₹600 महीना। उस वक्त के हिसाब से यह बुरी नहीं थी। लेकिन
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Speaker A
हर्षद के सपने बहुत बड़े थे। इसलिए उसको यह बहुत छोटी लग रही थी। उनके भाई अश्विन को ICICI में नौकरी मिल गई। दोनों भाई दिन में नौकरी करते और शाम को मिलकर कोई ना कोई साइड बिजनेस ढूंढते। दोनों के मन में
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Speaker A
एक ही ख्याल था कुछ बड़ा करना है कुछ ऐसा जो इन्हें इस साधारण जिंदगी से निकाल दे। 2 साल बीत गए। कई बिजनेस आइडियाज ट्राई किए। कुछ काम किया कुछ नहीं। लेकिन वो बड़ा ब्रेक नहीं आया जिसका दोनों को
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Speaker A
इंतजार था और फिर एक दिन 1980 में हर्षद पहली बार बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज गया। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज दलाल स्ट्रीट। मुंबई का वो हिस्सा जहां हर रोज करोड़ों रुपए बनते और डूबते थे। जब हर्षद पहली बार उस ट्रेडिंग रिंग में गया तो उसने जो देखा
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Speaker A
वो उसके लिए किसी जादू से कम नहीं था। बड़ा सा हॉल सैकड़ों लोग। चिल्लाना, हाथ हिलाना, नंबर चीखना ऐसा लग रहा था जैसे बड़े से जंग के मैदान में लड़ रहे हो। लेकिन इस लड़ाई का हथियार था दिमाग और
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Speaker A
इनाम था पैसा। हर्षद को उसी पल समझ आ गया। यही जगह है। यहीं उसकी [संगीत] किस्मत बदलेगी। उस वक्त बीएसई में ट्रेडिंग का तरीका आज से बिल्कुल अलग था। कोई कंप्यूटर नहीं, कोई इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम नहीं। सब कुछ मैनुअल होता था। ट्रेडिंग रिंग में
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Speaker A
जाकर शेयर्स खरीदे और बेचे जाते थे और इस रिंग में सिर्फ दो तरह के लोग जा सकते थे। ब्रोकर और जॉबर। जॉबर का काम होता था ब्रोकर्स और क्लाइंट्स के बीच में बिछोलिए का काम करना। शेयर्स खरीदना बेचना। हर
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Speaker A
ट्रांजैक्शन पर थोड़ी-थोड़ी कमाई। हर्षद ने ठान लिया। मुझे जॉबर बनना है। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। जॉबर बनने के लिए एक सीनियर ब्रोकर की सिफारिश चाहिए थी। हर्षद ने पी अंबालाल नाम के एक ब्रोकर से संपर्क किया। काफी मिन्नतें की, काफी कोशिशें की।
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Speaker A
आखिरकार उसे जॉबर का बैज मिल गया। पहला दिन हर्षद ट्रेडिंग रिंग में उतरा। जोश था, उत्साह था। लेकिन ट्रेडिंग रिंग उत्साह से नहीं चलती। वहां चलती है समझदारी और चतुराई है। पहले ही दिन ₹2000 का नुकसान। उस जमाने में ₹2000 कोई छोटी
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Speaker A
रकम नहीं थी। एक झटके में एक महीने की कमाई गायब हो गई। अगर कोई और होता तो हार मान लेता। लेकिन हर्षद के लिए यह एक सबक था। उसने उस नुकसान को एनालाइज किया। आखिर कहां गलती हुई? कहां चूक हुई? अगले कई
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Speaker A
हफ्तों तक उसने बस यही किया। देखना, सीखना, समझना, ट्रेडिंग रिंग के पुराने खिलाड़ियों को ऑब्जर्व करना, उनकी चाले समझना और धीरे-धीरे हर्षद को समझ में आने लगा कि यह गेम सिर्फ नंबर्स का नहीं है। यह इंफॉर्मेशन का गेम है। जिसके पास सही
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Speaker A
जानकारी है, वह सही वक्त पर मुनाफा बना लेता है। और यहीं से शुरू हुई हर्षद मेहता की असली जर्नी। हर्ष को बहुत जल्दी समझ में आ गया कि स्टॉक मार्केट में पैसे बनाने के लिए आपको दो चीजें चाहिए। सही
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Speaker A
इंफॉर्मेशन और सही टाइमिंग। सही इंफॉर्मेशन मतलब किसी कंपनी के बारे में वो बात जो मार्केट को अभी पता नहीं है और सही टाइमिंग मतलब उस जानकारी के आधार पर बाकियों से पहले शेयर खरीदना या बेचना। आज इसे इंसाइडर ट्रेडिंग कहते हैं और यह
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Speaker A
इललीगल है। लेकिन 1980 के दशक में यह ना सिर्फ लीगल था बल्कि मार्केट में यही तरीका चलता था। हर्षद ने एक बहुत ही चालाक नेटवर्क बनाना शुरू किया। उसने लेबर यूनियन के नेताओं से दोस्ती की क्योंकि लेबर यूनियन के नेताओं को पता होता था कि
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Speaker A
किसी फैक्ट्री में प्रोडक्शन कितना चल रहा है। अगर किसी कंपनी का प्रोडक्शन बढ़ रहा है तो मतलब उसका मुनाफा बढ़ने वाला है और अगर प्रोडक्शन घट रहा है या लेबर स्ट्राइक होने वाली है तो शेयर का भाव गिरने वाला
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Speaker A
है। हर्षद को यह जानकारी बाकी सबसे पहले मिलती थी क्योंकि हर्षद ने ऐसा नेटवर्क बना लिया था। अगर प्रोडक्शन बढ़ाता हर्षद शेयर खरीद लेता। अगर लेबर स्ट्राइक पर जाने वाली होती, हर्षद पहले ही शेयर बेच देता। यह था इंसाइडर ट्रेडिंग और हर्षद
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Speaker A
इसमें माहिर हो गया। लेकिन हर्षद यहीं नहीं रुका। उसने एक और तरीका खोजा। पंप एंड डंप। यह कैसे काम करता था? ध्यान से सुनिए। हर्षद किसी ऐसे शेयर को ढूंढते जो अपेक्षाकृत छोटा हो जिसका मार्केट कैप बड़ा ना हो। फिर वह उस शेयर की बहुत बड़ी
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Speaker A
मात्रा में खरीदारी करता। जब कोई एक ही शेयर को इतनी बड़ी मात्रा में खरीदने लगे तो मार्केट में उसकी सप्लाई कम हो जाती है। यानी डिमांड ज्यादा, सप्लाई कम तो उस शेयर का भाव अपने आप बढ़ने लगता है।
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Speaker A
जैसे-जैसे भाव बढ़ता है बाकी लोग सोचने लगते हैं कि यह शेयर क्यों बढ़ रहा है। जरूर कोई खबर होगी और वह भी खरीदने लगते हैं जिससे भाव और बढ़ जाता है और जब भाव काफी ऊपर चला जाता है तो हर्षद अपनी
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Speaker A
होल्डिंग बेच देता और बहुत बड़ा मुनाफा कमा लेता और बाकी लोग ऊपर खरीद कर फंस जाते। जब हर्षद अपने शेयर बेचने लगता तो भाव गिरने लगता और आम निवेशक नुकसान में रोते हैं। यह था पंप एंड डंप और हर्षद इसे
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Speaker A
बड़ी कुशलता से करता। 1980 से 1982 के बीच इन दोनों तरीकों से हर्षद ने काफी पैसे कमाए। इतने पैसे कि वह एक बड़े और आलीशान घर में शिफ्ट हो गया। जिंदगी बदलने लगी थी। लेकिन अभी असली खेल शुरू होना बाकी
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Speaker A
था। 1982 तक हर्षद मुंबई के स्टॉक मार्केट में एक जाना माना नाम बन चुका था। इंसाइडर ट्रेडिंग और पंप एंड डंप की बदौलत उसके पास अब अच्छी खासी दौलत आ गई थी। उसने एक बड़ा फ्लैट लिया। एक अच्छी गाड़ी खरीदी।
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Speaker A
परिवार के लिए बेहतर जिंदगी का इंतजाम किया। यह वो हर्षद नहीं रहा था जो कभी प्लास्टिक स्क्रैप बेचता था। लेकिन हर्षद के लिए यह तो बस शुरुआत थी। उसके सपने इससे कई गुना बड़े थे। उनके मन में एक
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Speaker A
ख्याल आया। क्यों ना एक ऐसी फर्म बनाई जाए जो दूसरे अमीर लोगों का पैसा स्टॉक मार्केट में लगाए और उन्हें बड़े रिटर्न दे। यही सोच आगे जाकर ग्रो मोर कंसलटेंट्स की नीव बनी। लेकिन किस्मत ने एक बड़ा झटका
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Speaker A
देने का प्लान बना रखा था। 18 मार्च 1982 यह तारीख हर्षद मेहता की जिंदगी में हमेशा के लिए दर्ज हो गई। इतिहास ने इसे नाम दिया ब्लैक थर्सडे उस दिन सुबह मार्केट बिल्कुल नॉर्मल खुला। कोई खतरे का संकेत
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Speaker A
नहीं था। लेकिन दोपहर करीब 2:00 बजे अचानक कुछ ऐसा हुआ जो किसी ने नहीं सोचा था। मार्केट अचानक से गिरने लगा। पहले धीरे-धीरे फिर तेज और फिर बहुत तेज। मार्केट एक झटके में नीचे आ गिरा। 15 मिनट के अंदर बीएसई ने उस सदी की सबसे तेज
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Speaker A
गिरावट देखी। हर जगह पैनिकिक मच गया। हर तरफ सेलिंग शुरू हो गई। जो जितनी जल्दी निकल सके निकल गए। हर्षद के पास उस वक्त काफी बड़ी पोजीशन थी मार्केट में। वो मार्जिन पर ट्रेड कर रहा था। मतलब उधार
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Speaker A
लिया हुआ पैसा लगाया था। जब मार्केट इस तरह क्रैश करता है और आपने मार्जिन पर ट्रेड किया हो तो नुकसान कई गुना बढ़ जाता है। हर्षद को ₹1 लाख का नुकसान हो गया। ₹1 लाख उस जमाने में जब ₹1 लाख में मुंबई में
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Speaker A
एक अच्छा घर आता था। हर्षद लगभग बर्बाद हो चुका था। ब्रोकर्स के पैसे चुकाने के लिए उसे अपनी पत्नी की ज्वेलरी तक गिरवी रखनी पड़ी। घर का खर्च चलाने के लिए अगले कुछ महीने उसके भाई अश्विन की पत्नी ने सहारा
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Speaker A
दिया। वो एक फ्रीलांस ब्यूटीशियन थी। सोचिए जरा जो आदमी कल तक मार्केट में बड़े-बड़े डील्स कर रहा था। आज उसके घर का खर्च उसकी भाभी चला रही थी। यह वह पल था जब अक्सर लोग टूट जाते हैं। हार मान लेते
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Speaker A
हैं। कह देते हैं यह मेरे बस का नहीं। लेकिन हर्षद मेहता ने कुछ अलग ही किया। उसने उस तबाही को अपना सबसे बड़ा सबक माना और अगले कुछ महीने बस एक ही काम किया सोचना, प्लान करना और वापसी की तैयारी
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Speaker A
करना। जून 1982 ब्लैक थर्सडे के करीब 3 महीने बाद हर्षद और अश्विन ने एक बड़ा फैसला किया। अब की बार मार्केट में सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के पैसे मैनेज करने के लिए वापस उतरेंगे और इसके लिए एक
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Speaker A
प्रॉपर फर्म खोलेंगे। ग्रोमोर रिसर्च एंड एसेट मैनेजमेंट यही नाम रखा। सब लोग इसे ग्रो मोर कंसलटेंट्स के नाम से जानते थे। शुरुआत बहुत छोटी थी। एक छोटा सा ऑफिस, बस, दो भाई और एक बड़ा सपना। शुरुआती कैपिटल के लिए अश्विन के ससुर ने कुछ लाख
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Speaker A
रुपए दिए। एक सीए ने भी इन्वेस्ट किया। ग्रो मोर का मकसद था वेल्थी लोगों का पैसा स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करके उन्हें हाई रिटर्न्स दिलाना। यानी पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विस। और हर्षद का अप्रोच बिल्कुल मेथोडिकल था। उसने मार्केट को
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Speaker A
ध्यान से देखा। 1982 में टी लीव्स के दाम अचानक से काफी बढ़ गए थे। मतलब T कंपनीज़ को नॉर्मल से ज्यादा प्रॉफिट होने वाला था। लेकिन स्टॉक मार्केट में T कंपनीज़ के शेयर अभी भी काफी सस्ते थे। मार्केट ने
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Speaker A
अभी इस बात को प्राइस इन नहीं किया था। यह एक गोल्डन अपॉर्चुनिटी थी। हर्षद ने अपने क्लाइंट्स के लिए मैक्लोड REL, Tata T, Harrisson, मलयालम जैसी T कंपनीज़ के शेयर भारी मात्रा में खरीदे। 1 साल के अंदर इन
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Speaker A
कंपनियों के शेयर आसमान पर पहुंच गए। Gromor के क्लाइंट्स ने जबरदस्त रिटर्न्स देखे और Grow मोर का नाम चारों तरफ फैल गया। अब Grow मोर के दरवाजे पर लाइन लगने लगी। अमीर लोग, बिजनेसमैन, इन्वेस्टर्स [संगीत] सब आना चाहते थे। 1985 तक Gror इंडियास
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Speaker A
मोस्ट टॉक्ड अबाउट ब्रोकरेज फर्म बन चुकी थी। और हर्षद स्टॉक मार्केट का जादूगर कहलाने लगा। एक समय जिसकी पत्नी की ज्वेलरी गिरवी थी, अब वह लोगों के करोड़ों रुपए मैनेज कर रहा था। लेकिन हर्षद जानता था यह सिर्फ एक पड़ाव है। मंजिल अभी बहुत
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Speaker A
दूर है। जितनी तेजी से हर्षद का नाम बढ़ रहा था, उतनी ही तेजी से उनके दुश्मन भी बढ़ रहे थे। स्टॉक मार्केट में एक नाम था जो हर्षद की तरक्की से खुश नहीं था। मनु माणिक। मनु माणिक मार्केट के पुराने और
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Speaker A
बड़े खिलाड़ियों में से था। स्टॉक मार्केट की भाषा में उसे बेयर कहा जाता था। बेयर का मतलब होता है वह ट्रेडर जो शेयरों की कीमत गिरने पर पैसे कमाता है। इसका तरीका होता है शॉर्ट सेलिंग। मतलब कोई शेयर किसी
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Speaker A
से उधार लो उसे अभी ऊंचे दाम पर बेचो। बाद में जब दाम गिर जाए तो कम दाम पर खरीद कर वापस कर दो। जो फर्क बचे वो मुनाफा। तो जहां हर्षद जैसे बुल्स चाहते थे कि मार्केट ऊपर जाए वहीं मनु माणिक जैसे
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Speaker A
बेयर्स चाहते थे कि मार्केट नीचे आए और जब हर्षद की वजह से मार्केट लगातार ऊपर जा रहा था। मनु माणिक और उसके बेयर गैंग का नुकसान हो रहा था। मनु माणिक बहुत लंबे समय से हर्षद को गिराने का मौका ढूंढ रहा
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Speaker A
था और वह मौका मिला 1986 में। उस साल फाइनेंस मिनिस्टर वीपी सिंह ने बजट में कुछ ऐसे फैसले लिए जो बिजनेस वर्ल्ड को पसंद नहीं आए। नतीजा स्टॉक मार्केट गिरने लगा। हर्षद ने उस वक्त एसपीआईसी नाम की कंपनी के शेयर बड़ी मात्रा में खरीद रखे
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Speaker A
थे मार्जिन पर यानी उधार लेकर जब मार्केट गिरा एसपीआईसी का भाव भी गिरने लगा और ओपोरर्चुनिटी देखकर मनु माणिक और उनके बेयर गैंग ने एसपीआईसी में हैवी शॉर्ट सेलिंग शुरू कर दी। इससे एसपीआईसी का भाव और भी तेजी से गिरने लगा। लेकिन बेयर गैंग
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Speaker A
यहीं तक नहीं रुकी। उन्होंने मार्केट में एक रूमर फैला दी कि हर्षद मेहता को 1 करोड़ से ज्यादा का नुकसान हो गया है। ग्रो मोर कंसलटेंट्स बैंककरप्ट होने वाली है। हर्षद अपने ड्यूज नहीं चुका पाएगा। यह अफवाह थी लेकिन स्टॉक मार्केट में अफवाह
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Speaker A
बहुत जल्दी सच की तरह फैलती है। ग्रो मोर के क्लाइंट्स में पैनिकिक मचने लगा। क्या हर्षद सच में डूब गया? क्या हमारा पैसा डूब जाएगा? हर्षद के पास वापस करने के लिए पैसे थे। यह सच था। लेकिन रेपुटेशन बचाना
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Speaker A
उतना ही जरूरी था। और हर्षद ने एक मास्टर स्ट्रोक चला। बीएसई में ड्यूज चुकाने के लिए 14 दिन का वक्त मिलता था। हर्षद ने 14 दिन में नहीं बल्कि 14 दिन से पहले ही एडवांस में सारे ड्यूज चुका दिए और फिर यह
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Speaker A
बात चाय की टपरियों से लेकर ट्रेडिंग रिंग तक हर जगह फैला दी। मार्केट में मैसेज क्लियर था हर्षद मेहता को डुबोना इतना आसान नहीं। बेयर गैंग शॉक्ड रह गई। उनका प्लान उल्टा पड़ गया था। लेकिन इस पूरे एपिसोड में हर्षद को 1.5 करोड़ का नुकसान
14:00
Speaker A
हुआ था। उस जमाने में यह कोई छोटी रकम नहीं थी। यह एक बड़ा सेटबैक था। लेकिन हर्षद ने एक बार फिर बाउंस बैकक किया और इस बार उसने डिसाइड किया कि अब वह सिर्फ एक ब्रोकर नहीं रहेंगे। अब वह एक बड़ा
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Speaker A
इन्वेस्टर बनेगा। हर्षद के मन में एक सवाल बार-बार आता था स्टॉक मार्केट में बड़े पैसे लगाने के लिए बड़ा कैपिटल चाहिए और वो कैपिटल कहां से आएगा? उसने एक नई दुनिया में झांका मनी मार्केट। मनी मार्केट वो जगह है जहां बड़े
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Speaker A
इंस्टीिट्यूशन खासकर बैंक्स एक दूसरे से शॉर्ट टर्म लोन लेते देते हैं। इन ट्रांजैक्शंस को रेडी फॉरवर्ड डील्स या आरएफ डील्स कहा जाता था। इसे एक सिंपल एग्जांपल से समझते हैं। मान लीजिए एसबीआई के पास ₹100 करोड़ एक्स्ट्रा हैं जो
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Speaker A
[संगीत] वह थोड़े दिनों के लिए इन्वेस्ट करना चाहता है। दूसरी तरफ बैंक ऑफ बरोड़ा है जिसे 15 दिनों के लिए 100 करोड़ की जरूरत है। SBI बैंक ऑफ बरो को 100 करोड़ देगा। बदले में बैंक ऑफ बड़ौदा एसबी को
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Speaker A
कोलटरल देगा। यानी गारंटी के तौर पर गवर्नमेंट सिक्योरिटीज या बॉन्ड्स। लेकिन यह सिक्योरिटीज फिजिकली ट्रांसफर नहीं होती थी। इनकी जगह एक कागज इशू [संगीत] होता था जिसे बैंक रिसीप्ट यानी बीआर कहते थे। यह बीआर बेसिकली एक प्रॉमिस था कि
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Speaker A
हमारे पास इतनी सिक्योरिटीज हैं और अगर हम लोन नहीं चुका पाए तो यह सिक्योरिटीज आपकी हो जाएंगी। 15 दिन बाद बैंक ऑफ बड़ौदा एसबी को 100 करोड़ प्लस इंटरेस्ट लौटता। एसबीआईबीआर वापस करता और डील कंप्लीट। इन डील्स को फैसिलिटेट करने के लिए मनी
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Speaker A
मार्केट ब्रोकर्स होते थे और इन ब्रोकर्स को हर डील पर अच्छी खासी ब्रोकरेज मिलती थी। हर्षद ने सोचा यह मार्केट मुझे चाहिए। लेकिन वहां भी एक प्रॉब्लम थी। मनी मार्केट पर पहले से एक कार्टेल का कब्जा था। सिटी बैंक, अजय कयान, हेमंत कोथारी
15:40
Speaker A
जैसे [संगीत] बड़े नाम यह लोग मिलकर पूरे मनी मार्केट को कंट्रोल करते थे। कोई नया ब्रोकर आए उससे पहले ही उसे बाहर का रास्ता दिखा देते थे। लेकिन हर्षद ने एक चतुराई भरी चाल चली। उसने उन बैंक्स को
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Speaker A
आइडेंटिफाई किया जो इस कार्टेल से खुश नहीं थे। बैंक ऑफ अमेरिका ए एन जेड ग्रैंडलिस्ट बैंक। यह बैंक्स चाहते थे कि कोई अल्टरनेटिव ब्रोकर हो। हर्षद ने इन बैंक्स को [संगीत] अपनी ब्रोकरेज सर्विसेज ऑफर की और इन बैंक्स के साथ मिलकर अपना
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Speaker A
खुद का एक इनफॉर्मल कार्टेल बना लिया। [संगीत] 2 साल के अंदर हर्षद मनी मार्केट का भी टॉप ब्रोकर बन गया। और अब उसके दिमाग में वो बड़ा प्लान था जो आगे जाकर इंडिया का सबसे बड़ा फाइनेंसियल स्कैंडल बनने वाला था। अब हम उस हिस्से पर आते हैं
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Speaker A
जो हर्षद मेहता की कहानी को एक ऑर्डिनरी सक्सेस स्टोरी से एक एक्स्ट्राऑर्डिनरी और कंट्रोवर्शियल लेजेंड बना देता है। हर्षद ने मनी मार्केट में दो बड़े लूप होल्स देखे। लूप होले एक बैंक्स के एडवांस पैसों का इस्तेमाल। मनी मार्केट में काम करने का
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Speaker A
तरीका था। कई बैंक्स अपने ब्रोकर को एडवांस में पैसे ट्रांसफर कर देते थे ताकि जब कोई अच्छी डी लाए ब्रोकर तुरंत ट्रांजैक्शन एग्जीक्यूट कर सके। इन पैसों को डील होने तक ब्रोकर के अकाउंट में रखा जाता था। हर्षद ने देखा कि कभी-कभी यह
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Speaker A
पैसे 10 से 15 दिन तक उसके अकाउंट में बिना काम के पड़े रहते थे और हर्षद ने इन पैसों को स्टॉक मार्केट में लगाना शुरू कर दिया। यह टेक्निकली गलत था। यह एक तरह से पैसों की चोरी थी। लेकिन उस वक्त इसे
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Speaker A
ट्रैक करने का कोई प्रॉपर मैकेनिज्म नहीं था। लूप होल दो फेक बैंक रिसीट्स। दूसरा और सबसे बड़ा लूप होल था बीआर्स का। जब कोई बैंक लोन के बदले बीआर इशू करता था तो कोई यह चेक नहीं करता था कि उस बैंक के
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Speaker A
पास सच में उतनी सिक्योरिटीज हैं भी या नहीं। हर्षद ने इसका फायदा उठाया। उसने कुछ छोटे बैंक्स जैसे बैंक ऑफ कराड को ब्रीफ दिया और उनसे फेक बीआरस बनवानी शुरू कर दी। हर्षद किसी बड़े बैंक जैसे एसबीआई से 500 करोड़ का लोन लेते। कोलैटरल के तौर
17:29
Speaker A
पर बैंक ऑफ कराड की फेक बीआर देता। बैंक ऑफ कराड की बीआर में लिखा होता था कि उनके पास 500 करोड़ की गवर्नमेंट सिक्योरिटीज हैं जबकि थी नहीं। फिर वह 500 करोड़ स्टॉक मार्केट में लगा देता। अपने फेवरेट
17:42
Speaker A
स्टॉक्स को पंप करता और जब भाव काफी बढ़ जाता तो बेचकर प्रॉफिट कमा लेता। बाद में किसी दूसरे बैंक से पैसे लेकर पहले बैंक को वापस करता। यह एक एंडलेस साइकिल था। 1990 से 1992 के बीच हर्षद ने इन पैसों से
17:56
Speaker A
मार्केट में जो तूफान मचाया वो अनप्रेसिडेंटेड था। मई 1990 में सेंसेक्स करीब 800 पॉइंट्स पर था। अप्रैल 1992 तक सेंसेक्स 4500 पॉइंट्स पर पहुंच गया। 2 साल में 460% की ग्रोथ। अगर हर्षद के फेवरेट स्टॉक्स की बात करें तो ACC का
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Speaker A
शेयर ₹300 से बढ़कर ₹10,000 पार कर गया। यानी 33 गुना। अपोलो टायर्स 10 गुना बढ़ गया। कई दूसरे स्टॉक्स भी आसमान पर थे। पूरा देश स्टॉक मार्केट में कूद पड़ा। हर कोई पैसे लगाना चाहता था। हर कोई अमीर
18:28
Speaker A
होना चाहता था। ग्रो मोर के दफ्तर के बाहर भीड़ लगती थी और इस सब के बीच मनु मणिक और बेयर गैंग की मार्केट को नीचे लाने की कोशिशें नाकाम होती रहीं। क्योंकि हर्षद के पास मार्केट को ऊपर रखने के लिए पैसों
18:41
Speaker A
का एक अंतहीन खजाना था। 1991 से 92 में हर्षद मेहता वो सब कुछ था जो एक आम इंसान बनने का सपना देख सकता है। 15,000 स्क्वायर फीट का पेंट हाउस। प्राइम मुंबई लोकेशन में इतना बड़ा कि उसमें छोटा सा एक
18:56
Speaker A
शहर बच सके। 29 कार्स इनमें इंडिया की पहली इंपोर्टेड लेक्स भी थी। उस वक्त लेक्स का भारत में आना एक इवेंट होता था। एक लैविश ऑफिस जहां प्रीमियम फर्नीचर था। जहां एक्सपेंसिव आर्ट पीसेस थे। जहां आना-जाना इंडिया के टॉप बिजनेसमैन और
19:12
Speaker A
पॉलिटिशियंस का था। बिजनेस इंडिया और बिजनेस टुडे जैसी मैगजीनंस के कवर पर हर्षद मेहता था। उसे इंडिया का हाईएस्ट इनकम टैक्स पेयर बताया जा रहा था। हर इंटरव्यू में उसकी लाइफस्टाइल, उसकी सक्सेस, उसके विज़न की चर्चा थी। हर्षद का
19:26
Speaker A
रुतबा इस हद तक बढ़ चुका था कि वह जिस भी स्टॉक को छूता उसका भाव बढ़ने लगता था। एक बार उसने मजदा कंपनी के शेयर खरीदे। उसी नाम की वजह से एक अलग कंपनी स्वराज mzदा के शेयर भी बढ़ने लगे। सिर्फ इसलिए कि नाम
19:41
Speaker A
में मजदा था और लोगों ने सोचा हर्षद ने शायद वह भी खरीदे हैं। यह था बिग बुल का रुतबा। लेकिन यही वो वक्त भी था जब हर्षद के अंदर एक खतरनाक एोगेंस आ गई थी। वो खुद को अजय मानने लगा था। वो सोचता था कि
19:55
Speaker A
मार्केट उससे चलता है वो मार्केट से नहीं उसने मेरल लिंच जैसे ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंक से ज्यादा रिटर्न्स कमाने के टारगेट सेट कर लिए थे। अहंकार यही उसके पतन का बीज था और डेस्टिनी ने उनके लिए एक बहुत दर्दनाक फॉल तैयार कर रखा था। 1991 में ही
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Speaker A
आरबीआई को एक टिप मिली कहीं से खबर आई कि मनी मार्केट में बैंक रिसीट्स का मिसयूज हो रहा है कि कुछ फेक बीआरस बनाई जा रही हैं। कोई सिस्टमैटिक फ्रॉड चल रहा है। आरबीआई ने कुछ बैंक्स के खिलाफ इंक्वायरी
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Speaker A
ऑर्डर की और साथ ही सभी बैंक्स के लिए बीआर के इस्तेमाल पर स्ट्रिक्ट गाइडलाइंस जारी कर दी। यह हर्षद के लिए पहली वार्निंग थी। फेक बीआरस का खेल अब मुश्किल हो गया था। लेकिन हर्षद नहीं रुका। दिसंबर 1991 में उसने SBI स्टेट बैंक ऑफ इंडिया
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Speaker A
से इंडिया के सबसे बड़े बैंक से ₹500 करोड़ उठा लिए और अपनी पुरानी आदत के मुताबिक वो पैसे स्टॉक मार्केट में लगा दिया। लेकिन इस बार एक प्रॉब्लम थी। आरबीआई की नई गाइडलाइंस की वजह से फेक बीआर्स लाना बहुत मुश्किल हो गया था। SBI
20:55
Speaker A
को कोलटरल नहीं दिया जा सका। तो हर्षद ने SBI के एक एंप्लई सीतारामन को ब्राइब दिया। उसे एसबीआई के रिकॉर्ड्स को मैनिपुलेट करने को कहा ताकि सीनियर एसबीआई ऑफिशियल्स को इस 500 करोड़ के गैप के बारे में पता ना चले लेकिन यह सब ज्यादा दिन
21:11
Speaker A
नहीं छुपा। अप्रैल 1992 में एसबीआई के सीनियर ऑफिशियल्स को अपने रिकॉर्ड्स में एक बहुत बड़ा गैप मिला। ₹500 करोड़ हवा में कहीं थे ही नहीं। SBI ने हर्षद को कंफ्रंट किया। पैसे वापस करने के लिए प्रेशर डाला। हर्षद के लिए यह एक कैच 20
21:29
Speaker A
सिचुएशन थी। एक तरफ उसे 500 करोड़ वापस करने थे। लेकिन वह पैसे स्टॉक मार्केट में फंसे हुए थे। दूसरी तरफ अगर वह स्टॉक्स बेचता तो एक मार्केट क्रैश होता। दो कैपिटल गेंस टैक्स देना पड़ता। तीन और सबसे बड़ी बात मार्केट को क्रैश होते
21:45
Speaker A
देखकर लोग समझ जाते कि कुछ गड़बड़ है। हर्षद ने एसबीआई से कुछ और वक्त मांगा और एक दूसरे बैंक एनएचबी से पैसे उठाकर एसबीआई को इंस्टॉलमेंट्स में देने लगा। यह पीटर को रब करके पॉल को पे करने वाला खेल
21:57
Speaker A
था और यह खेल ज्यादा दिन नहीं चल सका। 23 अप्रैल 1992 टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर छपी सुचेता दलाल एक जर्नलिस्ट जो फाइनेंशियल मार्केट्स को बहुत करीब से फॉलो करती थी। उसने किसी इंसाइडर से टिप मिली थी कि
22:11
Speaker A
एसबीआई के अकाउंट्स में बहुत बड़ा फ्रॉड हुआ है और उसके पीछे हर्षद मेहता का हाथ है। सुचेता दलाल ने खबर को वेरीफाई किया। सोर्सेस को कंफर्म किया और फिर वो स्टोरी छाप दी जिसने पूरे देश को हिला दिया।
22:23
Speaker A
फ्रंट पेज टाइम्स ऑफ इंडिया। SBI के 500 करोड़ गायब। बिग बुल हर्षद मेहता का हाथ। अगले कुछ घंटों में जो हुआ वो अनप्रेसिडेंटेड था। पार्लियामेंट में सरकार के खिलाफ आवाजें उठने लगी। अपोजिशन ने हंगामा किया। फाइनेंस मिनिस्ट्री पर
22:38
Speaker A
प्रेशर आया। सरकार ने घबराकर एक साथ कई इन्वेस्टिगेशंस ऑर्डर की। इनकम टैक्स, आरबीआई, सीबीआई और जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, एक-एक परत उखड़ने लगी। फेक बीआरस का पूरा रैकेट सामने आया। बैंक ऑफ कराड और मेट्रोपॉलिटन कन एपेटिव बैंक जिन्होंने
22:53
Speaker A
फेक बी आर्स बनाई थी उनका पर्दाफाश हुआ। मनी मार्केट की मैनपुलेशन स्टॉक मार्केट को आर्टिफिशियली पंप करना बैंक से इललीगली पैसे लेना एक के बाद एक सब सामने आने लगा। स्टॉक मार्केट में जो हुआ वो देखने लायक था। लेकिन उस वक्त कोई देखना नहीं चाहता
23:09
Speaker A
था। मार्केट तेजी से गिरने लगा। हर्षद मेहता के स्टॉक्स का हाल सबसे बुरा था। ACC जो 10,000 पर था गिरने लगा। अपोलो टायर्स गिरने लगा। ग्रोमोर के जो स्टॉक्स थे वह सब धड़ाम हो गए और इस क्रैश में डूब
23:22
Speaker A
गए वो लाखों आम निवेशक जिन्होंने हर्षद के नाम पर उसके मैजिक पर भरोसा करके अपनी जिंदगी भर की कमाई लगा दी थी। बुजुर्गों ने पेंशन के पैसे लगाए थे। नौकरी पेशा लोगों ने पीएफ के पैसे लगाए थे। किसानों
23:34
Speaker A
ने जमीन बेचकर इन्वेस्ट किया था। सब डूब गया। बैंक ऑफ कराड और मेट्रोपॉलिटन कन ऑपरेटिव बैंक दोनों कोलैप्स हो गए। जिन लोगों ने इन बैंक्स में अपनी सेविंग्स रखी थी उनका पैसा चला गया। कुल फ्रॉड का आकार 4000 करोड़ से भी ज्यादा 4000 करोड़ 1992
23:53
Speaker A
में जब इंडिया की जीडीपी आज की तुलना में बहुत छोटी थी। यह एक एस्ट्रोनॉमिकल नंबर था। जून 1992 उस दिन हर्षद मेहता और उसके भाई अश्विन मेहता को गिरफ्तार कर लिया गया। जिस आदमी के पास 29 कार्स थी, 15,000
24:07
Speaker A
स्क्वायर फीट का घर था। देश के सबसे ताकतवर लोगों के साथ उठना बैठना था। उसे हैंडकफ्स में ले जाया गया। उसका घर, बैंक अकाउंट्स, कार्स सब कुछ सीज हो गया। लेकिन हर्षद आसानी से हार मानने वाला नहीं था।
24:19
Speaker A
उसने कोर्ट्स में लड़ना शुरू किया। एक के बाद एक लीगल बैटल्स। कभी बेल मिलती, कभी जेल जाना पड़ता। इस दौरान उसने कुछ ऐसे बयान भी दिए, जिसने पॉलिटिकल हलचल मचा दी। उसने कहा कि उसने तत्कालीन प्राइम मिनिस्टर पीवी नरसिम्हा राव को ₹1 करोड़
24:34
Speaker A
दिए थे। यह बयान सच था या झूठ, यह आज भी विवादित है। 9 साल तक लीगल बैटल्स चलती रहीं और फिर दिसंबर 2001 हर्षद मेहता की उम्र करीब 47 साल पुलिस कस्टडी में उसने अपनी आखिरी सांस ली। कुछ कहते हैं यह
24:48
Speaker A
नेचुरल डेथ थी। कुछ कहते हैं हेल्थ ने साथ छोड़ दिया। लेकिन सच यह था कि जो आदमी इंडिया के सबसे ऊंचे पेंट हाउस में रहता था, उसने अपनी जिंदगी कस्टडी में खत्म की। हर्षल मेहता के इस स्कैम ने इंडिया के
25:00
Speaker A
फाइनेंशियल सिस्टम को हमेशा के लिए बदल दिया। सेबी, सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया को असली पावर्स दी गई। इंसाइडर ट्रेडिंग को क्लियरली इललीगल घोषित किया गया। इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग शुरू हुई। बीआरएएस का सिस्टम बदला गया। बैंक्स पर ओवरसाइड बढ़ाई गई। यानी आज का
25:16
Speaker A
इंडिया जो रिलेटिवली बेटर रेगुलेटेड फाइनेंशियल मार्केट है, उसकी एक वजह हर्षद मेहता स्कैम भी है। उस तबाही से सबक लिए गए। सिस्टम को ठीक किया गया। हर्षद मेहता के जाने के दो दशक से भी ज्यादा बाद, आज भी उनका नाम लोगों की जुबान पर है। वेब
25:31
Speaker A
सीरीज बनी, बुक्स लिखी गई, डॉक्यूमेंट्रीज बनी, केस स्टडीज पढ़ाई जाती हैं। लेकिन असली सवाल यह है हर्षद मेहता कौन था? एक विलेन, एक हीरो या कुछ और? इस नजरिए के मुताबिक हर्षद एक फाइनेंसियल क्रिमिनल था जिसने बैंक्स को छूना लगाया। फेक बीआर्स
25:47
Speaker A
बनवाई। मार्केट को आर्टिफिशियली पंप किया और जब सब क्रैश हुआ तो लाखों आम लोगों की जिंदगी बर्बाद हो गई। इनमें वो लोग थे जिन्होंने उस पर भरोसा किया था। उसकी फैमिली और कुछ लोग कहते हैं कि हर्षद ने
26:00
Speaker A
जो प्रैक्टिसेस फॉलो की वो उस जमाने में मार्केट में कॉमन थी। इंसाइडर ट्रेडिंग लीगल था। बीआरस का मिसयूज कई और लोग भी करते थे। लेकिन हर्षद को इसलिए टारगेट किया गया क्योंकि वो बहुत बड़ा हो गया था। मेरे हिसाब से सच्चाई इन दोनों के बीच में
26:15
Speaker A
है। हां, कुछ प्रैक्टिसेस उस जमाने में कॉमन थी। लेकिन फेक बियरर्स बनवाना, बैंक्स के पैसों को पर्सनल गेंस के लिए यूज करना यह किसी भी स्टैंडर्ड पर गलत था। दूसरी तरफ यह भी सच है कि पूरा सिस्टम फेल
26:27
Speaker A
हुआ था। आरबीआई सोई हुई थी। बैंक्स ने आंखें बंद रखी थी। किसी ने प्रॉपर ओवरसाइट नहीं किया। हर्षद ने उस सिस्टम की कमजोरियों को एक्सप्लइट किया। लेकिन वो कमजोरियां थी। यह भी तो सोचना होगा। लेकिन हर्षद की तरह एक और इंसान था जिसको पावर
26:42
Speaker A
और पैसे ने पूरी तरह अंधा कर दिया था। और उसी के इस जुनून ने उसे भारत का सबसे बड़ा आर्थिक भगोड़ा बना दिया। विजय माल्या। अभी क्लिक करके देखिए। और अगर आपको यह वीडियो अच्छी लगी तो लाइक करें और चैनल
26:55
Speaker A
सब्सक्राइब करें और कमेंट करके बताओ अगली वीडियो किस टॉपिक पर है।
Topics:हर्षद मेहतास्टॉक मार्केट स्कैम1992 भारत स्कैमबॉम्बे स्टॉक एक्सचेंजइंसाइडर ट्रेडिंगपंप एंड डंपफाइनेंशियल घोटालामुंबईदलाल स्ट्रीटग्रामीण से शहरी सफर

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