ओवरथिंकिंग के तीन वैज्ञानिक तरीके, कॉग्निटिव डिफ्यूजन, वरी टाइम और जोन टू वॉक से राहत पाएं।
Key Takeaways
- ओवरथिंकिंग मानसिक बीमारी नहीं बल्कि एक ट्रैप है।
- थॉट्स को ऑब्जर्व करना और उन्हें अपने आप से अलग समझना जरूरी है।
- दिन में एक निश्चित समय चिंताओं को सोचने के लिए निर्धारित करें।
- फिजिकल एक्टिविटी, खासकर जोन टू वॉक, मानसिक शांति के लिए जरूरी है।
- इन तीन वैज्ञानिक तरीकों से ओवरथिंकिंग को नियंत्रित किया जा सकता है।
What the video covers
- ओवरथिंकिंग वाले लोग अधिक इंटेलिजेंट और एंपैथेटिक होते हैं।
- ओवरथिंकिंग एक मानसिक ट्रैप है जिसे मालप्टिव रूमिनेशन कहते हैं।
- कॉग्निटिव डिफ्यूजन से थॉट्स को अपने आप से अलग करके ऑब्जर्व करना सिखाया जाता है।
- वरी टाइम तकनीक में दिन में 15 मिनट केवल चिंताओं को सोचने के लिए निर्धारित किया जाता है।
- इस तकनीक से प्रीफ्रontal कॉर्टेक्स को आराम मिलता है और ओवरथिंकिंग कम होती है।
- ओवरथिंकिंग तब ज्यादा होती है जब हम आराम से बैठे होते हैं।
- फिजिकल एक्टिविटी, खासकर जोन टू वॉक, ओवरथिंकिंग को कम करने में मदद करती है।
- जोन टू वॉक में दिल की धड़कन 130-140 तक जाती है और बातचीत संभव होती है पर गाना नहीं।
- 20 मिनट की जोन टू वॉक से ब्रेन का डिफॉल्ट मोड नेटवर्क धीमा हो जाता है।
- ओवरथिंकर्स को इस विधि से तुरंत राहत मिलती है।
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Speaker A
जो लोग बहुत ज्यादा सोचते हैं, वह एक्चुअली बाकी लोगों से ज्यादा इंटेलिजेंट होते हैं और एंपैथेटिक होते हैं। उनकी कॉग्निटिव एंपैथी, यानी कि दूसरों की फीलिंग को समझने की क्षमता, आम लोगों से कहीं ज्यादा होती है। तो आप बीमार नहीं
Speaker A
हैं। बस आपका मन आपको ओवर प्रोटेक्ट करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन यह प्रोटेक्शन एक ट्रैप बन गई है। और इस ट्रैप का नाम है मालप्टिव रूमिनेशन। यानी कि बार-बार एक ही थॉट लूप में घूमने लग जाता है। बार-बार
Speaker A
वही विचार आपके मन में आने लग जाता है। डॉक्टर बोलते हैं बस मत सोचो। घर वाले कहते हैं क्यों ज्यादा सोचते हो? लेकिन मन कहता है यह मेरे बस में नहीं है। और आप सही हैं। यह आपके बस में नहीं है। लेकिन आज
Speaker A
के बाद यह आपके बस में हो जाएगा। अगर आपको ओवरथिंकिंग करने की आदत है तो जब भी कोई थॉट आपके मन में आए तो उसे एक लेवल दे दीजिएगा। मन में बोलिएगा यह मेरे ब्रेन का एक वरी थॉट है। यह मेरा मन जनरेट कर रहा
Speaker A
है। इसे कॉग्निटिव डिफ्यूजन कहते हैं। यानी थॉट को अपने आप से अलग करके ऑब्जर्व करना। फर्क देखिए। पहला तरीका यह सिचुएशन बहुत खतरनाक है। इसमें आप थॉट के हिस्सेदार हैं। थॉट आपके अंदर है। दूसरा तरीका मेरा ब्रेन एक डेंजर थॉट जनरेट कर
Speaker A
रहा है। इससे आप थॉट को बाहर से देख रहे हैं। आप एक ऑब्जर्वर हैं। यह एक छोटा सा शिफ्ट डोपामिन लूप को तोड़ता है। दिन में एक बार सिर्फ 15 मिनट का एक टाइम फिक्स कर लीजिएगा। उसे हम वरी टाइम कहते हैं। बस
Speaker A
उसी समय अपनी चिंताओं को बुलाइएगा। अपनी सारी वरीज को या तो आप एक पेपर पे लिख लीजिएगा तब या उसको एक-एक करके अपने मन में बुलाइएगा। बाकी पूरे दिन जब भी कोई थॉट आए तो ब्रेन को बोलिएगा। इसे मैं वरी
Speaker A
टाइम के अंदर सोचूंगा, बुलाऊंगा। धीरे-धीरे ब्रेन यह पैटर्न समझ जाता है। प्रीफ्रोंटल कॉर्टेक्स को एक फिक्स टाइम मिल जाता है और बाकी टाइम वो रेस्ट करना सीख जाता है। ओवरथिंकिंग तब सबसे ज्यादा होती है जब हम आइडल होते हैं। आराम से
Speaker A
बैठे होते हैं। इसलिए आपको एक फिजिकल एक्टिविटी ऐड करनी है। जॉन टू वॉक। जॉन टू वाक वो है जिसमें आप बात कर सकते हैं लेकिन गाना नहीं गा सकते हैं। मतलब आपके चलने की गति इतनी होती है कि आपके दिल की
Speaker A
धड़कन 130-140 के आसपास पहुंच जाती है। यह आपके चलने की वो गति है जब आप अपने साथ चलते हुए किसी व्यक्ति से बातचीत कर सकते हैं। लेकिन गाना नहीं गा सकते हैं। गाना गाने में आपको मुश्किल होगी। रिसर्च कहती
Speaker A
है कि सिर्फ 20 मिनट की जोन टू वॉक से ब्रेन का डिफॉल्ट मोड नेटवर्क स्लो हो जाता है। ओवरथिंकर्स [नाक से की जाने वाली आवाज़] को डायरेक्ट इमीडिएट रिलीफ मिलता है।
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