माता पार्वती के पुत्र गणेश के जन्म और उनके गजानन बनने की अद्भुत कथा, जिसमें शिवजी के साथ उनका संघर्ष दर्शाया गया है।
Key Takeaways
- गणेश का जन्म माता पार्वती की ममता और दिव्य शक्ति से हुआ।
- गणेश को माता ने महाशक्ति और युद्ध कौशल से संपन्न किया।
- गणेश ने शिवजी सहित सभी देवताओं को अपने अद्भुत बल से परास्त किया।
- यह कथा गणेश की महत्ता और उनके गजानन बनने की प्रक्रिया को दर्शाती है।
- माता पार्वती की आज्ञा पालन में गणेश का अटल समर्पण उनकी महानता को दर्शाता है।
What the video covers
- माता पार्वती ने अपने शरीर से दिव्य उपटन बनाकर गणेश की मूर्ति बनाई और पंच तत्वों से उसमें प्राण फूंककर उसे जीवित किया।
- गणेश को माता पार्वती ने महाशक्ति, विद्या और युद्ध कौशल से संपन्न किया और महल के द्वार की रक्षा का दायित्व सौंपा।
- महादेव कैलाश पर गहन साधना में थे और उन्हें अपने पुत्र गणेश के जन्म का पता नहीं था।
- गणेश ने माता की आज्ञा का पालन करते हुए महादेव को भी महल में प्रवेश करने से रोका, जिससे महादेव क्रोधित हो गए।
- नंदी और शिव के गणों ने गणेश को हटाने का प्रयास किया, लेकिन गणेश ने सभी को परास्त कर दिया।
- देवराज इंद्र और मृत्यु देवता यमराज भी गणेश के सामने हार गए, जो उनकी अद्भुत शक्ति को दर्शाता है।
- महादेव का क्रोध बढ़ता गया और वे स्वयं युद्ध के लिए तैयार हुए, लेकिन गणेश ने उनका मार्ग रोका।
- यह कथा गणेश के जन्म, उनकी शक्ति, और शिवजी के साथ उनके संघर्ष की महागाथा है।
- कहानी में माता पार्वती की ममता, गणेश की भक्ति और शक्ति का अद्भुत चित्रण है।
- यह कथा तीनों लोकों की नियति बदलने वाली महालिला के आरंभ का वर्णन करती है।
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Speaker A
देखो अकेला देव छोटा इस दुष्ट बना। गणेश को शी मेरे मार्ग से हटाओ। गणेश, गणेश, गणेश। गणा एक वरदान से जन्मे, एक श्राप से कटे और एक करुणा से फिर जीवित हुए। यह कथा है उन्हीं गजानन की। वर्षों बीत गए। ऋतुएं बदलती रही। पर माता पार्वती का तप नहीं टूटा। एक मां का संकल्प अटल था। उन्हें चाहिए था एक ऐसा पुत्र जो उनकी ममता का रूप हो और जिसका नाम तीनों लोकों में गूंजे। और यहीं से आरंभ होता है महागणेश के जन्म का प्रथम अध्याय। एक ऐसी महालीला जो तीनों लोकों की नियति बदलने वाली थी। प्रभु, मुझे ऐसी संतान का वरदान दीजिए जो ब्रह्मदेव की भांति निर्मल और करुणामय हो। आपकी भांति तेजस्वी और निपुण हो और मेरे स्वामी महादेव की भांति निर्मल और करुणामय हो। उसमें त्रिमूर्ति के सभी श्रेष्ठ गुण समाए हों। तथास्तु। उस दिन माता पार्वती अपने भवन में स्नान की तैयारी कर रही थी। स्नान से पूर्व उन्होंने अपने पूरे शरीर पर चंदन, हल्दी और सुगंधित तेलों का दिव्य उपटन लगाया। और जब वह उपटन उतरा तो उस चंदन मिश्रित मैल को माता ने यूं ही नहीं बहने दिया। बड़े जतन से एक-एक कण समेट लिया। फिर अपने ही कोमल हाथों से बड़ी ममता और कुशलता से उन्होंने उस दिव्य उपटन को आकार देना आरंभ किया और एक अत्यंत सुंदर तेजस्वी सजीव से बालक की आकृति गढ़ डाली। पर यह आकृति सिर्फ एक आकृति नहीं थी। यह था संसार का वो अनमोल पुत्र जिसे एक दिन तीनों लोक पूजने वाले थे। अब बारी थी प्राण फूंकने की। पार्वती ने अपनी दिव्य योग शक्ति जगाई और पंच तत्वों का आह्वान किया। सबसे पहले पुकारा गया जल को और जल ने उस मूर्ति में जीवन खोल दिया। फिर आई बारी पृथ्वी की और धरती ने उस आकृति को देह दी, आकार दिया। और अग्नि ने उस बालक में तेज भर दिया। और वायु ने उसकी नासिका में सांसों का स्पंदन थूक दिया। जीवन की वह पहली कोमल सांस जिसका संसार युगों से इंतजार कर रहा था। यही था पार्वती का अपना पुत्र गणेश। पुत्रा मां, मैं आ गया। मां, आपकी इच्छा से ही मैं प्रकट हुआ हूं। क्या तुम ही मेरे महागणेश स्वरूप पुत्र हो? नहीं माता, मैं तो आपका गणेश हूं। आपका गौरी पुत्र गणेश, मेरा पुत्र, मेरा गणेश। माता पार्वती ने कुछ ही समय में अपने पुत्र को वह सब सौंप दिया जो एक महायोद्धा के लिए आवश्यक था। अपनी दिव्य शक्तियां, हर कुशल विद्या और युद्ध की संपूर्ण शिक्षा जो ज्ञान अर्जित करने में युगों बीत जाते हैं, वो महाशक्तिशाली बाल गणेश ने पल भर में आत्मसात कर लिया। किसी को भी भीतर प्रवेश करने देना। चाहे उसके बाद क्यों ना। माता पार्वती ने गणेश को महल के द्वार की रक्षा का दायित्व सौंप दिया और उन्हें स्पष्ट आज्ञा दी कि उनकी अनुमति के बिना कोई भी पुरुष महल के भीतर प्रवेश ना कर सके। और उधर अपने पुत्र के जन्म से बिल्कुल अनजान देवाधिदेव महादेव अपने भवन से बहुत दूर कैलाश के दूसरे छोर पर गहन साधना में लीन थे। उन्हें भान तक नहीं था कि उनके अपने घर में एक नया जीवन जन्म ले चुका है। नंदी, चलो बहुत दिन हो गए। अब देवी पार्वती से मिलने का समय आ गया है। जो आ गया प्रभु। और इधर वो महाशक्तिशाली बाल गणेश जिसमें साक्षात नारायण का अंश था, अपनी मां के एक आदेश पर प्रहरी बनकर द्वार पर डट गया। पर वो नहीं जानता था। वो इस बात से पूरी तरह बेखबर था कि यह घर जितना उसकी माता का है, उतना ही उसके पिता देवों के देव महादेव का भी है। और यही अनजानापन उस प्रलय की पहली आहट थी जो अब आने ही वाला था। रुकिए देव। माता स्नान कर रही हैं। उनकी आज्ञा के बिना किसी को भीतर जाने की अनुमति नहीं है। कृपया यहां से लौट जाइए। बालक, क्या तुम जानते भी हो कि तुम किसे रोक रहे हो? मैं शिव हूं। देवी पार्वती का पति। यह मेरा ही गृह है। मार्ग छोड़ो। आप जो भी हो देव, मेरे लिए मेरी माता की आज्ञा सर्वोपरि है। मुझे मेरे ही गृह में प्रवेश करने से रोकोगे। जब तक माता की आज्ञा नहीं मिलती। बालक, हठ मत करो। जिनका मार्ग तुम रोक रहे हो, यह स्वयं देवाधिदेव महादेव हैं। यह माता पार्वती के स्वामी हैं। माता को जब यह ज्ञात होगा कि तुमने स्वयं महादेव को रोका है, तो वे भी प्रसन्न नहीं होंगे। महोदय, यह देवाधिदेव हो या स्वयं महादेव, मेरे लिए मेरी माता की आज्ञा सर्वोपरि है। जब तक माता आज्ञा नहीं देंगी, मैं किसी को भीतर प्रवेश नहीं करने दूंगा। बालक, मेरा धैर्य मत परखो। मैं तुम्हें अंतिम बार समझा रहा हूं। मेरे मार्ग से हट जाओ। प्रभु, इस नन्हाए से बालक को दंड मत दीजिए। इसे तो कीर्तिमंक का एक दर्शन ही भयभीत कर देगा। इसके लिए आपके क्रोध की आवश्यकता नहीं प्रभु। कीर्तिमंक इस उध्द बालक को मेरे मार्ग से हटाओ। अभी नंदी, बहुत हुआ इस बालूक को मारे। मार्ग से हटाओ जो आज्ञा प्रभु। वाह! अरे प्रभु राम। नंदी वही नंदी जिनका नाम सुनते ही असुरों की सेनाएं थर्रा उठती थीं, जो अकेले ही पूरी दानव सेना को धूल चटाने की शक्ति रखते थे, जिन्हें स्वयं महादेव ने अपनी कुल शक्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा सौंपा था। पर आज उसी महाबली नंदी को एक नन्हे से बालक ने पल भर में परास्त कर दिया। यह देखकर देवों के देव महादेव भी एक क्षण के लिए स्तब्ध रह गए। फिर उनका शांत मुख क्रोध से दह उठा। उन्होंने अपने समस्त गणों को ललकारा और उनकी वो पुकार पूरे कैलाश में गरज बनकर गूंज उठी। शिव की आवाज कानों में पड़ते ही उनके गण बिजली की तरह दौड़ पड़े। इतने वेगवान, इतने प्रचंड कि बड़े-बड़े असुर भी उनके सामने पल भर ना टिक पाते। उनके कदमों से धरती कांपने लगी और आकाश उनकी गर्जना से भर उठा। और अब आमने-सामने थे दो छोर। एक ओर खड़ी थी शिव की वह अजय गणसेना जिसके आगे दानवों के साम्राज्य ढह जाया करते थे और दूसरी ओर बिल्कुल अकेला डट कर खड़ा था एक नन्हा बालक गणेश। महादेव का क्रोध प्रत्येक क्षण बढ़ता जा रहा है। यदि यह बालक अब भी नहीं हटा तो परिणाम अत्यंत गंभीर होगा। स्वामी, यह बालक हठ नहीं कर रहा। अपनी माता की आज्ञा निभा रहा है। किंतु महादेव के इस रौद्र रूप के सामने अब किसी बड़े अनर्थ की आशंका हो रही है। मुझे भी यही भय है देवी। अब इस तांडव को रोकना सरल नहीं होगा। अकेला नंदी तो बालिक गणेश को शीघ्र मार्ग से हटाओ। गणेश, गणा, गणेश, गणेश, गणेश, गणे, गणा, गणा, गणेश, गणा, गणेश, गणा, गणा, गणेश, गणेश, गणा, गणेश, गणा, गणा, गणेश। जब तक प्रभु यह संघर्ष तो हर क्षण बढ़ता ही जा रहा है। कहीं कोई बड़ा अनर्थ ना हो जाए। देवी, जिसे हम अनर्थ समझ रहे हैं, संभव है वही किसी महान लीला की भूमिका हो। तो क्या यह सब किसी आने वाली महान लीला का आरंभ है? समय स्वयं इसका उत्तर देगा। नन्हे बालक गणेश ने अपने असीम बल और अद्भुत पराक्रम से एक ही साथ पांच-छह बलशाली शिव गणों को पलक झपकते ही धूल चटा दी। मानो इतने प्रचंड योद्धाओं को परास्त कर देना उसके लिए महज बाएं हाथ का खेल हो। अब महादेव के मन में तनिक भी संदेह ना बचा था। द्वार पर डटा यह बालक कोई साधारण शिशु नहीं था। बिगड़ती स्थिति को भांपते हुए ब्रह्मदेव ने देवराज इंद्र का आह्वान किया और उन्हें आदेश दिया कि वे कैलाश जाकर उस हठी बालक को उसके मार्ग से हटाएं। किंतु अपने सामर्थ्य के मद में चूर इंद्र ने स्वयं महादेव के सम्मुख पूरे अहंकार के साथ ललकार भरी कि जिस बालक को समस्त शिवगण मिलकर नहीं हटा सके, उसे वे अकेले क्षण भर में कैलाश के द्वार से हटा देंगे। देवराज इंद्र आपके मार्ग की यह बाधा हटा देगा। ठीक है देवराज, यदि तुम्हें अपने सामर्थ्य पर इतना विश्वास है तो आगे बढ़ो। पर सावधान, यह कोई साधारण बालक नहीं है। तुम जो भी हो बालक, बहुत हो चुका। मार्ग छोड़ दो, वरना मुझे तुम्हें हटाना पड़ेगा। रुकिए देवराज, पहले मैं अपनी माता के चारों ओर सुरक्षा कवच बना दूं ताकि हमारे इस युद्ध से उनके स्नान में कोई विघ्न ना पड़े। त्रिशूल के जीवन, गणेश, यह मेरी अंतिम चेतावनी है। मार्ग छोड़ दो। चेतावनी समाप्त हो गई हो देवराज तो युद्ध आरंभ कीजिए। गणेश, गणा, गणेश, मेरा गणेश, गणा, गणेश, गणेश। बालक गणेश ने देवराज इंद्र को ऐसा परास्त किया कि पल भर में उनका सारा घमंड चकनाचूर हो गया। जिस विजय को इंद्र ने अत्यंत सरल समझा था, उसी युद्ध में वे गणेश के सामने क्षण भर भी टिक नहीं सके। एक के बाद एक शक्तिशाली योद्धा की पराजय देखकर महादेव का क्रोध अब अपनी सीमा लांघने लगा था। तब इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए महादेव ने स्वयं मृत्यु के देवता यमराज का आह्वान किया। आज्ञा दीजिए महादेव। इस बालक ने मेरे गणों और देवराज इंद्र तक को परास्त कर दिया है। अब इसे मेरे मार्ग से हटाओ। जैसी आपकी आज्ञा प्रभु। जिसे मृत्यु का पाश बांध ले उसका दंभ अधिक देर तक नहीं टिकता। सावधान रहना यम। गणेश ने यमराज के हर प्रहार का उत्तर इतनी सहजता से दिया, मानो यह उनके लिए कोई युद्ध ही ना हो। साक्षात मृत्यु के देवता उनके सामने खड़े थे। फिर भी हर वार के साथ एक ही सत्य और गहरा होता गया। इस बालक को मृत्यु छू तक नहीं सकती। फिर चाहे उसे लेने स्वयं यमराज ही क्यों ना आए। उधर महल के भीतर माता पार्वती शिव की आराधना में ऐसी लीन थी कि बाहर मचे इस प्रलय का उन्हें तनिक भी आभास ना था। यमराज के परास्त होते ही महादेव ने देखा उस क्षण गणेश द्वार पर नहीं था। वे भीतर जाने को आगे बढ़े। पर तभी वायु से भी तीव्र वेग से लौटकर गणेश अचानक उनके सामने आ खड़ा हुआ और एक बार फिर उनका मार्ग रोक दिया। है बालक, तुमने मेरे धैर्य की सारी सीमाएं पार कर दी हैं। अब परिणाम के लिए मुझे दोष मत देना। महादेव, मेरे गणेश को मोडक बहुत पसंद है। मेरा गणेश तब से बाहर खड़ा है। उसे भूख लगी होगी। अब बालक गणेश अनजाने में सारी मर्यादाएं लांघ चुके थे। उनका वह प्रहार किसी साधारण देवता पर नहीं, साक्षात काल के भी काल महाकाल पर हो चुका था। महादेव के नेत्रों म...
Speaker A
रही। पर माता पार्वती का तप नहीं टूटा। एक मां का संकल्प अटल था। उन्हें चाहिए था एक ऐसा पुत्र जो उनकी ममता का रूप हो और जिसका नाम तीनों लोकों में गूंजे और यहीं से आरंभ होता है महागणेश के जन्म का प्रथम
Speaker A
अध्याय एक ऐसी महालीला जो तीनों लोकों की नियति बदलने वाली थी। प्रभु मुझे ऐसी संतान का वरदान दीजिए जो ब्रह्मदेव की भांति निर्मल और करुणामय हो। आपकी भांति तेजस्वी और निपुण हो और मेरे स्वामी महादेव की भांति निर्मल और करुणामय
Speaker A
हो। उसमें त्रिमूर्ति के सभी श्रेष्ठ गुण समाए हो। तथास्तु उस दिन माता पार्वती अपने भवन में स्नान की तैयारी कर रही थी। स्नान से पूर्व उन्होंने अपने पूरे शरीर पर चंदन, हल्दी और सुगंधित तेलों का दिव्य उपटन लगाया और
Speaker A
जब वह उपटन उतरा तो उस चंदन मिश्रित मैल को माता ने यूं ही नहीं बहने दिया। बड़े जतन से एक-एक कण समेट लिया। फिर अपने ही कोमल हाथों से बड़ी ममता और कुशलता से उन्होंने उस दिव्य उपटन को आकार
Speaker A
देना आरंभ किया और एक अत्यंत सुंदर तेजस्वी सजीव से बालक की आकृति गढ़ डाली। पर यह आकृति सिर्फ एक आकृति नहीं थी। यह था संसार का वो अनमोल पुत्र जिसे एक दिन तीनों लोक पूजने वाले थे। अब बारी थी
Speaker A
प्राण फूंकने की। पार्वती ने अपनी दिव्य योग शक्ति जगाई और पंच तत्वों का आह्वान किया। सबसे पहले पुकारा गया जल को और जल ने उस मूर्ति में जीवन खोल दिया। फिर आई बारी पृथ्वी की और धरती ने उस आकृति को देह दी, आकार दिया और
Speaker A
अग्नि ने उस बालक में तेज भर दिया। और वायु ने उसकी नासिका में सांसों का स्पंदन थूक दिया। जीवन की वह पहली कोमल सांस जिसका संसार युगों से इंतजार कर रहा था। यही था पार्वती का अपना पुत्र गणेश।
Speaker A
पुत्रा मां मैं आ गया। मां आपकी इच्छा से ही मैं प्रकट हुआ हूं। क्या तुम ही मेरे महागणेश स्वरूप पुत्र हो?
Speaker A
नहीं माता मैं तो आपका गणेश हूं। आपका गौरी पुत्र गणेश मेरा पुत्र मेरा गणेश माता पार्वती ने कुछ ही समय में अपने पुत्र को वह सब सौंप दिया जो एक महायोद्धा के लिए आवश्यक था। अपनी दिव्य शक्तियां, हर कुशल विद्या और युद्ध की संपूर्ण
Speaker A
शिक्षा जो ज्ञान अर्जित करने में युगों बीत जाते हैं वो महाशक्तिशाली बाल गणेश ने पल भर में आत्मसात कर लिया। किसी को भी भीतर प्रेश मत करने देना। चाहे उसके बाद क्यों ना माता पार्वती ने गणेश को महल के
Speaker A
द्वार की रक्षा का दायित्व सौंप दिया और उन्हें स्पष्ट आज्ञा दी कि उनकी अनुमति के बिना कोई भी पुरुष महल के भीतर प्रवेश ना कर सके और उधर अपने पुत्र के जन्म से बिल्कुल अनजान देवाधिदेव महादेव अपने भवन
Speaker A
से बहुत दूर कैलाश के दूसरे छोर पर गहन साधना में लीन थे। उन्हें भान तक नहीं था कि उनके अपने घर में एक नया जीवन जन्म ले चुका है। नंदी चलो बहुत दिन हो गए अब देवी पार्वती से मिलने का समय आ गया है जो आ गया प्रभु
Speaker A
और इधर वो महाशक्तिशाली बाल गणेश जिसमें साक्षात नारायण का अंश था अपनी मां के एक आदेश पर प्रहरी बनकर द्वार पर डट गया। पर वो नहीं जानता था। वो इस बात से पूरी तरह बेखबर था कि यह घर जितना उसकी माता का है,
Speaker A
उतना ही उसके पिता देवों के देव महादेव का भी है। और यही अनजानापन उस प्रलय की पहली आहट थी जो अब आने ही वाला था। रुकिए देव। माता स्नान कर रही हैं। उनकी आज्ञा के बिना किसी को भीतर जाने की
Speaker A
अनुमति नहीं है। कृपया यहां से लौट जाइए। बालक क्या तुम जानते भी हो कि तुम किसे रोक रहे हो?
Speaker A
मैं शिव हूं। देवी पार्वती का पति यह मेरा ही ग्रह है। मार्ग छोड़ो। आप जो भी हो देव मेरे लिए मेरी माता की आज्ञा सर्वोपरि है। मुझे मेरे ही गृह में प्रवेश करने से रोकोगे। जब तक माता की आज्ञा नहीं मिलती। बालक हठ
Speaker A
मत करो। जिनका मार्ग तुम रोक रहे हो, यह स्वयं देवाधिदेव महादेव हैं। यह माता पार्वती के स्वामी हैं। माता को जब यह ज्ञात होगा कि तुमने स्वयं महादेव को रोका है, तो वे भी प्रसन्न नहीं होंगे। महोदय, यह देवाधिदेव हो या स्वयं महादेव।
Speaker A
मेरे लिए मेरी माता की आज्ञा सर्वोपरि है। जब तक माता आज्ञा नहीं देंगी, मैं किसी को भीतर प्रवेश नहीं करने दूंगा। बालक मेरा धैर्य मत परखो। मैं तुम्हें अंतिम बार समझा रहा हूं। मेरे मार्ग से ठग जाओ। प्रभु इस ननहाए से बालक को दंड मत दीजिए।
Speaker A
इसे तो कीर्तिमंक का एक दर्शन ही भयभीत कर देगा। इसके लिए आपके क्रोध की आवश्यकता नहीं प्रभु। कीर्तिमंक इस उद्ध बालक को मेरे मार्ग से हटाओ। अभी नंदी बहुत हुआ इस बालूक को मारे मार्ग से हटाओ जो आज्ञा प्रभु
Speaker A
वाओ अरे प्रभु राम नंदी वही नंदी जिनका नाम सुनते ही असुरों की सेनाएं थर्रा उठती थी जो अकेले ही पूरी दानव सेना को धूल चटाने की शक्ति रखते थे जिन्हें स्वयं महादेव ने अपनी कुल शक्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा हिस्सा सौंपा था।
Speaker A
पर आज उसी महाबली नंदी को एक नन्हे से बालक ने पल भर में परास्त कर दिया। यह देखकर देवों के देव महादेव भी एक क्षण के लिए स्तब्ध रह गए। फिर उनका शांत मुख क्रोध से दह उठा। उन्होंने अपने समस्त
Speaker A
गणों को ललकारा और उनकी वो पुकार पूरे कैलाश में गरज बनकर गूंज उठी। शिव की आवाज कानों में पड़ते ही उनके गण बिजली की तरह दौड़ पड़े। इतने वेगवान, इतने प्रचंड कि बड़े-बड़े असुर भी उनके सामने पल भर ना
Speaker A
टिक पाते। उनके कदमों से धरती कांपने लगी और आकाश उनकी गर्जना से भर उठा। और अब आमने-सामने थे दो छोर। एक ओर खड़ी थी शिव की वह अजय गणसेना जिसके आगे दानवों के साम्राज्य ढह जाया करते थे और दूसरी ओर
Speaker A
बिल्कुल अकेला डट कर खड़ा था एक नन्हा बालक गणेश महादेव का क्रोध प्रत्येक क्षण बढ़ता जा रहा है यदि यह बालक अब भी नहीं हटा तो परिणाम अत्यंत गंभीर होगा। स्वामी यह बालक हठ नहीं कर रहा। अपनी माता
Speaker A
की आज्ञा निभा रहा है। किंतु महादेव के इस रौद्र रूप के सामने अब किसी बड़े अनर्थ की आशंका हो रही है। मुझे भी यही भय है देवी। अब इस तांडव को रोकना सरल नहीं होगा। अकेला नंदी तो बालिक गणेश को शीघ्र मार्ग से हटाओ।
Speaker A
गणेश गणा गणेश गणेश गणेश गणे गणा गणा गणेश गणा गणेश गणा गणा गणेश गणेश गणा गणेश गणा गणा गणेश जब तक प्रभु यह संघर्ष तो हर क्षण बढ़ता ही जा रहा है। कहीं कोई बड़ा अनर्थ ना हो जाए।
Speaker A
देवी जिसे हम अनर्थ समझ रहे हैं। संभव है वही किसी महान लीला की भूमिका हो। तो क्या यह सब किसी आने वाली महान लीला का आरंभ है?
Speaker A
समय स्वयं इसका उत्तर देगा। नन्हे बालक गणेश ने अपने असीम बल और अद्भुत पराक्रम से एक ही साथ पांच छह बलशाली शिव गणों को पलक झपकते ही धूल चटा दी। मानो इतने प्रचंड योद्धाओं को परास्त कर देना उसके लिए महज बाएं हाथ का खेल हो।
Speaker A
अब महादेव के मन में तनिक भी संदेह ना बचा था। द्वार पर डटा यह बालक कोई साधारण शिशु नहीं था। बिगड़ती स्थिति को भांपते हुए ब्रह्मदेव ने देवराज इंद्र का आह्वान किया और उन्हें आदेश दिया कि वे कैलाश जाकर उस
Speaker A
हठी बालक को उसके मार्ग से हटाएं। किंतु अपने सामर्थ्य के मद में चूर इंद्र ने स्वयं महादेव के सम्मुख पूरे अहंकार के साथ ललकार भरी कि जिस बालक को समस्त शिवगण मिलकर नहीं हटा सके उसे वे अकेले क्षण भर
Speaker A
में कैलाश के द्वार से हटा देंगे। देवराज इंद्र आपके मार्ग की यह बाधा हटा देगा। ठीक है देवराज यदि तुम्हें अपने सामर्थ्य पर इतना विश्वास है तो आगे बढ़ो। पर सावधान यह कोई साधारण बालक नहीं है। तुम जो भी हो बालक बहुत हो चुका मार्ग
Speaker A
छोड़ दो वरना मुझे तुम्हें हटाना पड़ेगा। रुकिए देवराज पहले मैं अपनी माता के चारों ओर सुरक्षा कवच बना दूं ताकि हमारे इस युद्ध से उनके स्नान में कोई विघ्न ना पड़े। त्रिशूल के जीवन गणेश यह मेरी अंतिम चेतावनी है। मार्ग
Speaker A
छोड़ दो। चेतावनी समाप्त हो गई हो देवराज तो युद्ध आरंभ कीजिए। गणेश गणा गणेश मेरा गणेश गणा गणेश गणेश बालक गणेश ने देवराज इंद्र को ऐसा परास्त किया कि पल भर में उनका सारा घमंड चकनाचूर हो गया। जिस विजय को इंद्र ने अत्यंत सरल
Speaker A
समझा था। उसी युद्ध में वे गणेश के सामने क्षण भर भी टिक नहीं सके। एक के बाद एक शक्तिशाली योद्धा की पराजय देखकर महादेव का क्रोध अब अपनी सीमा लांघने लगा था। तब इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए महादेव
Speaker A
ने स्वयं मृत्यु के देवता यमराज का आह्वान किया। आज्ञा दीजिए महादेव। इस बालक ने मेरे गणों और देवराज इंद्र तक को परास्त कर दिया है। अब इसे मेरे मार्ग से हटाओ। जैसी आपकी आज्ञा प्रभु जिसे मृत्यु का पाश
Speaker A
बांध ले उसका दंभ अधिक देर तक नहीं टिकता। सावधान रहना यम। गणेश ने यमराज के हर प्रहार का उत्तर इतनी सहजता से दिया। मानो यह उनके लिए कोई युद्ध ही ना हो। साक्षात मृत्यु के देवता उनके सामने खड़े थे। फिर भी हर वार के साथ
Speaker A
एक ही सत्य और गहरा होता गया। इस बालक को मृत्यु छू तक नहीं सकती। फिर चाहे उसे लेने स्वयं यमराज ही क्यों ना आए। उधर महल के भीतर माता पार्वती शिव की आराधना में ऐसी लीन थी कि बाहर मचे इस प्रलय का
Speaker A
उन्हें तनिक भी आभास ना था। यमराज के परास्त होते ही महादेव ने देखा उस क्षण गणेश द्वार पर नहीं था। वे भीतर जाने को आगे बढ़े। पर तभी वायु से भी तीव्र वेग से लौटकर गणेश अचानक उनके सामने
Speaker A
आ खड़ा हुआ और एक बार फिर उनका मार्ग रोक दिया। है बालक तुमने मेरे धैर्य की सारी सीमाएं पार कर दी हैं। अब परिणाम के लिए मुझे दोष मत देना। महादेव मेरे गणेश को मोडक बहुत पसंद है। मेरा गणेश तब से बाहर खड़ा है। उसे भूख
Speaker A
लगी होगी। अब बालक गणेश अनजाने में सारी मर्यादाएं लांग चुके थे। उनका वह प्रहार किसी साधारण देवता पर नहीं साक्षात काल के भी काल महाकाल पर हो चुका था। महादेव के नेत्रों में धकते उस प्रलयंकारी क्रोध को देखकर
Speaker A
ब्रह्मदेव का हृदय कांप उठा। वे समझ गए यदि यह टकराव अभी ना रुका तो अनर्थ निश्चित है और वे बिना क्षण गवाए कैलाश की ओर दौड़ पड़े क्योंकि अब इस महालीला का सबसे निर्णायक अध्याय आरंभ होने वाला था।
Speaker A
यह बालक साधारण नहीं है। यदि महादेव के क्रोध में आकर गणेश का वध हो गया तो माता पार्वती का क्रोध कौन रोक पाएगा?
Speaker A
प्रभु मैं आपका सेवक हूं पर आज आपको रोक भी नहीं पा रहा और अपने नेत्रों के सामने यह अनर्थ देख भी नहीं पा रहा। महादेव पीछे रोके नियति ने साक्षात महाकाल को अपने ही पुत्र पर त्रिशूल फूल उठाने के लिए विवश कर दिया
Speaker A
था। यह प्रहार उस एक क्षण के क्रोध का परिणाम नहीं था। इसकी नीव तो युगों पहले रखी जा चुकी थी। लंका के दो प्रचंड राक्षस माली और सुमाली जो रिश्ते में रावण के नाना और परना थे। महादेव के परम भक्त थे।
Speaker A
कठोर तपस्या से उन्होंने शिव से अपनी रक्षा का वरदान पा लिया। पर उसी वरदान के अहंकार में डूबकर स्वयं को अजय समझकर वे तीनों लोकों में अत्याचार का तांडव मचाने लगे। अब दुष्य नहीं करते। जब उनका आतंक हर सीमा लांग गया तब पीड़ित
Speaker A
देवता सूर्यदेव की शरण में पहुंचे। सृष्टि का संतुलन बचाने के लिए सूर्यदेव ने उन पर आक्रमण कर दिया और उनकी प्रचंड अग्नि के सामने दोनों राक्षसों की शक्ति क्षण भर ना टिक सकी। जब सूर्य की ज्वालाएं उन्हें भस्म करने ही
Speaker A
वाली थी तब भयभीत माली सुमाली प्राण बचाकर महादेव के चरणों में जा गिरे। अपने भक्तों की रक्षा के वचन से बंधे महादेव उन्हें असहाय नहीं छोड़ सकते थे। उन्होंने सूर्यदेव को रोकना चाहा, समझाना चाहा पर सूर्य देव भी सृष्टि के प्रति अपने धर्म
Speaker A
से पीछे हटने को तैयार ना थे। एक ओर भक्तों की रक्षा का वचन, दूसरी ओर संसार की रक्षा का धर्म और जब सूर्य देव ना रुके तो महादेव का क्रोध प्रचंड हो उठा और उन्होंने अपना त्रिशूल सूर्य देव की ओर
Speaker A
चला दिया। त्रिशूल का वो भीषण प्रहार लगते ही सूर्यदेव चेतना खोकर अपने रथ से नीचे जा गिरे। सृष्टि के प्रकाश का स्रोत बुझा तो उसी क्षण संपूर्ण ब्रह्मांड घोर अंधकार में डूब गया। दिशाएं प्रकाशहीन हो गई और तीनों लोकों में भय की लहर दौड़ गई। जब
Speaker A
सूर्यदेव के पिता महर्षि कश्यप ने अपने पुत्र को अचेत पड़ा देखा तो उनका शोक प्रचंड क्रोध में बदल गया। उन्होंने इस अनर्थ के लिए सीधे महादेव को उत्तरदाई ठहराया और उसी क्षण उन्हें श्राप दे दिया। महादेव ये आपने क्या कर दिया? जिस त्रिशूल से
Speaker A
आपने आज मेरे पुत्र पर प्रहार किया है। एक दिन यही परिस्थिति आपको भी अपने ही पुत्र पर त्रिशूल उठाने को विवश करेगी और तब आप चाहकर भी उस प्रहार प्रहार को रोक नहीं पाएंगे। युग पर युग बीतते गए पर वो श्राप मिटा
Speaker A
नहीं। वो चुपचाप केवल अपने सत्य होने की घड़ी की प्रतीक्षा करता रहा। गणेश महादेव आपने यह क्या कर दिया? यह तो आपका अपना ही पुत्र था। अब देवी पार्वती का क्रोध स्वयं सृष्टि के लिए संकट बन सकता है। माता पार्वती ने जैसे ही अपने पुत्र
Speaker A
गणेश की निष्प्राण देह देखी मानो एक ही क्षण में पूरा कैलाश मौन हो गया। उनकी आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। सामने अपने पुत्र की यह दशा देखकर एक मां का हृदय भीतर तक टूट चुका था।
Speaker A
स्वामी आपने मेरे पुत्र का वध कर दिया। उनके करुण विलाप में केवल शोक नहीं था। हर आंसू के साथ एक प्रचंड क्रोध भी जन्म ले रहा था। माता ने वहां उपस्थित सभी देवताओं की ओर देखा और कांपती हुई आवाज में उत्तर
Speaker A
मांगा। तुम सब ने मिलकर मेरे निर्दोष पुत्र की यह दशा कैसे कर दी? जब महादेव का क्रोध मेरे पुत्र पर टूट रहा था तब तुम में से किसी ने उन्हें रोकने का साहस क्यों नहीं किया? देवताओं के पास माता के
Speaker A
प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था। उनके झुके हुए सिर और मौन ने माता पार्वती की पीड़ा को और भी बढ़ा दिया। पुत्र वियोग में उनका करुण विलाप अब धीरे-धीरे प्रलयंकारी क्रोध में बदलने लगा। आंसू अभी भी उनकी आंखों से
Speaker A
बह रहे थे। लेकिन उन्हीं आंसुओं के पीछे आदि शक्ति का रौद्र स्वरूप जाग उठा था। उनके बाल खुलकर बिखर गए। नेत्र लाल अंगारों की तरह धकने लगे। काली काली काल जय काली काली जय काली काली काली काली काल जय काली काली जय जय काली
Speaker A
काली जय जय काली काली का जय काली काली जय जय काली काली और उनके मुख से निकली भीषण गर्जना से तीनों लोक कांप उठे माता पार्वती ने महाकाली का अत्यंत भयंकर स्वरूप धारण कर लिया था। जो देवता यक्ष और गंधर्व कुछ समय
Speaker A
पहले तक महादेव की ओर से गणेश के विरुद्ध युद्ध कर रहे थे। अब वही अपनी जान बचाकर इधरउधर भागने लगे। वे समझ चुके थे कि यदि माता का क्रोध तुरंत शांत नहीं किया गया तो तीनों लोकों का विनाश निश्चित है।
Speaker A
स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो चुकी थी। तब ब्रह्मदेव के नेतृत्व में सभी देवता महादेव के समक्ष एकत्र हुए। गहन विचार के बाद सभी एक ही निर्णय पर पहुंचे। सृष्टि को बचाने का केवल एक उपाय था गणेश
Speaker A
को पुनः जीवित करना। महादेव ने बिना विलंब किए नंदी और अपने एक शिव गण को आदेश दिया। जीव उत्तर दिशा की ओर मुंह करके सो रहा हो। महादेव का आदेश मिलते ही नंदी और शिव गण खोज में निकल पड़े। उन्हें तनिक भी ज्ञात
Speaker A
नहीं था कि नियति उन्हें किसी मनुष्य की ओर नहीं बल्कि एक गज की ओर ले जा रही थी। इधर माता का क्रोध प्रत्येक क्षण और भी प्रचंड होता जा रहा था। सृष्टि के पास अब अधिक समय शेष नहीं था।
Speaker A
बहुत दूर जाने के बाद नंदी को एरावत हाथी का एक पुत्र दिखाई दिया। वह उत्तर दिशा की ओर मुख करके सो रहा था। महादेव द्वारा बताई गई सभी परिस्थितियां उसी स्थान पर पूरी हो रही थी। नंदी समझ गए। नियति ने
Speaker A
इसी गज का चयन किया है। वे उसका मस्तक लेकर तत्काल कैलाश लौटे और उसे महादेव को सौंप दिया। समय बहुत कम था। माता की संहारक शक्तियां तीनों लोकों में फैल चुकी थी। क्या ले आए तुम?
Speaker A
ये गज का मस्तक कहां से ले आए? महादेव विलंब ना कीजिए। एक भी पल व्यर्थ ना जाए। शीघ्र इस मस्तक को गणेश से जोड़ दीजिए। महादेव ने बिना देर किए अपने हाथों से उस गज मस्तक को गणेश के निष्प्राण शरीर पर
Speaker A
बिल्कुल सटीक स्थान पर स्थापित किया। यह केवल एक दिव्य अनुष्ठान नहीं था बल्कि विज्ञान और अध्यात्म के अद्भुत संगम से जीवन को पुनः जागृत करने की प्रक्रिया थी। महादेव ने वेद मंत्रों का उच्चारण आरंभ किया। योग माया और अपनी दिव्य शक्ति के
Speaker A
माध्यम से उन्होंने शरीर की सूक्ष्म नाड़ियों, रक्त संचार और चेतना को उस नए मस्तक से जोड़ना शुरू किया। धीरे-धीरे गज मस्तक और शरीर के बीच का प्रत्येक संबंध पूरा होने लगा। महादेव की शक्ति शरीर में प्रवाहित होते ही गणेश की नाड़ियों में
Speaker A
प्राण दोबारा दौड़ने लगे। उनके भीतर चेतना लौटी और गजमस्तक के साथ उनमें ब्रह्मांड की सर्वोच्च बुद्धि, विवेक और ज्ञान का प्रवेश हुआ। यह केवल माता पार्वती के पुत्र की वापसी नहीं थी। यह एक नए दिव्य स्वरूप का जन्म
Speaker A
था। गणेश से महागणेश बनने की यात्रा पूर्ण हो चुकी थी। वही महागणेश जिनके आगमन का वरदान स्वयं भगवान नारायण ने माता पार्वती को दिया था। अपने पुत्र को जीवित देखकर माता का महाकाली स्वरूप धीरे-धीरे शांत हो गया। उनकी संहारक शक्तियां पुनः उन्हीं
Speaker A
में समाने लगी और तीनों लोकों पर मंडरा रहा विनाश का संकट टल गया। महागणेश के इस अद्भुत दिव्य स्वरूप को देखकर चारों ओर उपस्थित सभी देवता उनके सामने नतमस्तक होने लगे। ब्रह्मदेव, भगवान विष्णु, देवराज इंद्र और समस्त नवग्रहों ने उनके
Speaker A
चरणों में अपने सिर झुका दिए। यही थी गणेश से महागणेश बनने की महान कथा। महागणेश का जन्म केवल माता पार्वती के पुत्र के रूप में नहीं बल्कि संपूर्ण सृष्टि के कल्याण के लिए हुआ था। अपने बाल्यकाल से ही
Speaker A
उन्होंने ऐसी अद्भुत लीलाएं और पराक्रम दिखाए जिन्हें देखकर देवता भी विस्मित रह गए। नन्हे स्वरूप में ही उन्होंने अपनी असाधारण बुद्धि और अपार बल का परिचय देते हुए अनेक मायावी तथा शक्तिशाली असुरों का संहार किया। लेकिन उनकी लीलाएं केवल युद्ध
Speaker A
और पराक्रम तक सीमित नहीं थी। वे ज्ञान, करुणा, वात्सल्य और धर्म की रक्षा का भी प्रतीक थी। महादेव के प्रचंड कोप, माता पार्वती के असीम वात्सल्य और भगवान नारायण के वरदान से प्रकट हुए महागणेश के इस दिव्य स्वरूप की आज भी प्रत्येक शुभ कार्य
Speaker A
से पहले पूजा की जाती है। क्योंकि महागणेश केवल विघ्नों को दूर करने वाले देवता नहीं है। वे बुद्धि, विवेक, विजय और सृष्टि की निरंतरता का आशीर्वाद हैं। यदि आपको महागणेश की यह दिव्य कथा पसंद आई हो तो वीडियो को लाइक करें और हमारे चैनल कथा
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