मुकेश कुमार सिंह बताते हैं कि महाभारत इतिहास है, मिथक नहीं, और इसके गहन अध्ययन से जीवन के सभी पहलुओं की समझ मिलती है।
Key Takeaways
- महाभारत इतिहास है, मिथक नहीं।
- पूर्वाग्रह मुक्त होकर इसे पढ़ना चाहिए।
- महाभारत में समस्त ज्ञान और जीवन के मूल्य निहित हैं।
- रोजाना महाभारत का अध्ययन जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है।
- स्वयं पढ़कर और समझकर ही सही निष्कर्ष निकाले जाने चाहिए।
What the video covers
- महाभारत को इतिहास के रूप में समझना चाहिए, न कि केवल मिथक या माइथोलॉजी।
- महाभारत में वेदों, उपनिषदों, पुराणों और न्यायमीमांसा का सार समाहित है।
- महाभारत का रोजाना अध्ययन करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।
- पढ़ने का सही दृष्टिकोण पूर्वाग्रह मुक्त होना चाहिए, इसे अपने पूर्वजों का इतिहास मानकर पढ़ना चाहिए।
- महाभारत के पात्रों को हीरो या विलेन के रूप में पूर्वाग्रह के बिना समझना आवश्यक है।
- महाभारत के विभिन्न संस्करणों जैसे हरिवंश पुराण और श्रीमद्भागवत को भी पढ़ना चाहिए।
- महाभारत में छुपाए गए तथ्य और घटनाएं जो आमतौर पर नहीं बताई जातीं, उन्हें जानना महत्वपूर्ण है।
- महाभारत के चरित्रों और घटनाओं की गहराई से व्याख्या की गई है, जो जीवन के विभिन्न संबंधों को समझने में मदद करती है।
- महाभारत को घर में रखना और पढ़ना एक सकारात्मक कार्य है, इसे नकारात्मक मानना गलत है।
- पॉडकास्ट का उद्देश्य लोगों को स्वयं महाभारत पढ़ने और समझने के लिए प्रेरित करना है।
Chapters
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Speaker A
आपने महाभारत पर काफी गहराई से रिसर्च की और पूरी रिसर्च में ऐसी कौन सी चीज आपको सबसे ज्यादा चौंका दिया? यह लोगों को जाननी चाहिए। यह बात सबको जाननी चाहिए कि महाभारत इतिहास है। महाभारत मिथ नहीं है जो हम
Speaker A
कहते हैं माइथोलॉजी। क्या पढ़ने के तरीके भी होते हैं कि कैसे पढ़ना चाहिए? श्री कृष्ण एक जगह कहते हैं महाभारत में ही कि मित्र वो होता है जो दो भाइयों में झगड़ा होता देखकर उनके बीच का झगड़ा शांत
Speaker A
करवाता है। क्योंकि दोनों की मित्रता का आधार था अहंकार। कर्ण को हीरो मानते हैं। कोई बोलते हैं कि दुर्योधन के साथ गलत हुआ। आपकी नजर में क्या है ये चीज?
Speaker A
कि युधिष्ठिर धर्म का वृक्ष है। श्री कृष्ण उसकी जड़े हैं। अर्जुन उसका तना है। भीम उसकी शाखाएं हैं और नकुल और सहदेव उसके टहनियां और पत्ते हैं। कौन सच्चा मित्र है?
Speaker A
जो सही सलाह दें। नमस्कार मुकेश जी। बहुत-बहुत स्वागत है आपका। कैसे हैं आप? नमस्कार। मैं बढ़िया हूं। आप बताइए आपसे दूसरी बार मुलाकात हो रही है। जी जी जी इतना अच्छा गया था पॉडकास्ट। हम सोचे दोबारा चर्चाएं होनी चाहिए और आपके
Speaker A
साथ बात करके ऐसा लगता है कि पॉडकास्ट खत्म ही नहीं होंगे। इतने अच्छे आपने रिसर्च की है रामायण पर, महाभारत पर और आपका एक्सपीरियंस जो रहा है बहुत अच्छा तजुर्बा आप लोगों के साथ शेयर करते हैं। आपने महाभारत पर काफी गहराई से रिसर्च की
Speaker A
है और पूरी रिसर्च में ऐसी कौन सी चीज आपको सबसे ज्यादा चौंका दिया जैसा लगा कि ये लोगों को जाननी चाहिए। देखिए महाभारत के बारे में कोई भी बात करने से पहले महाभारत में लिखा हुआ है कि आप भगवान श्री
Speaker A
नारायण नर रूपी अर्जुन और माता सरस्वती और श्री वेदव्यास जी को प्रणाम करके ही महाभारत पर चर्चा शुरू करनी चाहिए तो मैं उन सबको प्रणाम करता हूं और आज संयोग से आज व्यास जयंती भी है तो ऐसे अवसर पर मुझे महाभारत के बारे में बात
Speaker A
करने का मौका मिल रहा है तो मैं अपने आप को भाग्यशाली समझता हूं कि सबसे पहले इस बात के लिए कि मुझे महाभारत पढ़ने का अवसर मिला भले फिल्म बनाने की प्रेरणा से ही लेकिन लेकिन संक्षिप्त महाभारत मैंने
Speaker A
महाभारत पर सीरीज भी डायरेक्ट की है। आप जानते ही हैं। उस समय भी मैंने संक्षिप्त महाभारत पढ़ी थी और उसके पूर्व भी संक्षिप्त महाभारत मैं एक बार और पढ़ चुका था। लेकिन अभी मैंने सोचा कि पूरी महाभारत पढ़ी जाए। तो
Speaker A
मैंने शुरुआत की इस उद्देश्य से कि केवल कहानी पढ़ूंगा कि जो कौरव पांडवों की कहानी है वो पढ़ूंगा। लेकिन जब मैं पढ़ता गया पढ़ता गया तो मुझे लगा कि कौरव पांडवों से परे यह महाभारत पूरे संसार का नहीं पूरे ब्रह्मांड का
Speaker A
सारा ज्ञान इसमें भरा हुआ है और आप आप आप देखेंगे अगर किताबों को बाद में आप उसमें ये कर सकते हैं। आप हर दूसरे पेज पर कुछ न कुछ मार्क किया हुआ है। आप ये सात-छह खंड हैं महाभारत के और हरिवंश
Speaker A
ये भी महाभारत का ही भाग माना जाता है हरिवंश पुराण। जी तो आप हर [नाक से की जाने वाली आवाज़] जगह मार्किंग देखेंगे क्योंकि मुझे सब कुछ इतना इंपॉर्टेंट लगता है उसमें जब पढ़ना शुरू करता हूं जो उसके अलग की कहानियां हैं
Speaker A
पूरे भारत का इतिहास है उसमें ये बात सबको जाननी चाहिए कि महाभारत इतिहास है महाभारत मिथ नहीं है जो हम कहते हैं माइथोलॉजी और इसके हर दूसरे श्लोक में लिखा हुआ है कि ये इतिहास है। महाभारत में कोई एक चीज
Speaker A
फैसनेटिंग है ऐसा नहीं है। महाभारत अपने आप में पूरी कहानी का इसमें सबसे फैसनेटिंग यह है कि इसमें सब कुछ फैसनेटिंग है। इसके इसका एक-एक चरित्र इसकी एक-एक घटना ज्ञान विज्ञान सारे वेदों में इसमें स्वयं लिखा हुआ है कि वेदों में
Speaker A
उपनिषदों में पुराणों में न्यायमी मांसाह आदि जितने भी छह अंग हैं उन सबका निचोड़ इसमें डाल दिया गया है। और यह पढ़ने के बाद जो एक प्रश्न आप शायद पूछेंगे भी मैं पहले ही उसका उत्तर दे दूं क्योंकि
Speaker A
प्रारंभ में उस पर बात करना बहुत जरूरी है कि लोग कहते हैं कि महाभारत घर में नहीं रखना चाहिए। इसे महाभारत मैंने सवाल रखा था बहुत जरूरी सवाल है कि महाभारत घर में रखने से महाभारत होता है। एक्चुअली यह बिल्कुल उल्टा है। अगर आप
Speaker A
महाभारत घर में रखेंगे और अगर आप महाभारत का अध्ययन करेंगे रोज और उसमें लिखा हुआ अभी लास्ट के आप जब महाप्रस्थान पर्व के स्वर्गारोहण पर्व महाप्रस्थान पर्व के बाद सबसे एंड में 10 पेज में केवल इस बात की
Speaker A
व्याख्या की गई है कि महाभारत पढ़ने के क्या लाभ होते हैं? ब्राह्मण पढ़ेगा तो क्या होगा? क्षत्रिय पढ़ेगा तो क्या होगा?
Speaker A
वैश्य पढ़ेगा तो क्या होगा? शूद्र पढ़ेगा तो क्या होगा? सबको क्या लाभ होगा? गर्भवती स्त्री पढ़ेगी तो क्या लाभ होगा?
Speaker A
इसमें लिखा हुआ है कि महाभारत घर में रखने वाला इसका रोज पाठन करने वाला संसार में कहीं पराजित नहीं होता। उसके घर में हमेशा सुख शांति समृद्धि बनी रहती है। और जिसमें हमारे पूरे इतिहास का और ज्ञान विज्ञान का
Speaker A
खजाना है। मैं विज्ञान भी कह रहा हूं। बहुत सोच समझ के कह रहा हूं। का खजाना है। उसको एक षड्यंत्र की तरह के तहत हमारे घरों से बाहर कर दिया गया कि आप इसको रखो ही मत। संसार की कोई कोई संबंध नहीं है।
Speaker A
घर में आप नहीं रखते हैं क्योंकि घर में झगड़ा होगा। इसमें संबंधों की जो बात होती है, जितनी बारीकी से व्याख्या की गई है, सारे संबंधों की चाहे जीवन का कोई भी संबंध हो, किसी से भी हो। आप वो पढ़ने के
Speaker A
बाद आपकी पूरी दृष्टि बदल जाती है। अगर आप सचमुच पढ़ते हैं तो आप एक नावेल की तरह पढ़ते हैं, मिथ की तरह पढ़ते हैं तो अलग बात है। लेकिन अगर आप पढ़ते हैं तो यह ऐसा ग्रंथ है जो हर घर में रखा जाना चाहिए और
Speaker A
कम से कम दो पेज ही सही रोज पढ़ना चाहिए। पढ़ने के तरीके भी जैसे आपने अभी जिक्र किया कि अगर सही तरीके से पढ़ते हैं आप तो क्या पढ़ने के तरीके भी होते हैं कि कैसे पढ़ना चाहिए?
Speaker A
नहीं तरीके से मेरा मतलब ये नहीं था कि कोई विशेष स्टाइल है इसका पढ़ने का। नहीं मतलब कि आप सारी चीजों को भूल कर सिर्फ वही ध्यान रखें। मेरे पढ़ने के तरीके से मतलब यह था कि आप कोई पूर्वाग्रह लेकर ना आए मन में कि आपके
Speaker A
मन में अरे ये तो ऐसी कहानियां हैं। ये तो हुआ था। ये नहीं हुआ था। ये ऐसा है या वैसा है। इसमें ये करैक्टर वैसा है। वो कैरेक्टर वैसा है। मैं इसमें भी आगे बात करूंगा। लेकिन आप कोई पूर्वाग्रह लेकर ना
Speaker A
आए। आप ये मान के चले जैसे आपके दादा परदादा का इतिहास अगर आपको पढ़ाया जाए तो आप कैसे उसको अपना मान के अपने घर का इतिहास मान के पढ़ते हैं तो इसको उसी तरह आप लेकर पढ़िए कि ये हमारे पूर्वजों का
Speaker A
इतिहास है। इसमें जो हीरो है वो भी हमारे पूर्वज हैं। जो विलेन है वो भी हमारे पूर्वज हैं। ये समझना बहुत जरूरी है क्योंकि इस बात पर बहुत ये होने लगता है कि अच्छा वो हीरो है वो विलेन है। वो सही
Speaker A
था वो गलत था। तो वो आप अगर पहले से पूर्वाग्रह ले जाएंगे तो आप वही ढूंढेंगे जो आप चाहते हैं। लेकिन अगर आप यह सोच के कि मेरे दादा परदादा का मेरे पूर्वजों का इतिहास है तो जो जैसा है वैसा है मैं उसको
Speaker A
ग्रहण करूंगा तब आप इसको सही ढंग से समझ पाएंगे। जैसा आपने बताया कि आपने अच्छे से रिसर्च किया है। मैंने जाना है इस चीज को और गहन अध्ययन है आपका इस पर। लोगों के मन में सवाल रहते हैं। कुछ लोगों की
Speaker A
अपनी-अपनी अवधारणा है। कोई कर्ण को हीरो मानते हैं। कोई बोलते हैं कि दुर्योधन के साथ गलत हुआ। उसके साथ अत्याचार हुआ। सबकी अपनी-अपनी अवधारणा है। आपकी नजर में क्या है ये चीज?
Speaker A
देखिए सबसे पहले तो मेरी नजर मैं यहां नहीं रखूंगा। यहां जो मैं नजर रखूंगा वो श्री वेदव्यास जी ने जो लिखा है वो रखूंगा और मैं जो भी बताऊंगा मैं पहले स्पष्ट करूं कि मैं कोई बहुत बड़ा विद्वान नहीं
Speaker A
हूं। जी मेरा यह पॉडकास्ट करने का अर्थ यह है कि मैं यह लोगों को बताना चाहता हूं कि एक साधारण आदमी जिसका महाभारत से या रामायण से कोई लेना देना नहीं है वो इनको पढ़ने के बाद क्या जान सकता है और क्या आपको बता
Speaker A
सकता है। ये ग्रंथ इतने महान हैं कि मैं आपको बहुत सारी बहुत सारी चीजें बताऊंगा। लेकिन मैं उसकी श्लोक संख्या जैसे लोग नॉर्मल एक परंपरा है। आप चाहे तो आप बहुत आसानी से ढूंढ सकते हैं। किताबों में है
Speaker A
आप ले सकते हैं। लेकिन मैं क्यों नहीं बताऊंगा क्योंकि मेरा मूल आशय ये है कि मैं लोगों को प्रेरित कर सकूं कि वो स्वयं ये ग्रंथ पढ़ें। किसी के कहने में ना आए कि अच्छा इसमें ऐसा लिखा हुआ है। इसमें वो
Speaker A
करैक्टर वैसा है। वो लोग ऐसे हैं। ये घटना ऐसी हुई थी। वो किसी के कहने में ना आए। मैं भी जो बोल रहा हूं उस पर भी विश्वास आप पूरी तरह ना करें। आप स्वयं पढ़ें और स्वयं निर्णय लें। यह तो एक बात हो
Speaker A
गई। लेकिन मैं जो भी बोलूंगा वह या तो गीता प्रेस गोरखपुर की पुस्तक में श्री वेदव्यास जी ने लिखा है या बोरी क्रिटिकल एडिशन है उसमें जो लिखा हुआ है। इसके अलावा महाभारत के दो भाग और हैं। हरिवंश
Speaker A
पुराण और श्रीमद् भागवत में महाभारत की बहुत सारी कथाएं मिलती हैं। तो आप इन सब को पूरा पढ़ेंगे तब आप महाभारत का संपूर्ण ज्ञान ले पाएंगे क्योंकि कुछ घटनाएं हैं जो यहां से आपको वहां समझनी पड़ेगी और दूसरा आपको चीजों को जो आजकल बहुत ज्यादा
Speaker A
हो रहा है चेरी पिकिंग कि आप एक श्लोक उठाकर उसका कुछ मतलब निकालना चाहते हैं। आप एक घटना उठा के कुछ मतलब निकालना चाहते हैं। लेकिन कौन सा तार कहां से जुड़ा हुआ है उन चीजों पर
Speaker A
आप नहीं समझेंगे तब तक आप उसको पूरी तरह से समझ नहीं पाएंगे। अब जैसे मैं राहुल जी का पजल आता है ना केवल लिप्स दिखा के पहचानिए कि ये कौन है। [हंसी] आप नाक दिखा के ये पहचानिए कि कौन है।
Speaker A
आंखें दिखा के ये पहचानिए कौन है। तो ये वाली घटना नहीं होती है। आप जब पूरी तरह से देखेंगे कि भाई ये ह
Speaker A
भी और भीतर से भी। तो उसी तरह आप ग्रंथ को तभी समझ पाएंगे जब समग्रता में पढ़ेंगे। एक सेंटेंस उठा के एक लाइन उठा के नहीं होगा। अब आते हैं जो प्रश्न आपने पूछा था कि कुछ लोग यह मानते हैं, कुछ लोग वो मानते हैं।
Speaker A
देखिए जो वेदव्यास जी ने महाभारत की बिगिनिंग में ही बिल्कुल क्लियर कर दिया है। वो कहते हैं कि युधिष्ठिर धर्म का वृक्ष है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] श्री कृष्ण उसकी जड़े हैं। अर्जुन उसका तना है। भीम उसकी शाखाएं हैं और नकुल और
Speaker A
सहदेव उसके टहनिया और पत्ते हैं। उसके दूसरी तरफ कहते हैं कि दुर्योधन अधर्म का वृक्ष है। कर्ण उसका तना है। यह बहुत इंपॉर्टेंट है समझने के लिए। यह वेदव्यास जी स्वयं कह रहे हैं। धृतराष्ट्र उसकी जड़े हैं। ऐसी लाइनें लिखी हुई है उसमें। ये लाइनें
Speaker A
महाभारत की शुरुआत में ही लिखी हुई है। ये ये बफरकेशन साफसाफ किया हुआ है। और धृतराष्ट्र उसकी जड़े हैं। शकुनी उसकी टहनियां हैं और शकुनी और दुशासन उसकी टहनियां हैं। तो आप जो आपने जो प्रश्न पूछा उसका सबसे इंपॉर्टेंट बात ये समझना
Speaker A
है कि कर्ण को हम लोग नॉर्मली क्या समझते हैं कि शकुनी सबसे बड़ा विलेन था महाभारत का। हम यह एक आम धारणा लोगों में बनी हुई है। जबकि यह धारणा बिल्कुल ही मतलब मैंने जितना अध्ययन किया है उसके आधार पर
Speaker A
निराधार है। शकुनी का मुख्य काम द्वित क्रीड़ा में आता है। और उसके अलावा दो चार जगह वो सलाह देता हुआ दिखा है। बस उसके अलावा शकुनी कहीं भी मेन कैरेक्टर नहीं है। ये जो सारी बैकग्राउंड की उसके परिवार
Speaker A
को मार दिया, वो कर दिया वो सारी बैकग्राउंड कहानियां महाभारत में कम से कम नहीं है। लेकिन बाहर तो चर्चा शकुनी की ही होती है। हर एक जगह शकुनी मामा कहीं अर्जुन भाई या युधिष्ठिर भाई ऐसा कुछ नहीं बोलते।
Speaker A
तो अब हम जब इस पे आ गए इस विषय पे तो पहले हम इसी विषय पे चर्चा कर लेते हैं। मैंने भी एक पडकास्ट देखा था और एक सज्जन है बहुत अच्छी-अच्छी बातें भी करते हैं। लेकिन उनका पडकास्ट एक देखा था अक्षत
Speaker A
गुप्ता नाम है शायद उनका। जी जी वो दो बातें कहते हैं। एक तो कि शकुनी के पूरे परिवार को भीष्म ने मार डाला और इसलिए शकुनिया ने अपने पिता के हड्डियों से पासे बनाए और उसी से ही दूत क्रीडा की
Speaker A
थी। दूसरा वो कहते हैं वो अभी लेटेस्ट मैंने देखा है उनका जिस पर मुझे बहुत ही घोर आपत्ति है। मैं नाम ले बोल रहा हूं ताकि ये बात उन तक पहुंचे और मैं चाहता हूं कि वो इस बात का जवाब दें। वो
Speaker A
[नाक से की जाने वाली आवाज़] कहते हैं कि अगर ये इस युद्ध में कौरव जीत गए होते तो आज जो श्री कृष्ण को की हम जैसे पूजा करते हैं वैसे शकुनी की पूजा करते। इतनी बड़ी मतलब वो बहुत बुद्धिमानी की बात करते हैं।
Speaker A
बहुत अच्छा काम भी कर रहे हैं। लेकिन वो ऐसी गलती कैसे कर सकते हैं और ऐसी बात कैसे कर सकते हैं? ये बिल्कुल ताज्जुब की बात है। मैं शकुनी की बात आपको बताता हूं। एक कॉमन सेंस की बात है। एक मूर्ख से
Speaker A
मूर्ख राजा भी जिसके परिवार को उसने मरवा दिया हो उसको घर में बिठा के रखेगा कि तुम बड़े हो जाओ और बदला लो। हम एक छोटी सी फिल्म में कहानी देखते हैं कि अगर आपने किसी के साथ किया है तो उसको जितना दूर
Speaker A
रखे या उसको पूरा खत्म कर दो। जिस जगह पर कृपाचार्य भीष्म द्रोणाचार्य कणिक विदुर जैसे लोग हो अगर शकुनी के पूरे परिवार को मरवा डाला तो शकुनी को लाके घर में रखा कि बेटा तुम बड़े हो जाओ मेरे
Speaker A
बच्चों को के मन में जहर डालो और बदला लो बड़ा होके। इतने मूर्ख लोग थे वो। तो आप तर्क के हिसाब से ये बात नहीं आती कहीं भी। एक सिंपल सामान्य तर्क है। अब आते हैं ग्रंथ के हिसाब से। महाभारत में यह साफसाफ
Speaker A
लिखा हुआ है कि शकुनी का पूरा परिवार द्रोपदी स्वयंवर के समय मौजूद था। राज सुयज्ञ के समय मौजूद था। शकुनी के भाई महाभारत युद्ध में शामिल थे और मेरे ख्याल से 16व दिन या 14व दिन अर्जुन के साथ माया
Speaker A
युद्ध करते हुए उसके भाई मारे गए थे। तो ये साफसाफ यह महाभारत कहता है कि शकुनी का पूरा परिवार जीवित था। कहीं ऐसा नहीं लिखा है कि जबरदस्ती किया गया था या उसने हड्डियों से ऐसा बनाया था। ये सब मनगढ़ंत
Speaker A
कहानियां है वो सिर्फ झूठ क्रीडा में निपुण था। जैसे आज भी हम जानते हैं कितने लोग कि वो होते हैं वो निपुण कि आप उसके उनके साथ जीत नहीं सकते। बस यही बात थी। तो ये तो बात हो गई शकुनी की। एक और बात
Speaker A
जो शकुनी के बारे में बहुत लोग नहीं जानते। शकुनी ने लोग समझते हैं कि शकुनी विलेन था। वही हमेशा दुर्योधन कोगेट करता था। दुर्योधन स्टैंड अलोन विलेन था। वेदव्यास जी उसको अधर्म का वृक्ष ऐसे ही नहीं कहते। वो जो भी करता था अपनी इच्छा से करता था।
Speaker A
उसका सबसे बड़ा सलाहकार कर्ण था। दूसरा सलाहकार शकुनी था और तीसरा सलाहकार था दुशासन और इनको महाभारत में दुष्ट चतुष्ठय कहा गया है। आज जो हम चांडाल चौकड़ी जो शब्द सुनते हैं ये इन चारों के कारण ही बना है।
Speaker A
ये चारों के कारण शकुनी ने फिर भी महाभारत में जब गंधर्व युद्ध के बाद जब दुर्योधन का अपहरण कर लिया था गंधर्वों ने और तब युधिष्ठिर के कहने पर अर्जुन और भीम ने उसको छुड़ाया था। उस समय शकुनी ने जब
Speaker A
दुर्योधन बिल्कुल पागल हो गया कि भाई जिनको मैं जिंदगी भर मारना चाहता था खत्म करना चाहता हूं उनके हाथ से मेरे मुझे जीवन दान मिला है इससे तो अच्छा है कि मैं मर जाऊं वो प्रायश्चित नहीं कर रहा है
Speaker A
उसके मन में ये नहीं रहा है आ रहा है कि मैं उनके उपकार का बदला चुकाऊं उसके मन में ये आ रहा है कि मैं आत्महत्या कर दूं ऐसे जीवन से अच्छा है तो शकुनी समझाता है कि यह सही अवसर है कि उन्होंने तुम पर
Speaker A
उपकार किया है अब उनसे समझौता कर लो यह जो विरोध है यह त्याग दो यह शकुनी है जो एक बार कम से कम उसको समझाता है। ठीक उसी समय कर्ण आता है वहां पे जो भाग गया था गंधर्व युद्ध में अपना मित्र जिसको वह
Speaker A
सबसे बड़ा मित्र सबसे बड़ा लॉयल कहता था उनके सामने और गंधर्वों के के राजा चित्रसेन भी नहीं आए थे साधारण गंधर्वों के सामने वो युद्ध में दो बार आया उसमें बहादुरी दिखाई लेकिन वो नहीं जीत पाया और भाग गया था वहां से उस जगह पे कर्ण आता है
Speaker A
और कर्ण कर्ण ये बोलता है दुर्योधन को कि ये पांडव तो तुम्हारी प्रजा है अब तुम राजा हो और प्रजा का काम है राजा की रक्षा करना तो अगर उन्होंने तुम्हारी जीवन दान दे दिया तुम्हें बचा लिया तो कौन सी बड़ी
Speaker A
बात हुई तो कर्ण वहां भी उसको समझौता करने से मना करता है पूरे महाभारत में अगर कोई एक आदमी था बहुत सारे लोग कहते हैं कि महाभारत युद्ध का द्रोपदी महाभारत युद्ध के लिए जिम्मेदार थी बहुत सारे लोग
Speaker A
अलग-अलग कारण बताते हैं युधिष्ठिर ने जुआ खेला मैंने जो अध्ययन किया है वि नो ऑफेंसेस आप किताब कर सकते हैं अगर कोई एक आदमी इस युद्ध का जिम्मेदार था तो वो था कर्ण दुर्योधन के पास एक कारण था। कम से
Speaker A
कम उसको सत्ता चाहिए थी। उसको लालच था, ईर्ष्या था कि भाई मेरे भाई मुझसे ऊपर ना बढ़े। मेरे परिवार में कोई खानदान में मुझसे ऊपर ना बढ़े। उसके पास एक कारण था। कर्ण के पास एक ईर्ष्या के कारण यह अर्जुन
Speaker A
मुझसे बड़ा कैसे धनुर्धर कैसे हो सकता है? सिर्फ एक ईर्ष्या के कारण उसने पूरे आर्यावर्त को पूरे भारतवर्ष को युद्ध में झोंक दिया। क्योंकि दुर्योधन का एकमात्र सहारा कर्ण था। वह युद्ध से पहले जानता था कि भीष्म उसकी माता ने भी बताया, उसके
Speaker A
पिता ने भी बताया, विदुर जी ने भी बताया। सबने बताया कि भीष्म जितना तुमसे प्रेम करते हैं उतना पांडवों से करते हैं। द्रोण, कृपाचार्य सब जितना तुमसे प्रेम करते हैं उतना पांडवों से करते हैं। वो कभी भी उनके विरुद्ध पूरे मन से युद्ध
Speaker A
नहीं करेंगे। वो भी जानता था। दुर्योधन भी जानता था। सिर्फ एक आदमी था जो हमेशा कहता था कि तुम युद्ध करो ना। मैं सबको मार डालूंगा और जिस पर भरोसा था दुर्योधन को और वो आदमी था कर्ण। अगर कर्ण अपना हाथ
Speaker A
पीछे खींच लेता तो इतने लोगों का नरसंहार बच सकता था लेकिन उसने नहीं किया। अब आप अगर कर्ण के बारे में और प्रश्न पूछना चाहते हैं तो मैं एक सिंपल सी आपको एक मैं एक उदाहरण एक दो राजकुमारों की
Speaker A
कहानी में आप आगे पूछेंगे ही कि भाई अर्जुन बड़ा या कर्ण बड़ा कर्ण के साथ क्या अत्याचार हुआ? कैसे हुआ? पहले हम इसी मुद्दे को निपटा लेते हैं। जी जी आप इमेजिन कीजिए एक बच्चा एक नाजायज औलाद एक मां के गर्भ से पैदा
Speaker A
हुआ। मतलब नाजायज शायद सही शब्द नहीं है लेकिन असमय पैदा हुआ। मां ने उसको पिटारी में डाल दिया और उसको पानी में बहा दिया। बच्चा अभी-अभी पैदा हुआ है। उसको कोई बोध नहीं है कि उसके साथ क्या हो रहा है। वो पानी में गया। महाभारत
Speaker A
में साफसाफ लिखा हुआ है कि अधिरथ ने अपने सेवकों से वो देखा पिठारी बहता हुआ नदी में तो अपने सेवकों से वो निकलवाया। मैं एक एक वर्ड पे जोर दे रहा हूं उसप ध्यान दीजिएगा। जी और निकलवाया और उसमें देखा फिर अपनी पत्नी
Speaker A
की गोद में दिया तो पत्नी को दूध उतर आया तो उन्होंने रखा। उसके बाद ब्राह्मणों ने उसके शरीर पर कवच और कुंडल देखकर ब्राह्मणों ने उसका नाम वसुसेन रखा। वसु का अर्थ स्वर्ण होता है। अब बिगिनिंग में ही दो बातें आती है। एक जो कर्ण को कहा
Speaker A
जाता है कि [नाक से की जाने वाली आवाज़] दलित पीड़ित शोषित। तो अगर अधीर ने सेवकों से उसको निकलवाया तो वो दलित कैसे हुआ?
Speaker A
पीड़ित कैसे हुआ? शोषित कैसे हुआ? मतलब वो समृद्ध व्यक्ति रहा होगा। उसके बाद ब्राह्मणों ने उसका नामकरण किया। तो इसका भी कारण है कि तय है कि वह कोई नीच जाति का नहीं होगा। नीच जाति का होता तो
Speaker A
ब्राह्मण उसका नामकरण कैसे करते? अब आते हैं हम सूत पे। लोग कहते हैं कि सूत पुत्र कह के पहले मैं कहानी आपको बता दूं राज वो आया वहां पे दो लोगों ने उसको रखा पाला पोसा। अपने मां-बाप से अधिक प्यार दिया।
Speaker A
ये वो दोनों भी कहते हैं और कर्ण स्वयं भी स्वीकार करता है वो कि उसको कहीं भी प्रेम में उसके जीवन में कहीं कोई कमी नहीं रही। वो एक गुरु के यहां आया। उसको धनुर विद्या की शिक्षा मिली। वहां एक दूसरा जो था उससे
Speaker A
10 साल छोटा था। हमको यह कभी नहीं भूलना चाहिए। महाभारत पर चर्चा करते समय कर्ण और अर्जुन की तुलना करते समय कि अर्जुन कर्ण से कम से कम आठ से 10 साल छोटा था। जब द्रोणाचार्य के गुरुकुल में दोनों मिले तो
Speaker A
उस समय अर्जुन 15 16 साल का होगा तो वो 25 26 साल का 24 से 26 साल का था। आप हमेशा तुलना करते समय ये एज का ध्यान रखिएगा ये उम्र का। वहां उसने देखा कि मेरा गुरु ने
Speaker A
बता दिया है कि मैं तुमको सबसे बड़ा धनुर्धर बनाऊंगा। और उसके मन में हमेशा से था कि मुझसे बड़ा धनुधर दुनिया में कोई नहीं है। अर्जुन तो हां उन्होंने बोल दिया कि अर्जुन बनेगा सबसे बड़ा धनुर्धर। क्यों वो भी मैं आगे
Speaker A
बताऊंगा आपको। फिर वो वहां से त्याग के चला गया। वो आश्रम की जब गुरु ने ही बोल दिया है। गुरु का तो मेरे ऊपर ध्यान ही नहीं है। वो चला गया एक दूसरे गुरु के पास। वहां उसने झूठ का सहारा लेकर उनसे
Speaker A
शिक्षा ली। शिक्षा प्राप्त किया। लेकिन अंत में गुरु को पता चल गया कि यह जो विद्यार्थी है यह गलत बोल के मेरे पास आया है। तो उन्होंने उसको श्राप दिया। उसके पहले भी एक जगह उसको श्राप मिला था। जब
Speaker A
उसने अनजाने में एक गाय के बछरे को मार डाला था तो उसके पालक ने श्राप दिया था। वहां भी एक जानने वाली बहुत महत्वपूर्ण बात है कि जिसने जब गाय के बछे को उसने मार दिया था गलती से। तो वो जब उसको श्राप
Speaker A
देने लगता है तो बोलता है तुम्हें कितना धन चाहिए। मैं तुम्हें धन दे सकता हूं। तुम्हें यह दे सकता हूं। तो बोलता है तुम धन से खरीदना चाहते हो यह कि तुमने गौ हत्या की है या की है तो वह तो श्राप देता
Speaker A
है कि अंतिम समय में तुम भूल जाओगे जो भी विद्या है वो उसका श्राप था उसको वहां से वो आता है रंगभूमि में और फिर वहां पे वो अपनी कलाएं दिखाता है मैं रंगभूमि की चर्चा बाद में डिटेल में
Speaker A
करूंगा बहुत इंपॉर्टेंट है वो वहां वो दिखाता है वहां दुर्योधन उसको वापस जो बचपन से उसको जानता था दुर्योधन देखता है कि अब तो ये महान धनुर्धर हो गया इसने जो दूसरे राजकुमार ने जितना दिखाया उतना इसने भी दिखाया है तो वो गले लगा
Speaker A
लेता है और एक संयोग आने पर उसको राजा बना देता है। उस समय से राजा बनने से जब वह बना उस समय से जीवन के अंत तक वो राजा ही रहा। पूरे सुख में जब तक वो मृत्यु को
Speaker A
प्राप्त नहीं हुआ। कम से कम भौतिक सुख सुविधाओं में जीवन में जो भी होता है उसको कभी कोई कष्ट नहीं हुआ। मैं दूसरे राजकुमार की कहानी सुनाता हूं आपको। एक तो आपने एक राजकुमार की कहानी सुन ली। दूसरा
Speaker A
राजकुमार वन में पैदा हुआ। वन में जब पांडु और कुंती वन में ही थे जब निर्वास तो तब वह पैदा हुआ सात आठ साल का होगा तब उसके पिताजी गुजर गए फिर वो अपने चाचा के यहां आया रहने जो राज्य उनका था लेकिन फिर
Speaker A
भी वहां उनको इस तरह से बिगिनिंग में रखा गया जैसे वो कोई नहीं निरंतर उन पे उनके भाई को भीम को मारने के लिए दो बार प्रयत्न किया गया तो आप समझ सकते हैं आप देखिए ऊपर से कहानियां समझने में बहुत
Speaker A
आसान है लेकिन आप साइकोलॉजी में जाइए आप एक 8 10 साल का बच्चा और उसके 12 13 साल के भाई को मार मारने का प्रयत्न किया जा रहा है। उनके साथ हमेशा ऐसा व्यवहार किया जा रहा है। वो कोई नहीं है वहां पे। इस
Speaker A
वातावरण में पला बढ़ा। लेकिन फिर अपनी योग्यता से गुरु को उसने अपनी योग्यता दिखाई। तब द्रोणाचार्य जैसा आदमी जो द्रुपद अपने मित्र के खिलाफ उसने इतना बड़ा प्रण ले लिया कि मैं तुमको मार डालूंगा। तुम्हारा खत्म कर दूंगा। उसका
Speaker A
राज्य छीन लिया। आप समझ सकते हैं कि वो कैसे चरित्र के होंगे। वो अपने पुत्र को जिसके पुत्र के लिए उन्होंने इतना कुछ किया था उससे बड़ा धनुर्धर अर्जुन को मनाने का वचन दिया तो उसमें जरूर कोई ना
Speaker A
कोई गुण होगा और अर्जुन कोई राजा का बेटा भी नहीं था उस समय धृतराष्ट्र राजा थे धृतराष्ट्र का पुत्र तो दुर्योधन था तो एक कायदे से उनको उस पर ज्यादा ध्यान आना चाहिए लेकिन फिर भी अर्जुन में इतनी
Speaker A
विनम्रता थी इतना लगन था कि उनको लगा कि मतलब ये होता है ना गुरु को दिखता है कोई कि ये बच्चा है जिसमें जिसको मैं सब कुछ सिखा है कुछ सिखा दो। तो वो घटनाएं भी महाभारत में दिखाई गई है कि क्यों वो
Speaker A
चिड़िया की आंख वाली घटना है। उसके अलावा रात में अभ्यास कर रहा था अर्जुन। तो उसने अपने गुणों से जीता। ऐसा नहीं किसी अधिकार से नहीं जीता। अपने गुणों के कारण अपने गुरु का जीता। उसके बाद बड़े भाई को
Speaker A
अलग-अलग परिस्थितियों में राजा युवराज बनाया गया। लेकिन जब युवराज बना दिया गया तो फिर उनको लाछागरी में भेज के फिर उनको जलाने का प्रयत्न किया गया। वहां से फिर वो वन वन मारे मारे फिरते रहे। लेकिन फिर उन्होंने पराक्रम किया उस राजकुमार ने और
Speaker A
स्वयंवर में द्रोपदी को जीता। फिर वो लोग खड़े हुए। अपने दम पर उन्होंने अपना एक साम्राज्य बनाया। उनको एक खंडहर जैसा राज्य दे दिया गया था। इंद्रप्रस्थ जो पूरा दसियों से घिरा हुआ था। वहां उन्होंने अपना राज्य वापस स्थापित किया।
Speaker A
दिग्विजय की पूरे संसार में अपने बाहुबल से अपने पराक्रम से दादा पिताजी के नाम पर नहीं। सब कुछ हासिल किया। फिर एक आदमी के मन में ईर्ष्या हुई। उसने छल से दत क्रीड़ खेल के उनको यह पराया उनको हराया और 13
Speaker A
साल के लिए वनवास भेजा फिर 13 साल वह वन वन भटकते रहे लास्ट के एक साल 13 साल में अज्ञातवास में आप जिनके पिता पांडु थे जिनके दादा शांतनु भीष्म थे और जिनके चाचा अभी भी हस्तिनापुर के सम्राट हैं वो नौकर की तरह नपुंसक बनकर
Speaker A
अज्ञातवास में एक साल बिताए इस उम्मीद में कि शायद इसके बाद हमको न्याय मिलेगा लेकिन उसके बाद भी उनको न्याय नहीं मिला उसके बाद भी उनको पूरे परिवार का रक्त बहाने के बाद उनको अपना स्थान मिला। तो आप
Speaker A
बताइए कि दोनों में किसकी जीवन किसका जीवन ज्यादा कठिन था? हम हमेशा ये कहते हैं लोग नॉर्मली ये मानते हैं कि कर्ण के साथ बहुत अत्याचार हुआ। बहुत अन्याय हुआ। आप ये जो दोनों घटनाएं जो मैंने बनाई है उसमें आपको कोई
Speaker A
विरोधाभास लग रहा है। कोई झूठ लग रहा है कि मैं कुछ आपकी अपनी-अपनी अवधारणा है। अपने हिसाब से नहीं मैं अवधारणा की बात नहीं कर रहा हूं। मैं यह कह रहा हूं कि मैंने जो कहानी सुनाई वो असत्य नहीं है।
Speaker A
नहीं वो आपने किताब के हिसाब से जो जो सुनाई उसके हिसाब से आपको किसका जीवन अच्छा लग रहा है?
Speaker A
किसका जीवन कष्ट में लग रहा है? किसका जीवन आपको लग रहा है कि ये सुखमय सुविधा में पला भरा है। एक बच्चा उसको पानी में बहा दिया। बच्चे को क्या पता? स्वयं कर्ण ने महाभारत में कहीं अपने आप को विक्टिम
Speaker A
नहीं बताया है और आज सारी दुनिया उसको विक्टिम बताने में लगी हुई है। सिर्फ एक जगह जब अपनी मां से मिलता है तब वो शिकायत करता है। उसके अलावा उसने कहीं अपने आप को विक्टिम नहीं बनाया है। लेकिन लेकिन कभी एक्सेप्ट भी नहीं किया ना
Speaker A
कि हां मेरी मां है तो मैं उसके हिसाब से पांडवों का साथ दूं। कहीं ना कहीं लोगों की यह भी अवधारणा है कि वो चाहता तो पांडवों का साथ दे सकता था वो लेकिन दुर्योधन का साथ दिया उसने। वो जब पता
Speaker A
उसको चला उसको पता ही तब चला जब कि युद्ध होने वाला था उस समय उसको पता चला मैं उस पर भी आऊंगा अब मैं आपको कर्ण के चरित्र के अलग-अलग पहलू बताता हूं जो सबसे बड़ा एक मतलब असत्य कहा जाता है
Speaker A
कि उसको द्रोणाचार्य ने जाति के आधार पर शिक्षा नहीं दी ये पूरी तरह से 100% असत्य है। उसने खुद कहा है कि मैंने द्रोणाचार्य और परशुराम दोनों से शिक्षा प्राप्त की की है और मतलब दूसरों के द्वारा कहा गया है
Speaker A
कि वो कृपाचार्य द्रोणाचार्य और परशुराम तीनों का शिष्य रह चुका है। तो जैसा कि मैंने पहले आपको बताया कि एक गुरु देख लेता है कि अगर 8 10 साल बड़ा लड़का एक छोटे से बच्चे से ईर्ष्या कर रहा है तो वो
Speaker A
समझ जाता है गुरु कि मतलब इसका क्या आगे होने वाला है और ये कैसा उसकी मानसिकता है। तो उन्होंने सब कुछ उसको सिखाया ब्रह्मास्त्र की शिक्षा नहीं दी और यह वचन दे दिया अर्जुन को कि मैं तुमको सबसे
Speaker A
दुनिया में सबसे बड़ा धनुर्धर बनाऊंगा तो उसको लगा कि अब मेरी यहां जैसे एक यूनिवर्सिटी में अगर कोई टॉपर है तो वो उसको लगा कि अब मेरी यहां दाल नहीं गलने वाली है तो मैं दूसरे यूनिवर्सिटी में जाता हूं तो वो दूसरे गुरु के पास गया और
Speaker A
वहां उसने शिक्षा प्राप्त की जहां गुरु ने उसको लगनशील था मेहनती था सब कुछ था ऐसा नहीं है कि वो मेहनती नहीं था या उसमें दूसरी कोई कमी थी तो उसने अपने गुरु को प्रभावित किया गुरु ने उसको को शिक्षा दी
Speaker A
सब कुछ सिखाया लेकिन गुरु कांत में पता लगा कि ये तो झूठ बोल रहा था मुझसे तो उन्होंने उसको श्राप दिया केवल इतना दिया कि भाई तुम जब जरूरत पड़ेगी तब भूल जाओगे ऐसा नहीं कि सारी विद्या छीन ली तो उसके
Speaker A
बस और परशुराम द्रोण से भी बड़े गुरु थे द्रोण खुद परशुराम से शिक्षा ले आए थे और उसने जहां से शिक्षा ली थी वो कोई छोटी मोटी जगह नहीं थी उस समय भारत के सबसे बड़े गुरु थे परशुराम जिससे उन्होंने
Speaker A
शिक्षा ली थी कर्ण ने। अब हम आते हैं रंगभूमि पे जो सबसे ज्यादा जो असत्य बताया जाता है एक तो कि द्रोण ने उसको शिक्षा नहीं थी। दूसरा कि रंगभूमि के बारे में कहा जाता है कि वहां उसका जाति के नाम पर
Speaker A
अपमान किया गया सूतपुत्र कह के। रंगभूमि में क्या हुआ था? हम लोग रश्मिरथी इतनी मतलब अद्भुत रचना है। मैं ब्राह्मणधारी सिंह दिनकर जी को प्रणाम करता हूं। इतना अद्भुत लिखा है लेकिन उसमें भी पूरा सत्य नहीं लिखा है।
Speaker A
रंगभूमि में मैं क्षमा चाहता हूं। ये बहुत मतलब बहुत बड़ी बात कह रहा हूं मैं। लेकिन जो मैं वेदव्यास जी अगर मेरे सामने आए तो मैं रामधारी सिंह दिनकर जी को से वेदव्यास जी को ऊपर रखूंगा। निश्चित रूप से जो
Speaker A
उन्होंने किया रंगभूमि में जब सब प्रदर्शन हो गया। सबसे पहले ये समझ लेना चाहिए कि रंगभूमि था क्या? रंगभूमि का जो था जैसे कॉलेज में आपने पढ़ा एक राजा के बच्चे अगर किसी कॉलेज में पढ़ रहे हैं तो कॉलेज पूरा हुआ
Speaker A
तो राजा के बच्चों का प्रदर्शन हो रहा है कि कौन किस कला में सबसे आगे सिर्फ राजा के बच्चों के लिए था स्वयं गुरु द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा जो उस गुरुकुल के शिष्य थे श्री कृष्ण के पुत्र प्रद्युम भी उस
Speaker A
गुरुकुल के शिष्य थे सातिकी उस गुरुकुल का किसी ने भाग नहीं लिया सिर्फ कौरव और पांडव धृतराष्ट्र और पांडु के पुत्र उसमें हिस्सा ले रहे थे तो और किसी का उसमें योगदान नहीं था और वो प्रदर्शन मात्र था।
Speaker A
उसमें जब भीम और दुर्योधन जब प्रदर्शन कर रहे थे तो जब उनकी बढ़ने लगी जब ऐसा लगा कि दोनों एक दूसरे को मतलब चोट पहुंचा सकते हैं तो गुरु द्रोण ने तुरंत अश्वत्थामा को भेज के वो बंद करवा दिया।
Speaker A
इसका मतलब साफ था कि वहां कोई युद्ध नहीं हो रहा था। वो एक प्रदर्शन का मंच मात्र था। जब सारा प्रदर्शन हो गया उस समय कर्ण वहां आता है। और पूरा लिखा हुआ है पूरा जैसे आजकल फिल्मी ट्रीटमेंट होता है वैसा
Speaker A
लिखा हुआ है कि पूरा द्वार तोड़ के धरती हिलने लगी। ऐसा होने लगा और तब कर्ण वहां आता है और उसने बोला कि जो तालियां बज रही है लोग आप लिटरली हर वर्ड मत पकड़िएगा लेकिन जो लिखा हुआ है मूल भावना कि उसने
Speaker A
बोला कि इसने जो दिखाया है वो मैं खुद दिखा सकता हूं। आप कभी भी ये भूलिएगा मत 10 साल का आठ साल का जो एज डिफरेंस है दोनों में उसने बोला कि जो अर्जुन ने दिखाया वो मैं दिखा सकता हूं। ये ध्यान
Speaker A
रखने वाली बात है कि यहीं से सारी बातें शुरू होती है जो असत्य फैलाई जाती है कि पहले उसकी जाति पूछी फिर यह ऐसा कुछ नहीं हुआ था। वो आया और उसको तुरंत गुरु द्रोण ने अनुमति दे दी कि तुम जो चाहो तुम दिखा
Speaker A
सकते हो। तो उसने सारा प्रदर्शन किया। अर्जुन ने जो जो करतब किए थे जो जो किया था सब उसने करके दिखा दिया। अर्जुन से कम समय में करके दिखा दिया। पूरा तालियां बजने लगी सब जगह। उसी समय दुर्योधन ने आके
Speaker A
उसको गले से लगा लिया। बोला ये तो मुझे मिल गया क्योंकि अभी तक उसको भीम को लगता था कि वो मेरे बराबर का योद्धा है। बाकी किसी को वो गिनता नहीं था। एक अर्जुन का लग रहा था कि ऐसा धनुर्धर मेरे भाइयों में
Speaker A
कोई नहीं है। तो उसको लग गया कि ये और बचपन से दोनों एक दूसरे को जानते थे। ये साफसाफ महाभारत में लिखा हुआ है कि दोनों की दोस्ती बचपन से थी। बचपन से थी। अधिरथ ने क्योंकि वो धृतराष्ट्र का धृतराष्ट्र का मित्र बताया
Speaker A
गया अधिरथ को। तो अधिरथ ने उसी समय उसको कर्ण को शिक्षा दीक्षा के लिए जैसे हम भेजते हैं किसी अपने परिचित के पास भेज दिया था। तो वो शुरू से ही जानता था वो। तो दुर्योधन ने उसको गले लगा दिया। ये
Speaker A
सारे फैक्ट बहुत इंपॉर्टेंट है जो छुपाया जाता है जो कभी बताया नहीं जाता है। तो दुर्योधन ने उसको गले से लगा लिया। उस समय उसने तुरंत मांग कर ली कि मैं अर्जुन के साथ द्वंद युद्ध करना चाहता हूं। अब
Speaker A
द्वंद युद्ध का क्या मतलब होता है कि जब तक दोनों में से एक मरेगा नहीं तब तक वो युद्ध चलता रहेगा। आप इमेजिन कीजिए कि कॉलेज के फेस्ट में अचानक एक आदमी गन निकाल ले और एक आदमी एक साधारण समझिए कि
Speaker A
एक दो चार 500 करोड़ के आदमी है और दूसरा एक हजार करोड़ राजा का बेटा है या वहां का बेटा है वो बोल रहा है कि चैलेंज कर रहा है कि अगर मैं तुम अगर मैं तुमसे ज्यादा काबिल काबिलियत रखता हूं और जब तक दोनों
Speaker A
में से एक मरेगा नहीं आवाज मार लो। तो द्वंद युद्ध का मतलब है कि जब तक दोनों में से एक मारा नहीं जाता तब तक युद्ध चलता रहेगा। तो अब एक ने चैलेंज किया। अब इस पर डिस्कशन होने लगा कि वह किसी को
Speaker A
अधिकार है कि नहीं उसको चैलेंज होने का। फिर भी अर्जुन ने उसको बोला कि अभी मैं अगर तुम्हारे अंदर यही क्षमता है तो देखो अभी मैं तुम्हारा सर काट के जमीन पे गिरा दूंगा। आ जाओ। वो तैयार था उसके लिए और
Speaker A
गुरु द्रोणाचार्य ने भी अनुमति दे दी थी। ये बातें आपको नहीं बताई जाती। द्रोण ने भी अनुमति दे दी थी और किसी ने विरोध नहीं किया था। जब दोनों आमने-सामने आकर खड़े होने वाले थे उस समय कृपाचार्य सामने आए।
Speaker A
जो कुल गुरु थे कृपाचार्य पांडवों के यहां पले भरे थे। द्रोण बाहर से आकर शिक्षा दे रहे थे। लेकिन यह चीजें जानना बहुत जरूरी है कि कृपाचार्य को महाराज सांतनु लेकर आए थे तो उनके घर के सदस्य की तरह ही थे।
Speaker A
उनको अपने परिवार को भी बचाना था। उनके लिए वो परिवार था। वो सिर्फ गुरु मात्र नहीं थे कृपाचार्य। तो उस समय वो सामने आकर पूछते हैं और वो कर्ण को बोलते हैं कि राजकुमार आप ध्यान दीजिएगा हीन कुल नीच
Speaker A
कुल और हीन आचार विचार वाले व्यक्तियों के साथ द्वंद युद्ध नहीं कर सकते। तुम यह बताओ कि तुम कौन हो? अब इसमें जो सबसे इंपॉर्टेंट जानने वाली बात है कि कर्ण उनका शिष्य रह चुका है। द्रोणाचार्य के दोनों मिलकर सिखाते थे द्रोणाचार्य और
Speaker A
कृपाचार्य। बचपन से वो जानते थे। वह जानते हैं कि यह किसका कुत्ता है। यह किसका कुल है। फिर भी वह क्यों पूछ रहे हैं? एक कि एक तो यह अवसर नहीं है कि हम यह द्वंद युद्ध करें। मारकाट करने की ये जगह नहीं
Speaker A
है। दूसराकि हम हर बात में जाति ढूंढने की हमारी आदत हो गई है तो हम सिर्फ नीच कुल पर जाते हैं। हमने उन्होंने जो सेकंड वाक्य बोला हीन आचार व्यवहार वाला हम उस पर ध्यान ही नहीं देते। उसको नेगलेक्ट कर
Speaker A
देते हैं। जबकि उनका मूल आशय यही है। हम जैसे कोई कहावत बोलते हैं कि कुत्ता और बिल्ली दोनों ऐसा करेंगे या शेर और बकरी एक गाय पे तो आप केवल बकरी पकड़ लीजिए। शेर छोड़ दीजिए क्योंकि आपका मोटिव बकरी
Speaker A
पे होता है कि बकरी तो ये वैसा ही वैसे ही वाली बात है। जब वो जानते हैं उसका कुल फिर भी क्यों पूछ रहे हैं?
Speaker A
वो एक्चुअली वो कह रहे हैं कि यह हीन आचार व्यवहार ये जो तुम्हारा व्यवहार है यहां पे यहां पे स्वर प्रदर्शन का मंच है। तुमको प्रदर्शन करने से किसी ने नहीं रोका। तुमने कर दिया। बात खत्म हो गई। तो
Speaker A
अब तुम मरने मारने की बात क्यों कर रहे हो? इसीलिए उसको वो हीन आचार व्यवहार का बता रहे हैं और वो पहले भी उसका चरित्र जानते थे। महाभारत में कई जगह यह भी लिखा हुआ है। इसकी पूरी मतलब प्रमाणिकता के साथ
Speaker A
नहीं कह सकते क्योंकि एक दो जगह आके फिर चला जाता है कि भीम को विष देने में भी कर्ण उस समय भी शामिल था। साथ ही था। लेकिन यह एक जगह कहीं लिखा हुआ है। हर जगह नहीं लिखा हुआ है। तो इस को पूरी
Speaker A
प्रमाणिकता के साथ नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह पूरी प्रमाणिकता के साथ कहा जा सकता है कि कृपाचार्य जानते थे कि वो कौन है। तो उसके बाद जब उन्होंने पूछा तब उस समय कर्ण ने उसको बोला कि ठीक है अगर
Speaker A
राजकुमार ही राजकुमार को ये कर सकता है तो मैं इसको अंग देश का राजा बनाता हूं। अब यहां दूसरी महत्वपूर्ण बात है उस समय भीम ने उसका उपहास उड़ाया था सूतपुत्र कह के कि यह सूतपुत्र आप देखो चीजों को फिर वही
Speaker A
हम ऊपर ऊपर से समझेंगे तो नहीं समझ पाएंगे। आप एक बड़े भाई हो। आप एक कॉलेज फेस्टिवल में गए हो। आप ओलंपिक में गए हो और अचानक एक आदमी खड़ा हो के बोलेगा कि मैं आपके छोटे भाई को मार दूंगा
Speaker A
या मैं मारने तक युद्ध करना चाहता हूं। तो आप आपका रवैया क्या होगा? और भीम वैसे भी उदंड था। अगर पांडवों में कोई था जो बोलने में रुकता नहीं था तो वो भीम था। वो उसका स्वभाव था। वो उसका नेचर था। वो वैसा ही
Speaker A
था। लेकिन वो अवज्ञा नहीं करता था। वहां उसने उसको कहा कर्ण को। तब वहां पर अर्जुन दुर्योधन ने उसको बोला कि मैं इसको अंग देश का राजा बनाता हूं। अब फिर एक महत्वपूर्ण बात यह है जिसको सब नेगलेक्ट कर देते हैं कि अगर
Speaker A
वो नीच कुल का था, अगर वो छोटी जाति का था तो उसको राजा बनाने का विरोध किसी ने क्यों नहीं किया? ना कृपाचार्य ने किया, ना द्रोणाचार्य ने किया, ना भीष्म पितामह ने किया, ना विदुर ने किया। जो विदुर हर
Speaker A
बात में दुर्योधन का मतलब उसकी हर बुरी बात का विरोध करने लगे। उन्होंने भी विरोध नहीं किया। अगर वह छोटी जाति का था तो छोटी जाति के आदमी को कैसे वह राजा बना सकता था?
Speaker A
तो हमको चीजों को सही ढंग से उस समय जब वो राजा उसका ब्राह्मणों ने आकर संस्कार किया उसके सर पर मुकुट पहनाया वहीं पर उसका अभिषेक हुआ। एक आदमी ने किसी ने नहीं रोका। लेकिन तब तक संध्या हो गई थी और ये द्वंद
Speaker A
युद्ध की बात आई गई हो गई। तो ये जो घटना है ना इसको लोग उल्टा कि वो आया और पहले उसकी जाति पूछी फिर उसको दिखाने दिया गया। ऐसे उसको ये बता के पूरी की पूरी घटना को उल्टा बना देते हैं। इसीलिए मैं बार-बार
Speaker A
कहता हूं कि हमको पढ़ना बहुत जरूरी है। हम स्वयं पढ़ेंगे तब समझ में आएगा कि सचमुच क्या लिखा हुआ है और लोग कैसे एक कॉइन फ्लिप करके कैसे कहानियों को घुमा लेते हैं। अब ये तो एक प्रसंग हो गया। फिर अब
Speaker A
कर्ण की बात कर ही रहे हैं। तो मैं आपको कर्ण के चरित्र का मैं एक बानगी दे देता हूं। लोग कहते हैं कि वो सबसे अच्छा मित्र था। हां दोस्ती की बात दोस्ती की बात जब भी आती है मेरे साथ किसी
Speaker A
ने ऐसे WhatsApp मैसेज आते रहते हैं कि दोस्ती है तो करण जैसी होनी चाहिए वो कैसा दोस्त है मैं आपको बताता हूं सॉरी अगर मैं कहीं-कहीं आज के लोगों को समझाने के लिए बहुत अगर क्रूड हो सकता है
Speaker A
इसके लिए मुझे फिर जो होता है कि कर्ण एक आर्मी आती है और वो बोलना शुरू कर देती है लेकिन मैं सबसे अनुरोध यही करूंगा कि कर्ण भी मेरे भी पूर्वज थे दुर्योधन भी मेरे पूर्वज थे और पांडव भी
Speaker A
मेरे पूर्वज थे मेरा मतलब मतलब और इतने जनरेशन पहले थे कि मेरा कोई उससे संबंध नहीं है। और अपने परिवार में दो लोग अलग-अलग होते तो पक्षपात आम बात है। कभी इसका साथ देना, कभी उसका साथ देना। तो जो है मैंने जो किताबों में पढ़ा है
Speaker A
मैं वही कह रहा हूं। आपको मेरी बात में कहीं भी लगे विसंगति है या मैं असत्य कह रहा हूं। आप किताब में आप उदाहरण देके मुझे बता सकते हैं कि मैंने आपने झूठ बोला है। आपने असत्य कहा है मैं क्षमा
Speaker A
मांगूंगा। देखिए कर्ण एक तो बचपन से जानते थे वो। फिर वो दुर्योधन का मित्र बना। दोनों की अगर बारीकी से अगर यह कहूं मैं अगर एक सेंटेंस में कहूं कि दोनों की मित्रता का आधार था अहंकार। दोनों एक दूसरे के अहंकार को पोषित करते
Speaker A
थे और यही उन दोनों की मित्रता का आधार था। श्री कृष्ण एक जगह कहते हैं महाभारत में ही कि मित्र वो होता है जो दो भाइयों में अपने भाइयों भाइयों में झगड़ा होता देखकर उनके बीच का झगड़ा शांत करवाता है।
Speaker A
ऐसी बातें बोलता है कि वो आपस में आ जाए। क्या कर्ण ने ऐसा कभी किया? उसी जगह पर वह दो और बातें मित्र के बताते के बारे में बताते हैं। मुझे तीनों श्लोक याद नहीं है। लेकिन उसमें से एक भी काम ऐसे ऐसा नहीं
Speaker A
किया कर्ण ने कि कभी भाइयों के बीच में झगड़ा हो या मेरा मित्र सही रास्ते पे चले। आपके हिसाब से कौन आपके अगर मान लीजिए दो मित्र हैं। एक मित्र है। आप कहीं गुंडागर्दी करने जा रहे हैं। किसी के साथ
Speaker A
बेईमानी करने जा रहे हैं। चोरी करने जा रहा है। एक बोलता है चलो ना मैं तो हूं तुम्हारे साथ। और एक बोलता है कि नहीं तुम गलत करने जा रहे हो। तुम रुको सोचो कि तुम क्या करने जा रहे हो? कौन किसको आप सच्चा
Speaker A
मित्र मानते हैं? कौन सच्चा मित्र है जो सही सलाह दे हमें? क्या कर्ण ने पूरे महाभारत के एक भी 700 पृष्ठ हैं। इसमें एक भी पृष्ठ में एक श्लोक में कभी दुर्योधन को कहा है कि मित्र तुम यह गलत कर रहे हो।
Speaker A
कहीं नहीं कहा है दुर्योधन ने। कर्ण ने। एक बार भी कभी नहीं कहा कि तुम यह गलत कर रहे हो। उसको कभी एक बार भी सही सलाह नहीं दी। उल्टा हमेशा जब भी दुर्योधन भी कभी अगर लगा कि ये शांत हो जाएगा उसने हमेशा
Speaker A
उसको हमेशा उसको बढ़ा दिया। चढ़ाया कि मैं हूं ना मेरे भरोसे तुम सब करो। और आपको कमाल की बात बताऊं कि जिसके भरोसे वो कर रहा था 12व दिन के के युद्ध के बाद कर्ण युद्ध में 10वें दिन आया था। 12व दिन
Speaker A
के युद्ध के बाद दो दिन में वह इतनी बार हारा इतने लोगों से हारा कर्ण इतने लोगों से हारा कि शाम में लिटरली लिखा हुआ है। आप किताब चाहे तो वो देख सकते हैं ढूंढ के महाभारत में बहुत आसानी से मिल जाएगा। वो
Speaker A
साम सर पे हाथ रख के बैठा हुआ था कि इसके भरोसे मैंने युद्ध ठाना था। ये लिटरली यही वर्ड दुर्योधन ने यूज़ किया। 11व दिन आया था और 17व दिन तक के युद्ध में उसको सातिकी ने हराया उसको अभिमन्यु
Speaker A
ने हराया उसको भीम ने हराया उसकी आंखों के सामने अर्जुन ने उसके बेटे को मार डाला। उसके भाइयों को मार डाला। उसको बचाने में कर्ण को भीम के हाथ से बचाने में दुर्योधन के 20 से 25 भाई मारे
Speaker A
गए हैं। जो कर्ण जब भीम के हाथों और धनुर विद्या की बात कर रहा हूं मैं। भीम से धनुर विद्या में वह जब हार जाता था तो उसको बचाने के लिए दुर्योधन अपने भाइयों को भेजता था और भीम उन भाइयों को मार
Speaker A
डालता था। ये कर्ण की वीरता है जो उसमें लिखी हुई है। मैं अपनी तरफ से कुछ भी नहीं कह रहा हूं और [नाक से की जाने वाली आवाज़] उसी में मैं कर्ण के जब चरित्र की बात कर रहा हूं तो
Speaker A
उसी युद्ध की बात कर रहा हूं कि एक दिन में भीम ने उसको चार बार हराया। चार बार वो भाग गया। ये जो महाभारत की असली घटनाएं हैं मैं वो बता रहा हूं जो आपको कोई नहीं बताता। पांचवी बार उसने भीम को हरा दिया।
Speaker A
जो ये कहते हैं ना कि उसने सबको हरा दिया और छोड़ दिया। भीम ने उसको कम से कम 101 बार मतलब गिनती आप नहीं कर सकते। इतनी बार हराया होगा धनुर विद्या में। भीम को हर लो आदमी केवल गधा लेके हमने सब सीरियल में
Speaker A
गधा दिखाया है। धनुर विद्या में हराया था। और जब पांचवी बार कर्ण उसको हराने में सफल हुआ और वो किसी हाथी के पीछे भीम छुप गया। तो उसके पास आकर उसके साथ ऐसी ऐसी बदतमीजी वाली बातें की तू मोटू है तू पेटू है तू
Speaker A
ऐसा है तू वैसा है तू यह है तू वो है तू तो जाके ऐसा ही कर तो भीम लिटरली उसको जवाब देता है कि मैंने तुम्हें चार बार हराया मैंने तो तुम्हारे साथ तुम्हें ऐसा कुछ नहीं कहा लेकिन तुम एक बार जीतने के
Speaker A
बाद तुम ऐसी कड़वी बातें कर रहे हो अगर अभी भी तुम में सामर्थ्य है तो धनुष और यह छोड़ो और आओ मुझसे लड़ लो आओ हम लोग बाहु युद्ध कर लेते हैं देखते हैं कि कौन जीतता है और कर्ण वहां से भाग जाता यह कहेगा कि
Speaker A
भाई वो उसको याद आ जाता है कि मैंने माता कुंती को वचन दिया था। तो यह कर्ण की वीरता की बात मैं कर रहा हूं। अब जो मित्रता की बात पे हम थे हम फिर वापस उस पे आते हैं।
Speaker A
दुर्योधन का हर जगह तो उसने साथ दिया ही। लेकिन कुछ बातें जाननी बहुत जरूरी है कि हर जगह वो बोलता था कि मैं पांडवों को हरा दूंगा। दुर्योधन मेरा सबसे बड़ा मित्र है। लेकिन जब श्री कृष्ण कर्ण से मिलते हैं।
Speaker A
यह भी कहानी कोई आपको पूरी बात नहीं बताता। तो जब श्री कृष्ण मिलते हैं और उसके सामने उसको बताते हैं कि तुम पांडवों में से एक हो। तुम कुंती के पुत्र हो। सबसे बड़े हो। आ जाओ राज्य ले लो। तो बहुत
Speaker A
उसकी वीरता के बारे में कहा जाता है कि वो कहता है और कहता है कि मैं मित्र हूं। अब इस समय मैं पूरी दुनिया आप मुझे दे देंगे राज्य तो भी मैं नहीं लूंगा और मैं दुर्योधन को दे दूंगा। इसलिए मुझे आप रहने
Speaker A
ही दीजिए। उनको भी मत बताइएगा। ये अच्छी बातें उसने की है उसने वहां पे कि आप युधिष्ठिर को भी नहीं बताइएगा। नहीं तो वो आके मेरे ही चरणों में दे देगा राजी वो लड़ेगा ही नहीं वो भी जानता है कि
Speaker A
युधिष्ठिर क्या है कैसा है वो दे देगा तो इसलिए अभी आप किसी को बताइएगा मत ये राजी रखिएगा लेकिन अब इस समय मैं अगर युद्ध से पीछे हटूंगा तो लोग मुझे कायर कहेंगे हां कर्ण बोला है और मैं अपने मित्र को
Speaker A
नहीं छोड़ सकता ये बात आपको सब बताएंगे लेकिन साथसाथ उसने दो बातें ऐसी बताई जो लोग नेगलेक्ट कर जाते हैं एक वहां उसने साफसाफ स्वीकार किया कि जिस पक्ष में श्री कृष्ण है और जहां युधिष्ठिर जैसा धर्मात्मा है युद्ध वही जीतेगा।
Speaker A
ये कर्ण की वाणी है। ये कर्ण कह रहा है बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में कह रहा है कि वो युद्ध तो वही जीतेंगे। वो पूरा वर्णन करता है कि दुशासन की छाती फाड़ी जाएगी। ऐसे दुर्योधन हारेगा, वो हारेगा, ऐसे होगा। वो अपने
Speaker A
स्वप्न का वर्णन करता है कि मैंने स्वप्न में देखा है कि केवल तीन ही लोग जा रहे हैं। एक सिंहासन का वर्णन करता है। सीढ़ियों का वर्णन करता है सफेद कपड़ों में और बाकी सब मारे जा चुके हैं। यह पूरा
Speaker A
साफ-साफ कहता है और वास्तव में भी स्वीकार करता है कि जीत तो पांडव पक्ष की ही होगी। उसके अलावा वो वहां पर यह भी कहता है कि दुर्योधन ब्राह्मणों का द्रोही तो था ही। वो आजकल अपने जो सुहद है उनसे भी विपरीत
Speaker A
आचरण कर रहा है। आप देखिए पीठ पीछे वो दुर्योधन की बुराई कर रहा है। और यह तो वहां यह बात हो गई। यह बात भी किसी ने नहीं बताई। उसके बाद युद्ध में एक छोटी सी बात पे छोटी या बड़ी भी बात मान सकते हैं।
Speaker A
जब भीष्म ने बोला कि मैं तो इसको अधिरथ ही मानता हूं क्योंकि ये हर युद्ध में भाग जाता है। तो इस बात पर वो बोलता है कि मैं युद्ध जब करूंगा तो जीतूंगा मैं और श्रेय सारा भीष्म ले जाएंगे। इसलिए जब तक भीष्म
Speaker A
है लिटरली मैं एक एक वर्ड जो बोल रहा हूं मैं मेरे सामने पुस्तक है आप चाहे तो बाद में सब देख सकते हैं या लोग भी आजकल इतना आसान हो गया है रिसर्च करना आप देख सकते हैं कि मैं जो बोल रहा हूं सत्य है या
Speaker A
नहीं वो बोलता है कि मैं युद्ध मैं करूंगा और इसका श्रेय भीष्म ले जाएंगे तो मैं जब तक ये जीवित है तब तक मैं युद्ध नहीं करूंगा जिस मित्र ने पूरा युद्ध उसके भरोसे ठाना उसको एन एन जब युद्ध होने वाला
Speaker A
है तब वो छोड़ के चला गया और उसके उसके बाद मैं और आपको बता रहा हूं। आप सुनिए जब दव दिन उसको सेनापति जब उसको बुलाया जाता है द्रोण सेनापति बनाए जाते हैं तो आने के बाद सबसे पहली बात
Speaker A
क्या कहता है वो कि जय और पराजय तो भाग्य के हाथ में है। कभी-कभी बड़े से बड़ा धनुर्धर भी हार जाता है और कभी-कभी छोटा भी जीत जाता है। मतलब लबो यह है कि वो कह अब जाके जो आज तक हर समय दुर्योधन को कहता
Speaker A
था कि मैं अकेला सबको मार डालूंगा। मैं अकेला अर्जुन को मार डालूंगा। सारे पांडवों को मार डालूंगा। वह भाग्य की बात कर रहा है कि मैं कि यह तो मतलब जय पराजय तो भाग्य के हाथ में है। और दवें दिन से
Speaker A
11वें दिन से ले 17वें दिन तक वो सिर्फ एक बड़े योद्धा को मार पाया। वो घटोत्क था। वो भी जो उसको दानवीर कहा जाता है। अब वो पूरे सात दिन में वो सात दिन युद्ध किया उसने। वो एक को मार पाया। उसकी आंखों के
Speaker A
सामने जयद्रथ को अर्जुन ने मार डाला। भीम ने उसको बचाने में आए दुर्योधन के कई भाइयों को मार डाला। दुशासन की भुजा उखाड़ ली। छाती फाड़ डाला। सब कर्ण जीवित था। उसकी आंखों के सामने उसके पुत्र को मार
Speaker A
डाला। उसके भाइयों को मार डाला। जब उसने अभिमन्यु का जब अभिमन्यु को सब घेर के खड़े थे। पीछे से उसके धनुष की डोरी काटी थी। सामने भी नहीं। जबकि वो जानता था उस समय तक वो जान चुका था कि ये मेरे भाई है
Speaker A
पांडव ये उनका पुत्र है। जब वो भीम को भी अपमानित कर रहा था। उस समय वो जानता था कि ये मेरा छोटा भाई है और भीम भी उससे कम से कम छ साल छोटा था। तब वो ऐसे शब्दों का
Speaker A
उपयोग करता है। तो आप समझ सकते हैं कि कर्ण और युद्ध में लोग कहते हैं कि वो बहुत था। वो बहादुर था। उसने दिग्विजय की थी। दिग्विजय में बहुत सारे राजाओं को हराया था। यह भी एक जगह कथा आती है कि जब
Speaker A
दुर्योधन का विवाह हो रहा था तो वहां पर जरासंध को भी हराया था। जो जरासंध उस समय का सबसे शक्तिशाली लोगों में से एक था जो है वो है। लेकिन द्रुपद युद्ध में हार कर भागा था। गंधर्वों के सामने हारा था।
Speaker A
विराट युद्ध में अकेले अर्जुन ने सबको हराया था। वहां भी दो बार उस युद्ध में भी विराट युद्ध में भी उसके भाई को अर्जुन ने मार डाला था। और अर्जुन ने लिटरली बोला है कि तुम्हारे जैसा और कौन हुआ कि अपने भाई
Speaker A
के मां को मारा जाता देखकर भी भाग जाएगा। लिटरली यह सारे शब्द बोले गए हैं और फिर भी वो भाग गया था वहां से भी और भीष्म हमेशा इसी बात के लिए उसको जब युद्ध शुरू हुआ तो अधिरथी इसीलिए उन्होंने उसको कहा
Speaker A
कि हर युद्ध में तो ये भाग ही जाता है तो मैं इसको कैसे मानूं कि ये महारथी है और हमेशा और अब यह तो उसके वीरता की बात हो गई। कर्ण का जो एक बहुत कररेक्टर का जो एक
Speaker A
डायमेंशन है उसका वाचालपन मतलब बड़बोलापन मैं संस्कृत शब्द नहीं बोल पा रहा हूं। मतलब बढ़च बढ़ा चढ़ा के बोलना वो हमेशा अपनी योग्यता को बढ़ा चढ़ाकर बोलता था। उसके अलावा अपशब्द बोलने में उसने भीष्म के लिए द्रोण के लिए जैसे जैसे शब्दों का प्रयोग
Speaker A
किया है। आप कल्पना नहीं कर सकते कि कोई सभ्य आदमी किसी बुजुर्ग के लिए इस तरह के शब्दों का प्रयोग करेगा। उसके अलावा द्रोपदी को वह द्रोपदी का वस्त्र हरण लोग शकुनी के बारे में बात करते हैं। दुर्योधन
Speaker A
के बारे में बात करते हैं। द्रोपदी के वस्त्र हरण का आईडिया कर्ण का था। कर्ण ने बोला कि जो स्त्री पांच पांच लोगों की पत्नी है वो तो वैश्या होती है। गणिका होती है। वो एक वस्त्र में रहे। जब
Speaker A
द्रोपदी ने कहा था कि मैं एक वस्त्रा हूं। मुझे इस तरह से नहीं यहां लाना चाहिए। तो बोल रहा है कि ऐसी स्त्री तो एक वस्त्र में रहे या निर्वस्त्र रहे। दुर्योधन दुशासन उतार लो इसके वस्त्र। मास्टरमाइंड कर्ण थे।
Speaker A
मास्टरमाइंड कर्ण थे। और उसके अलावा यह साफसाफ महाभारत में लिखा हुआ है कि जब उसको खींच के लाया जा रहा था तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] सभा में सन्नाटा था। सिर्फ कर्ण, दुशासन, शकुनी और दुर्योधन हंस रहे थे। प्रसन्न हो रहे थे।
Speaker A
ये सब जो लिखा हुआ है मैं वो बात कर रहा हूं। अब आप किसी के कैरेक्टर को जज कीजिए। तो आपने सुनी सुनाई बातों के आधार पर मत कीजिए। आप मुकेश सिंह को जज करने वाले हैं या राहुल जी को जज करने वाले हैं तो आप
Speaker A
जानिए कि वो कौन है। उन्होंने उनके कर्म आदमी के कर्म गवाही देते हैं कि वो कौन है। आदमी का वचन गवाही नहीं देता कि मैं अपने मुंह से बोल मैं संसार का सबसे अच्छा आदमी हूं तो आप मान लेंगे। मैंने क्या
Speaker A
किया है ये गवाही देंगे ना तो ये कर्ण ने क्या किया है मैं वो आपको बता रहा हूं। और आप अगर ये समझते हैं कि एक घटना है नहीं। जब मद्र राजसल्य जब उसके सारथी बने थे उस समय जब मद्र राजसल्य से उसकी बातें होती
Speaker A
हैं तब वो मदद देश की स्त्रियों के लिए इतने निम्न स्तर की बातें करता है आप सुन भी नहीं सकते लोग यह कहते हैं कि द्रोपदी ने उसको बोला कि मैं सूतपुत्र से विवाह नहीं करूंगी तो इसका बदला लिया आप समझिए
Speaker A
कि आप किसी को प्यार करते हैं। मान लीजिए प्यार नहीं दिया। आप किसी स्त्री से विवाह करना चाहते हैं वो आपको रिजेक्ट कर देगी तो क्या आप उसका वस्त्र हरण करेंगे?
Speaker A
आज के जमाने में अगर कोई ऐसा करे तो हम उसको क्या कहेंगे? साइकोपैथ कहेंगे या नहीं कहेंगे? मानसिक रोगी कहेंगे या नहीं कहेंगे?
Speaker A
और ये भी जो कर्ण ने मना जो द्रोपदी ने कहा कि मैं सूतपुत्र से विवाह नहीं करूंगी। यह मैंने बो क्रिटिकल एडिशन की बात की जो 1919 में शुरू हुआ था और 1959 में समाप्त हुआ। भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च
Speaker A
इंस्टट्यूट इन्होंने महाभारत पर रिसर्च किया। भारत के अलग-अलग सारे इलाकों से उत्तर दक्षिण पू पश्चिम से जितनी पांडुलिपियां उनको मिली उन्होंने सब इकट्ठा किया। 1259 एग्जैक्ट संख्या मैं बता रहा हूं और उन सबका उन्होंने विश्लेषण किया। तो जो घटनाएं उनको ज्यादातर
Speaker A
प्रतियों में मिली सबसे पुरानी प्रतियों में मिली वो उन्होंने रखा और जो दो चार प्रतियों में मिली या कम प्रतियों में मिली उसको उन्होंने हटा दिया। इस महाभारत में गीता प्रेस में 1 लाख के लगभग श्लोक हैं। उसमें 89000
Speaker A
श्लोक है। मतलब 11,000 श्लोक कम है जो उन्होंने प्रक्षिप्त मान के प्रक्षिप्त मतलब जो बाद में जोड़े गए हैं हटा दिया। उनमें से एक यह भी है। 1259 1259 वर्जनंस में से सिर्फ पांच वर्जन में ऐसा मिला जिसमें यह कहा गया हो कि द्रोपदी ने ऐसा
Speaker A
कहा कि मैं सूतपुत्र से विवाह नहीं करूंगी। बाकी सब वर्जन में 1254 वर्जन में लिखा हुआ है कि कर्ण उस धनुष पर प्रत्यंचा भी नहीं चढ़ा पाया। गीता प्रेस गोरखपुर की पुस्तक में है कि द्रोपदी ने ऐसा कहा कि
Speaker A
सूतपुत्र से विवाह नहीं करूंगी। लेकिन बाद में लिखा हुआ है उसमें भी कि नीचे फुटनोट में दिया हुआ है कि ये भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट के इसमें पाया गया है कि ऐसा उसने नहीं कहा था। और कर्ण वास्तव
Speaker A
में धनुष पे प्रत्यंचा भी नहीं चढ़ा पाया था। और यह दो या तीन जगह उसमें लिखा हुआ है बाद में। महाभारत की एक विशेषता यह भी है कि आप एक घटना को एक जगह पर नहीं समझ सकते। आप जब तक पूरा नहीं पढ़ेंगे क्योंकि
Speaker A
एक घटना एक बार होती है दोबारा फिर कभी हो सकता है कि उसके बारे में बात की जाए। तिब्बारा हो सकता है कि फिर कभी उसके बारे में बात की जाए। तो आप जब तक सबको समग्रता से नहीं समझेंगे तब तक आपको पूरी कहानी
Speaker A
पूरी घटना समझ में नहीं आएगी। तो यह किताबें पहले भी और भी आई हैं। जैसे रामचरितमानस भी है, वाल्मीकि जी की भी है। तो क्या जितने सारे वर्जन इसमें आए हुए हैं पक्षपात भी इसमें हुआ है कि उनको
Speaker A
नॉलेज नहीं थी इसलिए उन्होंने नहीं लिखा है। पक्षपात भी किया गया है कि ये चीजों को हाइड कर देते हैं हम। इतिहास और मिथ। मिथ अर्थात सुनी सुनाई कहानियां। मैं आपसे बात कर रहा था कि अगर आप किसी चीज को इतिहास मानते हैं तो आप
Speaker A
जैसा हुआ था वैसा हुआ था वैसा लिखेंगे। लेकिन अगर आप किसी चीज को मिथ मानते हैं तो फिर आप अपने हिसाब से सोचते हैं कि उन्होंने वैसा लिखा तो मैं इसको ऐसे लिख सकता हूं। तब आप उसमें परिवर्तन करना शुरू
Speaker A
कर देते हैं। इतिहास में परिवर्तन नहीं किया जा सकता या नहीं करना चाहिए। अभी आप अगर देखेंगे तो बार-बार आपको बहुत सारी किताबें मार्केट में है जो कभी कोई कहते हैं कि मैंने द्रोपदी के पॉइंट ऑफ व्यू से
Speaker A
लिखा है। यह कर्ण के पॉइंट ऑफ व्यू से लिखा है या ये दुर्योधन के पॉइंट ऑफ व्यू से लिखा है। क्या कर्ण जैसे मैं आपको इंटरव्यू दे रहा हूं। क्या कर्ण इंटरव्यू दे दे के अपना पक्ष बताने आया था? द्रोपदी
Speaker A
अपना पक्ष बताने आई थी या दुर्योधन अपना पक्ष बताने आया था। ये राइटर की अपनी कल्पना है जो वो एक कैरेक्टर के माध्यम से व्यक्त करना चाहता है ताकि उसको ऑथेंटिसिटी मिले। दैट्स इट। अगर राइटर यह बोलेगा कि मैं ऐसा सोच रहा हूं कि कर्ण
Speaker A
ऐसा था तो कोई नहीं मानेगा। लेकिन वही बोलेगा कि अच्छा ये कर्ण के पॉइंट ऑफ व्यू से ऐसा है। लोग उस पर ज्यादा भरोसा करेंगे। तो यही है और जैसे आज कोई भी घटना होती है तो उसका हर आदमी अपने अपने हिसाब
Speaker A
से विश्लेषण करता है। तो यही स्थिति उस समय मतलब पहले भी थी कि लोगों ने अपने आप में जो है वही आप दूसरे में देख सकते हो। निष्पक्ष होना बहुत मुश्किल काम है कि आप एक चीज से हटके जो जैसा है वैसा मैं देख
Speaker A
रहा हूं। वो बहुत मुश्किल काम है। तो लोगों ने जोड़े हैं इसमें बाद में बहुत सारी चीजें अलग-अलग जोड़ी गई हैं। तो इस कहानी जो पूरी लिखी हुई है जो इतिहास में हुआ था महाभारत में क्या सिर्फ कहानी है या सही गलत का भी फैसला वाल्मीकि
Speaker A
जी ने किया है कि ये हुआ था इंसिडेंट यह गलत था यह सही था। यह हीरो है यह विलेन है या सिर्फ कहानी है?
Speaker A
यही महाभारत की सबसे बड़ी ब्यूटी है जो हम आज मॉडर्न लिटरेचर में ढूंढते हैं कि महाभारत बिगिनिंग में निर्णय दे देता है। मैंने जैसा कि बताया कि यह धर्म का पेड़ है। यह है। लेकिन बाद में जो घटनाएं हैं वह एज इट
Speaker A
इज लिख देता है। अब आप निर्णय कीजिए कि कौन सही था कौन गलत है। जिसका अच्छा पक्ष है वो भी लिखा उन्होंने जो बुरा पक्ष है वो भी लिखा। मैं वो बात हमारी अधूरी रह गई थी कि वो जो एक विद्वान है जो कहते हैं कि
Speaker A
अगर कृष्ण पांडव जीत गए इसलिए कृष्ण महान है। अगर कौरव जीत जाते तो शकुन ही महान है। होता। उस समय जो वेदव्यास जी ने जो इतिहास लिखा है वह पक्षपात पूर्ण क्यों नहीं है? यह मुगलों के समय यह परंपरा शुरू हुई कि जो
Speaker A
विजेता है वो इतिहास लिखेगा। यह हमारे समय ऐसा नहीं था। ना वाल्मीकि जी के समय था ना वेदव्यास जी के समय था। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि युधिष्ठिर ने अगर जुआ खेला तो वो लिखा हुआ है कि जुआ खेला।
Speaker A
पत्नी को दांव पर लगाया। अगर युधिष्ठिर ने इतिहास युधिष्ठिर सम्राट थे ना। अगर इतिहास उन्होंने लिखवाया होता तो क्यों लिखवाते कि मैंने जुआ खेला था। क्यों लिखवाते कि मैं पत्नी को हारा था। क्यों लिखवाते कि जब उन्होंने दुर्योधन को बोल
Speaker A
दिया था कि पूरा युद्ध समाप्त होने के बाद जब वो पानी में छुपा हुआ था कि तुम मेरे किसी एक भाई से लड़ लो तो तुम्हें तुम्हें राज्य दे दूंगा। तो कृष्ण ने उनको बहुत बुरी तरह लता था। बहुत बुरी तरह डांटा था।
Speaker A
वो क्यों लिखवाते वो? वो क्यों लिखवाते? इतने इतने सारे काम हुए हैं। इतनी सारी चीजें हुई है। वो नहीं लिखवाते। वो राजा बन गए थे ना उनको हटा देते। लेकिन नहीं हटाया उन्होंने। वो क्यों लिखवाते कि मैंने झूठ बोला था अश्वत्थामा मारा गया
Speaker A
इसलिए द्रोण वो भी हटा सकते थे। नहीं हटाया। जो जैसा था वैसा ही लिखा है। आप अपने मोटिव के लिए कि आप किसी को सही, किसी को गलत साबित करना चाहते हो। तो आप जो चाहे बोल सकते हो। लेकिन किताब तो
Speaker A
सामने है ना। अगर उन्होंने झूठ लिखा होता तो ये नहीं लिखवाते ना। आज पूरा समाज पूरा भारत युधिष्ठिर को जुारी मानता है। आपके मन में युधिष्ठिर की और कोई छवि है?
Speaker A
धर्मराज युधिष्ठिर किताब में लिखा गया है। लेकिन आप किसी से भी पूछे युधिष्ठिर कौन था? जुारी। इसके अलावा किसी के मन में कोई है नॉलेज युधिष्ठिर के बारे में नहीं है। पूरे संसार में अगर हम भगवान राम को और
Speaker A
कृष्ण को छोड़ दें। युधिष्ठिर से महान सम्राट पूरे संसार में दुर्लभ है। कोई नहीं हुआ था। लेकिन हम आज उस चरित्र को आधुनिक कथाकारों के कारण आधुनिक व्याख्याओं के कारण हम सिर्फ जुारी मान के छोड़ लेते हैं। आपको सोचना पड़ेगा कि भगवान श्री कृष्ण
Speaker A
उन्होंने अपने भाई बलराम को क्यों नहीं बनाया चक्रवर्ती सम्राट? अपने पुत्र प्रद्युम्न को क्यों नहीं बनाया चक्रवर्ती सम्राट? अपने पिता वसुदेव को जो राजा थे उग्रसेन उनको क्यों नहीं बनाया चक्रवर्ती सम्राट? युधिष्ठिर को क्यों चुना? कि वही चक्रवर्ती सम्राट बनेगा। यह इतना बड़ा
Speaker A
पैराडॉक्स है आज की सोसाइटी के लिए। आज की सोसाइटी में अगर हमको किसी राजा की जरूरत है तो वह युधिष्ठिर जैसे राजा की जरूरत है जो अपना अपमान होते हुए देखकर अपनी पत्नी का अपमान होते हुए देखकर भी कंट्रोल कर
Speaker A
सकता है अपने ऊपर। हम जब भी युद्ध क्रीड़ा की बात करते हैं, हम यह भूल जाते हैं कि युधिष्ठिर के पीछे भीम और अर्जुन खड़े थे। नकुल और सहदेव खड़े थे। दुनिया के सबसे बड़े वारियर थे। वो कमजोर नहीं था वहां पर
Speaker A
कि उसके साथ जो चाहे वो हो जाए वो कुछ नहीं कर सकता। वो एक बार इशारा कर देते तो पूरे राज्यसभा में लाशें बिक जाती। एक आदमी वो जीवित बचते या नहीं बचते लेकिन दूसरा कोई जीवित बच के नहीं निकल सकता था।
Speaker A
लेकिन उस आदमी ने मेरे गुरु ना मारे जाए। मेरे पिता ना मारे जाए। मेरे चाचा मेरे ताऊ ना मारे जाए। उसने अपना अपमान सहा। अपनी पत्नी का अपमान सहा लेकिन उंगली नहीं उठाई। दत क्रीडा भी जैसे रंग भवन है वैसे ही दत
Speaker A
क्रीडा भी बहुत समझने की चीज है कि वह क्या हुआ था वहां कैसे हुआ था दूर से बैठ के उंगली उठा लेना कि युधिष्ठिर ज्वारी पत्नी को हार गया जीवन इतना सहज नहीं होता जितना जीवन इतना सामान्य नहीं होता हमको
Speaker A
उस आदमी के की जगह बैठ के देखना पड़ेगा कि युधिष्ठिर था कौन युधिष्ठिर वो आदमी था कि इतना अपमान सहने के बाद भी सारी घटना होने के बाद भी जब दुर्योधन को गंधर्व उठा के ले जा रहे थे। भीम ने मना कर दिया कि जो
Speaker A
हमें करना चाहिए था वो गंधर्व कर रहे हैं। युधिष्ठिर बोलता है क्या बोलता है वो?
Speaker A
दूसरों के लिए हम 101 भाई 100 भाई अलग और पांच भाई अलग हैं। लेकिन अपने लिए हम 105 भाई हैं। ये किनके शब्द थे?
Speaker A
युधिष्ठिर के। सारा अपमान सहने के बाद वन में ऑलरेडी 12 साल जंग दरदर भटकने के बाद भी वो आदमी ऐसा बोल रहा है। आप उस आदमी की महानता की कल्पना नहीं कर सकते। हम कर्ण को दानवीर कहते हैं। जब युधिष्ठिर राजा थे
Speaker A
तो लिखा हुआ है कि 80 हजार स्नातक रोज उनके यहां भोजन करते थे और द्रोपदी स्वयं सबको बिठा के भोजन कराती थी। ये जो कौरव और पांडवों में जो लोग तुलना करते हैं वो एक कहीं अगर आप किताब पढ़ लेंगे तो कहीं
Speaker A
मतलब बिल्कुल ब्लैक एंड वाइट हो जाएगा क्लियर। युधिष्ठिर उलूक ये घटना भी लोगों को नहीं मालूम है। जब युद्ध के लिए शांति प्रस्ताव के बाद भी दुर्योधन अपमान करने के लिए शकुनी के पुत्र उल्लू को इनके पास भेजता
Speaker A
है और ऐसी ऐसी कड़वी बातें बोलता है। कहता है कि अरे तुम लोग आज भी संधि की बात करवा रहे हो। मैंने तो तुम्हारी पत्नी के साथ ऐसा किया। ऐसे भीम को ये बोला ऐसे बोला वो किया वो किया और तुम अभी भी संधि की बात
Speaker A
इतनी कड़वी बातें बोलता है। युधिष्ठिर क्या जवाब देते हैं? सब जवाब देते हैं उनका। बोल रहे हैं कि हम युद्ध में तुमको सब बात का जवाब देंगे। उसके बाद उल्लूक को क्या कहते हैं? उस शकुनी के पुत्र को कि
Speaker A
तुम अब हमने तुम्हारी बातें सुन ली। अब तुम चाहे तो चले जाओ या चाहो तो हमारे साथ रहो। और तुम भी तो हमारे अपने ही हो। आप उस आदमी की कल्पना नहीं कर सकते। वो आदमी जानता था कि मेरे साथ क्या होने वाला
Speaker A
है युद्ध क्रीड़ा में। फिर भी उसने धृतराष्ट्र को कभी अपने पिता से कम नहीं समझा। मेरे पिता की आज्ञा है। मैं इसको नहीं टाल सकता। लोग बहुत से लोग कहते हैं कि और शकुनी ने एक जगह कहा है कि उसको तो
Speaker A
दत क्रीड़ा का व्यसन था। जा जब विदुर जी लेने आए थे। उनको दत क्रीड़ा के लिए बुलाने आए उस समय पहला ही सवाल युधिष्ठिर ने किया था कि दत क्रीड़ा तो बहुत ही गलत चीज है। ये नहीं होना चाहिए। सभा में आने
Speaker A
के बाद भी उन्होंने यही प्रश्न किया कि दत क्रीड़ा तो बहुत ही गलत चीज है। ये नहीं होना चाहिए। भाइयों के बीच झगड़ा करवाता है। ये सारी बातें लोग वन कर जाते हैं। लेकिनकि धृतराष्ट्र की आज्ञा थी। वो नहीं
Speaker A
टाल सकता था। आप अगर दत क्रीड़ा का देखो विदुर बार-बार खड़े होते हैं। विरोध करते हैं। वो धृतराष्ट्र से कहते हैं कि इसको रोक दीजिए। वो युधिष्ठिर से क्यों नहीं कहते कि तुम उठकर चले जाओ। कह सकते थे ना
Speaker A
कम से कम एक बार तो कह सकते थे कि युधिष्ठिर तुम ये क्यों लड़ रहे हो चले जाओ नहीं कहते धृतराष्ट्र को क्यों कहते हैं क्योंकि धृतराष्ट्र की आज्ञा से वो शुरू हुआ था और धृतराष्ट्र की आज्ञा से ही
Speaker A
बंद हो सकता था और वैसा ही हुआ भी और पांडव वो थे ये भी तुलना बहुत जरूरी है। बाद में महाभारत में ये कहा भी गया है कि पांडव ने धृतराष्ट्र को अपना पिता ज्यादा माना। दुर्योधन उनके सामने से उठ के चलाया
Speaker A
जाया करता था। जब वो कुछ समझाया करते थे। पूरी भरी सभा में अपने पिता का अपनी माता का तिरस्कार करके चला जाया करता था। युधिष्ठिर ने कभी अपमान नहीं किया। युद्ध के बाद भी जब सारे लोग मारे गए अपने पिता
Speaker A
से ज्यादा हर बात धृतराष्ट्र की आज्ञा लेके उनसे पूछ के किया। वो अंत समय तक इतना कुछ होने के बाद भी वो युद्ध नहीं चाहता था। 13 साल वन में भटकने के बाद नौकर पूरी पृथ्वी का सम्राट अपने
Speaker A
दम पर पृथ्वी का सम्राट बनने वाला आदमी नौकर बन के रह रहा है। उसको विराट ने मारा था। उसके चेहरे पर पासा नाक से खून निकला था। फिर भी उसके मन में विराट के लिए भी कभी कोई ये नहीं आया। नहीं उन्होंने एक
Speaker A
साल आश्रय दिया है मुझे। हमें इनके गुणों को याद रखना है। वो अंत समय तक दुर्योधन को भी जब गंधर्व ले जा रहे थे और उसके पास लेके आए। बोले जाओ भाई तुम जाओ बस केवल हमारे हमारे प्रति मन में कोई ये मत रखना
Speaker A
जो किया वो फिर मत करना आप उस आदमी की महानता का हम अपने चरित्र से आकलन करना चाहते हैं कि टेंशन लेने का नहीं टेंशन लेने का हमारी सोच वहां से शुरू होती है हम युधिष्ठिर को समझ ही नहीं सकते आज
Speaker A
संसार में अगर राजा की जरूरत है तो युधिष्ठिर जैसे राजा की जरूरत है जिसके लिए अपना कोई मतलब ही नहीं है मुझे कुछ नहीं चाहिए मेरा जो है वो राज्य के लिए है और बाकी चारों पांडवों की सबसे बड़ी बड़ी
Speaker A
महानता यह है कि सब कुछ होते हुए भी उन्होंने कभी अपने भाई की अवज्ञा नहीं की। दत क्रीड़ा में भीम बोलता है यह भाई तुमने यह अनुचित किया। यह गलत किया। भीम आवाज उठाता है लेकिन जब अर्जुन उसको बोलता है
Speaker A
कि यही तो चाहते हैं ये कौरव कि हम भाइयों में फूट पड़ जाए। तुम उनके इसमें मत पड़ो। तो भीम का लिटरली मैं अभी आते-आते मैंने अभी स्क्रीनशॉट लिया है मेरे मोबाइल में। जी कहता है कि अगर मैं नहीं जानता कि जो
Speaker A
भाई कर रहे हैं मेरे भ्राता कर रहे हैं वो क्षत्रिय धर्म के अनुसार है तो मैं इनके हाथ जला देता। हम क्या दिखाते हैं सीरीज में कि वो भीम गुस्सा हो गया। उसने बोला कि तुमने जिस हाथ से पासे फेंके हैं मैं
Speaker A
वो जला दूंगा। उसने ऐसा नहीं कहा था। उसने यह कहा था। मैं दोबारा रिपीट कर रहा हूं कि अगर मैं नहीं जानता कि ये जो कर रहे हैं वो क्षत्रिय धर्म के अनुसार हैं तो मैं इनके हाथ जला देता।
Speaker A
यह भीम भी स्वीकार पूरे महाभारत में शकुनी, दुर्योधन और कर्ण के अलावा और दुशासन के अलावा एक व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसने कभी और एक बलराम ने उस उंगली उठाई थी कि इन्होंने जुआ खिलाया। एक किसी एक ने
Speaker A
ना धृतराष्ट्र ने, ना भीष्म ने, ना द्रोण ने, ना कृपाचार्य ने, ना नारद ने, ना व्यास जी ने, नास मुनि ने, ना मार्कंडे ऋषि ने, किसी ने यूनिवर्सिटी पर उंगली नहीं उठाई। क्यों? हम ज्यादा जानते हैं क्या उनसे उन ऋषि मुनियों से?
Speaker A
हम अपने चश्मे से देखना चाहते हैं। हम एक डाल देते हैं। हमको क्योंकि उनको बुरा साबित करना है तो हम यह डाल देते हैं कि बस नहीं वो तो जुवारी था। उसको मजबूर किया गया था वहां कि तुम अपनी पत्नी को दांव पर
Speaker A
लगाओ और वो भी यह भी लिखा हुआ है वहां कि युधिष्ठिर ने अपने किसी दूत को इशारा किया कि तुम जाकर द्रोपदी को यह बता दो कि क्या हो रहा है। तभी द्रोपदी सभा में आती है और सभा में आके पहला प्रश्न यह पूछती है कि
Speaker A
पहले मुझे हारा गया था। महाराज पहले स्वयं को हारे थे। आप मुझे हारे थे। वहां भी द्रोपदी कितनी विदुषी है। वो हाथ जोड़ के यह नहीं कहती कि मुझे छोड़ दो या क्या कर रहे हो। वो एक प्रश्न पूछती है। एक धर्म
Speaker A
का प्रश्न पूछती है। और वहां पे एक बहुत इंपॉर्टेंट लाइन है द्रोपदी की। एग्जैक्ट लाइन तो मुझे याद नहीं है। वो आप देख सकते हैं। लेकिन उसका मतलब यह है कि मेरे पति में वो सभा में खड़ा होकर कह रही है कि
Speaker A
मेरे पति में इतने गुण है कि मैं उनके इस तिनके बराबर दोष की तरफ दृष्टि भी नहीं डालना चाहती। यह द्रोपदी का वही द्रोपदी बाद में युधिष्ठिर पर आक्षेप करती है। जब अकेले में होते हैं जब वन में है तो कितनी
Speaker A
बार कहती है द्रोपदी भीम और युधिष्ठिर के बीच बहुत ही होता है कि क्षमा बड़ा है या दंड बड़ा है। तो वह बोलती भी है कि यह है और फिर जब सरथ्री के रूप में जब अज्ञात वास में
Speaker A
द्रोपदी का अपमान करता है कीचक वहां भी युधिष्ठिर को बहुत बुरा भला बोलती है लेकिन भीम वहां भी समझाता है उनको तो आपस में बोलती है लेकिन सभा में खड़ा होकर क्या बोलती है इनमें इतने गुण है कि मैं
Speaker A
इनके छोटे से अवगुण की तरफ देखना भी नहीं चाहती। ये चरित्र है उन लोगों का। यह चरित्र है और वही कर्ण यह जानने के बाद भी कि यह मेरा भाई है। मैं वापस एक तुलना कर रहा हूं। वो उसके बाद भी अभिमन्यु को पीछे
Speaker A
से मारता है। कुंती को वरना वचन देने के कारण वो पांडवों को मारता तो नहीं है लेकिन भीम को इस तरह से अपमानित करता है। इतनी बुरी तरह से युधिष्ठिर को अपमानित करता है। गीता प्रेस गोरखपुर के पुस्तक में यह भी लिखा
Speaker A
हुआ है कि युधिष्ठिर ने भी एक बार कर्ण को हराया था। उसके बाद फिर कर्ण वापस युधिष्ठिर को हराता है और छोड़ देता है। लेकिन वह युधिष्ठिर का भी अपमान करता है। कोई योद्धा उस समय किसी को हराने के बाद उसका
Speaker A
अपमान नहीं करता था। कर्ण एकमात्र ऐसा आदमी था जो [नाक से की जाने वाली आवाज़] किसी को हराने के बाद वो भी अपने छोटे भाई को ये जानते हुए यह कर्ण का चरित्र हो गया। और जिस दिन युधिष्ठिर को पता चला कि
Speaker A
कर्ण मेरा बड़ा भाई था। उस दिन महाभारत के दो सबसे बड़े खंड यह पंचम खंड और यह छठा खंड सिर्फ युधिष्ठिर को समझाने में जाते हैं। युधिष्ठिर बोलता है यह मैंने क्या कर डाला? मैंने अपने लिए अपने बड़े भाई को मरवा डाला राज्य के लिए
Speaker A
और तब वो कुंती को श्राप देता है कि आज के बाद किसी स्त्री के पेट में कोई बात पचेगी नहीं। वो आदमी जिसने जिंदगी भर जिसके जिसके हाथों झेला सब कुछ क्या-क्या नहीं झेला उसको रिग्रेट हो रहा है कि मैंने
Speaker A
अपने भाई को मरवा डाला है और दूसरा ये जानते हुए भी कर्ण ये मेरा भाई है उसको इस तरह की बातें करता है कि आप सुन भी नहीं सकते और फिर भी आप मतलब एक को महान और दूसरे को
Speaker A
जुारी साबित करना चाहते हो हम देखिए महाभारत और रामायण के चार चरित्रों की बात मैं करूंगा आज के जनमानस में क्या है?
Speaker A
युधिष्ठिर जुानी था। विभीषण कुल घाती था। कर्ण सबसे अच्छा मित्र था और रावण सबसे बड़ा शिव भक्त था। रामायण और महाभारत के साथ इससे ज्यादा अत्याचार आप नहीं कर सकते। आप उनकी शिक्षा का इससे ज्यादा अनादर नहीं कर सकते। अगर आपके मन में यह
Speaker A
बातें बिठा दी गई है और आप फोर्सफुली उसको दूसरे को प्रूव करना चाहते हो। विभीषण खुद छोड़कर नहीं आया था। रावण ने उसको निकाला था। ये द्वंद आज अगर आप आज का समाज देखो, आज की राजनीति देखो तो यह द्वंद हर आदमी
Speaker A
के मन में आता है कि धर्म बड़ा है या परिवार संबंध बड़ा है या धर्म? और आज पूरे संसार के ह्रास का जो नैतिक मूल्यों के ह्रास का कारण ये है कि हमारे लिए संबंध बड़ा है। अगर मेरा बेटा, मेरा पति, मेरा
Speaker A
भाई, मेरा पिता आप राजनीति में देख लीजिए। कुछ भी कुकर्म कर रहा है, कुछ भी गलत कर रहा है। नहीं वह तो मेरा भाई कर रहा है। मैं साथ दूंगा उसका। यह कर्म था। विभीषण वो नहीं था। विभीषण के लिए धर्म
Speaker A
बड़ा था। वो आदमी अच्छा है या वो वो आदमी अच्छा है जो अपने मित्र को मरवा डालता है। उसके पूरे खानदान को खत्म करवा देता है। आप युधिष्ठिर को जुारी बताते हो जो संसार का सबसे सहिष्णु आदमी था। सबसे अहिंसक आदमी था।
Speaker A
सबसे बड़ा प्रजापालक था। सबसे बड़ा दानवीर था और वो रावण जो सीरियल रेपिस्ट था जिसने कितनी महिलाओं का मान मर्दन किया उसको आप सबसे बड़ा शिव भक्त बताते हो। आप मैं एक सिंपल सी बात आपसे पूछता हूं। आपका एक पड़ोसी है जो सुबह से शाम तक पूजा
Speaker A
में लगा रहता है और रात में निकल के महिलाओं का बदतमीजी करता है। तो आप उसको शिव भक्त मानोगे कि उसको रेपिस्ट मानोगे?
Speaker A
रेपिस्ट जो गलत है गलत है। पहले तो पूजा पाठ कर्मों को छुपा सकता है क्या?
Speaker A
तो रामायण और महाभारत हमको सबसे इंपॉर्टेंट चीज सीखने की यह है कि रामायण और महाभारत यू ही नहीं लिखे गए। हमारा इतिहास ऐसे नहीं लिखा गया। हर घटना आपको कुछ ना कुछ सिखाने के लिए लिखी गई है। हम वो सीखते नहीं है। हम घटना पे विवाद
Speaker A
करने लगते हैं। जबकि घटना का मूल है आप महाभारत रामायण में कितनी जगह आप पढ़ेंगे कि इंद्र ने ऐसा किया, गलत किया, वायुदेव ने ऐसा गलत किया, सूर्यदेव ने ऐसा गलत किया। वह कहानियां क्यों कही गई है कि अगर
Speaker A
वायुदेव, सूर्य देव या इंद्र जैसा देवताओं का राजा भी गलत करेगा तो उसको भी दंड भोगना पड़ेगा। उसको भी उसकी सजा मिलेगी। लेकिन हम क्या करते हैं? हम ये सीख नहीं लेते। हम तो ये कहते हैं अरे इंद्र ने जब
Speaker A
गलत किया तो हम क्यों नहीं कर सकते? वायुदेव ने गलत किया, सूर्य देव ने गलत किया तो हम क्यों नहीं कर सकते? मुझे अंग्रेजी की एक कहावत याद आती है कि व्हेन वाइज वाज पॉइंटिंग एट मून द फूल वाज
Speaker A
लुकिंग एट फिंगर। तो हम मूल बातें भूल जाते हैं। रामायण त्रेता युग के अंत में लिखी गई थी ताकि द्वापर युग उससे सीख ले सके और महाभारत द्वापर युग के अंत में लिखी गई थी ताकि कलयुग उससे सीख ले सके। लेकिन हम
Speaker A
सीखने की बजाय हम इस भ्रम में उलझे हुए हैं कि कर्ण महान था कि कौन महान था कि कौन अच्छा था कि कौन बुरा था। हमको सीख लेना चाहिए कि अगर ऐसा मित्र आपके पास हो तो कैसे आपका पूरा खानदान खत्म हो जाता
Speaker A
है। लेकिन हम वह सीख नहीं दे रहे हैं। हम कह रहे हैं कि वह सबसे बड़ा मित्र था। सबसे अच्छा मित्र था। तो पूरा लिखने का मतलब खत्म हो गया। और हमको हमारे ग्रंथों को सही ढंग से समझने की जरूरत है। और यही
Speaker A
सबसे महत्वपूर्ण बात कि उसमें क्या लिखा है, कैसे लिखा है, हम वो सीख सके। तभी हम इन्होंने जो काम किया उसका कुछ उसकी कुछ सार्थकता हो पाएगी। बहुत-बहुत धन्यवाद सर। अगर आपके भी कुछ सवाल हैं महाभारत से जुड़े हुए तो आप कमेंट में जरूर बताएं। एक
Speaker A
और पडकास्ट करेंगे आपके सवालों के साथ।
Topics:महाभारतइतिहासमिथकश्री कृष्णपांडवकौरवधर्मभारतीय संस्कृतिमहाभारत अध्ययनमुकुल कुमार सिंह











