अमेरिका और ईरान के बीच इतिहास, तेल नियंत्रण, राजनीतिक संघर्ष और न्यूक्लियर प्रोग्राम की जटिलताओं का विश्लेषण।
Key Takeaways
- तेल संसाधनों का नियंत्रण अमेरिका-ईरान संघर्ष की मुख्य वजह है।
- राजनीतिक हस्तक्षेप और विदेशी समर्थन ने ईरान की आंतरिक राजनीति को प्रभावित किया।
- ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम क्षेत्रीय और वैश्विक तनाव का कारण बना।
- अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों में उतार-चढ़ाव रहे हैं, खासकर डील और प्रतिबंधों के संदर्भ में।
- ईरान की धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्था ने देश के सामाजिक अधिकारों और स्वतंत्रता को प्रभावित किया।
What the video covers
- 1951 तक ईरान के तेल पर ब्रिटेन का नियंत्रण था, जिससे ईरान को केवल 16% लाभ मिलता था।
- ईरान के पीएम मोसादक ने तेल इंडस्ट्री को नेशनलाइज किया, जिससे ब्रिटेन और अमेरिका ने मिलकर ऑपरेशन एजक्स कर सरकार गिराई।
- शाह मोहम्मद रेजा पहलवी को सत्ता में लाया गया, जो अमेरिका का पपेट था और 26 साल तक शासन किया।
- 1979 में ईरान में रिवोल्ट हुई और आयोतुल्ला रोहल्ला खोमेनी सत्ता में आए, जिन्होंने अमेरिका और ब्रिटेन से तेल का नियंत्रण छीन लिया।
- आयोतुल्ला के शासन में थियोक्रेसी स्थापित हुई, महिलाओं के अधिकार खत्म किए गए और राजनीतिक विरोधियों को दंडित किया गया।
- 1980 में ईरानियन स्टूडेंट्स ने 52 अमेरिकी डिप्लोमेट्स को 444 दिन तक बंधक बनाया, जिससे अमेरिका को बड़ा अपमान हुआ।
- इराक-ईरान युद्ध में अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को हथियार और इंटेलिजेंस सपोर्ट दिया, जिससे लाखों ईरानियंस मारे गए।
- ईरान ने हजबुल्ला और हमस जैसे समूहों को फंडिंग शुरू की और न्यूक्लियर प्रोग्राम भी शुरू किया।
- 2015 में ओबामा प्रशासन ने ईरान के साथ न्यूक्लियर डील की, लेकिन ट्रंप ने इसे रद्द कर दिया और नई नेगोशिएशंस की कोशिश की।
- हाल ही में अमेरिका और इजराइल ने ईरान की सरकार को गिराने के लिए उस पर हमला किया।
Chapters
- 00:00ईरान के तेल पर ब्रिटेन और अमेरिका का नियंत्रण
- 00:16ऑपरेशन एजक्स और शाह का शासन
- 00:401979 की क्रांति और खोमेनी का उदय
- 00:52थियोक्रेसी, महिलाओं के अधिकार और राजनीतिक दमन
- 01:05अमेरिकी डिप्लोमेट्स का बंधक बनना और युद्ध
- 01:20इराक-ईरान युद्ध में अमेरिका का समर्थन
- 01:32ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम और आर्थिक प्रतिबंध
- 01:432015 की डील, ट्रंप का रद्द करना और हालिया घटनाक्रम
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Speaker A
आखिर क्यों अमेरिका ईरान से नफरत करता है? ईरान के पास बेशुमार ऑयल है, और 1951 तक इस पूरे ऑयल पर ब्रिटेन का कंट्रोल था। ईरान को केवल 16% प्रॉफिट मिलता था। लेकिन फिर ईरान के डेमोक्रेटिकली इलेक्टेड पीएम मोसादक ने ऑइल इंडस्ट्री को नेशनलाइज कर
Speaker A
दिया ताकि ईरान के ऑयल का पैसा ईरान को ही मिले। इससे नाराज होकर ब्रिटेन और अमेरिका ने मिलकर ऑपरेशन एजक्स किया और ईरान की सरकार गिरा दी, और ईरान की गद्दी पर शाह मोहम्मद रेजा पहलवी को बैठा दिया जो
Speaker A
अमेरिका का पपेट था। इसीलिए अब अमेरिका को भी ईरान के 40% ऑयल का कंट्रोल मिल गया। शाह मोहम्मद ने ईरान में 26 साल रूल किया। बाहर से तो देश की एक मॉडर्न इमेज बनाई, लेकिन अपनी सीक्रेट पुलिस का यूज करके
Speaker A
हजारों लोगों को टॉर्चर किया और ऑपोजिशन को क्रश कर दिया। इसीलिए 1979 में ईरान के लोगों ने रिवोल्ट कर दिया और आयोतुल्ला रोहल्ला खोमेनी को पावर में ले आए। जिसने एक बार फिर से अमेरिका और ब्रिटेन से ऑयल
Speaker A
का एक्सेस छीन लिया। लेकिन आयोतुल्ला के आने से ईरान को फ्रीडम नहीं, थियोक्रेसी मिली। वुमेन राइट्स को खत्म कर दिया और पॉलिटिकल अपोनेंट्स को एग्जीक्यूट कर दिया गया। इसी दौरान ईरानियन स्टूडेंट्स ने ईरान में 52 अमेरिकन डिप्लोमेट्स को 444
Speaker A
डेज तक बंदी बनाकर रखा। अमेरिका के लिए यह बहुत बड़ी इंसल्ट थी। इसीलिए 1980 में जब इराक के सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला किया, तो अमेरिका ने उसे वेपंस और इंटेलिजेंस देकर सपोर्ट किया। इस वॉर में लाखों ईरानियंस मारे गए। जिसके बाद ईरान
Speaker A
ने भी ठान लिया कि अब वो और पावरफुल बनेगा। उसने हजबुल्ला और हमस जैसे ग्रुप्स को फंडिंग देना शुरू कर दिया और अपना न्यूक्लियर वेपंस प्रोग्राम भी स्टार्ट कर दिया। इसी न्यूक्लियर प्रोग्राम को रोकने के लिए अमेरिका ने ईरान पर इकोनॉमिक
Speaker A
सेंशंस लगा दिए। लेकिन फिर 2015 में ओबामा ने ईरान के साथ एक डील की, जिसके बाद ईरान ने अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम को लिमिट कर दिया और न्यूक्लियर सेंशंस हटवा लिए। लेकिन फिर ट्रंप आए और उन्होंने इस डील को
Speaker A
वर्स्ट डील एवर कहते हुए डील को कैंसिल कर दिया और अपनी सेकंड टर्म में नई डील के लिए नेगोशिएशंस करने लगे। और रिसेंटली जब ट्रंप को नेगोशिएशंस अपने फेवर में जाते हुए नहीं दिखे, तो यूएस और इजराइल ने ईरान
Speaker A
की सरकार गिराने के लिए उस पर हमला कर।
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