इस वीडियो में ओशो जीवन की सच्ची चाहतों को समझने और अस्तित्व के साथ सामंजस्य स्थापित करने की कला बताते हैं।
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Key Takeaways
- जीवन की वास्तविकता हमारे भीतर की चाहतों और विचारों का प्रतिबिंब है।
- मन की इच्छाओं को पहचानना और आत्मा की चाहतों को समझना आवश्यक है।
- ध्यान से हम अपनी सच्ची इच्छाओं को जान सकते हैं और जीवन में शांति पा सकते हैं।
- सकारात्मक ऊर्जा और प्रेम की तरंग जीवन में सफलता और आनंद लाती है।
- शुद्ध और सच्ची चाहतों के साथ ब्रह्मांड सहयोग करता है, जिससे जीवन सहज हो जाता है।
What the video covers
- जीवन आकस्मिक नहीं बल्कि हमारी अंदरूनी चाहतों का परिणाम है।
- असली इच्छा वही होती है जो मन से नहीं, बल्कि आत्मा से उठती है।
- मन की इच्छाएं अक्सर विरोधाभासी और अधूरी रहती हैं, जिससे जीवन में संघर्ष होता है।
- अस्तित्व हमारी सच्ची चाहतों को सुनता है और उसी के अनुसार जीवन में सहयोग करता है।
- ध्यान के माध्यम से हम अपनी असली इच्छाओं को पहचान सकते हैं और मन की भीड़ से ऊपर उठ सकते हैं।
- नकारात्मक सोच और डर जीवन में दुख और संघर्ष को आकर्षित करते हैं।
- जहां प्रेम और शांति की तरंग होती है, वहीं जीवन में समरसता और आनंद आता है।
- अपने विचारों और चाहतों को सजगता से चुनना चाहिए क्योंकि वे हमारे जीवन का निर्माण करते हैं।
- सच्ची चाहतें आत्मा से उठती हैं और उन्हें पूरा होना निश्चित है।
- जब चाह शुद्ध होती है, तो ब्रह्मांड भी उसका समर्थन करता है और असंभव भी संभव हो जाता है।
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Speaker A
जीवन कोई दुर्घटना नहीं है। कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह वैसा ही है जैसा तुम भीतर से चाहते हो। जो तुम्हारे मन में लगातार चलता रहता है, वही धीरे-धीरे तुम्हारे जीवन का रूप ले लेता है। जो तुम सोचते हो, वही तुम्हारा बनता है। तुम्हारा
Speaker A
हर विचार, हर भावना, हर आकांक्षा अस्तित्व के बीज हैं। वे बीज जो आज तुम्हारे भीतर बोए जा रहे हैं। कल तुम्हारे जीवन में पेड़ों की तरह प्रकट होंगे। तुम जो कुछ अपने जीवन में अनुभव कर रहे हो, वह सब
Speaker A
तुम्हारी ही चाह का परिणाम है। चाहे तुम उसे जानो या ना जानो। तुमने कभी गहराई से देखा नहीं कि तुम्हारी वास्तविक चाह क्या है। मन हजार दिशाओं में दौड़ता है और उसी कारण तुम्हारा जीवन बिखर जाता है। देखो
Speaker A
जरा एक ओर तुम धन चाहते हो। दूसरी ओर शांति भी चाहते हो। लेकिन जिसने धन का पीछा किया है, उसने जाना है कि धन और शांति साथ नहीं चलते। एक ओर तुम चाहते हो कि दुनिया तुम्हें जाने, सम्मान दे। और
Speaker A
दूसरी ओर तुम यह भी चाहते हो कि भीतर का विश्राम बना रहे। तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारी तारीफ करें, पर साथ ही तुम स्वतंत्र भी रहना चाहते हो। किसी की राय से बंधे नहीं रहना चाहते। यह विरोधाभास ही
Speaker A
तुम्हारे भीतर संघर्ष पैदा करते हैं। जीवन में पीड़ा इसीलिए है क्योंकि चाहतें टकरा रही हैं। जैसे कोई व्यक्ति एक ही समय में दो दिशाओं में चलना चाहे, वह थक जाएगा, टूट जाएगा, लेकिन कहीं पहुंचेगा नहीं। याद रखो अस्तित्व बहुत संवेदनशील है। वह तुम्हारी
Speaker A
हर चाहत को सुनता है। हर तरंग को समझता है। पर वह उसी को सच करता है जो तुम्हारी गहराई में सच्ची हो जाती है। तुम्हारे शब्द नहीं, तुम्हारा कंपन वही सुनाई देता है। यदि तुम्हारा मन कुछ और कहता है और हृदय
Speaker A
कुछ और चाहता है, तो अस्तित्व भ्रमित नहीं होता। वह हृदय की बात सुनता है क्योंकि वही तुम्हारा सत्य है। इसलिए पहले तुम्हें अपनी सच्ची इच्छा जाननी होगी। वह इच्छा जो भीतर से उठती है, जो समाज से उद्धार नहीं
Speaker A
ली गई, जो माता-पिता या गुरु या परंपरा की दी हुई नहीं है, बल्कि जो तुम्हारे अपने अस्तित्व से फूटी है, वही चाहत सृजन बनती है। अस्तित्व कोई ईश्वर की तरह बाहर बैठा हुआ नहीं है जो आदेश सुन रहा है। अस्तित्व
Speaker A
तुम्हारे भीतर ही धड़क रहा है। तुम्हारी हर भावना में, हर सांस में जब तुम किसी चीज को पूरे दिल से चाहते हो, तो तुम्हारा पूरा अस्तित्व उसकी दिशा में काम करने लगता है। ऊर्जा एक दिशा में बहने लगती है।
Speaker A
याद रखो जहां चाह है, वहीं मार्ग बनता है। जहां सच्ची आकांक्षा है, वहीं अस्तित्व सहयोग करता है। पर यदि चाह ही अस्पष्ट है, विरोधाभासी है, तो ऊर्जा बिखर जाती है। और तुम शिकायत करने लगते हो कि जीवन मुझे वह
Speaker A
नहीं दे रहा जो मैं चाहता हूं। सच यह है कि तुमने कभी यह जाना ही नहीं कि तुम वास्तव में क्या चाहते हो। लेकिन सृजन तभी होता है जब इच्छा एकाग्र हो, शुद्ध हो और भीतर से उठी हो। पहला कदम यही है अपने
Speaker A
भीतर झांको। देखो कि कौन सी चाहत तुम्हारी आत्मा से उठ रही है और कौन सी मन की चाह है। मन की इच्छाएं हमेशा अधूरी रहेंगी। आत्मा की इच्छा हमेशा पूरी होगी क्योंकि जो चाह आत्मा से उठती है, वही सच्चा सृजन
Speaker A
बन जाती है। हर सुबह जब तुम अपनी आंखें खोलते हो, तुम केवल एक नए दिन में प्रवेश नहीं करते। तुम एक नई सृष्टि में प्रवेश करते हो जो तुम्हारे अपने विचारों, इच्छाओं और भावनाओं से बन रही है। हर सुबह एक कोरा
Speaker A
पृष्ठ है और तुम्हारे विचार उस पर लिखे जाने वाले शब्द हैं। तुम्हारे मन के भीतर जो चल रहा है, वह धीरे-धीरे तुम्हारे जीवन का स्वरूप बन जाता है। अगर तुम दिन की शुरुआत शिकायत से करते हो, कितनी मुश्किल
Speaker A
जिंदगी है। लोग कितने खराब हैं। मेरे पास कुछ नहीं है। तो यह नकारात्मक ऊर्जा पूरे दिन तुम्हारे साथ चलती है और जो भी परिस्थितियां घटती हैं, वे उसी के अनुरूप होती जाती हैं। लेकिन यदि सुबह तुम आनंद से
Speaker A
भर जाओ, यह महसूस करो कि मैं जीवित हूं। यह सबसे बड़ा वरदान है, तो दिन का रंग बदल जाता है क्योंकि अस्तित्व उसी रंग को बढ़ाता है जो तुमने अपने भीतर से भेजा है। याद रखो अस्तित्व दर्पण है। वह ना कुछ
Speaker A
जोड़ता है, ना घटाता है। वह सिर्फ वही लौटाता है जो तुम उसमें भेजते हो। अगर तुम्हारे भीतर प्रेम है, तो वही प्रेम तुम्हारी ओर वापस आता है। अगर भीतर भय है, तो वही भय तुम्हारे जीवन में रूप धर लेता
Speaker A
है। कई लोग कहते हैं, मुझे पता नहीं क्यों मेरे साथ हमेशा गलत होता है। पर वे यह नहीं देखते कि उनके मन में लगातार डर चल रहा है। वह डर ही उन्हें उसी ऊर्जा से जोड़ देता है जो दुख लाती है। अस्तित्व
Speaker A
निष्पक्ष है। न्याय नहीं। वह केवल तरंगों को पकड़ता है। अगर तुम रेडियो पर किसी खास तरंग को पकड़ना चाहते हो, तो उसी तरंग पर मिलाना पड़ता है। ठीक वैसे ही जीवन भी है। तुम जिस भावना में जीते हो, उसी के अनुभव
Speaker A
तुम्हारे पास आने लगते हैं। इसलिए समस्या परिस्थितियों में नहीं है। समस्या तुम्हारी आंतरिक तरंग में है। अगर तुम्हारे भीतर दुख की तरंग है, तो तुम्हें दुनिया के हर कोने में दुख नजर आएगा। अगर तुम्हारे भीतर प्रेम की तरंग है, तो वही
Speaker A
दुनिया तुम्हें सुंदर लगेगी। यह मत कहो कि मुझे अपना जीवन बदलना है। पहले यह कहो कि मुझे अपना मन बदलना है। क्योंकि मन ही वास्तविकता का निर्माता है। जो भीतर चलता है, वही बाहर मूर्त रूप ले लेता है। अगर
Speaker A
भीतर भ्रम है, तो बाहर उलझन होगी। अगर भीतर शांति है, तो बाहर समरसता होगी। इसलिए जो दुख तुम बाहर देख रहे हो, वह तुम्हारा शत्रु नहीं। वह एक संकेत है कि तुम्हारे भीतर कुछ ठीक करने की आवश्यकता है। बाहर
Speaker A
की दुनिया में झगड़ो मत। वहां कुछ नहीं बदलेगा। भीतर की तरंग बदलो और तुम देखोगे कि वही लोग, वही घटनाएं अचानक नई अर्थवत्ता लेने लगेंगी। वैसे ही अस्तित्व का दर्पण भी नया प्रतिबिंब लौटाने लगता है। तुम अपने अनुभवों के निर्माता हो। तुम्हारी
Speaker A
चाहतें तुम्हें गढ़ रही हैं। तुम्हारे विचार तुम्हारा भविष्य बना रहे हैं। जो कुछ तुम भीतर बोओगे, वही बाहर फलेगा। इसलिए हर सुबह अपने विचारों के बीज सजगता से बो क्योंकि यही बीज तुम्हारे जीवन का बाग बनेंगे। और अगर भीतर प्रेम के, करुणा के,
Speaker A
विश्वास के बीज बोओगे, तो जीवन स्वयं स्वर्ग बन जाएगा। मन बड़ा चालाक है। वह तुम्हें यह एहसास दिलाता है कि जो भी इच्छा तुम्हारे भीतर उठ रही है, वह तुम्हारी है। लेकिन यदि तुम थोड़ी देर ठहरो, थोड़ी सजगता से देखो, तो पाओगे कि
Speaker A
तुम्हारी अधिकतर इच्छाएं तुम्हारी नहीं हैं। वे समाज ने दी हैं। वे माता-पिता की अधूरी आकांक्षाएं हैं। वे शिक्षकों की शर्तें हैं। वे भीड़ की अपेक्षाएं हैं। और तुमने उन्हें बिना परखे, बिना जाने अपना लिया है। बचपन से ही तुम्हें बताया गया
Speaker A
अच्छा बनो, सफल बनो, अमीर बनो, दूसरों जैसा बनो, और तुम उस दिशा में चल पड़े बिना यह देखे कि तुम्हारी आत्मा वास्तव में क्या चाहती है। यही मन का भ्रम है। मन एक नकली केंद्र बनाता है। जहां से तुम सोचते
Speaker A
हो कि तुम निर्णय ले रहे हो। पर वास्तव में तुम केवल प्रोग्राम किए जा रहे हो। मन उधार की इच्छाओं से भरा है। कभी भी खुद से यह प्रश्न पूछो, क्या यह इच्छा सच में मेरी है? क्या यह मेरे भीतर से उठ रही है
Speaker A
या किसी और की आवाज मेरे भीतर बोल रही है? अक्सर तुम पाओगे कि तुम्हारे भीतर जो आवाज है, वह तुम्हारी नहीं, समाज की गूंज है। मन बाहर से प्रभावित है और जब तक तुम मन के आदेशों पर चलते रहोगे, तुम कभी अपनी सच्ची
Speaker A
दिशा नहीं जान पाओगे। इसलिए ध्यान में बैठो क्योंकि ध्यान ही वह दर्पण है जिसमें तुम अपनी असली आकांक्षा को देख सकते हो। ध्यान का अर्थ है मन की भीड़ से ऊपर उठना। विचारों के शोर से परे जाना। भीतर गहरे
Speaker A
उतरते हो तो धीरे-धीरे मन शांत होने लगता है। उस मौन में एक नई तरंग उठती है। वह कोई उधार की इच्छा नहीं होती। वह तुम्हारे अस्तित्व की सच्ची आवाज होती है। वह चाहत बहुत अलग होती है। उसमें भय नहीं होता।
Speaker A
उसमें तुलना नहीं होती। उसमें कोई लक्ष्य नहीं होता जिसे पाने पर अहंकार तृप्त हो। वह सहज होती है। जैसे फूल का खिलना, जैसे पक्षी का गाना, जैसे नदी का बहना। और जब वह सच्ची इच्छा भीतर से उठती है, तो
Speaker A
अस्तित्व स्वयं उसकी सहायता करने लगता है। फिर तुम्हें संघर्ष नहीं करना पड़ता। जीवन तुम्हारे पक्ष में बहने लगता है। सारी परिस्थितियां, सारे लोग, सारे अवसर किसी अदृश्य शक्ति से एकजुट होकर तुम्हारे मार्ग को खोलने लगते हैं। यह कोई चमत्कार
Speaker A
नहीं है। यह प्राकृतिक नियम है। क्योंकि जब तुम्हारी चाह तुम्हारे अस्तित्व के साथ गूंजती है, तो तुम उसी सार्वभौमिक ऊर्जा के साथ एक हो जाते हो जो पूरे ब्रह्मांड को चला रही है। लेकिन जब इच्छा मन से आती है,
Speaker A
तो संघर्ष शुरू होता है। मन विभाजित है, इसलिए उसकी इच्छा भी विभाजित है। तुम एक दिशा में बढ़ते हो और भीतर कुछ और तुम्हें रोकता है। यही कारण है कि मनुष्य थका हुआ है। अधूरा है, असंतुष्ट है। इसलिए मैं
Speaker A
कहता हूं चाह को मत छोड़ो। उसे शुद्ध करो। शुद्धि का अर्थ है देखो कि वह चाह कहां से उठ रही है। अगर वह अहंकार से आती है, तो दुख देगी। अगर वह आत्मा से आती है, तो आनंद बनेगी। ध्यान के मौन में बैठो। अपने भीतर
Speaker A
झांको और बस देखो कौन सी इच्छाएं तुम्हारी सच्ची हैं। उन्हें पहचान लेना ही मुक्ति की शुरुआत है। क्योंकि जब चाह शुद्ध होती है, तो जीवन स्वयं तुम्हारी ओर झुक जाता है। फिर जो तुम चाहते हो, वह केवल तुम्हारा
Speaker A
नहीं, वह अस्तित्व की भी चाह बन जाता है। और तब असंभव भी संभव हो जाता है। तुम्हारा ध्यान तुम्हारी सबसे बड़ी शक्ति है। ध्यान ही ऊर्जा है। ध्यान ही जीवन है। जहां तुम ध्यान देते हो, वही तुम्हारी ऊर्जा बहने
Speaker A
लगती है। और जहां ऊर्जा बहती है, वहां सृजन होता है। तुम्हारे भीतर अनंत ऊर्जा छिपी है। प
Speaker A
नहीं हुई। बस दिशा खो गई है। जैसे सूर्य की किरणें जब फैली रहती हैं तो बस उजाला देती है। लेकिन जब उन्हें एक लेंस से केंद्रित कर दिया जाए तो वही किरणें आग जला सकती हैं। ध्यान वही लेंस है जो
Speaker A
तुम्हारी ऊर्जा को केंद्रित करता है। और जब तुम्हारा ध्यान एक दिशा में स्थिर होता है तो असंभव भी संभव हो जाता है। लेकिन अगर ध्यान हर पल बदलता रहे कभी अतीत में कभी भविष्य में कभी दूसरों के दोषों पर
Speaker A
कभी अपनी कमियों पर तो ऊर्जा बिखर जाती है। फिर तुम थक जाते हो टूट जाते हो और जीवन नीरस लगने लगता है। याद रखो तुम जिस पर ध्यान देते हो वह चीज तुम्हारे जीवन में बढ़ने लगती है। अगर तुम कमी पर ध्यान
Speaker A
दोगे मेरे पास यह नहीं है वह नहीं है। मैं दूसरों जैसा क्यों नहीं हूं तो वही अभाव बढ़ेगा। क्योंकि ध्यान एक चुंबक है। वह वैसा ही आकर्षित करता है जैसा सोचते हो। अगर तुम प्रेम पर ध्यान दोगे तो प्रेम
Speaker A
बढ़ेगा। अगर तुम करुणा पर ध्यान दोगे तो समृद्धि बढ़ेगी। क्योंकि करुणा तुम्हें उस ऊर्जा से जोड़ देती है जो सृष्टि का मूल है। पूरा ब्रह्मांड करुणा में ही धड़क रहा है। तुम देखो पेड़ बिना किसी अपेक्षा के फल देते हैं। नदियां बिना रोग के बहती
Speaker A
हैं। सूर्य रोज उगता है। बिना धन्यवाद के भी देता रहता है। क्योंकि उसका ध्यान देने पर है ना कि पाने पर। और जहां देना होता है वहां समृद्धि स्वयं आती है। इसीलिए अगर तुम अपने ध्यान की दिशा बदल दो तो
Speaker A
तुम्हारा पूरा जीवन बदल सकता है। जो नहीं है उस पर मत सोचो। जो है उसे देखो और उसके लिए आभार व्यक्त करो। उसी क्षण चमत्कार शुरू हो जाता है। ध्यान नकारात्मकता से हटाओ क्योंकि नकारात्मक विचार ऊर्जा को चूस लेते हैं। वे तुम्हारे भीतर अंधेरा
Speaker A
पैदा करते हैं। और जहां अंधेरा है वहां सृजन नहीं केवल क्षय होता है। जब तुम सजग होकर ध्यान को सकारात्मक दिशा में मोड़ते हो तो तुम्हारे भीतर एक प्रकाश जगता है। वही प्रकाश बाहर के अंधेरों को मिटा देता
Speaker A
है। फिर जीवन कठिन नहीं लगता क्योंकि तुम्हारी दृष्टि बदल गई है। याद रखो दुनिया वैसी नहीं है जैसी वह दिखती है। दुनिया वैसी है जैसा तुम देखते हो। तुम्हारी दृष्टि ही तुम्हारी दुनिया बनाती है। अगर तुम जीवन को एक वरदान की तरह देखो
Speaker A
तो वह वरदान बन जाता है। अगर उसे बोझ समझो तो वही जीवन भार लगने लगता है। इसलिए अपना ध्यान, प्रेम, कृतज्ञता और शांति की दिशा में मोड़ो। धीरे-धीरे तुम देखोगे कि वही दिशा तुम्हारी ऊर्जा को रूपांतरित कर देगी। जो कभी असंभव लगता था वह सहज रूप से
Speaker A
संभव होने लगेगा। क्योंकि सृष्टि का नियम बहुत सरल है। ऊर्जा वहीं जाती है जहां ध्यान जाता है और जहां ध्यान होता है वहीं जीवन खिल उठता है। जीवन में इच्छा का होना स्वाभाविक है क्योंकि इच्छा ही विकास की
Speaker A
दिशा है। यदि इच्छा ना हो तो कोई पेड़ बीज से वृक्ष ना बने। कोई बच्चा बड़ा ना हो। कोई आत्मा परमात्मा की खोज में ना निकले। इसलिए इच्छा बुरी नहीं है। वह तो ऊर्जा है। वही तुम्हें आगे बढ़ाती है। वही
Speaker A
तुम्हारे भीतर जीवन की गति पैदा करती है। लेकिन जहां इच्छा में आसक्ति जुड़ जाती है, वहां समस्या शुरू होती है। आसक्ति का अर्थ यह पूरा होना ही चाहिए। नहीं तो मैं अधूरा हूं। और जैसे ही तुम यह मान लेते हो
Speaker A
कि किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के बिना तुम अधूरे हो। तुमने अपनी स्वतंत्रता खो दी। आसक्ति तुम्हें बंधन में डाल देती है। वह तुम्हारे मन को बेचैन बना देती है। क्योंकि अब तुम परिणाम पर टिके हो यात्रा पर नहीं। तुम चाहते हो कि जीवन तुम्हारी
Speaker A
इच्छा के अनुसार चले। जबकि अस्तित्व तुम्हारे विकास के अनुसार चलता है। तुम्हें जो चाहिए वह हमेशा सही नहीं होता। पर जो तुम्हें मिलता है उसमें तुम्हारे विकास की संभावना जरूर छिपी होती है। इच्छा तो करो लेकिन उसे मांग मत बनाओ।
Speaker A
इच्छा एक सुगंध की तरह होनी चाहिए। जरूरत की तरह नहीं। जब तुम किसी चीज को अत्यधिक चाहने लगते हो तो तुम अस्तित्व पर भरोसा खो देते हो कि तुम्हें ही पता है कि तुम्हारे लिए क्या ठीक है। और यही अहंकार
Speaker A
की शुरुआत है। इच्छा को प्रार्थना बना दो। जैसे बच्चा अपने पिता से कहता है पिता मुझे जो ठीक लगे वही देना वह मांग नहीं करता वह भरोसा करता है। वह जानता है कि पिता उसे वही देंगे जो उसके भले के लिए
Speaker A
है। ऐसे ही जब तुम अस्तित्व से प्रार्थना करते हो तो तुम अपने जीवन को सहज प्रवाह में छोड़ देते हो। ऐसी इच्छा में तनाव नहीं होता बल्कि आनंद होता है। क्योंकि अब तुम परिणाम से बंधे नहीं हो बल्कि यात्रा
Speaker A
का आनंद ले रहे हो। तुम यह जानते हो कि जो भी घटेगा वही सर्वोत्तम होगा और यह जानना ही ध्यान है जब इच्छा से आसक्ति हट जाती है तो तुम भीतर से हल्के हो जाते हो। अब चाहे वह इच्छा पूरी हो या ना हो तुम्हारी
Speaker A
शांति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और यही वह अवस्था है जहां इच्छा तुम्हारे खिलाफ नहीं तुम्हारे साथ काम करने लगती है। याद रखो इच्छा नदी की तरह है जो बहना चाहती है और आसक्ति बांध की तरह जो उस बहाव को रोक
Speaker A
देती है। नदी को बांधोगे तो रुकावट शुरू होगी। बहने दोगे तो वही जल जीवन बन जाएगा। इसलिए चाहो क्योंकि चाह ही जीवन की दिशा है। पर उसे पकड़ो मत क्योंकि पकड़ ही दुख की जड़ है। जब तुम स्वतंत्र होकर इच्छा
Speaker A
करते हो तो अस्तित्व तुम्हारे साथ हो जाता है। और तब जो घटता है वह केवल तुम्हारा नहीं बल्कि स्वयं अस्तित्व का सृजन बन जाता है। यही कला है। इच्छा करो मगर आसक्ति मत रखो। यही ध्यान की पहली सीढ़ी
Speaker A
है और मुक्ति का आरंभ भी जब तुम्हारी इच्छा शुद्ध होती है। अर्थात वह तुम्हारे भीतर की सच्चाई से तुम्हारे अस्तित्व की गहराई से उठती है तो पूरा ब्रह्मांड तुम्हारे साथ हो जाता है। ये कोई चमत्कार नहीं है। ये सृष्टि का स्वाभाविक नियम है।
Speaker A
देखो एक छोटा सा बीज जब धरती में गिरता है तो वह अकेला नहीं होता। धरती उसे पोषण देती है। पानी उसे जीवन देता है और वायु उसे सांस देती है। एक बीज के खिलने में पूरा ब्रह्मांड सहयोग करता है। क्यों?
Speaker A
क्योंकि वह बीज अपने स्वभाव के अनुसार चल रहा है। वह कुछ बनने की कोशिश नहीं कर रहा। वो वही बनना चाहता है जो उसकी प्रकृति में है। जब तुम भी अपने स्वभाव के साथ चलते हो तो अस्तित्व तुम्हारे मार्ग
Speaker A
में नहीं तुम्हारे साथ चलता है। समस्या तब आती है जब तुम्हारी इच्छाएं तुम्हारी नहीं होती। जब तुम भीड़ की नकल में जी रहे होते हो। जब तुम्हारी चाहतें समाज की अपेक्षाओं से बनी होती हैं तब तुम अपने मार्ग से भटक
Speaker A
जाते हो। ऐसी इच्छाओं के लिए ब्रह्मांड कोई सहयोग नहीं करता क्योंकि वे तुम्हारी आत्मा की ध्वनि नहीं है। अस्तित्व केवल सत्य के साथ बहता है। झूठ के साथ नहीं। जब इच्छा शुद्ध होती है तो उसमें कोई भय, कोई
Speaker A
संदेह, कोई लालच नहीं होता। वह बस स्वाभाविक होती है जैसे फूल का खिलना। जैसे नदी का बहना। फूल कभी सोचता नहीं कि उसे कब और कैसे खेलना है। वह बस तैयार होता है और सही समय आने पर खिल जाता है।
Speaker A
ऐसे ही जब तुम्हारा मन शांत हो जाता है। जब भीतर का शोर थम जाता है तो तुम्हारी सच्ची चाहत अपने आप स्पष्ट हो जाती है और वही चाहत तुम्हें तुम्हारे जीवन के मार्ग पर ले जाती है। ब्रह्मांड केवल उन लोगों
Speaker A
की मदद करता है जो अपने भीतर सच्चे हैं क्योंकि अस्तित्व सत्य की तरंग पर ही चलता है। जब तुम भी उसी तरंग में होते हो। जब तुम्हारे विचार भावना और कर्म एक ही दिशा में बहते हैं तो तुम्हारा हर कदम
Speaker A
ब्रह्मांड के प्रवाह के साथ हो जाता है। फिर संयोग घटने लगते हैं। दरवाजे अपने आप खुलने लगते हैं। और वह चीजें जो पहले असंभव लगती थी, सहज हो जाती है। यह कोई रहस्यवाद नहीं। यह विज्ञान है। जैसे चुंबक
Speaker A
अपने समान धातु को आकर्षित करता है, वैसे ही शुद्ध चेतना वही परिस्थितियां आकर्षित करती हैं। तुम जो भीतर सोचते हो और महसूस करते हो वही बाहर प्रकट होता है। इसलिए अपने भीतर की चाह को पहचानो। ध्यान में उतर कर देखो कि क्या सच में तुम्हारे हृदय
Speaker A
से उठ रहा है। यदि वह इच्छा तुम्हारे अहंकार से नहीं बल्कि तुम्हारे अस्तित्व की गहराई से आती है तो वह पूरी होकर रहेगी। फिर तुम्हें दौड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अस्तित्व तुम्हारे कदमों को दिशा देगा। याद रखो जब चाह शुद्ध होती है तो
Speaker A
ब्रह्मांड विरोध नहीं करता। वह सहयोग करता है क्योंकि तब तुम अलग नहीं रहते। तुम उसी सृष्टि का हिस्सा बने जाते हो जिसने तुम्हें बनाया है और तब जीवन संघर्ष नहीं रहता। वह एक सुंदर नृत्य बन जाता है जिसमें तुम और अस्तित्व साथ-साथ झूमते हो।
Speaker A
मनुष्य का मन बहुत चतुर है पर अस्तित्व सरल है। मन नकार में सोचता है। मैं दुखी नहीं होना चाहता। मैं असफल नहीं होना चाहता। मुझे डर नहीं चाहिए। लेकिन अस्तित्व नहीं को नहीं समझता। वह केवल तरंग केवल भाव को समझता है। तुम जो भाव से
Speaker A
भेजते हो वही सृजित होता है। यदि तुम बार-बार कहते हो मैं दुख नहीं चाहता तो तुम्हारा ध्यान किस पर है? दुख पर। और जहां ध्यान होता है वहां ऊर्जा बहती है तो दुख ही बढ़ता है। अस्तित्व सुनता है
Speaker A
तुम्हारे शब्द नहीं तुम्हारे कंपन तुम्हारी ऊर्जा को। शब्द तो सतह पर है। असली संदेश तुम्हारे भाव से जाता है। तुम चाहे नहीं जोड़ो पर यदि तुम्हारा ध्यान दुख पर है तो वही तुम्हारे जीवन में आकर्षित होगा। एक बच्चा जब कहता है मुझे
Speaker A
डर नहीं लगना चाहिए तो डर ही उसे घेर लेता है। क्योंकि उसका मन उसी दिशा में चल पड़ा है। मन वही बनाता है जिस पर तुम केंद्रित होते हो। इसीलिए जिससे बचना चाहते हो वही बढ़ा जाता है। जिसे अपनाते हो वही रूप ले
Speaker A
लेता है। तुम्हारा जीवन किसी ना किसी विचार का प्रतिबिंब है। हर विचार एक बीज है। अगर वह बीज ना से भरा है तो वह भीतर तनाव बोता है। और अगर वह हां से भरा है तो जीवन में समरसता लाता है। इसलिए मैं कहता
Speaker A
हूं ना से नहीं हां से सोचो। मैं दुखी नहीं होना चाहता कि जगह कहो। मैं आनंद में जीना चाहता हूं। मैं असफल नहीं होना चाहता कि जगह कहो। मैं सफलता को स्वीकार करता हूं। मुझे डर नहीं चाहिए कि जगह कहो। मैं
Speaker A
साहस में जी रहा हूं। याद रखो ब्रह्मांड नकारात्मक तरंगों को सृजन के रूप में नहीं लेता। वह उन्हें भ्रम के रूप में लेता है और भ्रम सदा उलझन ही पैदा करता है। जब तुम सकारात्मक भाव में सोचते हो तो तुम्हारी
Speaker A
तरंगे सृष्टि के संगीत के साथ जुड़ जाती है। तब जीवन में सहजता आती है। यह कोई मनोविज्ञान नहीं यह ध्यान का विज्ञान है। जो भीतर के भाव को जान लेता है, वह जान लेता है कि ऊर्जा कैसे काम करती है। तुम्हारे भाव
Speaker A
तुम्हारा भविष्य बना रहे हैं। हर नहीं तुम्हें बांधता है और हर हां तुम्हें मुक्त करता है। इसलिए जीवन में नकार से दूर रहो। यह मत कहो कि मैं यह नहीं चाहता बल्कि कहो मैं यह चाहता हूं और जो चाहो
Speaker A
उसे पूरे दिल से चाहो उसे प्रेम की तरह चाहो ना कि डर की तरह क्योंकि जहां प्रेम है वहां सृजन है। और जहां डर है वहां विनाश है। अपने शब्दों को नहीं अपने भावों को बदलो। ना को हां में बदल दो। देखना
Speaker A
तुम्हारा पूरा जीवन नई दिशा में बहने लगेगा और तब तुम्हें महसूस होगा सृष्टि सदा तुम्हारे साथ थी। बस तुम ही नहीं कहकर अपने दरवाजे बंद किए बैठे थे। ध्यान और चाह का संबंध बहुत गहरा है। चाह अपने आप
Speaker A
में एक शक्ति है। सृजन की शक्ति पर जब यह शक्ति अंधे मन के हाथ में होती है तो यह विनाश भी कर सकती है। इसलिए ध्यान आवश्यक है ताकि चाह को दिशा मिले, स्पष्टता मिले, प्रकाश मिले। ध्यान के बिना चाह वैसी ही
Speaker A
है जैसे बिना पतवार की नाव लहरों में भटकती है, टकराती है, डूबती है। लेकिन ध्यान आने पर वही नाव दिशा पकड़ लेती है। फिर हवा भी साथ देने लगती है और समंदर भी रास्ता बना देता है। जब तुम ध्यान में
Speaker A
उतरते हो तो मन का शोर धीमा पड़ने लगता है। विचारों की भीड़ हटती है और भीतर से एक गहरी शांति उठती है। उस शांति में जो भी चाह उत्पन्न होती है, वह तुम्हारी आत्मा की चाह होती है। स्वार्थ से रहित,
Speaker A
भय से मुक्त, शुद्ध और सरल। ऐसी चाहतें कभी तुम्हें नहीं जलाती। वे तुम्हें खिलाती हैं। क्योंकि वे अस्तित्व की धारा के साथ बहती हैं। वे चाहतें तुम्हारे भीतर आनंद भर देती हैं। चाहे वे पूरी हो या ना हो क्योंकि वे संघर्ष नहीं है। वे
Speaker A
प्रार्थना है। ध्यान का अर्थ है भीतर का आकाश साफ करना। जैसे वर्षा के बाद आसमान निर्मल हो जाता है। वैसे ही ध्यान के बाद मन पारदर्शी हो जाता है। और तब तुम पहली बार अपनी सच्ची चाह को देख पाते हो। वह
Speaker A
चाह जो किसी और ने नहीं दी जो तुम्हारे अस्तित्व से जन्मी है। ऐसी चाहत पूरी होने के लिए भागदौड़ की जरूरत नहीं होती। अस्तित्व खुद उसके पीछे काम करता है क्योंकि तुम जो भीतर सोचते और महसूस करते हो वही बाहर प्रकट होता है। इसलिए अपने
Speaker A
भीतर की चाह को पहचानो। ध्यान में उतर कर देखो कि क्या सच में तुम्हारे हृदय से उठ रहा है। यदि वह इच्छा तुम्हारे अहंकार से नहीं बल्कि तुम्हारे अस्तित्व की गहराई से आती है तो वह पूरी होकर रहेगी। फिर
Speaker A
तुम्हें दौड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अस्तित्व तुम्हारे कदमों को दिशा देगा। याद रखो जब चाह शुद्ध होती है तो ब्रह्मांड विरोध नहीं करता। वह सहयोग करता है क्योंकि तब तुम अलग नहीं रहते। तुम उसी सृष्टि का हिस्सा बनने। जाते हो जिसने
Speaker A
तुम्हें बनाया है और तब जीवन संघर्ष नहीं रहता। वह एक सुंदर नृत्य बन जाता है। जिसमें तुम और अस्तित्व साथ-साथ झूमते हो। मनुष्य का मन बहुत चतुर है पर अस्तित्व सरल है। मन नकार में सोचता है मैं दुखी
Speaker A
नहीं होना चाहता। मैं असफल नहीं होना चाहता। मुझे डर नहीं चाहिए। लेकिन अस्तित्व नहीं को नहीं समझता। वह केवल तरंग केवल भाव को समझता है। तुम जो भाव से भेजते हो वही सृजित होता है। यदि तुम बार-बार कहते हो मैं दुख नहीं चाहता तो
Speaker A
तुम्हारा ध्यान किस पर है? दुख पर। और जहां ध्यान होता है वहां ऊर्जा बहती है तो दुख ही बढ़ता है। अस्तित्व सुनता है तुम्हारे शब्द नहीं तुम्हारे कंपन तुम्हारी ऊर्जा को। शब्द तो सतह पर है। असली संदेश तुम्हारे भाव से जाता है। तुम
Speaker A
चाहे नहीं जोड़ो पर यदि तुम्हारा ध्यान दुख पर है तो वही तुम्हारे जीवन में आकर्षित होगा। एक बच्चा जब कहता है मुझे डर नहीं लगना चाहिए तो डर ही उसे घेर लेता है क्योंकि उसका मन उसी दिशा में चल पड़ा
Speaker A
है। मन वही बनाता है जिस पर तुम केंद्रित होते हो। इसीलिए जिससे बचना चाहते हो वही बढ़ता है। जाता है। जिसे अपनाते हो वही रूप ले लेता है। तुम्हारा जीवन किसी ना किसी विचार का प्रतिबिंब है। हर विचार एक
Speaker A
बीज है। अगर वह बीज ना से भरा है तो वह भीतर तनाव बोता है। और अगर वह हां से भरा है तो जीवन में समरसता लाता है। इसलिए मैं कहता हूं ना से नहीं हां से सोचो। मैं दुखी नहीं होना चाहता कि जगह कहो मैं आनंद
Speaker A
में जीना चाहता हूं। मैं असफल नहीं होना चाहता कि जगह कहो। मैं सफलता को स्वीकार करता हूं। मुझे डर नहीं चाहिए कि जगह कहो। मैं साहस में जी रहा हूं। याद रखो ब्रह्मांड नकारात्मक तरंगों को सृजन के रूप में नहीं लेता। वह उन्हें भ्रम के रूप
Speaker A
में लेता है और भ्रम सदा उलझन ही पैदा करता है। जब तुम सकारात्मक भाव में सोचते हो तो तुम्हारी तरंगे सृष्टि के संगीत के साथ जुड़ जाती है। तब जीवन में सहजता आती है। यह कोई मनोविज्ञान नहीं। यह ध्यान का
Speaker A
विज्ञान है। जो भीतर के भाव को जान लेता है। वह जान लेता है कि ऊर्जा कैसे काम करती है। तुम्हारे भाव तुम्हारा भविष्य बना रहे हैं। हर नहीं तुम्हें बांधता है और हर हां तुम्हें मुक्त करता है। इसलिए
Speaker A
जीवन में नकार से दूर रहो। यह मत कहो कि मैं यह नहीं चाहता बल्कि कहो मैं यह चाहता हूं। और जो चाहो उसे पूरे दिल से चाहो उसे प्रेम की तरह चाहो ना कि डर की तरह। क्योंकि जहां प्रेम है वहां सृजन है और
Speaker A
जहां डर है वहां विनाश है। अपने शब्दों को नहीं अपने भावों को बदलो ना को हां में बदल दो। देखना तुम्हारा पूरा जीवन नई दिशा में बहने लगेगा। और तब तुम्हें महसूस होगा सृष्टि सदा तुम्हारे साथ थी। बस तुम ही
Speaker A
नहीं कहकर अपने दरवाजे बंद किए बैठे थे। ध्यान और चाह का संबंध बहुत गहरा है। चाह अपने आप में एक शक्ति है। सृजन की शक्ति है। पर जब यह शक्ति अंधे मन के हाथ में होती है तो यह विनाश भी कर सकती है। इसलिए
Speaker A
ध्यान आवश्यक है ताकि चाह को दिशा मिले, स्पष्टता मिले, प्रकाश मिले। ध्यान के बिना चाह वैसी ही है जैसे बिना पतवार की नाव लहरों में भटकती है, टकराती है, डूबती है। लेकिन ध्यान आने पर वही नाव दिशा पकड़
Speaker A
लेती है। फिर हवा भी साथ देने लगती है और समंदर भी रास्ता बना देता है। जब तुम ध्यान में उतरते हो तो मन का शोर धीमा पड़ने लगता है। विचारों की भीड़ हट
Topics:ओशोजीवन दर्शनध्यानआत्मिक चाहतमन और आत्मासकारात्मक सोचब्रह्मांड सहयोगसच्ची इच्छाआत्म-जागरूकताहिंदी प्रवचन








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