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The Night That Changed Pakistan: The Execution of Zulfikar Ali Bhutto

यह वीडियो जुल्फिकार अली भुट्टो की फांसी और पाकिस्तान की सियासत में उसके प्रभाव की कहानी बताता है।

Key Takeaways

  • जुल्फिकार अली भुट्टो की फांसी एक राजनीतिक साजिश और सियासी प्रतिशोध का परिणाम थी।
  • उनकी मौत ने पाकिस्तान की सियासत और लोकतंत्र को गहरा झटका दिया।
  • अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की।
  • भुट्टो की फांसी ने देश में सैन्य तानाशाही को मजबूत किया।
  • यह घटना पाकिस्तान के न्यायिक और राजनीतिक इतिहास में एक विवादास्पद अध्याय है।

What the video covers

  • 3 अप्रैल 1979 को जुल्फिकार अली भुट्टो को रावलपिंडी जेल में फांसी दी गई।
  • भुट्टो पाकिस्तान के पहले चुने हुए वजीर-ए-आज़म थे और उनकी फांसी ने देश की सियासत को हमेशा के लिए बदल दिया।
  • 1977 में जनरल जियाउल हक ने ऑपरेशन फियर प्ले के तहत भुट्टो की सरकार को गिराया।
  • भुट्टो पर नवाब मोहम्मद अहमद खान के कत्ल का आरोप लगा, जिसे राजनीतिक साजिश माना गया।
  • लाहौर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भुट्टो के खिलाफ विवादास्पद मुकदमे चले।
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देशों ने भुट्टो की फांसी पर आपत्ति जताई और उन्हें निर्वासित करने की पेशकश की।
  • भुट्टो की अंतिम 24 घंटे की कहानी में उनके परिवार से आखिरी मुलाकात और जेल में बिताए अंतिम पल शामिल हैं।
  • जनरल जियाउल हक ने भुट्टो को खत्म करने के लिए सख्त कदम उठाए और राजनीतिक विरोध को दबाया।
  • भुट्टो ने अपनी मौत से पहले देश के भविष्य के लिए आखिरी खत लिखे, जिन्हें बाद में छुपा दिया गया।
  • यह घटना पाकिस्तान की न्याय व्यवस्था और लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद मोड़ थी।

Answers

Questions about this video

जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी क्यों दी गई?

भुट्टो पर नवाब मोहम्मद अहमद खान के कत्ल का आरोप लगा था, जिसे राजनीतिक साजिश माना जाता है। उनकी फांसी का मकसद एक निडर सियासी वजूद को खत्म करना था।

जनरल जियाउल हक ने भुट्टो के खिलाफ क्या कदम उठाए?

जनरल जियाउल हक ने 1977 में ऑपरेशन फियर प्ले के तहत भुट्टो की सरकार को गिराया, उनके खिलाफ मुकदमा चलाया और अंततः फांसी की सजा दिलाई।

भुट्टो की फांसी का पाकिस्तान की सियासत पर क्या प्रभाव पड़ा?

भुट्टो की फांसी ने पाकिस्तान की सियासत को स्थायी रूप से बदल दिया, सैन्य तानाशाही को मजबूत किया और लोकतंत्र को गहरा झटका दिया।

Full Transcript — Download SRT & Markdown

00:00
Speaker A
रात के 2:05 पाकिस्तान के पहले मुंतखिब वजीर-ए-आज़म के गले में फंदा डाला जा चुका था। चंद लम्हों बाद तख्ता गिरने वाला था। लेकिन उस रात सिर्फ एक इंसान नहीं मरने वाला था। पाकिस्तान की सियासत का एक पूरा बाप हमेशा के लिए बदलने वाला था। सवाल सिर्फ यह नहीं कि जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी क्यों दी गई? सवाल यह है कि क्या यह इंसाफ था या तारीख का सबसे मुतनाजे सियासी फैसला? एक ऐसा शख्स जिसने कल तक दुनिया के 30 से ज्यादा मुल्क के सरबराहों की मेजबानी की थी जो अकवामे मुत्तहदा के ऐवानों में आलमी ताकतों की आंखों में आंखें डालकर बोलता था। आज लोहे के एक जंग आलूद फ्रेम पर खामोश लेटा था। बाहर फौजी जीपों के इंजन की गूंज थी और अंदर एक जल्लाद अपने हाथों में जैतून के तेल में भीगी हुई रस्सी को गिरे लगा रहा था। क्या यह सिर्फ एक अदालती फैसला था? या फिर तारीख का सबसे बड़ा संग दिलाना और खौफनाक सियासी इंतकाम। आज से 46 साल पहले 4 अप्रैल 1979 की उस काली रात को रावलपिंडी जेल के अंदर क्या हुआ था? वो आखिरी खुदूत कहां गए? और जनरल जियाउल हक ने आलमी ताकतों और शाही खानदानों के हंगामी फोन क्यों काट दिए थे? यह कहानी है पाकिस्तान के पहले मुंतखब वजीर एआम जुल्फिकार अली भुट्टो के उन आखिरी 24 घंटों की जिन्होंने इस मुल्क का मुस्तकबिल हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। दास्तान का आगाज वहां से नहीं होता जहां रस्सी गले में डाली गई। इस कहानी की बुनियाद 5 जुलाई 1977 की इस भीगती हुई रात को रखी गई थी। जब ऑपरेशन फियर प्ले के नाम पर मुल्क की जम्हूरियत की शहर पर पांव रख दिया गया। जनरल जियाउल हक वो आर्मी चीफ जिन्हें खुद जुल्फिकार अली भुट्टो ने सात सीनियर जनरलों पर तरजीह देकर इस ओदे पर बिठाया था। उन्होंने रात के अंधेरे में वजीर एआम हाउस का घेराव कर लिया। इब्तदा में कहा गया कि यह सिर्फ 90 दिनों का एक आरजी कदम है। सिर्फ नए इंतखाबादत करवाने के लिए। लेकिन इख्तेदार का नशा एक ऐसा जहर है जो एक बार रगों में उतर जाए तो उतारे नहीं उतरता। जनरल जियाउल हक को जल्द ही अंदाजा हो गया कि अगर पाकिस्तान में शफाफ और आजादाना इंतखाबादत हुए तो जुल्फिकार अली भुट्टो एक बार फिर भारी अक्सरियत के साथ इख्तेदार के ऐवानों में वापस आएंगे। और अगर भुट्टो वापस आ गए तो आइन के आर्टिकल छह के तहत संगीन गद्दारी का मुकदमा उनका मुंतजिर होगा। अब सवाल यह नहीं था कि इख्तेदार किसके पास रहेगा? सवाल यह था कि इन दोनों में से जिंदा कौन बचेगा? फिर तारीख ने वो मंज़र देखा जिसने अदलिया के चेहरे पर एक ऐसा दाग लगाया जो आज तक नहीं धुल सका। नवाब मोहम्मद अहमद खान का कत्ल केस। एक ऐसा केस जिसमें असल निशाना अहमद रजा कसूरी थे। लेकिन गोली उनके वालिद को जा लगी। एफआईआर में भुट्टो का नाम दर्ज हुआ। लेकिन उस केस की फाइल को तारीख ताकतचों में दबा दिया गया था। जनरल जिया के इख्तदार में आते ही उस फाइल को निकालकर दोबारा खोला गया और जुल्फिकार अली भुट्टो को लाहौर हाईकोर्ट के कटहरे में ला खड़ा किया गया। लाहौर हाईकोर्ट में मुकदमा चलाते वक्त माहौल में शदीद तनाव और खिंचाव था। चीफ जस्टिस मौलवी मुश्ताक हुसैन और जुल्फिकार अली भुट्टो के दरमियान पुरानी तल्खी किसी से ढकी छुपी नहीं थी। अदालत के अंदर जुल्फिकार अली भुट्टो को एक आम मुलजिम की तरह लकड़ी के जंगले में खड़ा किया गया। उनके दफा के तमाम हुकूक को महदूद किया जाता रहा। उनके गवाहों पर सवालात के रास्ते बंद किए गए और आखिरकार लाहौर हाईकोर्ट ने मुल्क के मुंतखिब साबिक वजीर एआम को सजा-ए-मौत का हुकुम सुना दिया। जब यह तारीखी मुकदमा अपील के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो वहां सात जजों पर मुश्तमिल एक पैनल तशकील दिया गया। अदालत की कार्रवाई महीनों चली। एवान एअ अल के अंदर जजों में शदीद इख्तेला और तकसीम वाजे नजर आ रही थी। सात में से तीन जजों ने भुट्टो को तमाम इल्जामात से मुकम्मल तौर पर बारी करने का फैसला दिया। जबकि चार जजों ने सजा-ए-मौत को बरकरार रखा। चार बा मुकाबला तीन। दुनिया की कानूनी तारीख में इतने बारीक, मुतनाजे और कमजोर फैसले पर कभी किसी रियासत के सरबराह को फांसी पर नहीं लटकाया गया था। लेकिन यहां मकसद अदलो इंसाफ कायम करना नहीं। एक निडर सियासी वजूद को हमेशा के लिए खत्म करना था। जैसे ही सुप्रीम कोर्ट से नजरसानी की तमाम अपीलें खारिज हुई, दुनिया भर के अहम तरीन दारुल हुकूमतों में सरासीगी फैल गई। शाह सऊदी अरब शाह खालिद, ईरान के शहंशाह मोहम्मद रजा पहलवी, लीबिया के मुम्मे कजाफी, तुर्की के वज़ीर एआज़म यहां तक कि अमकी सदर जमी कॉडर और बर्तनानिया की हुकूमत ने जनरल जियाउल हक को जाती और इंतहाई सख्त खुतूत लिखे। फस्तीनी रहनुमा यासिर अरफात ने अपना खुसूसी नुमाइंदा इस्लामाबाद भेजा और पेशकश की कि भुट्टो को जलावतन करके किसी दूसरे मुल्क मुंतकिल कर दिया जाए। वो आइंदा कभी पाकिस्तान की सियासत में हिस्सा नहीं लेंगे। सऊदी अरब के शाह खालिद ने तो यहां तक पैगाम भेजा। पाकिस्तान के लिए भुट्टो की जिंदगी उसकी मौत से कहीं ज्यादा फायदेमंद है। लेकिन जनरल जियाउल हक जानते थे कि अगर जुल्फिकार अली भुट्टो जिंदा रहे। खा वह जेल की सलाखों के पीछे हो या मुल्क से बाहर वो किसी भी वक्त एक तूफान बनकर उनका इख्तेदार बहा ले जाएंगे। जियाउल हक ने उन तमाम आलमी खुतूत को एक खुफिया फाइल में बंद किया और अपने करीबी मिलिट्री मुशीरों की तरफ देखकर सिर्फ एक जुमला कहा। एक कब्र में दो बंदे नहीं रह सकते या मैं या भुट्टो। और यूं 3 अप्रैल 1979 की वह खौफनाक और बोझल सुबह तुलू हुई। जहां से रावलपिंडी जेल के अंदर आखिरी 24 घंटों का उल्टा गिनत शुरू हुआ। 3 अप्रैल 1979 सुबह के 8:00 बजे रावलपिंडी डिस्ट्रिक्ट जेल का माहौल मामूल से बिल्कुल मुख़्तलिफ और खौफनाक हद तक साकित था। जेल के इर्द-गिर्द तमाम ऊंची इमारतों पर फौजी स्नाइपर्स तायनात कर दिए गए थे। रावलपिंडी और इस्लामाबाद के तमाम बड़े अस्पतालों में हंगामी हालत नाफिस की जा चुकी थी। तारीख और तंग कोठरी में लेटे हुए जुल्फिकार अली भुट्टो को अभी तक यह अंदाजा नहीं था कि आज उनकी जिंदगी का आखिरी दिन है। पाकिस्तान के जेल कवानीन के मुताबिक किसी भी कैदी को फांसी देने से कम से कम 24 घंटे पहले आगाह करना और उसके खानदान से आखिरी मुलाकात करवाना लाजमी होता है। लेकिन हुकूमत ने इस कानूनी हक को भी एक इंतहाई मोहताजद फौजी ऑपरेशन में बदल दिया। दोपहर के वक्त जेल सुपरिंटेंडेंट चौधरी यार मोहम्मद भुट्टो की कोठरी के सामने आए। लोहे का भारी दरवाजा एक हौलनाक चरचराहट के साथ खुला। सुपरिंटेंडेंट की आवाज खौफ से कांप रही थी जब उन्होंने कहा मिस्टर भुट्टो हुकूमत की तरफ से रहम की अपील पर कोई फैसला नहीं हुआ और ब्लैक वारेन जारी कर दिए गए हैं। आपकी फांसी का वक्त मुकर्रर कर दिया गया है। जुल्फकारक अली भुट्टो ने अपने रिवायती गुरूर और इस्तकामत के साथ चेहरे पर खौफ का एक तासुर लाए बगैर जवाब दिया। कितनी जल्दी है तुम लोगों को? दोपहर 1:30 बेगम नुसरत भुट्टो और उनकी बेटी बीनजीर भुट्टो को सिहाला रेस्ट हाउस से एक पुलिस विन में रावलपिंडी डिस्ट्रिक्ट जेल लाया गया। उन्हें यह नहीं बताया गया था कि यह उनकी आखिरी मुलाकात है। जब मां और बेटी को इस तंगोतारी कोठरी के बाहर लाया गया। जहां मुल्क का साबिक वजीर एआम जमीन पर बिछे एक मामूली गधे पर बैठा था तो लम्हे भर के लिए वक्त साकित हो गया। जेल कवानीन के तहत यह मुलाकात आधे घंटे की होनी चाहिए थी। लेकिन हालात की संगीनी को देखते हुए उसे बढ़ाकर 3 घंटे कर दिया गया। लोहे की जाली के आर-पार। बेनजीर भुट्टो ने अपने बाप के हाथ को छूने की नाकाम कोशिश की। भुट्टो ने अपनी बेटी की तरफ देखा और कहा, पिंकी तुमने हिम्मत नहीं हारनी। यह लोग मेरे जिस्म को खत्म कर सकते हैं। लेकिन मेरे नजरिए को नहीं। नुसरत भुट्टो ने अपने आंसुओं को जब्त करने की कोशिश की, लेकिन उनकी सिसकियां जेल की सर्द दीवारों से टकरा रही थी। जब आखिरी वक्त आया और सेंट्री ने लोहे का दरवाजा बजाया तो बीनजीर भुट्टो ने अपने बाप को आखिरी बार गले लगाने की इजाजत मांगी। लेकिन जेल हुकाम ने लोहे की गल खोलने से साफ इंकार कर दिया। बीनजीर भुट्टो ने जाली के सुराखों में से अपनी उंगलियों को अंदर किया। जुल्फकार अली भुट्टो ने उन उंगलियों को चूमा और कहा खुदा हाफिज पिंकी खुदा हाफिज। यह इन दोनों के दरमियान दुनिया में आखिरी कलाम था। शाम 6:00 बजे बेगम नुसरत भुट्टो और बेनजीर भुट्टो को रोते हुए वापस ले जाया गया। भुट्टो ने अपने आखिरी लम्हात को जाया नहीं होने दिया। उन्होंने अपनी डायरिया और कुछ इंतहाई अहम जाती कागजात संभाले। उन्होंने जेल के अमले से शेव बनाने का सामान मांगा। जब एक फौजी अफसर कर्नल रफी उनकी कोठरी के पास आए तो भुट्टो ने शेव करते हुए आईने में देखकर मुस्कुराते हुए कहा मैं नहीं चाहता कि जब यह लोग मुझे फांसी घाट ले जाएं तो मैं एक बुजदिल या बिखरे हुए इंसान की तरह नजर आऊं। रात 9:00 बजे उन्हें आखिरी खाना पेश किया गया लेकिन उन्होंने सिर्फ थोड़ी सी चाय पी। उन्होंने सफेद कागज पर कुछ आखिरी तहरीरें लिखी वो खुतूद जिनमें मुल्क के मुस्तकबिल अपने बच्चों के लिए वसीयत और तारीख का फैसला दर्ज था। लेकिन वह खुतूत कहां गए जिन्हें मिलिट्री हुकाम ने उसी रात कब्जे में ले लिया और वह कभी मंजरे आम पर ना आ सके। आमतौर पर फांसी की सजा सुबह सवेरे यानी 4:00 या 5:00 बजे दी जाती है। लेकिन जिया हुकूमत को शदीद खौफ था कि अगर सूरज निकल आया तो आवाम सड़कों पर निकल आएगी और फौज के लिए हालात...
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Speaker A
के लिए बदलने वाला था। सवाल सिर्फ यह नहीं कि जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी क्यों दी गई? सवाल यह है कि क्या यह इंसाफ था या तारीख का सबसे मुतनाजे सियासी फैसला? एक ऐसा शख्स जिसने कल तक दुनिया के 30 से
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Speaker A
जायद मुालिक के सरबराहों की मेजबानी की थी जो अकवामे मुत्तहदा के ऐवानों में आलमी ताकतों की आंखों में आंखें डालकर बोलता था। आज लोहे के एक जंग आलूद फ्रेम पर खामोश लेटा था। बाहर फौजी जीपों के इंजन की गूंज थी और अंदर एक जल्लाद अपने हाथों
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Speaker A
में जैतून के तेल में भीगी हुई रस्सी को गिरे लगा रहा था। क्या यह सिर्फ एक अदालती फैसला था? या फिर तारीख का सबसे बड़ा संग दिलाना [संगीत] और खौफनाक सियासी इंतकाम। आज से 46 साल पहले 4 अप्रैल 1979 की उस
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Speaker A
काली रात को रावलपिंडी जेल के अंदर क्या हुआ था? वो आखिरी खुदूत कहां गए? और जनरल जियाउल हक ने आलमी ताकतों और शाही खानदानों के हंगामी फोन क्यों काट [संगीत] दिए थे? यह कहानी है पाकिस्तान के पहले मुंतखब वजीर एआम जुल्फिकार अली भुट्टो के
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Speaker A
उन आखिरी 24 घंटों की जिन्होंने इस मुल्क का मुस्तकबिल हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। दास्तान का आगाज वहां से नहीं होता जहां रस्सी गले में डाली गई। [संगीत] इस कहानी की बुनियाद 5 जुलाई 1977 की इस
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Speaker A
भीगती हुई रात को रखी गई थी। जब ऑपरेशन फियर प्ले के नाम पर मुल्क की जम्हूरियत की शहर पर पांव रख दिया गया। [संगीत] जनरल जियाउल हक वो आर्मी चीफ जिन्हें खुद जुल्फिकार अली भुट्टो ने सात सीनियर जनरलों पर तरजीह देकर इस ओदे पर बिठाया
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Speaker A
था। उन्होंने रात के अंधेरे में वजीर एआम हाउस का घेराव कर लिया। इब्तदा में कहा गया कि यह सिर्फ 90 दिनों का एक आरजी कदम है। सिर्फ नए इंतखाबादत करवाने के लिए। लेकिन इख्तेदार का नशा एक ऐसा जहर है जो
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Speaker A
एक बार रगों में उतर जाए तो उतारे नहीं उतरता। जनरल जियााउल हक को जल्द ही अंदाजा हो गया कि अगर पाकिस्तान में शफाफ और आजादाना इंतखाबादत हुए तो जुल्फिकार अली भुट्टो एक बार फिर भारी अक्सरियत के साथ इख्तेदार के ऐवानों में वापस आएंगे। और
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Speaker A
अगर भुट्टो वापस आ गए तो आइन के आर्टिकल छह के तहत संगीन गद्दारी का मुकदमा उनका मुंतजिर होगा। अब सवाल यह नहीं था कि इख्तेदार किसके पास रहेगा? सवाल यह था कि इन दोनों में से जिंदा कौन बचेगा? फिर
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Speaker A
तारीख ने वो मंज़र देखा जिसने अदलिया के चेहरे पर एक ऐसा दाग लगाया जो आज तक नहीं धुल सका। नवाब मोहम्मद अहमद खान का कत्ल केस। एक ऐसा केस [संगीत] जिसमें असल निशाना अहमद रजा कसूरी थे। लेकिन गोली
02:54
Speaker A
उनके वालिद को जा लगी। एफआईआर में भुट्टो का नाम दर्ज हुआ। लेकिन उस केस की फाइल को तारीख ताकतचों [संगीत] में दबा दिया गया था। जनरल जिया के इख्तदार में आते ही उस फाइल को निकालकर दोबारा खोला गया और
03:07
Speaker A
जुल्फिकार अली भुट्टो को लाहौर हाईकोर्ट के कटहरे में ला खड़ा किया गया। लाहौर हाईकोर्ट में मुकदमा चलाते वक्त माहौल में शदीद तनाव और खिंचाव था। चीफ जस्टिस मौलवी मुश्ताक हुसैन और जुल्फिकार अली भुट्टो के दरमियान पुरानी तल्खी किसी से ढकी छुपी
03:24
Speaker A
नहीं थी। अदालत के अंदर जुल्फिकार अली भुट्टो को एक आम मुलजिम की तरह लकड़ी के जंगले में खड़ा किया गया। उनके दफा के तमाम हुकूक को महदूद किया जाता रहा। उनके गवाहों पर सवालात के रास्ते बंद किए गए और
03:38
Speaker A
आखिरकार लाहौर हाईकोर्ट ने मुल्क के मुंतखिब साबिक वजीर एआम को सजा-ए-मौत का हुकुम सुना दिया। जब यह तारीखी मुकदमा अपील के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो वहां सात जजों पर मुश्तमिल एक पैनल तशकील दिया गया। अदालत की कार्रवाई महीनों चली। एवान
03:54
Speaker A
एअ अल के अंदर जजों में शदीद इख्तेला और तकसीम वाजे नजर आ रही थी। सात में से तीन जजों ने भुट्टो को तमाम इल्जामात से मुकम्मल तौर पर बारी करने का फैसला दिया। जबकि चार जजों ने सजा-ए-मौत को बरकरार
04:08
Speaker A
रखा। चार बा मुकाबला तीन। दुनिया की कानूनी तारीख में इतने बारीक, मुतनाजे और कमजोर फैसले पर कभी किसी रियासत के सरबराह को फांसी पर नहीं लटकाया गया था। लेकिन यहां मकसद अदलो इंसाफ कायम करना नहीं। एक निडर सियासी वजूद को हमेशा के लिए खत्म
04:26
Speaker A
करना था। जैसे ही सुप्रीम कोर्ट से नजरसानी की तमाम अपीलें खारिज हुई, दुनिया भर के अहम तरीन [संगीत] दारुल हुकूमतों में सरासीगी फैल गई। शाह सऊदी अरब शाह खालिद, ईरान के शहंशाह मोहम्मद रजा पहलवी, लीबिया के मुम्मे कजाफी, तुर्की के वज़र
04:42
Speaker A
एआज़म यहां तक कि अमकी सदर जमी कॉडर और बर्तनानिया की हुकूमत ने जनरल जियाउल हक को [संगीत] जाती और इंतहाई सख्त खुतूत लिखे। फस्तीनी रहनुमा यासिर अरफात ने अपना खुसूसी नुमाइंदा इस्लामाबाद भेजा और पेशकश की कि भुट्टो को जलावतन करके किसी दूसरे
05:01
Speaker A
मुल्क मुंतकिल कर दिया जाए। वो आइंदा कभी पाकिस्तान की सियासत में हिस्सा नहीं लेंगे। सऊदी अरब के शाह खालिद ने तो यहां तक पैगाम भेजा। पाकिस्तान के लिए भुट्टो की जिंदगी उसकी मौत से कहीं ज्यादा फायदेमंद है। लेकिन जनरल जियाउल हक जानते
05:16
Speaker A
थे कि अगर जुल्फिकार अली भुट्टो जिंदा रहे। खा वह जेल की सलाखों के पीछे हो या मुल्क से बाहर वो किसी भी वक्त एक तूफान बनकर उनका इख्तेदार बहा ले जाएंगे। जियाउल हक ने उन तमाम आलमी खुतूत को एक खुफिया
05:29
Speaker A
फाइल में बंद किया और [संगीत] अपने करीबी मिलिट्री मुशीरों की तरफ देखकर सिर्फ एक जुमला कहा। एक कब्र में दो बंदे नहीं रह सकते या मैं या भुट्टो। और यूं 3 अप्रैल 1979 की वह खौफनाक और बोझल सुबह तुलू हुई।
05:45
Speaker A
जहां से रावलपिंडी जेल के अंदर आखिरी 24 घंटों का उल्टा गिनत शुरू हुआ। 3 अप्रैल 1979 सुबह के 8:00 बजे रावलपिंडी डिस्ट्रिक्ट जेल का माहौल मामूल से बिल्कुल मुख़्तलिफ और खौफनाक हद तक साकित था। जेल के इर्द-गिर्द तमाम ऊंची इमारतों
06:03
Speaker A
पर फौजी स्नाइपर्स तायनात कर दिए गए थे। रावलपिंडी और इस्लामाबाद के तमाम बड़े अस्पतालों में हंगामी हालत नाफिस की जा चुकी थी। तारीख और तंग कोठरी में लेटे हुए जुल्फिकार अली भुट्टो को अभी तक यह अंदाजा नहीं था कि आज उनकी जिंदगी का आखिरी दिन
06:20
Speaker A
है। पाकिस्तान के जेल कवानीन के मुताबिक किसी भी कैदी को फांसी देने से कम से कम 24 घंटे पहले आगाह करना और उसके खानदान से आखिरी मुलाकात करवाना लाजमी होता है। लेकिन हुकूमत ने इस कानूनी हक को भी एक
06:35
Speaker A
इंतहाई मोहताजद फौजी ऑपरेशन में बदल दिया। दोपहर के वक्त जेल सुपरिंटेंडेंट चौधरी यार मोहम्मद भुट्टो की कोठरी के सामने आए। लोहे का भारी दरवाजा एक हौलनाक चरचराहट के साथ खुला। सुपरिंटेंडेंट की आवाज खौफ से कांप रही [संगीत] थी जब उन्होंने कहा
06:52
Speaker A
मिस्टर भुट्टो हुकूमत की तरफ से रहम की अपील पर कोई फैसला नहीं हुआ और ब्लैक वारेन जारी कर दिए गए हैं। आपकी फांसी का वक्त मुकर्रर कर दिया गया है। जुल्फकारक अली भुट्टो ने अपने रिवायती गुरूर और इस्तकामत के साथ चेहरे पर खौफ का एक तासुर
07:08
Speaker A
लाए बगैर जवाब दिया। [संगीत] कितनी जल्दी है तुम लोगों को? दोपहर 1:30 बेगम नुसरत भुट्टो और उनकी बेटी बीनजीर भुट्टो को सिहाला रेस्ट हाउस से एक पुलिस विन में रावलपिंडी [संगीत] डिस्ट्रिक्ट जेल लाया गया। उन्हें यह नहीं बताया गया
07:23
Speaker A
था कि यह उनकी आखिरी मुलाकात है। जब मां और बेटी को इस तंगोतारी कोठरी के बाहर लाया गया। जहां मुल्क का साबिक वजीर एआम जमीन पर बिछे एक मामूली गधे पर बैठा था तो लम्हे भर के लिए वक्त साकित हो गया। जेल
07:38
Speaker A
कवानीन के तहत यह मुलाकात आधे घंटे की होनी चाहिए थी। लेकिन हालात की संगीनी को देखते हुए उसे बढ़ाकर 3 घंटे [संगीत] कर दिया गया। लोहे की जाली के आर-पार। बेनजीर भुट्टो ने अपने बाप के हाथ को छूने की
07:52
Speaker A
नाकाम कोशिश की। भुट्टो ने अपनी बेटी की तरफ देखा और कहा, पिंकी तुमने हिम्मत नहीं हारनी। यह लोग मेरे जिस्म को खत्म कर सकते हैं। लेकिन मेरे नजरिए को नहीं। नुसरत भुट्टो ने अपने आंसुओं को जब्त करने की
08:05
Speaker A
कोशिश की, लेकिन उनकी सिसकियां जेल की सर्द दीवारों से टकरा रही थी। जब आखिरी वक्त आया और सेंट्री ने लोहे का दरवाजा बजाया तो बीनजीर भुट्टो ने अपने बाप को आखिरी बार गले लगाने की इजाजत मांगी। लेकिन जेल हुकाम [संगीत] ने लोहे की गल
08:20
Speaker A
खोलने से साफ इंकार कर दिया। बीनजीर भुट्टो ने जाली के सुराखों में से अपनी उंगलियों को अंदर किया। [संगीत] जुल्फकार अली भुट्टो ने उन उंगलियों को चूमा और कहा खुदा हाफिज पिंकी खुदा हाफिज। यह इन दोनों के दरमियान दुनिया में आखिरी कलाम था। शाम
08:37
Speaker A
6:00 बजे बेगम नुसरत भुट्टो और बेनजीर भुट्टो को रोते हुए वापस ले जाया गया। भुट्टो ने अपने आखिरी लम्हात को जाया नहीं होने दिया। उन्होंने अपनी डायरिया और कुछ इंतहाई अहम जाती कागजात संभाले। [संगीत] उन्होंने जेल के अमले से शेव बनाने का
08:52
Speaker A
सामान मांगा। जब एक फौजी अफसर कर्नल रफी उनकी कोठरी के पास आए तो भुट्टो ने शेव करते हुए आईने में देखकर मुस्कुराते हुए कहा मैं नहीं चाहता कि जब यह लोग मुझे फांसी घाट ले जाएं तो मैं [संगीत] एक
09:05
Speaker A
बुजदिल या बिखरे हुए इंसान की तरह नजर आऊं रात 9:00 बजे उन्हें आखिरी खाना पेश किया गया लेकिन उन्होंने सिर्फ थोड़ी सी [संगीत] चाय पी उन्होंने सफेद कागज पर कुछ आखिरी तहरीरें लिखी वो खुतूद जिनमें मुल्क के मुस्तकबिल अपने बच्चों के लिए वसीयत और
09:21
Speaker A
तारीख का फैसला दर्ज था। लेकिन वह खुतूत कहां गए जिन्हें मिलिट्री हुकाम ने उसी रात कब्जे में ले लिया और वह कभी मंजरे आम पर ना आ सके। आमतौर पर फांसी की सजा सुबह सवेरे यानी 4:00 या 5:00 बजे दी जाती है।
09:36
Speaker A
लेकिन जिया हुकूमत को शदीद खौफ था कि अगर सूरज निकल आया तो आवाम सड़कों पर निकल आएगी और फौज के लिए हालात [संगीत] कंट्रोल करना नामुमकिन हो जाएगा। फैसला किया गया कि तमाम कवानीन को पामाल करके फांसी रात
09:50
Speaker A
के 2:00 बजे दी जाएगी और यूं 4 अप्रैल की वह अंधेरी [संगीत] रात अपने सबसे खौफनाक मोड़ पर पहुंच गई। रात के 1:45 रावलपिंडी जेल के डेथ सेल का जंग आलूद लोहे का ताला एक खौफनाक आवाज के साथ खोला
10:05
Speaker A
गया। मैजिस्ट्रेट जेल डॉक्टर और जल्लाद तारा मसीह खामोशी से अंदर दाखिल हुए। जुल्फिकार अली भुट्टो उस वक्त [संगीत] शदीद बुखार और पेट की मुसलसल तकलीफ की वजह से इंतहाई कमजोर थे और जमीन पर बिच्छे गधे पर लेटे हुए थे। जब उनसे कहा गया कि वह
10:22
Speaker A
अपने पांव पर खड़े हो तो उनके नकाहत जदा जिस्म ने साथ देने से इंकार कर दिया। उन्हें एक स्ट्रेचर पर लिटाया गया। चार मशक्कत कैदियों ने स्ट्रेचर को अपने कांधों पर उठाया और खामोशी से फांसी घाट की तरफ बढ़ने लगे। रावलपिंडी जेल के उस
10:38
Speaker A
कच्चे रास्ते पर सिर्फ कदमों की चाप और जैतून के तेल से भीगी रस्सी के लटकने की साईं साईं आवाजें थीं। 2:02 स्ट्रेचर को फांसी के तख्ते के नीचे लाया गया। जल्लाद तारा मसीह ने अपने कांपते हाथों से जुल्फिकार अली भुट्टो के गले में
10:55
Speaker A
जैतून के तेल में भीगी रस्सी का फंदा डाला। उनके चेहरे पर स्या कपड़े का टोपा पहनाया गया। जल्फिकार अली भुट्टो ने आखिरी बार अपने खुश्क होठों को हिलाया और बहुत मध्यहम लेकिन परवकार आवाज में कहा या अल्लाह मदद कर मैं बेगुनाह हूं रात 2:04
11:14
Speaker A
पर जल्लाद ने लिवर खींच दिया तख्ता नीचे गिरा और पाकिस्तान का साबिक वजीर आजम फजा में मुआलक हो गया 25 मिनट तक उनका जिस्म वहां लटकता रहा जब तक डॉक्टर ने उनकी मौत की हत्मी तस्दीक नहीं कर दी| सुबह के सूरज
11:29
Speaker A
ने अभी रावलपिंडी के उफ को छुआ भी नहीं| नहीं था कि जुल्फिकार अली भुट्टो के जसद खाकी को एक खुफिया फौजी हेलीकॉप्टर में मुंतकिल करके उनके आबाई गांव गढ़ी खुदाबख्श रवाना कर दिया गया। आवाम को खबर तक ना होने दी गई। इंतहाई महदूद लोगों की
11:45
Speaker A
मौजूदगी में मिलिट्री सिक्योरिटी [संगीत] के सख्त पहरे के तहत उन्हें खामोशी से सुपुरदे खाक कर दिया गया। जनरल जियाउल हक ने सोचा था कि भुट्टो का बाप हमेशा के लिए बंद हो गया है। लेकिन जिस शख्स को रात के
11:57
Speaker A
अंधेरे में मिट्टी तले दबा दिया गया था, उसकी कब्र आने वाली कई दहाइयों तक पाकिस्तान की सियासत का सबसे बड़ा और मजबूत मरकज बन गई। और वो जनरल जिसने इख्तेदार के लिए कानून को पामाल किया। 9 साल बाद बहावलपुर की फजा में एक पुरसरार
12:15
Speaker A
तैयारे के हादसे में राख का ढेर बन गया। दहाईयों बाद आला तरीन अदालत ने भी इस बात का एतराफ किया कि जुल्फिकार अली भुट्टो का ट्रायल मुनसिफाना नहीं था और उन्हें एक अदालती कत्ल के जरिए रास्ते से हटाया गया।
12:29
Speaker A
4 अप्रैल 1979 की वह काली [संगीत] रात रावलपिंडी जेल की दीवारों पर एक ऐसा सवाल छोड़ गई जिसका जवाब पाकिस्तान के निजामे अदल को आज भी देना बाकी है।
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