इंग्लिश विलो से क्रिकेट बैट बनाने की 20 साल की प्रक्रिया और मेरठ में इसका निर्माण।
Key Takeaways
- इंग्लिश विलो की विशिष्ट मिट्टी और मौसम बैट के लिए आदर्श लकड़ी प्रदान करते हैं।
- लकड़ी की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए साइड ब्रांचेस को काटना जरूरी है।
- मेरठ विश्व का सबसे बड़ा इंग्लिश विलो बैट निर्माण केंद्र है।
- बैट की मजबूती और पिंगिंग के लिए सही प्रेशर और ड्राइंग प्रक्रिया महत्वपूर्ण है।
- टॉप क्रिकेटर्स के लिए कस्टम बैट बनाना आम है, जो उनकी जरूरतों के अनुसार डिजाइन किए जाते हैं।
What the video covers
- क्रिकेट बैट बनाने में इंग्लिश विलो पेड़ों का उपयोग होता है, जो इंग्लैंड के ग्रेट लीस्ट विलेज में उगते हैं।
- विलो पेड़ों को 15-20 साल तक उगाया जाता है, और साइड ब्रांचेस को मैनुअली काटा जाता है ताकि लकड़ी मजबूत रहे।
- पेड़ों को काटने के बाद लकड़ी को क्लेफ्ट्स में स्प्लिट किया जाता है, जो बाद में एयर ड्राई और ड्राइंग चेंबर में सुखाई जाती है।
- क्लेफ्ट्स को इंग्लैंड से भारत के मेरठ तक 11,000 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है, जहां बैट्स का निर्माण होता है।
- मेरठ में क्लेफ्ट्स को 2 टन प्रति स्क्वायर इंच के प्रेशर में कंप्रेस किया जाता है ताकि बैट मजबूत और पिंगिंग वाला बने।
- बैट का शेप मशीन और फिर मास्टर क्राफ्ट्समैन द्वारा हाथों से दिया जाता है, जो लगभग 3 घंटे लगाते हैं।
- बैट का हैंडल इंग्लिश विलो से नहीं, बल्कि मलेशिया के मनाओ केन से बनाया जाता है।
- टॉप क्रिकेटर्स अपने कस्टम बैट बनवाते हैं, जैसे सचिन तेंदुलकर का हेवी बैट और हार्दिक पांड्या का एक्स्ट्रा कर्व वाला बैट।
- बैट को अंतिम रूप देने के लिए हैमर टेस्ट किया जाता है, जिससे क्राफ्ट्समैन बैट की गुणवत्ता का पता लगाते हैं।
- पूरी प्रक्रिया लगभग 20 साल की होती है और इसके बाद प्रीमियम बैट क्रिकेटर्स के हाथों में पहुंचते हैं।
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Speaker A
विराट कोहली के इस बैट को बनाने में पूरे 20 साल लगते हैं। इस बैट की कहानी शुरू होती है इंग्लैंड के ग्रेट लीस्ट नाम के विलेज में। जहां उगने वाले इंग्लिश विलो पेड़ों से बनते हैं दुनिया के 75% प्रीमियम बैट्स। वैसे तो विलो ट्रीज हमारे कश्मीर में भी उगते हैं। लेकिन इंग्लैंड के विलो ट्रीज वहां की स्पेसिफिक सोइल और वेदर कंडीशंस के कारण एक ऐसी वुड प्रोड्यूस करते हैं जो लाइट वेट और स्ट्रांग होने के साथ-साथ बेटर पिंग भी प्रोवाइड करती है। इन पेड़ों को उगाने के लिए इन्हीं की ब्रांचेस को लेकर जमीन में लगाया जाता है और शुरू के 8-10 साल इनमें से जो साइड ब्रांचेस निकलती हैं, उन्हें मैनुअली तुरंत काटना पड़ता है। वरना यह वुड को कमजोर बना देती हैं। 15 से 20 सालों बाद जब पेड़ का सरकम्फेरेंस 1.4 मीटर हो जाता है तब इसे काटा जाता है। ऐसे राउंड लॉग्स में इन राउंड लॉक्स को स्प्लिट करके क्लेफ्ट्स में कन्वर्ट किया जाता है और इन्हें कभी भी एक 100 यानी एक आरी से नहीं काटा जाता। हमेशा एक वेज का यूज करके ही स्प्लिट किया जाता है। क्योंकि 100 का यूज करने पर इनके नेचुरल फाइबर्स वीक हो जाते हैं। एक पूरे इंग्लिश विलो पेड़ से केवल 40 क्लेफ्ट्स बनते हैं। यानी केवल 40 बैट्स। फिर इन क्लेफ्ट्स को एक साल तक एयर ड्राई किया जाता है और फिर 10 वीक्स तक लो टेंपरेचर ड्राइंग चेंबर में रखा जाता है ताकि वुड का मॉइस्चर एग्जैक्टली 10 से 12% पे आ जाए। इसके बाद ये क्लेफ्ट्स इंग्लैंड से करीब 11,000 कि.मी. का सफर करके मेरठ पहुंचते हैं। एसजी और एसएस जैसी कंपनीज़ के पास। भारत के मेरठ में ही पूरी दुनिया के सबसे ज्यादा इंग्लिश विलो बैट्स बनते हैं। यहां इनक्लेव्स को 2 टन पर स्क्वायर इंच के प्रेशर में कंप्रेस करके हार्ड बनाया जाता है। लेकिन यह प्रोसेस आसान नहीं होती। ज्यादा प्रेशर देने पर बैट की पिंग खत्म हो जाती है और अगर कम प्रेशर दिया तो बैट कमजोर रह जाएगा और बॉल लगते ही उस पर डेंट आ जाएगा। क्लेफ्ट्स को प्रेस करने के बाद एक मशीन से इन्हें रफ बैट का शेप दिया जाता है। जिसके बाद एक मास्टर क्राफ्ट्समैन 3 घंटे लगा के इन्हें हाथों से फाइनल शेप देता है। इंटरेस्टिंग बात यह है कि बैट का हैंडल इंग्लिश विलो से नहीं बनता। वो बनता है मलेशिया के जंगलों से आए इन मनाओ केन से। टॉप लेवल क्रिकेटर्स अपना कस्टम बैट बनवाते हैं। जैसे सचिन तेंदुलकर एक 1.47 kg का बैट यूज किया करते थे जो एवरेज बैट से करीब 300 ग्राम हेवियर था। हार्दिक पांड्या अपने बैट को 200% एक्स्ट्रा कर्व करवाते हैं और सूर के बैट में रेड कलर का शेड होता है। लास्ट स्टेप में बैट को हैमर टेस्ट से गुजरना पड़ता है और केवल इसका साउंड सुनके क्राफ्ट्समैन को पता चल जाता है कि बैट सही से बना है या नहीं। 20 साल की इस लंबी प्रोसेस के बाद यह बैट फाइनली क्रिकेटर्स के हाथों में जाता।
Speaker A
प्रीमियम बैट्स। वैसे तो विलो ट्रीज हमारे कश्मीर में भी उगते हैं। लेकिन इंग्लैंड के विलो ट्रीज वहां की स्पेसिफिक सोइल और वेदर कंडीशंस के कारण एक ऐसी वुड प्रोड्यूस करते हैं जो लाइट वेट और स्ट्रांग होने के साथ-साथ बेटर पिंग भी
Speaker A
प्रोवाइड करती है। इन पेड़ों को उगाने के लिए इन्हीं की ब्रांचेस को लेकर जमीन में लगाया जाता है और शुरू के 8-10 साल इनमें से जो साइड ब्रांचेस निकलती हैं, उन्हें मैनुअली तुरंत काटना पड़ता है। वरना यह वुड को कमजोर बना देती हैं। 15 से 20
Speaker A
सालों बाद जब पेड़ का सरकम्फेरेंस 1.4 मीटर हो जाता है तब इसे काटा जाता है। ऐसे राउंड लॉग्स में इन राउंड लॉक्स को स्प्लिट करके क्लेफ्ट्स में कन्वर्ट किया जाता है और इन्हें कभी भी एक 100 यानी एक
Speaker A
आरी से नहीं काटा जाता। हमेशा एक वेज का यूज करके ही स्प्लिट किया जाता है। क्योंकि 100 का यूज करने पर इनके नेचुरल फाइबर्स वीक हो जाते हैं। एक पूरे इंग्लिश विलो पेड़ से केवल 40 क्लेफ्ट्स बनते हैं।
Speaker A
यानी केवल 40 बैट्स। फिर इन क्लेफ्ट्स को एक साल तक एयर ड्राई किया जाता है और फिर 10 वीक्स तक लो टेंपरेचर ड्राइंग चेंबर में रखा जाता है ताकि वुड का मॉइस्चर एग्जैक्टली 10 से 12% पे आ जाए। इसके बाद
Speaker A
ये क्लेफ्ट्स इंग्लैंड से करीब 11,000 कि.मी. का सफर करके मेरठ पहुंचते हैं। एसजी और एसएस जैसी कंपनीज़ के पास। भारत के मेरठ में ही पूरी दुनिया के सबसे ज्यादा इंग्लिश विलो बैट्स बनते हैं। यहां इनक्लेव्स को 2 टन पर स्क्वायर इंच के
Speaker A
प्रेशर में कंप्रेस करके हार्ड बनाया जाता है। लेकिन यह प्रोसेस आसान नहीं होती। ज्यादा प्रेशर देने पर बैट की पिंग खत्म हो जाती है और अगर कम प्रेशर दिया तो बैट कमजोर रह जाएगा और बॉल लगते ही उस पर डेंट
Speaker A
आ जाएगा। क्लेफ्ट्स को प्रेस करने के बाद एक मशीन से इन्हें रफ बैट का शेप दिया जाता है। जिसके बाद एक मास्टर क्राफ्ट्समैन 3 घंटे लगा के इन्हें हाथों से फाइनल शेप देता है। इंटरेस्टिंग बात यह है कि बैट का हैंडल इंग्लिश विलो से नहीं
Speaker A
बनता। वो बनता है मलेशिया के जंगलों से आए इन मनाओ केन से। टॉप लेवल क्रिकेटर्स अपना कस्टम बैट बनवाते हैं। जैसे सचिन तेंदुलकर एक 1.47 kg का बैट यूज किया करते थे जो एवरेज बैट से करीब 300 ग्राम हेवियर था।
Speaker A
हार्दिक पांड्या अपने बैट को 200% एक्स्ट्रा कर्व करवाते हैं और सूर के बैट में रेड कलर का शेड होता है। लास्ट स्टेप में बैट को हैमर टेस्ट से गुजरना पड़ता है और केवल इसका साउंड सुनके क्राफ्ट्समैन को पता चल जाता है कि बैट सही से बना है या
Speaker A
नहीं। 20 साल की इस लंबी प्रोसेस के बाद यह बैट फाइनली क्रिकेटर्स के हाथों में जाता
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