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The Throne of Blood: The Complete History of the Delhi Sultanate | (Hindi Documentry 4k)

दिल्ली सल्तनत का इतिहास, मोहम्मद गौरी से लेकर बलबान तक के प्रमुख शासकों और उनकी उपलब्धियों का विस्तृत वर्णन।

Key Takeaways

  • दिल्ली सल्तनत की स्थापना मोहम्मद गौरी के आक्रमण से हुई।
  • कुतुबुद्दीन ऐबक ने गुलाम से सुल्तान बनने का अद्भुत सफर तय किया।
  • इल्तुतमिश ने मंगोल आक्रमणों को रोका और सल्तनत को सुदृढ़ किया।
  • रजिया सुल्तान ने महिला शासक के रूप में प्रशासनिक सुधार और सामाजिक एकता को बढ़ावा दिया।
  • बलबान ने सल्तनत की सुरक्षा और शासन व्यवस्था को मजबूत किया।

What the video covers

  • मोहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण कर दिल्ली सल्तनत की नींव रखी।
  • पृथ्वीराज चौहान के साथ तराइन के युद्धों का वर्णन और गौरी की विजय।
  • कुतुबुद्दीन ऐबक ने गुलाम से सुल्तान बनने तक का सफर तय किया और कुतुब मीनार का निर्माण करवाया।
  • इल्तुतमिश ने दिल्ली को राजधानी बनाया और मंगोल आक्रमणों से भारत की रक्षा की।
  • इल्तुतमिश ने तुर्काने चिहालगानी नामक सैन्य समूह का गठन किया।
  • इल्तुतमिश ने अपनी बेटी रजिया को उत्तराधिकारी बनाया, जो पहली महिला सुल्तान बनीं।
  • रजिया सुल्तान ने सामाजिक और प्रशासनिक सुधार किए, और हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया।
  • रजिया की राजनीतिक और व्यक्तिगत चुनौतियां, अंततः उनकी मृत्यु।
  • गयासुद्दीन बलबान ने दिल्ली सल्तनत को मजबूत किया और मंगोलों से सुरक्षा प्रदान की।
  • सल्तनत के दौरान कई युद्ध, राजनीतिक संघर्ष और सांस्कृतिक विकास हुए।

Answers

Questions about this video

दिल्ली सल्तनत की स्थापना किसने की थी?

दिल्ली सल्तनत की स्थापना मोहम्मद गौरी ने की थी, जिन्होंने भारत पर आक्रमण कर इस क्षेत्र में अपना शासन स्थापित किया।

कुतुब मीनार का निर्माण किसने करवाया था?

कुतुब मीनार का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने शुरू करवाया था, जो दिल्ली सल्तनत के पहले सुल्तान थे।

रजिया सुल्तान क्यों महत्वपूर्ण हैं?

रजिया सुल्तान दिल्ली सल्तनत की पहली महिला शासक थीं, जिन्होंने प्रशासनिक सुधार किए और हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया।

Full Transcript — Download SRT & Markdown

00:00
Speaker A
हेलो फ्रेंड्स, जैसा कि आप जानते हैं कि हमारे भारत का सेंट्रल एरिया जिसे आज नई दिल्ली के नाम से जाना जाता है। यहां मुगल एंपायर ने 300 सालों से ज्यादा राज किया है। जहां यह भारत के कई मेजर स्टेट्स पर भी अपना अधिकार कर चुके हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं मुगलों से पहले भारत के सेंट्रल एरिया में कौन सी सल्तनत या डायनेस्टी का राज था? क्या वे भी इतने क्रूर थे? इसके लिए हमें समय में पीछे जाकर दिल्ली सल्तनत का पूरा इतिहास जानना होगा। इन टुडेएस वीडियो टाइटल एंटायर हिस्ट्री ऑफ दिल्ली सल्तनत। इस सब की शुरुआत होती है मोहम्मद गोरी से जो उस समय घोर का शासक था। जो अपने भाइयों के साथ वर्तमान अफगानिस्तान पर राज कर रहा था। पर उसकी नजर पड़ती है भारत पर जो उस समय सोने की चिड़िया कहलाया जाता था। भारत को देखकर वो मोहित हो जाता है। वो दिन रात भारत को पाने के सपने देखने लगता है। उस समय भारत का काफी बड़ा हिस्सा इंक्लूडिंग दिल्ली चौहान वंश के अधीन फल फूल रहा था। जिस पर राज पृथ्वीराज चौहान तृतीय का था। पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने मोहम्मद गोरी को कई बार हराया। मगर मोहम्मद गोरी के अंदर भारत की इतनी चाह थी कि उसने हारने के बाद भी कई युद्ध लड़े। सन 1191 ईस्वी में पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच तराइन का पहला युद्ध हुआ। जिसमें मोहम्मद गौरी को हार मिली। इतनी बड़ी हार के बाद मोहम्मद गौरी ने आक्रमण करना बंद कर दिया। वह एक साल तक अगले युद्ध की भारी रणनीति बनाई। दूसरी तरफ पृथ्वीराज चौहान को लगा कि मोहम्मद गौरी अब दोबारा नहीं आएगा। 1192 ईस्वी में जब पृथ्वीराज चौहान दूसरे युद्ध से जीतकर अपने सैनिकों के साथ विश्राम कर रहे थे, तब मोहम्मद गौरी ने धोखेबाजी से सुबह के समय पृथ्वीराज चौहान की सेना पर आक्रमण कर दिया। वो अपनी बेहतरीन युद्ध नीति से तराइन के दूसरे युद्ध में विजय हासिल की। अपने शासनकाल में मोहम्मद गौरी ने वर्तमान अफगानिस्तान से लेकर वर्तमान बांग्लादेश तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। भारत के पश्चिमी पंजाब की एक जनजाति खोकर ने मोहम्मद गौरी के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत की। जिस कारणवर्ष मोहम्मद गोरी को भारी मात्रा में नरसंहार करना पड़ा ताकि वह विद्रोह को कुचल सके। विद्रोहियों को सफलतापूर्वक दबाने के बाद गजनी लौटते समय प्रतिद्वंदी टीम के एक सिपाही द्वारा 1206 ईस्वी में मोहम्मद गौरी की हत्या कर दी गई। अचानक मृत्यु के कारण मोहम्मद गोरी अपने उत्तराधिकारी के बारे में कोई निर्णय नहीं कर पाया था। उसका कोई पुत्र नहीं था। लेकिन वह अपने दासों पर काफी विश्वास करता था। उन्हीं में से एक गुलाम था जो गोरी का प्रिय था और उसका नाम था कुतुबुद्दीन ऐबक। कुतुबुद्दीन ऐबक गोरी के साथ युद्ध में भी उसका साथ देता था। गोरी ने उसकी बहादुरी देखकर उसको अपना राइट हैंड बना दिया था। 1193 से लेकर 1206 तक ऐबक ने दिल्ली, अजमेर, कन्नौज, ग्वालियर सारे राजपूत इलाके गोरी के लिए जीते थे। कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1192 से 1199 ईसवी के बीच अजमेर में स्थित एक संस्कृत विद्यालय को तोड़कर, वहां आई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद बनवाई। मोहम्मद गौरी के आदेश पर हिरात के वास्तुकार अबू बक्र ने हिंदू कारीगरों की मदद से इसे ढाई दिन में तैयार किया। जिससे इसका नाम पड़ा अढ़ाई दिन का झोपड़ा। 1206 ईसवी मोहम्मद गौरी की मौत के बाद दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठता है। उसका भरोसेमंद गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक और वह दिल्ली सल्तनत की पहली डायनेस्टी स्लेव डायनेस्टी जिसे ममलूक वंश भी कहते हैं कि नींव रखता है। अपने शासनकाल में ऐबक कई बदलाव करता है। जैसे उसने लाहौर को अपनी राजधानी बनाई। कुतुबुद्दीन ऐबक खुद एक गुलाम होने के कारण दिल का बहुत अच्छा था। वह हर युद्ध को जीतने के बाद अपनी आवाम को सोने, चांदी या तोहफे दिया करता था। इसलिए लोग उसे लख बख्श कहकर बुलाया करते थे। इसके अलावा ऐबक ने कई इमारतों का भी निर्माण करवाया। जिसमें से सबसे प्रसिद्ध मीनार है कुतुब मीनार। कुतुब मीनार साउथ दिल्ली में बनी 73 मीटर ऊंची दुनिया की सबसे ऊंची मीनार है। यह मीनार भारत में इस्लामी शासन की स्थापना और विजय का प्रतीक मानी जाती है। ऐबक का जीवन अधिकतर युद्ध में ही बिता। ऐबक का प्रिय खेल था पोलो। 1210 ईसवी में लाहौर में पोलो खेलते समय घोड़े से गिर जाने के कारण कुतुबुद्दीन ऐबक की मौत हो गई। ऐबक की मौत के बाद दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठता है उसका बेटा आरामशाह। परंतु वह काफी कमजोर और अयोग्य शासक था। इसलिए सिर्फ 6 महीने में ऐबक के दामाद शमसुद्दीन इल्तुतमिश ने 1206 ईस्वी में उसे हराकर दिल्ली की सत्ता संभाली। दिल्ली सल्तनत और ममलूक वंश को रियल स्ट्रेंथ इल्तुतमिश के आने के बाद ही मिली। इल्तुतमिश ने सुल्तान बनने के बाद दिल्ली को अपनी राजधानी बनाई और ऐबक के द्वारा निर्माण कुतुब मीनार का काम पूरा करवाया। इल्तुतमिश ने अपने शासनकाल में 40 गुलाम व अमीर सरदारों का एक समूह बनाया जिसे तुर्काने चिहालगानी का नाम दिया गया। इस समूह के सदस्य सैन्य सहायता देना व शासन के मामले में सुल्तान को सलाह दिया करते थे। इल्तुतमिश को सबसे ज्यादा जाना जाता है गैंगिश खान को भारत आने से रोकने के लिए। सन 1221 में जब मंगोल के क्रूर नेता चंगेज खान को पता चला कि ईरान के राजकुमार जलालुद्दीन मिंगबर्नी और चंगेज खान की बेटी के बीच प्रेम है तो इससे डरकर अपनी जान बचाने के लिए जलालुद्दीन पंजाब तक आ गया और चंगेज खान भी अपनी सेना के साथ उसके पीछे-पीछे सिंध तक आ गया। जलालुद्दीन ने इल्तुतमिश की शरण लेनी चाही। पर इल्तुतमिश ने समझदारी दिखाते हुए उसे मना कर दिया। जिससे चंगेज खान ने भारत पर हमला नहीं किया। इल्तुतमिश पहला ऐसा सुल्तान था जिसने शुद्ध अरबी सिक्के चलवाए। उसने सल्तनत के लिए दो इंपॉर्टेंट सिक्के, चांदी का टका तथा तांबे का जीतल चलवाया। लगातार युद्ध के कारण इल्तुतमिश बीमार हो गया। अपने आखिरी दिनों में इल्तुतमिश अपने सक्सेसर के सवाल को लेकर चिंता में था। उसके बेटे शासन के लायक बिल्कुल नहीं थे। इसलिए इल्तुतमिश ने अपनी बेटी रजिया को अपना उत्तराधिकारी बनाया। इन द एंड 30 अप्रैल 1236 में उसकी मौत हो गई। स्रोतों के अनुसार पहले इल्तुतमिश के बड़े बेटे को उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया गया। पर अनफॉर्चूनेटली उसकी अल्प आयु में ही मृत्यु हो गई। इल्तुतमिश पहला ऐसा शासक था जिसने अपने बाद किसी महिला को उत्तराधिकारी बनाया। लेकिन मुस्लिम वर्ग को इल्तुतमिश का किसी महिला को वारिस बनाना मंजूर नहीं था। इसलिए उसकी मृत्यु के बाद उसके छोटे बेटे रखनुद्दीन फिरोज शाह को गद्दी पर बैठाया गया। पर वह एक बेवकूफ और अक्षम सुल्तान साबित हुआ। जनता ने परेशान होकर 9 नवंबर 1236 को रखुद्दीन तथा उसकी माता शाह तुर्कान की हत्या कर दी। उसका शासन सिर्फ छह माह का था। जनता की मदद से रजिया ने फिर से गद्दी हासिल कर ली और दिल्ली सल्तनत की पहली महिला शासक बन गई। शासन कार्यों में रजिया की रुचि अपने पिता के शासन के समय से ही थी। रजिया ने रीति-रिवाजों के विपरीत पुरुषों की तरह सैनिकों का कोट और पगड़ी पहनना पसंद किया। बल्कि बाद में युद्ध में बिना नकाब पहने शामिल हुई। रजिया ने पर्दा प्रथा का त्याग कर पुरुषों की तरह कुर्ता, टोपी पहनकर दरबार में खुले मुंह जाने लगी। रजिया अपनी राजनीतिक समझदारी और नीतियों से सेना तथा जनसाधारण का ध्यान रखती थी। वह दिल्ली की सबसे शक्तिशाली शासक बन गई थी। रजिया सुल्तान एक कुशल प्रशासक थी। जिन्होंने एक आदर्श शासक की तरह अपने राज्य में विकास के काम किए। उन्होंने दिल्ली को सुरक्षित रखा। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई स्कूल, कॉलेजों एवं शैक्षणिक संस्थानों का निर्माण करवाया। अपने राज्य में पानी की व्यवस्था को सुचारू ढंग से चलाने के लिए कुएं और नलकूप खुदवाए। सड़कें बनवाई। इसके अलावा उन्होंने हिंदू और मुस्लिम एकता के लिए काम किया। रजिया सुल्तान का उनके गुलाम जमालुद्दीन याकूद के साथ मोहब्बत की कहानी भी इतिहास में दर्ज है। रजिया सुल्तान को अपने सलाहकार याकूद के साथ इश्क हो गया था। जिसके बाद तमाम मुस्लिम शासकों ने इसका विरोध किया था। वहीं भटिंडा के गवर्नर इख्तियार अल्तुनिया भी रजिया सुल्तान की खूबसूरती के पीछे पागल थे और वे किसी भी हाल में उनको पाना चाहते थे। साथ ही दिल्ली पर भी अपना कब्जा जमाना चाहते थे। जिसके चलते अल्तुनिया और वह लोग जो रजिया को नापसंद करते थे, ने साथ मिलकर दिल्ली पर हमला बोल दिया। रजिया और अल्तुनिया के बीच युद्ध हुआ जिसमें याकूत मारा गया और रजिया को बंदी बना लिया गया। मरने के डर से रजिया अल्तुनिया से शादी करने को तैयार हो गई। इस बीच रजिया के भाई मैजुद्दीन बहराम शाह ने सिंहासन हथिया लिया। अपनी सल्तनत की वापसी के लिए रजिया और उसके पति अल्तुनिया ने बहराम शाह से युद्ध किया जिसमें उनकी हार हुई। उन्हें दिल्ली छोड़कर भागना पड़ा और अगले दिन वह कैथल पहुंचे। जहां उनकी सेना ने साथ छोड़ दिया। वहां डाकुओं के द्वारा 14 अक्टूबर 1240 को रजिया उनके पति के साथ मारी गई। रजिया की मौत के बाद दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठता है एक कठोर शासक जिसका नाम था गयासुद्दीन बलबान जो पहले मंगोलों का पकड़ा गया एक गुलाम था। जब वह दिल्ली आया तो इल्तुतमिश ने उसे खरीद लिया। अपनी सूझबूझ से वह जल्द ही सुल्तान के काफी करीब आ गया और चिहालगानी का मेंबर बन गया। वैसे तो रजिया की मौत के बाद कई राजा आते हैं पर वे उतने समझदार नहीं थे और वे सभी गयासुद्दीन बलबान के सोचे गए डिसीजंस पर ही फैसला लिया करते थे क्योंकि बलबान चिहालगानी का एक इंपॉर्टेंट सरदार था इसलिए।
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Speaker A
भी अपना अधिकार कर चुके हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं मुगलों से पहले भारत के सेंट्रल एरिया में कौन सी सल्तनत या डायनेस्टी का राज था? क्या वे भी इतने [संगीत] ही क्रूर थे? इसके लिए हमें समय में पीछे जाकर दिल्ली सल्तनत का पूरा
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Speaker A
इतिहास जानना होगा। इन टुडेेस वीडियो टाइटल एंटायर हिस्ट्री ऑफ दिल्ली सल्तनत। इस सब की शुरुआत होती है मोहम्मद गोरी से जो उस समय घोर का शासक था। जो अपने भाइयों के साथ वर्तमान अफगानिस्तान पर राज कर रहा था। पर उसकी नजर पड़ती है भारत पर जो उस
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Speaker A
समय सोने की चिड़िया कहलाया जाता था। भारत को देखकर वो मोहित हो जाता है। वो दिन रात भारत को पाने के सपने देखने लगता है। उस समय भारत का काफी बड़ा हिस्सा इंक्लूडिंग दिल्ली चौहान वंश के अधीन फल फूल रहा था।
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Speaker A
जिस पर राज पृथ्वीराज चौहान तृतीय का था। पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने मोहम्मद गोरी को कई बार हराया। मगर मोहम्मद गोरी के अंदर भारत की इतनी चाह थी कि उसने हारने के बाद भी कई युद्ध लड़े। सन 1191 ईस्वी में
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Speaker A
पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच तराइन का पहला युद्ध हुआ। जिसमें मोहम्मद गौरी को हार मिली। इतनी बड़ी हार के बाद मोहम्मद गौरी ने आक्रमण करना बंद कर दिया। वह एक साल तक अगले युद्ध की भारी रणनीति
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Speaker A
बनाई। दूसरी तरफ पृथ्वीराज चौहान को लगा कि मोहम्मद गौरी अब दोबारा नहीं आएगा। 1192 ईस्वी में जब पृथ्वीराज चौहान दूसरे युद्ध से जीतकर अपने सैनिकों के साथ विश्राम कर रहे थे। तब मोहम्मद गौरी ने धोखेबाजी से सुबह के समय पृथ्वीराज चौहान
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Speaker A
की सेना पर आक्रमण कर दिया। वो अपनी बेहतरीन युद्ध नीति से तराइन के दूसरे युद्ध में विजय हासिल की। अपने शासनकाल में मोहम्मद गौरी ने वर्तमान अफगानिस्तान से लेकर वर्तमान बांग्लादेश तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। भारत के
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Speaker A
पश्चिमी पंजाब की एक जनजाति खोकर ने मोहम्मद गौरी के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत की। जिस कारणव वर्ष मोहम्मद गोरी को भारी मात्रा में नरसंहार करना पड़ा ताकि वह विद्रोह को कुचल सके। विद्रोहियों को सफलतापूर्व दबाने के बाद गजनी लौटते समय
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Speaker A
प्रतिद्वंदी टीम के एक सिपाही द्वारा 1206 ईस्वी में मोहम्मद गौरी की हत्या कर दी गई। अचानक मृत्यु के कारण मोहम्मद गोरी अपने उत्तराधिकारी के बारे में कोई निर्णय नहीं कर पाया था। उसका कोई पुत्र नहीं था। लेकिन वह अपने दासों पर काफी विश्वास करता
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Speaker A
था। उन्हीं में से एक गुलाम था जो गोरी का प्रिय था और उसका नाम था कुतुबुद्दीन ऐबक। कुतुबुद्दीन ऐबक गोरी के साथ युद्ध में भी उसका साथ देता था। गोरी ने उसकी बहादुरी देखकर उसको अपना राइट हैंड बना दिया था।
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Speaker A
1193 से लेकर 1206 तक ऐबक ने दिल्ली, अजमेर, कन्नौज, ग्वालियर सारे राजपूत इलाके गोरी के लिए जीते थे। कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1192 से 1199 ईसवी के बीच अजमेर में स्थित एक संस्कृत विद्यालय को तोड़कर, वहां अाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद
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Speaker A
बनवाई। मोहम्मद गौरी के आदेश पर हिरात के वास्तुकार अबू बक्र ने हिंदू कारीगरों की मदद से इसे ढाई दिन में तैयार किया। जिससे इसका नाम पड़ा अढ़ाई दिन का झोपड़ा। 1206 ईसवी मोहम्मद गौरी की मौत के बाद दिल्ली
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Speaker A
सल्तनत की गद्दी पर बैठता है। उसका भरोसेमंद गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक और वह दिल्ली सल्तनत की पहली डायनेस्टी स्लेव डायनेस्टी जिसे ममलूक वंश भी कहते हैं कि नींव रखता है। अपने शासनकाल में ऐबक कई बदलाव करता है। जैसे उसने लाहौर को अपनी
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Speaker A
राजधानी बनाई। कुतुबुद्दीन ऐबक खुद एक गुलाम होने के कारण दिल का बहुत अच्छा था। वह हर युद्ध को जीतने के बाद अपनी आवाम को सोने, चांदी या तोहफे दिया करता था। इसलिए लोग उसे लख बख्श कहकर बुलाया करते थे।
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Speaker A
इसके अलावा ऐबक ने कई इमारतों का भी निर्माण करवाया। जिसमें से सबसे प्रसिद्ध मीनार है कुतुब मीनार। कुतुब मीनार साउथ दिल्ली में बनी 73 मीटर ऊंची दुनिया की सबसे ऊंची मीनार है। यह मीनार भारत में इस्लामी शासन की स्थापना और विजय का
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Speaker A
प्रतीक मानी जाती है। ऐबक का जीवन अधिकतर युद्ध में ही बिता। ऐबक का प्रिय खेल था पोलो। 1210 ईसवी में लाहौर में पोलो खेलते समय घोड़े से गिर जाने के कारण कुतुबुद्दीन ऐबक की मौत हो गई। ऐबक की मौत
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Speaker A
के बाद दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठता है उसका बेटा आरामशाह। परंतु वह काफी कमजोर और अयोग्य शासक था। इसलिए सिर्फ 6 महीने में ऐबक के दामाद शमसुद्दीन इल्तुतमिश ने 1206 ईस्वी में उसे हराकर दिल्ली की सत्ता संभाली। दिल्ली सल्तनत और
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Speaker A
ममलूक वंश को रियल स्ट्रेंथ इल्तुतमिश के आने के बाद ही मिली। इल्तुतमिश ने सुल्तान बनने के बाद दिल्ली को अपनी राजधानी बनाई और ऐबक के द्वारा निर्माण कुतुब मीनार का काम पूरा करवाया। इल्तुतमिश ने अपने शासनकाल में 40 गुलाम व अमीर सरदारों का
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Speaker A
एक समूह बनाया जिसे तुर्काने चिहालगानी का नाम दिया गया। इस समूह के सदस्य सैन्य सहायता देना व शासन के मामले में सुल्तान को सलाह दिया करते थे। इल्तुतमिश को सबसे ज्यादा जाना जाता है गैंगिश खान को भारत आने से रोकने के लिए। सन 1221 में जब
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Speaker A
मंगोल के क्रूर नेता चंगेज खान को पता चला कि ईरान के राजकुमार जलालुद्दीन मिंगबर्नी और चंगेज खान की बेटी के बीच प्रेम है तो इससे डरकर अपनी जान बचाने के लिए जलालुद्दीन पंजाब तक आ गया और चंगेज़ खान
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Speaker A
भी अपनी सेना के साथ उसके पीछे-पीछे सिंध तक आ गया। जलालुद्दीन ने इल्तुतमिश की शरण लेनी चाही। पर इल्तुतमिश ने समझदारी दिखाते हुए उसे मना कर दिया। जिससे चंगेज खान ने भारत पर हमला नहीं किया। इल्तुतमिश पहला ऐसा सुल्तान था जिसने शुद्ध अरबी
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Speaker A
सिक्के चलवाए। उसने सल्तनत के लिए दो इंपॉर्टेंट सिक्के, चांदी का टका तथा तांबे का जीतल चलवाया। लगातार युद्ध के कारण इल्तुतमिश बीमार हो गया। अपने आखिरी दिनों में इल्तुतमिश अपने सक्सेसर के सवाल को लेकर चिंता में था। उसके बेटे शासन के
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Speaker A
लायक बिल्कुल नहीं थे। इसलिए इल्तुतमिश ने अपनी बेटी रजिया को अपना उत्तराधिकारी बनाया। इन द एंड 30 अप्रैल 1236 में उसकी मौत हो गई। स्रोतों के अनुसार पहले इल्तुतमिश के बड़े बेटे को उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया गया। पर
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Speaker A
अनफॉर्चूनेटली उसकी अल्प आयु में ही मृत्यु हो गई। इल्तुतमिश पहला ऐसा शासक था जिसने अपने बाद किसी महिला को उत्तराधिकारी बनाया। लेकिन मुस्लिम वर्ग को इल्तुतमिश का किसी महिला को वारिस बनाना मंजूर नहीं था। इसलिए उसकी मृत्यु के बाद उसके छोटे बेटे रखनुद्दीन फिरोज
07:12
Speaker A
शाह को गद्दी पर बैठाया गया। पर वह एक बेवकूफ और अक्षम सुल्तान साबित हुआ। जनता ने परेशान होकर 9 नवंबर 1236 को रखुद्दीन तथा उसकी माता शाह तुर्कान की हत्या कर दी। उसका शासन सिर्फ छह माह का था। जनता
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Speaker A
की मदद से रजिया ने फिर से गद्दी हासिल कर ली और दिल्ली सल्तनत की पहली महिला शासक बन गई। शासन कार्यों में रजिया की रुचि अपने पिता के शासन के समय से ही थी। रजिया ने रीति-रिवाजों के विपरीत पुरुषों की तरह
07:44
Speaker A
सैनिकों का कोट और पगड़ी पहनना पसंद किया। बल्कि बाद में युद्ध में बिना नकाब पहने शामिल हुई। रजिया ने पर्दा प्रथा का त्याग कर पुरुषों की तरह कुर्ता, टोपी पहनकर दरबार में खुले मुंह जाने लगी। रजिया अपनी राजनीतिक समझदारी और नीतियों से सेना तथा
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Speaker A
जनसाधारण का ध्यान रखती थी। वह दिल्ली की सबसे शक्तिशाली शासक बन गई थी। रजिया सुल्तान एक कुशल प्रशासक थी। जिन्होंने एक आदर्श शासक की तरह अपने राज्य में विकास के काम किए। उन्होंने दिल्ली को सुरक्षित रखा। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई
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Speaker A
स्कूल, कॉलेजों एवं शैक्षणिक संस्थानों का निर्माण करवाया। अपने राज्य में पानी की व्यवस्था को सुचारू ढंग से चलाने के लिए कुएं और नलकूप खुदवाए। सड़कें बनवाई। इसके अलावा उन्होंने हिंदू और मुस्लिम एकता के लिए काम किया। रजिया सुल्तान का उनके
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Speaker A
गुलाम जमालुद्दीन याकूद के साथ [संगीत] मोहब्बत की कहानी भी इतिहास में दर्ज है। रजिया सुल्तान को अपने सलाहकार याकूद के साथ इश्क हो गया था। जिसके [संगीत] बाद तमाम मुस्लिम शासकों ने इसका विरोध किया था। वहीं भटिंडा के गवर्नर इख्तियार
08:52
Speaker A
अल्तुनिया भी रजिया सुल्तान की खूबसूरती के पीछे पागल थे और वे किसी भी हाल में उनको पाना चाहते थे। साथ ही दिल्ली पर भी अपना कब्जा भी जमाना चाहते थे। जिसके चलते अल्तुनिया और वह लोग जो रजिया को नापसंद करते थे ने साथ मिलकर [संगीत]
09:11
Speaker A
दिल्ली पर हमला बोल दिया। रजिया और अल्तुनिया के बीच युद्ध हुआ जिसमें याकूत मारा गया और रजिया को बंदी बना लिया गया। मरने के डर से रजिया अल्तुनिया से शादी करने को तैयार हो गई। इस बीच रजिया के भाई
09:25
Speaker A
मैजुद्दीन बहराम शाह ने सिंहासन हथिया लिया। अपनी सल्तनत की वापसी के लिए रजिया और उसके पति अल्तुनिया ने बहराम शाह से युद्ध किया जिसमें उनकी हार हुई। उन्हें दिल्ली छोड़कर भागना पड़ा और अगले दिन वह कैथल पहुंचे। जहां उनकी सेना ने साथ छोड़
09:43
Speaker A
दिया। वहां डाकुओं के द्वारा 14 अक्टूबर 1240 को रजिया उनके पति के साथ मारी गई। रजिया की मौत के बाद दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठता है एक कठोर शासक जिसका नाम [संगीत] था गयासुद्दीन बलबान जो पहले मंगोलों का पकड़ा गया एक गुलाम
10:02
Speaker A
था। जब वह दिल्ली आया तो इल्तुतमिश ने उसे खरीद लिया। अपनी सूझबूझ से वह जल्द ही सुल्तान के काफी करीब आ गया और चिहालगानी का मेंबर बन गया। वैसे तो रजिया की मौत के बाद कई राजा आते हैं पर वे उतने समझदार
10:18
Speaker A
नहीं थे और वे सभी गयासुद्दीन बलबान के सोचे गए डिसीजंस पर ही फैसला लिया करते थे क्योंकि बलबान चिहालगानी का एक इंपॉर्टेंट सरदार था इसलिए उसकी पहुंच बहुत ऊपर तक थी कहीं ना कहीं रजिया का शासनकाल भी इन्हीं
10:34
Speaker A
चिहालगानी सदस्यों की वजह से ही बिगड़ा इल्तुतमिश की मौत के बाद सत्ता का संतुलन बदल गया और सुल्तान इन अमीरों की कठपुतली बन गया। यह अमीर इल्तुतमिश के बच्चों और पोतेपोतियों को गद्दी पर बिठाते और हटाते थे और अक्सर परेशानी पैदा करने पर उन्हें
10:51
Speaker A
मार देते थे। आगे जाकर बलबान ने अमीरों की शक्ति को तोड़कर इसको खत्म किया। सबसे पहले बलबान बहराम शाह का जागीरदार बना और बाद में नसीरुद्दीन महमूद को सुल्तान बनाया। व6 से 1265 तक खुद को उसका वजीर बनाए रखा। सुल्तान नासिरुद्दीन का कोई मेल
11:11
Speaker A
सक्सेसर ना होने की वजह से उसकी मौत के बाद बलबान ने खुद को दिल्ली का सुल्तान घोषित कर दिया। बलबान 1266 में 50 साल की उम्र में सुल्तान गयासुद्दीन बलबान की उपाधि के साथ सिंहासन पर बैठा। अपने शासनकाल में बलबान ने कठोर शासन किया।
11:29
Speaker A
बलबान के शासनकाल में उसने लोगों के बीच सत्ता का डर बनाए रखा। बलबान खुद को जिले इलाही यानी ईश्वर की छाया कहता था। उस समय दिल्ली सल्तनत पर मेवों ने लूट मचा रखी थी। जो मेवात के लोग थे और वे दिन दहाड़े
11:45
Speaker A
दिल्ली वासियों को लूटते थे। रात में घुसकर लोगों की नींद खराब करते और घरों को लूटते। बाद में बलबान ने अपनी बड़ी सेना की मदद से इन मेवों को बड़ी मात्रा में मार डाला था। बलबान ने एक बहुत बड़ी सेना
11:59
Speaker A
खड़ी करी जो सुल्तान के लिए लॉयल थी। इसके अलावा बलबान अपने सरदारों को किसी भी गलती के लिए सबसे कठोर सजा देता था। बलबान का दरबार एक सीरियस कोर्ट था। जहां हंसी का कोई नामोनिशान नहीं था। उसने राजा के
12:14
Speaker A
सामने झुकने और उनके पैर चूमने जैसे कठोर रूल्स बनाए। 1287 में बलबान की मौत के बाद उसके पोते मुईजुद्दीन कैकाबाद को सुल्तान बनाया। पर कैकाबाद अपने दादा की फैलाई सल्तनत को संभाल नहीं पाया क्योंकि वह काफी कमजोर था। सुल्तान बनने के बाद वह
12:32
Speaker A
शराब और औरतों में ही लगा रहता था। उस समय उत्तरी बिहार में उसकी सेना का सामना उसके पिता नसीरुद्दीन बुगरा की बंगाल की सेना से हुआ। पर पिता से प्यार होने की वजह से उसने युद्ध नहीं किया और रोते हुए पिता को
12:47
Speaker A
गले लगा लिया। जिससे बाद में बंगाल और हिंदुस्तान के बीच संधि हो गई। जिसकी वजह [संगीत] से सुल्तान को काफी सम्मान भी मिला। दिल्ली लौटने के बाद कैकाबाद ने जलालुद्दीन फिरोज खिलजी को नया सेनापति बनाया। 1290 में जब कैकाबाद बीमार था
13:04
Speaker A
इसीलिए सही मौका देख जलालुद्दीन खिलजी ने उसे मार दिया। इसके बाद कैकाबाद के 3 साल के बेटे शमशुद्दीन कयुमर्स को सुल्तान बनाया गया। पर सत्ता कमजोर होने की वजह से जलालुद्दीन खिलजी ने अपनी सेना के साथ हमला करके सत्ता को छीन लिया। जिससे ममलूक
13:23
Speaker A
डायनेस्टी पूरी तरह से खत्म हो गई। और ममलूक डायनेस्टी [संगीत] के बाद दिल्ली सल्तनत पर झंडा लहराने लगा नई डायनेस्टी खिलजी डायनेस्टी का जिसके फाउंडर थे जलालुद्दीन फिरोज खिलजी। सुल्तान बनते टाइम जलालुद्दीन खिलजी 70 साल के थे। जलालुद्दीन ने मंगोलों के आक्रमणों को
13:41
Speaker A
रोका और कई मंगोलों को इस्लाम कबूलवाया। जिसके बाद उन्हें [संगीत] भारत में बसने की अनुमति दे दी। इसके बाद उसने मंडावर और झाइन पर कब्जा कर लिया। हालांकि 1290 से 1292 के बीच जब उसने चौहान वंश के राजा
13:56
Speaker A
हम्मीर से उनकी राजधानी रणथंबोर को छीनने के लिए वहां घेरा लगाया तब उसे वहां से कोई सफलता नहीं मिली। तब जलालुद्दीन खिलजी को लगा कि वह रणथंबोर का किला नहीं जीत पाएगा। इसलिए उसने अपनी सेना से यह कहकर
14:11
Speaker A
वापस बुला ली कि मैं ऐसे 10 किलों को मुसलमान के बाल के बराबर भी नहीं समझता। जलालुद्दीन को लोग उसके शासनकाल के समय एक दयालु और विनम्र सम्राट की नजर से देखते थे। कई रईस मानते थे कि जलालुद्दीन एक
14:26
Speaker A
कमजोर शासक है और इसलिए उन्होंने कई बार जलालुद्दीन को उखाड़ फेंकने की कोशिश की। पर एंड में उनको हार ही मिली। जलालुद्दीन के शासनकाल में ही उसके भतीजे अलाउद्दीन खिलजी ने सुल्तान बनने से पहले 1292 ईस्वी में अपने चाचा की एक्सेप्टेंस के बाद
14:44
Speaker A
देवगिरी में लूटमार का काम किया। उस समय देवगिरि को लूटना मुस्लिमों का दक्षिण भारत पर पहला अटैक था। उन दिनों अलग-अलग स्थानों पर लूटमार की वजह से अलाउद्दीन को बहुत सारी संपत्ति मिली। जलालुद्दीन का शासनकाल उदार निरंकुशता पर आधारित था।
15:02
Speaker A
अपनी उदार नीति की वजह से जलालुद्दीन ने कहा था कि मैं एक वृद्ध मुसलमान हूं और मुसलमानों का खून बहना मेरी आदत है। अमीर खुसरो और कई इतिहासकारों ने जलालुद्दीन को एक लकी पर्सन बताया है। 1290 की खिलजी
15:18
Speaker A
क्रांति से बहुत पहले ही अलाउद्दीन ने जलालुद्दीन की बेटी मलिकाए जहां से शादी कर ली थी और जलालुद्दीन का भरोसेमंद आदमी बन गया था। लेकिन अलाउद्दीन के अपनी सास से अच्छे संबंध ना होने की वजह से उसकी सास ने जलालुद्दीन को कई बार वर्न किया कि
15:36
Speaker A
अलाउद्दीन देश के दूसरे हिस्से में अपना खुद का राज बना लेगा। लेकिन जलालुद्दीन ने इस पर इतना ध्यान नहीं दिया। 1291 में अलाउद्दीन खिलजी ने कारा के गवर्नर मलिक छज्जू को हराने में मदद की। जिसके लिए सुल्तान ने अलाउद्दीन को कारा का नया
15:53
Speaker A
गवर्नर बना दिया। कारा में मलिक छज्जू के पुराना सेनापति जलालुद्दीन खिलजी को कमजोर शासक मानता था। इसलिए उसने अलाउद्दीन को उन्हें गद्दी से हटाने के लिए उकसाया। जिसका प्रभाव अलाउद्दीन के दिमाग पर भी पड़ा। इसके बाद अलाउद्दीन ने जलालुद्दीन
16:11
Speaker A
को गद्दी [संगीत] से हटाने के अपने प्लान के लिए पड़ोसी हिंदू राज्यों पर अटैक करने का फैसला किया। 1293 में उसने परमार राज्य के भिलसा नामक एक अमीर शहर को लूटा जहां उसे दक्कन क्षेत्र के यादव राज्य की अपार
16:26
Speaker A
संपत्ति और उनकी राजधानी देवगिरि जाने वाले रास्तों के बारे में पता चला। इसलिए उसने चालाकी से भिलसा से लूटा हुआ धन जलालुद्दीन को दे दिया ताकि सुल्तान का उस पर भरोसा बना रहे। जबकि उसने यादव राज्य की इंफॉर्मेशन छुपा ली। वर्षों की योजना
16:44
Speaker A
और तैयारी के बाद अलाउद्दीन ने 1296 में देवगिरी पर अटैक किया और देवगिरि से भारी मात्रा में धन संपत्ति लेकर कारा की ओर निकला। इसी बीच अलाउद्दीन के छोटे भाई उलू खान ने जलालुद्दीन को कारा जाकर अलाउद्दीन से मिलने के लिए राजी किया। विश्वास से
17:02
Speaker A
भरे जलालुद्दीन जब कारा पहुंचे तो 20 जुलाई 1296 को अलाउद्दीन ने स्वागत का एक्ट करते हुए सही मौका दे जलालुद्दीन को मार दिया और खुद को नया राजा घोषित कर दिया। 22 अक्टूबर 1296 में अलाउद्दीन ने बलबान के लाल महल में खुद का राज्याभिषेक
17:20
Speaker A
करवाया। अलाउद्दीन खिलजी के राज्याभिषेक पर बरानी कहते हैं कि शहीद सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के कटे सर से अभी रक्त टपक ही रहा था कि शाही चंदोबा अलाउद्दीन खिलजी के सिर पर रखा गया और उसे सुल्तान घोषित कर दिया गया। और फिर आता है खिलजी
17:36
Speaker A
डायनेस्टी का दूसरा सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी जिसे लोग सिकंदर सानी यानी सेकंड अलेक्जेंडर भी बुलाते थे। अलाउद्दीन ने सुल्तान बनने के बाद सेना की पावर बढ़ाई और सभी सोल्जर्स को डेढ़ साल का वेतन नकद दिया। अलाउद्दीन के सुल्तान के रूप में
17:52
Speaker A
पहले वर्ष के बारे में हिस्टोरियन बरानी लिखते हैं कि यह दिल्ली के लोगों द्वारा देखा गया अब तक का सबसे खुशहाल वर्ष था। 1297 की सर्दियों में मंगोलों ने पंजाब पर अटैक किया। लेकिन 6 फरवरी 1298 में उल्लू
18:07
Speaker A
खान के नेतृत्व में अलाउद्दीन की सेना ने मंगोलों को हरा दिया। अमीर खुसरो के अनुसार इस लड़ाई में 20,000 मंगोल मारे गए और कई सारों को दिल्ली में कैदी बनाकर लाया गया। 1301 में अलाउद्दीन ने उल्लू खान और नुसरत
18:22
Speaker A
खान को रणथंबोर पर अटैक करने का आर्डर दिया। जिसके राजा हम्मीरा देव ने जालौर के पास हुए विद्रोह के नेताओं को शरण दी थी। घेराबंदी के दौरान नुसरत खान के मारे जाने के बाद अलाउद्दीन ने स्वयं घेराबंदी की
18:37
Speaker A
कमांड संभाली और जुलाई 1301 में किले की सुरक्षा कम होने पर धोखे से किला जीत लिया। रणथंबोर अभियान के दौरान अलाउद्दीन को तीन बार हार का सामना करना पड़ा। हम्मीर को हरा देने के बाद अलाउद्दीन की वजह से राजस्थान का पहला साका रणथंबोर के
18:54
Speaker A
किले में हुआ। इसके अलावा 1303 में अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर भी अटैक किया। जहां के राजा मेवाड़ के रावल रतन सिंह थे। कुछ हिस्टोरियंस और लोकथाओं के अनुसार अलाउद्दीन को रतन सिंह की धर्मपत्नी पद्मिनी से मोह होने के कारण
19:11
Speaker A
उसने उसे पाना चाहा। पर जीत के बाद राजस्थान का दूसरा साका हुआ और 60 हजार से ज्यादा औरतों ने जौहर किया। इसके बाद अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का नाम बदलकर अपने बेटे खिज्र खान के नाम पर खिजराबाद रख दिया और उसे चित्तौड़ सौंप कर वापस दिल्ली
19:29
Speaker A
लौट गया। अलाउद्दीन खिलजी को गुजरात अभियान में बनाए गए गुलाम मलिक काफूर से बहुत लगाव था। सैन्य कमांडर और अपनी इंटेलिजेंस से वह अलाउद्दीन की सेवा में तेजी से आगे बढ़ने लगा और एंड में सल्तनत का वायसराय बन गया। अलाउद्दीन काफूर को
19:47
Speaker A
बहुत पसंद करता था और उनके बीच गहरा संबंध था। जिस पर हिस्टोरियंस में मतभेद है। अलाउद्दीन के पास एक हरम था जो टाइम के साथ विशाल होता गया। अलाउद्दीन अपने वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था। अपने शासनकाल के दौरान ग्रामीण क्षेत्र और कृषि क्षेत्र
20:06
Speaker A
पर पारंपरिक हिंदू अधिकारियों का कंट्रोल था। अलाउद्दीन उन्हें अपने शासनकाल के लिए खतरा मानता था और उसे अपने दरबार में चल रही साजिशों का भी सामना करना पड़ रहा था। उसने गैर मुस्लिमों के खिलाफ कुछ नियम लागू किए जिसमें हिंदुओं को इस हद तक
20:23
Speaker A
कमजोर किया जाना था कि वे घोड़े रखने, अच्छे कपड़े पहनने और जीवन की कोई भी चीज का आनंद ना ले सके। अलाउद्दीन की सरकार ने अपने गैर मुस्लिम प्रजा पर जिजिया कर लगाया। उसने आवासों और चरागाहों पर भी कर
20:38
Speaker A
लगाए। इसके अलावा उसने रोजमर्रा की चीजों के भावों को कम किया ताकि वह कम सैलरी देकर एक बड़ी सेना खड़ी कर सके। माना जाता है कि अलाउद्दीन के पास एक विशाल सेना सहित 4,75,000 घुड़सवार थे। वह हर हथियार और घोड़ों की
20:57
Speaker A
जांच करवाया करता था। यह पता रखने के लिए कि घोड़ा दूसरी बार जांच के लिए ना आए। उसने घोड़ों पर निशान लगवाना चालू करवाया। इसके अलावा अलाउद्दीन ने वैश्यावृत्ति पर बन लगा दिया और व्यभचार को रोकने के लिए
21:12
Speaker A
पुरुष व महिला व्यभिचारी के लिए कठोर दंड सुनाए। अलाउद्दीन ने धोखेबाजों को भी पत्थर मारकर मौत की सजा देने का आर्डर दिया। अपने जीवन के आखिरी सालों में अलाउद्दीन बीमार पड़ गया और उसे अपने अधिकारों पर बिल्कुल भरोसा नहीं था।
21:29
Speaker A
इसीलिए उसने अपनी पावर अपने फैमिली मेंबर्स और गुलामों के हाथों केंद्रित करना शुरू कर दिया। बढ़ती चली गई बीमारी के चलते 4 जनवरी 1316 की रात को अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु हो गई। लेकिन कुछ हिस्टोरियंस का मानना है कि
21:45
Speaker A
अलाउद्दीन की मृत्यु उसी के चहेते मलिक कफूर ने की थी। अलाउद्दीन के मरने के बाद सारी पावर अब मलिक कफूर के पास आ गई थी। अगले दिन ही कफूर ने अलाउद्दीन के सबसे छोटे बेटे शहाबुद्दीन ओमार को डमी सम्राट घोषित कर
22:02
Speaker A
दिया। कफूर ने अलाउद्दीन के बड़े बेटे मुबारक शाह को कैद कर लिया। जिसे वो अपना खतरा मानता था। लेकिन कुछ समय बाद ही मलिक कफूर को वहां के सरदारों ने परेशान होकर मार दिया और मुबारक शाह को रिजेंट बनाना
22:18
Speaker A
चाहा। पर मुबारक शाह का मानना था कि रीजेंट बनने के बाद उसकी लाइफ लगातार डेंजर में रहेगी। लेकिन बाद में वो इसके बारे में मान गया। इसके बाद उसने अपने छोटे भाई से सत्ता हथियाली [संगीत] और नया सुल्तान बन गया। लेकिन सुल्तान के रूप में
22:35
Speaker A
मुबारक शाह बहुत बेकार था। उसका मानना था कि खुदा ने उसे सुल्तान बनाया है और खुदा ही उसे हटा सकते हैं। इसलिए उसने खुद को खालसा घोषित कर दिया। सिंहासन पर बैठने के बाद उसने अलाउद्दीन खिलजी के लगाए सारे
22:51
Speaker A
करों और जुर्मनों को खत्म कर दिया और हजारों कैदियों को छोड़ दिया। इसके अलावा वह हमेशा दरबार में लड़कियों के कपड़े पहन कर आता या कभी-कभी नंगे होकर दरबार में दौड़ता रहता। उस समय मुबारक शाह का वजीर खुसरो खान था जो काफी समय से सुल्तान को
23:09
Speaker A
मारने का प्लान बनाए हुए था। एक समय खुसरो खान ने सुल्तान से कहा कि वह अपने आदमियों को महल में प्रवेश की अनुमति चाहता है ताकि वे सुल्तान का साथ छोड़े बिना उससे मिल सकें। सुल्तान मान गया और उसके बाद हर
23:25
Speaker A
रात 300 से 400 बरदू सैनिक महल में आने जाने लगे। और 9 जुलाई 1320 की रात को जब सभी परीदारी महल में थे तो खुसरो खान ने वहां हमला बोल दिया। सुल्तान ने अपने हरम में भागने की कोशिश की। पर खुसरो खान ने
23:41
Speaker A
उसके बाल पकड़ कर उसे रोक दिया और कुल्हाड़ी से मुबारक शाह का सर काट दिया और उसे आंगन में फेंक दिया। और इसके बाद खुसरो खान ने बड़े लेवल पर महल में अटैक किया और सत्ता हथिया ली। मुबारक शाह की
23:56
Speaker A
मौत के बाद अब खुसरो खान नसीरुद्दीन के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठता है। अमीर खुसरो के हिसाब से खुसरो खान का शासन सिर्फ 2 महीने या उससे भी कम चला क्योंकि खुसरो खान के थ्रोन पर बैठने के बाद कई
24:11
Speaker A
लोगों ने उसे सुल्तान मानने से मना कर दिया। जिसमें से एक थे गजी मालिक तुगलक जो पहले मुबारक शाह की सेवा करते थे। और मुबारक शाह ने उन्हें पंजाब का जागीरदार भी बनाया था। इससे पहले गजी मलिक अलाउद्दीन खिलजी की सेवा में भी रह चुके
24:28
Speaker A
थे। वे अलाउद्दीन के भाई उल्लू खान के सेवक के रूप में खिलजी सेना में आए थे। और इसके अलावा उन्होंने मलिक काफूर की भी जंग के दौरान काफी मदद की थी। 1320 में जब खुसरो खान सुल्तान बना तो गजी मलिक के
24:41
Speaker A
बेटे मोहम्मद बिन तुगलक ने खुसरो को गद्दी से हटाने के लिए अपने पिता से बात की। इसके बाद उन दोनों ने अटैक करने का प्लान बनाया। इसके बाद गजी मलिक की सेना ने सरस्वती और लहरावत के युद्ध में खुसरो खान
24:55
Speaker A
को हराया और उसे मार डाला। फिर 6 सितंबर 1320 में गजी मलिक को गियसुद्दीन तुगलक के नाम से सुल्तान बनाया गया। और इसी तरह खिलजी डायनेस्टी का भी एंड हो गया और तुगलक डायनेस्टी आई जिसे दिल्ली सल्तनत पर
25:10
Speaker A
सबसे ज्यादा शासन करने वाली डायनेस्टी में गिना जाता है। करीब 94 इयर्स। गजी मलिक मंगोलों के प्रति क्रूर था और उसने कई मंगोलों के लिए कठोर दंड सुनाए। गजी मलिक ने मंगोलों को 18 बार हराया था। इसके अलावा उसने तुगलकाबाद किले का निर्माण
25:27
Speaker A
करवाया था। 5 साल शासन करने के बाद फरवरी 1325 में जब वे मानिकपुर में थे, उनके स्वागत के लिए यूज़ किया गया लकड़ी का मंडप टूट गया जिससे उनकी मृत्यु हो गई। माना जाता है कि उनकी मौत के पीछे उन्हीं
25:40
Speaker A
के बेटे मोहम्मद बिन तुगलक की साजिश थी जो बाद में नया सुल्तान बनता है। मोहम्मद बिन तुगलक को हिस्ट्री में सबसे सनकी सुल्तान बताया गया है। जबकि मोहम्मद बिन तुगलक को चिकित्सा में इंटरेस्ट था और उन्हें फारसी, अरबी, हिंदी, तुर्की और संस्कृत
25:57
Speaker A
जैसी भाषाएं आती थी। लेकिन वे डिसीजंस लेने में काफी कच्चे थे। जिसका खामियाजा उनकी प्रजा को भुगतना पड़ा। इसके अलावा मोहम्मद बिन तुगलक दूसरे रिलीजंस को भी पसंद करते थे। कई हिस्टोरियंस का कहना है कि मोहम्मद बिन तुगलक हिंदू त्यौहारों में
26:14
Speaker A
भाग लेने वाले पहले सुल्तान थे। 1327 में लगातार मंगोल और अफगानी अटैक्स की वजह से तुगलक ने एक बहुत बड़ा डिसीजन लिया। उन्होंने अपनी राजधानी दिल्ली से दौलताबाद शिफ्ट करने का फैसला किया जिसे देवगिरी भी कहते हैं। इसकी सुविधा के लिए उन्होंने
26:31
Speaker A
सड़क का काम करवाया और भोजन व पानी की व्यवस्था भी की। इसके बावजूद सफर के बीच में कई सारे लोग मारे गए। क्योंकि उन्हें जिंदा रखने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं था। इसके बाद तुगलक खुद ही बीमार पड़ गया, और
26:45
Speaker A
वहां के विद्रोह को रोकने की वजह से कई सारे सोल्जर्स भी मारे गए। दूसरी तरफ क्योंकि सुल्तान दिल्ली में नहीं था तो वहां कंटीन्यूअसली अटैक्स होने लगे। यह सब देख के 1335 में उसने राजधानी को वापस दिल्ली ट्रांसफर करने का डिसीजन लिया।
27:00
Speaker A
जिससे लोगों को मजबूरन वापस दिल्ली लौटना पड़ा। जिससे और ज्यादा मौतें हुई। इसके बाद 1329 में मोहम्मद बिन तुगलक ने 3,70,000 सैनिकों की सेना खड़ी की। लेकिन उन्होंने सैनिकों की क्षमता और घोड़ों की नस्ल की जांच करने के लिए कोई कदम नहीं
27:18
Speaker A
उठाया। 1330 में उसने सोचा कि क्यों ना हिमालय पार चीन पर अटैक किया जाए। लेकिन यहां भी वह फेल हो गया क्योंकि हिमालय के पहाड़ी राजपूतों ने मोहम्मद बिन तुगलक की सेना को हरा दिया जो पहाड़ी पर ठीक से
27:31
Speaker A
नहीं लड़ पा रहे थे। इसलिए उनके लगभग 1 लाख सैनिक मारे गए और उन्हें मजबूरन पीछे हटना पड़ा। उनके इसी तरह काफी डिसीजंस फेल हुए। जैसे बाद में जब वह देवगिरी को भी नहीं जीत पाए तो पैसे खत्म हो जाने की वजह
27:45
Speaker A
से उन्होंने तांबे के सिक्के चलवाने शुरू किए। जिनकी कॉस्ट उन्होंने सोने चांदी के बराबर रखी। आगे जाकर यह योजना बहुत बुरी तरीके से फेल हो गई क्योंकि अब लोग घर में ही नकली सिक्के बनाने लगे। इसका कारण यह
28:00
Speaker A
था कि मोहम्मद बिन तुगलक ने यह फैसला भी जल्दबाजी में लिया था और इसलिए मोहम्मद बिन तुगलक को हिस्ट्री में बुद्धिमान मूर्ख उपनाम दिया गया है। मोहम्मद बिन तुगलक की मौत 1351 में बीमारी से हुई जब वह सिंध के थट्टा जा रहे थे और फिर लोगों
28:17
Speaker A
ने चैन की सांस ली और कहा कि सुल्तान को प्रजा से मुक्ति मिली और प्रजा को सुल्तान से। उनकी मौत के बाद दिल्ली को फिर से एक अच्छा शासक मिला जो थे उन्हीं के कजिन ब्रदर फिरोज शाह तुगलक। फिरोज शाह तुगलक
28:33
Speaker A
की पहली जीत मंगोलों के विरुद्ध हुई। इसके बाद उन्होंने बंगाल पर अटैक किया जहां का शासक उनसे डर कर भाग गया। इसके 2 साल बाद उन्होंने हिसार शहर बनवाया और यमुना नदी के किनारे फिरोजाबाद शहर बनवाया। इसके अलावा फिरोजपुर, हिसार, हासी, फतेहाबाद
28:53
Speaker A
जैसे शहर दिल्ली के आसपास बनवाए। इसके बाद उन्होंने अपने भाई मोहम्मद बिन तुगलक के पहले नाम जोना खान पर जौनपुर शहर भी बनवाया। उन्होंने सरदारों की सैलरी बढ़वाई और कठोर सजाओं को कम करवाया। इसके अलावा 300 से ज्यादा गांव बनवाए, सिंचाई के लिए
29:13
Speaker A
पांच नहरे खुदवाई। जब 1368 में कुतुब मीनार पर बिजली गिरने की वजह से ऊपर की मंजिल गिर गई तो उन्होंने उसकी मरम्मत का काम भी करवा दो। नई मंजिलें बनवाई। उन्होंने गरीब परिवार की लड़कियों की शादी के पैसे देने के लिए दीवान खैरात का रूल
29:31
Speaker A
बनाया। इसके अलावा उन्होंने बुजुर्गों को पेंशन देने के लिए दीवान इस्तिका का रूल भी बनवाया। उन्होंने गरीबों के मुफ्त इलाज के लिए कई अस्पताल भी बनवाए। फिरोज ने अपने पोते तुगलक खान को अपना सक्सेसर चुना और 1388 में 37 साल तक राज करने के बाद
29:50
Speaker A
उनकी मृत्यु हो गई। फिरोजशाह तुगलक की मौत के बाद तुगलक डायनेस्टी का डाउनफॉल स्टार्ट हो गया। हिस्ट्री में तुगलक वंश के सिर्फ इन तीन राजाओं के बारे में ही पढ़ाया जाता है। क्योंकि उनके बाद आए राजा उतने पावरफुल नहीं थे। जिसकी वजह से
30:08
Speaker A
लगातार उत्तर भारत भी छोटे-छोटे राज्यों में बट गया। एंड में 1398 में दिल्ली पर उस समय के टर्किश और मंगोल के शासक तैमूर लंग का अटैक हुआ। उस समय दिल्ली का शासक नसीरुद्दीन महमूद तुगलक था जो तैमूर से
30:25
Speaker A
बड़ी आसानी से हार गया और फिर तैमूर ने दिल्ली में कत्लेआम मचाया। [संगीत] जिसमें 1 लाख से ज्यादा लोग मारे गए और तैमूर के सैनिकों ने लोगों के सिरों की मीनार बनाई। तैमूर ने दिल्ली को पूरी तरीके से लूट
30:41
Speaker A
लिया। जो दिल्ली पहले ही अक्षम सुल्तानों की वजह से कमजोर थी, वह अब तैमूर की लूटमार की वजह से और ज्यादा कमजोर हो चुकी थी। इस सब के बाद तैमूर ने दिल्ली पर शासन नहीं किया। बल्कि उसने अपने गवर्नर खिज्र
30:57
Speaker A
खान को दिल्ली की कमांड सौंप कर लूट के साथ सेंट्रल एशिया लौट गया। और इसी तरह तुगलक डायनेस्टी का भी एंड हो गया। और अब दिल्ली सल्तनत पर आई सबसे कमजोर डायनेस्टी सईद डायनेस्टी जिसके फाउंडर थे खिज्र खान
31:14
Speaker A
जिनका दावा था कि वे पहले पैगंबर मोहम्मद के वंशज है। 1414 में उन्होंने दौलत खान लोदी को हराकर दिल्ली को छीना। लेकिन उन्होंने खुद को सुल्तान घोषित नहीं किया और तैमूर के बाद उसके नाती तक अपने आप को
31:30
Speaker A
उनका जागीरदार ही माना। 1421 में उनकी मौत के बाद उनके बेटे मुबारक शाह सेकंड ने दिल्ली की सत्ता अपने हाथ में ली और अपने पिता के ऑोजिट उन्होंने खुद को सुल्तान डिक्लेअ किया। इसके अलावा उन्होंने सिक्कों पर अपना नाम मुईजुद्दीन मुबारक
31:48
Speaker A
शाह लिखवाया और खुद को खलीफा बताया। वे सईद डायनेस्टी के सबसे कुशल शासक थे। उन्होंने 1434 तक राज किया और उनकी मौत के बाद उनके भतीजे मोहम्मद शाह ने 1434 से 1445 तक शासन किया। जहां उनके शासनकाल में
32:07
Speaker A
विद्रोह और षड्यंत्र भारी मात्रा में जगे। 1445 में उनकी मौत के बाद उनके बेटे आलमशाह ने गद्दी संभाली। पर वे अपने पिता से भी कमजोर शासक साबित हुए। उन्हें अपनी गद्दी से कोई लगाव नहीं था। इसलिए उन्होंने एंड में अपनी गद्दी बहलूल लोदी
32:27
Speaker A
को खुशी-खुशी दे दी। जिससे सईद डायनेस्टी खत्म हो गई और दिल्ली सल्तनत की पहली अफगानी सल्तनत लोदी डायनेस्टी शुरू हुई जिसके फाउंडर थे बहलूल लोदी। अपने शुरुआती जीवन में बहलूल लोदी घोड़ों के व्यापारी थे। जिनके चाचा मलिक सुल्तान सईद वंश के
32:47
Speaker A
पहले सुल्तान खिज्र खान के गवर्नर थे। बाद में उनकी मौत के बाद बहलूल लोदी को राज्यपाल बनाया गया। जहां उन्होंने मोहम्मद शाह की युद्ध में भी काफी मदद की। बहलूल लोदी ने सत्ता को हथियाने के लिए दो बार असफल प्रयास किए। बाद में जब आलम शाह
33:05
Speaker A
ने गद्दी को छोड़ दिया तो बहलूल लोदी को ही गद्दी पर बैठाया गया। बहलूल लोदी ने जौनपुर पर अटैक करके उसे अपने अंडर में ले लिया और उसको रेनोवेंट करवाया। जहां उसे कई मस्जिदों सहित एक किले जैसा बना दिया
33:18
Speaker A
गया। 1489 में उनकी मौत के बाद अगला सुल्तान बना उनका बेटा निजाम खान उर्फ सिकंदर लोदी। सिकंदर लोदी एक कुशल और सक्षम शासक था। जिसके शासनकाल में बिहार और ग्वालियर जैसे क्षेत्रों पर पुनः विजय प्राप्त की। दूसरी तरफ उन्होंने 1503 में
33:38
Speaker A
आज का सुंदर आगरा शहर का निर्माण करवाया। सिकंदर लोदी एक क्रूर शासक भी था। जिसने कई हिंदू मंदिर तुड़वाए और दूसरों के दबाव में आकर एक ब्राह्मण को फांसी भी दे दी। जिसने सिर्फ यह कहा था कि हिंदू धर्म और
33:52
Speaker A
इस्लाम धर्म दोनों ही सत्य हैं। हिस्टोरियंस का मानना है कि इसके पीछे कारण यह था कि सिकंदर लोदी की मां एक हिंदू थी। पर जनता से पॉलिटिकल प्रॉफिट लेने के लिए उसने पूरी कोशिश की कि वह खुद को कट्टर मुसलमान बताए।
34:09
Speaker A
1507 में उसकी मौत के बाद उसका सबसे बड़ा बेटा इब्राहिम लोदी अगला शासक बना। इब्राहिम लोदी एक गुस्सैल शासक था जिसने अपने भाई जलाल को मरवा डाला था जब वह इब्राहिम के खिलाफ गया था। उसने कई बार मेवाड़ में अपनी सेना भेजी। लेकिन वहां के
34:26
Speaker A
राजा राणा सांगा ने उसे कई बार हराया। अपने भाई जलाल के विद्रोह के बाद इब्राहिम अब अपने कई तुर्की और अफगानी सरदारों पर शक करने लगा और उनके लिए कठोर बनता गया। वह सिर्फ शक की वजह से कई लॉयल लोगों व
34:42
Speaker A
सैनिकों को मरवा देता था। इस सब से परेशान होकर पंजाब के गवर्नर दौलत खान लोदी और इब्राहिम के चाचा अलाउद्दीन खान ने काबुल में बाबर से हेल्प मांगी और बाबर ने उनकी यह रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली। 1524 में
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Speaker A
बाबर ने लाहौर पर कब्जा कर लिया। उसके बाद इब्राहिम लोदी की सेना को हरा पंजाब पर भी कब्जा कर लिया। और धीरे-धीरे 1526 तक बाबर ने उत्तरी भारत तक पे अटैक स्टार्ट कर दिए। 20 अप्रैल 1526 में बाबर ने इब्राहिम
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Speaker A
लोदी के [संगीत] साथ पानीपत की लड़ाई लड़ी। जिसमें उसने इब्राहिम लोदी को हरा दिया और मार दिया। जिससे ना सिर्फ लोदी डायनेस्टी [संगीत] खत्म हुई बल्कि दिल्ली सल्तनत भी खत्म हो गई और भारत में अब मुगल साम्राज्य का झंडा लहराने लगा।
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Speaker A
तो दोस्तों, यह थी दिल्ली सल्तनत की पूरी कहानी जहां हमने कई राजाओं के बारे में जाना। कुछ को सत्ता हथियानी पड़ी तो कुछ को वह रियासत में ही मिल गई। किसी ने सत्ता के लिए अपने सगे संबंधियों को मारने
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Speaker A
से पहले कुछ नहीं सोचा। तो किसी ने थ्रोन की कदर ही नहीं करी। अगर आपको यह हिस्टोरिकल डॉक्यूमेंट्री पसंद आई हो तो वीडियो को लाइक एंड चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें। आगे अगर आप किसी एंपायर या किसी स्पेसिफिक किंग के ऊपर वीडियो चाहते
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Speaker A
हैं तो कमेंट सेक्शन में जरूर बताना। तो मिलते हैं आपसे अगली वीडियो में। तब तक लिए बाय।
Topics:दिल्ली सल्तनतमोहम्मद गौरीकुतुबुद्दीन ऐबकइल्तुतमिशरजिया सुल्तानगयासुद्दीन बलबानतराइन के युद्धममलूक वंशकुतुब मीनारमंगोल आक्रमण

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