Speaker A
हेलो फ्रेंड्स, जैसा कि आप जानते हैं कि हमारे भारत का सेंट्रल एरिया जिसे आज नई दिल्ली के नाम से जाना जाता है। यहां मुगल एंपायर ने 300 सालों से ज्यादा राज किया है। जहां यह भारत के कई मेजर स्टेट्स पर भी अपना अधिकार कर चुके हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं मुगलों से पहले भारत के सेंट्रल एरिया में कौन सी सल्तनत या डायनेस्टी का राज था? क्या वे भी इतने क्रूर थे? इसके लिए हमें समय में पीछे जाकर दिल्ली सल्तनत का पूरा इतिहास जानना होगा। इन टुडेएस वीडियो टाइटल एंटायर हिस्ट्री ऑफ दिल्ली सल्तनत। इस सब की शुरुआत होती है मोहम्मद गोरी से जो उस समय घोर का शासक था। जो अपने भाइयों के साथ वर्तमान अफगानिस्तान पर राज कर रहा था। पर उसकी नजर पड़ती है भारत पर जो उस समय सोने की चिड़िया कहलाया जाता था। भारत को देखकर वो मोहित हो जाता है। वो दिन रात भारत को पाने के सपने देखने लगता है। उस समय भारत का काफी बड़ा हिस्सा इंक्लूडिंग दिल्ली चौहान वंश के अधीन फल फूल रहा था। जिस पर राज पृथ्वीराज चौहान तृतीय का था। पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने मोहम्मद गोरी को कई बार हराया। मगर मोहम्मद गोरी के अंदर भारत की इतनी चाह थी कि उसने हारने के बाद भी कई युद्ध लड़े। सन 1191 ईस्वी में पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच तराइन का पहला युद्ध हुआ। जिसमें मोहम्मद गौरी को हार मिली। इतनी बड़ी हार के बाद मोहम्मद गौरी ने आक्रमण करना बंद कर दिया। वह एक साल तक अगले युद्ध की भारी रणनीति बनाई। दूसरी तरफ पृथ्वीराज चौहान को लगा कि मोहम्मद गौरी अब दोबारा नहीं आएगा। 1192 ईस्वी में जब पृथ्वीराज चौहान दूसरे युद्ध से जीतकर अपने सैनिकों के साथ विश्राम कर रहे थे, तब मोहम्मद गौरी ने धोखेबाजी से सुबह के समय पृथ्वीराज चौहान की सेना पर आक्रमण कर दिया। वो अपनी बेहतरीन युद्ध नीति से तराइन के दूसरे युद्ध में विजय हासिल की। अपने शासनकाल में मोहम्मद गौरी ने वर्तमान अफगानिस्तान से लेकर वर्तमान बांग्लादेश तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। भारत के पश्चिमी पंजाब की एक जनजाति खोकर ने मोहम्मद गौरी के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत की। जिस कारणवर्ष मोहम्मद गोरी को भारी मात्रा में नरसंहार करना पड़ा ताकि वह विद्रोह को कुचल सके। विद्रोहियों को सफलतापूर्वक दबाने के बाद गजनी लौटते समय प्रतिद्वंदी टीम के एक सिपाही द्वारा 1206 ईस्वी में मोहम्मद गौरी की हत्या कर दी गई। अचानक मृत्यु के कारण मोहम्मद गोरी अपने उत्तराधिकारी के बारे में कोई निर्णय नहीं कर पाया था। उसका कोई पुत्र नहीं था। लेकिन वह अपने दासों पर काफी विश्वास करता था। उन्हीं में से एक गुलाम था जो गोरी का प्रिय था और उसका नाम था कुतुबुद्दीन ऐबक। कुतुबुद्दीन ऐबक गोरी के साथ युद्ध में भी उसका साथ देता था। गोरी ने उसकी बहादुरी देखकर उसको अपना राइट हैंड बना दिया था। 1193 से लेकर 1206 तक ऐबक ने दिल्ली, अजमेर, कन्नौज, ग्वालियर सारे राजपूत इलाके गोरी के लिए जीते थे। कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1192 से 1199 ईसवी के बीच अजमेर में स्थित एक संस्कृत विद्यालय को तोड़कर, वहां आई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद बनवाई। मोहम्मद गौरी के आदेश पर हिरात के वास्तुकार अबू बक्र ने हिंदू कारीगरों की मदद से इसे ढाई दिन में तैयार किया। जिससे इसका नाम पड़ा अढ़ाई दिन का झोपड़ा। 1206 ईसवी मोहम्मद गौरी की मौत के बाद दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठता है। उसका भरोसेमंद गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक और वह दिल्ली सल्तनत की पहली डायनेस्टी स्लेव डायनेस्टी जिसे ममलूक वंश भी कहते हैं कि नींव रखता है। अपने शासनकाल में ऐबक कई बदलाव करता है। जैसे उसने लाहौर को अपनी राजधानी बनाई। कुतुबुद्दीन ऐबक खुद एक गुलाम होने के कारण दिल का बहुत अच्छा था। वह हर युद्ध को जीतने के बाद अपनी आवाम को सोने, चांदी या तोहफे दिया करता था। इसलिए लोग उसे लख बख्श कहकर बुलाया करते थे। इसके अलावा ऐबक ने कई इमारतों का भी निर्माण करवाया। जिसमें से सबसे प्रसिद्ध मीनार है कुतुब मीनार। कुतुब मीनार साउथ दिल्ली में बनी 73 मीटर ऊंची दुनिया की सबसे ऊंची मीनार है। यह मीनार भारत में इस्लामी शासन की स्थापना और विजय का प्रतीक मानी जाती है। ऐबक का जीवन अधिकतर युद्ध में ही बिता। ऐबक का प्रिय खेल था पोलो। 1210 ईसवी में लाहौर में पोलो खेलते समय घोड़े से गिर जाने के कारण कुतुबुद्दीन ऐबक की मौत हो गई। ऐबक की मौत के बाद दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठता है उसका बेटा आरामशाह। परंतु वह काफी कमजोर और अयोग्य शासक था। इसलिए सिर्फ 6 महीने में ऐबक के दामाद शमसुद्दीन इल्तुतमिश ने 1206 ईस्वी में उसे हराकर दिल्ली की सत्ता संभाली। दिल्ली सल्तनत और ममलूक वंश को रियल स्ट्रेंथ इल्तुतमिश के आने के बाद ही मिली। इल्तुतमिश ने सुल्तान बनने के बाद दिल्ली को अपनी राजधानी बनाई और ऐबक के द्वारा निर्माण कुतुब मीनार का काम पूरा करवाया। इल्तुतमिश ने अपने शासनकाल में 40 गुलाम व अमीर सरदारों का एक समूह बनाया जिसे तुर्काने चिहालगानी का नाम दिया गया। इस समूह के सदस्य सैन्य सहायता देना व शासन के मामले में सुल्तान को सलाह दिया करते थे। इल्तुतमिश को सबसे ज्यादा जाना जाता है गैंगिश खान को भारत आने से रोकने के लिए। सन 1221 में जब मंगोल के क्रूर नेता चंगेज खान को पता चला कि ईरान के राजकुमार जलालुद्दीन मिंगबर्नी और चंगेज खान की बेटी के बीच प्रेम है तो इससे डरकर अपनी जान बचाने के लिए जलालुद्दीन पंजाब तक आ गया और चंगेज खान भी अपनी सेना के साथ उसके पीछे-पीछे सिंध तक आ गया। जलालुद्दीन ने इल्तुतमिश की शरण लेनी चाही। पर इल्तुतमिश ने समझदारी दिखाते हुए उसे मना कर दिया। जिससे चंगेज खान ने भारत पर हमला नहीं किया। इल्तुतमिश पहला ऐसा सुल्तान था जिसने शुद्ध अरबी सिक्के चलवाए। उसने सल्तनत के लिए दो इंपॉर्टेंट सिक्के, चांदी का टका तथा तांबे का जीतल चलवाया। लगातार युद्ध के कारण इल्तुतमिश बीमार हो गया। अपने आखिरी दिनों में इल्तुतमिश अपने सक्सेसर के सवाल को लेकर चिंता में था। उसके बेटे शासन के लायक बिल्कुल नहीं थे। इसलिए इल्तुतमिश ने अपनी बेटी रजिया को अपना उत्तराधिकारी बनाया। इन द एंड 30 अप्रैल 1236 में उसकी मौत हो गई। स्रोतों के अनुसार पहले इल्तुतमिश के बड़े बेटे को उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया गया। पर अनफॉर्चूनेटली उसकी अल्प आयु में ही मृत्यु हो गई। इल्तुतमिश पहला ऐसा शासक था जिसने अपने बाद किसी महिला को उत्तराधिकारी बनाया। लेकिन मुस्लिम वर्ग को इल्तुतमिश का किसी महिला को वारिस बनाना मंजूर नहीं था। इसलिए उसकी मृत्यु के बाद उसके छोटे बेटे रखनुद्दीन फिरोज शाह को गद्दी पर बैठाया गया। पर वह एक बेवकूफ और अक्षम सुल्तान साबित हुआ। जनता ने परेशान होकर 9 नवंबर 1236 को रखुद्दीन तथा उसकी माता शाह तुर्कान की हत्या कर दी। उसका शासन सिर्फ छह माह का था। जनता की मदद से रजिया ने फिर से गद्दी हासिल कर ली और दिल्ली सल्तनत की पहली महिला शासक बन गई। शासन कार्यों में रजिया की रुचि अपने पिता के शासन के समय से ही थी। रजिया ने रीति-रिवाजों के विपरीत पुरुषों की तरह सैनिकों का कोट और पगड़ी पहनना पसंद किया। बल्कि बाद में युद्ध में बिना नकाब पहने शामिल हुई। रजिया ने पर्दा प्रथा का त्याग कर पुरुषों की तरह कुर्ता, टोपी पहनकर दरबार में खुले मुंह जाने लगी। रजिया अपनी राजनीतिक समझदारी और नीतियों से सेना तथा जनसाधारण का ध्यान रखती थी। वह दिल्ली की सबसे शक्तिशाली शासक बन गई थी। रजिया सुल्तान एक कुशल प्रशासक थी। जिन्होंने एक आदर्श शासक की तरह अपने राज्य में विकास के काम किए। उन्होंने दिल्ली को सुरक्षित रखा। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई स्कूल, कॉलेजों एवं शैक्षणिक संस्थानों का निर्माण करवाया। अपने राज्य में पानी की व्यवस्था को सुचारू ढंग से चलाने के लिए कुएं और नलकूप खुदवाए। सड़कें बनवाई। इसके अलावा उन्होंने हिंदू और मुस्लिम एकता के लिए काम किया। रजिया सुल्तान का उनके गुलाम जमालुद्दीन याकूद के साथ मोहब्बत की कहानी भी इतिहास में दर्ज है। रजिया सुल्तान को अपने सलाहकार याकूद के साथ इश्क हो गया था। जिसके बाद तमाम मुस्लिम शासकों ने इसका विरोध किया था। वहीं भटिंडा के गवर्नर इख्तियार अल्तुनिया भी रजिया सुल्तान की खूबसूरती के पीछे पागल थे और वे किसी भी हाल में उनको पाना चाहते थे। साथ ही दिल्ली पर भी अपना कब्जा जमाना चाहते थे। जिसके चलते अल्तुनिया और वह लोग जो रजिया को नापसंद करते थे, ने साथ मिलकर दिल्ली पर हमला बोल दिया। रजिया और अल्तुनिया के बीच युद्ध हुआ जिसमें याकूत मारा गया और रजिया को बंदी बना लिया गया। मरने के डर से रजिया अल्तुनिया से शादी करने को तैयार हो गई। इस बीच रजिया के भाई मैजुद्दीन बहराम शाह ने सिंहासन हथिया लिया। अपनी सल्तनत की वापसी के लिए रजिया और उसके पति अल्तुनिया ने बहराम शाह से युद्ध किया जिसमें उनकी हार हुई। उन्हें दिल्ली छोड़कर भागना पड़ा और अगले दिन वह कैथल पहुंचे। जहां उनकी सेना ने साथ छोड़ दिया। वहां डाकुओं के द्वारा 14 अक्टूबर 1240 को रजिया उनके पति के साथ मारी गई। रजिया की मौत के बाद दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठता है एक कठोर शासक जिसका नाम था गयासुद्दीन बलबान जो पहले मंगोलों का पकड़ा गया एक गुलाम था। जब वह दिल्ली आया तो इल्तुतमिश ने उसे खरीद लिया। अपनी सूझबूझ से वह जल्द ही सुल्तान के काफी करीब आ गया और चिहालगानी का मेंबर बन गया। वैसे तो रजिया की मौत के बाद कई राजा आते हैं पर वे उतने समझदार नहीं थे और वे सभी गयासुद्दीन बलबान के सोचे गए डिसीजंस पर ही फैसला लिया करते थे क्योंकि बलबान चिहालगानी का एक इंपॉर्टेंट सरदार था इसलिए।











