यह वीडियो भारत की आजादी के इतिहास और 2014 के बाद की राजनीतिक स्थिति पर सच्चाई उजागर करता है।
Key Takeaways
- भारत की आजादी का संघर्ष लंबा और दर्दनाक था, जो 1857 से शुरू हुआ।
- ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटिश राज तक का संक्रमण भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।
- 1947 का विभाजन आजादी की खुशी के साथ गहरा दर्द लेकर आया।
- राष्ट्रीय नेताओं और क्रांतिकारियों के बलिदान से ही भारत को स्वतंत्रता मिली।
- 2014 के बाद की राजनीतिक स्थिति को समझने के लिए इतिहास को जानना आवश्यक है।
What the video covers
- कुछ लोग कहते हैं कि भारत को आजादी 2014 के बाद मिली, पर यह गलत धारणा है।
- 1947 की आजादी दर्दनाक थी, जिसमें विभाजन और सबसे बड़ा पलायन हुआ।
- 1857 की क्रांति भारत की आजादी की पहली मजबूत नींव थी, जिसमें कई वीरों ने बलिदान दिया।
- ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1600 में हुई और धीरे-धीरे उसने भारत पर शासन कर लिया।
- अंग्रेजों ने भारतीयों के धार्मिक भावनाओं को आहत करते हुए विद्रोह को जन्म दिया।
- मंगल पांडे के नेतृत्व में 1857 का विद्रोह शुरू हुआ, जो पूरे देश में फैल गया।
- विद्रोह असफल रहा लेकिन उसने अंग्रेजों को भारत पर सीधे शासन करने के लिए मजबूर किया।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई और धीरे-धीरे राष्ट्रीय चेतना बढ़ी।
- 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड ने स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा दी।
- 1947 में आजादी मिली लेकिन विभाजन के कारण भारी सांप्रदायिक हिंसा और विस्थापन हुआ।
Chapters
- 00:00आजादी की सच्चाई और 2014 के बाद की गलतफहमी
- 01:201947 की आजादी और विभाजन का दर्द
- 02:38ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना और भारत में व्यापार
- 03:58मुगल दरबार में अंग्रेजों का प्रवेश
- 05:15अंग्रेजों का भारत में विस्तार और किलेबंदी
- 06:401857 का विद्रोह: कारण और शुरुआत
- 08:021857 के क्रांतिकारियों का संघर्ष और परिणाम
- 09:29राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना और स्वतंत्रता संग्राम
- 10:29जलियांवाला बाग हत्याकांड और स्वतंत्रता की लड़ाई
- 11:321947 का विभाजन और उसके बाद की सांप्रदायिक हिंसा
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Speaker A
कुछ लोग कहते हैं कि आजादी 2014 के बाद मिली है। ऐसे लोगों की बेवकूफी पर क्या ही कहा जाए? बस इतना कहिए कि यह बात उन लोगों के मुंह पर कही जा रही है जिन्होंने 1947 में सब कुछ गवा दिया था। 1947 की आजादी
Speaker A
इतनी खतरनाक थी, इतनी दर्दनाक थी कि जश्न मनाने वालों के घर में उस रात खाने को कुछ नहीं था। इतना बड़ा मुल्क और एक अंग्रेज ने एक कमरे में बैठकर नक्शे पर एक लकीर खींचकर उसे काट दिया। उसे पता ही नहीं था
Speaker A
कि यह लकीर किसके घर के बीच से होकर जा रही है। पता था कि किसी एक खेत के दो टुकड़े हो रहे हैं। और जब आखिरकार आजादी मिली तो उसके साथ आया वह दुख आज तक का सबसे बड़ा पलायन। लोग अपना घर छोड़कर चल
Speaker A
पड़े। और सबसे बुरा हुआ बच्चों और गर्भवती औरतों के साथ। जो औरतें काफिलों में चलते-चलते बच्चे जनती रही, ना पानी, ना छांव, ना दवा। यह लड़ाई 1857 में शुरू हुई थी। लोग अपनी जान देते रहे, बलिदान देते रहे और फिर गांधी ने वह खेल खेला कि
Speaker A
अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ा। पिछले कुछ सालों में नेहरू और गांधी जी का बहुत अपमान हुआ है। लेकिन सच्चाई कभी हारती नहीं। आज हम सब कुछ विस्तार से देखेंगे। भारत को आजादी असल में कैसे मिली? 15 अगस्त 1947 आधी रात का समय था।
Speaker A
पूरा भारत आजादी का जश्न मनाने की तैयारी कर रहा था। दिल्ली की संसद में पंडित जवाहरलाल नेहरू अपना ऐतिहासिक भाषण देने वाले थे। करोड़ों भारतीय सदियों की गुलामी के अंत का इंतजार कर रहे थे। लेकिन उसी समय देश के कई हिस्सों में लोग खुशी नहीं
Speaker A
बल्कि दर्द, भय और चीखों से घिरे हुए थे। यह वह रात थी जब एक ओर भारत आजाद हुआ तो दूसरी ओर भारत का सबसे बड़ा विभाजन भी हुआ। कहा जाता है कि आजादी की खुशी जितनी बड़ी थी बंटवारे का दर्द उससे कहीं अधिक
Speaker A
गहरा था। लाखों लोग रातोंरात अपने ही घरों में पराए हो गए। जिन्होंने वर्षों तक एक साथ रहकर जीवन बिताया था। वे अचानक अलग-अलग देशों के नागरिक बन गए। किसी ने अपना घर खोया। किसी ने अपना परिवार और किसी ने अपनी पूरी जिंदगी 1857 की क्रांति
Speaker A
केवल एक विद्रोह नहीं थी बल्कि भारत की आजादी की पहली मजबूत नींव थी। इस क्रांति में कई ऐसे महान वीरों ने अपने साहस, बलिदान और नेतृत्व से अंग्रेजी शासन की जड़े हिला दी। मंगल पांडे की पहली चिंगारी, रानी लक्ष्मीबाई की वीरता,
Speaker A
तात्या टोपे की युद्ध नीति, नाना साहेब का नेतृत्व, कुंवर सिंह का अदम्य साहस और बेगम हजरत महल का संघर्ष आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा है। आइए जानते हैं इतिहास के उस सबसे दर्दनाक अध्याय की पूरी कहानी।
Speaker A
31 दिसंबर 1600 को ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई थी। 16वीं शताब्दी के अंत तक यूरोप के देशों विशेषकर पुर्तगाल और डच ने पूर्वी देशों के साथ मसालों के व्यापार से भारी मुनाफा कमाना शुरू कर दिया था। इसे
Speaker A
देखकर ब्रिटेन के व्यापारियों ने भी पूरब के देशों के साथ व्यापार करने की योजना बनाई। इसके लिए गवर्नर एंड कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ लंदन ट्रेडिंग इन टू द ईस्ट इंडीज नाम की एक कंपनी बनाई गई। जिसे बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी कहा गया। 31 दिसंबर
Speaker A
1600 को ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने एक शाही चार्टर अधिकार पत्र पर हस्ताक्षर किए। इस चार्टर के तहत कंपनी को भारत और पूर्वी एशिया के देशों के साथ 15 वर्षों तक व्यापार करने का एकाधिकार मोनोपोली मिल गया। यानी ब्रिटेन की कोई
Speaker A
दूसरी कंपनी इस क्षेत्र में व्यापार नहीं कर सकती थी। महारानी से अधिकार मिलने के बाद कंपनी ने भारत की ओर रुख किया। 24 अगस्त 1608 को अंग्रेजों का पहला व्यापारिक समुद्री जहाज जिसका नाम हेक्टर था गुजरात के सूरत बंदरगाह पर आकर रुका।
Speaker A
इस जहाज का नेतृत्व कैप्टन विलियम हॉकिंस कर रहे थे। अंग्रेजों का मुख्य उद्देश्य भारत से सूती कपड़ा, रेशम, नील, पोटेशियम नाइट्रेट, शोरा और मुख्य रूप से मसालों को सस्ते दामों पर खरीदना और उन्हें यूरोप के बाजारों में ऊंचे दामों पर बेचना था। सूरत
Speaker A
पहुंचने के बाद कैप्टन हॉकिंस को समझ आया कि भारत में व्यापार करने के लिए तत्कालीन मुगल साम्राज्य की अनुमति जरूरी है। उस समय भारत पर मुगल बादशाह जहांगीर का शासन था। साल 1609 में कैप्टन हॉकिंस जहांगीर के आगरा स्थित दरबार में पहुंचे। हॉकिंस
Speaker A
ने जहांगीर को प्रभावित करने के लिए तुर्की और फारसी भाषा में बात की। जहांगीर ने हॉकिंस का स्वागत किया और उन्हें इंग्लिश खान की उपाधि भी दी। हालांकि शुरुआत में पुर्तगालियों के दबाव के कारण जहांगीर ने अंग्रेजों को सूरत में
Speaker A
फैक्ट्री खोलने की अनुमति देने से मना कर दिया। अंग्रेजों ने हार नहीं मानी और पुर्तगालियों के प्रभाव को कम करने की कोशिश की। साल 1611 में अंग्रेजों ने भारत के पूर्वी तट पर मसूलीपट्टनम में अपनी पहली अस्थाई फैक्ट्री खोली। इसके बाद साल
Speaker A
1612 में स्वाली के युद्ध में अंग्रेजों ने पुर्तगाली नौसेना को बुरी तरह हरा दिया। इस जीत से प्रभावित होकर मुगल बादशाह जहांगीर ने 1613 में एक शाही फरमान जारी किया जिसके तहत अंग्रेजों को सूरत में अपनी पहली स्थाई फैक्ट्री स्थापित
Speaker A
करने की कानूनी अनुमति मिल गई। साल 1615 में ब्रिटेन के राजा जेम्स प्रथम ने सर थॉमस रो को अपना राजदूत बनाकर जहांगीर के दरबार में भेजा। थॉमस रो करीब 3 साल तक भारत में रहे। अपनी कूटनीति के बल पर
Speaker A
उन्होंने मुग़ल साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अंग्रेजों को फैक्ट्रियां खोलने और टैक्स में छूट पाने के विशेष अधिकार प्राप्त कर लिए। इसके बाद अंग्रेजों ने मद्रास 39, बॉम्बे, 68 और कोलकाता जैसे प्रमुख तटीय शहरों में अपनी मजबूत व्यापारिक चौकियां स्थापित की और
Speaker A
उनकी किलेबंदी फर्टिफिकेशन शुरू कर दी। अगले 150 सालों तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में सिर्फ एक व्यापारिक संस्था के रूप में काम किया। लेकिन 18वीं सदी के मध्य में जब मुगल साम्राज्य कमजोर होने लगा तो देश में राजनीतिक अस्थिरता फैल गई।
Speaker A
अंग्रेजों ने इस स्थिति का फायदा उठाया। 1757 की प्लासी की लड़ाई और 1764 की बक्सर की लड़ाई जीतकर कंपनी ने बंगाल पर नियंत्रण कर लिया। इसके बाद उन्होंने भारत के व्यापारिक राजाओं से धीरे-धीरे पूरी सत्ता अपने हाथ में ले ली और अगले 200
Speaker A
सालों तक भारत पर शासन किया। ईस्ट इंडिया कंपनी धीरे-धीरे पूरे भारत पर अपना अधिकार जमा चुकी थी। अंग्रेज भारतीय राजाओं के राज्य छीन रहे थे। किसानों से भारी कर वसूल रहे थे। कारीगरों का रोजगार खत्म कर रहे थे और भारतीयों के साथ भेदभाव करते
Speaker A
थे। लोगों के मन में अंग्रेजों के प्रति गहरा गुस्सा भर चुका था। इसी बीच अंग्रेजों ने भारतीय सैनिकों को नई एनफील्ड राइफल दी। इन राइफलों के कारतूस का मुंह दांतों से काटना पड़ता था। यह खबर फैल गई कि इन कारतूसों पर गाय और सूअर की
Speaker A
चर्बी लगी हुई है। इससे हिंदू और मुस्लिम दोनों सैनिकों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं। यही घटना उस बारूद में चिंगारी साबित हुई जो वर्षों से भीतर सुलग रही थी। 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी में सैनिक मंगल पांडे ने अंग्रेज अधिकारियों के
Speaker A
खिलाफ हथियार उठा लिए। उन्होंने खुलेआम अंग्रेजों का विरोध किया और अपने साथियों से भी विद्रोह करने की अपील की। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और 8 अप्रैल 1857 को फांसी दे दी। लेकिन उनकी शहादत ने पूरे देश में आजादी की आग फैला दी। मंगल
Speaker A
पांडे भारत के पहले महान क्रांतिकारियों में गिने जाने लगे। 10 मई 1857 को मेरठ की छावनी में भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया। उन्होंने जेल में बंद अपने साथियों को छुड़ाया और दिल्ली की ओर कूच कर गए। दिल्ली पहुंचकर विद्रोहियों
Speaker A
ने मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को भारत का शासक घोषित किया। यह घटना पूरे देश के लिए एक संदेश बन गई कि अब अंग्रेजों के खिलाफ खुलकर लड़ने का समय आ गया है। कुछ ही दिनों में विद्रोह उत्तर भारत के अनेक
Speaker A
क्षेत्रों में फैल गया। कानपुर में नाना साहेब पेशवा ने अंग्रेजों को चुनौती दी। झांसी में रानी लक्ष्मीबाई ने अपने राज्य की रक्षा के लिए तलवार उठा ली। उन्होंने पुरुषों के समान युद्ध किया और अपने घोड़े बादल पर सवार होकर अंग्रेजों से बहादुरी
Speaker A
से लड़ी। ग्वालियर में तात्या टोपे ने गोरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई और लंबे समय तक अंग्रेजों को परेशान किया। बिहार में कुंवर सिंह जिनकी उम्र लगभग 80 वर्ष थी। उन्होंने भी अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संभाला और अद्भुत साहस का परिचय
Speaker A
दिया। अवध में बेगम हजरत महल ने अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी और अपने बेटे बिरजिस कद्र को शासक घोषित कर स्वतंत्र शासन चलाने का प्रयास किया। भारतीय सैनिकों ने पूरी बहादुरी दिखाई लेकिन उनके पास आधुनिक हथियारों की कमी थी। सभी क्षेत्रों के
Speaker A
नेताओं के बीच एक मजबूत संगठन नहीं था। कई भारतीय राजा अंग्रेजों के साथ मिल गए। इन कारणों से अंग्रेज धीरे-धीरे विद्रोह को दबाने में सफल हो गए। 1858 तक अंग्रेजों ने अधिकांश क्षेत्रों पर दोबारा कब्जा कर लिया। रानी लक्ष्मीबाई युद्ध में वीरगति
Speaker A
को प्राप्त हुई। तात्या टोपे को पकड़ कर फांसी दे दी गई। बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार करके रंगून वर्तमान म्यांमार निर्वासित कर दिया गया। यद्यपि यह क्रांति सफल नहीं हुई। लेकिन इसने अंग्रेजों को हिला दिया। 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी का
Speaker A
शासन समाप्त कर दिया गया और भारत का शासन सीधे ब्रिटेन की महारानी के हाथों में चला गया। अंग्रेज समझ चुके थे कि भारतीय अब हमेशा के लिए गुलाम नहीं रहेंगे। 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। शुरुआत में कांग्रेस शांतिपूर्ण
Speaker A
तरीकों से भारतीयों के अधिकारों की मांग करती रही। लेकिन धीरे-धीरे देश भर में राष्ट्रीय चेतना बढ़ने लगी। 1905 में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन कर दिया। भारतीयों ने इसक...
Speaker A
स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग शुरू किया और अंग्रेजी सामान का बहिष्कार किया। यहीं से स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा मिली। देश के अनेक युवाओं ने हथियार उठाने का फैसला किया। भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और अनेक क्रांतिकारियों
Speaker A
ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष शुरू किया। 1928 में लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए भगत सिंह और उनके साथियों ने ब्रिटिश अधिकारी सोडर्स की हत्या की। 1929 में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका।
Speaker A
लेकिन किसी को मारने के लिए नहीं बल्कि अपनी आवाज पूरे देश तक पहुंचाने के लिए। 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई। उनकी शहादत ने पूरे भारत में स्वतंत्रता की लहर और तेज
Speaker A
कर दी। 1915 में महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। उन्होंने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी। उन्होंने चंपारण सत्याग्रह, खेड़ा आंदोलन और अहमदाबाद मिल आंदोलन के माध्यम से किसानों और मजदूरों की समस्याओं
Speaker A
को उठाया। 13 अप्रैल 1919 पंजाब के अमृतसर शहर में बैसाखी का त्यौहार था। पूरे पंजाब से हजारों लोग नए कपड़े पहनकर मेले में आए थे। खेतों में नई फसल की खुशी थी। बाजारों में रौनक थी और हर तरफ उत्सव का माहौल
Speaker A
दिखाई दे रहा था। लेकिन किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि यह दिन भारतीय इतिहास का सबसे दर्दनाक दिन बन जाएगा। उस समय भारत पर अंग्रेजों का शासन था। प्रथम विश्व युद्ध खत्म हो चुका था। युद्ध के दौरान
Speaker A
लाखों भारतीय सैनिकों ने ब्रिटेन की मदद की थी। भारतीयों को उम्मीद थी कि अब अंग्रेज उन्हें अधिकार देंगे और आजादी की दिशा में कुछ कदम उठाएंगे। लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा। अंग्रेज सरकार ने रेलेट एक्ट लागू कर दिया। इस कानून के तहत किसी
Speaker A
भी भारतीय को बिना मुकदमे और बिना सबूत के गिरफ्तार किया जा सकता था। ना अदालत में सुनवाई, ना वकील की सुविधा और ना ही अपील का अधिकार। पूरे देश में इस कानून का विरोध शुरू हो गया। महात्मा गांधी ने भी
Speaker A
इसका विरोध किया और सत्याग्रह का आह्वान किया। पंजाब में इस आंदोलन का नेतृत्व दो लोकप्रिय नेताओं डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल कर रहे थे। अंग्रेज सरकार उनकी लोकप्रियता से घबरा गई। 10 अप्रैल 1919 को दोनों नेताओं को बिना किसी सूचना
Speaker A
के गिरफ्तार कर लिया गया और अमृतसर से बाहर भेज दिया गया। जब लोगों को यह खबर मिली तो पूरे शहर में गुस्सा फैल गया। लोग शांतिपूर्वक विरोध कर रहे थे लेकिन अंग्रेज अधिकारियों ने गोली चलवा दी। कई लोग मारे गए और शहर में तनाव बढ़ गया।
Speaker A
इसके बाद अंग्रेज सरकार ने सार्वजनिक सभाओं पर रोक लगा दी। लेकिन यह आदेश गांव तक नहीं पहुंच पाया। बैसाखी के अवसर पर हजारों लोग 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में इकट्ठा हुए। कुछ लोग रलेट एक्ट और नेताओं की गिरफ्तारी के
Speaker A
विरोध में आए थे। जबकि हजारों ग्रामीण केवल बैसाखी मेले के कारण वहां पहुंचे थे। जलियांवाला बाग चारों ओर ऊंची दीवारों से घिरा हुआ था। अंदर जाने और बाहर निकलने के लिए केवल एक संकरा रास्ता था। दोपहर बाद मैदान में हजारों महिलाएं, पुरुष, बुजुर्ग
Speaker A
और बच्चे मौजूद थे। कुछ लोग भाषण सुन रहे थे। कुछ परिवारों के साथ बैठे थे और कई बच्चों को तो यह भी नहीं पता था कि वहां सभा क्यों हो रही है। इसी दौरान अमृतसर का सैन्य अधिकारी ब्रिगेडियर जनरल रेजिनोल्ड
Speaker A
डायर लगभग 90 सैनिकों के साथ वहां पहुंचा। उसके साथ गोरखा, बलूच और सिख रेजिमेंट के सैनिक भी थे। डायर ने मैदान के मुख्य रास्ते पर अपने सैनिकों को तैनात कर दिया ताकि कोई बाहर ना निकल सके। सब लोग यह सोच
Speaker A
रहे थे कि शायद अंग्रेज सभा समाप्त करने की चेतावनी देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। डायर ने बिना किसी चेतावनी के अपने सैनिकों को आदेश दिया फायर अचानक गोलियों की तेज आवाज पूरे मैदान में गूंज उठी। लोगों को समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा
Speaker A
है। कुछ ही सेकंड में चारों तरफ अफरातफरी मच गई। लोग जान बचाने के लिए भागने लगे। लेकिन बाहर निकलने का रास्ता सैनिकों ने बंद कर रखा था। कई लोग दीवारों पर चढ़ने की कोशिश करने लगे। लेकिन गोलियां उन्हें
Speaker A
वहीं गिरा देती। माएं अपने बच्चों को सीने से लगाकर बचाने की कोशिश कर रही थी। बुजुर्ग जमीन पर गिर रहे थे। घायल लोग दर्द से चीख रहे थे। पूरा मैदान चीखों से भर गया। मैदान के बीच एक गहरा कुआं था। जब
Speaker A
लोगों को कहीं भागने का रास्ता नहीं मिला तो दर्जनों लोग अपनी जान बचाने के लिए उस कुएं में कूद गए। कुछ जिंदा थे, कुछ घायल थे और कुछ गोलियां लगने के बाद सीधे कुएं में गिर पड़े। कुछ ही मिनटों में वह कुआं
Speaker A
लाशों और घायल लोगों से भर गया। डायर लगातार सैनिकों को आदेश देता रहा कि जहां सबसे ज्यादा भीड़ दिखाई दे वहीं निशाना लगाओ। लगभग 10 मिनट तक लगातार गोलियां चलाई गई। करीब 1650 गोलियां दागी गई। जब सैनिकों की गोलियां लगभग खत्म होने लगी तब
Speaker A
जाकर फायरिंग रुकी। डायर बिना किसी घायल की मदद किए वहां से चला गया। मैदान में चारों ओर केवल लाशें, घायल लोग और चीख पुकार रह गई। घंटों तक किसी को घायलों की मदद करने की अनुमति नहीं दी गई। कई लोग
Speaker A
पूरी रात दर्द से तड़पते रहे और इलाज ना मिलने के कारण उनकी मौत हो गई। ब्रिटिश सरकार के अनुसार इस घटना में 379 लोग मारे गए और लगभग 10,200 घायल हुए। लेकिन भारतीय नेताओं और स्थानीय लोगों का मानना था कि
Speaker A
मरने वालों की संख्या 1000 से भी अधिक थी। इस हत्याकांड की खबर पूरे भारत में आग की तरह फैल गई। हर भारतीय का खून खौल उठा। महात्मा गांधी जो पहले अंग्रेजों से न्याय की उम्मीद रखते थे। अब पूरी तरह समझ चुके
Speaker A
थे कि अंग्रेजी शासन से न्याय की आशा नहीं की जा सकती। यहीं से स्वतंत्रता आंदोलन ने एक नया और अधिक व्यापक रूप ले लिया। महान कवि रविंद्रनाथ टैगोर ने इस घटना के विरोध में अंग्रेजों द्वारा दी गई अपनी नाइटहुड
Speaker A
की उपाधि लौटा दी। पूरी दुनिया में ब्रिटिश सरकार की आलोचना होने लगी। ब्रिगेडियर जनरल डायर ने बाद में कहा कि उसका उद्देश्य भीड़ को तितर-बितर करना नहीं बल्कि भारतीयों को ऐसा सबक सिखाना था जिसे वे कभी भूल ना सकें। लेकिन हुआ इसका
Speaker A
बिल्कुल उल्टा। जिस घटना से अंग्रेज भारतीयों को डराना चाहते थे उसी घटना ने पूरे देश को आजादी के लिए एकजुट कर दिया। जलियांवाला बाग हत्याकांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा मोड़ बना जिसने लाखों लोगों को अंग्रेजी शासन के
Speaker A
खिलाफ खड़ा कर दिया। आज भी अमृतसर का जलियांवाला बाग उन मासूम लोगों की याद दिलाता है जिन्होंने बिना हथियार बिना किसी अपराध के केवल आजादी की चाह में अपनी जान गवा दी। 1920 में गांधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया। लोगों ने सरकारी
Speaker A
नौकरियां छोड़ी। अंग्रेजी स्कूलों का बहिष्कार किया। विदेशी वस्त्र जलाए और स्वदेशी अपनाया। पूरा देश पहली बार इतने बड़े स्तर पर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा। 1930 में गांधी जी ने 240 मील लंबी दांडी यात्रा निकाली। उन्होंने समुद्र किनारे पहुंचकर नमक बनाया और अंग्रेजों के नमक
Speaker A
कानून को तोड़ दिया। इस आंदोलन ने पूरी दुनिया का ध्यान भारत की ओर आकर्षित किया। 8 अगस्त 1942 को गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया। उनका नारा था करो या मरो। देश भर में लाखों लोग सड़कों पर उतर
Speaker A
आए। अंग्रेजों ने हजारों नेताओं को जेल में डाल दिया। लेकिन आंदोलन रुकने वाला नहीं था। सुभाष चंद्र बोस ने विदेश जाकर आजाद हिंद फौज आईएनए का गठन किया। उन्होंने भारतीय सैनिकों को संगठित कर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ा। उनका
Speaker A
प्रसिद्ध नारा था तुम मुझे खून दो। मैं तुम्हें आजादी दूंगा। हालांकि सैन्य दृष्टि से सफलता सीमित रही लेकिन इससे भारतीय सैनिकों और जनता का मनोबल बहुत बढ़ा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन आर्थिक रूप से कमजोर हो चुका था। भारत में
Speaker A
लगातार आंदोलन, सैनिकों का असंतोष, नौसेना विद्रोह 1946 और बढ़ता जदबाव, अंग्रेजों के लिए शासन चलाना कठिन बना रहे थे। उन्हें समझ आ गया कि अब भारत पर शासन करना संभव नहीं है। अंततः ब्रिटिश सरकार ने भारत को स्वतंत्र करने का निर्णय लिया। 15
Speaker A
अगस्त 1947 की आधी रात भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र बना। दिल्ली में पहली बार तिरंगा फहराया गया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपना ऐतिहासिक भाषण प्रिस्ट विद डेस्टिनी दिया। लेकिन इसी आजादी के साथ देश का बंटवारा भी हुआ। ब्रिटिश सरकार ने भारत को दो देशों
Speaker A
भारत और पाकिस्तान में विभाजित करने का निर्णय लिया। 3 जून 1947 को माउंटबेटन योजना की घोषणा हुई और सर सिरिल रेडक्लिफ ने दोनों देशों की सीमाएं निर्धारित की जिसे रेडक्लिफ लाइन कहा गया। 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान स्वतंत्र हुआ और 15
Speaker A
अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ। बंटवारे के बाद लाखों हिंदू, सिख और मुसलमान अपने-अपने नए देशों की ओर पलायन करने लगे। इतिहास के सबसे बड़े मानव पलायनों में से एक इस घटना में लगभग एक से 1.5 करोड़ लोगों ने अपना घर छोड़ दिया। इस दौरान कई
Speaker A
स्थानों पर भयंकर सांप्रदायिक हिंसा हुई। हजारों गांव उजड़ गए, घर जला दिए गए और लाखों लोग शरणार्थी बन गए। अनेक परिवार हमेशा के लिए बिछड़ गए और लाखों लोगों की जान चली गई। भारत को आजादी मिली। लेकिन बंटवारे ने करोड़ों लोगों को ऐसा दर्द
Speaker A
दिया जिसे आज भी इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में गिना जाता
Topics:भारत की आजादी1857 की क्रांतिईस्ट इंडिया कंपनीब्रिटिश राज1947 का विभाजनमंगल पांडेरानी लक्ष्मीबाईजलियांवाला बागभारतीय स्वतंत्रता संग्रामनेहरू गांधी











