बीजेपी के 2029 में हारने के संभावित कारणों का विश्लेषण, राजनीतिक इतिहास और हालिया घटनाओं के संदर्भ में।
Key Takeaways
- बीजेपी की राजनीतिक ताकत में 2014-19 के बाद गिरावट दिख रही है।
- जाति आधारित राजनीति और आरक्षण नीतियों ने पार्टी के वोट बैंक को प्रभावित किया है।
- नीति निर्माण में असमंजस और विवाद पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
- कोर वोटर का समर्थन हमेशा स्थायी नहीं रहता, उसे बनाए रखना जरूरी है।
- 2029 के चुनाव परिणाम को लेकर कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।
What the video covers
- जनवरी 2024 में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के बाद भी बीजेपी को अयोध्या की फैजाबाद सीट पर हार का सामना करना पड़ा।
- बीजेपी का 2014 और 2019 में रिकॉर्ड बहुमत हासिल करना और मोदी-शाह नेतृत्व के तहत पार्टी की पहचान बनना।
- 2024 के लोकसभा चुनाव में 400 सीटों के नारे के बावजूद पार्टी 240 सीटों पर सिमट गई, जिससे मोदी लहर कमजोर होने का संकेत मिला।
- जाति जनगणना और आरक्षण नीतियों में बदलाव से बीजेपी के कोर वोटर बेस में दरार आई।
- यूजीसी के 2026 के इक्विटी रेगुलेशंस पर विवाद और सुप्रीम कोर्ट की रोक ने पार्टी की नीतिगत असमंजस दिखाया।
- इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति के कारण अर्बन मिडिल क्लास वोटर नाराज, माइलेज गिरना और वाहन खराब होने की शिकायतें बढ़ीं।
- नीट परीक्षा लीक और रद्द होने की घटना ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया।
- प्रशांत किशोर की जन स्वराज पार्टी ने बिहार के बांकीपुर में बीजेपी को हार का सामना कराया, जो एक बड़ा संकेत है।
- बीजेपी की नीतियों में विरोधाभास और गवर्नेंस में असमंजस के कारण पार्टी की लोकप्रियता पर असर पड़ा।
- वीडियो अंत में 2029 के चुनाव परिणाम को लेकर अनिश्चितता जताता है और कोर वोटर को टेकेन फॉर ग्रांटेड न लेने की सलाह देता है।
Chapters
- 00:00राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा और लोकसभा चुनाव परिणाम
- 00:56बीजेपी का राजनीतिक इतिहास और विकास
- 01:53मोदी-शाह युग और पार्टी की पहचान
- 02:432024 चुनाव और बीजेपी की चुनौतियां
- 03:33जाति जनगणना और आरक्षण विवाद
- 04:30यूजीसी इक्विटी रेगुलेशंस और सुप्रीम कोर्ट
- 06:32इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति और अर्बन वोटर की नाराजगी
- 07:33नीट पेपर लीक और सरकार की प्रतिक्रिया
- 09:33बांकीपुर उपचुनाव और राजनीतिक संकेत
- 11:51निष्कर्ष और 2029 चुनाव की अनिश्चितता
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Speaker A
जनवरी 2024, अयोध्या में राम मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा समारोह, दशकों पुराना वादा आखिरकार पूरा और उसके ठीक 5 महीने बाद जब लोकसभा का नतीजा आता है तो फैजाबाद सीट जिसके अंदर अयोध्या आती है, बीजेपी वहीं से हार जाती है। अबकी बार 400 पार का
Speaker A
नारा लगाने वाली पार्टी 240 पर सिमट गई। अकेले दम पर बहुमत तक नहीं। अब कट करिए अगस्त 2026 पर। बिहार का बांकीपुर बीजेपी का पुराना घर। उपचुनाव होता है और प्रशांत किशोर की जन स्वराज पार्टी बीजेपी के नीरज
Speaker A
कुमार को 19,000 से ज्यादा वोट से हरा देती है। प्रशांत किशोर का यह पहला चुनाव था पहला। तो सवाल यह है क्या यह सच में डाउनफॉल है? या हम दो-चार नतीजे उठाकर पूरी कहानी गढ़ रहे हैं। आज इसी पर बात
Speaker A
करते हैं और मैं आपसे वादा करता हूं अंत तक एक ऐसा कंट्राडिक्शन सामने आएगा जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगा। पहले थोड़ा पीछे चलते हैं क्योंकि राइज समझे बिना फॉल समझ नहीं आएगा। 1980 में वाजपेयी और आडवाणी ने भारतीय जनता पार्टी बनाई। 1984
Speaker A
में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वाली सहानुभूति लहर में बीजेपी को कुल दो सीटें मिली दो। फिर 1996 में बीजेपी 161 पर पहुंची कांग्रेस 140 पर। 2004 में कांग्रेस 145, बीजेपी 138। यानी लगभग दो दशक तक भारत में एक असली दो पार्टी
Speaker A
मुकाबला चला। किसी के पास अकेले बहुमत नहीं था। हर बिल के लिए बात करनी पड़ती थी। संविधान छूना तो दूर की बात। 2/ तिहाई किसी के पास थी ही नहीं। 2014 ने यह सब बदल दिया। बीजेपी को अकेले 282 सीटें,
Speaker A
एनडीए को 350 के आसपास कांग्रेस 44 पर सिमट गई। 2019 में बीजेपी अकेले 303 और यहीं से जो बना वह सिर्फ एक पार्टी नहीं थी। एक पूरा इको सिस्टम था। मोदी सिर्फ प्रधानमंत्री नहीं थे। वह पार्टी की पहचान
Speaker A
बन चुके थे। विधायक का चुनाव हो या नगर निगम का। कैंडिडेट कहता था मैं मोदी जी की पार्टी से हूं और जीत जाता था और अकेले मोदी नहीं 370 हटने के बाद अमित शाह का कद बढ़ा। 2020 में जब पता चला कि देश में रोज
Speaker A
37 कि.मी. हाईवे बन रहा है। नितिन गडकरी हाईवे मैन बन गए। 2022 में यूरोप में जयशंकर का वो जवाब कि यूरोप को लगता है यूरोप की समस्या पूरी दुनिया की समस्या है। इंटरनेट पर आग लगा गया। बंदे की आंखों
Speaker A
से बिजली निकालने वाले एडिट्स बन रहे थे। एक ही पार्टी के चारप नेता एक साथ लविंग फिगर बन जाए। यह किसी भी पार्टी का पीक होता है, लेकिन पीक की एक दिक्कत है। पीक के बाद रास्ता एक ही तरफ जाता है। अब आते
Speaker A
हैं 2024 पर जो असली टर्निंग पॉइंट है। बीजेपी ने नारा दिया 400 पार और कुछ नेताओं ने साथ में यह भी कह दिया कि इतनी सीटें चाहिए ताकि संविधान में बदलाव किए जा सकें। पार्टी को शायद लगा कि 370 वाला
Speaker A
मूवमेंट दोबारा होगा। 2019 में जब आर्टिकल 370 हटा तो देश ने खुलकर साथ दिया था। यहां तक कि ध्रुव राठी जैसे कट्टर आलोचक ने भी उसे सही बताया था। लेकिन 2024 में उल्टा हुआ। संविधान बदलने की बात सुनते ही
Speaker A
लोगों के मन में एक डर बैठ गया। कहीं यह अपने फायदे के लिए तो नहीं कर रहे और नतीजा सबके सामने है। 240 उस दिन एक चीज साफ हो गई। मोदी लहर जो 10 साल तक हर कैलकुलेशन को बेकार कर देती थी। अब कोई
Speaker A
गारंटी नहीं रही और यहीं से बीजेपी की सबसे बड़ी उलझन शुरू होती है। पार्टी को समझ आ गया कि सिर्फ कोर वोटर बेस से 272 नहीं आएगा। ओबीसी, दलित, ईबीसी सबको साथ लेना पड़ेगा। लेकिन उसकी कीमत कौन चुका
Speaker A
रहा है? खुद उनका अपना कोर वोटर। जाति जनगणना का किस्सा याद करिए। 2024 से पहले राहुल गांधी पूरे देश में जितनी आबादी उतना हक लेकर घूम रहे थे। कांग्रेस को पता था कि धर्म के मैदान पर वह नहीं जीत सकते।
Speaker A
तो उन्होंने जाति पर डबल डाउन कर दिया। बीजेपी का जवाब क्या था कि यह देश तोड़ने की साजिश है। हिंदू समाज में दरार डालने की कोशिश है। महाराष्ट्र में एक हैं तो सेफ हैं। यूपी में बटेंगे तो कटेंगे।
Speaker A
पहलगाम हमले के बाद तो पार्टी के ऑफिशियल हैंडल से धर्म पूछा जाति नहीं वाली पोस्ट जा रही थी और उसके कुछ ही दिन बाद सरकार ने खुद जाति जनगणना का ऐलान कर दिया। कांग्रेस ने तुरंत लिख दिया सरकार
Speaker A
तुम्हारी है सिस्टम हमारा है। बीजेपी समर्थक सोशल इंक्लूजन और इकोनॉमिक अपलिफ्टमेंट समझाने में लग गए। लेकिन जो आदमी कल तक पार्टी के साथ खड़ा होकर इसी का विरोध कर रहा था, वह अचानक अकेला खड़ा था और यह अकेला मामला नहीं है। मध्य
Speaker A
प्रदेश में बीजेपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में ओबीसी आरक्षण 14 से 27% करने के लिए एफिडेविट डाला जिससे राज्य में कुल आरक्षण 73% पर पहुंचता है। 50% की सीलिंग का सीधा उल्लंघन। बिहार में एनडीए सरकार पटना हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ लड़ रही है
Speaker A
जिसने 65% आरक्षण रोका था। महाराष्ट्र में आरक्षण बढ़ाने का काम एनडीए सरकार ने ही किया। कर्नाटक में बीजेपी कोर्ट में एफिडेविट डाल चुकी है और हरियाणा में खट्टर प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण की बात करते थे। क्रोनोलॉजी समझिए। कांग्रेस करे
Speaker A
तो देश तोड़ना, चुनाव नजदीक आए तो वही चीज सोशल जस्टिस बन जाती है। फिर आया जनवरी 2026। 13 जनवरी को यूजीसी ने प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीटशंस रेगुलेशंस 2026 नोटिफाई किए। मकसद ठीक था। कैंपस में जातिगत भेदभाव रोकना। यह 2012
Speaker A
के एडवाइज़री फ्रेमवर्क की जगह लेने वाला बाइंडिंग नियम था और इसकी जड़ रोहित वेमुला जैसे केसों में है। कोई भी समझदार इंसान यह नहीं कहेगा कि कैंपस में जाति के नाम पर भेदभाव होना चाहिए। लेकिन नियम लिखे कैसे गए? वहां खेल बिगड़ा। शिकायत का
Speaker A
दायरा एससी, एसटी और ओबीसी तक सीमित रखा गया। इक्विटी कमेटी में इन कैटेगरी से मेंबर अनिवार्य। जनरल कैटेगरी की कोई गारंटीड जगह नहीं और झूठी शिकायत पर पेनल्टी वाला क्लॉज़ हटा दिया गया। जनरल कैटेगरी के स्टूडेंट्स को लगा कि उन्हें
Speaker A
जानबूझकर बाहर किया गया है। यूपी में बीजेपी के 11 पदाधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया। रायबरेली में एक कार्यकर्ता ने अपने खून से चिट्ठी लिखी। मनन कुमार मिश्रा जैसे पार्टी के अपने सीनियर नेता खुलकर विरोध में उतर आए। 29 जनवरी को सुप्रीम
Speaker A
कोर्ट ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने रेगुलेशन पर रोक लगा दी। कोर्ट ने इसे अस्पष्ट और दुरुपयोग के लायक बताया। अब इसे ठीक से समझिए। केंद्र में बीजेपी की सरकार, यूजीसी शिक्षा मंत्रालय के अंडर नियम इन्हीं के और जब बैकलैश आया तो
Speaker A
पार्टी ने कोर्ट के स्टे को राहत की तरह लिया। अपनी ही पॉलिसी से अपने आप को बचाना पड़ा और ध्यान रहे दूसरी तरफ भी उतना ही गुस्सा था। मायावती ने रेगुलेशन का समर्थन किया और रोल बैक की मांग को पूरी तरह
Speaker A
अनुचित बताया। दिल्ली यूनिवर्सिटी में छात्रों ने स्टे के खिलाफ मार्च निकाला। यानी सरकार ने ऐसी पॉलिसी बनाई जिसने दोनों तरफ के लोगों को नाराज कर दिया। यह गवर्नेंस नहीं है। यह कंफ्यूजन है। अब वह मुद्दा जिसने बीजेपी के सबसे वफादार अर्बन
Speaker A
वोटर को हिलाया। नेशनल पॉलिसी ऑन बायोफ्यूल्स के तहत सरकार ने 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग का टारगेट 2030 से खिसका कर 2025 कर दिया। और अप्रैल 2026 में ईबीस का देशव्यापी रोल आउट हो गया। पेट्रोल में 20% इथेनॉल अब यह ऑप्शन नहीं है। सरकार का
Speaker A
तर्क मजबूत है। ईमानदारी से कहूं तो क्रूड इंपोर्ट घटेगा, विदेशी मुद्रा बचेगी और किसानों को पैसा मिलेगा। गडकरी जी के मुताबिक गन्ना और मक्का सप्लाई करने वाले किसानों को करीब ₹400 करोड़ मिले। लेकिन जमीन पर क्या हुआ? अप्रैल 2023 से पहले
Speaker A
बनी गाड़ियां ई 10 के लिए डिजाइन थी। यानी सड़क पर दौड़ रही ज्यादातर गाड़ियां। लोगों ने माइलेज गिरने, पार्ट्स खराब होने और परफॉर्मेंस डाउन होने की शिकायत की और जुलाई 2026 में गडकरी जी ने संसद में खुद मान लिया कि ईबी से माइलेज 2 से 6% तक गिर
Speaker A
सकता है। गाड़ी की कैटेगरी और उम्र के हिसाब से। अब याद करिए वह पुराना वादा। यही मंत्री कहते थे कि इथेनॉल आने से पेट्रोल सस्ता होगा। हुआ उल्टा माइलेज कम, दाम वही और ऊपर से मेंटेनेंस का खर्च। जून
Speaker A
2026 में मामला और बिगड़ा जब सरकार के अटर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि सरकार 20% ब्लैंड के साथ प्रयोग कर रही है। सरकार ने बाद में कहा कि उन्हें गलत समझा गया लेकिन तब तक बात निकल चुकी थी और
Speaker A
नाराज होने वालों में सिर्फ विपक्ष नहीं था। सरकार के अपने समर्थक कमेंटेटर भी शामिल थे। 5 जुलाई को जंतरमंतर पर प्रदर्शन हुआ। 4 अगस्त को अरविंद केजरीवाल 2 लाख याचिकाएं लेकर पहुंचे और सरकार का जवाब पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी
Speaker A
ने शिकायतों को गलत बयानी बताया। गडकरी जी ने कहा कि ईबी से किसी गाड़ी में कोई दिक्कत नहीं आई और यह पूरा कैंपेन राजनीतिक रूप से प्रेरित है। जिन्हें शुद्ध पेट्रोल चाहिए वह ज्यादा दाम देकर ले सकते हैं। विपक्ष ने कॉन्फ्लिक्ट ऑफ
Speaker A
इंटरेस्ट का आरोप भी लगाया कि गडकरी परिवार से जुड़ी कंपनियों का इथेनॉल प्रोडक्शन में हित है। यह आरोप है साबित नहीं हुआ है और गडकरी इसे खारिज करते हैं। लेकिन आरोप का चिपक जाना ही अपने आप में नुकसान है। क्योंकि जिस आदमी को देश हाईवे
Speaker A
मैन कहता था आज उसी की नियत पर सवाल उठ रहे हैं। देखिए इथेनॉल से किसी को दुश्मनी नहीं है। दिक्कत रोल आउट की स्पीड में है। जब सड़क पर ज्यादातर गाड़ियां कंप्लायंट नहीं हैं तो लोगों को विकल्प देना पड़ता
Speaker A
है। धीरे-धीरे बढ़ना पड़ता है। और सबसे बड़ी बात जो आदमी गाड़ी चलाता है वह अर्बन एजुकेटेड मिडिल क्लास है। बीजेपी का कोर वोटर भी वही है। अब वो घटना जो इस पूरी वीडियो का सबसे बड़ा पॉइंट है। जून 2026
Speaker A
के आखिर में नीट का पेपर लीक हुआ। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने परीक्षा रद्द की। करीब 20 लाख स्टूडेंट्स को दोबारा एग्जाम देना पड़ा। और फिर कुछ ऐसा हुआ जो इस सरकार के साथ पहले कभी नहीं हुआ।
Speaker A
पार्टी जो शुरू में एक ऑनलाइन मजाक था। एक असली आंदोलन बन गया। हफ्तों तक छात्र सड़कों पर रहे। सोनम वांगचुक ने 26 दिन का अनशन किया और पुलिस ने उन्हें प्रोटेस्ट साइड से उठाकर अस्पताल में डाल दिया। नेहा
Speaker A
बोरा 23 दिन भूख हड़ताल पर रही। सरकार ने वहीं पुराना प्लेबुक निकाला। लाठी, आंसू, गैस, इंटरनेट शटडाउन। लेकिन इस बार भीड़ कम नहीं हुई, बढ़ती गई। हजारों लोग संसद की तरफ मार्च करने लगे। 25 जुलाई 2026 शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने
Speaker A
इस्तीफे का ऐलान कर दिया। रुकिए, इसका मतलब समझिए। यह वो सरकार है जो प्रोटेस्ट से नहीं झुकती। किसान आंदोलन याद है? सीए एए ए एन आर सी याद है। इस सरकार ने कभी जन दबाव में मंत्री नहीं हटाया। 2014 के बाद
Speaker A
पहली बार ऐसा हुआ और सिर्फ इस्तीफा नहीं। सरकार ने तीनों मांगे मानी। एग्जाम सिस्टम में सुधार, प्रदर्शनकारियों पर दर्ज केस वापस और आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा। मोदी जी ने नंदन नीलेखनी की अध्यक्षता में टास्क फोर्स
Speaker A
बनाई। 27 जुलाई को संसद में पब्लिक एग्जामिनेशन कानून में संशोधन का बिल आया। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इसे 2014 के बाद मोदी को मिली सबसे बड़ी युवा चुनौती कहा और नैरेटिव पर पकड़ रखने वाले प्रधानमंत्री को Instagram पर बिना
Speaker A
स्क्रिप्ट वाले वीडियो डालकर युवाओं तक पहुंचना पड़ा और यह खत्म अभी हुआ भी नहीं है। दिल्ली शांत हुई तो झारखंड में सरकारी नौकरी की परीक्षाओं को लेकर छात्र विधानसभा की तरफ मार्च करने लगे और पुलिस ने वाटर कैनन चलाए। फिर 3 अगस्त को
Speaker A
बांकीपुर का नतीजा आया। आप इन दोनों को अलग-अलग घटना मान सकते हैं। मुझे नहीं लगता कि वह अलग हैं। अब वह कंट्राडिक्शन जिसका मैंने शुरू में वादा किया था और मैं आपसे बिल्कुल ईमानदारी से कहूंगा क्योंकि आधी कहानी बताना बेईमानी होगी। अगर
Speaker A
डाउनफॉल का मतलब है चुनाव हारना तो बीजेपी का डाउनफॉल नहीं हो रहा। बिल्कुल नहीं। नवंबर 2025 बिहार एनडीए ने 243 में से 202 सीटें जीती। बीजेपी पहली बार बिहार में सबसे बड़ी पार्टी बनी। 101 में से 89 सीट।
Speaker A
जेडीयू को 85, 2010 के बाद उनका सबसे अच्छा प्रदर्शन। महागठबंधन 35 पर सिमटा। कांग्रेस 61 में से सिर्फ छह पर और प्रशांत किशोर की पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। मई 2026 पश्चिम बंगाल बीजेपी ने ममता बनर्जी के 15 साल के शासन को खत्म
Speaker A
कर दिया और शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बने। करीब 94% वोटिंग हुई जो भारत में किसी भी चुनाव में सबसे ज्यादा है और मोदी जी की अप्रूवल रेटिंग एक ग्लोबल ट्रैकर में वह 2026 की शुरुआत में 71% के साथ दुनिया के नेताओं में पहले नंबर पर थे।
Speaker A
हां, 2025 के 75 से गिरे। लेकिन मैक्रो स्टार्मर मेयर्स इन सबसे कहीं ऊपर तो फिर डाउनफॉल शब्द का क्या मतलब बचा? मुझे लगता है दोनों चीजें एक साथ सच है और यही इस पूरे मोमेंट को दिलचस्प बनाता है। बीजेपी
Speaker A
चुनाव जीत रही है लेकिन जिस तरह जीत रही है वह बदल चुका है। 2019 में बीजेपी इसलिए जीतती थी क्योंकि लोग उससे प्यार करते थे। 2026 में बीजेपी इसलिए जीत रही है क्योंकि विपक्ष बिखरा हुआ है। संगठन मजबूत है और
Speaker A
सामने कोई विकल्प खड़ा नहीं है। कांग्रेस बिहार में 61 में से छह सीट लाती है। यह बीजेपी की ताकत कम और कांग्रेस की कमजोरी ज्यादा है। अंतर यह है पहले लोग बीजेपी को चुनते थे। अब लोग बाकियों को नकार रहे
Speaker A
हैं। यह अलग चीज है और यह ज्यादा नाजुक होती है। तीन चीजें जो मुझे सबसे साफ दिखती हैं। पहली नियत पर शक। 370 हटा तो देश ने साथ दिया। क्योंकि लोगों को लगा यह देश के लिए हो रहा है। आज डीलिमिटेशन और
Speaker A
वन नेशन वन इलेक्शन पर वही भरोसा नहीं है। सवाल पॉलिसी का नहीं इरादे का है। और एक बार नियत पर शक बैठ जाए तो अच्छी पॉलिसी भी शक की निगाह से देखी जाती है। दूसरी चुप्पी। इथेनॉल पर महीनों बवाल चला। टॉप
Speaker A
लीडरशिप से कोई ढंग का जवाब नहीं आया। यूजीसी पर पार्टी के अपने पदाधिकारी इस्तीफा देते रहे। ऊपर से खामोशी। सरकार को लगता है वक्त गुजर जाएगा तो लोग भूल जाएंगे। लोग भूलते नहीं। बस अगली बार थोड़ा कम उत्साह से वोट डालते हैं। तीसरी
Speaker A
ऑथेंटिसिटी का टूटना और यह सबसे बड़ी है। गडकरी को हाईवे मैन कहा जाता था। जयशंकर के एडिट्स बनते थे। यह चीजें खरीदी नहीं जा सकती, वह अनऑर्गेनिक थी। और आज उन्हीं पर सवाल है। जो चीज अनऑर्गेनिक बनती है,
Speaker A
वह ऑन ऑर्गेनिक तरीके से ही टूटती है और उसे वापस लाना बहुत मुश्किल होता है। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सिर्फ एक मंत्री के जाने की बात नहीं थी। वह एक मिसाल थी। पूरे देश ने देख लिया कि दबाव
Speaker A
डालो तो यह सरकार भी झुकती है। यह जानकारी अब बाहर आ चुकी है और वापस अंदर नहीं जाएगी। तो जवाब क्या है? अगर आप पूछे कि क्या बीजेपी 2029 हार रही है? तो मेरा ईमानदार जवाब है अभी कोई नहीं जानता। और
Speaker A
जो दावे से बोल रहा है वह या तो भविष्यवक्ता है या बेवकूफ। लेकिन अगर आप पूछें कि क्या 2014 से 2019 वाला मैजिक बचा है? तो वह जवाब मुझे साफ दिखता है। नहीं बचा। पार्टी अब सिर्फ नाम पर नहीं
Speaker A
जीत सकती। हर मुद्दे पर लड़ना पड़ रहा है और अपने ही समर्थकों से लड़ना पड़ रहा है। जाति जनगणना का डाटा जब बाहर आएगा आरक्षण बढ़ाने की मांग और तेज होगी। शायद प्राइवेट सेक्टर तक पहुंचे। यह दबाव कम
Speaker A
नहीं बढ़ने वाला है। डेमोक्रेसी का एक सीधा साधा नियम है और इसका किसी पार्टी से लेना देना नहीं है। कांग्रेस ने 1977 में यह सीखा और बीजेपी आज उसी टेस्ट से गुजर रही है। आप कितने भी ताकतवर हो जाओ अपने
Speaker A
कोर वोटर को हमेशा के लिए टेकन फॉर ग्रांटेड नहीं ले सकते। आपकी क्या राय है?
Speaker A
आप इसे डाउनफॉल मानते हैं या सिर्फ नॉर्मल एंटी इनकंबेंसी? कमेंट में जरूर बताइएगा। और जो असहमत हैं उनके कमेंट में ज्यादा ध्यान से पता हूं।
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