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Juz Raf ul Yadain Aur Ahnaf Ke Dalail Ka Jaiza | Sheikh Jalaluddin Qasmi

शेख जलालुद्दीन कासमी का रफ़उल यदैन पर वीडियो: इमाम बुखारी के जुज़ रफ़उल यदैन के हवाले से हनफ़ी दलील और अल्बानी/ज़ुबैर अली ज़ई के मतभेद की समीक्षा।

Key Takeaways

  • इमाम बुखारी के अनुसार रफ़उल यदैन की सुन्नत सही सनद से साबित है।
  • अब्दुल्लाह बिन मसऊद की रिवायत की सनद पर विद्वानों में मतभेद है।
  • वक्ता के अनुसार यह रिवायत इसबात वाली रिवायतों से टकराती नहीं है।

What the video covers

  • वक्ता बताते हैं कि इमाम बुखारी ने रफ़उल यदैन पर अलग किताब 'जुज़ रफ़उल यदैन' लिखी है।
  • इमाम बुखारी के अनुसार नबी ﷺ या किसी सहाबी से रफ़उल यदैन छोड़ना सही सनद से साबित नहीं है।
  • रफ़उल यदैन न करने वालों की दलील अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि.) की रिवायत है, जिसे अल्बानी सही और ज़ुबैर अली ज़ई ज़ईफ़ कहते हैं।
  • वक्ता के अनुसार सनद के साथ हर रावी की जाँच ज़रूरी है।
  • रिवायत में आसिम बिन कुलैब पर कलाम है, और इमाम अहमद व इमाम बुखारी ने इसे ज़ईफ़ कहा।
  • यदि रिवायत सही मान भी ली जाए, तो वह रफ़उल यदैन का इसबात करने वाली रिवायतों के विरोध में नहीं मानी जा सकती।
  • वक्ता के अनुसार इब्न मसऊद से कुछ मसाइल मख़फ़ी रह गए होंगे।
  • रुकू में घुटनों पर हाथ रखने की पोजीशन पर भी इब्न मसऊद की रिवायत के हवाले से चर्चा है।
  • वीडियो में मसलक-आधारित बहस और सनद-आधारित विश्लेषण दोनों शामिल हैं।

Answers

Questions about this video

इमाम बुखारी ने रफ़उल यदैन पर क्या लिखा है?

वक्ता के अनुसार इमाम बुखारी ने 'जुज़ रफ़उल यदैन' नाम से अलग किताब लिखी है। उनके कथन के अनुसार नबी ﷺ या किसी सहाबी से रफ़उल यदैन छोड़ना सही सनद से साबित नहीं है।

अब्दुल्लाह बिन मसऊद की रिवायत पर विवाद क्यों है?

अल्बानी इस रिवायत को सही मानते हैं जबकि ज़ुबैर अली ज़ई इसे ज़ईफ़ कहते हैं। वीडियो के अनुसार इसकी सनद में आसिम बिन कुलैब पर कलाम है।

वक्ता के अनुसार इस रिवायत का जवाब क्या है?

वक्ता कहते हैं कि यह रिवायत ज़ईफ़ है, और अगर सही मान भी ली जाए तो यह इसबात वाली रिवायतों के विरोध में नहीं है। उनके अनुसार इब्न मसऊद से कुछ मसाइल मख़फ़ी रह गए होंगे।

Full Transcript — Download SRT & Markdown

00:00
Speaker A
लोग यह कहते हैं कि रफ़ुलयदैन नमाज़ में नहीं है। ऐसा रफ़ुलयदैन नमाज़ में नहीं है। इमाम बुखारी रह॰ ने जुज़ु रफ़ेयदैन, बाकायदा उनकी किताब है। अलग से उन्होंने ये किताब लिखी है कि रफ़ेयदैन का क्या मकाम नमाज़ के अंदर है।
00:25
Speaker A
बुखारी के अंदर तो रिवायत लाए ही हैं, वो अलग से उन्होंने किताब लिख दी है कि नमाज़ में रफ़ेयदैन की हैसियत क्या है और नमाज़ में रफ़ेयदैन का मकाम क्या है? अलग से एक किताब लिखी है उन्होंने, रफ़ेयदैन उसके अंदर लिखते हैं। अब एक पूरा मसलक ये कह रहा है, पूरा एक सेक्ट है जो ये कह रहा है कि रफ़ेयदैन नमाज़ में नहीं है।
00:38
Speaker A
इमाम बुखारी क्या कहते हैं? "फ़लम यसबत अन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम वला असहाबिहि अनहु लम यफ़आद।" ये कोई मामूली बात नहीं है। जुज़ू के अंदर ये कौल हज़रत इमाम बुखारी का है। ये कौल जो अरबी में अभी मैंने पढ़ा उसका तर्जुमा ये है कि किसी के नज़दीक भी, किसी के नज़दीक भी सही सनद से यह बात साबित नहीं है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ज़िंदगी में कभी भी नमाज़ में रफ़ेयदैन को छोड़ा हो, और सहाबा-ए-इकराम में से भी किसी एक के बारे में यह साबित नहीं है कि किसी सहाबी ने रफ़ेयदैन न किया हो।
01:00
Speaker A
यानी रफ़ेयदैन साबित है। अच्छा, अब एक आदमी ये कह रहा है कि रफ़ेयदैन साबित नहीं है। उसकी दलील क्या है? उसकी दलील देखें। "अन अलकामा, अन अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु ताला अनहु, काला: सल्ला रसूलुल्लाहि सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़लम यरफ़ा यदैहि इल्ला फ़ी अव्वलि मरह।" इस हदीस को सही अल्बानी ये कह रहे हैं कि ये हदीस सही है, बराबर है। तर्जुमा पहले देख लेते हैं, उसके बाद हम इस पर बहस करेंगे। अलकामा कहते हैं कि अब्दुल्लाह बिन मसऊद ने एक दफ़ा कहा, क्या मैं तुम्हें नबी की नमाज़ पढ़कर न बताऊँ कि नबी की नमाज़ कैसी थी? नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम नमाज़ कैसे पढ़ते थे? क्या मैं तुम्हें नबी की नमाज़ पढ़कर न बताऊँ?
01:20
Speaker A
लोगों ने कहा, बताइए। तो हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद ने नमाज़ पढ़कर बताई, फ़लम यरफ़ा यदैहि इल्ला फ़ी अव्वलि मरह, यानी उन्होंने सिर्फ़ एक बार, पहली बार में रफ़ा यदैन किया, फिर नहीं किया। उन्होंने एक ही बार तकबीर-ए-तहरीमा के वक़्त हाथ उठाया और हाथ बांध लिए। तो फ़लम यरफ़ा यदैहि इल्ला मरतन, इस हदीस से साबित हुआ कि रफ़ेयदैन नमाज़ में नहीं है, इसलिए कि अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु ताला अनहु ने नबी की नमाज़ पढ़ के बताया और एक ही बार रफ़ा यदैन किया। तो इस हदीस से, इस असर से यह साबित हुआ, और हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद के इस फ़ेअल से इसका साबित होना कि रफ़ेयदैन नमाज़ में नहीं है।
01:38
Speaker A
इमाम बुखारी क्या कह रहे हैं कि किसी के नज़दीक भी सही सनद से यह बात साबित नहीं है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ज़िंदगी में कभी नमाज़ में रफ़ेयदैन छोड़ा हो। ये तो नबी का मामला हुआ। सहाबा-ए-इकराम जितने हैं, किसी सहाबी से भी तर्क-ए-रफ़ेयदैन साबित नहीं है। दो बातें हो गईं। अब सही क्या है? सही यह है कि सनद को चेक किया जाएगा। अभी बात हुई कि एक तो सनद होना ज़रूरी है, और दूसरे सनद काफ़ी नहीं है, बल्कि हर रावी को चेक किया जाएगा।
01:58
Speaker A
तो जब चेक किया गया तो इसमें आसिम बिन कुलैब एक रावी हैं इस रिवायत के अंदर, जिनके ऊपर कलाम है। इसी वजह से ज़ुबैर अली ज़ई कहते हैं, जो एक मुहद्दिस थे, वो कहते हैं कि ये हदीस ज़ईफ़ है। कहा ज़ुबैर अली ज़ई ने, इब्न ज़ई कहते हैं कि ज़ुबैर अली ज़ई कहते हैं कि यह हदीस ज़ईफ़ है। अब देखिए, अल्लामा अल्बानी जो कह रहे हैं कि यह सही है, और ज़ुबैर अली ज़ई कह रहे हैं कि इसकी सनद सही नहीं है। अब ज़ाहिर है कि इस हदीस के अंदर शक पैदा हो गया, इसलिए कि एक मुहद्दिस कह रहा है और एक इसको सही कह रहा है। जवाब क्या है?
02:12
Speaker A
जवाब देखें। जो लोग कहते हैं कि नमाज़ में रफ़ेयदैन नहीं है, उन्होंने इसी रिवायत से इस्तदलाल किया है, अब्दुल्लाह बिन मसऊद की इस रिवायत से। तो पहली बात तो ये कि ये हदीस ज़ईफ़ है। इमाम अहमद और इमाम बुखारी ने आसिम बिन कुलैब, जो एक रावी है, उस रावी को चेक करने के बाद कहा कि ये हदीस ज़ईफ़ है। किन्होंने? इमाम अहमद बिन हंबल और इमाम बुखारी रह॰ ने। अगर यह रिवायत सही होती तो इमाम बुखारी का जुज़ू जो अलग से रफ़ेयदैन के ऊपर पूरी किताब लिखी है, कभी यह न कहते कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से ज़िंदगी भर तर्क-ए-रफ़ेयदैन साबित नहीं, और नबी को तो छोड़िए, किसी भी सहाबी से तर्क-ए-रफ़ेयदैन साबित नहीं है। ये कौन बोला? इमाम बुखारी रह॰ और इमाम अहमद बिन हंबल, और इस हदीस के बारे में ज़ुबैर अली ज़ई कहेंगे कि ज़ईफ़ है।
02:23
Speaker A
चलो मान लेते हैं अल्लामा अल्बानी के कहने की वजह से कि ये हदीस सही है। चलो, अव्वल तो ये हदीस सही नहीं है, इसलिए कि इमाम बुखारी वगैरह इस हदीस को सही न मानते हैं आसिम की वजह से। अच्छा चलो, हम इसे सही मान लेते हैं, ये हदीस सही है। अगर इसे सही मान लिया जाए तो ये उन रिवायतों के मुखालिफ़ और मुआरिज़ नहीं जिन रिवायतों के अंदर रफ़ेयदैन का इसबात मिलता है। जैसे इमाम बुखारी रह॰ वो हदीस ला रहे हैं कि इतनी जगहों पर रफ़ेयदैन करना है। इमाम मुस्लिम भी वही रिवायत ला रहे हैं, इमाम इब्न माजा ला रहे हैं, इमाम तिरमिज़ी ला रहे हैं। सारे लोग उन रिवायतों को ला रहे हैं जिनमें ये है कि इतनी जगहों पर रफ़ेयदैन करना है। तो अगर अब्दुल्लाह बिन मसऊद की ये रिवायत तस्लीम कर ली जाए, सही मान लिया जाए, तो ये उन रिवायतों के मुखालिफ़ नहीं है। क्यों मुखालिफ़ नहीं भाई? उनमें तो रफ़ेयदैन का इसबात है, इसमें तो रफ़ेयदैन की नफ़ी है। तो इसबात और नफ़ी दोनों एक कैसे हो सकते हैं? हाँ भी और नहीं भी, और बोले तो हदीस है। सही मान लिया जाए तो इन रिवायतों के मुकाबले में यह हदीस नहीं है जिनसे रुकू में जाते वक़्त, रुकू से उठते वक़्त वगैरह रफ़ेयदैन का इसबात होता है। क्यों? इसलिए कि अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु ताला अनहु से बहुत सारे मसाइल मख़फ़ी रह गए थे। उनमें से एक मसला ये भी रहा होगा कि उनसे रफ़ेयदैन का मामला मख़फ़ी रह गया। मख़फ़ी रह गया इसलिए कि इनसे कई मसले मख़फ़ी रह गए थे। रहने का मतलब यह है कि उनको उस मसले का इल्म नहीं था। जैसे सबूत के तौर पर हम एक रिवायत पेश करते हैं, उन्हीं की, अब्दुल्लाह बिन मसऊद की, कि "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें नमाज़ सिखाई..." अल्लामा अल्बानी भी इसको सही कह रहे हैं और ज़ुबैर अली भी सही कह रहे हैं। किसको? इस रिवायत को जो अभी मैंने पढ
02:42
Speaker A
हो रही है कि उन्होंने एक ही दफा तकबीर तहरीमा के वक्त हाथ उठाया और हाथ बांध लिए तो फलम यफा यद इल्ल मरति इस हदीस से साबित हुआ कि रफूल यद नमाज़ में नहीं है इसलिए कि अब्दुल्ला इब्न मसूद रदी
02:56
Speaker A
अल्लाह ताला अनू ने नबी की नमाज़ पढ़ के बताया और फलम यद मर तो इस हदीस से इस असर से ये साबित हुआ और हजरत अब्दुल्ला इब्न मसूद इस फेल से इफ नमाज़ में नहीं है। इमाम बुखारी क्या कह
03:10
Speaker A
रहे हैं कि किसी के नजदीक भी सही सनद से ये बात साबित नहीं है कि नबी-ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जिंदगी में कभी नमाज़ में रफूल छोड़ा हो। ये तो नबी का मामला हुआ। सहाबे इकराम जितने हैं किसी सहाबी से भी तरके
03:27
Speaker A
रफू साबित नहीं है। दो बातें हो गई। अब सही क्या है? सही यह है कि सनद को चेक किया जाएगा। अभी बात हुई कि एक तो सनद होना जरूरी है और दूसरे सनद काफी नहीं है बल्कि हर रावी को
03:41
Speaker A
चेक किया जाएगा। तो जब चेक किया गया तो इसमें आसिम इब्न कुलैब एक रावी हैं इस रिवायत के अंदर जिनके ऊपर कलाम है। इसी वजह से जुबैर अली ज़ई कहते हैं जो एक मुहद्दिस थे वो कहते हैं कि ये हदीस जईफ
03:53
Speaker A
है। काला जुबैर अली ज़ई इस ज़ई। जुबैर इब्न ज़ई कहते हैं कि जुबैर अली ज़ई कहते हैं कि यह हदीस जईफ़ है। अब देखिए अल्लामा अलबानी जो है कह रहे हैं कि यह सही है और जुबैर अली ज़ई कह रहे हैं कि इसकी इस सनात सही
04:07
Speaker A
नहीं है। अब जाहिर है कि इस हदीस के अंदर शक पैदा हो गया। इसलिए कि एक मुहद्दिस कह रहा है। और एक इसको सही कह रहा है। जवाब क्या है?
04:24
Speaker A
जवाब देखें। जो लोग कहते हैं कि नमाज में रफ गौर से हां जो लोग कहते हैं कि नमाज में रफुल नहीं है। उन्होंने इसी रिवायत से इस्तालाल किया है। अब्दुल्ला इब्न मसूद की इस रिवायत से तो पहली बात तो ये कि ये
04:38
Speaker A
हदीस जईफ है। इमाम अहमद और इमाम बुखारी ने आसिम इब्न कुलैब जो एक रावी है उस रावी को चेक करने के बाद कहा कि ये हदीस जईफ है। किन्होंने? इमाम अहमद बिन हंबल और इमाम बुखारी रह ने। अगर यह रिवायत सही होती तो इमाम बुखारी का
04:54
Speaker A
जुद जो अलग से रफ के ऊपर पूरी किताब लिखी है कभी यह ना कहते कि नबी करीम सल्लल्लाह वसल्लम से जिंदगी भर तके रफ साबित नहीं और नबी को तो छोड़िए किसी भी सहाबी से तके रफ साबित नहीं है। ये कौन बोला इमाम बुखारी
05:07
Speaker A
रह और इमाम अहमद हंबल और इस हदी के बारे में जुबेर कहेंगे जफ है। चलो मान लेते हैं अल्लामा अलबानी के कहने की वजह से कि ये हदीस सही है। चलो अवल तो ये हदीस सही नहीं है। इसलिए कि इमाम बुखारी रहमा [हंसी]
05:21
Speaker A
वगैरह इस हदीस को सही मानना है आसि की वजह से। अच्छा चलो हम इसे सही मान लेते हैं। ये हदीस सही है। अगर इसे सही मान लिया जाए तो ये उन रिवायतों के मुखालिफ और मुारिज़ नहीं जिन रिवायतों के अंदर रफुलदैन का इस
05:36
Speaker A
मिलता है। जैसे इमाम बुखारी रहम वो हदीस ला रहे हैं कि इतनी जगहों पर रफूल यद करना है। इमाम मुस्लिम भी वही रिवायत ला रहे हैं। इमाम माजा ला रहे हैं। इमाम तिरमिजी ला रहे। सारे लोग उस उन रिवायतों को बुला
05:47
Speaker A
रहे हैं। जिनमें ये है कि इतनी जगहों पर रफूलन करना है। तो अगर अब्दुल्ला इब्न मसूद की ये रिवायत तस्लीम कर ली जाए सही मान लिया जाए तो ये उन रिवायतों के मुखालिफ नहीं है। क्यों मुखालिफ नहीं भाई? उनमें तो रफुल यद का
06:02
Speaker A
इस्बा है। इसमें तो रफुल यद की नफी है। तो इजाब और स दोनों एक कैसे हो सकते हैं? हां भी और नहीं भी। और बोले तो हदीस है। सही मान लिया जाए तो सही मान लिया जाए तो इन
06:14
Speaker A
रिवायतों के मुज यह हदीस नहीं है। जिनसे रुकू में जाते वक्त रुकू से उठते वक्त वगैरह रफुल का इस बात होता है। क्यों? इसलिए के अब्दुल्ला इब्न मसूद रज़ अल्लाहहु ताला अनो से बहुत सारे मसाइल मखफी रह गए थे। उनमें
06:32
Speaker A
से एक मसला ये भी रहा होगा कि उनसे रफल यद रफल यद का मामला मफ रह गया वो मफि रह गया वो इसलिए कि इनसे कई मसले मफ रह गए थे रहने का मतलब यह है के उनको उस मसले का
06:45
Speaker A
इल्म नहीं था जैसे सबूत के तौर पर हम एक रिवायत पेश करते हैं उनहीं की अब्दुल्लाह अल रसूल्लाह सल्ला वसल्लम सलामा फका सादा यानी अलसा किताब तक अल्लामा अलबानी भी इसको सही कह रहे हैं। और जुबैर अली भी सही कह रहे हैं।
07:09
Speaker A
किसको? इस रिवायत को जो अभी मैंने पढ़ा। क्या मतलब है इस रिवायत का? हजरत अब्दुल्ला मसूद फरमा रहे हैं कि हमको नबी-ए करीम सल्लल्लाहु वसल्लम ने नमाज़ सिखाई। अलमना रसूल सल्ल सला कौन है बताने वाले? यही जिनकी रिवायत अभी मैंने पेश की। फिर
07:22
Speaker A
उन्होंने एक ही मर्तबा रसूल देन किया। उन्हीं की रिवायत है कि हमको रसूल्लाह सल्ला वसल्लम ने नमाज़ सिखाई। फकामा आप खड़े हुए। बरा आपने तकबीर कहा फलम्मा अरादा अरका अब्दुल्ला इब्न मसूद नबी करीम सल्लल्लाहु अलह वसल्लम के बारे में फरमा
07:36
Speaker A
रहे कि हमको नबी ने नमाज़ इस तरह सिखाई तो खड़े हुए और उसके बाद तकबीर कहा फलम्मा अरादा का जब वो रुकू में गए तो तब बक रुक बताई उन्होंने अपने दोनों हाथों को मिलाकर अपने दोनों घुटनों के दरमियान रख लिया
07:49
Speaker A
देखा भाई रुकू में हाथों के रखने की पोजीशन क्या है? हजरत अब्दुल्ला मसूद जो पोजीशन बता रहे हैं इस पोजीशन के बारे में क्या है? अपने दोनों हाथों को मिला करके उन्होंने दोनों घुटनों के दरमियान रख लिया। इसलिए रिवायत अल्फाज़ तब रुक रुक का
08:05
Speaker A
मतलब घुटना दोनों हाथों की तकबी देकर मिलाकर उसे घुटने के बीच में रख लिया। फल का सादन हजरत साद रदीज़ अल्लाह ताला अनो को ये बात मालूम हुई। क्या उन्होंने तत्वी की है। अच्छा फकाल तो हजरत साद ने कहा
08:20
Speaker A
सदका मेरे भाई ने बिलकुल सच कहा। मेरे भाई ने बिल्कुल सच कहा और यह जो उन्होंने तबीक की है दोनों घुटनों के बीच हाथों को मिलाकर रखने की कद नफ हादा हम ये करते थे हम ये करते थे सुम्मा उरनादा फिर हमको इस
08:38
Speaker A
बात का हुक्म दिया गया पहले हम ऐसे ही करते थे तत करते थे लेकिन फिर हमको इस बात का हुक्म दिया गया क्या अल इंसाब रुकब हाथों से घुटनों को पकड़ लेना पकड़ लेना तो पहले रखने का हुक्म था ततबीक का बाद
08:50
Speaker A
में हमें हुक्म दिया गया कि हम घुटनों को अपने हाथों से पकड़ ले सुम्मा इंसाब घुटनों को हम हाथों से पकड़ ले देखिए हजरत अब्दुल मसूद रज़ अल्लाह ताला ने जो पोजीशन बताई रुकू की वो तबी थी हजरत साद ने
09:05
Speaker A
फरमाया ये मसला इनके ऊपर मफिल हो गया था इन्हें मालूम नहीं था हम ये करते थे लेकिन फिर बाद में नबी करीम सल्ल ने हमसे ये फरमाया हमें हुक्म दिया तो उमरनादा फिर हमें हम ये करते थे ठीक है जो उन्होंने
09:14
Speaker A
किया हम करते थे लेकिन फिर हमें ये हुक्म दिया गया क्या हुक्म दिया गया अल इंसाकत रखना नहीं है हाथ मिला के घुटनों के दरमियान बल्कि हमें घुटनों को पकड़ना है जैसे हम करते हैं। ऐसे घुटनों को पकड़
09:23
Speaker A
लेते हैं। तो बहुत सारे मसाइल इनसे मफ रह गए थे। उनमें से एक मसला यह भी है। और दूसरे ये हजरत अब्दुल्ला इब्न मसूद का फेल है ये। और नबी करीम सल्लल्लाहु अलह वसल्लम की तमाम सही अहदीस जो इस बात रफ के ऊपर
09:36
Speaker A
दलील है वो इसके मुरारिज़ हैं। लिहाजा हजरत अब्दुल्ला इब्न मसूद की इस बात को अगर सही भी मान लिया जाए तो बहुत सारी जो रिवायत हैं जो सही है इसके मुज़ है। उनका यह अमल लिहाजा इसको नहीं लिया जाएगा। और यही कहा
09:46
Speaker A
जाएगा उनसे मफ रह गई थी ये बात।
Topics:रफ़उल यदैननमाज़इमाम बुखारीजुज़ रफ़उल यदैनहदीससनदअल्बानीज़ुबैर अली ज़ईअब्दुल्लाह बिन मसऊदफ़िक़्ह

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