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पितृ पक्ष में प्रतिदिन सुने। भगवद्गीता गीता | पितृ स्तोत्र | #गजेन्द्र पित्रों को मिलेगा मोक्ष

पितृ पक्ष में श्रवण हेतु महत्वपूर्ण पितृ स्तोत्र और भगवद्गीता के अध्यायों का समावेश। पितरों की तृप्ति और मोक्ष हेतु मार्गदर्शन।

Key Takeaways

  • पितृ पक्ष में पितृ स्तोत्रों का नियमित श्रवण पितरों की तृप्ति और मोक्ष का कारण है।
  • भगवद्गीता के अध्यायों से कर्म, योग और भक्ति के माध्यम से जीवन में संतुलन और मुक्ति संभव है।
  • पितृ रक्षा के लिए यज्ञ, दान और तप का पालन आवश्यक है।
  • श्री कृष्ण के उपदेशों से जीवन के आध्यात्मिक मार्ग को समझा जा सकता है।
  • ध्यान और श्रद्धा के साथ पितरों को स्मरण करने से परिवार और कुल की समृद्धि होती है।

What the video covers

  • पितृ पक्ष में प्रतिदिन सुनने योग्य पितृ स्तोत्रों का संग्रह प्रस्तुत किया गया है।
  • इन स्तोत्रों के श्रवण से पितर प्रसन्न होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • श्रोताओं को पितरों की तृप्ति और आशीर्वाद के लिए नियमित श्रवण और ध्यान करने का निर्देश दिया गया है।
  • भगवद्गीता के 15वें अध्याय पुरुषोत्तम योग का पाठ और व्याख्या भी वीडियो में शामिल है।
  • गीता के श्लोकों के माध्यम से कर्म, योग, ज्ञान और भक्ति के महत्व को समझाया गया है।
  • पितृ पक्ष के दौरान पितृ रक्षा और कुल की समृद्धि के लिए यज्ञ, दान और तप का महत्व बताया गया है।
  • श्री कृष्ण और अर्जुन के संवाद के माध्यम से जीवन के आध्यात्मिक सिद्धांतों का वर्णन किया गया है।
  • पितृ पक्ष के दौरान पितरों की प्रसन्नता हेतु 'ओम पितृभ्यो नमः' का जप करने की सलाह दी गई है।
  • योग, ज्ञान और कर्म के समन्वय से मोक्ष की प्राप्ति पर बल दिया गया है।
  • वीडियो में पितृ पक्ष के धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व को विस्तार से बताया गया है।

Answers

Questions about this video

पितृ पक्ष में पितृ स्तोत्र क्यों सुनना आवश्यक है?

पितृ पक्ष में पितृ स्तोत्र सुनने से पितर प्रसन्न होते हैं, उनकी तृप्ति होती है और वे अपने वंश को सुख, संपत्ति, धन, यश तथा मोक्ष का आशीर्वाद देते हैं।

भगवद्गीता के 15वें अध्याय का पितृ पक्ष से क्या संबंध है?

भगवद्गीता के 15वें अध्याय में पुरुषोत्तम योग का वर्णन है जो आत्मा, कर्म और मोक्ष के मार्ग को समझाता है, जो पितृ पक्ष में पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए महत्वपूर्ण है।

पितृ पक्ष में 'ओम पितृभ्यो नमः' का जप कैसे करना चाहिए?

पितृ पक्ष में प्रतिदिन पितृ स्तोत्र सुनते हुए मन में अपने पितरों को ध्यान करते हुए 'ओम पितृभ्यो नमः' का जप करना चाहिए, जिससे पितरों की प्रसन्नता और तृप्ति होती है।

Full Transcript — Download SRT & Markdown

00:00
Speaker A
प्रिय भक्तों, नमस्कार। पितृ पक्ष का समय चल रहा है। मैं आपको इस वीडियो के माध्यम से पितृ पक्ष में सुने जाने वाले उन सभी महत्वपूर्ण स्तोत्रों को सुनाऊंगा, जिसके श्रवण करने से पितृ पक्ष का संपूर्ण फल आपको प्राप्त होता है। जिसके प्रतिदिन के
00:19
Speaker A
श्रवण से आपके पितर प्रसन्न होते हैं। उनको तृप्ति मिलती है और वे आपकी सभी इच्छाओं को पूरा कर आपको सुख, संपत्ति, धन, यश, वैभव तथा वंश वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। आपको करना बस यह है कि आप प्रतिदिन
00:36
Speaker A
जब भी आपको समय मिले, आप इस वीडियो को चलाकर अपने पितरों को ध्यान करते हुए इस पूरे वीडियो में दिए गए स्तोत्रों को सुनिए और इसका मनन करिए। और अंत में कमेंट बॉक्स में "ओम पितृभ्यो नमः" लिखकर अपने
00:51
Speaker A
पितरों की प्रसन्नता की कामना करिए। उनकी तृप्ति की कामना करिए। बोलिए, "ओम पितृभ्यो नमः।" पितृ कुल रक्षा स्तत्र नमः। सर्व पित्यस पित्य परमेशिन कुलस रक्षणार्थाय स्मराम हृद निश्चितम्। ये कृपा बल धर्म सत्यम श्रद्धा च वधते। ते पित प्रसंतु रक्षा ददा तुम सदा
01:31
Speaker A
स्वधाकार प्रिया नित्यम स्वधा भो महासा। ते पित कृपालु गृहं में सुखमाव। कुल देवतया सारघं पित सर्वदा कुलस मंगलम कुर। संकटम ना ते ऋणत्र विहोय। पित्य प्रणतो ते कृपा बलात सर्व दुख दुःस्वप्न नाशनम्। सदा कुल हितार्थाय पित पारसमेव
02:15
Speaker A
आयु च धनं ध्यम प्रजाम च ददाताम सुघम्। यत कृतं पाप कर्माणि यच्चा परा धनं कृतं पित। छंतु मरहंतु प्रसन्ना सर्वदा सदा तृप्तिम लभंतु। पित श्रद्धा भक्त पितते यज्ञ दान तपोवत्या रक्षाम कुरंतु में सदा सर्व पित नम नमोस्तु। कुल रक्षण
02:53
Speaker A
ते प्रसाद मात्रे सर्व संपद भवेत कुले। ओम पितृभ्यो नमः नमः। पित्री गणेशाय सर्व लोक पितामहे पित दोष प्रशाय पितणा पावकाय च। ये प्रसादतो नित्यम वंसो दीर्घम समृद्ध ते स्मरण मात्रे दुख दारिद्र नाशनम्। पितणा दर्शना देवा रोग शोका विनाशम्।
03:34
Speaker A
आयु प्रज्ञा सहर्तिम पुत्र पौत्र विविकम श्राद्ध दान समाराध्या तर्पण प्रसन्नता तेषाम कृपा प्रसादेन सर्व सिद्ध विनिश्चितम्। नमः सर्व पित्री नित्यम ब्रह्म स्वरूपण नमः। कृपाम कुरमे नित्यम रक्षमा दुख नाशका। ये स्मरण मात्रे कुल वृक्षोः पुत्रे पितरे सदा रक्षा प्रण्य श्रद्धया ध्रुवम्
04:17
Speaker A
नमः कुलोवेय नमः पित्री पदाने नमस्ते लोकनाथाय नमस्ते पित विग्रहे। पितणाम कृपया नित्यम धनधान्य समृद्धं गृह सौख्यम च स्वास्थ्यम च सर्वदा लभते नर। यह पठे प्रातः श्रद्धा भक्ति समन्वित पित रक्षाव दिव्यम तस दोष प्रणसते। ओम पितृभ्यो नमः। श्री भगवान वाच इम विवसते योगम प्रोक्तम्।
05:06
Speaker A
वाहनयम विवसान मनवे प्रावावे एवं परंपरा प्राप्तिम इम राजयो विद सह कालेने महता योगो नष्ट परंतप। स एव योगो नष्ट पुरंतप भक्तो में सखा चेते रहस्यम हो तदत्तम। अर्जुन उवाच, अपरम भतो जन्म परम जन्म विवसत कथानी तमा दोते। श्री भगवान वाच
05:53
Speaker A
बहुति में व्यतीतानी जाना तवचुन तान वेद सर्वाणि नम वे परंतप। अजोपसवयात्मा भूता नाम स्वरूप प्रकृति स्वाध संभवाया। यदा यदा ही धर्मस गिर भवती भारत अभान धर्मस तदात्म श्रीजाम परित्राणाय साधु नाम विनाशाय चतुष्कता धर्म संस्थापनार्थाय संभवाम युगे युगे जन्म कर्म चमे दिव्य एवं।
06:43
Speaker A
योवेति तत्वतः तक्तवा देह पुनर्जन्म नैति मामेतिना वितराग भय क्रोधा मनमाया मापासिता बवो ज्ञान तपसा पुता भाव मागत ये यथा माम प्रपदते तामव भजाम ममात्मवरते। मनुष्य पार्थ सर्वस कांग कर्मणा सिद्धिम यजता देवता छिप ही मानुष लोके सिद्ध भवती कर्मजा चतुर्व्यम।
07:27
Speaker A
मया सष्टम गुण कर्म विभागस तस कर्ता रमपिमा वृद्ध कर्ता रमव्ययम। नमा माम कर्मा लिपते नमे कर्म फलेहा इमाम यो जानाते कर्म फिर सते। एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्व कुर कर्मव तस्मातम पूर्वतरम कृतं किम कर्म किम कर्मति कवोत्र मोहित।
08:03
Speaker A
तत्त कर्म प्रवक्षाम यज्ञ मोक्ष से कर्मणो बुद्धव्यम बुद्ध्यम च विकर्मण अकर्मणस बोव्यम। गहना कर्मणो गति कर्मण्य कर्मय पश्य कर्मणी च कर्मय स बुद्धिमान मनुष्येषु सहयुक्त कृत कर्म कृता यस सर्वे समारंभ काम संकल्प वर्जिता ज्ञान अग्नि दग करणम तमाहु पंडितम बुधा।
08:42
Speaker A
तक्त कर्म फला संगम नितो निराश्रय कर्म भी प्रवितो न किंचित करो स निराशित्मा। तक्त सर्व परिग्रह शरीरम केवलम कर्म कुपनम यक्षा लाभ संतुष्टो द्वंदातीतो सम सिद्ध सिद्धो च कृत् निबंध बंधते गत संगस मुक्तस ज्ञानवस्थ चेतस। यज्ञ चरत कर्म समग्रम प्रवियते।
09:28
Speaker A
ब्रह्मा परम ब्रह्म हवे ब्रह्मग ब्रह्मणाहुतम ब्रह्मवते तेन गंतव्यम। ब्रह्म कर्म समाधिना देवमेवा पर योग्यम योगिन परपासते। ब्रह्मावर पर यज्ञम यज्ञ नज श्रोताद इंद्रिय संग्नि सुजूति शब्दायन्य इंद्रिय जुहति सर्दिय कर्माण प्राण कर्माण चा आत्म संयम योगानो जूहति ज्ञान दीपते द्रव्य यज्ञ तपो।
10:14
Speaker A
यज्ञ योग यज्ञ तथा परे स्वाध्याय यज्ञ यज्ञ यत संसित अपाने जुहति प्राणम प्राण पानम तथा परे प्राणापान गति रुध्वा प्राणायाम परायण अपरेताहार प्राण प्राण सुजू सर्वे यज्ञ विदो यज्ञ यज्ञ छपिता कलमश यज्ञ सष्ट भुजो याते ब्रह्म सनातनम ना लोको यज्ञस कुत्तमा।
10:57
Speaker A
एवं बहुविधा [गला साफ़ करने की आवाज़] यज्ञ विता ब्रह्मणो मुखे कर्म जान सर् ने ज्ञत्वा विमोक्षसे श्रेया द्रव्य मयाज परंतप। सर्वम कर्माखिलम पार्थ ज्ञाने परिसमापते त्व प्राण पाते पर सेवया उपदेशते ज्ञानम ज्ञान नद यज्ञ पुन मेवम यास पांडव ये भूतान शेषण दक्षसनथोम।
11:43
Speaker A
अपचेस पापभ्य सर्वे पाप कृतम सर्वम ज्ञान प्लवे वृजनम संतसी यथसी समृद्ध भस्म सात कुरते। ज्ञान अग्नि सर्वण भस्म सात कुरते तथा न ही ज्ञान सदम पवित्र विद्यते। तत स्वयं योग संस काले नात्मिवते श्रद्धा वल्लभते ज्ञानम तत संत ज्ञानम ल पर श चणाधगच्छते।
12:28
Speaker A
अधान संशयात्मा विनसते ना लोक परो न सुखम संशयात्म योगम सनस्त करणम। ज्ञान संस संशयम आत्मवंतम न कर्माण निबती धनंजय। तस्मात ज्ञान संभतम हस्तम ज्ञानसनात्म संसयम योग माष् भारत। ओम तत्सद श्रीमद् भगवत गीता सुपिषद ब्रह्म विद्यायाम योग शास्त्रे श्री कृष्ण अर्जुन
13:10
Speaker A
संवाद दिव्य ज्ञान योग नाम चतुर्थ्या। हरि ओम। श्री भगवान वाच मयाक्त मन पार्थ योगम युज जन्मदाय असं समग्रम यथा याज्ञ ज्ञानम ते सवि्ञान वच्छ शेष यज्ञाने भयो ज्ञातव्यवषते। मनुष्य सहस्त्रे कच्च सिद्ध यतता सिना कंचन मावे तत्वत भूम राो नलो वायु ख मनो बुद्धि रेवच।
14:13
Speaker A
अहंकार इति यम में भिन्ना प्राकृति अपरेित प्रकृति वृद्धि में पराम जीव भूता महाबाओ यदम धारते जगत निभानी सर् पधारय। अहं सनस जगत प्रभ प्रलय तथा म परतरम किंच दस्त धनंजय। म सर्वदम प्रोक्तम सूत्र मणग रसोसु कौते प्रभास सूर्यो।
15:02
Speaker A
प्रणव सर्ववेशु शब्द खेपुष पुण्यो गंध पृथिव्याम च तेजस्म विभाश जीवनम सर्वभतेशु तपश्च तपस्वीषु बीजम। मा सर्वभ नाम वृद्धि पार्थ सनातनम बुद्ध बुद्धिमतास्म तेजस तेजस्व नाम बलम बलवता चाहम काम राग विवर्जितम धर्मा विरुद्ध भूतेशु कामोस भरत ये चव शक्ति का भावा राजसाय।
15:54
Speaker A
मत एता नम ते [घंटी की आवाज़] त्रिभुमय भारभ सर्वदम जगत मोहितम नाभातानी मामे परम्यम देव होष गुणमय मम माया दुरतया मामेव प्रपदते। माया मेताम तरते न माम दुकनो मूढ़ प्रपदते नराधम मायाया प्रितज्ञाना आसुरम भाव मासित चतुरधा भजते मा जान सुकृत।
16:44
Speaker A
आर जिज्ञा सुरार्थी ज्ञानी च भरत तेशा ज्ञानी नित्य युक्त एक भक्त विशिषते प्रियो ज्ञानर्थ महम सच मम प्रिय उदारा सर्व ते ज्ञानीत्म वमेतम अस्थित स युक्तात्मा मामे वात्तमागतिम बहु नाम जन नामते ज्ञानवान प्रपदते। वासुदेव सर्वमते सम महात्मा सुदुर्लभ।
17:31
Speaker A
कामस्त हित ज्ञान प्रपदते देवता तम तम नियमस्थाय प्रकृत्याने स्वया यो यो याम याम तनु भक्त श्रद्धयाचितते तस तस चला श्रद्धा तामेव विदधाय सतया श्रद्धया युक्तस तस राधते लभते तत काम मायव विहितान अंतवत फलम तेशा तब्शा देवा देव यजोते।
18:20
Speaker A
मक्तया मामपी [घंटी की आवाज़] अव्यक्तम व्यक्तिमापनम मन्यते माम बुद्ध परम भाव म जानंतो ममा व्यक्तमम नाहम प्रकाश सर्वस्य योग माया समावत मूढ़ोयम नाभ जातानी लोको माम जमव्ययम देवा समतीनी वर्तमान चार्जुन भविष्याण च भूतानी मामतु वेदन कंचनम इच्छा द्वेष समुन।
19:07
Speaker A
द्वंदवा मोहे न भारत सर्वभान समोह सर्ग परंतपा ये गतम पापम जना नाम पुण्य कर्मणा ते द्वंद मोह निर्मुक्त भजते। मादता जरा मरण मोक्षा मामा ते ब्रह्मा तद कृत्मम कर्म चाखिलम साध भूताध देवम साध यज्ञम चहु प्रयाण काले पचमा ते विदुरक्त चेतस।
19:55
Speaker A
[घंटी की आवाज़] ओम तत्सद श्रीमद् भगितास्तु ब्रह्म विद्यायाम योग शास्त्रे श्री कृष्ण अर्जुन संवादे भगवत ज्ञान योगो नाम सप्तमो अध्याय। ओम हरि। प्रिय दोस्तों, नमस्कार। आज हम आपको इस वीडियो में भगवत गीता के 15वें अध्याय को सुनाने का प्रयास कर रहे हैं। तो चलिए हम
20:24
Speaker A
भगवत गीता के 15वें अध्याय जिसका नाम है पुरुषोत्तम योग। इसे हम ध्यान से भगवान श्री कृष्ण को याद करते हुए मन से सुनिए। श्री भगवान वाच उध्व मूल मध्यम शाखं स्वम प्राहुयम छंद यस परानी यस्तम वेद सवेद अध प्रतास शाखा गु प्रव विषय प्रल।
20:56
Speaker A
अध मूल कर्म मनुष्य लोके न रूप तथभ्य नंतो न चाद न सम संष्ठा असमे सु मूल मसंग्रे दित्वा त पदम त परमारित्यम यस्मिन गत निरवती भू तमेव चादम पुरुष प्रपद्य यत प्रवत्त प्रिता पुराण निर्माण मोहात संग दोष अध्यात्म नित्या।
21:39
Speaker A
निवत्तमा द्वंद सुख दुख संग गच्छंत मूढ़ा पदमय तत न तते सूर्य न सशको न पावक य नरते त परम मम ममो जीवो जीव भूत सनातन मनस्थ इंद्रण प्रकृति स्थानी कर्षते शरीरम यदवानोती य्राश्वर ग्वता संते वायुर गंध निवासयात श्रोतम चक्षु स्पर्शनम च रसम ग्राणमेव च।
22:33
Speaker A
अध मनसम विषयवते उत्रांतम स्थितम वाजवा गुितम विनापसते पश्यते ज्ञान चक्षुष यत योग पसंतस्थितम यत कृतात्मानो नैनम पश्यंततेस यदादित्य गतम तेजो जगतते खिलम य चंद्रसंगो ततेजो वृद्धि मामकम गामा च भूतानी हारयाम्यो जसा पुष्णाम चौषध सर्व सोमो भूत्वा रसात्मक अहम वैवा नरो भूत्वा।
23:36
Speaker A
प्राण नाम देह मासित प्राणापान युक्त पचाम चतुरधम सर्वस चाह सनवष्टो मत स्मृति पोहनम वेदस सर्व वेद वेदांत कृदमो पुरुषो लोके छराव चर सर् भूतान।
24:36
Speaker A
यो मामेव समू जा पुरुषोत्तमम स सर्ववि जयती माम सर्व भावे भारत इति गुहतम शास्त्र मुक्तमयाधम बुद्ध बुद्धिमान या कृत कृतस भारत ओम तत्सदिति श्रीमद् भगवत गीता सुपनिषदस्तु ब्रह्म विद्यायाम योग शास्त्रे श्री कृष्ण अर्जुन संवादे पुरुषोत्तम योगो नाम पश्चम
25:14
Speaker A
दसोध्याय हरि ओम अथ श्री नारायण कवच राजोवाच यया गुप्त सहस्त्राक्ष सवा कण विनर्जित त्रिलोक्या श्रीम भगवन माख्या वर्म नारायणात्मकम कथ त शत्र ये गुप्त जय मृद श्री सुख उवा वृत पुरोहितो महेंद्र प्रक्षते नारायण्यम वर्मा तदी है कमणो विश्वूप वाच
26:10
Speaker A
भतांग पाणराम्या स पवित्र मुख कृतंग कर्यासो मंत्र्या वाच नारायण वर्मा सन भयागते पादानुद रुदरे हद थसे मुखे सिरसानु कारा विन्यसे ओम नमो नारायण विपर्यथापवा कर्यासम त कुर द्वादक्षर विद्याया प्रणवाद कार्त मंगुल्य गुष् पर्वस नसे ओकारम विकार मनुधनी साकारम तू भ्र मध्य आकारम शिखया दश
27:10
Speaker A
वेम नेत्रुजा ओंकारम सर्व संधि मकारमस्त्रम मंत्र भवे बुद्ध सग संग फलंतम तत सर्व दक्षु विन ओम विष्णुवे नमः इति आत्मानम परम धय धयम स शक्तिम विद्या तेजस तपो मूर्तम मंत्र मुदा हरे ओम हरि ध्यानम मम सर्व रक्षा नस्तांग पद्म पतंग दष्टो दरारी चचा
27:57
Speaker A
पागोबाहु जलेत मूर्त यदो गभ वरुणस पाले सुया व मनोभ्या त्रविक्रमत विश्वूप दुर्गभ्या प्रभु पाया सिंो सुर पार विमुचतो यस महासंग द विने द पद गर्भ रक्षसो ध्वन यज्ञ कल्प स्वदयो धरोरा रामोदूथ प्रवासे स लक्ष्मणो्या भरताजोस्मान मामोग्र धखिलात प्रामा
28:47
Speaker A
नारायण पात नरस हासात दत्त योगा दथ योगनाथ पाया कपिल कर्म बंधनात सनत कुमारो वतका देव यमापथ देव हेनाथ देव पुरुषता कुर हर माम निरया धनवंत भगवान पार्थ पथ्या द्वंद भया दृश्यभ निर्जितत्मा यज्ञ लोका जनता बलो ग क्रोध हवसाद इंद्र
29:27
Speaker A
द्वपायनो भगवान प्रबोध बुद्ध पाखंड ग प्रमादात कलक कले काल मला प्रयात धर्मावना कृतावतार माम केशव गदया प्रतारभ्या गोविंद आसंगवे नारायण प्रा उदार शक्ति मधने विष्णुंद्र पाण देवो पर मधु ग्रधवा सायं त्रिधामा वत माधवो मा दो ऋषिकेश उदार रात्र निश एको वत
30:08
Speaker A
पद्मनाभ श्रीव्स धामा पररात्र ई प्रत्युष ईो सिधरो जनार्दन दामोदर व्याद अनुसंध प्रभात विश्वेश्वर भगवान काल मूर्ति चक्रम युगता नल नेम भ्रम समता भगवत प्रत्तम दंद दंद मासु कच्छम यथावा सखो हुतास गिशनंगे निस्पिंज प्रिया कुमांडायक यक्षो भूत ग्रह चुर चुया
30:50
Speaker A
तधान प्रम प्रेत मात्रे पिशाच विप्रो दृष्टि दरेंद्र विद्राव पूरितो भीम हृदय कंपन तंतग्म धारा शिवरा सैन्य मी प्रयुक्तो मम छिन [गाना गाने की आवाज़] चम चंद्र छादमन नाम हर पाप चक्षुशा य भयं गभ्यो भूत केतु निभव सरप दभ्यो
31:27
Speaker A
भूतभ्य होवा सर्त भगना रूपम कीर्तिना प्रयंतो संयम सद ये प्रतीपका गरुड़ो भगवान तो प्रभु रक्ष कृप हरे नाम रूपया बुद्ध मन प्राण पारद भूषण यथा ही भगने वस्तुता सदस सया सत्यने सर्वे या समवा यत नाम विकल्प रहित स्वयं भूषणा युद्ध
32:21
Speaker A
लिंगाख्या धत्त शक्ति स्वाया तेव सत्य मानेन सर्वज भगवान हरि पातु सर्व स्वरूप सदा सर्वत्र सर्वग वि दक्ष समता द बहिग भगवान नरसिं प्रपयाम लोक भयं स्वने गस्त समस्त तेज मग माख्यातम वर्म नारायणत्मकम विजयस जसा द सुरपान धस्तु य य पति चक्षुष पदा
33:07
Speaker A
ससा विमुते न कुतश्चित भयं तस विद्या धतो भवेत राजद्रो व्याघित इमाम विद्या पुरा कश्चित कौशिको धारज योग धारयाम स्वांगम जास मरनी तस पर विमान गंधर्व पतिरे कदा यो चित्र रथ वृतो यत्र द्वक्षय गगना पत समानो हवा सल वचना दना विस्मित
33:56
Speaker A
प्रास प्राच सरस्वत स्नात्वा धामनगा श्री सुख उवा यदम यात काले योद्ध चाद नम नमती भूतानी मुते सर्वतो भयात विद्याधगत विश्वूपास कृत त्रलोक्य लक्ष्मी भू भुजे विनित मधेशुरा इति श्री नारायण कवचम संपूर्णम गजेंद्र मोक्ष श्री सुख उवास एवं बो समाधान मनो
34:49
Speaker A
जजाप परम जाप्यम प्राज मनशिक्षितम श्री गजेंद्र वाच [घंटी की आवाज़] ओम नमो भगवते तस्मै यद्मकम पुरुषायाद बीजाया परेशाया वि धीमहि यस्मिन निदम यत दम येनेदम स्वयं [घंटी की आवाज़] योस्मात परस्मात परस्तम प्रपदे स्वयंभव [घंटी की आवाज़] निजयातम कचम कहितम
35:25
Speaker A
अंम तते सात मूल काले पंचते कृष्े सर्व हेतु तमस्तदास [घंटी की आवाज़] गहनम गभीरम यस्तस पारे विराजते विभ न यस देवा पदम विदुर जंतु पुनः कोर हति गंतु यथा नटस विच दूत समा [घंटी की आवाज़] य पदम सुमंगलम
36:06
Speaker A
विुक्त संग सुसाव चर लोकमने भूतात्म समते न विदते य जन्म कर्मवा न नाम रूप गुण दोषवा [घंटी की आवाज़] तथाप लोका संभवायतते तस्मै नम पराय ब्रह न्य शक्तय अरुपायो रूपाय नम आश्चर्य कर्मण नम आत्मा प्रदीप साक्षे परमात्मने नमो ग विदुराय मनसमपिलभ्या
36:55
Speaker A
नकर्मण विपश्चिता नमः कैवल्य नाथाय निर्वाण सुख संविदे नमः [घंटी की आवाज़] शताय घोराय मूढ़ाय गुण धर्म निर्िशाय साम्याय नमो ज्ञान घनाय च क्षेत्र नमस्तम सर्वाक्षा साक्षे पुरुषा मूलाय मूल प्रकृए नमः सर्वेंद्रिय गुद सर्व प्रत्यय हेतवे असताय युक्ताय सदा भाषायते नमः
37:33
Speaker A
नमो नमस्ते खिल कारणय निष्कारणाय वितकारणाय [घंटी की आवाज़] सर्वागमय महणवाय नमोगाय परायणाय गुार चपाय तर्जित मानसाय नकर्म्य भावे विवर्जितागम स्वयं प्रकाशय नमो मादिक प्रपन पशुपाश विमोक्षणाय मुक्ताय भू करु नमोसे सर्व तनु भ मन प्रती प्रत्य भगवते नमस्ते आत्मविनाय
38:23
Speaker A
गुण संग विवर्जिताय मुक्तात हृदय परिभाविताय ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय य धर्म काम विमा भजंत गति मावते किशोरा देह करो विक्षणम एकिस कंचन वंछ भगवत प्रपन अतम तितम सुमंगलम गायंत आनंद समुद्र मग तमरम ब्रह्म पर्यक्त माध्यात्मिक योगगम्यम अत्वा दूर
39:16
Speaker A
मनंत माध्यम परिपूर्ण य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोका चराचर नाम रूप विभदे कलया यथार्थ भस्त निर तथा संप्रो बुद्ध मन खान शरीर सर्ग स देवा सुरम न शंडो नपमान जंतु नस चासन निषध शेषो जता जीना मुया की मंत्र भयो्या
40:06
Speaker A
[घंटी की आवाज़] इच्छाम काले नस विप्लव तसत्म लोकावरस मोक्षम सोहम विश्वमजम विश्वम विश्वम विश्व वेदसम विश्वात्मा मनजम ब्रह्मा प्रणतोस्म परम पदम योगित करणो ह योग विभाविते योगोम प्रप पश्चती योगेशम नमोह नमो नमस्तुमसवेग शक्ति त्रया खिलधाय प्रपन पाला दर शक्तय कदणा मनवाने
40:48
Speaker A
नाय वेदसात्म यक्ष धियातम तत्मम भगवंतमित श्री व्यास कृ पितत्रम जा बालवाच गुरु व महा भाग वेदस जगत गुरु गुरु तारतम्य कस्मात किंग फल मुच्छते व्यास वाच माता पिता गुरु श्रेया जेष्ठ भ्राता पिताम ससुर मातुलसव तथा माता महस्मत पिंतु जेष् कनिष्ठस
41:38
Speaker A
भ्राता जेष्ठा निजस पितु स्वसा जन्यास स्वसा गुरुजन स्मृता पत्न पिता महा दीनना तथ गुरु स्मृता हेतु सुह पिता श्रेया गुरुरेव महा गुरु पिता पिता धर्म पिता स्वर्ग पिता ही परम तप पितरी प्रतिमा पने प्रियते सर्व देवता पित्थ पुण्य करण कुरत सर्तता
42:17
Speaker A
तेतोम कुरवा वसीते यत पीतरम यस्तु क्रत पुण्य चकारयत सप्त फलम कोटिमा संशयत्रम विष्णवे ब्रह्मणितम नाभ पद्मभव येना तितम सतम श्री रुच कृत्रम रुचवा अर्चित नाम पित नाम दिव्य तेजस नमस्याम सदा तेशाम ध्यान नाम दिव्य चक्षुशा इंद्राद नाम चनेतारो
43:08
Speaker A
दक्षमारी चथा सप्तशणा तथा ताम नमस्याम कामदा मनद नाम मुनि सूर्या चंद्रस तथा तान नमस्याम सर् पित नप्स दधाव नक्षत्रणा ग्रहणा चसथा दवा प्रीति तथा तानम्याम कृतंजलि देवणा जनोक नमता अ सदा दातिम नमस्याम कृतंजलि प्रजापते कश्यपाय सोमााय वरुाय च
43:57
Speaker A
योगेश्वर सदा नमस्याम कृतंजलि नमो गभ सप्तभ्या तथा सप्तस स्वयंभ नमस्याम ब्रहण योग चक्षुसे सोमा पित गण योग मूर्त ध नमस्याम सदा सोमम पितरम जागता अग्न रूपथवा नमस्याम प्रता अग्नि सोमय विश्वम यत तदत येत ते चते सोम सूर्य अग्नि मूर्त जगत
44:41
Speaker A
स्वरूप तथा ब्रह्म स्वरूपण ते खिलेभ्य योगभ्य पित यत मानस नमो नमो नम प्रसंतु सदा भुज श्री ब्रह्मा कृतम पितत्रम ब्रह्मो वाच ओम नमः पित्रे जन्मदात्रे सर्व देवमय च सुखदाय प्रसन्नाय सुप्रीताय महात्मने सर्वज्ञ स्वरूपाय स्वर्गााय परमेष्िने सर्व तीर्थवोकाय करुणा सागराय च नमः सदा सुतोषाय
45:30
Speaker A
शिव रूपायते नमः सदा पराधम सुखाय सुखदाय च दुर्लभ मानुषदम ये लब्ध मयापहु संभावनीयम धर्मार्थे तस्म पित्रे नमो नमः तीर्थम स्नानम तपो हो जयास महा गुरु गुरुवे तस्मै पित्रे नमो नमः यस प्रणाम कोटि पित तपणम अमेल्यम तस्मै पित्रे नमो नमः इदमत्रम पितु पूर्णम
46:14
Speaker A
यह पतो नर प्रत्यु पित श्राद्ध स्व जन्म दिवसे साक्षात पितुरवा न तस दुर्लभम कििंच सर्वज्ञता दिवम नानाम कृत्या यस्तो पितम सुत सधम प्रीतिव प्रायश्चितम सुखी भवे पितु प्रीति करो नित्यम सर्व कर्मा यथ इति ब्रह्मा कृतम पित पित स्तोत्रम
46:54
Speaker A
संपूर्णम स्वधा स्तत्रम ब्रह्मवाच स्वधारण मात्रण तीर्थए भवे नर मोचते सर्व पापे वाजपेय फलम लभ स्वधा स्वधा स्वधवम यदि वत्रयम स्मरे श्राद्धस फलमा ते कालस तर्पणस श्राद्ध काले स्वधाम यणो समाहित लभ नाम च पूर्णमेव न संशय स्वधा स्वधा स्वधवम
47:42
Speaker A
त्र पठ नर प्रिया विनीताम सभ स्वा पुत्रम गु ितम पितणा प्राण तुल्यम द्विज जीवन रूप श्रद्धा देवी च श्रद्धा दी नाम फल प्रदा बहि मन मनस पितणा तष्ट हेतवे संपतय द्वजाती नाम गणा वृद्धि हेतवे नित्यात नित स्वरूपा से
48:21
Speaker A
गुण रूपास सुते अविभाव भाव सष्टो च प्रलय तवा ओम स्वस्त नमः स्वाहा स्वधाम दक्षिणा तथा निरूपिता चतुरदेव स प्रशस्त करणा पूरा स्वधा गोपी गोलोके राधिका सखी घतोस स्वधा कृतम ते स्वधावा मुक्त ब्रह्मा ब्रह्म लोके संसदे त सहसा स्वधा सावभव
49:06
Speaker A
तदा प्रभ्य प्रदो तामेव कमल नाम ताम सम्राप्य यज पीतरस प्रिता स्वधाम पूर्ण्यमणो समाहित सहसात सर्व ती वेद पाठ फलम लभ इति ब्रह्मवर महापुराण प्रकृति खंडे ब्रह्मा कृतम स्वधाम संपूर्णम ॐ पितृभ्यो नमः श्री पित्री क्षमा प्रार्थना स्तोत्रम नमः पित्र गणेशाय
49:52
Speaker A
सर्व लोक पितामह भव पूजितो नित्यम त्रम बंधनात यद कृतम पापम जन्म जन्मांतरे च तत्स सर्वम क्षम्यताम देवा मात पित्री पुरोगमा श्राद्ध व्रत तपो होमा दान भोग विवर्जिता संतु में पित सर्वे मोदता स्वकांगहे पित लोकगत सर्वे माता पुरोगम आगत गमेधम
50:36
Speaker A
कृपाम कुरवंतु नित्यस यद अनम यतम दत्तम यतपणहा तना पित सर्वे तृप्त माया नित्यदा अन्यथा यया कार्य विस्मृतम तद अनुग्रहात तत प्रसादे में पित्रे छंतव्या पराधीन पित सर्व देव कुल नाम रक्षणाय च प्रसदंतु सदा भक्त स्मिता नाम च महर्षय
51:18
Speaker A
पित्यो नम सर्वे मातभ्यो गुरु पूजते क्षमा दत्त्वा च सर्वेशा सुखम दत्तम मय प्रभु कृपया पितर सर्वे दोषान मुक्त यथारणम आशीर्वादंतु नित्यम में मोक्ष लाभ भूष ओम पित पित्यो नमः विस्मृत्य वंश देवाय लजया संस्थितोहम क्षम्यता में महान दोषो माताम पिताम
52:01
Speaker A
पित्य प्रणमाम सर्व देवा समासयात यत कृत्यम कृतम पापम तदक्षमसाघया आयुषम स्वास्थ संपत्ति संता सुखमेव दत्तम पित नित्यम स्माते नमोस्तुमे यदि दोष कृतो मोहात वसा मनसामया स्वप्ने जागतिवा सर्वम छम प्रिवृंदके तृप्त ददातुमे नित्यम पित यज्ञ समवित संत संतुष्टा पित सर्वे गहम में सुखमावत
52:50
Speaker A
विनयन प्रणम्याहम कृतांजलि पुटम पुनः दत्तम मोक्ष मगभ्यो ममव पिताम भूलम विग मोहस यदि सेवा नकतवा क्षम्यता में महान दोषो भव्य शरणम गतः कृपाम कुर तुम नित्यम पित सर्व देवता सर्व सोख्यानो में युत भक्तया शांतिम ददातुमे नित्यम गहमम चतरपणा
53:33
Speaker A
संतोषम पित सर्वे मोक्षम ददातु पूर्वज ओम पित्यो नमः
Topics:पितृ पक्षपितृ स्तोत्रभगवद्गीतापुरुषोत्तम योगमोक्षयोगकर्मभक्तिपितृ रक्षाआध्यात्मिक ज्ञान

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