डीएस ग्रुप की कहानी, जिसने पान मसाला की छोटी दुकान से ₹10,000 करोड़ का FMCG साम्राज्य बनाया।
Key Takeaways
- छोटी शुरुआत से बड़े सपने और मेहनत से बड़ा बिजनेस बनाया जा सकता है।
- ग्राहकों की पसंद और गुणवत्ता पर फोकस सफलता की कुंजी है।
- ब्रांडिंग और मार्केटिंग से उत्पाद की पहचान और लोकप्रियता बढ़ती है।
- बदलते बाजार और स्वास्थ्य जागरूकता के अनुसार बिजनेस मॉडल में बदलाव जरूरी है।
- डायवर्सिफिकेशन से कंपनी को स्थिरता और विकास मिलता है।
What the video covers
- 1929 में धर्मपाल और सतपाल ने दिल्ली के चांदनी चौक में पान मसाला की छोटी दुकान शुरू की।
- 1940 के दौरान कच्चे माल की कमी के बावजूद उन्होंने किसानों से सीधे सोर्सिंग शुरू की।
- 1946 में पहला स्टैंडर्डाइज्ड प्रोडक्ट जाफरानी पत्ती लॉन्च किया गया।
- 1958 में इंडिया का पहला ब्रांडेड चिंग टोबैको 'बाबा' लॉन्च हुआ।
- 1983 में रजनीगंधा पान मसाला लॉन्च कर पान मसाला को प्रीमियम ब्रांड बनाया गया।
- 1990 के दशक में हेल्थ अवेयरनेस बढ़ने पर टोबैको बिजनेस घटाकर FMCG सेक्टर में डायवर्सिफिकेशन किया।
- कैच, पासपास, चिंगल्स जैसे नए प्रोडक्ट्स के साथ कंपनी ने तेजी से विस्तार किया।
- 2014 तक डीएस ग्रुप का रेवेन्यू लगभग ₹4800 करोड़ पहुंच गया।
- पल्स कैंडी ने कैंडी मार्केट में 1/3 हिस्सेदारी हासिल की।
- डीएस ग्रुप ने टोबैको से हटकर मॉडर्न डायवर्सिफाइड FMCG पावरहाउस बनने का सफर तय किया।
Chapters
- 00:00डीएस ग्रुप की शुरुआत और पान मसाला की दुकान
- 00:54मुश्किल दौर और कच्चे माल की कमी
- 02:38मैन्युफैक्चरिंग यूनिट की स्थापना और स्टैंडर्डाइजेशन
- 04:17पहला ब्रांडेड प्रोडक्ट और वितरण चुनौतियाँ
- 05:10बाबा चिंग टोबैको और कंपनी का विस्तार
- 06:08रजनीगंधा का लॉन्च और ब्रांडिंग
- 07:58टोबैको से FMCG में डायवर्सिफिकेशन
- 09:49नए प्रोडक्ट्स और कंपनी की आधुनिक पहचान
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Speaker A
पान की गुमटी पर बैठने वाले इन दो लोगों ने कैसे खड़ी कर दी 10,000 करोड़ की एंपायर। असल में यह कारनामा कर दिखाया है धर्मपाल और उनके बेटे सतपाल जी ने, जिन्होंने डीएस ग्रुप की शुरुआत की थी। अरे भाई, डीएस ग्रुप नहीं पता तो फिर आप
Speaker A
पल्स कैंडी, पासपास, रजनीगंधा, बाबा इलायची और कैच मसाले को तो जानते हैं ना? जी हां, तो यही ग्रुप है जो कि इन्हें बनाती है और आज 200 से भी ज्यादा प्रोडक्ट्स इनके पोर्टफोलियो में शामिल हैं। लेकिन अब सवाल
Speaker A
यह उठता है कि चांदनी चौक की एक छोटी सी पान मिश्री की दुकान से उठकर डीएस ग्रुप 10,000 करोड़ का एफएमसीजी एंपायर कैसे बन गई? यह कंपनी करती क्या है? और आखिर ऐसा क्या हुआ कि इसे अपने टोबैको बिजनेस को
Speaker A
100% से घटाकर 10% के भी नीचे लाना पड़ गया। चलिए जानते हैं डीएस ग्रुप की पूरी कहानी। तो दोस्तों, कहानी की शुरुआत होती है 1929 से, जब भारत अंग्रेजों के शासन में था और तरह-तरह के अत्याचारों के साथ लोग महंगाई
Speaker A
और बेरोजगारी की भी मार झेल रहे थे। उसी मुश्किल समय में दिल्ली के चांदनी चौक में धर्मपाल जी और उनके बेटे सतपाल अपनी छोटी सी पान मसाला की दुकान की शुरुआत करते हैं। अब दुकान भले ही छोटी थी। रिसोर्सेज
Speaker A
बेहद कम थे, फिर भी यह उन बाप बेटों के लिए पान शॉप से कहीं ज्यादा एक टेस्ट लैब बन गई थी। जहां धर्मपाल और सतपाल अपने ग्राहकों को ऑब्जर्व करते, उनकी पसंद पूछते और फिर घंटों बैठकर अलग-अलग इंग्रेडिएंट्स के साथ में एक्सपेरिमेंट
Speaker A
करते रहते। उनका मकसद बिल्कुल साफ था, सौंफ मिश्री और टोबैको ब्लेंड से एक ऐसा स्वाद बनाना जो कि बाकी सबसे अलग और प्रीमियम लगे। धीरे-धीरे लोगों को भी यह फर्क महसूस होने लगा और फिर वर्ल्ड ऑफ माउथ से उनकी
Speaker A
दुकान की पॉपुलरिटी इतनी हो गई कि चांदनी चौक की इस छोटी सी दुकान का नाम दिल्ली के बाहर तक जाने लगा। लेकिन 1940 का टाइम इनके लिए काफी मुश्किल साबित हुआ क्योंकि उस टाइम वर्ल्ड वॉर टू चल रहा था और उसका
Speaker A
असर भारत की भी इकॉनमी पर पड़ रहा था। पूरे बाजार में रॉ मटेरियल्स की भारी कमी होने लगी, जिसका नतीजा यह हुआ कि उस दौर की सारी छोटी दुकानें हमेशा के लिए बंद हो गई। अब यही मुश्किल धर्मपाल और सतपाल के
Speaker A
भी सामने आ खड़ी हुई। दुकान का स्टॉक तेजी से खत्म हो रहा था। सप्लाई लगभग रुक चुकी थी और कई बार ग्राहकों को खाली हाथ ही वापस लौट जाना पड़ता था। लेकिन फिर जब यह समस्या महीनों तक चलती रही तो दोनों ने
Speaker A
फैसला किया कि अब वह सप्लायर्स पर डिपेंडेंट नहीं रहेंगे बल्कि खुद ही रॉ मटेरियल्स ढूंढकर लाएंगे। इसके लिए उन्होंने सीधे किसानों से कांटेक्ट किया और मिडिलमैन को हटाकर मटेरियल्स की सोर्सिंग डायरेक्ट करनी शुरू कर दी। जिसका असर यह हुआ कि जहां इनके बाकी
Speaker A
कॉम्पिटिटर्स का व्यापार मंदा पड़ा हुआ था, वहीं इनके पान, टोबैको, ब्लेंड और सौंफ मिश्री की बिक्री काफी ज्यादा बढ़ गई। और फिर 1940 आते-आते इनके स्वाद की पहचान लोगों की जुबान पर चढ़ गई। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें एक बड़ी रियलिटी समझ आई
Speaker A
कि हाथ से हर मसाला एक बराबर मिलाते रहना बढ़ती डिमांड के साथ में अब पॉसिबल नहीं था। उन्हें समझ आ गया था कि अगर बिजनेस को आगे बढ़ाना है तो फिर टेस्ट को स्टैंडराइज करना पड़ेगा। यहीं से एक नया आईडिया आया
Speaker A
कि क्यों ना सब कुछ हाथ से करने के बजाय एक छोटा सा मैन्युफैक्चरिंग सेटअप शुरू किया जाए। अब आज यह बात नॉर्मल लग सकती है, लेकिन उस समय पान मसाला का पूरा मार्केट अनऑर्गनाइज्ड था। सब कुछ खुले पाउच में बिकते थे। कोई हाइजिंग स्टैंडर्ड
Speaker A
नहीं और ना ही कोई ब्रांडिंग। ऐसे में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने का आईडिया काफी अजीब लगता था। और दोस्तों, इस जर्नी का सबसे बड़ा स्ट्रगल यह था कि उनके पास कोई रोड मैप ही नहीं था कि पान मसाला को
Speaker A
आखिर ब्रांड कैसे बनाते हैं। ना यह पता था कि पैकेजिंग कैसी होनी चाहिए, मशीन कौन सी लगानी चाहिए या फिर डिस्ट्रीब्यूशन कैसे होगा। लेकिन किसी को तो शुरुआत करनी ही थी ना। जल्दी दुकान के पीछे एक छोटी सी जगह
Speaker A
साफ की गई। कुछ पुराने डिब्बे हटाए गए और वहीं उनका छोटा सा एक्सपेरिमेंटल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट शुरू हुआ जिसे लोग धर्मपाल सत्यपाल सुगंधी फैक्ट्री कहने लगे और आगे चलकर यही नाम डीएस ग्रुप के रूप में पूरे देश में जाना गया। अब दोस्तों
Speaker A
फैक्ट्री तो शुरू हो गई थी लेकिन असली चुनौती अब स्टार्ट हुई क्योंकि कभी मिक्सचर बिल्कुल परफेक्ट बनता तो कभी अगले ही दिन टेस्ट थोड़ा सा चेंज हो जाता था। कई बार घंटों मेहनत करके पूरा बैच तैयार होता लेकिन धर्मपाल जी सिर्फ स्मेल करके
Speaker A
बोल देते थे, इसमें वह बात नहीं है। यह मार्केट में नहीं जाएगा और फिर पूरा बैच ही फेंक देना पड़ जाता था। लोग हैरान थे कि धर्मपाल जी आखिर कर क्या रहे हैं?
Speaker A
लेकिन उन्हें पता था कि अगर एक बार टेस्ट बिगड़ गया ना तो फिर सालों का बनाया ट्रस्ट चला जाएगा। और फिर इस तरह आखिरकार कई सारे एक्सपेरिमेंट्स के बाद 1946 में डीएस ग्रुप का पहला स्टैंडर्डाइज प्रोडक्ट तैयार हुआ, जाफरानी पत्ती, जो कि आगे चलकर
Speaker A
जाफरानी पत्ती 120 के नाम से फेमस हुआ। अब प्रोडक्ट तैयार था, पैकेजिंग भी हो चुकी थी, लेकिन असली दिक्कत आई डिस्ट्रीब्यूशन में। डिस्ट्रीब्यूटर्स ने यह कहकर मना कर दिया कि पान मसाला भाई, पैकेट में कौन खरीदेगा?
Speaker A
लोग तो इसे खुला ही पसंद करते हैं। ऐसे में डिस्ट्रीब्यूटर्स को मनाने की बजाय दोनों भाइयों ने सीधे रिटेल शॉप्स को ही टारगेट करना शुरू कर दिया। वह खुद चांदनी चौक, सदर बाजार, कश्मीरी गेट जैसे बाजारों में जाकर दुकानदारों से मिलने लगे।
Speaker A
हालांकि रिटेलर्स भी उनका प्रोडक्ट देखकर हिचकिचा ही रहे थे। लेकिन तभी सत्यपाल जी ने एक सिंपल सा ऑफर दिया कि आप बस कुछ पैकेट अपने काउंटर पर रख लीजिए। अगर नहीं बिकेंगे तो हम वापस लेकर जाएंगे। और फिर
Speaker A
जब इतना आश्वासन दे दिया तो फाइनली रिटेलर्स भी मान गए। और फिर इसके बाद जो भी ग्राहक दुकान पर आता, वह जाफरानी पत्ती की खुशबू और उसकी साफ सुथरी पैकेजिंग तुरंत नोटिस करने लगता था। एंड जब लोगों ने इसे टेस्ट किया तो इसका अरोमा और
Speaker A
फ्लेवर उनके दिल को छू गया। जिसकी वजह से देखते ही देखते यह प्रोडक्ट लोकल कस्टमर्स के बीच में सुपरहिट हो गया। इस सक्सेस से सत्यपाल जी का कॉन्फिडेंस और ज्यादा बढ़ गया। जिससे आगे एक्सपेरिमेंट करते हुए 1958 में उन्होंने इंडिया का पहला
Speaker A
ब्रांडेड चिंग टोबैको लॉन्च किया, बाबा। और दोस्तों, यह प्रोडक्ट इंडस्ट्री के लिए गेम चेंजर साबित हुआ। क्योंकि इसका रिफाइंड टेस्ट और स्ट्रांग अरोमा लोगों को इतना पसंद आया कि बहुत ही जल्द यह पूरे देश का स्टार प्रोडक्ट बन गया। और इस तरह
Speaker A
से 1960 के एंड तक चांदनी चौक की वो छोटी सी दुकान अब तेजी से बढ़ती हुई कंपनी बन चुकी थी। फिर आया 1970 और 80 का टाइम, जब भारत में एक नया सेगमेंट तेजी से उभर रहा था। पान मसाला इंडस्ट्री का। ट्रेडिशनल
Speaker A
पत्ते वाला पान अब धीरे-धीरे यंग और ऑफिस जाने वाले लोगों के बीच में कम पॉपुलर हो रहा था क्योंकि यह टाइम कंज्यूमिंग होने के साथ-साथ काफी मेसी भी था। यहीं से पान मसाला एक मॉडर्न अल्टरनेटिव बनकर सामने आया, जो कि सुपारी, कत्थ, चूना और इलायची
Speaker A
जैसे इंग्रेडिएंट्स का एक ड्राई मिक्सचर होता था। डीएस ग्रुप ने इस बदलते हुए टेंट को देखते हुए सोचा कि पान मसाला तो सभी बना रहे हैं भाई। क्यों ना हम इसमें कुछ प्रीमियम ऑफर करें जो कि टेस्ट में
Speaker A
सुपीरियर हो, फ्रेगेंस में रिच हो और ऐसा फील दें कि पान मसाला भी क्लासी हो सकता है। और फिर इसी विजन के साथ 1983 में डीएस ग्रुप ने अपना आइकॉनिक प्रोडक्ट रजनीगंधा पान मसाला लॉन्च कर दिया। लेकिन लॉन्च के
Speaker A
बाद उन्हें तुरंत समझ आ गया कि अगर रजनीगंधा को बाकी पान मसाला से अलग दिखाना है तो फिर हमें एडवरटाइजमेंट पर जोर देना पड़ेगा। उस समय पान मसाला की दुनिया में ग्लैमर एडवर्टाइजमेंट लगभग न के बराबर थी। फिर भी डीएस ग्रुप ने रिस्क लिया और
Speaker A
बॉलीवुड एक्टर अविनाश वधावन और शिख स्वरूप के साथ अपना पहला बड़ा कैंपेन लॉन्च किया, स्वाद रजनीगंधा का सबसे निराला। यह कैंपेन इतना पॉपुलर हुआ कि पूरी कैटेगरी का ही परसेप्शन बदल गया। एड्स में रजनीगंधा को खुले पार्क में टहलते, ड्राइव पर जाते और
Speaker A
बेफिक्र होकर लाइफ एंजॉय करते लोगों के साथ में दिखाया गया। हर फ्रेम यह एहसास दिलाता था कि रजनीगंधा सिर्फ स्वाद नहीं देता बल्कि जिंदगी में फ्रेशनेस और खुशी को भी जोर देता है। इस फ्रेश और फन से भरे
Speaker A
प्रेजेंटेशन ने कैटेगरी की पूरी इमेज बदल दी और रजनीगंधा को टेस्ट से आगे बढ़ाकर एक लाइफस्टाइल सिंबल बना दिया। जिसके चलते 1990 में आते-आते रजनीगंधा की पॉपुलरिटी काफी ज्यादा बढ़ चुकी थी। और इस सक्सेस के साथ ही डीएस ग्रुप भी नई ऊंचाइयों पर
Speaker A
पहुंच गया था। लेकिन दोस्तों, कई बार सफलता के साथ-साथ चैलेंजेस भी आते हैं और डीएस ग्रुप के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ क्योंकि वह इतनी बड़ी कंट्रोवर्सी में घिर गया कि उसे अपने कोर बिजनेस को रिड्यूस करके एफएमसीजी सेक्टर का रुख करना पड़
Speaker A
गया। असल में 1990 के मिड में हेल्थ डिबेट्स अचानक तेज होने लगे थे। टोबैको को लेकर हेल्थ अवेयरनेस काफी तेजी से बढ़ रही थी। मेडिकल रिसर्च, एनजीओस और मीडिया ने चबाने वाले तंबाकू को हाई रिस्क कैटेगरी में रखना शुरू कर दिया था और यहीं से डीएस
Speaker A
ग्रुप के लिए मुश्किलें शुरू हो गईं क्योंकि कंपनी की रेवेन्यू का बड़ा हिस्सा इसी सेगमेंट से ही आता था और हां, भले ही रजनीगंधा पूरी तरह से टोबैको फ्री था, फिर भी पब्लिक परसेप्शन में लोग उसे अक्सर टोबैको प्रोडक्ट के साथ ही जोड़ देते थे
Speaker A
और फिर इस कंफ्यूजन ने ब्रांड इमेज को काफी नुकसान पहुंचाया और फिर जैसे-जैसे अवेयरनेस बढ़ी वैसे-वैसे सरकार पर
Speaker A
तो कहीं पूरी तरह से। साथ ही कंपनियों के लिए पैकेजिंग पर बड़े-बड़े वार्निंग लेबल लगाना भी जरूरी हो गया था। एडवरटाइजिंग पर भी सीमाएं लगने लगी और मास मीडिया में ऐसे प्रोडक्ट को ओपनली प्रमोट करना मुश्किल होने लगा। यही सब देखकर डीएस ग्रुप ने
Speaker A
सोचा कि अगर समय रहते बिजनेस मॉडल नहीं बदला तो फिर ग्रोथ रुक सकती है। यहीं पर डीएस ग्रुप की नई जनरेशन रविंद्र कुमार और राजीव कुमार ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि कंपनी धीरे-धीरे टोबैको पर अपनी डिपेंडेंसी कम करेगी और
Speaker A
लॉन्ग टर्म में इसे 10% से भी नीचे लेकर आएगी। साथ ही उन्होंने अपने बिजनेस को ऐसे एरियाज में ले जाने की सोची जहां लॉन्ग टर्म ग्रोथ भी हो और ब्रांड की इमेज भी साफ-सुथरी रहे। पर ऐसे में एफएमसीजी से
Speaker A
बेहतर क्या ही हो सकता था? एफएमसीजी एक ऐसा सेक्टर है जहां डिमांड कभी नहीं रुकती क्योंकि यह रोज इस्तेमाल होने वाले प्रोडक्ट्स होते हैं। लोग इन्हें बार-बार खरीदते हैं और इसीलिए इसकी सेल्स भी लगातार बढ़ती रहती है। ऊपर से इंडिया की
Speaker A
बढ़ती पॉपुलेशन और बढ़ते कंजमशन की वजह से ऑलरेडी यह फास्ट ग्रोइंग सेक्टर था। और हां, कमाल की बात तो यह थी कि डीएस ग्रुप ने डायवर्सिफिकेशन की शुरुआत पहले से ही करनी शुरू कर दी थी। जब उन्होंने कैच
Speaker A
ब्रांड के तहत अपना एफएमसीजी प्रोडक्ट 1987 में ही ल्च कर दिया था। लेकिन इसको उन्होंने बहुत सीरियसली शुरू नहीं किया था। यह उस समय कुछ नया आजमाने की बस एक एक्स्ट्रा कोशिश थी। लेकिन 1999 डीएस ग्रुप के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित
Speaker A
हुआ। क्योंकि यहीं से इन्होंने बड़े लेवल पर तंबाकू से हटकर नए सेक्टर्स में डायवर्सिफिकेशन शुरू किया। पहले तो इन्होंने कैच नेचुरल स्प्रिंग वाटर ल्च किया। फिर पासपास जैसा रेवोल्यूशनरी प्रोडक्ट। लेकिन साल 2000 के बाद से डीएस ग्रुप ने काफी तेजी से और कई सारे नए-नए
Speaker A
बिजनेस में एंट्री लेना शुरू कर दिया। जैसे नैनीताल में मनु महारानी लग्जरी होटल खोला। स्विट्जरलैंड बेस्ड कंपनी के साथ पार्टनरशिप करके डीएस कैन पैक पैकेजिंग यूनिट शुरू की। जहां फ़ूड और स्नैक्स प्रोडक्ट्स के लिए मॉडर्न सिलडिकल कैन बनाए जाते हैं। कैच मसाले को बेवरेजेस तक
Speaker A
बढ़ाया और सैंडलवुड प्लांटेशन और मॉडर्न फार्मिंग जैसे सेक्टर्स में जाकर धीरे-धीरे टोबैको पर अपनी डिपेंडेंसी कम करने लगा। हालांकि इस टाइम पर भी डीएस ग्रुप की ज्यादातर कमाई टोबैको से ही आती थी। लेकिन बढ़ते रेगुलेशंस और हेल्थ अवेयरनेस को देखकर कंपनी समझ चुकी थी कि
Speaker A
इस बिजनेस पर हमेशा निर्भर रहना सही नहीं होगा। इसी वजह से 2011 के बाद उन्होंने तेजी से एफएमसीजी और दूसरे सेक्टर्स में भी डायवर्सिफाई करना शुरू कर दिया। जैसे कि राजस्थान में डेयरी यूनिट खरीदी, चिंगल चिंगम ल्च किया और कैश ब्रांड को बेसिक
Speaker A
स्पाइसेस से लेकर ब्लेंडेड मसालाज़ और टेबल टॉप स्प्रिंकल्स तक एक्सपेंड कर दिया। और फिर धीरे-धीरे कैच पासपास और चिंगल्स जैसे ब्रांड हर घर में ही पहचाने जाने लगे। और फिर 2014 तक DS ग्रुप का रेवेन्यू करीब 4800 करोड़ तक पहुंच गया था। जिसमें
Speaker A
टोबैको का हिस्सा सिर्फ 25% रह गया था। यानी कि अब बिल्कुल क्लियर था कि डीएस ग्रुप धीरे-धीरे टोबैको कंपनी से एक मल्टी कैटेगरी एफएमसीजी पावर हाउस बन रहा था। इसी दौरान 2015 में डीएस ग्रुप ने अपना एक आइकॉनिक प्रोडक्ट ल्च किया पल्स कैंडी और
Speaker A
यह कुछ ही महीनों में पूरे देश में हिट हो गई। इसका यूनिक फ्लेवर और सडन टंगी ब्रस्ट लोगों को बहुत पसंद आया। कैंडी मार्केट जो सालों से एक ही टेस्ट पर चल रही थी। Puls ने आकर पूरी कैटेगरी को ही रिडफाइन कर
Speaker A
दिया। 2016 की शुरुआत तक लॉन्च के सिर्फ 8 महीनों में ही Puls कैंडी ने ₹100 करोड़ की सेल्स को पार कर ली थी और यह अचीवमेंट सिर्फ ₹1 की कैंडी के लिए बहुत बड़ा था। वह भी बिना किसी एडवर्टाइजमेंट के। 2017
Speaker A
तक पल्स भारत का नंबर वन कैंडी बन चुका था। जिसने उस साल ₹326 करोड़ का रेवेन्यू दर्ज किया और सिर्फ 2 साल में उसने कैंडी मार्केट का 1/3 हिस्सा अपने कब्जे में कर लिया। 2018 से 2021 के बीच डीएस ग्रुप ने
Speaker A
तुलसी रॉयल खजूर प्लस बाबा ब्लैक सुपारी केवल मसाले और पल्स नटकारे जैसे कई सारे प्रोडक्ट्स ल्च करके अपने एफएमसीजी पोर्टफोलियो को और मजबूत कर लिया। 2025 तक डीएस ग्रुप ने यह साबित कर दिया कि उसकी ट्रांसफॉर्मेशन सिर्फ शब्दों में नहीं
Speaker A
बल्कि रिजल्ट्स में भी नजर आती है। आज डीएस ग्रुप 10,000 करोड़ का रेवेन्यू क्रॉस कर चुका है और कंपनी का ऐ है कि इसे बढ़ाकर वह 2030 में ₹000 करोड़ तक कर लेंगे। फिलहाल इस ₹10,000 करोड़ के रेवेन्यू में फूड एंड बेवरेजेस ने 42%,
Speaker A
माउथ फ्रेशनर्स ने 38% और हॉस्पिटिटी ने 3% कंट्रीब्यूट किया है। और दोस्तों, टोबैको जो कभी डीएस ग्रुप की पहचान था और रेवेन्यू का 80 से 90% लाता था, अब वह घटकर सिर्फ 10% रह गया है। और इससे यह
Speaker A
बिल्कुल साफ दिखता है कि डीएस ग्रुप ने अपनी आइडेंटिटी पूरी तरह से बदल दी है। और अब वह एक टोबैको ड्रिवन कंपनी से उठकर मॉडर्न डायवर्सिफाइड एफएमसीजी पावर हाउस बन चुका है। और दोस्तों इस बदलाव का रीजन सिर्फ नए सेक्टर्स में एंटर करना और नए-नए
Speaker A
प्रोडक्ट्स ल्च करना नहीं है। बल्कि इसे सफल बनाने के लिए डीएस ग्रुप ने पूरे देश में एक बेहद मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क खड़ा किया है। जिसमें आज 150 सुपर स्टॉक, 5000 प्लस डिस्ट्रीब्यूटर्स और 1.5 मिलियन डिटेल आउटलेट शामिल हैं। और दोस्तों, सबसे
Speaker A
इंटरेस्टिंग बात यह है कि यह पूरी ग्रोथ बिना किसी बड़े शोरशराबे के हुई है। डीएस ग्रुप कभी भी पीआर पर डिपेंडेंट रहा ही नहीं। यही वजह है कि उसे इंडिया का साइलेंट जॉइंट कहा जाता है। एक ऐसी कंपनी
Speaker A
जो शांति से बिना स्पॉटलाइट की चाहत के अलग-अलग सेक्टर्स में मजबूती से अपना बिजनेस खड़ा करती रहती है और यही इस कंपनी की सबसे खूबसूरत बात भी है क्योंकि ट्रांसफॉर्मेशन तब सबसे मजबूत होता है जब वह लाउड नहीं होता और उसके रिजल्ट पूरे
Speaker A
बाजार को सुनाई देते
Topics:डीएस ग्रुपपान मसालारजनीगंधाटोबैको बिजनेसFMCGकैच मसालेपासपासपल्स कैंडीब्रांडिंगबिजनेस स्टोरी











