Ustad Molana Waseem Raza Subhani ||#part1|| (شرح دعاء ا… — Transcript

मौलाना वसीम रज़ा सुब्हानी द्वारा दुआए सहर की इरफानी व्याख्या और तौहीद की गहन समझ।

Key Takeaways

  • दुआए सहर की इरफानी व्याख्या आध्यात्मिक गहराई प्रदान करती है।
  • हजरत इमाम के असर को समझना तौहीद की सही समझ के लिए आवश्यक है।
  • कुरान और अहले बाइट के बयानात तौहीद की बुनियाद हैं।
  • इरफानी इस्तलाहात को सरल भाषा में प्रस्तुत करना जरूरी है।
  • वहदतुल वजूद और तौहीद के बीच स्पष्ट अंतर को समझना आवश्यक है।

Summary

  • मौलाना वसीम रज़ा सुब्हानी ने दुआए सहर की इरफानी व्याख्या प्रस्तुत की।
  • उन्होंने हजरत इमाम के असर और शरह को उर्दू भाषा में समझाने का प्रयास किया।
  • शरह में तौहीद की गहन और कुरानी व्याख्या पर जोर दिया गया।
  • इरफान और तसव्वुर के कठिन पहलुओं को सरल बनाने की कोशिश की गई।
  • वहदतुल वजूद और तौहीद के बीच के अंतर को स्पष्ट किया गया।
  • कुरान मजीद और अहले बाइट के बयानात के संदर्भ दिए गए।
  • मौलाना ने इरफानी इस्तलाहात की मुख्तसर वजाहत का आश्वासन दिया।
  • शरह में तर्क और तजवीज के साथ गहरे आध्यात्मिक विषयों को समझाया गया।
  • वहाबियत के तसव्वुर और इस्लामी तौहीद के बीच के मतभेदों पर चर्चा हुई।
  • जलसों की श्रृंखला में इस विषय को विस्तार से समझाने का इरादा जताया गया।

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00:01
Speaker A
बिस्मिल्लाह रहमान रहीम। वही नस्त हु रनास न व सल्लल्लाह अला मोहम्मद वा तारीन परवरदिगार आलम के लुत्फ करम से एक मर्तबा फिर माहे मुबारक रमजान की सहादत से मुशर्रफ हो रहे हैं। गुजرتा दो-तीन सालों से बाज अजीजनगर किए।
00:53
Speaker A
जाए मामूला उन अजीज को वादा देता रहा इंशा अल्लाह कोई वक्त मुनासिब आए कुछ फुर्सत मिले तो दुआए सहर के बारे में कुछ अराइज पेश करें इस बारे में बहुत ज्यादा तामुल किया आखिर में इसी नतीजे पर पहुंचे के दुआए सहर
01:18
Speaker A
जाए मामूला उन अजीज को वादा देता रहा। इंशा अल्लाह कोई वक्त मुनासिब आए, कुछ फुर्सत मिले तो दुआए सहर के बारे में कुछ अराइज पेश करें। इस बारे में बहुत ज्यादा तामुल किया, आखिर में इसी नतीजे पर पहुंचे के दुआए सहर।
01:46
Speaker A
दुआए सहर बयान ही कर रहे हैं तो फिर जो तलबी का अंदाज है उसी अंदाज में हजरत इमाम की यह जो शर दुआ सहर है उसको बयान करें यानी मता जिब की तौजी भी दें और हजरत इमाम की इबारा की तदब भी करें हमारे पास मुझे
02:10
Speaker A
की जो बेहतरीन शर इमाम राहिल नवर अल्ला मरक शरीफ की है, क्यों ना उसी शर को बयान किया जाए। पहले मैंने कहा कि कुल्ली तरीके से फकत उसके मता को जिक्र करूं, लेकिन फिर बाज अजीज ने भी कहा कि अगर हजरत इमाम की शर।
02:35
Speaker A
बल्कि असलन यह माबास पेश ही नहीं किए गए इसीलिए हर कोई बंदा इस वादी में कदम रखने से डरता भी है लेकिन बहरहाल हौल कुवत इलाही का सहारा लेते हुए बिखरे हम चाहते हैं कि इन इरफानी मुत का भी आगाज
02:59
Speaker A
दुआए सहर बयान ही कर रहे हैं तो फिर जो तलबी का अंदाज है, उसी अंदाज में हजरत इमाम की यह जो शर दुआ सहर है उसको बयान करें। यानी मता जिब की तौजी भी दें और हजरत इमाम की इबारा की तदब भी करें। हमारे पास मुझे।
03:21
Speaker A
जाते हैं थक जाते हैं इस्लाह की वजाहत नहीं आती मतलब हाथ में नहीं आता हजरत इमाम क्या कहना चाहते हैं वो हाथ में नहीं आता लिहाज इस तबार से अगर देखा जाए तो यह हजरत इमाम का जो असर है शर दुआए सहर कि तकरीबन
03:41
Speaker A
नहीं मालूम फारसी जबान में तो बहुत ज्यादा काम हुआ है, बहुत ज्यादा बुजुर्गा है जो इन मौजू आत पर बेहतरीन तरीके से काम भी करते हैं, लेकिन उर्दू जबान में मामूल यह मफतीह कम रंग रहे। अच्छा कम रंग भी शायद कहना मुनासिब ना हो।
04:03
Speaker A
निहायत अहम असर है यानी मिस्बा उल हिदाय शायद खुदा वंदे मन्नान तौफीक दे तो फिर उस असर को भी हद्द अकल उर्दू जबान में इंसान तदरी की हद तक दर्स की हद तक पेश करे फिर हर एक की मर्जी है मुख्तलिफ अले जौक है जो
04:24
Speaker A
बल्कि असलन यह माबास पेश ही नहीं किए गए। इसीलिए हर कोई बंदा इस वादी में कदम रखने से डरता भी है, लेकिन बहरहाल हौल कुवत इलाही का सहारा लेते हुए बिखरे हम चाहते हैं कि इन इरफानी मुत का भी आगाज।
04:41
Speaker A
होने को मद्देनजर रखते हुए हमेशा तर्क नहीं किया जा सकता छोड़ा नहीं जा सकता आहिस्ता आहिस्ता हम आगाज करते हैं मुमकिन है बाज नुका इससे वाज हो जाए मुमकिन है बाज नुका वाजे ना हो आहिस्ता आहिस्ता जो बंदा इन मबाये तो बहरहाल नुका
05:03
Speaker A
किया जाए। बहुत सारे लोग हजरत इमाम के आसार को पढ़ते हैं, लेकिन क्योंकि हजरत इमाम के आसार मामूल इरफानी जबान में है, तो अक्सर हमारे जो हत्ता अहले जौक अफराद भी हैं, वह बेचारे मुताल करते करते खस्ता हो।
05:24
Speaker A
मुकम्मल इरफानी इस्लाह में बयान हुई है उन मताफ की तजी के लिए मैं बहुत ज्यादा तो नहीं बरहाल दो तीन जलसा में कोशिश करूंगा इरफान की इस्तल हात की मुख्तसर वजाहत पेश करूं दो तीन जलसा के अंदर अगरचे जाहिर सी
05:48
Speaker A
जाते हैं, थक जाते हैं। इस्लाह की वजाहत नहीं आती, मतलब हाथ में नहीं आता। हजरत इमाम क्या कहना चाहते हैं, वो हाथ में नहीं आता। लिहाज इस तबार से अगर देखा जाए तो यह हजरत इमाम का जो असर है शर दुआए सहर कि तकरीबन।
06:07
Speaker A
अंदर मुख्तसर तरीके से इरफानी इस्तल की वजाहत करू क्योंकि आप देखेंगे जब हम किताब में वारिद होंगे कुल्लन इसी इस्तल कालि में इस्तरा ढांचे में हजरत इमाम राहिल मता को जिक्र करते हैं तो बहरहाल तीन जलसा में दोती जलसा में इन कुल्ली इस्लाह की
06:33
Speaker A
यह कहते हैं कि हजरत इमाम का पहला इरफानी असर है। 27 साल की उम्र में उन्होंने इस असर को तहरीर किया लिखा। बल इंशाल्लाह कि अगर खुदा वंदे मन्नान ने तौफीक दी तो इमाम का जो इरफान के बारे में एक और असर है और।
06:58
Speaker A
देखें यह जो हजरत इमाम के आसार है यानी शर दो सहर या दूसरे आसार इन तमाम आसार की बुनियाद वहदत शख्स पर है यानी अहले मफत जो तौहीद बारी ताला की तस्वीर हमारे सामने पेश करते हैं उसी तौहीद के
07:27
Speaker A
निहायत अहम असर है, यानी मिस्बा उल हिदाय। शायद खुदा वंदे मन्नान तौफीक दे तो फिर उस असर को भी हद्द अकल उर्दू जबान में इंसान तदरी की हद तक दर्स की हद तक पेश करे। फिर हर एक की मर्जी है मुख्तलिफ अले जौक है जो।
07:49
Speaker A
को शायद उनकी सतह के मुताबिक समझाने के लिए किसी हद तक मेमार और इमारत की मिसाल देते हैं यानी एक बन्ना है एक बिना है एक इमारत बनाने वाला है और एक इमारत है इब्तिदा सतह पर हम लोग इस तरीके से तौहीद का तसव्वुर
08:13
Speaker A
अले जौक है मुमकिन है वो इन दुरू को सुने और जो बहुत ज्यादा वादी से शग नहीं रखता तो फिर इन दुरुस की तरफ नहीं जाएगा। लेकिन कहने का मकसद यह है कि मताफ की संगीन को मद्देनजर रखते हुए मता जिब के मुश्किल।
08:33
Speaker A
हदीद को देखें हुल अव्वल वल आखिर रवल बातन वहुवा ब कुली अलीम अव्वल वही है आखिर वही है जाहिर वही है बातिन वही है यानी तमाम हस्ती को जो अपने इते में लिए हुए है वह वुजूद हक है
08:57
Speaker A
होने को मद्देनजर रखते हुए हमेशा तर्क नहीं किया जा सकता, छोड़ा नहीं जा सकता। आहिस्ता आहिस्ता हम आगाज करते हैं। मुमकिन है बाज नुका इससे वाज हो जाए, मुमकिन है बाज नुका वाजे ना हो। आहिस्ता आहिस्ता जो बंदा इन मबाये तो बहरहाल नुका।
09:16
Speaker A
से मैं कोई जिक्र लूं मैं कोई तरबियती बराल जो सिलसिला होता है तो आपने मुझे जिक्र दिया कि इस तरीके से आप जिक्र करें फिर अल्लामा ने मुझसे पूछा कि यह कौन सा खुदा तो अल्लामा हसन जादे कहते हैं कि
09:34
Speaker A
इसी तरीके से वाज होते हैं। तो बहरहाल बहुत ज्यादा ल तोला अल्लाह के बाद परवरदिगार आलम से मदद चाहते हुए हजरत इमाम के इस असर का, यानी शर दुआए सहर का हम आगाज करते हैं। लेकिन जाहिर सी बात है कि शर दुआए सहर।
09:49
Speaker A
है कि देख वहाबियत में तो बिल्कुल रोशन है कि नमी दनम वो ऊपर अर्शों पर किसी जगह पर बैठा हुआ है अल इयाज बिल्लाह ना खुदा का ऐसे तसवर नहीं है खुदा हर जगह पर हुजूर रखता है खुदा हर कायनात की तमाम अश्या पर
10:09
Speaker A
मुकम्मल इरफानी इस्लाह में बयान हुई है। उन मताफ की तजी के लिए मैं बहुत ज्यादा तो नहीं, बरहाल दो तीन जलसा में कोशिश करूंगा इरफान की इस्तल हात की मुख्तसर वजाहत पेश करूं। दो तीन जलसा के अंदर अगरचे जाहिर सी।
10:30
Speaker A
या मसला सूर मुबारक बकरा में आप पढ़ते हैं के फन मावल फजला इनला वास अलीम यह भीन खूबसूरत ताबीर है के फन मा तुव फला जिस तरफ रुख करो उस तरफ वज खुदा है इनला वास खुदा वसत रखता है खुदा इता रखता है यह
10:59
Speaker A
बात है कि यह इल्म इरफान, खास तौर पर इरफान नजरी निहायत द कीक इल्म है, लेकिन बहरहाल अले जौक के लिए जो जौकी अफराद है, उनके लिए थोड़ी सी फजा को बाज करने के लिए खोलने के लिए मैं कोशिश करूंगा कि दो तीन जलसा के।
11:19
Speaker A
उठाकर देखें वहां पर अमीरे बयान का जो बयान है तौहीद के बारे में तौहीद तमल तौहीद खुदा को खल्क से जुदा करो लेकिन कैसे जुदा त बनतो सिफत ला बनतो उलन और यह तमज और जुदाई का हुक्म इस तरीके
11:46
Speaker A
अंदर मुख्तसर तरीके से इरफानी इस्तल की वजाहत करू। क्योंकि आप देखेंगे जब हम किताब में वारिद होंगे, कुल्लन इसी इस्तल कालि में इस्तरा ढांचे में हजरत इमाम राहिल मता को जिक्र करते हैं। तो बहरहाल तीन जलसा में दोती जलसा में इन कुल्ली इस्लाह की।
12:04
Speaker A
बयानात है मरा तो इला तुला कबल बाहु हु कि मैंने किसी चीज को नहीं देखा मगर यह कि उससे पहले भी खुदा को देखा उसके बाद भी खुदा को देखा उसके साथ भी खुदा को देखा ब यह बयानात है जो अहल बैत अहार के हां पाए
12:25
Speaker A
मुख्तसर वजाहत पेश करता हूं। बाकी मुख्तलिफ मकामा पर जैसे जैसे बहाना मिलता जाएगा, बज इस्लाह को और ज्यादा खोलते जाएंगे। तो बहरहाल आज का जलसा और दो तीन दो और जलसा इरफान की इस्तल की वजाहत के बारे में बगैर किसी मुकदमे के वारिद होते हैं।
13:00
Speaker A
मौके पर इन तमाम फकत की तजी नहीं देना चाहता इन जुमला पर गौर करें अजमत खुदा जिस अजमत खुदा ने तमाम चीजों को पुर किया हुआ है भर दिया है या आगे चलकर पढ़ते हैं वमा मर कु और तुम्हारे उन असमा का वास्ता
13:21
Speaker A
देखें यह जो हजरत इमाम के आसार है, यानी शर दो सहर या दूसरे आसार, इन तमाम आसार की बुनियाद वहदत शख्स पर है, यानी अहले मफत जो तौहीद बारी ताला की तस्वीर हमारे सामने पेश करते हैं, उसी तौहीद के।
13:40
Speaker A
वक्त में उन बयानात की तरफ नहीं जाना चाह रहा या काफी का एक जुमला सुन ले फम मलाल अजीम शन अल मलिक दयान फलायन मकान खुदा से कोई मकान खाली नहीं लाय मकान वला यक इला मकानन अकब मन हो इला मकाने य इंशाल्लाह
14:07
Speaker A
मुताबिक इन आसार को लिखा गया है। और जाहिर सी बात है कि यह जो वहदत शख्स हम कह रहे हैं, पहले मरहले में कुरान मजीद ने जिस तौहीद का तसव्वुर दिया है, वह यही तौहीद है। याने हम आम तौर पर आम लोगों।
14:38
Speaker A
इन चीजों को समझना चाहिए या ना या जो कुरान कहता है वहु मा मा या मसलन कुरान कहता है कि यह तसवर के खुदा तीन में से तीसरा है यह कुफ्र है लेकिन उसके मुकाबले में हम दूसरे मकाम पर
14:54
Speaker A
को शायद उनकी सतह के मुताबिक समझाने के लिए किसी हद तक मेमार और इमारत की मिसाल देते हैं, यानी एक बन्ना है, एक बिना है, एक इमारत बनाने वाला है और एक इमारत है। इब्तिदा सतह पर हम लोग इस तरीके से तौहीद का तसव्वुर।
15:19
Speaker A
लाना म जाला इला हर एक के साथ है तो यह कुरानी तौहीद ऐसे है मेमार और इमारत की तरह नहीं है बना और बिन्ना बिना की तरह नहीं है खुदा हर जगह पर है किसी जगह से महदूद नहीं है तो
15:40
Speaker A
देते हैं, लेकिन वाजे सी बात है कि यह तसव्वुर निहायत नाकस तसव्वर है। कुरान मजीद और रिवायत आल मोहम्मद से जो हमें तौहीद का तसव्वुर मिलता है, वह इससे हटकर है। कुरान तौहीद का जो तसवर देता है, मसलन सूर मुबारक।
16:00
Speaker A
लू यह ताबीर ज्यादा इस्तेमाल ना करूं क्योंकि इसका तसव्वुर गलत आता है जैसे इबादत वजूद कहते हैं तो बाज लोग इसे लूल और इत्तेहाद का तसव्वुर समझ लेते हैं हालांकि कतन गलत है यह कुफर है शिर्क है या मसलन जैसे ही वहदतुल वजूद कहते हैं तो
16:18
Speaker A
हदीद को देखें, हुल अव्वल वल आखिर रवल बातन वहुवा ब कुली अलीम अव्वल वही है, आखिर वही है, जाहिर वही है, बातिन वही है। यानी तमाम हस्ती को जो अपने इते में लिए हुए है, वह वुजूद हक है।
16:34
Speaker A
जितनी भी अश्या है यह खयाली है पूछ है हीच है कुछ भी नहीं है यह भी बिल बदा गलत है मखलूक बिल विज दन मौजूदा बिल विजन हम देखते हैं तो लिहाजा मैं यहां पर ताबीर वहदतुल वुजूद की नहीं कर रहा मैं यहां पर
16:53
Speaker A
ऐसे नहीं है कि खुदा का तसव्वुर कायनात से काट कर आप पेश करें। यह तसव्वुर दुरुस्त नहीं है। मरहूम अल्लामा हसन जाद आमली रहमतुल्ला अल फरमाते हैं कि जब मैं अल्लामा तबा तबाई के पास गया ताकि सेर सुलूक के लिए अल्लामा।
17:15
Speaker A
हस्ती को जिसने पुर किया हुआ है वह जात खुदा है वुजूद हक है अच्छा जात की भी अभी ताबीर ना कर यानी कायनात के अंदर जात जो मौजूद है जो हस्ती है वह फकत खुदा की है बकाया जितने भी मौजूदा है वह सारे के
17:41
Speaker A
से मैं कोई जिक्र लूं, मैं कोई तरबियती बराल जो सिलसिला होता है, तो आपने मुझे जिक्र दिया कि इस तरीके से आप जिक्र करें। फिर अल्लामा ने मुझसे पूछा कि यह कौन सा खुदा? तो अल्लामा हसन जादे कहते हैं कि।
18:07
Speaker A
जिसको हम कहते हैं तजल्ली बस यह जितनी भी तजल्ली यात है यह तजल्ली यात है यह जलवा है यह जुहूर है उस वुजूद के कमात का ना कि आप आए और जलवे को खुदा कहे ना कि आप आए और
18:26
Speaker A
मैंने जवाब दिया कि वह खुदा जो हमसे जुदा नहीं है। तो उन्होंने कहा बिल्कुल ऐसे। यह जो हम लोग आमतौर पर तसव्वुर करते हैं कि यह दुनिया यह मौजूदा बिल्कुल अलग थलग है और खुदा इनके ऊपर एक जुदा गाना चीज।
18:50
Speaker A
मुझे मालूम है बहुत ज्यादा तफसील गुफ्तगू की जरूरत है लेकिन मैं यहां पर रुकना नहीं चाहता मैं चाहता हूं कि शर द सहर की तरफ जाए असल मबन को इस्तल को फकत समझे आरिफ जो कहता है वहदत वुजूद और वुजूद
19:07
Speaker A
है कि देख वहाबियत में तो बिल्कुल रोशन है कि नमी दनम वो ऊपर अर्शों पर किसी जगह पर बैठा हुआ है। अल इयाज बिल्लाह ना खुदा का ऐसे तसवर नहीं है। खुदा हर जगह पर हुजूर रखता है, खुदा हर कायनात की तमाम अश्या पर।
19:31
Speaker A
की खुसूसियत यह है कि एक लिहाज से मतलब को जहन के करीब लेकर आती है लेकिन उस मिसाल के अंदर बहुत सारी जिते होती हैं कि जिनकी वजह से इंसान मतलब से दूर भी हो जाता है मामूल इरफानी किताबों में वहदत शख्स को
19:49
Speaker A
इता किए हुए हैं। यही सूरे हदीद की बहुत ही खूबसूरत ताबीर के हुल अव्वल वल आखर रवल बातिन कि देख अ इल्म जानते हैं कि हसर की शक्ल में अव्वल फकत वही है, आखिर फकत वही है, जाहिर फकत वही है, बातिन फकत वही है।
20:09
Speaker A
दरिया और जो उसके अंदर मौजे होती है मौज है दरिया और अवाज मौजों की आपस में क्या निस्बत है एक लिहाज से देखा जाए मौज अपनी तरफ से कुछ भी नहीं है फकत दरिया है पानी है पानी और दरिया के अलावा कोई चीज नहीं
20:32
Speaker A
या मसला सूर मुबारक बकरा में आप पढ़ते हैं के फन मावल फजला इनला वास अलीम। यह भीन खूबसूरत ताबीर है के फन मा तुव फला जिस तरफ रुख करो उस तरफ वज खुदा है। इनला वास खुदा वसत रखता है, खुदा इता रखता है। यह।
20:56
Speaker A
है लेकिन मौज दरिया नहीं है लेकिन दरिया से जुदा भी नहीं है दरिया से हटकर भी नहीं है इस इस जंबे को मद्देनजर रखे कि मौज इसी दरिया से उठती है लेकिन मौज दरिया नहीं है लेकिन दूसरी तरफ से देखें मौज के पूरे
21:22
Speaker A
वसत और अहाता बहुत ही अहम है और इसके अलावा कुरान मजीद की बहुत सारी आयात है के अभी में फिर उन आयात की तरफ नहीं जाना चाह रहा। या मसलन हमारे पास रिवायत आले मोहम्मद में भी इसी तरीके से है तजा त बसी को।
21:41
Speaker A
हुआ है वजूद खुदा ने पुर किया हुआ है लेकिन यह मौजूदा जहूरा है उसी हस्ती के अमवा है मौजे हैं मौज पानी नहीं है बूद नहीं नमूद है इसी तरीके से यह आलम मौजूदा जितने भी है यह तजल्ली यात है जहरात
22:08
Speaker A
उठाकर देखें वहां पर अमीरे बयान का जो बयान है तौहीद के बारे में। तौहीद तमल तौहीद खुदा को खल्क से जुदा करो, लेकिन कैसे जुदा? त बनतो सिफत ला बनतो उलन और यह तमज और जुदाई का हुक्म इस तरीके।
22:31
Speaker A
दस्त मौज दरिया अजबान के न बाश दरिया हम सब अमवा है मौजे हैं दरिया जमाल हुस्नो कमाल तू है मौज दरिया है लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि मौज दरिया नहीं है एक लिहाज से देखो दरिया है अल्लाह अकबर
22:59
Speaker A
से है कि वस् के तबार से सिफत के तबार से जुदा करो खुदा को, ना के बनत उजली एक चीज को जैसे दूसरी चीज से जुदा किया जाता है। इस तरीके से ना या मसलन इसी तरीके से और भी मौला के।
23:27
Speaker A
वदर दरिया में भागती है ना गुजर दरिया के अलावा मौज का तस नहीं है इन्ना लिल्ला व इना इल राज यह एक मिसाल खूबसूरत मिसाल है वदत शसी को बयान करने के लिए पस देखे अजजम द दत शसी में अगर किसी भी जगह पर आपके जहन में
23:55
Speaker A
बयानात है। मरा तो इला तुला कबल बाहु हु कि मैंने किसी चीज को नहीं देखा मगर यह कि उससे पहले भी खुदा को देखा, उसके बाद भी खुदा को देखा, उसके साथ भी खुदा को देखा। ब यह बयानात है जो अहल बैत अहार के हां पाए।
24:10
Speaker A
आपने इरफान की बात नहीं समझी अगर वहदत वजूद से आप समझे खुदा के अलावा सब कुछ ही चो पूच है तो यकीन मान ले कि आपने इरफान के नुक्ते को नहीं लिया दत शसी को नहीं लिया दर हाल कि तमाम हस्ती को खुदा ने पुर
24:28
Speaker A
जाते हैं। या हता द कुमेल जो मामूल आपका आज अल्लाहु इनी असल क बरहम अलती वस कुला व कलत ब कु ला कुलो ला कुलो व जबरू कलती गल ब कु व कती लायला वम कती मला कु य। देख मैं अब इस।
24:55
Speaker A
बयान के मुताबिक है अच्छा यहां पर एक बहस आती है हमारे सामने वो यह है कि भाई जब वुजूद खुदा वंद मुताल की जात में मुनसर है तो यह फिर तमाम आलम की तरतीब कैसे है आलम क्या है यहां पर
25:19
Speaker A
मौके पर इन तमाम फकत की तजी नहीं देना चाहता। इन जुमला पर गौर करें। अजमत खुदा जिस अजमत खुदा ने तमाम चीजों को पुर किया हुआ है, भर दिया है। या आगे चलकर पढ़ते हैं वमा मर कु और तुम्हारे उन असमा का वास्ता।
25:40
Speaker A
तरीके से है इरफानी नुक्ता निगाह से यहां पर सबसे पहली चीज जो हमारे सामने आती है वह तजल्ली और जुहूर है वुजूद एक है बाकी उस वजूद की तजल्ली यात है उस वुजूद के कमाला का जुहूर है इरफान में यह तजल्ली का तसर आता है अच्छा
26:07
Speaker A
देता हूं कि मलत अरकान कुले जिसने हर चीज के अरकान और रुकन को पुर कर दिया। य क्या मुराद है इन असमा इलाही से? कैसे खुदा वंद मुताल के असमा ने तमाम चीजों को भर दिया है। और बहुत सारे बयानात है इस।
26:34
Speaker A
जात हजरत हक के मरहूम इमाम ने भी अपने आसार में खूब इसको बयान किया है तमाम अले मफत के किताबों में यह मतलब पाया जाता है मकाम जात मकाम जात यानी जात हजरत हक जिस जात हजरत हक के अंदर तमाम
26:57
Speaker A
वक्त में उन बयानात की तरफ नहीं जाना चाह रहा। या काफी का एक जुमला सुन ले। फम मलाल अजीम शन अल मलिक दयान फलायन मकान। खुदा से कोई मकान खाली नहीं। लाय मकान वला यक इला मकानन अकब मन हो इला मकाने य। इंशाल्लाह।
27:26
Speaker A
लेकिन जैसे कि हम लोग कलाम से जना भी है वहां पर पढ़ते हैं ना के तमाम कमाला ने जात है कि इरफान में ताबील करते हैं कि तमाम कमाला बनवे इतक और इमाज मुनमि है मुनक है मुस्तक है तमाम
27:49
Speaker A
कुछ बयानात को जिक्र करेंगे। आहिस्ता आहिस्ता यह जो तौहीद शक् को जिक्र करते हैं यह इन्हीं बयानात कुरानी या मसलन जैसे कुर्बे वरीदी है। कुरान मजीद के अंदर भी नानक मवरीद या कल याल बादनी फनी करीब। यानी क्या आखर मुझे।
28:13
Speaker A
जातिया शने जातिया की जो ताबीर आती है वह यहीं पर आती है इंशाल्लाह बाद में कमाल जिला कमाल इस्ते जला ये वो इन इस्लाह को जिक्र करूंगा तो और ज्यादा मतलब रोशन होगा यह मकाम जात है के मकाम जात तमाम कमाला का
28:32
Speaker A
इन चीजों को समझना चाहिए या ना? या जो कुरान कहता है वहु मा मा। या मसलन कुरान कहता है कि यह तसवर के खुदा तीन में से तीसरा है, यह कुफ्र है। लेकिन उसके मुकाबले में हम दूसरे मकाम पर।
28:56
Speaker A
लारस अ इसम रस्म नहीं है यानी क्या इसका क्या मतलब है इसकी वजाहत इंशाल्लाह थोड़ी देर के बाद आएगी लेकिन यह वो कमाल कि जिस जात के अंदर तमाम शने जातिया मौजूद है तो फिर यहां पर अहले मफत जिक्र
29:16
Speaker A
सूर मुजादरा में देखते हैं वहां पर यह आता है मायक सला इलारा लामसन इला साद लाना मन जालि ला इला नमा कान। तीन बंदे आपस में सरगोशी नहीं करते मगर यह कि चौथा वह है। पांच बंदे आपस में सरगोशी नहीं करते मगर यह कि छटा वह है।
29:48
Speaker A
मयन इस रिवायत के तबार से पहली मर्तबा हरकते ी क के परवरदिगार आलम जो अपनी जात और कमाला जात के साथ मोहब्बत करता है उसने चाहा कि अपने कमाला को जाहिर करें अगर इल्म इरफान के अंदर अले मफत के अंदर तखक दर हकीकत कमाला हक के
30:17
Speaker A
लाना म जाला इला हर एक के साथ है। तो यह कुरानी तौहीद ऐसे है मेमार और इमारत की तरह नहीं है। बना और बिन्ना बिना की तरह नहीं है। खुदा हर जगह पर है, किसी जगह से महदूद नहीं है। तो।
30:36
Speaker A
है इंशाल्लाह बाद में अर्ज करूंगा कि इस इजहार का भी खास तरीका है अले मफत कहते हैं कि पहली मर्तबा इजहार जुहूर तायन अव्वल की शक्ल में फिर तायने सानी की शक्ल में है कि इनको नात खलकी शुरू होते हैं कि दिग फिर वो भी
31:01
Speaker A
यह दुआए सहर शर दुआए सहर जो मरहूम इमाम की है, इसी तौहीद शक् की बिना पर है कि इसको बाज हजरात वहदतुल वजूद के नाम से भी कहते हैं, लेकिन असल वहदतुल वजूद के नाम से मैं इसलिए कतरा हूं कि यह ना।
31:21
Speaker A
खम्स के साथ भी ताबीर करते हैं इंशाल्लाह इसको फिर ज बाद में भी अर्ज करूंगा बस मकाम जात मकाम जात के अंदर जो सुनाते जातिया कमाला जातिया थे व हरकत हुब्बी की बिना पर परवरदिगार आलम ने चाहा कि अपने इन कमाला
31:41
Speaker A
को जाहिर करे यह कमाला का इजहार यह कमाला का जुहूर तजल्ली कहलाता है यह कमाला का जुहूर इजहार जलवा कहलाता है दुरुस्त है इंशाल्लाह इसके बारे में बाद में अ करता हूं बस यह दो तीन इलाहा वदत शसी किसे कहते हैं मकाम जात वह मकाम
32:06
Speaker A
है कि जहां पर किसी को रसाई हासिल नहीं है कोई नहीं पहुंच सकता उस मकाम जात में तमाम कमाला बिना इतक और बिना इमाज मौजूद है फिर उसी मरहले से पहली मर्तबा हरकत हुब्बी की बिना पर कि खुदा चाहता है अपने कमाला को
32:25
Speaker A
जाहिर करे असलन सि खलकत इरफानी नुक्ता निगाह से यह मोहब्बत है यह इश्क है यह जो आप बाज अशर के अंदर सुनते हैं कि बुनियाद तखक आलम मोहब्बत है इसका माना यही है अगय आप देखें अपने अंदर भी देखें एक
32:47
Speaker A
इंसान के अंदर छोटा सा कमाल होता है तो कितनी मोहब्बत होती है कि अपने इस कमाल को जाहिर करू वो जो मंब कमाल है जहां पर तमाम कमाल ला महदूद कमाला ला महदूद तरीके से मौजूद है व शना
33:06
Speaker A
जातिया उन शना जातिया को हजरत हक ने चाहा कि मैं जाहिर करू यह सिर तली है जनाबे फातिमा जहरा सलाम उल्ला अलहा के खुतबा फद्य में भी सिर तखक यही बयान किया गया इजहार कुदरत उसने अपने कमाल को कुदरत को जाहिर करे वहां पर
33:32
Speaker A
भी यही नुक्ता जिक्र हुआ सिर तली आलम इरफान में यह मोहब्बत है यह इश्क है यह मोहब्बत है कुंतो कनन मया सि तली या सिर जहूर सिर इजहार उन कमाला का इजहार क्यों है मोहब्बत की वजह से चाहता है कि मैं जाहिर हूं चाहता है कि
34:00
Speaker A
मुझे देखे चाहता है कि अपने आप को बमला करें खब ये इरफानी नुक्ते निगाह से सिर तखक है यहां पर रोकता हूं क्योंकि कोशिश करेंगे कि हमारे जलसा 30 से 35 मिनट तक हो इससे ज्यादा ना हो क्योंकि इससे ज्यादा
34:17
Speaker A
सुनने वाला थक जाता है एक जलसा लेकिन बहरहाल जो मेरे जहन में था कि ज्यादा इस्लाह को जिक्र करूंगा अगर इस तरीके से चला तो फिर शायद चार पांच जलस हो जाए इब्तिदा में जहन में था कि तीन जला साथ
34:30
Speaker A
में समेट दूं लेकिन कोशिश करूंगा ज्यादा ना रुकू क्योंकि हम चले उसकी तरफ शर दुआए सहर की तरफ लेकिन बरल यह मुकदमा है सल्लल्लाह अला मोहम्मद वा तारीन
Topics:दुआए सहरइरफानतौहीदहजरत इमामवहदतुल वजूदमौलाना वसीम रज़ा सुब्हानीरमजानइस्लामी व्याख्याकुरानअहले बाइट

Frequently Asked Questions

दुआए सहर क्या है और इसका महत्व क्या है?

दुआए सहर एक विशेष प्रार्थना है जो रमजान के महीने में सुबह के समय पढ़ी जाती है। इसका उद्देश्य आध्यात्मिक शुद्धि और खुदा से मदद मांगना है।

मौलाना वसीम रज़ा सुब्हानी ने दुआए सहर की व्याख्या में क्या मुख्य बिंदु बताए?

उन्होंने दुआए सहर की इरफानी और तौहीदी व्याख्या की, हजरत इमाम के असर को समझाया, और कुरान व अहले बाइट के संदर्भों के माध्यम से तौहीद की गहराई पर प्रकाश डाला।

वहदतुल वजूद और तौहीद में क्या अंतर है?

वहदतुल वजूद एक इरफानी अवधारणा है जो अस्तित्व की एकता पर जोर देती है, जबकि तौहीद इस्लाम में खुदा की एकता का सिद्धांत है। वीडियो में इनके बीच के अंतर को गहराई से समझाया गया है।

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