किसान के बेटे ललित केसरे ने IIT से लेकर Go तक की प्रेरणादायक यात्रा, जो भारत का नंबर वन स्टॉक ब्रोकिंग प्लेटफॉर्म है।
Key Takeaways
- कठिनाइयों और फेलियर से सीखना स्टार्टअप सफलता की कुंजी है।
- ग्राहक संतुष्टि और कस्टमर ऑब्सेशन बिजनेस की सफलता के लिए आवश्यक हैं।
- सही समय और इंफ्रास्ट्रक्चर के बिना भी बेहतरीन आइडिया सफल नहीं हो सकता।
- टीम बिल्डिंग और सही कोफाउंडर्स का चयन महत्वपूर्ण होता है।
- डिजिटल तकनीक और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से निवेश को सरल और सुलभ बनाया जा सकता है।
What the video covers
- ललित केसरे का जन्म मध्य प्रदेश के एक पिछड़े गांव में हुआ जहां इंग्लिश मीडियम स्कूल तक नहीं था।
- उन्होंने IIT बॉम्बे में माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और स्टॉक मार्केट में रुचि विकसित की।
- ललित ने एड्यूfिक्स नाम से एक एजुकेशन स्टार्टअप शुरू किया, जो विफल रहा लेकिन उससे महत्वपूर्ण सीख मिली।
- Flipkart में काम करते हुए उन्होंने कस्टमर ऑब्सेशन और फास्ट डिलीवरी की अहमियत समझी।
- 2017 में ललित और उनकी टीम ने Go लॉन्च किया, जो म्यूचुअल फंड्स और स्टॉक मार्केट में निवेश को सरल बनाता है।
- Go की शुरुआत केवल वेबसाइट से हुई, जिसमें म्यूचुअल फंड्स की पूरी जानकारी उपलब्ध थी।
- पहले महीने बिना पेड मार्केटिंग के 600 यूजर्स मिले, जिससे टीम को प्रोडक्ट मार्केट फिट का भरोसा हुआ।
- Go ने बाद में ऐप भी लॉन्च किया और रेनोड इन्वेस्टर्स से फंडिंग हासिल की।
- वीडियो में स्टार्टअप के शुरुआती संघर्ष, फेलियर से सीख और सफलता की कहानी विस्तार से बताई गई है।
- डिजिटल इंडिया, आधार, और Jio जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता ने Go के सफल होने में मदद की।
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Speaker A
Go आज इंडिया का नंबर वन स्टॉक ब्रोकर है। हर तीन नई एसआईपीस में से एक Go पे होती है। लेकिन सरप्राइजिंगली हजारों करोड़ों की इसी कंपनी को बनाया एक किसान के बेटे ने, जिसके गांव में एक इंग्लिश मीडियम स्कूल तक नहीं था और केवल 7 साल की उम्र में उसे अपने पेरेंट्स से दूर होना पड़ा था। ललित केसरे का जन्म मध्य प्रदेश के लेपा नाम के गांव में हुआ था। यह गांव इतना पिछड़ा हुआ था कि बेटर एजुकेशन के लिए उनके पेरेंट्स को उन्हें खड़गौन शहर भेजना पड़ा। ललित के नाना नानी के पास। लकीली खड़गौन में उसी साल पहला इंग्लिश मीडियम स्कूल खुला और ललित वहां के 4 सेकंड स्टूडेंट बन गए। वो एक एवरेज स्टूडेंट थे। लेकिन सेकंड क्लास में सम हाउ उन्होंने टॉप कर दिया। जिसके बाद उनके नाना ने उन्हें शाबाशी देते हुए एक शब्द कहा। गुड, सिर्फ गुड। लेकिन इस एक शब्द ने उन्हें लाइफ में हमेशा एक्सीलेंस हासिल करने के लिए इंस्पायर कर दिया। कई सालों बाद स्कूल की लाइब्रेरी में ललित की नजर एक मोटी किताब पर पड़ी। प्रिंसिपल ने बताया कि यह आईआईटी जेईई की प्रिपरेशन की बुक है और यह एक बहुत ही कॉम्प्लिकेटेड एग्जाम है। इससे पहले ललित या उनके किसी भी क्लासमेट ने आईआईटी का नाम तक नहीं सुना था। लेकिन क्योंकि प्रिंसिपल ने कहा कि यह एक कॉम्प्लिकेटेड एग्जाम है, तो ललित ने इसी एग्जाम की तैयारी करने की ठान ली। उन्होंने ब्रिलियंट ट्यूटोरियल्स का पोस्टल बेस्ड कोचिंग प्रोग्राम सब्सक्राइब कर लिया, जिसमें उन्हें हर महीने स्टडी मटेरियल डिलीवर होता था। उन्होंने दिन रात एक करके पूरी तैयारी खुद से की। एग्जाम दिया और उनका सिलेक्शन भी हो गया। आईआईटी बॉम्बे माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में। आईआईटी में जहां दूसरे बच्चे केवल कैंपस लाइफ, प्लेसमेंट्स और ग्रेड्स पर फोकस करते थे, वहीं ललित की लाइफ अप्रोच डिफरेंट थी। कैंपस में पोलन के होने के कारण उन्हें अक्सर एलर्जी हो जाती थी। इसीलिए उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग की नॉलेज को प्रैक्टिकली अप्लाई किया और एक एलर्जेंट डिटेक्टर डिवाइस बना डाला, जो उन्हें एडवांस में ही एनवायरमेंट में एलर्जेंस की होने की वार्निंग दे देता था। इससे प्रूव हो चुका था कि उनके अंदर प्रॉब्लम सॉल्विंग और एंटरप्रेन्योरशिप का पैशन था। इसके अलावा आईआईटी में ललित को एक्सपोज़र मिला स्टॉक मार्केट का। वो फाइनेंशियल न्यूज़ देखने लगे। कैपिटल मार्केट्स को ट्रैक करने लगे और अपने स्कॉलरशिप के पैसे से ₹80 में एक शेयर भी खरीदा। उस टाइम पे एक स्टॉक मार्केट अकाउंट खोलने के लिए लाइन में लगना पड़ता था। फिजिकल पेपर वर्क फिल करना पड़ता था और हाई ब्रोकरेज फीस भरनी पड़ती थी। लेकिन उस टाइम ललित को कोई अंदाजा नहीं था कि वो फ्यूचर में पूरे इंडिया के लिए इसी प्रॉब्लम को सॉल्व करने वाले हैं। आईआईटी से ग्रेजुएशन करने के बाद ललित इथियम सिस्टम्स में जॉब करने लगे। यह एक इंडियन कंपनी थी जो बेसिकली Google और Netflix जैसे क्लाइंट्स के लिए वीडियो स्ट्रीमिंग सॉफ्टवेयर्स बनाती थी, जिससे उनकी वीडियोस बिना डिले के यूज़र्स तक पहुंच सके। और यही काम करते हुए ललित को वीडियो कंटेंट की पावर समझ में आ गई। उन्हें याद आया कि किस तरह केवल अच्छी एजुकेशन के लिए बचपन में ही उन्हें अपने पेरेंट्स से दूर होना पड़ा था और इवन आईआईटी के लिए उन्होंने बिना किसी गाइडेंस के तैयारी की थी। इसीलिए 2011 में उन्होंने स्टार्ट किया एड्यूfिक्स। बेसिकली एक ऐसा Netflix जो एजुकेशन के लिए था। आईडिया था इंडिया के बेस्ट टीचर्स को ऑनलाइन लाना और लाइव स्ट्रीमिंग के थ्रू देश के कोने-कोने तक क्वालिटी एजुकेशन को पहुंचाना। सरप्राइजिंगली ललित ने इस आईडिया को Unacademy, BYJU'S और PW से कई सालों पहले ही सोच लिया था। लेकिन यही फैक्ट एड्यूfिक्स के फेलियर का कारण भी बना। उस समय इंडिया का इंफ्रास्ट्रक्चर इतना एडवांस नहीं था कि वो वीडियो स्ट्रीमिंग को इस स्केल पे संभाल सके और ना ही हर घर में खुद का लैपटॉप या स्मार्टफोन था। इसीलिए करीब 3 साल तक मेहनत करने के बाद भी एड्यूfिक्स फेल हो गया। लेकिन इसी फेलियर ने उन्हें एक बहुत बड़ा बिजनेस लेसन सिखा दिया। टाइमिंग इज एवरीथिंग इन अ स्टार्टअप। इस क्रशिंग फेलियर के बाद ललित ने डिसाइड किया इंडिया के सबसे बड़े स्टार्टअप को ज्वॉइ करने का और वो था Flipkart। यहां काम करते वक्त राखी के दौरान एक इंसिडेंट हुआ। एक टेक्निकल एरर के कारण कई राखी के ऑर्डर्स कैंसिल हो गए। Flipkart चाहता तो एक सिंपल अपोलॉजी ईमेल लिखकर मामले को क्लोज कर सकता था। लेकिन उस रात 10 से 15 इंजीनियर्स पूरी रात ऑफिस में रुके और खुद राखी को पैक करके कस्टमर्स को रक्षाबंधन के दिन डिलीवर करवाई। ललित को इस इंसिडेंट ने सिखाया कि एक सक्सेसफुल बिजनेस बनाने के लिए कस्टमर ऑब्सेशन कितना इंपॉर्टेंट है। उन्होंने Flipkart में यह भी देखा कि जितनी फास्ट डिलीवरी होती थी, कस्टमर का सेटिस्फेक्शन उतना ही ज्यादा बढ़ता था। इसीलिए उनके दिमाग में थ्री डेज, टू डेज या वन डे डिलीवरी नहीं बल्कि उस समय सीधा वन आवर डिलीवरी का ख्याल आया। उन्होंने Flipkart क्विक नाम से एक पायलट प्रोजेक्ट भी रन किया। बेसिकली जो ज़प्टो, Swiggy और ब्लिंकेट आज कर रहे हैं, उसका पायलट ललित 2015 में ही कर चुके थे। लेकिन फिर से इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण यह आईडिया उस समय उतना बड़ा नहीं हो पाया। जॉब करने के लिए Flipkart एक कमाल की जगह थी। लेकिन ललित के सपने बहुत बड़े थे। वो खुद एक ऐसा स्टार्टअप बनाना चाहते थे जो Flipkart जितना ही इंपैक्टफुल हो। इस वक्त उनका केवल एक गोल था। कोफाउंडर्स के तौर पर खुद से बेटर लोगों को चुनना। देखते ही देखते उनके साथ जुड़े हर्ष जैन, नीरज सिंह और ईशान बंसल। यह तीनों भी उस समय Flipkart में ही काम कर रहे थे। टीम बनाने के बाद अब बारी थी स्टार्टअप आईडिया सोचने की। इसीलिए चारों हर संडे ब्रेकफास्ट के लिए मिलने लगे। सरप्राइजिंगली यह सब खुद को बार-बार एक ही चीज के बारे में बात करते हुए पाते थे, स्टॉक मार्केट और इन्वेस्टिंग। सभी के मन में क्वेश्चंस थे कि आखिर क्यों एक डीमैट अकाउंट खोलना इतना पेनफुल है? म्यूच्युअल फंड्स इतने कॉम्प्लिकेटेड क्यों हैं? और आखिर क्यों केवल 2 करोड़ इंडियंस ही म्यूच्युअल फंड्स में इन्वेस्ट कर रहे थे, जबकि 20 करोड़ लोगों के पास इन्वेस्ट करने के पैसे थे। आल्सो इसी समय इंडिया में डिजिटल इंडिया इनिशिएटिव, आधार के चलते ईकेवाईसी और Jio की भी एंट्री हो चुकी थी। मतलब अनलाइक एड्यूfिक्स और Flipkart क्विक, इस बार इनके स्टार्टअप के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर भी अवेलेबल था। इसीलिए इन सब ने डिसाइड किया कि ये फाइनेंशियल सर्विसेज स्पेस में ही स्टार्टअप बनाएंगे। आगे बढ़ने से पहले एक इंपॉर्टेंट अनाउंसमेंट: हम हायर कर रहे हैं टैलेंटेड फ्रीलांस रिसर्चर्स और वीडियो एडिटर्स को, जो हमारे कंटेंट को नेक्स्ट लेवल पर ले जा सकें। अगर आप हमारी टीम को ज्वाइन करना चाहते हैं, तो आपको सिंपली इस ईमेल आईडी पे एक ईमेल लिखना है। ईमेल में तीन चीजों को कवर कीजिए: व्हाई डू यू वांट टू वर्क विद अस? हाउ कैन यू हेल्प आवर चैनल ग्रो? और तीसरा अपना पास्ट वर्क एक्सपीरियंस एक्सप्लेन कीजिए और वर्क सैंपल्स अटैच कीजिए। आपके ईमेल का प्रोफेशनलिज्म, टोन और स्टाइल बहुत मैटर करता है। इसीलिए लिखने से पहले क्विलबॉट का Chrome एक्सटेंशन जरूर डाउनलोड कर लेना। क्विलबॉट रियल टाइम पे आपके ग्रामर, पंकुएशन और स्पेलिंग मिस्टेक्स को कैच कर लेगा और केवल एक क्लिक में उन्हें सही कर देगा। इनका पैराफ्रेज फीचर भी गेम चेंजर है। इसका यूज करके मैसेज को फॉर्मल, फ्लुएंट या क्रिएटिव जैसे अलग-अलग स्टाइल्स में ट्रांसफॉर्म किया जा सकता है। प्लस इनके AI टूल का यूज करके आप मनचाहे कस्टमाइजेशन कर सकते हैं। लेकिन क्विलबॉट का एक्सटेंशन केवल ईमेल के लिए नहीं है। यह हर उस वेबसाइट पर काम करता है जहां आप राइटिंग करते हो। LinkedIn, Twitter, Google, Everywhere। बेसिकली ईमेल, सोशल मीडिया कैप्शंस, YouTube स्क्रिप्ट्स और प्रोजेक्ट रिपोर्ट्स जैसे हर एक काम में क्विलबॉट आपको क्लियरली और प्रोफेशनल्ली लिखने में हेल्प करता है। एक्सटेंशन का लिंक और मेरी ईमेल आईडी दोनों ही पिन्ड कमेंट और डिस्क्रिप्शन में है। अब वीडियो पे वापस आते हैं। फाइनली 2017 में इन्होंने लॉन्च किया Go। एक ऐसा प्लेटफार्म जो इन्वेस्टिंग में सिंप्लिसिटी का रिवॉल्यूशन लाने वाला था। शुरुआत में इन्होंने केवल एक वेबसाइट लॉन्च करी क्योंकि इनके पास ऐप बनाने के पैसे ही नहीं थे। Go की वेबसाइट में केवल म्यूच्युअल फंड्स के ऑप्शन थे। म्यूच्युअल फंड्स के बारे में सारी इंफॉर्मेशन जैसे फंड मैनेजर की प्रोफाइल, एक्सपेंस रेशियो, लास्ट वन, 3, 5 और 10 इयर्स की परफॉर्मेंस और रिस्क रेटिंग भी थी। यूज़र्स अपने हिसाब से सभी इंफॉर्मेशन चेक करके इन्वेस्टमेंट डिसीजन ले सकते थे। इन्होंने सोचा कि अगर लॉन्च के फर्स्ट मंथ में 100 यूज़र्स आ गए, तो यह स्टार्टअप को कंटिन्यू रखेंगे। लेकिन पहले ही महीने 600 यूज़र्स आ गए। वो भी बिना किसी पेड मार्केटिंग के। सुनने में यह छोटी सी सक्सेस उन फाउंडर्स के लिए बहुत बड़ी अचीवमेंट थी। सभी चार्ज्ड अप फील कर रहे थे। Go महीने दर महीने नए यूज़र्स ऐड करता चला जा रहा था और इसी दौरान कंपनी के सीटीओ और को-फाउंडर नीरज सिंह ने Go का ऐप भी बना दिया और फाइनली उन्हें रेनोड इन्वेस्टर्स से फंडिंग भी मिल गई। Go को प्रोडक्ट मार्केट फिट मिल चुका था। और अब बारी थी पूरी ताकत लगा के इस प्रूवन कांसेप्ट को पूरे इंडिया में फैला देने की। लेकिन इस स्पेस में मार्केट में एंट्री करने वाला Go अकेला नहीं था। उसी दौरान Zerodha...
Speaker A
स्कूल तक नहीं था और केवल 7 साल की उम्र में उसे अपने पेरेंट्स से दूर होना पड़ा था। ललित केसरे का जन्म मध्य प्रदेश के लेपा नाम के गांव में हुआ था। यह गांव इतना पिछड़ा हुआ था कि बेटर एजुकेशन के
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लिए उनके पेरेंट्स को उन्हें खड़गौन शहर भेजना पड़ा। ललित के नाना नानी के पास। लकीली खड़गौन में उसी साल पहला इंग्लिश मीडियम स्कूल खुला और ललित वहां के 4 सेकंड स्टूडेंट बन गए। वो एक एवरेज स्टूडेंट थे। लेकिन सेकंड क्लास में सम
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हाउ उन्होंने टॉप कर दिया। जिसके बाद उनके नाना ने उन्हें शाबाशी देते हुए एक शब्द कहा। गुड सिर्फ गुड। लेकिन इस एक शब्द ने उन्हें लाइफ में हमेशा एक्सीलेंस हासिल करने के लिए इंस्पायर कर दिया। कई सालों बाद स्कूल की लाइब्रेरी में ललित की नजर
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एक मोटी किताब पर पड़ी। प्रिंसिपल ने बताया कि यह आईआईटी जेईई की प्रिपरेशन की बुक है और यह एक बहुत ही कॉम्प्लिकेटेड एग्जाम है। इससे पहले ललित या उनके किसी भी क्लासमेट ने आईआईटी का नाम तक नहीं सुना था। लेकिन क्योंकि प्रिंसिपल ने कहा
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कि यह एक कॉम्प्लिकेटेड एग्जाम है तो ललित ने इसी एग्जाम की तैयारी करने की ठान ली। उन्होंने ब्रिलियंट ट्यूटोरियल्स का पोस्टल बेस्ड कोचिंग प्रोग्राम सब्सक्राइब कर लिया। जिसमें उन्हें हर महीने स्टडी मटेरियल डिलीवर होता था। उन्होंने दिन रात
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एक करके पूरी तैयारी खुद से की। एग्जाम दिया और उनका सिलेक्शन भी हो गया। आईआईटी बॉम्बे माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में। आईआईटी में जहां दूसरे बच्चे केवल कैंपस लाइफ प्लेसमेंट्स और ग्रेड्स पर फोकस करते थे, वहीं ललित की लाइफ अप्रोच डिफरेंट थी। कैंपस में पोलन
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के होने के कारण उन्हें अक्सर एलर्जी हो जाती थी। इसीलिए उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग की नॉलेज को प्रैक्टिकली अप्लाई किया और एक एलर्जेंट डिटेक्टर डिवाइस बना डाला जो उन्हें एडवांस में ही एनवायरमेंट में एलर्जेंस की होने की वार्निंग दे देता था। इससे प्रूव हो चुका
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था कि उनके अंदर प्रॉब्लम सॉल्विंग और एंटरप्रेन्योरशिप का पैशन था। इसके अलावा आईआईटी में ललित को एक्सपोज़र मिला स्टॉक मार्केट का। वो फाइनेंशियल न्यूज़ देखने लगे। कैपिटल मार्केट्स को ट्रैक करने लगे और अपने स्कॉलरशिप के पैसे से ₹80 में एक
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शेयर भी खरीदा। उस टाइम पे एक स्टॉक मार्केट अकाउंट खोलने के लिए लाइन में लगना पड़ता था। फिजिकल पेपर वर्क फिल करना पड़ता था और हाई ब्रोकरेज फीस भरनी पड़ती थी। लेकिन उस टाइम ललित को कोई अंदाजा नहीं था कि वो फ्यूचर में पूरे इंडिया के
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लिए इसी प्रॉब्लम को सॉल्व करने वाले हैं। आईआईटी से ग्रेजुएशन करने के बाद ललित इथियम सिस्टम्स में जॉब करने लगे। यह एक इंडियन कंपनी थी जो बेसिकली Google और Netflix जैसे क्लाइंट्स के लिए वीडियो स्ट्रीमिंग सॉफ्टवेयर्स बनाती थी जिससे
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इनकी वीडियोस बिना डिले के यूज़र्स तक पहुंच सके और यही काम करते हुए ललित को वीडियो कंटेंट की पावर समझ में आ गई। उन्हें याद आया कि किस तरह केवल अच्छी एजुकेशन के लिए बचपन में ही उन्हें अपने
Speaker A
पेरेंट्स से दूर होना पड़ा था और इवन आईआईटी के लिए उन्होंने बिना किसी गाइडेंस के तैयारी की थी। इसीलिए 2011 में उन्होंने स्टार्ट किया एड्यूfिक्स। बेसिकली एक ऐसा Netflix जो एजुकेशन के लिए था। आईडिया था इंडिया के बेस्ट टीचर्स को
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ऑनलाइन लाना और लाइव स्ट्रीमिंग के थ्रू देश के कोने-कोने तक क्वालिटी एजुकेशन को पहुंचाना। सरप्राइजिंगली ललित ने इस आईडिया को Unacademy bjूस और PW से कई सालों पहले ही सोच लिया था। लेकिन यही फैक्ट एड्यूfिक्स के फेलियर का कारण भी
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बना। उस समय इंडिया का इंफ्रास्ट्रक्चर इतना एडवांस नहीं था कि वो वीडियो स्ट्रीमिंग को इस स्केल पे संभाल सके और ना ही हर घर में खुद का लैपटॉप या स्मार्टफोन था। इसीलिए करीब 3 साल तक मेहनत करने के बाद भी एड्यूfिक्स फेल हो
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गया। लेकिन इसी फेलियर ने उन्हें एक बहुत बड़ा बिजनेस लेसन सिखा दिया। टाइमिंग इज एवरीथिंग इन अ स्टार्टअप। इस क्रशिंग फेलियर के बाद ललित ने डिसाइड किया इंडिया के सबसे बड़े स्टार्टअप को ज्वॉइ करने का और वो था Flipkart। यहां काम करते वक्त
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राखी के दौरान एक इंसिडेंट हुआ। एक टेक्निकल एरर के कारण कई राखी के ऑर्डर्स कैंसिल हो गए। Flipkart चाहता तो एक सिंपल अपोलॉजी ईमेल लिखकर मामले को क्लोज कर सकता था। लेकिन उस रात 10 से 15 इंजीनियर्स पूरी रात ऑफिस में रुके और खुद
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राखी को पैक करके कस्टमर्स को रक्षाबंधन के दिन डिलीवर करवाई। ललित को इस इंसिडेंट ने सिखाया कि एक सक्सेसफुल बिजनेस बनाने के लिए कस्टमर ऑब्सेशन कितना इंपॉर्टेंट है। उन्होंने Flipkart में यह भी देखा कि जितनी फास्ट डिलीवरी होती थी कस्टमर का
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सेटिस्फेक्शन उतना ही ज्यादा बढ़ता था। इसीलिए उनके दिमाग में थ्री डेज, टू डेज या वन डे डिलीवरी नहीं बल्कि उस समय सीधा वन आवर डिलीवरी का ख्याल आया। उन्होंने Flipkart क्विक नाम से एक पायलट प्रोजेक्ट भी रन किया। बेसिकली जो ज़प्टो Sविg और
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ब्लिंकेट आज कर रहे हैं उसका पायलट ललित 2015 में ही कर चुके थे। लेकिन फिर से इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण यह आईडिया उस समय उतना बड़ा नहीं हो पाया। जॉब करने के लिए Flipkart एक कमाल की जगह थी। लेकिन
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ललित के सपने बहुत बड़े थे। वो खुद एक ऐसा स्टार्टअप बनाना चाहते थे जो Flipkart की जितना ही इंपैक्टफुल हो। इस वक्त उनका केवल एक गोल था। कोफाउंडर्स के तौर पर खुद से बेटर लोगों को चुनना। देखते ही देखते
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उनके साथ जुड़े हर्ष जैन, नीरज सिंह और ईशान बंसल। यह तीनों भी उस समय Flipkart में ही काम कर रहे थे। टीम बनाने के बाद अब बारी थी स्टार्टअप आईडिया सोचने की। इसीलिए चारों हर संडे ब्रेकफास्ट के लिए
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मिलने लगे। सरप्राइजिंगली यह सब खुद को बार-बार एक ही चीज के बारे में बात करते हुए पाते थे स्टॉक मार्केट और इन्वेस्टिंग। सभी के मन में क्वेश्चंस थे कि आखिर क्यों एक डीममेट अकाउंट खोलना इतना पेनफुल है? म्यूच्यूल फंड्स इतने
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कॉम्प्लिकेटेड क्यों हैं? और आखिर क्यों केवल 2 करोड़ इंडियंस ही म्यूच्यूल फंड्स में इन्वेस्ट कर रहे थे। जबकि 20 करोड़ लोगों के पास इन्वेस्ट करने के पैसे थे। आल्सो इसी समय इंडिया में डिजिटल इंडिया इनिशिएटिव, आधार के चलते ईकेवाईसी और Jio
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की भी एंट्री हो चुकी थी। मतलब अनलाइक एडfx और Flipkart क्वic इस बार इनके स्टार्टअप के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर भी अवेलेबल था। इसीलिए इन सब ने डिसाइड किया कि ये फाइनेंशियल सर्विज स्पेस में ही स्टार्टअप बनाएंगे। आगे बढ़ने से पहले एक
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इंपॉर्टेंट अनाउंसमेंट हम हायर कर रहे हैं टैलेंटेड फ्रीलांस रिस्चरर्स और वीडियो एडिटर्स को जो हमारे कंटेंट को नेक्स्ट लेवल पर ले जा सकें। अगर आप हमारी टीम को ज्वाइन करना चाहते हैं तो आपको सिंपली इस ईमेल आईडी पे एक ईमेल लिखना है। ईमेल पे
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तीन चीजों को कवर कीजिए। व्हाई डू यू वांट टू वर्क विद अस? हाउ कैन यू हेल्प आवर चैनल ग्रो? और तीसरा अपना पास्ट वर्क एक्सपीरियंस एक्सप्लेन कीजिए और वर्क सैंपल्स अटैच कीजिए। आपके ईमेल का प्रोफेशनलिज्म, टोन और स्टाइल बहुत मैटर
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करता है। इसीलिए लिखने से पहले क्विलbot का Chrome एक्सटेंशन जरूर डाउनलोड कर लेना। क्वल बॉट रियल टाइम पे आपके ग्रामर, पंकुएशन और स्पेलिंग मिस्टेक्स को कैच कर लेगा और केवल एक क्लिक में उन्हें सही कर देगा। इनका पैराफ्रेज फीचर भी गेम चेंजर
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है। इसका यूज करके मैसेज को फॉर्मल, फ्लुएंट या क्रिएटिव जैसे अलग-अलग स्टाइल्स में ट्रांसफॉर्म किया जा सकता है। प्लस इनके एi टूल का यूज करके आप मनचाहे कस्टमाइजेशनंस कर सकते हैं। लेकिन क्विलबॉट का एक्सटेंशन केवल ईमेल के लिए
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नहीं है। यह हर उस वेबसाइट पर काम करता है जहां आप राइटिंग करते हो। Lindin, Twitter, Google D एवरीवेयर। बेसिकली ईमेल, सोशल मीडिया कैप्शंस, YouTube स्क्रिप्ट्स और प्रोजेक्ट रिपोर्ट्स जैसे हर एक काम में क्विलबॉट आपको क्लियरली और प्रोफेशनलली लिखने में हेल्प करता है।
Speaker A
एक्सटेंशन का लिंक और मेरी ईमेल आईडी दोनों ही पिंड कमेंट और डिस्क्रिप्शन में है। अब वीडियो पे वापस आते हैं। फाइनली 2017 में इन्होंने लॉन्च किया Go। एक ऐसा प्लेटफार्म जो इन्वेस्टिंग में सिंपलीसिटी का रिवॉल्यूशन लाने वाला था। शुरुआत में
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इन्होंने केवल एक वेबसाइट ल्च करी क्योंकि इनके पास ऐप बनाने के पैसे ही नहीं थे। Go की वेबसाइट में केवल म्यूच्यूल फंड्स के ऑप्शन थे। म्यूच्यूल फंड्स के बारे में सारी इंफॉर्मेशन जैसे फंड मैनेजर की प्रोफाइल, एक्सपेंस रेशियो, लास्ट वन, 3,
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5 और 10 इयर्स की परफॉर्मेंस और रिस्क रेटिंग भी थी। यूज़र्स अपने हिसाब से सभी इंफॉर्मेशन चेक करके इन्वेस्टमेंट डिसीजन ले सकते थे। इन्होंने सोचा कि अगर लॉन्च के फर्स्ट मंथ में 100 यूज़र्स आ गए, तो यह स्टार्टअप को कंटिन्यू रखेंगे। लेकिन पहले
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ही महीने 600 यूज़र्स आ गए। वो भी बिना किसी पेड मार्केटिंग के। सुनने में यह छोटी सी सक्सेस उन फाउंडर्स के लिए बहुत बड़ी अचीवमेंट थी। सभी चार्ज्ड अप फील कर रहे थे। Go महीने दर महीने नए यूज़र्स ऐड
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करता चला जा रहा था और इसी दौरान कंपनी के सीटीओ और को-फाउंडर नीरज सिंह ने Gro का ऐप भी बना दिया और फाइनली इन्हें रनोड इन्वेस्टर्स से फंडिंग भी मिल गई। Go को प्रोडक्ट मार्केट फिट मिल चुका था। और अब
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बारी थी पूरी ताकत लगा के इस प्रूवन कांसेप्ट को पूरे इंडिया में फैला देने की। लेकिन इस स्पेस में मार्केट में एंट्री करने वाला Go अकेला नहीं था। उसी दौरान Zerodha USTok और वन जैसे प्लेयर्स भी डिस्काउंट ब्रोकिंग सर्विज दे रहे थे
Speaker A
और इनसे निपटने के लिए ग्रो को कुछ यूनिक करना था। इन्होंने देखा कि इनके सभी कॉम्पिटिटर्स में एक चीज कॉमन थी। यह सब ही केवल डायरेक्ट स्टॉक इन्वेस्टिंग और ट्रेडिंग सर्विज देने पर फोकस कर रहे थे क्योंकि स्टॉक्स में ही सबसे ज्यादा
Speaker A
रेवेन्यू पोटेंशियल था। ऐसे में ग्रो ने डिसाइड किया कि वो एग्जैक्टली ऑोजिट करेंगे। उन्होंने ऐसे प्रोडक्ट से स्टार्ट करने का फैसला किया जो बेहद सिंपल था जिसमें बिगिनर्स भी आसानी से इन्वेस्ट कर सकते थे म्यूच्यूल फंड्स। इसके अलावा
Speaker A
इन्होंने एक और बोल्ड डिसीजन लिया। रेगुलर म्यूच्यूल फंड्स बंद करके केवल डायरेक्ट म्यूच्यूल फंड्स ऑफर किए। डायरेक्ट फंड्स के कंपैरिजन में रेगुलर फंड्स में यूज़र्स से 1 से 1ढ़% एक्स्ट्रा कमीशन चार्ज किया जाता है जो प्लेटफार्म को मिलता है। लेकिन
Speaker A
GO ने कस्टमर्स का फायदा देखते हुए अपना कमीशन कंप्लीटली जीरो कर दिया। इससे हुआ यह कि 2017 टू 202 करीब 4 साल तक Go का कोई मीनिंगफुल रेवेन्यू नहीं हुआ। लेकिन इसी दौरान इन्होंने करीब 2 करोड़ रजिस्टर्ड यूज़र्स भी बना लिए जो Go पे
Speaker A
ट्रस्ट करते थे। इसीलिए जब बाद में इन्होंने स्टॉक्स ल्च किया तो पहले ही दिन 1.8 लाख डीमेट अकाउंट्स खुल गए और यहां भी G ने जीरो अकाउंट ओपनिंग फीस रखी। जीरो एनुअल मेंटेनेंस चार्जेस रखे। जबकि G के बाकी मेजर कॉम्पिटिटर्स यह दोनों चार्जेस
Speaker A
लेवी कर रहे थे। इंस्टेड gro ने कस्टमर्स को सिर्फ स्टॉक्स बाय या सेल करने पर ही ब्रोकरेज चार्ज किया क्योंकि अभी भी फोकस रेवेन्यू पे नहीं ट्रस्ट पे था। इसके बाद एक-एक करके नए प्रोडक्ट्स लॉन्च होते चले गए। जैसे ईटीएफ, आईपीओ, इंट्राडे
Speaker A
ट्रेडिंग, एफएओ एटसेट्रा। जो प्लेटफार्म सिर्फ एक म्यूच्यूल फंड प्लेटफार्म की तरह स्टार्ट हुआ था। अब उसका विज़न था हर तरह की फाइनेंशियल सर्विज को ऑफर करना। इनफैक्ट जब इन्होंने स्टॉक्स ल्च करके मोनेटाइजेशन स्टार्ट किया तो इनका रेवेन्यू एक्सप्ललोड हो गया। फाइनेंसियल
Speaker A
ईयर 21 में 52.7 करोड़ से फाइनेंसियल ईयर 25 में 462 करोड़। करीब 77 टाइम्स ग्रोथ केवल 4 साल में। लेकिन केवल मल्टीपल प्रोडक्ट्स लॉन्च कर देने से सक्सेस नहीं मिलती। इनकी सक्सेस का असली राज था कस्टमर ऑब्सेशन। ललित केशरे आज भी सीईओ होते हुए
Speaker A
हर दिन 2 घंटे Go ऐप यूज करते हैं और कस्टमर्स से खुद इंटरेक्ट करते हैं क्योंकि उन्हें वह पर्सपेक्टिव चाहिए जो उनके यूज़र्स को मिलता है। हर एक एंप्लई चाहे इंजीनियर हो, डिजाइनर हो या खुद ललित केसरी सबको रेगुलरली कस्टमर सपोर्ट में
Speaker A
काम करना होता है ताकि सभी को पता रहे कि कस्टमर्स को एक्चुअली क्या प्रॉब्लम्स आ रही हैं। अगर किसी यूजर को ईकेवाईसी में दिक्कत है या प्रोसेस समझ नहीं आ रही तो Go का कस्टमर सपोर्ट एग्जीक्यूटिव खुद उनके घर जाता है सिग्नेचर्स लेने। लेकिन
Speaker A
इन्होंने कस्टमर ऑब्सेशन की सारी लिमिट क्रॉस करी 2023 में। सेबी ने एक रिपोर्ट निकाली कि एफएओ में ट्रेड करने वाले 10 में से नौ लोग पैसे लूज कर रहे थे। मतलब फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस ट्रेडिंग में 90% लोग फेल हो रहे थे। इसीलिए Go ने ऐसे फीचर्स
Speaker A
लाए जिससे यूज़र्स का फायदा था। लेकिन Gro का रेवेन्यू लॉस। अगर कोई यूजर लगातार लॉस कर रहा था तो ग्रो उसे ऑटोमेटिकली ट्रेडिंग से ब्लॉक कर देता था। डिपेंडिंग ऑन द लॉस अमाउंट एंड यूज़र्स इनकम। अगर मार्केट ज्यादा वोलेटाइल हो तो ऐसे में
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यूज़र्स को एफएओ ट्रेडिंग को पॉज करने का ऑप्शन दिया। और अगर यूजर सेफ लिमिट से ज्यादा लॉस करें तो उन्हें वार्निंग भी मिलती है। यह दिखाता है कि Go का फोकस है लॉन्ग टर्म लॉयल कस्टमर बेस बनाना। जब
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यूज़र्स देखते हैं कि ग्रो के फीचर्स उनके लॉसेस कम कर रहे हैं और उन्हें जेन्युइनली वेल्थ बिल्ड करने में मदद मिल रही है तो वह प्लेटफार्म से जुड़े रहते हैं। जितने लंबे समय तक कस्टमर ग्रो के थ्रू इन्वेस्टमेंट करते हैं, उतने ही ग्रो के
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रेवेन्यू कमाने के चांसेस भी बढ़ जाते हैं। Go के इसी कस्टमर ऑब्सेशन का रिजल्ट है कि आज इनके 70 टू 80% यूज़र्स वर्ल्ड ऑफ माउथ से आते हैं। फाइनली, Go की मार्केटिंग स्ट्रेटजी देख के लगता ही नहीं है कि यह मार्केटिंग है। क्योंकि इन्होंने
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ट्रेडिशनल मार्केटिंग का पूरा मॉडल ही फ्लिप कर दिया। जहां कॉम्पिटिटर्स करोड़ों लगा रहे थे टीवी एड्स, सेलिब्रिटी इंडोर्समेंट्स और इन्फ्लुएंसरर मार्केटिंग में, वहीं ग्रो ने अपना पूरा ध्यान एजुकेशन में लगा दिया। आज के दिन इनके 19 एजुकेशनल YouTube चैनल्स हैं। मेन चैनल पर
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2.4 मिलियन सब्सक्राइबर्स हैं। प्लस सात रीजनल लैंग्वेज चैनल्स हैं। तमिल, तेलुगु, कन्नडा, मलयालम, मराठी, गुजराती और बंगाली। जिसके चलते यह टिए टू और थ्री की नॉन इंग्लिश स्पीकिंग ऑडियंस तक ईली पहुंच पाते हैं। साथ ही इन्होंने स्पेशलाइज्ड चैनल्स भी खोल रखे हैं। जैसे म्यूच्यूल
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फंड्स वि ग्रो, आईपीओ रिव्यू बाय ग्रो और मनी टॉक्स बाय ग्रो फॉर पर्सनल फाइनेंस। इन्होंने इंटरनेट पर करीब 60 हजार से ज्यादा एजुकेशनल पेजेस खोल रखे हैं। जिनके मेनली तीन टाइप्स हैं। पहला एजुकेशनल आर्टिकल्स। दूसरा हजारों इंडिविजुअल स्टॉक
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पेजेस जिसमें डाटा रियल टाइम अपडेट होता है। और फाइनली 200 से ज्यादा कैलकुलेटर्स। जब कोई सर्च करता है व्हाट इज म्यूच्यूल फंड या TCS शेयर प्राइस या एसआईपी कैलकुलेटर तो इनके बेहतरीन एसइओ के चलते सर्च इंजन के फर्स्ट पेज पे Go का वेब पेज
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आता है जिसके चलते हर महीने करोड़ों लोग ऑर्गेनिकली go की वेबसाइट विजिट करते हैं एजुकेटेड होते हैं और अल्टीमेटली ग्रो पे ट्रस्ट करने लगते हैं। लेकिन इन्हें पता था कि केवल डिजिटल मार्केटिंग से काम नहीं चलेगा। इसीलिए 2020 में इन्होंने लॉन्च
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किया अब इंडिया करेगा इन्वेस्ट कैंपेन जिसमें इन्होंने आज तक 250 से भी ज्यादा सिटीज का टूर किया है। जिसमें 60% सिटीज टियर टू और टिए थ्री सिटीज हैं। इन्होंने इन शहरों में इंडस्ट्री एक्सपर्ट से फ्री वर्कशॉप्स और कॉन्फ्रेंसेस कंडक्ट करवाई
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ताकि ग्रो के थ्रू कस्टमर्स और न्यू इन्वेस्टर्स इन्वेस्टिंग सीख सकें। म्यूच्यूल फंड क्या है? एसआईपीस कैसे काम करती हैं? रिस्क कैसे मैनेज करना है? सब कुछ। Gro ने एसेंशियली मार्केटिंग को एजुकेशन से रिप्लेस कर दिया। जब लाखों यूज़र्स ने पहली बार इन्वेस्टिंग और पर्सनल
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फाइनेंस के बेसिक्स G से सीखे तो उनका ग्रो के ऊपर एक्सट्रीम ट्रस्ट बिल्ड हो गया। इसीलिए फाइनली जब उन्होंने इन्वेस्टिंग स्टार्ट करने का मन बना लिया तो उन्होंने नेचुरली ग्रो को ही चुना। ऑब्वियसली आज के दिन ब्रांड अवेयरनेस के
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लिए Go ने टीवी एड्स, क्रिकेट स्पॉनसरशिप्स और इन्फ्लुएंसरर मार्केटिंग में भी इन्वेस्ट करना चालू कर दिया है। अगर आप ध्यान से देखें तो Go के हर एक मार्केटिंग स्ट्रेटजी का केवल एक मेन गोल था कस्टमर का ट्रस्ट जीतना। जैसे में
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मार्केटिंग का डिसीजन पेपर में देखा जाए तो सबसे प्रैक्टिकल मार्केटिंग डिसीजन नहीं था। क्योंकि रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट पॉजिटिव नहीं था। लेकिन एड्स के थ्रू उनका ब्रांड नेम और लोगो करोड़ों इंडियंस तक पहुंच गया। जिससे बिल्ड होने वाली क्रेडिबिलिटी का फायदा आने वाले कई सालों
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तक मिलेगा। ललित केसरे ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वो इस कंपनी को आज के लिए या अगले साल के लिए नहीं बना रहे। वह इसे अगले कई डिकेड्स के लिए बना रहे हैं। और इसी लॉन्ग टर्म विज़न के चलते ग्रो की
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ग्रोथ हर साल कंपाउंड हो रही है। यह आज इंडिया के 98% प्लस पिन कोड्स में यूज किए जा रहे हैं। और करीब 27% मार्केट शेयर के साथ यह इंडिया के नंबर वन स्टॉक ब्रोकर हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि Go ने
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यह सब कुछ अचीव किया कस्टमर को एक्सप्लइट करके नहीं बल्कि उन्हें एजुकेट करके। यह कहानी थी Gro की। वीडियो अच्छी लगी तो मैं रेकमेंड करूंगा कि आप नेक्स्ट इस वीडियो को देखें। [संगीत]
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