Skip to content
Get App

38 Ways to Win an Argument

लॉजिक और डायलेक्टिक के बीच अंतर, बहस की कला और जीतने के तरीके पर विस्तृत चर्चा।

Key Takeaways

  • लॉजिक और डायलेक्टिक दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं, एक सोचने का तरीका है और दूसरी बहस करने का हुनर।
  • बहस में जीतना जरूरी नहीं कि सच साबित करना हो, बल्कि चालाकी से अपनी बात मनवाना होता है।
  • इंसान की जिद और घमंड बहस को जटिल बनाते हैं, इसलिए सोच-समझकर बोलना जरूरी है।
  • बहस की कला सीखकर हम अपने विचारों को बेहतर तरीके से प्रस्तुत कर सकते हैं।
  • सच की खोज और बहस में जीतना दो अलग-अलग चीजें हैं, दोनों को समझना आवश्यक है।

What the video covers

  • लॉजिक का मतलब है गहराई से सोचना और दिमाग के काम करने का सही तरीका।
  • डायलेक्टिक का मतलब है बहस करने का हुनर और बातचीत के माध्यम से अपनी बात मनवाना।
  • पुराने समय में दोनों शब्दों का अर्थ लगभग समान माना जाता था, लेकिन बाद में डायलेक्टिक का अर्थ बहस में जीतने की चालाकी से जुड़ गया।
  • इंसान की फितरत जिद्दी होती है, जिससे बहस में सच की जगह अपनी बात मनवाना ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।
  • बहस में जीतना जरूरी नहीं कि सच साबित करना हो, बल्कि चालाकी से अपनी बात रखना होता है।
  • अरस्तु और प्लेटो ने डायलेक्टिक को बहस की कला के रूप में समझाया, लेकिन सच और जीत के बीच फर्क बताया।
  • बहस करने के नियम और लॉजिक के नियम अलग होते हैं, और दोनों को अलग-अलग समझना चाहिए।
  • बहस में ईमानदारी कम होती है क्योंकि लोग अपनी बात पर अड़े रहते हैं और सच को नजरअंदाज कर देते हैं।
  • बहस की कला सीखकर कोई भी अपनी बात को बेहतर तरीके से प्रस्तुत कर सकता है और जीत सकता है।
  • सच का पता लगाना अलग प्रक्रिया है, बहस का मकसद अपनी बात को प्रभावी ढंग से मनवाना है।

Answers

Questions about this video

लॉजिक और डायलेक्टिक में क्या अंतर है?

लॉजिक दिमाग के सही सोचने के तरीके को दर्शाता है जबकि डायलेक्टिक बहस करने का हुनर है जिसमें बातचीत के जरिए अपनी बात मनवाना शामिल है।

डायलेक्टिक का असली मकसद क्या है?

डायलेक्टिक का मकसद बहस के दौरान अपनी बात को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर जीतना है, न कि केवल सच को ढूंढना।

क्या बहस में हमेशा सच जीतता है?

नहीं, बहस में अक्सर चालाकी और अपनी बात को मनवाने की कला जीतती है, चाहे सच सामने हो या न हो।

Full Transcript — Download SRT & Markdown

00:01
Speaker A
पुराने जमाने में दो भारीभरकम शब्दों लॉजिक और डायलेक्टिक का मतलब एक ही माना जाता था। हालांकि असल में इन दोनों का काम बहुत अलग है। लॉजिक का मतलब होता है गहराई से सोचना या हिसाब लगाना। जबकि डायलेक्टिक का मतलब होता है आपस में बातचीत करना।
00:23
Speaker A
किताबों से पता चलता है कि प्लेटो नाम के एक बड़े ज्ञानी ने सबसे पहले डायलेक्टिक शब्द का इस्तेमाल किया था। उनके लिए इसका मतलब था अपनी अकल, अपनी रीजन को सही तरीके से चलाने का हुनर। इसके बाद अरस्तु ने भी इसी मतलब में इस
00:43
Speaker A
शब्द का इस्तेमाल किया। लेकिन कहा जाता है कि अरस्तु ने ही सबसे पहले लॉजिक शब्द को भी इसी काम के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया। इस तरह डायलेक्टिक शब्द लॉजिक से थोड़ा ज्यादा पुराना है। सैकड़ों सालों तक लोग इन दोनों शब्दों को
01:02
Speaker A
एक जैसा ही समझते रहे। और आज भी कई लोग ऐसा ही करते हैं। पर कुछ समय पहले काट नाम के एक लेखक ने डायलेक्टिक शब्द को एक बुरे अंदाज में इस्तेमाल किया। उन्होंने इसका मतलब बताया बहस या आर्गुमेंट में जीतने की
01:20
Speaker A
चालाकी। इस वजह से लोग लॉजिक शब्द को ज्यादा शरीफ और अच्छा समझने लगे। पर सच तो यह है कि शुरू में यह दोनों एक ही चीज के दो नाम थे। और अब फिर से लोग इन्हें एक ही समझने लगे हैं।
01:36
Speaker A
बड़े अफसोस की बात है कि पुराने समय से ही इन शब्दों का इस्तेमाल एक जैसा होता आ रहा है। अगर मेरी चलती तो मैं इन दोनों का मतलब एकदम अलग-अलग रखता। [संगीत] मेरे हिसाब से लॉजिक का मतलब होना चाहिए दिमाग
01:52
Speaker A
के काम करने का सही तरीका। यानी जब इंसान अकेला बैठकर बिना किसी रुकावट के शांति से सोचता है तो उसका दिमाग जिन नियमों पर चलता है उसे लॉजिक कहना चाहिए। दूसरी तरफ डायलेक्टिक का मतलब होना चाहिए बहस करने
02:11
Speaker A
का हुनर। जब दो समझदार लोग आपस में बातचीत करते हैं तो कायदे से उन्हें एक जैसा ही सोचना चाहिए। लेकिन हम इंसान कोई मशीन या घड़ी नहीं है जो हमेशा एक ही समय दिखाएं। जैसे ही दो लोगों की सोच अलग होती है उनके बीच दिमागी
02:30
Speaker A
मुकाबला या इंटेलेक्चुअल कॉन्टेस्ट शुरू हो जाता है। अगर हम सिर्फ मशीनों की तरह होते तो हम हमेशा एक दूसरे से सहमत होते। पर हम सब अलग-अलग हैं। इसलिए हमारी सोच भी अलग होती है। यही वजह है कि लॉजिक को तो हम बिना किसी
02:51
Speaker A
बाहरी दुनिया के अनुभव के ही समझ सकते हैं। क्योंकि यह सिर्फ हमारे अपने दिमाग के अंदर की [संगीत] बात है। लेकिन डायलेक्टिक को समझने के लिए हमें लोगों के बीच जाकर उन्हें देखना परखना होगा। हमें यह देखना होगा कि जब दो लोगों की राय
03:08
Speaker A
अलग होती है तो वे एक दूसरे को निशाना दिखाने के लिए क्या-क्या तरीके अपनाते हैं। इंसान की फितरत इंसान का नेचर ही कुछ ऐसा है कि अगर ए और बी किसी बात पर चर्चा कर रहे हो और ए को लगे कि बी की बात उसकी सोच
03:26
Speaker A
से अलग है तो ए अपनी गलती नहीं ढूंढेगा। वह सबसे पहले यही मान लेगा कि गलती बी के सोचने के तरीके में है। असल में इंसान पैदाइशी तौर पर जिद्दी होता है। इस जिद्दीपन की वजह से ही जो बहसबाजी होती
03:44
Speaker A
है उसी की पढ़ाई को मैं डायलेक्टिक कहना चाहता हूं। सीधे शब्दों में कहें तो यह इंसान के इसी अियल स्वभाव को समझने का एक तरीका है। इरिस्टिक बस उसी चीज का एक थोड़ा कड़क नाम है। इसे हम बहसबाजी का हुनर कह सकते हैं।
04:06
Speaker A
कंट्रोवर्शियल डायलेक्टिक। यह बहस करने की वो कला है जिसमें इंसान को बस अपनी बात ऊपर रखनी होती है। चाहे वह सच बोल रहा हो या झूठ। कभी-कभी ऐसा होता है कि एक आदमी सच बोल रहा है। लेकिन फिर भी साथ खड़े लोगों को
04:25
Speaker A
लगता है कि वह हार गया। मान लीजिए मैंने अपनी बात सही साबित करने के लिए कोई एक सबूत दिया। अब सामने वाले ने उस सबूत को गलत ठहरा दिया। बस सबको लगेगा कि मेरी पूरी बात ही गलत है। भले ही मेरे पास अपनी
04:42
Speaker A
बात को सही साबित करने के और भी कई तरीके हो। यहां पासा पलट जाता है। सामने वाला गलत होकर भी जीत जाता है और मैं सही होकर भी हार जाता हूं। अब आप सोचेंगे कि ऐसा क्यों होता है? तो
04:59
Speaker A
यह इंसान की फितरत या नेचर की कमजोरी या बुराई है। अगर हम सब बहुत ज्यादा ईमानदार होते तो बहस के वक्त हमारा एक ही काम होता। सच को ढूंढना। हमें जरा भी फर्क नहीं पड़ता कि सच मेरी बात में है या
05:16
Speaker A
सामने वाले की बात में। लेकिन असली दुनिया में ऐसा नहीं होता। हम सबको अपनी अकल, अपनी इंटेलिजेंस पर बहुत घमंड होता है। हमारा यह घमंड यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि हम शुरू में गलत थे और सामने वाला सही।
05:34
Speaker A
इस मुश्किल से बचने का एक ही रास्ता था। बोलने से पहले अच्छी तरह सोचना। लेकिन ज्यादातर लोगों के साथ यह दिक्कत है कि वे सोचने से पहले ही बोलने लगते हैं और जब उन्हें बाद में पता चलता है कि वे गलत
05:48
Speaker A
हैं तब भी वे यही चाहते हैं कि लोग उन्हें सही [गला साफ़ करने की आवाज़] समझे। उनके लिए सच अब जरूरी नहीं रह जाता बल्कि उनका घमंड जरूरी हो जाता है। इसीलिए वे सच को झूठ और झूठ को सच दिखाने की कोशिश करने
06:04
Speaker A
लगते हैं। हालांकि इस बेईमानी और अपनी बात पर अड़े रहने के पीछे भी एक वजह होती है। कई बार ऐसा होता है कि हमें पूरा यकीन होता है कि हम सही बोल रहे हैं। लेकिन सामने वाले की बात हमें गलत साबित कर देती है।
06:23
Speaker A
अगर हम उसी वक्त हार मान ले तो हो सकता है कि बाद में हमें पता चले कि हम तो सच में सही थे। बस उस वक्त हमारे पास सही सबूत नहीं था या हमें सही बात याद नहीं आई।
06:37
Speaker A
इसी डर से हम सामने वाले की बात को काटते रहते हैं। भले ही उस वक्त उसकी बात सही लग रही हो। हमें लगता है कि बहस करते-करते हमें कोई ऐसा नया पॉइंट मिल जाएगा जिससे हम अपनी बात को सही साबित कर देंगे।
06:53
Speaker A
इस चक्कर में हम लगभग बेईमान बनने पर मजबूर हो जाते हैं। यहां हमारी अकल की कमजोरी और हमारा जिद्दी मन एक दूसरे का साथ देने लगते हैं। ज्यादातर लोग सच के लिए नहीं लड़ते बल्कि अपनी बात को ऊपर रखने के लिए ऐसे लड़ते
07:10
Speaker A
हैं जैसे अपनी जान बचा रहे हो। वह चाहे सही हो या गलत बस अपनी बात पर अड़े रहना चाहते हैं। एक तरह से हर इंसान के पास चालाकी का अपना-अपना हथियार होता है। जैसे हम सबके पास सोचने का अपना तरीका
07:29
Speaker A
होता है। वैसे ही बहस करने का अपना हुनर भी होता है। लेकिन सोचने के मुकाबले बहस करना ज्यादा मुश्किल है। अकल के मामले में इंसान कम ही गलती करता है। यानी गलत नतीजा निकालना इतना आसान नहीं है। लेकिन बहस करने का हुनर हर किसी के पास एक
07:49
Speaker A
जैसा नहीं होता। यह वैसा ही है जैसे फैसले लेने की ताकत हर इंसान में अलग-अलग होती है। भले ही दिमाग सबके पास एक जैसा हो। अक्सर ऐसा होता है कि एक आदमी अपनी बात में एकदम सही होता है। लेकिन सामने वाले
08:09
Speaker A
की ऊपरी बातों की वजह से वह हार मान लेता है। और जो इंसान बहस में जीतता है, वह इसलिए नहीं जीतता कि उसकी बात सही थी। बल्कि इसलिए जीतता है क्योंकि उसे चालाकी से अपनी बात रखना आता है।
08:25
Speaker A
जैसे बाकी सब चीजों में होता है। बहस करने का सबसे बढ़िया हुनर भी इंसान के साथ पैदा ही होता है। फिर भी बार-बार मेहनत करके और यह सीख कर कि सामने वाले को हारने के लिए कौन सी चाले चलनी हैं, कोई भी इस कला का
08:45
Speaker A
मास्टर बन सकता है। सच तो यह है कि अकेले बैठकर गहराई [हंसी] से सोचने के नियम शायद रोजाना की दुनिया में उतने काम ना आएं। लेकिन बहस करने का तरीका पक्का काम आता है। मुझे तो लगता है कि अरस्तु ने भी एरिस्टोटल ने भी सोचने के
09:03
Speaker A
कायदों को सिर्फ एक फाउंडेशन की तरह बनाया था। ताकि वे बहस करने के अपने असली काम की तैयारी कर सकें। लॉजिक सिर्फ बातों के ऊपरी बनावट को देखता है। लेकिन डायलेक्टिक बातों के अंदर के असली माल, असली सब्सटेंस पर ध्यान देता है।
09:22
Speaker A
इसीलिए किसी भी चीज की गहराई में जाने से पहले यह देखना जरूरी है कि बातें कही कैसे जाती हैं। अरस्तु ने डायलेक्टिक के मतलब को उतनी साफ तरह से नहीं बताया जितना मैं यहां बता रहा हूं। उन्होंने यह तो माना कि इसका काम
09:39
Speaker A
बहसबाजी करना है। पर साथ ही यह भी कह दिया कि इससे सच भी ढूंढा जाता है। उन्होंने बाद में यह भी कहा कि अगर हम ज्ञान की नजर से देखें तो बातें सच होनी चाहिए। लेकिन डायलेक्टिक के हिसाब से जरूरी है कि आपकी
09:55
Speaker A
[संगीत] बात लोगों को कितनी सही लगती है और कितने लोग आपकी बात मान लेंगे। वे जानते थे कि सच होना और अपनी बात मनवा लेना दो अलग चीजें हैं। पर वे इन दोनों के बीच एक पक्की दीवार नहीं बना पाए।
10:12
Speaker A
उन्होंने बहस के जो नियम दिए उनमें से कई नियम तो सिर्फ अकेले बैठकर सोचने के तरीके के थे। इसलिए मुझे लगता है कि उन्होंने इस उलझन का कोई साफ हल नहीं निकाला। हमें हर पढ़ाई को एक दूसरे से एकदम अलग
10:30
Speaker A
रखना चाहिए। अगर आप बहस करने के हुनर को समझना चाहते हैं तो असली सच पर ध्यान मत दीजिए। सच का पता लगाना तो सोचने के तरीके का काम है। बहसबाजी को तो बस एक ऐसी कला की तरह देखिए जिससे आप मुकाबले में जीत
10:48
Speaker A
सकें। जैसा कि हमने देखा है अगर आप सचमुच सही हैं तो जीतना और भी आसान हो जाता है। इस हुनर का बस इतना ही काम है कि वह आपको हर तरह के हमलों से बचना सिखाए। खासकर जब कोई आपसे बेईमानी करे। साथ ही यह आपको
11:10
Speaker A
सिखाता है कि कैसे आप दूसरे की बात को काट सकते हैं। बिना अपनी ही बातों में उलझे। सच क्या है? यह ढूंढना एक अलग मामला है। और अपनी बात लोगों से मनवाना एक एकदम अलग चीज। सच का पता तो सही फैसले और
11:28
Speaker A
एक्सपीरियंस से चलता है। उसके लिए कोई अलग से जादुई हुनर नहीं होता। यही बहस यानी डायलेक्टिक का असली मकसद है। कुछ लोग इसे दिखावे का खेल कहते हैं। पर यह कहना गलत होगा। अगर ऐसा होता तो इसका इस्तेमाल सिर्फ झूठ को रोकने के लिए होता।
11:50
Speaker A
सच तो यह है कि अगर कोई इंसान सही भी है तब भी उसे अपनी बात बचाने के लिए इस हुनर की जरूरत पड़ती है। उसे पता होना चाहिए कि सामने वाला कौन सी गंदी चालें चल सकता है ताकि वह उनका जवाब दे सके।
12:07
Speaker A
कभी-कभी तो दुश्म...
12:24
Speaker A
सही ठहराने और दूसरे की बात को गलत साबित करने पर ध्यान देना चाहिए। इन नियमों का पालन करते समय सच की फिक्र मत कीजिए क्योंकि अक्सर हमें खुद नहीं पता होता कि सच आखिर [हंसी] है कहां? सच बहुत गहरा होता है। जब बहस शुरू
12:45
Speaker A
होती है तो हर किसी को यही लगता है कि वही सही है। फिर जैसेजैसे बहस आगे बढ़ती है, सबको शक होने लगता है। सच का पता तो एकदम आखिर में जाकर ही हमें चलता है। तो समझ लीजिए कि इस बहसबाजी इस डायलेक्टिक
13:03
Speaker A
का सच से कोई लेना देना नहीं है। यह बिल्कुल तलवारबाजी सिखाने वाले मास्टर जैसा है। जब दो लोगों के बीच मुकाबला होता है तो मास्टर यह नहीं देखता कि कौन सही है और कौन गलत। उसका पूरा काम बस यह सिखाना
13:19
Speaker A
है कि वॉर कैसे करना [हंसी] है और अपना बचाव कैसे करना है। यह डायलेक्टिक असल में दिमाग की तलवारबाजी का हुनर है। इंटेलेक्चुअल फेंसिंग है। अगर हम इसमें सिर्फ असली सच ढूंढने निकलेंगे तो यह लॉजिक बन जाएगा। और अगर हम सिर्फ जानबूझकर
13:38
Speaker A
झूठ को सच साबित करेंगे तो यह धोखाधड़ी बन जाएगा। पर दिक्कत यह है कि बहस शुरू होने से पहले हमें खुद नहीं पता होता कि सच आखिर है क्या? इसलिए इस हुनर का असली मतलब यही है कि दिमाग की ऐसी तलवारबाजी जिससे
13:54
Speaker A
हम बहस में अपनी बात ऊपर रख सकें। इस पढ़ाई का बस एक ही मकसद है उन सारी चालों को इकट्ठा करना जो लोग तब इस्तेमाल करते हैं जब उन्हें लगता है कि वे हार रहे हैं। फिर भी वे जीतना चाहते हैं।
14:11
Speaker A
आमतौर पर जब लोग आपस में भिड़ते हैं तो उन्हें सच की परवाह नहीं होती। उन्हें सिर्फ जीत चाहिए होती है। इसलिए हम यहां उन गंदी चालों की जांच पड़ताल करेंगे ताकि असली बहस के दौरान हम उन्हें तुरंत पहचान
14:26
Speaker A
सके और सामने वाले को हरा सके। मैंने इसके बारे में बहुत पता किया। पर मुझे कहीं भी इस पर कोई खास जानकारी नहीं मिली। यह एक ऐसा मैदान है जहां अब तक किसी ने काम नहीं किया है। इस काम को पूरा करने
14:43
Speaker A
के लिए हमें अपने एक्सपीरियंस, अपने अनुभव का सहारा लेना होगा। हमें ध्यान से देखना होगा कि जब हमारे आसपास लोग आपस में बहस करते हैं तो वे कौन-कौन सी चाले चलते हैं। जब हम इन आम चालों को समझ लेंगे तो हम खुद
15:00
Speaker A
भी उनका सही इस्तेमाल कर पाएंगे और दूसरों को हमें बेवकूफ बनाने से रोक पाएंगे। सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि किसी भी बहस में असल में होता क्या है। सामने वाला कोई एक बात रखता है। अब उस बात को गलत साबित करने के दो मेन
15:24
Speaker A
तरीके और दो रास्ते होते हैं। मेन तरीका और रिम। इसमें हम यह दिखाते हैं कि सामने वाले की बात दुनिया की सच्चाई से मेल नहीं खाती। यानी वह बात ही गलत है। दूसरा अ होमिनेम। इसमें हम दिखाते हैं कि सामने वाले की बात
15:49
Speaker A
उसकी ही पुरानी बातों या उसके व्यवहार उसके बिहेवियर से मेल नहीं खाती। भले ही वह बात सच हो या झूठ। हम बस यह दिखाते हैं कि वह अपनी ही बातों में उलझ गया है। यह दो मुख्य तरीके यानी द मोड्स हैं। फिर दो
16:08
Speaker A
मुख्य रास्ते हैं। द कोर्सेज हैं। पहला सीधा हमला। इसमें हम बात की वजह पर चोट करते हैं। हम दिखाते हैं कि जिस आधार पर यह बात कही गई है, वही गलत है। यानी यह बात सच नहीं है। दूसरा टेढ़ा हमला। इसमें हम बात के नतीजे
16:30
Speaker A
यानी बात के रिजल्ट पर गौर करते हैं। हम दिखाते हैं कि अगर यह बात मान ली जाए तो इसके नतीजे बहुत ही अजीब या गलत निकलेंगे। यानी यह बात सच हो ही नहीं सकती। सीधे हमले के दो दाव हैं। या तो आप यह कह
16:48
Speaker A
दें कि जो कारण जो रीजन दिया गया है वही झूठा है। या फिर आप यह मान ले कि कारण तो ठीक है लेकिन उससे जो नतीजा निकाला जा रहा है वह गलत है। यानी बात का तालमेल ही ठीक
17:03
Speaker A
नहीं है। टेढ़े हमले की दो चाले हैं। पहली बात को घुमाना। या हम थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि सामने वाला सच कह रहा है। फिर हम उसकी बात को किसी दूसरी ऐसी बात से जोड़ देते हैं
17:19
Speaker A
जिसे सब सच मानते हैं। अगर इन दोनों को मिलाने से आखिर में कोई ऐसी बात निकले जो एकदम बेवकूफी भरी या गलत हो तो इसका मतलब है कि सामने वाले की पहली बात ही गलत थी। क्योंकि सच से कभी झूठ पैदा नहीं हो सकता।
17:39
Speaker A
दूसरा है उल्टा उदाहरण। यह बहुत ही आसान और असरदार तरीका है। अगर सामने वाला कोई ऐसी बात कहे जो सब पर लागू होती हो तो आप बस एक ऐसा एग्जांपल एक ऐसा उदाहरण दे दें जहां यह बात फेल हो जाती
17:56
Speaker A
हो। जैसे ही आप एक भी उल्टा एग्जांपल देंगे सामने वाले का पूरा दाव, पूरा क्लेम मिट्टी में मिल जाएगा। यह हर बहस हर डिबेट का एक ढांचा या स्केलेटन है। दुनिया की सारी बहसें आखिर में इसी एक सांचे में फिट हो जाती हैं। कभी-कभी बहस
18:17
Speaker A
सचमुच ऐसी होती है और कभी-कभी बस वैसी दिखने की कोशिश करती है। अब क्योंकि सच क्या है? यह पता लगाना आसान नहीं है। इसीलिए बहसें इतनी लंबी और जिद्दी हो जाती हैं। हम बहस के वक्त यह नहीं देख सकते कि
18:35
Speaker A
असली सच क्या है और झूठ क्या? क्योंकि बहस करने वालों को खुद भी पहले से पक्का पता नहीं होता। इसलिए मैं यहां सिर्फ उन चालों के बारे में बताऊंगा जिन्हें लोग जीत के लिए चलते हैं। एक बात याद रखिए किसी भी मुद्दे पर
18:52
Speaker A
बहस करने के लिए कुछ बुनियादी बातों को मानना जरूरी है। जो इंसान बुनियादी बातों को प्रिंसिपल्स को नहीं मानता उसके साथ बहस करना बेकार है। चाल नंबर एक बात को बहुत ज्यादा खींचना। इस चाल में आप सामने वाले की बात को उसकी
19:15
Speaker A
सीमा से बाहर ले जाते हैं। आप उसकी बात को इतना फैला देते हैं कि वह बहुत बड़ी और आम लगने लगे। दूसरी तरफ अपनी बात को जितना हो सके उतना छोटा कर लें। इसका कारण यह है कि बात जितनी बड़ी और आम होगी उस पर उतने ही
19:33
Speaker A
ज्यादा सवाल उठाए जा सकते हैं। इस चाल से बचने का तरीका यह है कि अपनी बात को एकदम साफ रखें। कि आप किस बारे में बात कर रहे हैं। एग्जांपल मान लीजिए मैंने कहा इंग्लैंड के लोग नाटक लिखने में सबसे ऊपर
19:50
Speaker A
हैं। अब सामने वाले ने मुझे हराने के लिए कहा। सबको पता है कि उन्हें म्यूजिक की कोई समझ नहीं है। इसलिए वे ओपेरा में एकदम फिसड्डी हैं। मैंने उसे रोकते हुए जवाब दिया। अरे भाई म्यूजिक नाटक का हिस्सा नहीं है। नाटक में
20:09
Speaker A
सिर्फ दुखी या हंसीज़ाक वाली कहानियां आती हैं। उसने मेरी बात को खींच कर थिएटर की हर चीज पर लागू करने की कोशिश की थी ताकि मुझे हरा सके। पर मैंने अपनी बात को छोटा करके खुद को बचा लिया। एक और एग्जांपल।
20:28
Speaker A
एक आदमी ने कहा 1814 के समझौते ने जर्मनी के सभी शहरों को आजाद कर दिया। दूसरे ने तुरंत सबूत दिया पर डांजिंग शहर ने तो अपनी आजादी खो दी थी। पहले वाले ने खुद को बचाने के लिए कहा। मैंने जर्मनी के शहरों
20:46
Speaker A
की बात की थी और डाजिंग तो पोलैंड का हिस्सा था। इस तरह उसने अपनी बात को छोटा कर लिया और हारने से बच गया। पुराने जमाने के बड़े ज्ञानी अरस्तु या जिन्हें हम एरिस्टोटल कहते हैं। उन्होंने भी अपनी किताब में इस चाल का जिक्र किया
21:03
Speaker A
था। एक और एग्जांपल लामार्क नाम के एक लेखक ने अपनी किताब में लिखा कि पॉलिप नाम के छोटे समुद्री जीव कुछ भी महसूस नहीं करते क्योंकि उनके शरीर में नर्वस नहीं होती। लेकिन यह पक्का है कि वे लाइट को पहचानते
21:22
Speaker A
हैं क्योंकि वे लाइट की तरफ बढ़ते हैं और अपना शिकार भी पकड़ते हैं। इससे लोगों ने यह अंदाजा लगाया कि शायद उनकी नर्व्स पूरे शरीर में फैली हुई है। अब अपनी बात को बचाने के लिए लामार्क ने एक चाल चली। उन्होंने इस बात को इतना
21:42
Speaker A
ज्यादा खींच दिया कि वह मजाक लगने लगा। उन्होंने कहा अगर ऐसा है तो उस जीव के शरीर का हर हिस्सा देख सकेगा, सूंघ सकेगा और सोच भी सकेगा। तब तो वह छोटा सा जीव इंसान से भी बड़ा हो गया। क्योंकि इंसान
21:57
Speaker A
का हर हिस्सा तो नहीं सोच सकता। यहां लामार्क ने चालाकी दिखाई। सिर्फ इसलिए कि वह जीव लाइट को महसूस कर सकता है। लामार्क ने यह कह दिया कि वह सोचता भी है ताकि वे बहस जीत सके। जब कोई ऐसी चाल चलता है तो समझिए उसे अंदर
22:17
Speaker A
ही अंदर पता है कि वह गलत है। चाल नंबर दो एक जैसे शब्द का खेल। यह चाल तब चली जाती है जब आप किसी ऐसे शब्द को पकड़ लेते हैं जिसके दो अलग-अलग मतलब होते हैं। आप सामने वाले की बात का
22:36
Speaker A
वह मतलब निकालते हैं जो उसने सोचा भी नहीं था। और फिर उसे गलत साबित करके अपनी जीत की खुशी मनाते हैं। इसे ऐसे समझिए। सिनोनिम का मतलब है दो अलग शब्द जिनका मतलब एक हो। पर होमोनियम का मतलब है एक ही
22:54
Speaker A
शब्द जिसके दो अलग मतलब हो। जैसे तीखा शब्द मिर्च के लिए भी इस्तेमाल होता है और किसी की कड़वी बात के लिए भी। इस चाल का एक मजेदार एग्जांपल देखिए। हर लाइट को बुझाया जा सकता है। इंसान की अकल, इंसान
23:11
Speaker A
की इंटेलेक्ट भी एक लाइट है। इसलिए इंटेलेक्ट को भी बुझाया जा सकता है। यहां लाइट शब्द के दो अलग काम है। पहली लाइन में लाइट का मतलब आग या बल्ब है। पर दूसरी लाइन में यह सिर्फ एक मेटाफर है।
23:27
Speaker A
अगर कोई चालाकी से ऐसी बात कहे तो सुनने वाला उलझन में पड़ सकता है। यह चाल तभी काम करती है जब लोग एक ही शब्द के दो अलग मतलबों के बीच का फर्क ना समझ पाए। कितना अच्छा होता अगर हम हर चालाकी
23:45
Speaker A
का एक छोटा और प्यारा सा नाम रख देते। इससे जैसे ही कोई बहस के दौरान वह चाल चलता, हम तुरंत उसे पकड़ लेते और टोक देते। आइए एक ही शब्द के दो मतलब वाली चाल के दो और एग्जांपल्स देखते हैं। पहला
24:03
Speaker A
एग्जांपल पहला आदमी ए अभी तुम्हें कांट की सोच के गहरे राज नहीं पता है। दूसरा आदमी बी अच्छा अगर यह कोई राजवाज वाली बात है तो मुझे इसमें बिल्कुल नहीं पड़ना। यहां राज शब्द के दो मतलब निकाले गए। एक
24:23
Speaker A
का मतलब था गहरा ज्ञान और दूसरे का मतलब कोई छुपी हुई या बुरी चीज। एक और एग्जांपल मैंने एक बार कहा कि इज्जत के नाम पर झगड़ा करना बेवकूफी है। पुराने नियमों के हिसाब से अगर कोई आपको गाली दे [संगीत] तो
24:39
Speaker A
आपकी इज्जत चली जाती है। उसे वापस पाने के लिए आपको या तो उसे और बड़ी गाली देनी होगी या फिर उसका खून बहाना होगा। मैंने दलील दी कि इंसान की असली इज्जत उसके अपने काम से बनती है। ना कि इस बात
24:55
Speaker A
से कि दूसरे उसके साथ क्या बुरा करते हैं। पर मेरे सामने वाले ने मुझ पर तुरंत हमला किया। उसने सबूत दिया कि अगर किसी दुकानदार पर बेईमानी या काम में लापरवाही का झूठा इल्जाम लगाया जाए तो यह उसकी
25:10
Speaker A
इज्जत पर हमला है। यहां उसकी इज्जत उस बात से खराब हुई जो उसके साथ हुई [संगीत] यानी इल्जाम लगना। उसे अपनी इज्जत वापस पाने के लिए इल्जाम लगाने वाले को सजा दिलवानी ही होगी। यहां उसने एक चालाकी चली।
25:28
Speaker A
उसने समाज के अच्छे नाम यानी रेपुटेशन और पुराने जमाने की अकड़ इन दोनों को एक ही समझ लिया क्योंकि दोनों के लिए इज्जत शब्द का इस्तेमाल होता है। उसने बिजनेस के भरोसे वाली बात को लड़ाई झगड़े वाली इज्जत
25:43
Speaker A
से मिला दिया ताकि वह बहस को घुमा सके और जीत जाए। चाल नंबर तीन। किसी खास बात को सबके लिए सच मान लेना। एक और चला यह है कि जब सामने वाला किसी एक खास चीज के बारे में कोई बात कहे तो आप
26:06
Speaker A
उसे ऐसे दिखाएं जैसे उसने वह बात पूरी दुनिया या हर चीज के लिए कही हो। या फिर उसके बाद का कोई दूसरा ही मतलब निकाल लें और फिर उसे गलत साबित करने में जुट जाए। पुराने जमाने में एरिस्टोटलल यानी अरस्तु
26:22
Speaker A
ने इसका एक एग्जांपल दिया है। एक काला आदमी है पर उसके दांत एकदम सफेद हैं। तो क्या वह एक ही समय पर काला भी है और काला नहीं भी। यह तो बहुत साफ दिखने वाली चालाकी है। जिससे कोई भी बेवकूफ नहीं
26:40
Speaker A
बनेगा। लेकिन असल जिंदगी में लोग इसे बहुत चतुराई से इस्तेमाल करते हैं। जैसे मेरे साथ एक बार हुआ। बातोंबातों में मैंने एक खास गुट की तारीफ की। थोड़ी देर बाद बात एक लेखक हेगल पर शुरू हुई और मैंने कहा कि उसकी लिखी बातें
26:58
Speaker A
ज्यादातर बेकार हैं। नॉनसेंस है। सामने वाले ने मुझ पर तुरंत हमला किया और कहा अभी तो आप उन लोगों की तारीफ कर रहे थे जिन्होंने खुद भी बहुत सी बेकार बातें लिखी हैं। मैंने तुरंत अपना बचाव किया। मैंने कहा अरे भाई मैंने उनकी तारीफ उनके
27:15
Speaker A
अच्छे बर्ताव और काम करने के तरीके के लिए की थी ना कि उनकी किताबों के लिए लेकिन हेगुल की तो हम सिर्फ किताबों और सोचने के तरीके की बात कर रहे हैं। इस तरह मैंने उसकी चाल को बेकार कर दिया।
27:31
Speaker A
यह शुरू की तीनों चाले एक जैसी ही हैं। इनमें सामने वाला उस बात पर हमला नहीं करता जो आपने असल में कही है। बल्कि वह बात को घुमाकर किसी और चीज पर हमला कर देता है। अगर आप यह नहीं समझ पाए तो आप
27:47
Speaker A
बिना बात के अपनी हार मान लेंगे। [संगीत] इन सब एग्जांपल्स में सामने वाला जो कह रहा है वह शायद सच हो। पर उसका आपकी बात से कोई लेना देना नहीं होता। आपको बस इतना करना है कि उसके नतीजे उसके कंक्लूजन को
28:04
Speaker A
मानने से मना कर दें। आपको कहना चाहिए आपकी बात तो ठीक है पर इससे मेरी बात गलत साबित नहीं होती। एक और शल यह होती है कि लोग आपकी बातों को शुरू में ही मानने से मना कर देते हैं। क्योंकि उन्हें डर होता
28:20
Speaker A
है कि अगर उन्होंने आपकी बात मान ली तो वे आखिर में हार जाएंगे। इस चाल को कैसे तोड़ना है यह हम अगले हिस्से में देखेंगे। चाल नंबर चार अपनी चाल छुपाना। अगर आप किसी बहस में अपनी कोई बात या
28:41
Speaker A
नतीजा मनवाना चाहते हैं तो उसे शुरू में ही मत बताइए। अगर सामने वाले को पहले ही पता चल गया कि आप उसे कहां ले जा रहे हैं तो वह बीच में ही टांग अड़ाना शुरू कर देगा। इसके बजाय आप धीरे-धीरे छोटी मोटी
28:56
Speaker A
बात मनवाते चलिए। इन बातों को बातों के बीच में ऐसे मिला दीजिए कि उसे आपकी असली चाल समझ ना आए। अगर आपको लगे कि वह आपकी बातें आसानी से नहीं मानेगा तो आप टेढ़े-मेढ़े सवाल पूछे जिनका सीधा रिलेशन
29:14
Speaker A
आपकी मेन बात से ना लगे। जब वह आपकी सारी छोटी मोटी बातों को मान ले तब आखिर में अपनी मेन बात सामने रख दीजिए और वह चाहकर भी मुकर नहीं पाएगा क्योंकि वह पहले ही उन सारी बातों पर हां कह चुका है। यह बिल्कुल
29:31
Speaker A
वैसा ही है जैसे शिकार को चारों तरफ से घेर कर जाल में फंसाना। चाल नंबर पांच झूठ का सहारा। अपनी बात को सही साबित करने के लिए आप ऐसी बातों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं जो सच नहीं है। आप सोचेंगे ऐसा क्यों? तो सुनिए
29:54
Speaker A
अगर सामने वाला सच सुनने को तैयार ही नहीं है तो आप उसकी अपनी गलत सोच को ही उसके खिलाफ हथियार बना लें। इसमें आप ऐसी बातें बोले जो आपके लिए तो गलत है पर सामने वाले की नजर में एकदम सच
30:10
Speaker A
है। फिर उन्हीं बातों के दम पर आप अपनी बात साबित कर दें। याद रखिए कभी-कभी गलत बातों से भी सही नतीजा निकल आता है। जैसे अगर सामने वाला किसी खास गुटिया टोली का है तो आप उसे टोली की पुरानी बातों को
30:27
Speaker A
उसके खिलाफ सबूत की तरह पेश कर सकते हैं। यहां जरूरी यह नहीं कि बात सच है या नहीं। जरूरी यह है कि वह इंसान उस बात को मानता है या नहीं। चाल नंबर छह जो साबित करना है उसे पहले ही
30:45
Speaker A
मान लेना। यह एक और बड़ी चालाकी है। इसमें आप चतुराई से उसी बात को सच मानकर बोलना शुरू कर देते हैं जिसे आपको असल में साबित करना है। इसे करने के कुछ तरीके यह हैं। नाम बदल देना जैसे इज्जत शब्द को साबित करने
31:04
Speaker A
के बजाय अच्छे नाम का इस्तेमाल करना। या फिर एक ही चीज के लिए अलग शब्द ढूंढ लेना। बड़ी बात में छोटी बात छुपाना। मान लीजिए आपको यह साबित करना है कि कोई खास दवाई काम करती है। आप इसके बजाय यह कह दें कि
31:22
Speaker A
इंसानी नॉलेज ही अधूरा है तो वह दवाई वाली बात इसी में अपने आप आ जाएगी। फिर है उल्टा पुल्टा घुमाना। अगर दो चीजें एक दूसरे से जुड़ी है तो दूसरे को सच दिखाकर पहली वाली बात मनवा लेना। फिर टुकड़ों में
31:40
Speaker A
हां बुलवाना। अगर आपको कोई बहुत बड़ी बात साबित करनी है तो सामने वाले से उससे जुड़ी हर एक छोटी चीज पर हां करवा लें। जब वह हर टुकड़े को मान लेगा तो पूरी बात अपने आप सच हो जाएगी।
31:58
Speaker A
चाल नंबर सात सवालों के जाल में फंसाना। अगर बहस बहुत कायदे कानून से चल रही है और आप अपनी बात साबित करना चाहते हैं तो सवाल पूछने का तरीका अपनाएं। पुराने जमाने के बड़े ज्ञानी सोक्रेटीज यानी सुकरात भी यही
32:17
Speaker A
करते थे। शालिया है कि आप एक साथ बहुत सारे बड़े-बड़े सवाल पूछे। इससे यह छुप जाएगा कि आप असल में उससे क्या कहलवाना चाहते हैं। जैसे ही वह आपके सवालों के जवाब में कुछ बातों पर अपनी मंजूरी दे दे,
32:33
Speaker A
तुरंत अपनी बात का नतीजा सबके सामने रख दें। जो लोग थोड़ा धीरे सोचते हैं, वे आपकी इस तेजी को पकड़ नहीं पाएंगे और उन्हें लगेगा कि आपकी बात सही है। चाल नंबर आठ सामने वाले को गुस्सा दिलाना। यह चाल बहुत ही असरदार है। सामने वाले को
32:56
Speaker A
इतना चिढ़ाएं कि उसे गुस्सा आ जाए। जब कोई इंसान गुस्से में होता है तो उसका दिमाग काम करना बंद कर देता है और उसे यह नहीं सोचता कि उसका फायदा कहां है। आप उसके साथ जानबूझकर बुरा बर्ताव करें। छोटी-छोटी
33:12
Speaker A
बातों पर उसे परेशान करें या उसके साथ [संगीत] बदतमीजी करें। बस उसे भड़का दें। चाल नंबर नौ सवालों को घुमा फिराकर पूछना। अपने सवाल उस तरीके से मत पूछिए जिससे आपकी बात आसानी से समझ आ जाए। सवालों को
33:33
Speaker A
आगे पीछे करके पूछें ताकि सामने वाले को पता ही ना चले कि आपका निशाना क्या है। जब उसे आपका मकसद पता नहीं होगा तो वह अपना बचाव नहीं कर पाएगा। बाद में आप उसके दिए हुए जवाबों को अपनी जरूरत के हिसाब से
33:50
Speaker A
इस्तेमाल कर सकते हैं। सवाल नंबर 10 ना कहने वालों का फायदा उठाना। अगर आपको लगे कि सामने वाला जानबूझकर आपकी हर बात पर ना बोल रहा है तो उसे बुद्धू बनाने के लिए अपनी बात का एकदम उल्टा पूछें। उसे ऐसा लगना चाहिए कि आप
34:11
Speaker A
वही बात मनवाना चाहते हैं जो असल में आप नहीं चाहते। या फिर उसे दो बातों का चुनाव करने को कहें ताकि उसे समझ ही ना आए कि आप उससे कौन सी बात पर हां करवाना चाहते हैं। सवाल नंबर 11
34:30
Speaker A
छोटी हां से बड़ी बात मनवाना। अगर आप एक-एक करके बहुत सारे छोटे एग्जांपल्स देते हैं और सामने वाला हर छोटी बात पर हां कह देता है तो आखिर में उससे यह मत पूछिए कि क्या वह आपकी मुख्य बात जनरल ट्रुथ को भी मानता है? बस थोड़ी
34:50
Speaker A
देर बाद अपने उस मेन बात को ऐसे पेश करें जैसे वह तो पहले ही तय हो चुकी हो और उसने उसे मान लिया हो। इससे क्या होगा? इससे यह होगा कि सामने वाले को खुद लगेगा कि शायद उसने इस बड़ी बात पर भी हां कह दी थी।
35:07
Speaker A
वहां बैठे लोगों को भी यही लगेगा क्योंकि उन्हें आपके पूछे गए बहुत सारे छोटे सवाल याद रहेंगे। उन्हें लगेगा कि इतनी सारी हां के बाद तो आपका मकसद पूरा हो ही गया होगा। चाल नंबर 12 बातों को अपनी पसंद का नाम देना। [संगीत]
35:32
Speaker A
अगर आप किसी ऐसी चीज पर बात कर रहे हैं जिसका कोई एक पक्का नाम नहीं है तो उसे अपनी पसंद का नाम दें। ऐसा नाम चुने जो आपकी बात को सही दिखाए और सामने वाली बात को गलत। फॉर एग्जांपल
35:47
Speaker A
अगर सामने वाला कोई बदलाव करना चाहता है तो उसे पुरानी अच्छी चीजों से छेड़छाड़ कहें ताकि सुनने वालों को वह बुरा लगे लेकिन अगर आप खुद वही बदलाव करना चाहते हैं तो उसे नया सुधार कहें। एक आदमी जिसे किसी का पक्ष नहीं लेना। वह
36:07
Speaker A
जिसे पूजा पाठ कहेगा उसे मानने वाला भक्ति कहेगा और उसका दुश्मन उसे अंधविश्वास कह देगा। यह बहुत ही चालाकी भरा तरीका है। आप अपनी बात की जांच पड़ताल करने के बजाय उसके नाम में ही अपना नतीजा अपना रिजल्ट छुपा देते
36:24
Speaker A
हैं। जैसे कोई जिसे हिफाजत में रखना सिर्फ कस्टडी कहता है। दूसरा उसे जेल में डालना या प्रजन कह सकता है। कोई जिसे धर्म की लगन कहता है। दूसरा उसे कट्टरपन कह सकता है। कोई जिसे गलती कहता है, दूसरा उसे धोखा कह
36:46
Speaker A
सकता [संगीत] है। कोई पैसे का मामला कहता है, तो दूसरा उसे रिश्वत कह देता है। बहस में यह चाल सबसे ज्यादा चली जाती है और लोग बिना सोचे समझे इसे इस्तेमाल करते हैं। चाल नंबर 13 दो रास्तों में से एक चुनने को कहना। अपनी
37:13
Speaker A
बात मनवाने के लिए सामने वाले के आगे दो रास्ते रखें। एक आपकी बात और दूसरा उसका एकदम उल्टा और बहुत ही बेकार रास्ता। उन दोनों के बीच इतना बड़ा फर्क दिखाएं कि सामने वाला बेवकूफ ना दिखने के लिए आपकी
37:28
Speaker A
बात मान ले। जैसे अगर आप चाहते हैं कि वह यह बात मान ले कि बच्चों को अपने पिता की हर बात माननी चाहिए तो उससे पूछे कि क्या बच्चों को अपने मां-बाप का कहना मानना चाहिए या उनकी हर बात को अनसुना कर देना
37:44
Speaker A
चाहिए। अब वह अजीब ना दिखने के लिए यही कहेगा कि कहना मानना चाहिए। यह वैसा ही है जैसे किसी काली चीज के बगल में स्लिट या ग्रे रंग रखकर उसे सफेद कहना। चाल नंबर 14 हारकर भी जीत का ढोल पीटना यह एक बहुत ही
38:09
Speaker A
ढीठ चाल है। मान लीजिए आपने सामने वाले से बहुत सारे सवाल पूछे और उसने ऐसे जवाब दिए जिनसे आपकी बात जरा भी साबित नहीं हुई। फिर भी आप बिना डरे जोर से और पूरे भरोसे के साथ ऐलान कर दें कि आपकी बात सच साबित
38:28
Speaker A
हो गई है। अगर सामने वाला थोड़ा शर्मीला है या उसका दिमाग थोड़ा धीरे चलता है और आपकी आवाज दमदार है तो यह चाल आसानी से काम कर जाएगी। इसमें आप इस तरह बर्ताव करते हैं जैसे आप ही विजेता हैं।
38:46
Speaker A
चाल नंबर 15 उलझाने वाली बात फेंकना। अगर आपने कोई बहुत ही अजीब या टेढ़ी बात कह दी है और उसे साबित करना मुश्किल लग रहा है तो एक नई चाल चलें। सामने वाले के आगे एक ऐसी छोटी सी बात
39:03
Speaker A
रखें जो सच तो हो पर आसानी से समझ ना आए। अगर वह डर के मारे उसे गलत कह दे तो आप उसे सबके सामने बेवकूफ साबित कर सकते हैं कि देखो इसे तो सच भी नहीं पता और अगर वह इसे सही मान ले तो आपको थोड़ा
39:20
Speaker A
सहारा मिल जाएगा। फिर आप पिछली चाल यानी चाल नंबर 14 का इस्तेमाल करके जोर से कह सकते हैं कि देखिए इसकी वजह से मेरी पहली वाली अजीब बात भी सच साबित हो गई। इसके लिए बहुत ज्यादा बेशर्मी चाहिए। लेकिन पर
39:36
Speaker A
दुनिया में कुछ लोग इस काम में एक्सपर्ट होते हैं। चाल नंबर 16 उसी की बातों से उसे फंसाना। जब सामने वाला कोई बात कहे तो यह देखिए कि क्या वह बात उसकी किसी पुरानी बात उसके काम या उसकी पसंद से अलग तो नहीं है। अगर
39:58
Speaker A
वह किसी चीज की तारीफ करता है तो आप उसके पुराने कामों का सबूत देकर उसे फंसा सकते हैं। जैसे अगर वह कहे कि जिंदगी बेकार है और मर जाना ही ठीक है तो आप तुरंत कहिए तो फिर आप अभी तक जिंदा क्यों है? फांसी
40:13
Speaker A
क्यों नहीं लगा लेते? चाल नंबर 17 बारीक फर्क निकालकर बचना। अगर सामने वाला कोई ऐसा सबूत दे दे जिसे आप काट ना सके तो घबराए नहीं। आप उस बात में कोई बहुत ही बारीक फर्क सल डिस्टिंक्शन ढूंढ निकाले। ऐसी छोटी सी बात
40:34
Speaker A
जो आपने पहले ना सोची हो पर अब आपको बचा ले। अगर एक ही बात के दो मतलब निकल सकते हैं तो आप वह मतलब पकड़ लें जो आपको सही साबित करें और अपनी जान बचा लें। चाल नंबर 18 बहस को बीच में ही रोकना या
40:53
Speaker A
भटकाना। अगर आपको महसूस हो कि सामने वाला ऐसी बातें कर रहा है जिससे आप पक्का हार जाएंगे तो उसे अपनी बात पूरी ना करने दें। बीच में ही उसे टोक दें। या तो बहस को वहीं खत्म कर दें या फिर चालाकी से बात को
41:08
Speaker A
किसी दूसरे सब्जेक्ट पर मोड़ दें। सीधे शब्दों में कहें तो मुद्दा ही बदल दीजिए ताकि वह अपनी जीत वाली बात तक पहुंच ही ना पाए। चाल नंबर 19। बात को बहुत बड़ा बनाकर उस पर बहस करना। जब सामने वाला आपसे किसी एक खास चीज पर
41:34
Speaker A
सवाल पूछे और आपको उसका जवाब ना पता हो तो उस खास चीज को छोड़ दें। आप बात को इतना बड़ा और आम बना दें कि उस पर बोलना आसान हो जाए। जैसे अगर कोई पूछे कि यह विज्ञान का अंदाजा यह हाइपोथेसिस गलत क्यों है? और
41:50
Speaker A
आपको सही जवाब ना पता हो तो आप इस पर बोलना शुरू कर दें कि इंसान का नॉलेज, इंसान का ज्ञान हमेशा अधूरा होता है और इंसान से गलतियां होना तो आम बात है। फिर उस पर ढेर सारे एग्जांपल्स देने लगे।
42:07
Speaker A
चाल नंबर 20 खुद ही नतीजा सुना देना। जब आप अपनी सारी छोटी-छोटी बातें मनवा लें और सामने वाला उन पर हां कह दे तो उससे आखिरी नतीजा मत पूछिए। खुद ही पूरे भरोसे के साथ कह दीजिए कि आपकी बात सही साबित हो
42:27
Speaker A
गई। यहां तक कि अगर कोई एक छोटी बात छूट भी गई हो तो भी ऐसे बर्ताव करिए। ऐसा बिहेवियर दिखाइए जैसे उसने उसे भी मान लिया हो और तुरंत अपनी जीत का ऐलान कर दीजिए। चाल नंबर 21 21 ईंट का जवाब पत्थर से
42:47
Speaker A
देना। अगर सामने वाला कोई बेकार या चालाकी भरी बात कहे और आपको समझ आ जाए कि वह आपको बेवकूफ बना रहा है तो उसे यह समझाने में समय खराब ना करें कि वह गलत है। इसके बजाय आप भी वैसे ही कोई बेकार और चालाकी भरी
43:03
Speaker A
बात उसके मुंह पर मारे। याद रखिए यहां आप सच ढूंढने नहीं बल्कि जीत हासिल करने आए हैं। अगर वह आप पर कोई निजी हमला करें तो आप भी उसकी किसी पुरानी बात को पकड़ कर उस पर वैसा ही हमला कर दें। कम समय में जीतने
43:20
Speaker A
का यह सबसे छोटा रास्ता है। चाल नंबर 22 जड़ को ही काट देना। अगर सामने वाला आपसे कोई ऐसी बात मनवाना चाहे जिससे उसकी जीत एकदम पक्की हो जाए तो उसे मानने से साफ मना कर दें। उसे कहें कि यह तो वही बात है
43:42
Speaker A
जिस पर हमारी बहस चल रही है। अक्सर लोग और साथ बैठे लोग मिलती जुलती बातों को एक ही समझ लेते हैं। अगर आप उसकी उस बात को शुरू में ही रोक दें तो आप उसका सबसे तगड़ा हथियार छीन लेंगे।
43:58
Speaker A
चाल नंबर 30 23 उसे बात को बढ़ा चढ़ाकर बोलने पर मजबूर करना। जब हम किसी की बात को बार-बार काटते हैं तो वह चिढ़कर अपनी बात को बहुत बढ़ा चढ़ाकर बोलने लगता है। हो सकता है उसकी बात एक हद तक सच हो। लेकिन गुस्से में वह
44:17
Speaker A
उसे इतना फैला देता है कि वह गलत लगने लगती है। जब आप उसकी उस बड़ी और गलत बात को काटेंगे तो सबको यही लगेगा कि उसकी पहली वाली बात भी गलत थी। इसी तरह खुद भी सावधान रहें। अगर सामने वाला आपको टोक कर
44:34
Speaker A
आपकी बात को बढ़ाना चाहे तो उसे तुरंत रोक दें। उसे साफ कहें। मैंने सिर्फ इतना ही कहा था। इससे ज्यादा एक शब्द भी नहीं। चाल नंबर 24 24 गलत नतीजा निकालना। इस जाल में आप सामने वाले की बात को तोड़
44:54
Speaker A
मरोड़ कर पेश करते हैं। आप उसकी बातों से ऐसे गलत नतीजे निकालते हैं जो उसने कभी सोचे भी नहीं थे और जो बहुत ही अजीब या खतरनाक होते हैं। इससे ऐसा लगने लगता है कि उसकी मेन बात से यह सारी गलत बातें
45:11
Speaker A
निकल रही हैं और इस तरह उसकी बात अपने आप गलत लगने लगती है। यह एक तरह से उसकी बात का गलत मतलब निकालने का तरीका है। चाल नंबर 25 25 एक उल्टा एग्जांपल ढूंढना। अगर सामने वाला कोई ऐसी बात कहे जो सब पर
45:34
Speaker A
लागू होती है तो उसे गलत साबित करने के लिए आपको ढेरों सबूतों की जरूरत नहीं है। आपको बस एक ऐसा एग्जांपल ढूंढना है जहां उसकी बात फिट ना बैठती हो। जैसे अगर कोई कहे कि हर जुगाली करने वाले जानवर
45:50
Speaker A
के सींग होते हैं तो आप बस ऊंट का नाम लें। ऊंट जुगाली तो करता है पर उसके सींग नहीं होते। बस एक ही एग्जांपल से उसकी पूरी बात मिट्टी में मिल जाएगी। पर ध्यान रहे अगर सामने वाला यह चाल चले तो जांच
46:06
Speaker A
पड़ताल करें कि क्या उसका दिया हुआ एग्जांपल सच है? क्या वह आपकी बात के दायरे में आता है और क्या वह सचमुच आपकी बात को गलत साबित करता है?
46:18
Speaker A
चाल नंबर 26 26 बाजी पलट देना। यह बहुत ही शानदार चाल है। इसमें आप सामने वाले की ही दलील को उसके खिलाफ इस्तेमाल कर लेते हैं। मान लीजिए वह कहता है, अरे वह तो अभी बच्चा है। उसकी गलती पर ध्यान
46:38
Speaker A
मत दो। आप तुरंत पलट कर कहें कि वह बच्चा है इसीलिए तो उसे भी सुधारना जरूरी है। वरना उसकी यह बुरी आदतें कभी नहीं छूटेंग। चाल नंबर 27 27 गुस्से से कमजोरी पहचानना। अगर आप कोई बात कहें और सामने वाला उस पर
47:00
Speaker A
बहुत ज्यादा गुस्सा हो जाए तो समझ लीजिए कि आपने उसकी सबसे दुखती रख पर हाथ रख दिया है। आपको अब उसी बात पर और ज्यादा जोर देना चाहिए। एक तो इसलिए कि उसे गुस्सा दिलाना आपके फायदे में है और दूसरा
47:15
Speaker A
इसलिए कि आपको उसकी सबसे बड़ी कमजोरी मिल गई है। वह उस जगह से बहुत कमजोर है जहां उसे चोट लगी है। चाल नंबर 28 28 सुनने वालों को अपनी तरफ करना। यह चाल तब सबसे ज्यादा काम आती है
47:34
Speaker A
जब दो पढ़े लिखे लोग आपस में बहस कर रहे हो और उन्हें सुनने वाले लोग आम आदमी हो जिन्हें उस सब्जेक्ट की ज्यादा जानकारी ना हो। अगर आपके पास सामने वाले की बात काटने के लिए कोई सही सबूत नहीं है। तो आप ऐसी बात
47:50
Speaker A
कहें जो सुनने वालों को सुनने में सही लगे। भले ही वह साइंस के हिसाब से गलत हो। आपकी बात का मकसद सामने वाले को हराना नहीं बल्कि लोगों की नजरों में उसे बेवकूफ साबित करना है। अगर आप कोई ऐसी बात कह दे
48:05
Speaker A
जिससे लोग उस पर हंसने लगे तो समझिए आप जीत गए। लोग हमेशा हंसाने वाले का साथ देते हैं। सामने वाले को अपनी बात सही साबित करने के लिए बहुत लंबी और उबाहू बातें समझानी पड़गी। आम लोगों के पास इतना समय और दिमाग
48:23
Speaker A
नहीं होता कि वह उसकी गहरी बातों को सुने। जैसे मान लीजिए सामने वाला कहता है कि पहाड़ जब बन रहे थे तब वे बहुत गर्म थे लगभग 480 डिग्री और वे समुद्र के पानी के नीचे थे। आप तुरंत बीच में बोलिए कि अरे
48:39
Speaker A
भाई क्या बात कर रहे हो? सबको पता है कि 212 डिग्री पर तो पानी उबलकर भाप बन जाता है। [संगीत] अगर तापमान 480 डिग्री होता तो पूरा समुद्र ही भाप बनकर उड़ गया होता। यह सुनते ही वहां खड़े लोग हंसने लगेंगे।
48:55
Speaker A
अब उस बेचारे को अपनी बात सही साबित करने के लिए लोगों को हवा के दबाव यानी एटमॉस्फेरिक प्रेशर और पानी के उबलने के मुश्किल नियम समझाने पड़ेंगे। लेकिन लोग उसकी इतनी लंबी और थकाने वाली बात नहीं सुनेंगे और आपको ही विनर मान लेंगे।
49:14
Speaker A
साल नंबर 29 29 बात को घुमा देना। अगर आपको महसूस हो कि आप हार रहे हैं तो अचानक किसी और चीज के बारे में बात करना शुरू कर दें। इसे ऐसे पेश करें जैसे यह पुरानी बात से ही जुड़ी हो। और सामने वाले
49:32
Speaker A
के खिलाफ एक नया सबूत हो। अगर यह नई बात थोड़ी बहुत भी काम की हो तो लोग इसे मान लेंगे। पर अगर इसका पुरानी बात से कोई लेना देना नहीं है तो यह बहुत ही ढीठ तरीका माना जाता है। इसमें आप सामने वाले
49:48
Speaker A
पर सीधा हमला करने लगते हैं। जैसे एक बार मैंने चीन के पुराने तरीके की तारीफ की। जहां लोगों को उनके खानदान के बजाय उनकी मेहनत और परीक्षा के आधार पर ऊंचे पदों पर बिठाया जाता था। मेरा मुकाबला करने वाला
50:04
Speaker A
हारने लगा। तब उसने अचानक बात घुमा दी और बोला, चीन में तो लोगों को डंडों से पीटा जाता है और वे बहुत ज्यादा चाय पीते हैं। अब अगर मैं उसकी इस चाय और डंडे वाली बात पर बहस करने लगता, तो मेरी जीती जीताई
50:20
Speaker A
बाजी हाथ से निकल जाती। यह चाल आम लोगों की लड़ाई में बहुत ज्यादा दिखती है। जब एक इंसान दूसरे की कोई गलती बताता है तो दूसरा अपनी सफाई देने के बजाय पलट कर कोई और पुरानी बात निकाल लेता है।
50:36
Speaker A
जैसे हां पर तुमने भी तो उस दिन पैसे चुराए थे। यह जंग के मैदान जैसी चाल है। जैसे एक सेना अपने देश को बचाने के बजाय दुश्मन के देश पर हमला कर दे ताकि दुश्मन अपना पीछा छोड़ दे। लड़ाई में यह चाल काम आ सकती है।
50:54
Speaker A
पर बातचीत में यह बहुत घटिया तरीका है। इससे असली सच तो बाहर नहीं आता। बस दोनों तरफ के लोगों की बुराइयां ही सामने आती हैं। इसे तभी इस्तेमाल करें जब जीतने का कोई और रास्ता ना बचा हो। चाल नंबर 30 30 दिमाग चलाने के बजाय बड़े
51:14
Speaker A
नामों का सहारा लेना। यह चाल बहुत मजेदार है। इसमें आप सही वजह बताने के बजाय किसी बड़े या मशहूर आदमी का नाम लेते हैं। आपको बस ऐसा नाम ढूंढना है जिसकी सामने वाला इज्जत करता हो। एक पुराने ज्ञानी सनिका ने कहा था कि हर आदमी
51:34
Speaker A
खुद सोच विचार करने के बजाय दूसरों की बातों पर यकीन करना ज्यादा आसान समझता है। इसलिए अगर आपके पास कोई ऐसा बड़ा नाम है जिसे सामने वाला मानता है तो आपका काम बहुत आसान हो जाएगा। सामने वाला जितना कम
51:52
Speaker A
पढ़ा लिखा होगा वह उतने ही ज्यादा बड़े नामों से डरेगा। लेकिन अगर वह बहुत होशियार है तो वह आपकी बातों में आसानी से नहीं आएगा। आम लोग किसी भी काम के एक्सपर्ट की बहुत इज्जत करते हैं। उन्हें यह नहीं पता होता कि कई लोग अपने काम से
52:08
Speaker A
इसलिए जुड़े हैं क्योंकि उन्हें वहां पैसा मिलता है। ना किस लिए कि उन्हें उस काम का बहुत गहरा ज्ञान है। अक्सर जो लोग दूसरों को पढ़ाते हैं, वे खुद उस चीज को पूरी तरह नहीं जानते। अगर आपको अपनी बात सही साबित करने के लिए
52:26
Speaker A
कोई सही नाम ना मिले तो आप किसी की कही हुई बात को घुमा फिराकर भी बता सकते हैं जो बातें लोगों को समझ नहीं आती। वे अक्सर उन बातों की ज्यादा इज्जत करते हैं। अगर आप किसी पुरानी और कठिन भाषा जैसे संस्कृत
52:41
Speaker A
या लैटिन का कोई भारी शब्द बोल दें तो कम पढ़ा लिखा आदमी तुरंत दब जाएगा। इतना ही नहीं अगर बहुत जरूरी हो तो आप झूठ भी बोल सकते हैं या अपनी तरफ से कोई बात बना सकते हैं। सामने वाले के पास उस वक्त कोई किताब
52:58
Speaker A
नहीं होगी कि वह आपकी बात की जांच पड़ताल कर सके। इसका एक बहुत बढ़िया एग्जांपल है एक पादरी का। उसे अपने घर के सामने वाली सड़क बनवाने के लिए पैसे देने थे। उसने इससे बचने के लिए अपनी तरफ से एक लाइन बनाई और
53:16
Speaker A
कह दिया कि यह पवित्र किताब में लिखा है। अफसरों को कुछ समझ नहीं आया। पर उन्होंने बड़े नाम के डर से उसे छोड़ दिया और उसे पैसे नहीं देने पड़े। सब लोग ऐसे ही कहते हैं। इस बात को भी आप एक सबूत की तरह
53:30
Speaker A
इस्तेमाल कर सकते हैं। ज्यादातर लोग यही सोचते हैं कि अगर बहुत सारे लोग किसी बात को मान रहे हैं तो वह सच ही होगी। इंसान की आदत बड़ी अजीब है। कोई भी बात चाहे कितनी भी बेवकूफी भरी क्यों ना हो। अगर
53:44
Speaker A
उसे सबकी राय बता दिया जाए तो बाकी सब भी उसे झट से मान लेते हैं। लोग भेड़ों की तरह होते हैं। जहां उनका आगे वाला चलता है सब वहीं [गला साफ़ करने की आवाज़] पीछे पीछे हो लेते हैं। वे खुद दिमाग चलाने की
53:57
Speaker A
मेहनत करने के बजाय कुछ भी मान लेना आसान समझते हैं। ताज्जुब की बात तो यह है कि लोग यह नहीं देख पाते कि वे सिर्फ दूसरों की नकल कर रहे हैं। उन्हें खुद की कोई समझ नहीं होती। बड़े
54:13
Speaker A
ज्ञानी प्लेटो ने सही कहा था कि आम लोगों के दिमाग में बहुत सारी उलजुलूल बातें भरी होती हैं। जिन्हें ठीक करना बहुत लंबा काम है। अगर सचमुच देखा जाए तो किसी बात का मशहूर होना इस बात का सबूत नहीं है कि वह सही
54:29
Speaker A
है। [संगीत] अगर ऐसा होता तो पुराने जमाने की सारी गलतियां आज हमें सच माननी पड़ती। जैसे पुराने जमाने में सब लोग मानते थे कि सूरज धरती के चक्कर लगाता है। तो क्या आज भी उसे सच मान लें? अलग-अलग देशों में
54:46
Speaker A
अलग-अलग बातों को सबका सच मानते हैं। तो क्या वे सब एक साथ सच हो सकते हैं?
54:54
Speaker A
हकीकत तो यह है कि जिसे दुनिया की राय या यूनिवर्सल ओपिनियन कहा जाता है, वह शुरू में सिर्फ दो-तीन लोगों की सोच होती है। इसकी कहानी कुछ ऐसे शुरू होती है। सबसे पहले दो या तीन लोगों ने कोई बात कही या
55:10
Speaker A
शुरू की। बाकी लोगों को लगा कि इन दो-तीन लोगों ने पक्का बहुत जांच पड़ताल की होगी। इसलिए उन्होंने उन पर भरोसा कर लिया। फिर कुछ और लोग उनसे जुड़ गए क्योंकि वे खुद सोचने में बहुत आलसी थे। उन्हें लगा कि
55:25
Speaker A
खुद दिमाग खपाने से अच्छा है कि चुपचाप बात मान लिया जाए। धीरे-धीरे मानने वालों की संख्या बढ़ती गई। जब भीड़ बड़ी हो गई तो नए जुड़ने वाले लोगों को लगा कि यह बात जरूर बहुत ठोस होगी। तभी तो इतने लोग इसे
55:39
Speaker A
मान रहे हैं। आखिर में जो लोग बच गए उन्हें भी मजबूरन हां में हां मिलानी पड़ी ताकि वे समाज या सोसाइटी की नजरों में लड़ाकू या बहुत ज्यादा होशियार बहुत ओवर स्मार्ट ना लगे। जब बात इस हद तक पहुंच जाती है तो उसे
55:57
Speaker A
मानना सबकी मजबूरी बन जाती है। इसके बाद जो थोड़े बहुत लोग खुद सोच सकते हैं वह चुप हो जाते हैं। बोलने वाले वे लोग होते हैं जिनमें अपनी कोई सोच नहीं होती। वे बस दूसरों की बातों को तोते की तरह दोहराते
56:14
Speaker A
हैं और फिर भी बहुत गुस्से में उन बातों का बचाव करते हैं। वे उन लोगों से इसलिए नफरत नहीं करते क्योंकि उनकी राय अलग है बल्कि इसलिए क्योंकि वे लोग खुद का दिमाग चलाने की हिम्मत करते हैं। सच तो यह है कि सोचने
56:30
Speaker A
वाले बहुत कम है। पर राय ओपिनियन सबको देनी है। तो लोग खुद मेहनत करने के बजाय दूसरों की बनी बनाई राय उठा लेते हैं। अगर ऐसा है तो करोड़ों लोगों की राय की क्या कीमत? क्या वैल्यू? यह वैसा ही है
56:48
Speaker A
जैसे 100 लोगों ने इतिहास की एक ही बात लिखी हो। पर पता चले कि उन सब ने एक दूसरे से चोरी की। आखिर में वह बात सिर्फ एक ही इंसान की होती है। यह बस मैंने कहा, तुमने कहा और उसने कहा का चक्कर है। बस बातें ही
57:03
Speaker A
बातें हैं। कोई ठोस सच्चाई [संगीत] नहीं। फिर भी जब आप आम लोगों से बहस करें तो सब लोग ऐसा ही कहते हैं। यह वाली बात को हथियार की तरह इस्तेमाल करिए। क्योंकि जब दो आम लोग लड़ते हैं तो वे इसी हथियार को
57:19
Speaker A
सबसे ज्यादा चुनते हैं। अगर कोई समझदार आदमी उनसे भिड़ रहा है तो उसे भी अपनी शान छोड़कर यही हथियार उठा लेना चाहिए। आपको ऐसे बड़े नाम या राय चुननी चाहिए जो सामने वाले की कमजोर नस पर चोट करें।
57:36
Speaker A
क्योंकि ऐसे लोग किसी भी अकल वाली बात को नहीं समझेंगे। उनका दिमाग एकदम पत्थर जैसा होता है जो ना सोच सकता है और ना फैसला कर सकता है। अदालत में तो लड़ाई सिर्फ बड़े नामों और कानूनों की होती है। वहां सारा काम बस यह
57:54
Speaker A
देखना है कि कौन सा कानून किस मामले पर फिट बैठता है। लेकिन यहां भी बातों को घुमाने का बहुत मौका होता है। अगर कोई मामला और कानून आपस में मेल नहीं खाते तो उन्हें तब तक मुड़ाया जा सकता है जब तक कि
58:08
Speaker A
वे एक दूसरे के लिए सही ना लगने लगे। चाल नंबर 31 31 यह मेरी समझ के बाहर है। अगर आपको लगे कि सामने वाले की बात का आपके पास कोई जवाब नहीं है तो एक बहुत मजेदार चाल है।
58:26
Speaker A
बहुत ही मासूम बनकर कहें कि भाई आप जो बोल रहे हैं वह मेरी इस छोटी सी बुद्धि के एकदम ऊपर से निकल गया। हो सकता है आप सच कह रहे हो पर मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा।
58:37
Speaker A
इसलिए मैं इस पर कुछ नहीं कहूंगा। ऐसा कहकर आप चुपके से साथ खड़े लोगों को यह इशारा कर देते हैं कि सामने वाला बेकार की बातें कर रहा है। पुराने समय में जब कांड जैसे बड़े लेखों की किताबें आई तो कई
58:53
Speaker A
पुराने प्रोफेसर्स ने यही चाल चली थी। उन्हें लगा कि हमें समझ नहीं आया। ऐसा बोलने से किताबें गलत साबित हो जाएगी। यह चाल तभी चले जब आपको पक्का पता हो कि सुनने वाले लोग आपको सामने वाले से ज्यादा
59:10
Speaker A
समझदार मानते हैं। जैसे एक टीचर किसी स्टूडेंट के साथ ऐसा कर सकता है। इसका तोड़, इसका काउंटर ट्रिक। अगर कोई आपके साथ ऐसा करे तो तुरंत पलट कर कहे। अरे नहीं साहब आप जैसे तेज दिमाग वाले के लिए तो कुछ भी समझना बहुत आसान
59:28
Speaker A
है। पक्का मेरे ही समझाने के तरीके में कोई कमी होगी। इसके बाद आप अपनी बात को और भी सरल करके उसके गले उतार दें। जब तक कि वह खुद यह ना मान ले कि उसे समझ आ गया है।
59:41
Speaker A
इस तरह आपने बड़ी इज्जत के साथ उसे सबके सामने बुद्धू साबित कर दिया। चाल नंबर 32 32 बुरा नाम दे देना। अगर कोई ऐसी बात कहे जिससे आप पीछा छुड़ाना चाहते हैं तो उसे किसी बुरे या बदनाम नाम के साथ जोड़ दें। जैसे ही सामने
60:02
Speaker A
वाला अपनी बात रखे आप तुरंत बोले अरे यह तो नास्तिकता है, एथिज्म है या यह या यह तो वही पुरानी घिसीपटी सोच है या [संगीत] यह या यह या यह या यह या यह या यह या यह या यह या यह या यह या यह तो अंधविश्वास
60:12
Speaker A
है। भले ही उस बात का उस नाम से कोई सीधा रिश्ता ना हो। पर ऐसा करने से दो चीजें होती हैं। लोग सोचते हैं अरे यह तो वही पुरानी बात है जो मैंने पहले भी सुनी है। लोग यह मान लेते हैं कि इस तरह की सोच तो
60:27
Speaker A
पहले ही गलत साबित की जा चुकी है और इसमें कोई सच्चाई नहीं है। चाल [संगीत] नंबर 33 33 सुनने में तो ठीक है पर असलियत में काम नहीं करेगा। अक्सर लोग कहते हैं कि कहने में तो तुम्हारी बात
60:42
Speaker A
अच्छी लगती है पर काम करने में यह फेल हो जाएगी। यह एक बहुत बड़ी चालाकी है। बहुत बड़ी ट्रिक। इसमें इंसान अपनी बात तो मान लेता है, पर उसके नतीजे को मानने से मना कर देता है। लेकिन सच तो यह है कि अगर कोई
60:57
Speaker A
बात सोचने के तरीके में एकदम सही है तो उसे असली काम में भी पक्का सही होना चाहिए। अगर वह असलियत में काम नहीं कर रही तो इसका मतलब है कि आपकी सोच या प्लान में ही कोई बड़ी गलती रह गई है। जो चीज असलियत
61:13
Speaker A
में गलत है वह सोच में भी गलत ही मानी जाएगी। चाल नंबर 34 34 सामने वाले को पीछा छुड़ाने मत दीजिए। जब आप कोई सवाल पूछे या कोई पक्की बात रखें और सामने वाला उसका सीधा जवाब ना दे
61:30
Speaker A
तो समझ जाइए कि आपने सही जगह वार किया है। अगर वह जवाब देने के बजाय बात को घुमाने लगे, उल्टा सवाल पूछने लगे या किसी ऐसी चीज पर बात करने लगे जिसका कोई मतलब ना हो तो यह एक साफ इशारा है। इसका मतलब है कि
61:45
Speaker A
आपने अनजाने में ही उसकी किसी बहुत कमजोरी पर हाथ रख दिया है। आपने उसे एक तरह से चुप कर दिया है। अब आपको अपनी उस बात पर और भी ज्यादा जोर देना है। उसे भागने का मौका बिल्कुल मत
62:00
Speaker A
दीजिए। भले ही आपको यह ना पता हो कि उसकी कमजोरी असली में क्या है। बस उसे वही दबाए रखिए। चाल नंबर 35 35 अकल से नहीं फायदे से बात मनवाना। यह एक ऐसी जादुई चाल है जो अगर काम कर जाए
62:20
Speaker A
तो बाकी किसी भी तरीके की जरूरत नहीं पड़ती। इसमें आपको सामने वाले के दिमाग यानी इंटेलेक्ट पर नहीं बल्कि उसकी जरूरत और फायदे पर वार करना है। अगर आप सामने वाले को यह यकीन दिला दें कि उसकी बात सच
62:35
Speaker A
साबित होने से उसका खुद का भारी नुकसान हो जाएगा तो वह अपनी बात को तुरंत ऐसे छोड़ देगा जैसे कोई जलता हुआ कोयला छोड़ देता है। उसे फौरन लगने लगेगा कि वह कितनी बड़ी गलती कर रहा था। जैसे फॉर एग्जांपल मान
62:51
Speaker A
लीजिए एक पुजारी किसी गहरी सोच का बचाव कर रहा है। आप उसे बस यह याद दिला दें कि उसकी यह बात उसके अपने धर्म या चर्च के नियमों के खिलाफ है। वह अपनी बात को उसी पल छोड़ देगा। या फिर मान लीजिए एक बड़ा
63:06
Speaker A
जमींदार कहता है कि खेतों में मशीनों का इस्तेमाल बहुत अच्छी चीज है क्योंकि वह बहुत सारे आदमियों का काम अकेले कर देती है। आप उसे चुपके से कहें पर भाई अगर मशीनें आ गई तो सड़कों पर गाड़ियां भी भाप
63:20
Speaker A
से चलने लगेंगी और फिर आपके इन महंगे घोड़ों को कोई नहीं खरीदेगा। इनकी कीमत एकदम गिर जाएगी। देखिए फिर वह कैसे मशीनों की बुराई करना शुरू करता है। इतना ही नहीं अगर सुनने वाले लोग भी आपकी ही बिरादरी या
63:37
Speaker A
आपके जैसे फायदे वाले हैं तो वह आपकी हर बात पर तालियां बजाएंगे। भले ही आपकी बात कितनी भी बेतुकी क्यों ना हो उन्हें वह एकदम सही लगेगी और सामने वाला चाहे कितना भी सच क्यों ना बोल रहा हो सबको उसकी बात
63:52
Speaker A
बेकार और कमजोर लगेगी। वह बेचारा सबके सामने अकेला पड़ जाएगा और उसे हार माननी पड़ेगी। इस चल को हम कह सकते हैं पेड़ को उसकी जड़ से ही काट देना। लोग अक्सर वही चीज मानते हैं जिसमें उनका अपना फायदा
64:08
Speaker A
छुपा हो। चाल नंबर 36 36 भारी भरकम शब्दों से चकरा देना। आप सामने वाले को सिर्फ दिखावटी और भारी शब्दों से उलझन में डाल सकते हैं। अक्सर इंसान को लगता है कि अगर कोई कुछ बोल रहा है तो उसका कुछ ना कुछ गहरा मतलब जरूर
64:29
Speaker A
होगा। अगर सामने वाला अपनी कमजोरी जानता है और उसे बिना समझे हां में हां मिलाने की पुरानी आदत है तो आप उसे आसानी से ठग सकते हैं। आप बहुत ही गंभीर बनकर ऐसी उलझुल बातें बोले जो सुनने में बहुत विद्वान
64:47
Speaker A
लगे। वह आपकी भारी बातों के चक्कर में ऐसा फंसेगा कि उसकी सोचने समझने की शक्ति गायब हो जाएगी। आप अपने उन बेकार बातों को सबसे पक्का सबूत बताकर पेश करें। कुछ चालाक लोग तो पूरी दुनिया को बेवकूफ बनाने के लिए
65:03
Speaker A
इसी चाल का इस्तेमाल करते हैं। चाल नंबर 37 37 एक गलत सबूत से पूरी बात को गलत बताना। मान लीजिए कि सामने वाला आदमी एकदम सच बोल रहा है। लेकिन आपकी किस्मत अच्छी है कि उसने अपनी बात साबित करने के लिए कोई
65:23
Speaker A
कमजोर या गलत सबूत चुन लिया। बस आपको मौका मिल गया। आप उसके उससे एक सबूत को गलत साबित कर दें और फिर पूरे भरोसे से कहें कि क्योंकि उसका सबूत गलत है। इसलिए उसकी पूरी बात ही गलत है। यह वैसा ही है जैसे
65:39
Speaker A
कोई वकील केस तो सच्चा लड़ रहा हो। पर वह अदालत में कोई ऐसा कानून बता दे जो उस पर फिट ना बैठता हो। जैसे ही आप उसके उस दलील को काटेंगे आप जीत जाएंगे। लोग अक्सर यह नहीं देख पाते कि सिर्फ एक सबूत के गलत
65:54
Speaker A
होने से पूरी बात गलत नहीं हो जाती। चाल नंबर 38 38 बदतमीजी और निजी हमला यह सबसे आखिरी चाल है। जब आपको साफ दिखने लगे कि सामने वाला आपसे ज्यादा समझदार साबित हो रहा है और आप हारने वाले हैं तो आप तुरंत मुद्दे की बात
66:18
Speaker A
छोड़ दें। आप उस बहस को एक हारी हुई बाजी की तरह मान लें और सामने वाले इंसान पर ही हमला कर दें। इसमें आप अकल यानी इंटलेक्ट की बातें और बहस का सब्जेक्ट यानी विषय पूरी तरह छोड़ दें। आप सामने वाले को गाली
66:36
Speaker A
देना, उसे नीचा दिखाना या उसके बारे में कड़वी बातें बोलना शुरू कर देते हैं। यह वैसा ही है जैसे दिमाग की लड़ाई छोड़कर जानवरों जैसा बर्ताव करना। यह चैनल बहुत ज्यादा पॉपुलर है, मशहूर है क्योंकि इसे करने के लिए किसी खास पढ़ाई
66:55
Speaker A
या अकल की जरूरत नहीं होती। इसे कोई भी कर सकता है। लेकिन अब मुश्किल यह है, प्रॉब्लम यह है कि दूसरा इंसान इस हमले से कैसे बचे?
67:05
Speaker A
क्योंकि अगर वह भी पलट कर बदतमीजी करेगा तो बात गाली गलौज से बढ़कर मारपीट [संगीत] या कोर्ट कचहरी के मामले तक पहुंच सकती है। आज के लिए बस इतना ही। हम फिर मिलेंगे आपसे एक नए एपिसोड में एक नए टॉपिक के
67:38
Speaker A
साथ। मेरा नाम है रोहित और आप सुन रहे थे सिलेबस वि रोहित। धन्यवाद। [संगीत]
Topics:लॉजिकडायलेक्टिकबहसतर्कशक्तिअरस्तुप्लेटोइरिस्टिकचालाकीसचविवाद

Get More with the SozAI App

Transcribe recordings, audio files, and YouTube videos — with AI summaries and speaker detection. 30 minutes free.

Or transcribe another YouTube video here →