Speaker A
अगर आप इस वीडियो पर क्लिक कर चुके हैं तो एक बात साफ है। आप एवरेज नहीं हैं। लेकिन कड़वा सच यह है कि आपकी आदतें वह बिल्कुल एवरेज हैं। आज दुनिया में एक महामारी फैली है। नहीं, मैं किसी वायरस की बात नहीं कर रहा। मैं बात कर रहा हूं एक दिमागी बीमारी की जिसका नाम है मीडियक्रेटी, यानी औसत बने रहने की बीमारी। सुकरात ने कहा था एक इंसान के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और कोई नहीं हो सकती कि वह बूढ़ा हो जाए और कभी अपनी उस शारीरिक और मानसिक ताकत को ना देख पाए जिसके लिए उसका शरीर बना था। जरा सोचिए, क्या आप अपनी जिंदगी बस गुजार रहे हैं? आज हम उस झूठ का पर्दाफाश करेंगे जो आपको बताया गया है। आज हम डेविड गोगिंस, फ्रेडरिक नीचे और न्यूरो साइंस की दुनिया में गोता लगाएंगे। नमस्कार दोस्तों, मैं हूं सौरभ और स्वागत है आपका बुक ट्यूबर हिंदी पर। कहानी शुरू होती है डेविड गोगिंस के ऑफिस में। एक 25 साल का लड़का गोगिंस से मिलने आता है। वह गाइडेंस मांग रहा था। उसने कहा, डेविड, मैंने बहुत कोशिश की। मेरा वजन कम नहीं होता। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं भविष्य में क्या करूं। कभी सोचता हूं आर्मी ज्वाइन कर लूं। कभी जिम खोलने का मन होता है, कभी बिजनेस करने का। गोगिंस ने उसे ध्यान से देखा। उनकी आंखों में वह एक्सरे विजन था जो इंसान की रूह को पढ़ लेता है। गोगिंस कहते हैं मैंने उससे बस कुछ पर्सनल सवाल किए और 5 मिनट में मुझे सब समझ आ गया। उस लड़के की समस्या उसका वजन नहीं था। उसकी समस्या उसका करियर नहीं था। उसकी समस्या यह थी कि उसने जिंदगी में हथियार डाल दिए थे। जब भी कुछ कठिन होता वह रास्ता बदल लेता। जब भी दर्द होता वह पीछे हट जाता। उसके अंदर किसी भी चैलेंज को फेस करने का कॉन्फिडेंस ही नहीं बचा था और इसे ही कहते हैं मीडियोक्रीटी। बस किसी तरह काम चल जाए वाली सोच। क्या यह कहानी आपको जानी-पहचानी नहीं लगती? हम सब एक ऐसी दुनिया में रहना चाहते हैं जहां हमें कोई चैलेंज ना करे। अक्सर स्टूडेंट्स को क्या कहा जाता है? बस उतना ही पढ़ लो जितने में एग्जाम पास हो जाए। बस ऐसी नौकरी ढूंढ लो जहां सुकून हो। हमने कंफर्ट को अपना भगवान बना लिया है। लेकिन यहां एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है जिसे द फ्रॉग ब्रेन बायस कहते हैं। आपका दिमाग विशेष रूप से आपका पुराना दिमाग, लिंबिक सिस्टम, महान बनने के लिए डिजाइन नहीं किया गया है। यह आपको जिंदा रखने और सुरक्षित रखने के लिए डिजाइन किया गया है। जब आप रिस्क लेते हैं, आपका दिमाग चिल्लाता है, रुको, खतरा है। जब आप सुबह 4:00 बजे उठना चाहते हैं, आपका दिमाग फुसफुसाता है, सो जा, बाहर ठंड है। आप आलसी नहीं हैं। आप बस अपनी बायोलॉजी के गुलाम हैं। और मीडियोग्रिटी इसी गुलामी का नाम है। और सच यह है आप एवरेज लोगों के बीच बेस्ट दिखना चाहते हैं। इसलिए आप अपने आसपास कमजोर लोगों को इकट्ठा कर लेते हैं ताकि आपका अहंकार सुरक्षित रहे। लेकिन फ्रेडरिक नीचे ने कहा था, बिकम हु यू आर। वह बनो जो तुम असल में हो और जो तुम हो वह आराम की मखमल में नहीं बल्कि संघर्ष की आग में मिलेगा। यह सिर्फ हवाहवाई बातें नहीं हैं। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. एंड्रू ह्यूबरमैन ने हाल ही में एक खोज की है। हमारे दिमाग में एक हिस्सा होता है, एंटीरियर मिड सिंगुलेट कॉर्टेक्स। रिसर्च में पाया गया कि मोटे और आलसी लोगों में यह हिस्सा छोटा होता है और एथलीट्स और योद्धाओं में यह हिस्सा बड़ा होता है। मजे की बात यह है यह हिस्सा सिर्फ तब बड़ा होता है जब आप वह काम करते हैं जो आप नहीं करना चाहते। जब आप मन मारकर जिम जाते हैं या ठंडे पानी से नहाते हैं तो यह हिस्सा फिजिकली बड़ा होता है। यही आपकी विल पावर की मसल है। यानी अगर आप संघर्ष नहीं कर रहे तो आपका दिमाग लिटरली सिकुड़ रहा है। तो फिर वह 1% लोग कौन हैं जो दुनिया बदलते हैं? क्या उनके पास कोई जादुई शक्ति है? नहीं। फर्क सिर्फ एक है। पेन टॉलरेंस। दर्द सहने की क्षमता। बहुत कम लोग हैं जो शीशे में देखकर खुद से कहते हैं, मुझे फर्क नहीं पड़ता कि यह संभव है या नहीं। मुझे मतलब है कि क्या मैं इसके लिए अपनी जान लगा सकता हूं। वे परिणाम के लिए नहीं बल्कि सेल्फ डिस्कवरी, आत्म खोज के लिए लड़ते हैं। गोगिंस कहते हैं अगर आपको इन टॉप 1% लोगों के बीच रहना पड़े जो लगातार एक पर्वत के बाद दूसरा पर्वत नापते हैं तो आप उनका साथ बर्दाश्त नहीं कर पाओगे। क्यों? क्योंकि उनके सामने आपका डर, आपका खोखलापन और आपकी बहानेबाजी नंगी हो जाएगी। उनकी आग में आपका अहंकार जल जाएगा। ध्यान दीजिए आप अंदर से खुश क्यों नहीं हैं? क्योंकि आपके करंट सेल्फ और आपके पोटेंशियल सेल्फ के बीच बहुत बड़ा अंतर आ गया है। आप जानते हैं कि आप बेहतर कर सकते हैं, लेकिन आप कर नहीं रहे। यह जो खालीपन है, इसे भरने के लिए आप क्या करते हैं? रील्स स्क्रोल करते हैं, जंक फूड खाते हैं, नशा करते हैं। यह सब उस दर्द को शून्य करने के तरीके हैं जो आपकी अपनी आत्मा आपको दे रही है। अब मैं आपको उस दुनिया में ले चलता हूं जिसके बारे में डेविड गोगिंस बात करते हैं। वह दुनिया जो डर के दूसरे छोर पर है। सैन डियागो की वह सरहद रात। डेविड गोगिंस ने एक पागलपन भरा फैसला लिया। बिना किसी खास ट्रेनिंग के, बिना किसी सपोर्ट क्रू के उन्होंने 100 माइल्स, 160 कि.मी. की रेस में दौड़ना शुरू किया। 24 घंटे का लक्ष्य। शुरुआत जोश में हुई। नेवी सील की ट्रेनिंग काम आई। वो दौड़ते रहे। 12 घंटों के अंदर उन्होंने किसी तरह 112 कि.मी. पूरे कर लिए। लेकिन फिर 112 कि.मी. के बाद शरीर ने जवाब दे दिया। गोगिंस कुर्सी पर बैठ गए। उन्होंने नीचे देखा, सफेद मोजे लाल हो चुके थे। पैरों के छालों से खून रिस रहा था। जब वह वाशरूम गए तो देखा कि वह यूरिन नहीं बल्कि खून निकाल रहे थे। किडनी फेल हो रही थी। फेफड़ों में खून भर रहा था। हड्डियां चटकने की कगार पर थीं। हर तर्क, हर लॉजिक, हर डॉक्टर यही कहता रुक जाओ वरना मर जाओगे। उनका मन चिल्ला रहा था। डेविड, तुम यहां क्यों हो? तुम कितने बेवकूफ हो? बिना ट्रेनिंग के 160 कि.मी. क्यों? यही वह पल है। यही वह खाई है जहां 99.9% लोग लौट आते हैं। गोगिंस ने अपने मन को जवाब देने की कोशिश की। मैं यह चैरिटी के लिए कर रहा हूं। मन ने कहा बकवास। कोई भी चैरिटी के लिए अपनी जान नहीं देता। मैं लोगों को इंस्पायर करना चाहता हूं। मन ने कहा झूठ, तुम दर्द में हो। बस करो। अगले चार घंटे वह कुर्सी पर बैठे रहे। कांपते हुए, रोते हुए। सारे मोटिवेशनल कोर्स खत्म हो चुके थे। सारी पॉजिटिव थिंकिंग फेल हो चुकी थी। जब आप नर्क में होते हैं तो यू कैन डू इट वाले नारे काम नहीं आते। तभी उस अंधेरे सन्नाटे में डेविड के अंदर से एक आवाज आई। कोई लॉजिक नहीं, कोई बहाना नहीं। बस एक कच्चा जानवर जैसा सच। उसने खुद से कहा, बिकॉज आई एम वन हार्ड मदर। उस एक वाक्य ने सब बदल दिया। यह कोई मोटिवेशन नहीं था। यह आइडेंटिटी शिफ्ट था। अचानक शरीर में एड्रेनालाईन दौड़ गया। दर्द अभी भी था। हड्डियां अभी भी टूटी थीं। लेकिन अब सहने वाला बदल चुका था। उन्होंने टेप से अपने पैरों को बांधा। खड़े हुए और चलना शुरू किया। 113 कि.मी., 120, 140 और उन्होंने वह रेस पूरी की। गोगिंस कहते हैं जब रेस खत्म हुई तो मैंने उस कुर्सी पर बैठकर एक नई दुनिया देखी। मुझे समझ आया कि मेरा मन कितनी भी डरावनी तस्वीर बना ले, मैं उसे पार कर सकता हूं। यह थी द 40% रूल की खोज। जब आपका दिमाग कहता है कि आप पूरी तरह थक चुके हैं, तब दरअसल आपने अपनी क्षमता का सिर्फ 40% ही इस्तेमाल किया होता है। बाकी 60% अभी भी रिजर्व टैंक में है। स्टोइक फिलॉसफर मार्कस ओरिलियस कहते थे, बाधा ही रास्ता है। द ऑब्सकल इज द वे। और यहां एक बहुत गहरा मनोवैज्ञानिक सिद्धांत काम करता है जिसे कहते हैं द पेन पैराडॉक्स। दर्द का विरोधाभास। सिद्धांत यह है आप जितना दर्द से भागेंगे, जीवन आपको उतना ही अधिक कष्ट देगा। लेकिन अगर आप स्वेच्छा से दर्द को चुनते हैं तो जीवन का कष्ट आपको छू भी नहीं पाएगा। हमने पिछले कुछ वीडियोस में बताया है कि आपके दिमाग को रियलिटी और इमेजिनेशन में फर्क नहीं पता। जब आप खुद को बेचारा बोलते हैं तो आपके मिरर न्यूरॉन्स उस लाचारी को सच मान लेते हैं। आप अपने ही दिमाग को हिप्नोटाइज कर रहे हैं फेल होने के लिए। एक ट्रिक बताता हूं। एनिमी विजुअलाइजेशन। अपने दिमाग में एक ऐसे इंसान को इमेजिन करो जो आपसे नफरत करता है। वह चाहता है कि आप फेल हो जाओ। क्या आप उसे जीतने दोगे? कई बार प्यार से ज्यादा ताकत नफरत या जिद में होती है। उस जिद का इस्तेमाल करो। अपनी सफलता से उन्हें गलत साबित करो। महान दार्शनिक ओशो ने कहा था, दर्द को चुनो मत। लेकिन जब वह आए तो उसे गले लगाओ। दर्द तुम्हें शुद्ध करता है। खलील जिब्रान ने लिखा था, तुम्हारा दर्द उस कवच के टूटने की आवाज है जो तुम्हारी समझ को कैद किए हुए है। दोस्तों, मीडियोग्रिटी इसलिए नहीं है कि आप में काबिलियत नहीं है। मीडियोग्रिटी इसलिए है क्योंकि आप दर्द को अपना दुश्मन मानते हैं। जिम में मसल्स कब बनते हैं? जब आप आखिरी रैप्स लगाते हैं। जब फाइबर टूटते हैं। दिमाग कब तेज होता है? जब आप वो किताब पढ़ते हैं जो समझ नहीं आ रही। लेकिन आप फिर भी पढ़ते रहते हैं। न्यूरोसाइंस में एक कांसेप्ट है विनर इफेक्ट। जब आप कोई कठिन काम पूरा करते हैं, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों ना हो, आपके दिमाग में टेस्टोस्टेरोन और डोपामाइन का एक ऐसा कॉकटेल रिलीज होता है जो आपके ब्रेन को रिवायर करता है। जीतना एक आदत है और हारना वो भी एक आदत है। जब आप सुबह अलार्म बंद करके दोबारा सोते हैं, आप अपने दिमाग को हारने की ट्रेनिंग दे रहे हैं। तो अब सवाल है आप इस चक्रव्यूह से