सिर्फ 1 आदत — और आपकी Identity पूरी तरह बदल जाएगी | Dav… — Transcript

डेविड गोगिंस की प्रेरक कहानी और मीडियोक्रीटी से लड़ने की एक आदत जो आपकी पहचान बदल देगी।

Key Takeaways

  • औसत बनने की मानसिकता से बाहर निकलना जरूरी है।
  • दर्द और संघर्ष को अपनाकर ही असली पहचान बनती है।
  • 40% रूल से पता चलता है कि हमारी क्षमता का बड़ा हिस्सा अनछुआ रहता है।
  • दिमाग की संरचना संघर्ष से मजबूत होती है, इसलिए कठिनाइयों का सामना करें।
  • छोटी सफलताएं आपकी मानसिक मजबूती और जीत की आदत बनाती हैं।

Summary

  • मीडियोक्रीटी यानी औसत बने रहने की मानसिकता एक दिमागी बीमारी है जो हमें कमजोर बनाती है।
  • डेविड गोगिंस की कहानी से पता चलता है कि दर्द और संघर्ष को अपनाकर ही असली पहचान बनती है।
  • न्यूरोसाइंस के अनुसार, कठिनाइयों का सामना करने से दिमाग का एक हिस्सा बढ़ता है जो विल पावर को दर्शाता है।
  • 40% रूल बताता है कि जब आप थक चुके लगते हैं तब भी आपकी क्षमता का 60% हिस्सा बचा होता है।
  • दर्द से भागने की बजाय उसे चुनने से जीवन के कष्ट कम होते हैं और मानसिक मजबूती आती है।
  • अपने दिमाग को नकारात्मक सोच से बचाने के लिए एनिमी विजुअलाइजेशन जैसी तकनीकें मददगार हैं।
  • विनर इफेक्ट के तहत छोटी-छोटी सफलताएं दिमाग में सकारात्मक हार्मोन रिलीज कर सफलता की आदत बनाती हैं।
  • मीडियोक्रीटी की जड़ दर्द से डरना और संघर्ष से बचना है, जो आपकी असली क्षमता को दबा देता है।
  • सफलता और हार दोनों आदतें हैं, इसलिए रोजाना की छोटी-छोटी जीतों पर ध्यान देना जरूरी है।
  • कंफर्ट जोन से बाहर निकलकर संघर्ष की आग में खुद को तपाना ही असली विकास है।

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Speaker A
अगर आप इस वीडियो पर क्लिक कर चुके हैं तो एक बात साफ है। आप एवरेज नहीं हैं। लेकिन कड़वा सच यह है कि आपकी आदतें वह बिल्कुल एवरेज हैं। आज दुनिया में एक महामारी फैली है। नहीं, मैं किसी वायरस की बात नहीं कर रहा। मैं बात कर रहा हूं एक दिमागी बीमारी की जिसका नाम है मीडियक्रेटी, यानी औसत बने रहने की बीमारी। सुकरात ने कहा था एक इंसान के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और कोई नहीं हो सकती कि वह बूढ़ा हो जाए और कभी अपनी उस शारीरिक और मानसिक ताकत को ना देख पाए जिसके लिए उसका शरीर बना था। जरा सोचिए, क्या आप अपनी जिंदगी बस गुजार रहे हैं? आज हम उस झूठ का पर्दाफाश करेंगे जो आपको बताया गया है। आज हम डेविड गोगिंस, फ्रेडरिक नीचे और न्यूरो साइंस की दुनिया में गोता लगाएंगे। नमस्कार दोस्तों, मैं हूं सौरभ और स्वागत है आपका बुक ट्यूबर हिंदी पर। कहानी शुरू होती है डेविड गोगिंस के ऑफिस में। एक 25 साल का लड़का गोगिंस से मिलने आता है। वह गाइडेंस मांग रहा था। उसने कहा, डेविड, मैंने बहुत कोशिश की। मेरा वजन कम नहीं होता। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं भविष्य में क्या करूं। कभी सोचता हूं आर्मी ज्वाइन कर लूं। कभी जिम खोलने का मन होता है, कभी बिजनेस करने का। गोगिंस ने उसे ध्यान से देखा। उनकी आंखों में वह एक्सरे विजन था जो इंसान की रूह को पढ़ लेता है। गोगिंस कहते हैं मैंने उससे बस कुछ पर्सनल सवाल किए और 5 मिनट में मुझे सब समझ आ गया। उस लड़के की समस्या उसका वजन नहीं था। उसकी समस्या उसका करियर नहीं था। उसकी समस्या यह थी कि उसने जिंदगी में हथियार डाल दिए थे। जब भी कुछ कठिन होता वह रास्ता बदल लेता। जब भी दर्द होता वह पीछे हट जाता। उसके अंदर किसी भी चैलेंज को फेस करने का कॉन्फिडेंस ही नहीं बचा था और इसे ही कहते हैं मीडियोक्रीटी। बस किसी तरह काम चल जाए वाली सोच। क्या यह कहानी आपको जानी-पहचानी नहीं लगती? हम सब एक ऐसी दुनिया में रहना चाहते हैं जहां हमें कोई चैलेंज ना करे। अक्सर स्टूडेंट्स को क्या कहा जाता है? बस उतना ही पढ़ लो जितने में एग्जाम पास हो जाए। बस ऐसी नौकरी ढूंढ लो जहां सुकून हो। हमने कंफर्ट को अपना भगवान बना लिया है। लेकिन यहां एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है जिसे द फ्रॉग ब्रेन बायस कहते हैं। आपका दिमाग विशेष रूप से आपका पुराना दिमाग, लिंबिक सिस्टम, महान बनने के लिए डिजाइन नहीं किया गया है। यह आपको जिंदा रखने और सुरक्षित रखने के लिए डिजाइन किया गया है। जब आप रिस्क लेते हैं, आपका दिमाग चिल्लाता है, रुको, खतरा है। जब आप सुबह 4:00 बजे उठना चाहते हैं, आपका दिमाग फुसफुसाता है, सो जा, बाहर ठंड है। आप आलसी नहीं हैं। आप बस अपनी बायोलॉजी के गुलाम हैं। और मीडियोग्रिटी इसी गुलामी का नाम है। और सच यह है आप एवरेज लोगों के बीच बेस्ट दिखना चाहते हैं। इसलिए आप अपने आसपास कमजोर लोगों को इकट्ठा कर लेते हैं ताकि आपका अहंकार सुरक्षित रहे। लेकिन फ्रेडरिक नीचे ने कहा था, बिकम हु यू आर। वह बनो जो तुम असल में हो और जो तुम हो वह आराम की मखमल में नहीं बल्कि संघर्ष की आग में मिलेगा। यह सिर्फ हवाहवाई बातें नहीं हैं। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. एंड्रू ह्यूबरमैन ने हाल ही में एक खोज की है। हमारे दिमाग में एक हिस्सा होता है, एंटीरियर मिड सिंगुलेट कॉर्टेक्स। रिसर्च में पाया गया कि मोटे और आलसी लोगों में यह हिस्सा छोटा होता है और एथलीट्स और योद्धाओं में यह हिस्सा बड़ा होता है। मजे की बात यह है यह हिस्सा सिर्फ तब बड़ा होता है जब आप वह काम करते हैं जो आप नहीं करना चाहते। जब आप मन मारकर जिम जाते हैं या ठंडे पानी से नहाते हैं तो यह हिस्सा फिजिकली बड़ा होता है। यही आपकी विल पावर की मसल है। यानी अगर आप संघर्ष नहीं कर रहे तो आपका दिमाग लिटरली सिकुड़ रहा है। तो फिर वह 1% लोग कौन हैं जो दुनिया बदलते हैं? क्या उनके पास कोई जादुई शक्ति है? नहीं। फर्क सिर्फ एक है। पेन टॉलरेंस। दर्द सहने की क्षमता। बहुत कम लोग हैं जो शीशे में देखकर खुद से कहते हैं, मुझे फर्क नहीं पड़ता कि यह संभव है या नहीं। मुझे मतलब है कि क्या मैं इसके लिए अपनी जान लगा सकता हूं। वे परिणाम के लिए नहीं बल्कि सेल्फ डिस्कवरी, आत्म खोज के लिए लड़ते हैं। गोगिंस कहते हैं अगर आपको इन टॉप 1% लोगों के बीच रहना पड़े जो लगातार एक पर्वत के बाद दूसरा पर्वत नापते हैं तो आप उनका साथ बर्दाश्त नहीं कर पाओगे। क्यों? क्योंकि उनके सामने आपका डर, आपका खोखलापन और आपकी बहानेबाजी नंगी हो जाएगी। उनकी आग में आपका अहंकार जल जाएगा। ध्यान दीजिए आप अंदर से खुश क्यों नहीं हैं? क्योंकि आपके करंट सेल्फ और आपके पोटेंशियल सेल्फ के बीच बहुत बड़ा अंतर आ गया है। आप जानते हैं कि आप बेहतर कर सकते हैं, लेकिन आप कर नहीं रहे। यह जो खालीपन है, इसे भरने के लिए आप क्या करते हैं? रील्स स्क्रोल करते हैं, जंक फूड खाते हैं, नशा करते हैं। यह सब उस दर्द को शून्य करने के तरीके हैं जो आपकी अपनी आत्मा आपको दे रही है। अब मैं आपको उस दुनिया में ले चलता हूं जिसके बारे में डेविड गोगिंस बात करते हैं। वह दुनिया जो डर के दूसरे छोर पर है। सैन डियागो की वह सरहद रात। डेविड गोगिंस ने एक पागलपन भरा फैसला लिया। बिना किसी खास ट्रेनिंग के, बिना किसी सपोर्ट क्रू के उन्होंने 100 माइल्स, 160 कि.मी. की रेस में दौड़ना शुरू किया। 24 घंटे का लक्ष्य। शुरुआत जोश में हुई। नेवी सील की ट्रेनिंग काम आई। वो दौड़ते रहे। 12 घंटों के अंदर उन्होंने किसी तरह 112 कि.मी. पूरे कर लिए। लेकिन फिर 112 कि.मी. के बाद शरीर ने जवाब दे दिया। गोगिंस कुर्सी पर बैठ गए। उन्होंने नीचे देखा, सफेद मोजे लाल हो चुके थे। पैरों के छालों से खून रिस रहा था। जब वह वाशरूम गए तो देखा कि वह यूरिन नहीं बल्कि खून निकाल रहे थे। किडनी फेल हो रही थी। फेफड़ों में खून भर रहा था। हड्डियां चटकने की कगार पर थीं। हर तर्क, हर लॉजिक, हर डॉक्टर यही कहता रुक जाओ वरना मर जाओगे। उनका मन चिल्ला रहा था। डेविड, तुम यहां क्यों हो? तुम कितने बेवकूफ हो? बिना ट्रेनिंग के 160 कि.मी. क्यों? यही वह पल है। यही वह खाई है जहां 99.9% लोग लौट आते हैं। गोगिंस ने अपने मन को जवाब देने की कोशिश की। मैं यह चैरिटी के लिए कर रहा हूं। मन ने कहा बकवास। कोई भी चैरिटी के लिए अपनी जान नहीं देता। मैं लोगों को इंस्पायर करना चाहता हूं। मन ने कहा झूठ, तुम दर्द में हो। बस करो। अगले चार घंटे वह कुर्सी पर बैठे रहे। कांपते हुए, रोते हुए। सारे मोटिवेशनल कोर्स खत्म हो चुके थे। सारी पॉजिटिव थिंकिंग फेल हो चुकी थी। जब आप नर्क में होते हैं तो यू कैन डू इट वाले नारे काम नहीं आते। तभी उस अंधेरे सन्नाटे में डेविड के अंदर से एक आवाज आई। कोई लॉजिक नहीं, कोई बहाना नहीं। बस एक कच्चा जानवर जैसा सच। उसने खुद से कहा, बिकॉज आई एम वन हार्ड मदर। उस एक वाक्य ने सब बदल दिया। यह कोई मोटिवेशन नहीं था। यह आइडेंटिटी शिफ्ट था। अचानक शरीर में एड्रेनालाईन दौड़ गया। दर्द अभी भी था। हड्डियां अभी भी टूटी थीं। लेकिन अब सहने वाला बदल चुका था। उन्होंने टेप से अपने पैरों को बांधा। खड़े हुए और चलना शुरू किया। 113 कि.मी., 120, 140 और उन्होंने वह रेस पूरी की। गोगिंस कहते हैं जब रेस खत्म हुई तो मैंने उस कुर्सी पर बैठकर एक नई दुनिया देखी। मुझे समझ आया कि मेरा मन कितनी भी डरावनी तस्वीर बना ले, मैं उसे पार कर सकता हूं। यह थी द 40% रूल की खोज। जब आपका दिमाग कहता है कि आप पूरी तरह थक चुके हैं, तब दरअसल आपने अपनी क्षमता का सिर्फ 40% ही इस्तेमाल किया होता है। बाकी 60% अभी भी रिजर्व टैंक में है। स्टोइक फिलॉसफर मार्कस ओरिलियस कहते थे, बाधा ही रास्ता है। द ऑब्सकल इज द वे। और यहां एक बहुत गहरा मनोवैज्ञानिक सिद्धांत काम करता है जिसे कहते हैं द पेन पैराडॉक्स। दर्द का विरोधाभास। सिद्धांत यह है आप जितना दर्द से भागेंगे, जीवन आपको उतना ही अधिक कष्ट देगा। लेकिन अगर आप स्वेच्छा से दर्द को चुनते हैं तो जीवन का कष्ट आपको छू भी नहीं पाएगा। हमने पिछले कुछ वीडियोस में बताया है कि आपके दिमाग को रियलिटी और इमेजिनेशन में फर्क नहीं पता। जब आप खुद को बेचारा बोलते हैं तो आपके मिरर न्यूरॉन्स उस लाचारी को सच मान लेते हैं। आप अपने ही दिमाग को हिप्नोटाइज कर रहे हैं फेल होने के लिए। एक ट्रिक बताता हूं। एनिमी विजुअलाइजेशन। अपने दिमाग में एक ऐसे इंसान को इमेजिन करो जो आपसे नफरत करता है। वह चाहता है कि आप फेल हो जाओ। क्या आप उसे जीतने दोगे? कई बार प्यार से ज्यादा ताकत नफरत या जिद में होती है। उस जिद का इस्तेमाल करो। अपनी सफलता से उन्हें गलत साबित करो। महान दार्शनिक ओशो ने कहा था, दर्द को चुनो मत। लेकिन जब वह आए तो उसे गले लगाओ। दर्द तुम्हें शुद्ध करता है। खलील जिब्रान ने लिखा था, तुम्हारा दर्द उस कवच के टूटने की आवाज है जो तुम्हारी समझ को कैद किए हुए है। दोस्तों, मीडियोग्रिटी इसलिए नहीं है कि आप में काबिलियत नहीं है। मीडियोग्रिटी इसलिए है क्योंकि आप दर्द को अपना दुश्मन मानते हैं। जिम में मसल्स कब बनते हैं? जब आप आखिरी रैप्स लगाते हैं। जब फाइबर टूटते हैं। दिमाग कब तेज होता है? जब आप वो किताब पढ़ते हैं जो समझ नहीं आ रही। लेकिन आप फिर भी पढ़ते रहते हैं। न्यूरोसाइंस में एक कांसेप्ट है विनर इफेक्ट। जब आप कोई कठिन काम पूरा करते हैं, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों ना हो, आपके दिमाग में टेस्टोस्टेरोन और डोपामाइन का एक ऐसा कॉकटेल रिलीज होता है जो आपके ब्रेन को रिवायर करता है। जीतना एक आदत है और हारना वो भी एक आदत है। जब आप सुबह अलार्म बंद करके दोबारा सोते हैं, आप अपने दिमाग को हारने की ट्रेनिंग दे रहे हैं। तो अब सवाल है आप इस चक्रव्यूह से
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Speaker A
रहा। मैं बात कर रहा हूं एक दिमागी बीमारी की जिसका नाम है मीडियक्रेटी यानी औसत बने रहने की बीमारी। सुकरात ने कहा था एक इंसान के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और कोई नहीं हो सकती कि वह बूढ़ा हो जाए और
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Speaker A
कभी अपनी उस शारीरिक और मानसिक ताकत को ना देख पाए जिसके लिए उसका शरीर बना था। जरा सोचिए क्या आप अपनी जिंदगी बस गुजार रहे हैं? आज हम उस झूठ का पर्दाफाश करेंगे जो आपको बताया गया है। आज हम डेविड गोगिंस,
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Speaker A
फ्रेडरिक नीचे और न्यूरो साइंस की दुनिया में गोता लगाएंगे। नमस्कार दोस्तों, मैं हूं सौरभ और स्वागत है आपका बुक ट्यूबर हिंदी पर। कहानी शुरू होती है डेविड गोगिंस के ऑफिस में। एक 25 साल का लड़का गोगिंस से मिलने आता है। वह गाइडेंस मांग
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Speaker A
रहा था। उसने कहा, डेविड, मैंने बहुत कोशिश की। मेरा वजन कम नहीं होता। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं भविष्य में क्या करूं। कभी सोचता हूं आर्मी ज्वाइन कर लूं। कभी जिम खोलने का मन होता है, कभी बिजनेस
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Speaker A
करने का। गोगिंस ने उसे ध्यान से देखा। उनकी आंखों में वह एक्सरे विजन था जो इंसान की रूह को पढ़ लेता है। गोगिंस कहते हैं मैंने उससे बस कुछ पर्सनल सवाल किए और 5 मिनट में मुझे सब समझ आ गया। उस लड़के
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Speaker A
की समस्या उसका वजन नहीं था। उसकी समस्या उसका करियर नहीं था। उसकी समस्या यह थी कि उसने जिंदगी में हथियार डाल दिए थे। जब भी कुछ कठिन होता वह रास्ता बदल लेता। जब भी दर्द होता वह पीछे हट जाता। उसके अंदर
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Speaker A
किसी भी चैलेंज को फेस करने का कॉन्फिडेंस ही नहीं बचा था और इसे ही कहते हैं मीकटी। बस किसी तरह काम चल जाए वाली सोच। क्या यह कहानी आपको जानी पहचानी नहीं लगती? हम सब एक ऐसी दुनिया में रहना चाहते हैं जहां
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Speaker A
हमें कोई चैलेंज ना करे। अक्सर स्टूडेंट्स को क्या कहा जाता है? बस उतना ही पढ़ लो जितने में एग्जाम पास हो जाए। बस ऐसी नौकरी ढूंढ लो जहां सुकून हो। हमने कंफर्ट को अपना भगवान बना लिया है। लेकिन यहां एक
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Speaker A
मनोवैज्ञानिक तथ्य है जिसे द फ्रॉग ब्रेन बायस कहते हैं। आपका दिमाग विशेष रूप से आपका पुराना दिमाग लिंबिक सिस्टम महान बनने के लिए डिजाइन नहीं किया गया है। यह आपको जिंदा रखने और सुरक्षित रखने के लिए डिजाइन किया गया है। जब आप रिस्क लेते
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Speaker A
हैं, आपका दिमाग चिल्लाता है। रुको, खतरा है। जब आप सुबह 4:00 बजे उठना चाहते हैं, आपका दिमाग फुसफुसाता है। सो जा बाहर ठंड है। आप आलसी नहीं है। आप बस अपनी बायोलॉजी के गुलाम हैं। और मीडियोग्रिटी इसी गुलामी
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Speaker A
का नाम है। और सच यह है आप एवरेज लोगों के बीच बेस्ट दिखना चाहते हैं। इसलिए आप अपने आसपास कमजोर लोगों को इकट्ठा कर लेते हैं ताकि आपका अहंकार सुरक्षित रहे। लेकिन फ्रेडरिक नीचे ने कहा था बिकम हु यू आर।
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Speaker A
वह बनो जो तुम असल में हो और जो तुम हो वह आराम की मखमल में नहीं बल्कि संघर्ष की आग में मिलेगा। यह सिर्फ हवाहवाई बातें नहीं है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. एंड्रू ह्यूबरमैन ने हाल ही में एक खोज की है। हमारे दिमाग में
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Speaker A
एक हिस्सा होता है एंटीरियर मिड सिंगुलेट कॉर्टेक्स। रिसर्च में पाया गया कि मोटे और आलसी लोगों में यह हिस्सा छोटा होता है और एथलीट्स और योद्धाओं में यह हिस्सा बड़ा होता है। मजे की बात यह है यह हिस्सा
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Speaker A
सिर्फ तब बड़ा होता है जब आप वह काम करते हैं जो आप नहीं करना चाहते। जब आप मन मारकर जिम जाते हैं या ठंडे पानी से नहाते हैं तो यह हिस्सा फिजिकली बड़ा होता है। यही आपकी विल पावर की मसल है। यानी अगर आप
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Speaker A
संघर्ष नहीं कर रहे तो आपका दिमाग लिटरली सिकुड़ रहा है। तो फिर वह 1% लोग कौन है जो दुनिया बदलते हैं? क्या उनके पास कोई जादुई शक्ति है? नहीं। फर्क सिर्फ एक है। पेन टॉलरेंस। दर्द सहने की क्षमता। बहुत
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Speaker A
कम लोग हैं जो शीशे में देखकर खुद से कहते हैं मुझे फर्क नहीं पड़ता कि यह संभव है या नहीं। मुझे मतलब है कि क्या मैं इसके लिए अपनी जान लगा सकता हूं। वे परिणाम के लिए नहीं बल्कि सेल्फ डिस्कवरी आत्म खोज
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Speaker A
के लिए लड़ते हैं। गोगिंस कहते हैं अगर आपको इन टॉप 1% लोगों के बीच रहना पड़े जो लगातार एक पर्वत के बाद दूसरा पर्वत नापते हैं तो आप उनका साथ बर्दाश्त नहीं कर पाओगे। क्यों? क्योंकि उनके सामने आपका
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Speaker A
डर, आपका खोखलापन और आपकी बहानेबाजी नंगी हो जाएगी। उनकी आग में आपका अहंकार जल जाएगा। ध्यान दीजिए आप अंदर से खुश क्यों नहीं हैं?
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Speaker A
क्योंकि आपके करंट सेल्फ और आपके पोटेंशियल सेल्फ के बीच बहुत बड़ा अंतर आ गया है। आप जानते हैं कि आप बेहतर कर सकते हैं, लेकिन आप कर नहीं रहे। यह जो खालीपन है, इसे भरने के लिए आप क्या करते हैं?
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Speaker A
रील्स स्क्रोल करते हैं, जंक फूड खाते हैं, नशा करते हैं। यह सब उस दर्द को शून्य करने के तरीके हैं जो आपकी अपनी आत्मा आपको दे रही है। अब मैं आपको उस दुनिया में ले चलता हूं जिसके बारे में
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Speaker A
डेविड गोगिंस बात करते हैं। वह दुनिया जो डर के दूसरे छोर पर है। सैन डियागो की वह सरहद रात। डेविड गोगिंस ने एक पागलपन भरा फैसला लिया। बिना किसी खास ट्रेनिंग के, बिना किसी सपोर्ट क्रू के उन्होंने 100
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Speaker A
माइल्स 160 कि.मी. की रेस में दौड़ना शुरू किया। 24 घंटे का लक्ष्य। शुरुआत जोश में हुई। नेवी सील की ट्रेनिंग काम आई। वो दौड़ते रहे। 12 घंटों के अंदर उन्होंने किसी तरह 112 कि.मी. पूरे कर लिए। लेकिन फिर 112 कि.मी. के बाद शरीर ने जवाब दे
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Speaker A
दिया। गोगिंस कुर्सी पर बैठ गए। उन्होंने नीचे देखा सफेद मोजे लाल हो चुके थे। पैरों के छालों से खून रिस रहा था। जब वह वाशरूम गए तो देखा कि वह यूरिन नहीं बल्कि खून निकाल रहे थे। किडनी फेल हो रही थी।
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Speaker A
फेफड़ों में खून भर रहा था। हड्डियां चटकने की कगार पर थी। हर तर्क, हर लॉजिक, हर डॉक्टर यही कहता रुक जाओ वरना मर जाओगे। उनका मन चिल्ला रहा था। डेविड, तुम यहां क्यों हो? तुम कितने बेवकूफ हो? बिना
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Speaker A
ट्रेनिंग के 160 कि.मी. क्यों? यही वह पल है। यही वह खाई है जहां 99.9% लोग लौट आते हैं। गोगिंस ने अपने मन को जवाब देने की कोशिश की। मैं यह चैरिटी के लिए कर रहा हूं। मन ने कहा बकवास। कोई भी
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Speaker A
चैरिटी के लिए अपनी जान नहीं देता। मैं लोगों को इंस्पायर करना चाहता हूं। मन ने कहा झूठ तुम दर्द में हो। बस करो। अगले चार घंटे वह कुर्सी पर बैठे रहे। कांपते हुए, रोते हुए। सारे मोटिवेशनल कोर्ट्स खत्म हो चुके थे। सारी पॉजिटिव थिंकिंग
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Speaker A
फेल हो चुकी थी। जब आप नर्क में होते हैं तो यू कैन डू इट वाले नारे काम नहीं आते। तभी उस अंधेरे सन्नाटे में डेविड के अंदर से एक आवाज आई। कोई लॉजिक नहीं, कोई बहाना नहीं। बस एक कच्चा जानवर जैसा सच। उसने
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Speaker A
खुद से कहा। बिकॉज़ आई एम वन हार्ड मदर। उस एक वाक्य ने सब बदल दिया। यह कोई मोटिवेशन नहीं था। यह आइडेंटिटी शिफ्ट था। अचानक शरीर में एड्रना लाइन दौड़ गया। दर्द अभी भी था। हड्डियां अभी भी टूटी थी। लेकिन अब
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Speaker A
सहने वाला बदल चुका था। उन्होंने टेप से अपने पैरों को बांधा। खड़े हुए और चलना शुरू किया। 113 कि.मी. 120 140 और उन्होंने वह रेस पूरी की। गोगिंस कहते हैं जब रेस खत्म हुई तो मैंने उस कुर्सी पर
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Speaker A
बैठकर एक नई दुनिया देखी। मुझे समझ आया कि मेरा मन कितनी भी डरावनी तस्वीर बना ले मैं उसे पार कर सकता हूं। यह थी द 40% रूल की खोज। जब आपका दिमाग कहता है कि आप पूरी तरह थक चुके हैं तब दरअसल आपने अपनी
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Speaker A
क्षमता का सिर्फ 40% ही इस्तेमाल किया होता है। बाकी 60% अभी भी रिजर्व टैंक में है। स्टइक फिलॉसफर मार्कस ओरिलियस कहते थे बाधा ही रास्ता है। द ऑब्सकल इज द वे। और यहां एक बहुत गहरा मनोवैज्ञानिक सिद्धांत काम करता है जिसे कहते हैं द पेन
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Speaker A
पैराडॉक्स। दर्द का विरोधाभास। सिद्धांत यह है आप जितना दर्द से भागेंगे जीवन आपको उतना ही अधिक कष्ट देगा। लेकिन अगर आप स्वेच्छा से दर्द को चुनते हैं तो जीवन का कष्ट आपको छू भी नहीं पाएगा। हमने पिछले कुछ वीडियोस में बताया है कि आपके दिमाग
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Speaker A
को रियलिटी और इमेजिनेशन में फर्क नहीं पता। जब आप खुद को बेचारा बोलते हैं तो आपके मिरर न्यूरॉन्स उस लाचारी को सच मान लेते हैं। आप अपने ही दिमाग को हिप्नोटाइज कर रहे हैं फेल होने के लिए। एक ट्रिक
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Speaker A
बताता हूं। एनिमी विजुअलाइजेशन। अपने दिमाग में एक ऐसे इंसान को इमेजिन करो जो आपसे नफरत करता है। वह चाहता है कि आप फेल हो जाओ। क्या आप उसे जीतने दोगे? कई बार प्यार से ज्यादा ताकत नफरत या जिद में
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Speaker A
होती है। उस जिद का इस्तेमाल करो। अपनी सफलता से उन्हें गलत साबित करो। महान दार्शनिक ओशो ने कहा था। दर्द को चुनो मत। लेकिन जब वह आए तो उसे गले लगाओ। दर्द तुम्हें शुद्ध करता है। खलील जिब्रान ने
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Speaker A
लिखा था। तुम्हारा दर्द उस कवच के टूटने की आवाज है जो तुम्हारी समझ को कैद किए हुए है। दोस्तों, मीडियोगिटी इसलिए नहीं है कि आप में काबिलियत नहीं है। मीडियोग्रिटी इसलिए है क्योंकि आप दर्द को अपना दुश्मन मानते हैं। जिम में मसल्स कब
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Speaker A
बनते हैं? जब आप आखिरी रैप्स लगाते हैं। जब फाइबर टूटते हैं। दिमाग कब तेज होता है? जब आप वो किताब पढ़ते हैं जो समझ नहीं आ रही। लेकिन आप फिर भी पढ़ते रहते हैं। न्यूरोसाइंस में एक कांसेप्ट है विनर
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Speaker A
इफेक्ट। जब आप कोई कठिन काम पूरा करते हैं, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों ना हो, आपके दिमाग में टेस्टोस्टेरोन और डोपामाइन का एक ऐसा कॉकटेल रिलीज होता है जो आपके ब्रेन को रिवायर करता है। जीतना एक आदत है
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Speaker A
और हारना वो भी एक आदत है। जब आप सुबह अलार्म बंद करके दोबारा सोते हैं। आप अपने दिमाग को हारने की ट्रेनिंग दे रहे हैं। तो अब सवाल है आप इस चक्रव्यूह से बाहर कैसे निकलें? आपको लगता है कि आपको
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Speaker A
मोटिवेशन की जरूरत है? गोगिंस कहते हैं, मोटिवेशन इज गार्बेज। मोटिवेशन पेट्रोल की तरह है। जलकर खत्म हो जाता है। आपको इंजन बदलना होगा। आपको अपनी आइडेंटिटी बदलनी होगी। लोग इंतजार कर रहे हैं कि एक दिन उनके दरवाजे पर कोई गिफ्ट आएगा, कोई जादू
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Speaker A
होगा और उनका माइंडसेट बदल जाएगा। कठोर सच यह है। ऐसा कभी नहीं होगा। आपको संघर्ष करना पड़ेगा। आपको विजुअलाइज करना होगा सपनों को नहीं बल्कि उस कष्ट को जो रास्ते में आएगा। बी जे फोग जो स्टैनफोर्ड में बिहेवियरल साइंटिस्ट हैं कहते हैं बदलाव
11:13
Speaker A
बड़े फैसलों से नहीं बल्कि सूक्ष्म आदतों टाइनी हैबिट से आता है। लेकिन गोगिंस का तरीका थोड़ा अलग है। वो कहते हैं अपने दिमाग को कठोर बनाओ। हर दिन कुछ ऐसा करो जो तुम्हें करना पसंद नहीं है। क्या तुम्हें ठंडे पानी से नहाना पसंद नहीं तो
11:30
Speaker A
रोज नहाओ। क्या तुम्हें पढ़ना पसंद नहीं? तो रोज 10 पन्ने पढ़ो। क्यों? ताकि तुम अपने फ्रॉग ब्रेन को बता सको कि मालिक कौन है। क्या आप जानते हैं कि नासा जब अंतरिक्ष यात्रियों को चुनता है तो वह उनकी सफलताएं नहीं गिनता। वह यह देखता है
11:48
Speaker A
कि वह अपनी असफलताओं से कैसे उभरे। वह ग्रिट यानी दृढ़ता ढूंढते हैं। टैलेंट नहीं। अब मैं चाहता हूं कि आप मेरी बात बहुत ध्यान से सुने। यह वीडियो खत्म होने वाला है, लेकिन आपकी लड़ाई अब शुरू होगी। डेविड गोगिंस जब 300 पाउंड के थे, वह हर
12:05
Speaker A
रात शीशे के सामने खड़े होकर खुद को गाली देते थे। वो इसे अकाउंटेबिलिटी मिरर कहते थे। वह खुद से झूठ नहीं बोलते थे कि मैं हेल्थी हूं। वह कहते थे तुम मोटे हो, तुम आलसी हो और तुम अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे
12:18
Speaker A
हो। आपको भी आज रात यही करना है। खुद से मीठी बातें करना बंद करो। सेल्फ लव के नाम पर खुद को धोखा देना बंद करो। सच्चा सेल्फ लव यह है कि आप खुद से इतनी मोहब्बत करें कि आप खुद को एवरेज बनकर सड़ने ना दें।
12:34
Speaker A
यहां थ्री स्टेप्स हैं जो आपको आज से फॉलो करने हैं। नंबर वन द हेल यस और नो रूल। अगर कोई लक्ष्य आपको डरा नहीं रहा अगर उसे सोचकर रोंगटे नहीं खड़े हो रहे तो वह बहुत छोटा है। सेफ खेलना बंद करो। नंबर टू द
12:50
Speaker A
40% पुश। जब कल आप काम करते-करते थक जाओ, जब मन कहे बस बहुत हो गया, तो याद रखना यह सिर्फ 40% है। 5 मिनट और करो। एक पन्ना और पढ़ो। वही एक पन्ना आपको भीड़ से अलग करेगा। नंबर थ्री किल द विक्टिम। मेरे साथ
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Speaker A
बुरा हुआ। मेरे पास पैसे नहीं है। मेरा बैकग्राउंड खराब है। इन कहानियों को कचरे में डाल दो। आपकी समस्याएं आपकी हैं और उनका समाधान भी आप ही हैं। 1960 के दशक में वैज्ञानिक जॉन कैलहून ने एक डरावना प्रयोग किया। यूनिवर्स 25 उन्होंने चूहों
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Speaker A
के लिए एक स्वर्ग बनाया। असीमित खाना, असीमित पानी, कोई बिल्ली नहीं, कोई बीमारी नहीं। सब कुछ परफेक्ट था। आप सोचेंगे कि वह चूहे बहुत खुश रहे होंगे? नहीं। कुछ ही समय में वह चूहे आलसी हो गए। उन्होंने आपस
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Speaker A
में लड़ना शुरू कर दिया। माताओं ने अपने बच्चों को छोड़ दिया और अंत में वह सब मर गए। कंफर्ट ने उन्हें मार दिया। विज्ञान ने साबित किया है कि बिना संघर्ष के दिमाग और समाज दोनों सड़ जाते हैं और आज आप उसी
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Speaker A
यूनिवर्स 25 में जी रहे हैं। आपका सोफा, आपका Netflix और आपकी सुविधाएं धीरे-धीरे आपके दिमाग की हत्या कर रही हैं। औसत बनकर आप कभी खुश नहीं रह पाओगे क्योंकि इंसान की आत्मा विस्तार चाहती है। आराम आपको मौत की तरफ ले जाता है। संघर्ष
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Speaker A
आपको जीवन देता है। याद रखना एक दिन यह सब खत्म हो जाएगा। जब आप अपने आखिरी बिस्तर पर होंगे, तो आपके सामने दो लोग खड़े होंगे। एक वह जो आप बन गए और दूसरा वो जो आप बन सकते थे। अगर इन दोनों अजनबियों के
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Speaker A
बीच बहुत बड़ा अंतर हुआ, तो वह होगा असली नर्क। लेकिन अगर वह दोनों एक जैसे दिखे, अगर आपने अपनी पूरी क्षमता को निचोड़ लिया, तो वह होगा स्वर्ग। चुनाव आपका है। इस वीडियो को अभी लाइक मत करो। सब्सक्राइब
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Speaker A
भी मत करो अगर आप सीरियस नहीं हो। लेकिन अगर आपके अंदर वह आग है, अगर आप उस मीडिओ क्रिटिक वायरस को मारने के लिए तैयार हो तो कमेंट बॉक्स में जाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराओ। सिर्फ अपना शहर या स्टेट लिखो
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Speaker A
जहां से आप यह वीडियो देख रहे हो। देखते हैं कि भारत और दुनिया के किस कोने में वह 1% शेयर छिपे बैठे हैं। अपनी पहचान छोड़ जाओ। क्योंकि एवरेज लोग कमेंट नहीं करते। वह बस स्क्रोल कर देते हैं। बहुत-बहुत
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Speaker A
धन्यवाद।
Topics:डेविड गोगिंसमीडियोक्रीटीविल पावर40% रूलसंघर्षदर्द सहनान्यूरोसाइंसप्रेरणासफलता की आदतेंमोटिवेशन

Frequently Asked Questions

मीडियोक्रीटी क्या है और यह हमारे जीवन को कैसे प्रभावित करती है?

मीडियोक्रीटी का मतलब है औसत बने रहने की मानसिकता जो हमें दर्द और संघर्ष से बचाती है। यह हमारी असली क्षमता को दबा देती है और हमें कमजोर बनाती है।

डेविड गोगिंस की 40% रूल क्या है?

40% रूल कहता है कि जब आपका दिमाग कहता है कि आप पूरी तरह थक चुके हैं, तब भी आपने अपनी क्षमता का केवल 40% ही इस्तेमाल किया होता है। बाकी 60% अभी भी रिजर्व में होता है।

दर्द और संघर्ष को अपनाने का हमारे दिमाग पर क्या प्रभाव पड़ता है?

संघर्ष और दर्द को अपनाने से दिमाग का एंटीरियर मिड सिंगुलेट कॉर्टेक्स हिस्सा बढ़ता है, जो हमारी विल पावर और मानसिक मजबूती को बढ़ाता है। इससे हम कठिनाइयों का बेहतर सामना कर पाते हैं।

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