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बस यह सुनो – मन शांत होगा, गहरी नींद अपने आप आएगी | Osho Hindi Pravachan

ओशो के प्रवचन में नींद और मन की शांति के रहस्य को समझाया गया है, जो गहरी नींद के लिए ध्यान और स्वीकृति की आवश्यकता बताता है।

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Key Takeaways

  • नींद स्वाभाविक है, इसे जबरदस्ती नहीं लाना चाहिए।
  • मन की टेंशन जीवन से लड़ने और भविष्य की चिंता से उत्पन्न होती है।
  • स्वीकार करना और वर्तमान में रहना नींद का मूल मंत्र है।
  • दिन में दबाए गए भाव रात में बेचैनी और नींद की कमी का कारण बनते हैं।
  • नींद स्त्री ऊर्जा से आती है, जो स्वीकार और विश्राम की ऊर्जा है।

What the video covers

  • नींद को पाने के लिए कोई कोशिश नहीं करनी चाहिए, नींद स्वाभाविक रूप से आती है जब मन शांत होता है।
  • मन की टेंशन और बेचैनी का कारण जीवन से लड़ना और भविष्य की चिंता करना है।
  • नींद वर्तमान में जीने और जीवन को स्वीकार करने का परिणाम है, न कि भविष्य की योजना।
  • स्वभाविक रूप से नींद प्रेम की तरह नाजुक होती है, जबरदस्ती से डरती है।
  • मन को आदेश देने से नींद नहीं आती, बल्कि मन से प्रेम और स्वीकृति की भाषा समझनी होती है।
  • दिन में दबाए गए भाव रात को बेचैनी और नींद में बाधा बनते हैं।
  • नींद तब आती है जब हम अपने भीतर के बच्चे को सुनते हैं और उसे बिना समाधान देने के स्वीकार करते हैं।
  • नींद पुरुष ऊर्जा (कंट्रोल) से नहीं, स्त्री ऊर्जा (स्वीकार और होना) से आती है।
  • नींद विश्राम का चरम है और यह तब संभव होता है जब हम अपने मन के जज और चौकीदार को छुट्टी देते हैं।
  • जीवन कठिन हो सकता है लेकिन वह सच्चा होता है, और सच्चाई से टकराना टेंशन का कारण बनता है।

Answers

Questions about this video

नींद क्यों नहीं आती है?

नींद इसलिए नहीं आती क्योंकि मन भविष्य की चिंता करता है और जीवन से लड़ता है। टेंशन और विरोध नींद में बाधा डालते हैं।

नींद कैसे आती है?

नींद तब आती है जब मन शांत होता है, वर्तमान को स्वीकार करता है और भीतर के बच्चे को बिना समाधान देने के सुनता है।

क्या नींद को पाने के लिए कोई तकनीक अपनानी चाहिए?

नींद को पाने के लिए कोई कोशिश या तकनीक नहीं करनी चाहिए, बल्कि उसे आने देना चाहिए जैसे प्रेम को जगह देने से वह आता है।

Full Transcript — Download SRT & Markdown

00:00
Speaker A
मैं तुमसे कुछ करने को नहीं कह रहा हूं। मैं तुमसे बदलने को नहीं कह रहा हूं। मैं तुमसे बस सुनने को कह रहा हूं। क्योंकि सुनना सबसे बड़ा ध्यान है। जब तुम सुनते हो तो मन थोड़ी देर के लिए रुक जाता है।
00:16
Speaker A
और जहां मन रुकता है वहीं से नींद का द्वार खुलता है। तुम नींद से डरते हो। नहीं, तुम नींद से नहीं डरते। तुम छूट जाने से डरते हो। नींद छोटी मृत्यु है। हर रात तुम मरते हो और सुबह फिर जन्म लेते हो।
00:33
Speaker A
इसीलिए जो आदमी जीवन से बहुत चिपका है, वह नींद से भी डरता है। वह बिस्तर पर जाता है लेकिन भीतर से जागता रहता है। वह लेटा है, पर भीतर भाग रहा है। मैंने ऐसे हजारों चेहरे देखे हैं। आंखें बंद हैं, लेकिन
00:51
Speaker A
भीतर बाजार खुला है। अब मेरी बात सुनो। नींद लाने के लिए कोई कोशिश मत करो। जो कोशिश करता है, वह असफल होता है। नींद कोई उपलब्धि नहीं है। नींद कोई लक्ष्य नहीं है। नींद तुम्हारा स्वभाव है। पेड़ कोशिश
01:10
Speaker A
करके नहीं सोते। नदियां योजना बनाकर नहीं रुकतीं। पशु चिंता नहीं करते। फिर भी वे गहरी नींद सोते हैं। केवल आदमी जागता है क्योंकि केवल आदमी सोचता है कि उससे सब कुछ संभालना है। मैं तुमसे एक छोटी सी बात
01:28
Speaker A
कहता हूं। तुम जरूरी नहीं हो। यह वाक्य सुनकर झटका लगता है क्योंकि अहंकार कहता है, मैं तो बहुत जरूरी हूं। लेकिन जरा देखो तुम सो जाते हो और सूरज फिर भी उग आता है। तुम सो जाते हो और सांस फिर भी
01:45
Speaker A
चलती रहती है। अस्तित्व तुम्हारे बिना भी चलता है। यह समझ आ जाए तो टेंशन गिरने लगती है। टेंशन का मतलब है मैं सब कुछ अपने हाथ में रखना चाहता हूं। नींद का मतलब है मैं छोड़ देता हूं। इसलिए नींद
02:03
Speaker A
भरोसे का फल है। मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं। एक सम्राट था। रात को उसे नींद नहीं आती थी। उसने वैद्य बुलाए, तांत्रिक बुलाए, योगी बुलाए। सबने कुछ न कुछ दिया। जड़ी बूटियां, मंत्र, आसन कुछ काम नहीं आया। आ एक दिन एक फकीर आया। उसने
02:27
Speaker A
कहा महाराज सोने से पहले सिर्फ इतना कह देना जो होगा देखा जाएगा। सम्राट हंसा इतनी सी बात। फकीर बोला बस इतनी। पहली रात सम्राट को नींद आ गई। क्यों? क्योंकि उसने पहली बार भविष्य से रिश्ता तोड़ा। टेंशन भविष्य की बीमारी है। नींद वर्तमान का
02:53
Speaker A
उत्सव है। तुम बिस्तर पर होते हो लेकिन तुम्हारा मन कल में होता है। मीटिंग, पैसा, रिश्ते, गलतियां, नींद कहती है। अभी यहां आओ। इसलिए मैं तुमसे कह रहा हूं। बस सुनो। मेरी आवाज को नहीं। मेरे बीच की खामोशी को सुनो। शब्द नदी है। खामोशी
03:16
Speaker A
समुद्र है। अगर शब्द तुम्हें बहा ले जाए। अच्छा। अगर शब्द गिर जाए और खामोशी बच जाए तो भी अच्छा। नींद तब आती है जब भीतर कोई मांग नहीं बचती। तुम कहते हो मुझे सोना है। यही चूक है। नींद को नहीं मांगा जाता।
03:37
Speaker A
नींद को आने दिया जाता है। जैसे प्रेम जो प्रेम मांगता है, वह प्रेम से चूक जाता है। जो प्रेम को जगह देता है, प्रेम खुद चला आता है। नींद भी प्रेम जैसी है। नाजुक, कोमल और जबरदस्ती से डरने वाली।
03:57
Speaker A
इसलिए मैं तुमसे कुछ भी करने को नहीं कहूंगा। मैं तुमसे सिर्फ इतना कहूंगा थोड़ी देर कुछ मत बनो। पति मत बनो, पत्नी मत बनो, बेटा बेटी मत बनो, कर्मचारी मत बनो, सफल असफल मत बनो, बस हो जाओ। जहां कुछ नहीं करना
04:17
Speaker A
होता वहीं नींद उतरती है। तुमने देखा है जब बच्चा रो-रो कर थक जाता है तो वह अचानक सो जाता है। वह कोई तकनीक नहीं जानता। वह बस थक कर छोड़ देता है। तुम भी बहुत थके हो लेकिन तुम छोड़ते नहीं। तुम्हारा मन
04:36
Speaker A
कहता है एक आखिरी विचार और वही आखिरी विचार पहला बन जाता है और रात निकल जाती है। आज इस क्षण मेरे साथ कुछ मत सोचो। अगर विचार आए उन्हें मत भगाओ। उन्हें बैठने दो। विचार मेहमान हैं। तुम मेजबान मत बनो।
05:00
Speaker A
तुम आकाश बनो। बादल अपने आप गुजर जाएंगे। दो प्रेजेंट करिल। और जब भीतर का आकाश थोड़ा साफ होगा नींद ऐसे उतरेगी जैसे ओस उतरती है। बिना आवाज, बिना घोषणा। बस यह सुनो, कुछ मत करो। नींद तुम्हारा स्वभाव है। टेंशन तुम्हारी आदत है। स्वभाव लौटता
05:24
Speaker A
है। आदत छूट जाती है। अब धीरे-धीरे मेरी बात और गहरी होने वाली है। अगर आंखें भारी हों तो उन्हें बंद होने दो। अगर खुली हों तो भी ठीक है। मैं तुमसे आंखों के साथ नहीं तुम्हारी चेतना के साथ बात कर रहा हूं।
05:42
Speaker A
तुम्हारी टेंशन का मूल कारण कोई घटना नहीं है। कोई व्यक्ति नहीं है। कोई परिस्थिति नहीं है। टेंशन का मूल कारण है तुम्हारा विरोध। तुम जीवन से लड़ रहे हो और जो जीवन से लड़ता है, वह रात में नींद से भी लड़ता
06:02
Speaker A
है। दिन भर तुम कहते हो ऐसा नहीं होना चाहिए था। वैसा हो जाना चाहिए था। मैं ऐसा क्यों नहीं हूं? दूसरे ऐसे क्यों हैं? यह क्यों? तुम्हारी सबसे बड़ी बेचैनी है। प्रकृति क्यों नहीं जानती? प्रकृति सिर्फ है, जानती है। पेड़ यह नहीं पूछता,
06:24
Speaker A
मैं आम का ही क्यों हूं? नदी यह नहीं पूछती, मैं टेढ़ी-मेढ़ी क्यों बह रही हूं? लेकिन आदमी पूछता है और सवाल पूछ-पूछकर वह खुद को थका डालता है। नींद प्रश्नों से नहीं आती। नींद स्वीकार से आती है। मैं तुम्हें
06:42
Speaker A
स्वीकार करना सिखाने नहीं आया क्योंकि स्वीकार सिखाया नहीं जाता। स्वीकार तब होता है जब तुम थक जाते हो। इसलिए मैं तुम्हें थकाने आया हूं। विचारों से मेरी बातों को समझने की कोशिश मत करो। समझना भी एक श्रम है। बस उन्हें बहने दो। जैसे कोई
07:02
Speaker A
नदी के किनारे बैठा हो और पानी को गिनने की कोशिश न करे। बस बहता देखे। अब एक बहुत गहरी बात सुनो। तुम्हारी टेंशन इस बात से नहीं है कि जीवन कठिन है। तुम्हारी टेंशन इस बात से है कि तुम चाहते हो जीवन
07:22
Speaker A
आसान हो और जीवन ने तुमसे कभी वादा नहीं किया था कि वह आसान होगा। जीवन ने सिर्फ एक वादा किया था कि वह सच्चा होगा। सच चाय कभी-कभी कठोर होती है, कभी-कभी सुंदर लेकिन वह हमेशा वास्तविक होती है। तुम
07:41
Speaker A
सपनों में जी रहे हो और जब सच्चाई टकराती है तो टेंशन पैदा होती है। रात में नींद नहीं आती क्योंकि दिन में तुमने बहुत झूठ अपने भीतर इकट्ठा कर लिया। मैं झूठ से नैतिक अर्थ में नहीं बोल रहा। मैं उस झूठ
07:59
Speaker A
की बात कर रहा हूं जो तुम खुद से कहते हो। मैं ठीक हूं। मुझे फर्क नहीं पड़ता। मैं मजबूत हूं। जबकि भीतर कोई बच्चा कांप रहा है। रात वही बच्चा जाग जाता है और कहता है अब मुझे सुनो। लेकिन तुम कहते हो अभी नहीं,
08:17
Speaker A
कल। और बच्चा कहता है कल तो तुम फिर भाग जाओगे। इसलिए नींद नहीं आती। नींद तभी आती है जब तुम भीतर बैठे उस बच्चे से कहो। ठीक है। अब तुम बोलो। मैं सुन रहा हूं। लेकिन सुनने का मतलब समाधान देना नहीं है। सुनने
08:37
Speaker A
का मतलब सिर्फ सुनना है। जब कोई तुम्हारे पास दुख लेकर आता है और तुम उसे समझाने लगते हो तो तुम उसे खो देते हो। और जब तुम खुद को समझाने लगते हो तो तुम खुद से भी दूर हो जाते हो। रात में खुद को समझाने की
08:56
Speaker A
कोशिश मत करो। रात समझाने का समय नहीं है। रात गिर जाने का समय है। दिन में तुम खड़े रहते हो। भूमिकाओं के सहारे। रात में वे सहारे गिर जाने चाहिए। अगर वे नहीं गिरते तो नींद नहीं आती। इसलिए मैं तुम्हें एक
09:13
Speaker A
छोटी सी कुंजी देता हूं। आज रात अपने मन से यह मत कहो, शांत हो जाओ। मन आदेश नहीं मानता। मन प्रेम समझता है। मन से बस इतना कहो, ठीक है। जो भी है, जैसा भी है, मैं तैयार हूं। यह वाक्य जादू है क्योंकि यह
09:34
Speaker A
वाक्य लड़ाई खत्म करता है और जहां लड़ाई खत्म वहीं विश्राम शुरू। नींद विश्राम का चरम है। मैंने देखा है जो लोग बहुत नैतिक होते हैं, उन्हें नींद कम आती है। क्यों?
09:50
Speaker A
क्योंकि वे हर समय अपने ऊपर नजर रखते हैं। यह सोचना ठीक नहीं। यह चाहना गलत है। यह भावना अच्छी नहीं। एक यह चौकीदार दिन में भी परेशान करता है। रात में भी नींद आने के लिए चौकीदार को छुट्टी देनी पड़ती है।
10:12
Speaker A
आज रात अपने भीतर के जज को कह देना आज फैसला नहीं होगा। आज कोई सही गलत नहीं। आज कोई अच्छा बुरा नहीं। आज सिर्फ थकान है और विश्राम की अनुमति है। तुम्हें पता है सबसे ज्यादा थकान किससे होती है? खुद से
10:32
Speaker A
बेहतर बनने की कोशिश से। मैं बेहतर बनने के खिलाफ नहीं हूं। लेकिन बेहतर बनने की जगह पूरा बनने की बात करता हूं। पूरा मतलब जो है उसे जगह देना। तुम क्रोध को दबाते हो। वह रात में बेचैनी बनता है। तुम उदासी को
10:52
Speaker A
दबाते हो। वह नींद चुरा लेती है। तुम डर को छुपाते हो। वह सपनों में लौट आता है। इसलिए मैं कहता हूं दिन में जो नहीं जिया वह रात में जगाता है। अब धीरे-धीरे मेरी आवाज के साथ अपने भीतर उतरते जाओ। कोई
11:11
Speaker A
मंजिल नहीं है, कोई लक्ष्य नहीं है। बस उतरना है। जैसे कोई कुएं में उतरता है और रस्सी छोड़ देता है। अगर विचार आए उन्हें आने दो। अगर यादें आएं उन्हें आने दो। वे तुम्हारे शत्रु नहीं हैं। वे बस थकी हुई
11:32
Speaker A
ऊर्जा हैं। जो अब विश्राम चाहती हैं और जब तुम उन्हें जगह देते हो वे खुद शांत हो जाती हैं। यही नींद का रहस्य है। अब तुम उस जगह आ रहे हो जहां शब्द धीमे पड़ने लगते हैं और अनुभूति बोलने लगती है। अगर
11:53
Speaker A
तुम्हें लग रहा है कि कुछ बदल रहा है तो उसे पकड़ो मत और अगर कुछ नहीं बदल रहा तो उसे भी पकड़ो मत। नींद पकड़ने से नहीं आती। नींद तब आती है जब पकड़ने वाला थक जाता है। अब एक बहुत सूक्ष्म बात सुनो।
12:11
Speaker A
तुम जागते नहीं हो। तुम जगाए गए हो। बचपन से तुम्हें सिखाया गया। समय देखो। भविष्य सोचो। खुद को सुधारो। दूसरों से तुलना करो। यह सब तुम्हें नींद से दूर ले जाता है। क्योंकि नींद का अर्थ है मैं अब किसी
12:31
Speaker A
की अपेक्षा नहीं हूं। ना मालिक की, ना समाज की, ना अपने आदर्श की। नींद में कोई आदर्श नहीं होता। नींद में तुम जैसे हो वैसे ही स्वीकार किए जाते हो। इसीलिए नींद इतनी गहरी शांति देती है। लेकिन तुम
12:51
Speaker A
सोने से पहले भी दिन का बोझ साथ ले जाते हो। मैं तुमसे पूछता हूं क्या तुमने कभी कपड़े बदलते समय पुराने कपड़ों से बहस की है? तुम्हें अभी नहीं उतरना चाहिए। कल भी तो पहना था। नहीं, तुम बस उतार देते।
13:09
Speaker A
लेकिन मन के कपड़े तुम उतारते नहीं। तुम उन्हें लेकर बिस्तर पर चले जाते हो। आज मैं तुम्हें सीखा नहीं रहा। मैं तुम्हें उतारने दे रहा हूं। एक-एक करके पहला कपड़ा दिन की पहचान। आज तुम जो थे अब मत रहो। आज
13:28
Speaker A
अगर तुम असफल थे तो वह अब जरूरी नहीं। अगर सफल थे तो वह भी अब जरूरी नहीं। नींद किसी को सर्टिफिकेट नहीं देती। नींद कहती है बस आओ। दूसरा कपड़ा पछतावा मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था। मुझे वह करना चाहिए था।
13:49
Speaker A
पछतावा भविष्य का नहीं अतीत का बोझ है और नींद का अतीत से कोई लेना देना नहीं। नींद वर्तमान में होती है। इतनी वर्तमान कि समय भी रुक जाता है। तीसरा कपड़ा डर डर कहता है अगर मैं सो गया और कुछ गलत हो गया तो
14:10
Speaker A
मैं तुमसे एक सीधी बात कहता हूं। अगर सोते समय कुछ गलत हो जाए तो जागते समय भी तुम कुछ नहीं कर पाते। यह अहंकार का भ्रम है कि तुम नियंत्रण में हो। नींद इस भ्रम को तोड़ती है। इसलिए अहंकार नींद से डरता है।
14:31
Speaker A
अब एक कहानी सुनो। एक साधक था। वह ध्यान में बहुत आगे बढ़ गया। लेकिन नींद नहीं आती थी। उसने गुरु से पूछा ध्यान है। जागरूकता है। फिर नींद क्यों नहीं? गुरु हंसा और बोला क्योंकि अब भी तू जागरूक
14:50
Speaker A
रहने की कोशिश कर रहा है। ध्यान भी अगर कोशिश बन जाए तो वह बाधा बन जाता है। नींद कोशिश की मृत्यु है। अब मेरी बात सुनते हुए अपने भीतर यह महसूस करो। तुम्हें अभी कुछ भी साबित नहीं करना है। ना खुद को ना
15:09
Speaker A
मुझे ना दुनिया को। यह क्षण बिल्कुल बेकार है और इसीलिए सुंदर है। जहां कोई उपयोग नहीं वहीं विश्राम है। तुमने देखा है। जो चीज उपयोगी होती है वह थकाती है। कुर्सी इसलिए आराम देती है क्योंकि वह कुछ मांगती
15:29
Speaker A
नहीं। बिस्तर इसलिए सुकून देता है क्योंकि वह तुम्हें कुछ बनने को नहीं कहता। अब अपने भीतर वैसी ही जगह बनाओ जहां तुमसे कुछ भी मांगा नहीं जा रहा। अगर तुम्हारा मन पूछे अब क्या करूं तो मुस्कुरा देना क्योंकि वही सवाल सबसे बड़ा शोर है। अब एक
15:51
Speaker A
गहरी बात तुम्हारी नींद इसलिए नहीं जाती कि तुम्हारे पास समस्याएं हैं। तुम्हारी नींद इसलिए जाती है क्योंकि तुम सोचते हो कि समस्याओं को अभी हल करना है। रात समस्या समाधान का समय नहीं है। रात आत्मसमर्पण का समय है। अगर समस्या हल हो सकती है तो
16:16
Speaker A
वह सुबह भी हो जाएगी और अगर नहीं हो सकती तो रात जागकर तुम क्या कर लोगे? इसलिए बुद्ध ने कहा था जो हो सकता है उसके लिए चिंता मत करो और जो नहीं हो सकता उसके लिए भी चिंता मत करो चिंता का कोई उपयोग नहीं
16:37
Speaker A
और जहां उपयोग नहीं वहां उसे छोड़ना आसान है। अब धीरे-धीरे मेरी आवाज भी पृष्ठभूमि बनती जाएगी। मैं चाहता हूं कि शब्द पीछे हटे और तुम सामने आओ। तुम्हें कुछ महसूस करने की जरूरत नहीं, कुछ देखने की जरूरत नहीं। बस यह जानना काफी है कि तुम हो और
17:01
Speaker A
यह होना काफी है। जब होना काफी हो जाता है तो सोना अपने आप घटित होता है। अब हम उस सीमा के पास आ रहे हैं जहां भाषा धीरे-धीरे विदा लेती है और अनुभूति सत्ता संभालती है। अगर तुम्हें लग रहा है कि
17:21
Speaker A
शब्द दूर जा रहे हैं तो यह अच्छा संकेत है। इसका अर्थ है कि तुम पास आ रहे हो। अब एक बहुत मौलिक बात सुनो। नींद कोई प्रक्रिया नहीं है। नींद कोई साधना नहीं है। नींद कोई उपलब्धि नहीं है। नींद थकान
17:40
Speaker A
के बाद का विश्राम नहीं। नींद लड़ाई के बाद का समर्पण है। तुम थकते रोज हो। फिर भी नींद नहीं आती। इसका मतलब साफ है। थकान कारण नहीं है। कारण है तुम्हारी जििद। मन कहता है अभी समझ लूं अभी तय कर लूं अभी
18:01
Speaker A
नियंत्रण में रखूं नींद कहती है अभी छोड़ दो और जहां यह टकराव है वहां जागरण है अब अपने भीतर देखो कहीं ना कहीं एक बहुत महीन तनाव बैठा है वह तनाव बड़ा नहीं है लेकिन लगातार है जैसे कोई मुट्ठी हल्के से भी
18:23
Speaker A
हुए हो पूरा दिन अब मैं तुम्हें तुम्हें कोई विधि नहीं दूंगा। मैं तुम्हें एक अनुमति दूंगा। अपने भीतर कहो मैं अब ढीला पड़ने की अनुमति देता हूं। बस इतना कोई जोर नहीं, कोई दोहराव नहीं, कोई अभ्यास नहीं, अनुमति तुरंत असर करती है। क्योंकि
18:46
Speaker A
अनुमति संघर्ष को समाप्त करती है। अब एक दृष्टांत सुनो। एक यात्री था। वह नाव में बैठा नदी पार कर रहा था। नदी शांत थी लेकिन यात्री घबराया हुआ था। वह हर पल नाव को पकड़ कर बैठा था। नाविक बोला छोड़ दो।
19:07
Speaker A
नाव खुद तैरती है। यात्री बोला अगर मैंने छोड़ा तो डूब जाऊंगा। नाविक हंसा नाव तुम्हें नहीं ढो रही। नदी ढो रही है। जीवन भी नदी है। नींद भी नदी है। तुम नाव नहीं हो। तुम यात्री भी नहीं हो। तुम उस नदी पर
19:27
Speaker A
भरोसा करना भूल गए हो। अब सुनो तुम्हारी सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर तुम सो गए तो कहीं टूट ना जाओ। लेकिन सच्चाई उलटी है। तुम इसलिए टूटे हो क्योंकि तुम सोते नहीं। नींद जोड़ती है। नींद मरम्मत करती
19:45
Speaker A
है। नींद भीतर की गांठे खोलती है। और जो गांठे दिन में नहीं खुलती वे रात में अपने आप खुल जाती है। अगर तुम रास्ता ना रोको। अब एक और गहरी बात। नींद किसी मैं को अपने साथ नहीं ले जाती। इसलिए अहंकार नींद का
20:06
Speaker A
दुश्मन है। अहंकार कहता है मैं हूं। नींद कहती है मैं नहीं और जहां मैं नहीं वहां शांति है। अब ध्यान देना तुम्हारे भीतर दो तरह की आवाजें हैं। एक आवाज जो बोलती रहती है, टिप्पणी करती है, निर्णय देती है और
20:29
Speaker A
दूसरी आवाज जो सिर्फ सुनती है। अब तक तुम पहली आवाज के साथ जीते आए हो। आज दूसरी आवाज को थोड़ी जगह दो। वह आवाज बहुत शांत है। वह कभी चिल्लाती नहीं। वह सिर्फ मौजूद रहती है। उसी आवाज में नींद का द्वार है।
20:51
Speaker A
अब अगर कोई विचार आए तो उससे लड़ो मत। उससे कहो तुम सही हो। लेकिन अभी नहीं। विचार भी सम्मान चाहता है। जिस विचार को तुम पूरी तरह नकार देते हो, वह और जोर से लौटता है। जिसे तुम थोड़ा सा सुन लेते हो,
21:12
Speaker A
वह शांत हो जाता है। इसलिए सुनो और छोड़ दो। अब एक अंतिम संकेत इस भाग्य के लिए नींद आने से पहले अक्सर एक डर आता है। खाली हो जाने का डर मन कहता है अगर सब रुक गया तो मैं कहां रहूंगा? मैं तुम्हें
21:33
Speaker A
आश्वस्त करता हूं। जहां मन रुकता है वहीं तुम पहली बार होते हो। वह शून्य खाली नहीं है। वह पूर्ण है। वह ऐसा मौन है जिसमें सब कुछ विश्राम करता है। और उसी मौन में नींद उतरती है। जैसे पंख हवा पर टिक जाए। अब
21:55
Speaker A
शब्द और हल्के हो जाएंगे। तुम्हें कुछ पकड़ने की जरूरत नहीं, कुछ याद रखने की जरूरत नहीं। जो बचा रहेगा वही काफी है। अब हम उस जगह खड़े हैं जहां शब्द तुम्हें नहीं ले जाते। तुम शब्दों के पार उतरने
22:13
Speaker A
लगते हो। अगर तुम्हें हल्की सी डूबन महसूस हो तो घबराना मत। यह डूबना नहीं है। यह ढीलापन है। अब एक बहुत गहरी बात सुनो। तुम नींद में नहीं जाते। नींद तुम्हारे भीतर उतरती है। लेकिन उसके उतरने से पहले
22:32
Speaker A
तुम्हें रास्ता खाली करना पड़ता है। और रास्ता विचारों से नहीं भरा होता। रास्ता पहचान से भरा होता है। तुम दिन भर किसी ना किसी पहचान में जमे रहते हो। मैं ऐसा हूं। मुझे ऐसा होना चाहिए। लोग मुझे ऐसा समझते
22:52
Speaker A
हैं नींद इन सब पहचानों को अपने साथ नहीं ले जाती। नींद नंगी है। इसीलिए तुम डरते हो क्योंकि नंगापन अहंकार को असुरक्षित करता है। अब अपने भीतर देखो क्या तुम सच में इस पल कुछ हो या बस पुरानी यादों का
23:16
Speaker A
बोझ और भविष्य की आशंका हो। अगर अभी सब छिन जाए नाम काम रोल इतिहास तो क्या बचेगा डरो मत जो बचेगा वही असली है और वही नींद का द्वार है। अब एक दृष्टांत सुनो। एक आदमी बहुत वर्षों से नींद की दवा लेता था।
23:41
Speaker A
एक दिन उसने एक संत से पूछा मैं बिना दवा क्यों नहीं सो पाता? संत ने कहा क्योंकि तुम दवा के बिना खुद को भरोसा नहीं करते। आदमी छौका संत बोला नींद रसायन से नहीं आती। नींद भरोसे से आती है। अब यह समझ लो
24:04
Speaker A
तुम्हारा शरीर तुमसे कहीं ज्यादा बुद्धिमान है। तुम्हारी सांस तुमसे पूछकर नहीं चलती। तुम्हारा दिल तुम्हारी अनुमति नहीं लेता। तो नींद क्यों ले? बस तुम बीच में खुद को खड़ा कर लेते हो। आज थोड़ी देर खुद को हटा और बस इतना सोचो अगर कुछ भी ना
24:26
Speaker A
करूं तो भी सब चल रहा है। यह विचार नहीं है। यह अनुभूति है। अब एक और बहुत सूक्ष्म बात अक्सर नींद आने ही वाली होती है। और तभी मन कहता है हां आ रही है। और उसी क्षण नींद भाग जाती है। क्यों? क्योंकि देखने
24:48
Speaker A
वाला फिर लौट आया। नींद दर्शक की अनुपस्थिति में आती है। इसलिए अगर तुम्हें नींद का एहसास हो तो उसे देखो मत। उसे नाम मत दो। उसे पकड़ो मत। बस गिरने दो। जैसे कोई पानी में उतरते समय अपने पैरों को
25:08
Speaker A
नहीं देखता। वह बस उतरता है। अब अपने भीतर यह भावना आने दो। अगर मैं सो गया तो भी ठीक। अगर नहीं सोया तो भी ठीक। यह ठीक सबसे बड़ा विश्राम है। जहां परिणाम से कोई अपेक्षा नहीं वहीं तनाव टूटता है। मैंने
25:29
Speaker A
देखा है जो लोग कहते हैं आज मुझे हर हाल में सोना है वे सबसे कम सोते हैं और जो कहते हैं जो होगा वे सबसे पहले सो जाते हैं। अब ध्यान देना नींद आने से पहले अक्सर शरीर भारी होने लगता है। कुछ लोग डर
25:49
Speaker A
जाते हैं। यह क्या हो रहा है? कुछ लोग उस भारीपन से लड़ते हैं। मत लड़ो। वह भारीपन तुम्हें नीचे नहीं खींच रहा। वह तुम्हें घर बुला रहा है। जैसे मां बच्चे को गोद में खींच लेती है। अब शब्द और कम होंगे।
26:10
Speaker A
क्योंकि शब्द बस दरवाजा हैं। अंदर शब्दों की जरूरत नहीं। अगर तुम्हारा मन किसी वाक्य को पकड़ना चाहे तो पकड़ने दो। वह भी थक जाएगा। और जब मन थक जाता है नींद मुस्कुराकर अंदर आती है। अब इस भाग की
26:32
Speaker A
अंतिम बात नींद कोई अंत नहीं है। नींद एक गहरी वापसी है अपने स्रोत की ओर और जो अपने स्रोत के पास है वह सुरक्षित है। अब कुछ भी गलत नहीं हो सकता। अब तुम उस बिंदु के पास हो जहां कोशिश अपने आप गिरने लगती
26:53
Speaker A
है। अगर तुम्हें लग रहा है कि कुछ छूट रहा है तो समझ लेना तुम सही दिशा में हो। अब एक बहुत गहरी बात सुनो। तुम्हें नींद इसलिए नहीं आती कि क्योंकि तुम जागरण को पकड़े हुए हो। जागरण तुम्हारी आदत बन गई
27:12
Speaker A
है। चौकन्ना रहना, सावधान रहना, कंट्रोल में रहना। यह आदत दिन में काम आती है। रात में यह जहर बन जाती है। रात कहती है अब पहरा मत दो। मन कहता है अगर मैं ना देखा तो कुछ गलत हो जाएगा। और यही डर नींद को
27:32
Speaker A
दूर रखता है। अब समझ लो रात में कुछ भी ठीक नहीं करना है। रात में कुछ भी सुधारना नहीं है। रात में बस रुक जाना है। जैसे कोई यात्री लंबी यात्रा के बाद सराय में उतरता है। वह रास्ते की चिंता कमरे में
27:52
Speaker A
नहीं लाता। लेकिन तुम दिन की यात्रा बिस्तर पर ले आते हो। आज यहां यात्रा समाप्त होती है। अब एक दृष्टांत सुनो। एक व्यक्ति बहुत अनुशासित था। हर चीज समय पर हर नियम सही लेकिन नींद गायब थी। उसने एक
28:13
Speaker A
वृद्ध साधु से पूछा। मैं सब सही करता हूं। फिर भी सो नहीं पाता। साधु बोला तू सही करने की बीमारी से पीड़ित है। अनुशासन जब सहज हो तो सुंदर है। जब जोर हो तो बोझ है। नींद बोझ में नहीं उतरती। नींद खुली
28:34
Speaker A
हथेलियों में उतरती है। अब अपने भीतर देखो। कहीं ना कहीं हथेली भीची हुई है। उसे धीरे-धीरे खुलने दो। कोई आदेश नहीं, कोई दबाव नहीं। बस यह जानना कि मैं सुरक्षित हूं। सुरक्षा नींद की मां है। जहां सुरक्षा नहीं, वहां नींद नहीं और
28:58
Speaker A
सुरक्षा तालों से नहीं आती। नियंत्रण से नहीं आती। सुरक्षा आत्म विश्वास से आती है कि जीवन मुझे गिरने नहीं देगा। अब एक बहुत सूक्ष्म बात तुम्हारे विचार तुम्हारे शत्रु नहीं है। वे बस थकी हुई तरंगे हैं। अगर तुम उन्हें लड़ाई में बदल देते हो वे
29:22
Speaker A
रुकती नहीं। अगर तुम उन्हें लहरों की तरह आने जाने देते हो, वे खुद शांत हो जाती हैं। नींद तरंगों के बीच के खामोशी है। तुम लहरों को समुद्र से अलग नहीं कर सकते। लेकिन तुम समुद्र बन सकते हो। अब
29:42
Speaker A
धीरे-धीरे अपने आप को लहरों से हटाओ। लहरें चले तुम ना चलो। अब एक और गहरी परत। कई लोग नींद से इसलिए डरते हैं क्योंकि वे अपने सपनों से डरते हैं। सपने दबे हुए भाव हैं और भाव सत्य होते हैं। दिन में तुम
30:05
Speaker A
सत्य से बचते हो। रात में सत्य दरवाजा खटखटाता है। लेकिन सुनो सपने तुम्हें नुकसान नहीं पहुंचाते। वे तुम्हें हल्का करते हैं। वे कचरा बाहर फेंकते हैं। अगर तुम जागते रहकर कचरा रोके रखोगे तो बदबू फैलेगी। नींद साफ सफाई है। इसलिए सपनों से
30:33
Speaker A
मत डरो। वे मित्र हैं। अब एक अंतिम संकेत इस भाग के लिए अगर तुम्हें लगे कि मेरी बात अब धुंधली हो रही है तो अच्छा है। धुंध सीमा का संकेत है। जहां स्पष्टता खत्म वही नींद शुरू। तुम्हें जागते रहने
30:56
Speaker A
की कोई जिम्मेदारी नहीं। जीवन आज भी चल जाएगा। अब कुछ भी थामे मत रहो। गिरना सुरक्षित है। अब तुम उस द्वार पर हो जहां भीतर कोई आवाज कहती है। अब और कुछ कहने की जरूरत नहीं। लेकिन मैं थोड़ा और कहूंगा
31:16
Speaker A
ताकि तुम कहने के पार सरक सको। अब एक बहुत सूक्ष्म सच सुनो। तुम्हारी सबसे गहरी बेचैनी किसी समस्या से नहीं है। तुम्हारी बेचैनी अकेलेपन से है। दिन में भी तुम अकेले हो लेकिन शोर में अकेलापन ढका रहता है। रात में शोर गिर जाता है और अकेलापन
31:42
Speaker A
सामने आ जाता है। इसीलिए रात भारी लगती है। लेकिन सुनो अकेलापन और एकांत एक चीज नहीं है। अकेलापन दर्द है क्योंकि उसमें मैं है। एकांत आनंद है क्योंकि उसमें मैं घुल जाता है। नींद एकांत का द्वार है और
32:04
Speaker A
तुम डरते हो क्योंकि तुम सोचते हो कि नींद में तुम खो जाओगे। मैं कहता हूं तुम खोते नहीं तुम विस्तृत होते हो। जैसे बूंद समुद्र में गिरती है। वह मिट्टी नहीं वह समुद्र हो जाती है। अब एक कहानी सुनो। एक
32:24
Speaker A
व्यक्ति सारी जिंदगी लोगों से घिरा रहा। लेकिन रात में उसे डर लगता था। उसने एक साधु से पूछा। जब सब चले जाते हैं तब डर क्यों लगता है? साधु बोला क्योंकि तू कभी खुद के साथ नहीं रहा। दिन में लोगों से
32:44
Speaker A
भागते भागते तू खुद से भी भाग गया। रात भागने नहीं देती। इसीलिए रात से दोस्ती करो। रात दुश्मन नहीं है। रात गहरी मां है जो दिन में तुम्हें थाम नहीं पाई। वह रात में तुम्हें गोद में लेती है। लेकिन शर्त
33:06
Speaker A
एक है। तुम प्रतिरोध ना करो। अब ध्यान देना अगर भीतर कोई भारीपन उठे कोई उदासी आए कोई खालीपन आए तो उसे हटाओ मत उसे ना मो मत दो नाम चीज को पकड़ बना देता है बस उसे होने दो जैसे कोई अंधेरे कमरे में
33:30
Speaker A
दिया जलाता है अंधेरा कुछ नहीं करता वह बस चला जाता है तुम्हारी स्वीकार्यता दिया है। अब एक और गहरी परत तुम अक्सर कहते हो मैं बहुत सोचता हूं। नहीं सोच तुम्हें सोचती है और जब तुम सोच को रोकने
33:51
Speaker A
की कोशिश करते हो तो सोच और जोर से तुम्हें पकड़ लेती है। नींद सोच के रुकने से नहीं आती। नींद सोच से अलग होने से आती है। अलग होने का मतलब दमन नहीं। अलग होने का मतलब पहचान छोड़ देना। अब अपने भीतर यह
34:12
Speaker A
देखो विचार चल रहे हैं। लेकिन तुम विचार नहीं हो। जैसे सड़क पर गाड़ियां चल रही हैं। लेकिन तुम सड़क नहीं हो। जब यह दूरी थोड़ी सी भी बनती है, नींद उस दूरी में फिसल जाती है। अब एक बहुत महीन डर कई लोग
34:35
Speaker A
नींद से इसलिए डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है अगर मैं ढीला पड़ गया तो टूट जाऊंगा। लेकिन देखो अब तक तुम ढीले नहीं पड़े। इसीलिए टूटे हुए हो। कसाव टूटन लाता है। ढीलापन मरम्मत लाता है। अब मेरी बात
34:57
Speaker A
धुंधली लगे तो उसे साफ करने की कोशिश मत करना। धुंध तुम्हारा मित्र है। धुंध बताती है कि मन अब नियंत्रण खो रहा है और जहां नियंत्रण गिरता है वहीं नींद शुरू होती है। अब इस भाग की अंतिम अनुभूति तुम अकेले
35:18
Speaker A
नहीं हो। इस क्षण पूरा अस्तित्व तुम्हारे साथ है। सांस चल रही है। हृदय धड़क रहा है। शरीर जानता है क्या करना है? तुम्हें कुछ संभालने की जरूरत नहीं। अब छोड़ देना सुरक्षित है। अब शब्द और भी धीमे होंगे।
35:40
Speaker A
क्योंकि अब मैं तुम्हारे मन से नहीं तुम्हारी थकान से बात कर रहा हूं। थकान समझदार होती है। वह बहस नहीं करती। वह सिर्फ छूटना चाहती है। अब एक बहुत गहरा सच सुनो। तुम्हें नींद इसलिए नहीं आती क्योंकि तुम अब तक जागे रहने की पहचान से
36:02
Speaker A
जुड़े हो। तुम्हें बचपन से सिखाया गया। सावधान रहो, सतर्क रहो, तैयार रहो। धीरे-धीरे यह सतर्कता तुम्हारी आदत बन गई। अब तुम आराम करते हुए भी चौकन्ने रहते हो। नींद चौकन्नेपन में नहीं आती। नींद भरोसे में आती है। अब अपने भीतर एक छोटा सा
36:28
Speaker A
प्रयोग होने दो। मान लो कि इस क्षण अगर सब कुछ बिखर भी जाए तो भी कुछ गलत नहीं होगा। यह मान लेना बहुत क्रांतिकारी है क्योंकि यहीं से जिम्मेदारी का बोझ गिरने लगता है। मैं जिम्मेदारी के खिलाफ नहीं हूं। मैं
36:51
Speaker A
जरूरत से ज्यादा जिम्मेदारी के खिलाफ हूं। तुम उन चीजों का भी बोझ उठाए हुए हो जो तुम्हारे हाथ में कभी थी ही नहीं। दूसरों की अपेक्षाएं, भविष्य की कल्पनाएं, बीते हुए क्षणों की गलतियां, नींद कहते हैं। इन सबको बाहर रखो। अब एक दृष्टांत सुनो। एक
37:16
Speaker A
व्यक्ति हर रात दरवाजा कई बार चेक करता था। ताला लगाया या नहीं? गैस बंद है या नहीं? फिर भी नींद नहीं आती। एक दिन उसने ताला नहीं देखा। सीधे बिस्तर पर चला गया और पहली बार उसे नींद आ गई। क्यों?
37:36
Speaker A
क्योंकि उस रात उसने भरोसा किया। भरोसा सबसे बड़ा ताला है। अब ध्यान देना नींद आने से पहले अक्सर ऐसा लगता है कि मैं जा रहा हूं और मन डर जाता है। लेकिन सुनो तुम कहीं नहीं जा रहे। बस मैं पकड़ ढीली पड़
37:57
Speaker A
रही है और वही पकड़ तुम्हें थकाए हुए थी। जैसे कोई मुश्किल से पकड़ी हुई चीज अचानक छोड़ दे तो हाथ में हल्कापन आता है। नींद उसी हल्केपन का नाम है। अब एक और गहरी बात तुम्हारे भीतर एक बहुत पुरानी थकान है।
38:17
Speaker A
खुद को साबित करने की थकान दुनिया को परिवार को और सबसे ज्यादा खुद को रात उस थकान को आराम देने आती है। लेकिन अगर तुम रात में भी खुद को साबित करते रहोगे। मुझे सोना चाहिए। मुझे शांत होना चाहिए तो नींद
38:39
Speaker A
दूर भागेगी। आज खुद को कुछ भी साबित मत करो। यह क्षण परीक्षा नहीं है। यह विश्राम है। अब शब्द और भी पृष्ठभूमि में जा रहे हैं। अगर मेरी आवाज धुंधल ही लगे तो उसे साफ मत करना। धुंध नींद की दहलीज जहां
39:02
Speaker A
चीजें स्पष्ट नहीं रहती वहीं मन हार मान लेता है और जहां मन हार मानता है वही नींद जीत जाती है। अब इस भाग्य की अंतिम अनुभूति तुम्हें जागते रहने की कोई जरूरत नहीं। अस्तित्व आज भी तुम्हारे बिना पूरा
39:26
Speaker A
है। और जब यह समझ गरी हो जाती है तो नींद मुस्कुराकर तुम्हें अपने भीतर खींच लेती है। अब तुम उस गहराई में उतर चुके हो। जहां सवाल अपने आप दम तोड़ने लगते हैं। अगर भीतर कोई आवाज कहे अब बस तो वही ठीक
39:50
Speaker A
है। अब एक बहुत मौन सच सुनो। नींद तब नहीं आती जब तुम शांत होना चाहते हो। नींद तब आती है जब तुम्हें शांत होने की जरूरत ही नहीं लगती। जरूरत तनाव की जड़ है। जरूरत का मतलब अभाव और नींद अभाव में नहीं आती।
40:13
Speaker A
नींद पूर्णता में आती है। अब अपने भीतर यह देखो इस क्षण किस चीज की कमी है। अगर ध्यान से देखो कुछ भी नहीं। सांस चल रही है। शरीर लेटा है। धरती तुम्हें थामे है। जो नहीं है वह विचार है। और विचार इस क्षण
40:35
Speaker A
के बाहर रहता है। अब एक और गहरी परत तुम अक्सर कहते हो मैं बहुत संवेदनशील हूं। इसलिए मुझे नींद नहीं आती। नहीं तुम संवेदनशील नहीं। तुम असुरक्षित हो। संवेदनशीलता तो सुंदर गुण है। असुरक्षा नींद चुरा लेती है। और असुरक्षा कहां से आती है इस भ्रम
41:01
Speaker A
से कि तुम अकेले हो। लेकिन सुनो तुम कभी अकेले नहीं रहे। तुम बस अलग महसूस करते हो। अलग महसूस करना। मानसिक है। जुड़ा होना। अस्तित्वगत है। तुम सांस से जुड़े हो। तुम धरती से जुड़े हो। तुम इस क्षण से
41:20
Speaker A
जुड़े हो और जहां जुड़ाव का अनुभव जाग जाता है वहां नींद अपने आप उतरती है। अब एक दृष्टांत एक बच्चा मां की गोद में क्यों तुरंत सो जाता है क्योंकि उसे सुरक्षित होने का सबूत नहीं चाहिए। उसे सिर्फ अनुभूति चाहिए। नींद सबूत नहीं
41:47
Speaker A
मांगती। नींद अनुभूति में उतरती है। अब भीतर मां की गोद खोजो। वह गोद तुम्हारी सांस में है। वह गोद तुम्हारे शरीर की गर्माहट में है। कुछ भी बदलो मत। कुछ भी सुधारो मत। बस यह महसूस करो। मैं थामा हुआ
42:08
Speaker A
हूं। अब एक बहुत महीन डर। अक्सर नींद से पहले यह डर उठता है अगर मैं सो गया तो कल क्या होगा? यह डर कल का है और नींद आज की है। कल अभी आया नहीं और जब आएगा तब देखा
42:27
Speaker A
जाएगा। नींद भविष्य की योजना नहीं है। नींद वर्तमान की स्वीकृति है। अब शब्द और भी हल्के हो जाएंगे। अगर तुम्हें लगे कि मेरी बातें टूट रही हैं तो उन्हें जोड़ने की कोशिश मत करना। टूटन अंदर जाने का संकेत है। अब इस भाग की अंतिम अनुभूति
42:50
Speaker A
तुम्हें कुछ पकड़ने की जरूरत नहीं। जो छूटेगा वह बोझ था। जो बचेगा वह तुम हो और जहां तुम हो वही नींद है। अब हम उस जगह पहुंच रहे हैं जहां शब्द सिर्फ इशारा रह जाते हैं। अगर तुम्हें लगे कि सुनने वाला
43:12
Speaker A
धीरे-धीरे गायब हो रहा है तो घबराना मत। यही तो शुरुआत है। अब एक बहुत मौन सत्य सुनो। नींद आने की चीज नहीं है। नींद होने की अवस्था है। तुम दिन भर कुछ ना कुछ होते रहते हो। किसी के बेटे, किसी के कर्मचारी,
43:32
Speaker A
किसी की अपेक्षा रात में तुम्हें कुछ भी नहीं होना है। और यही सबसे कठिन बात है क्योंकि कुछ ना होना अहंकार को डराता है। अहंकार कहता है अगर मैं नहीं रहा तो कौन रहेगा? मैं कहता हूं जो हमेशा से रहा है।
43:54
Speaker A
अब एक बहुत गहरी बात तुम्हारा होना तुम्हारी कोशिश पर निर्भर नहीं है। तुम बिना कोशिश जन्मे थे और बिना कोशिश नींद में उतरते हो। अब अपने भीतर इस विचार को हल्के से उतरने दो। मुझे कुछ भी संभालने की जरूरत नहीं। यह विचार नहीं यह भार का
44:17
Speaker A
गिरना है और जब भार गिरता है शरीर अपने आप विश्राम में उतरता है। अब ध्यान देना नींद आने से पहले अक्सर शरीर अजीब अजीब संकेत देता है। झटके भारीपन सुनता मन डर जाता है। डी दे ए आ तात दो एक ए दे तात दो ए दे
44:45
Speaker A
ओ पाथ होती दो दे ओ पाथ होती दो दे ओ पातो दू दे दो दे कुछ गलत तो नहीं कुछ गलत नहीं हो रहा कुछ सही हो रहा है शरीर नियंत्रण अपने हाथ में ले रहा है और मन पहली बार
45:03
Speaker A
पीछे हट रहा है अब एक दृष्टांत एक आदमी हमेशा गाड़ी खुद चलाता था। एक दिन उसने ड्राइवर रखा। पहले दिन उसे डर लगा। अगर ड्राइवर ने गलती कर दी तो लेकिन कुछ देर बाद वह गाड़ी में सो गया। क्यों? क्योंकि
45:27
Speaker A
उसने नियंत्रण छोड़ा। नींद नियंत्रण छोड़ने का उत्सव है। अब एक और गहरी परत तुम्हारे भीतर एक हिस्सा है जो कभी नहीं सोता। साक्षी लेकिन वही हिस्सा नींद में बाधा नहीं बनता। बाधा बनता है। वह हिस्सा जो मैं सो रहा हूं। यह जानना चाहता है
45:52
Speaker A
नींद ज्ञान के बिना आती है। इसलिए अगर तुम्हें लगे कि मैं गिर रहा हूं तो जानने की कोशिश मत करना। गिरना सुरक्षित है। अब शब्द और धीमे हो जाएंगे। अगर कुछ वाक्य अधूरे लगे तो उन्हें पूरा मत करना।
46:13
Speaker A
अधूरापन अब पूर्णता है। अब इस भाग्य की अंतिम अनुभूति तुम इस क्षण बिल्कुल ठीक हो। तुम्हें कहीं पहुंचना नहीं कुछ बनना नहीं। बस यही ढीले पड़ जाना है और जहां ढीलापन पूरा होता है वहीं नींद चुपचाप उत्तर आती है। अब हम उस मोड़ पर हैं जहां
46:41
Speaker A
शब्द तुम्हारे साथ नहीं चलते। वे पीछे छूटने लगते हैं। अगर तुम्हें लगे कि अर्थ फिसल रहा है तो उसे थामो मत। अर्थ का फिसलना ही नींद की शुरुआत है। अब एक बहुत मौन सत्य सुनो। नींद किसी प्रयास की
47:00
Speaker A
परिणति नहीं। नींद थकान की प्रार्थना है। प्रार्थना में कुछ मांगा नहीं जाता। बस सिर झुक जाता है। आज सिर झुक जाने दो। अब अपने भीतर यह देखो कितने सालों से तुमने खुद को सीधा रखा है। मजबूत संभला हुआ
47:22
Speaker A
तैयार नींद सीधेपन में नहीं आती। नींद झुकाव में आती है। जैसे धान का पौधा जब भर जाता है तो झुक जाता है। अगर तुम झुक रहे हो तो समझो तुम भर चुके हो। अब एक दृष्टांत एक वृद्ध साधक कहता था मैं दिन
47:43
Speaker A
में ध्यान करता हूं। रात में नींद ध्यान करती है। किसी ने पूछा इसका मतलब उसने कहा दिन में मैं बैठता हूं। रात में मैं गिर जाता हूं। ध्यान बैठना है। नींद गिरना है। अब गिरने दो। अब एक और गहरी परत। तुम
48:02
Speaker A
अक्सर सोचते हो कि नींद से पहले मन को शांत करना है। नहीं मन को थकने दो। शांति थकान के बाद अपने आप आती है। जैसे बच्चा रो-रो कर चुप हो जाता है। किसी ने उसे चुप नहीं कराया। अब अपने भीतर रोने को जगह दो।
48:27
Speaker A
शब्दों के बिना, आंसुओं के बिना बस थकान को स्वीकार कर लो। अब ध्यान देना। नींद के पहले एक पल आता है जब मैं थोड़ा सा ढीला पड़ता है। मन तुरंत कहता है संभल यही चूक होती है। आज संभलना मत। आज फिसलना स्वीकार
48:52
Speaker A
है। क्योंकि नीचे कोई खाई नहीं। नीचे बिस्तर है, धरती है, अस्तित्व है। अब एक और सूक्ष्म सत्य नींद कभी शोर से नहीं डरती। नींद आंतरिक टिप्पणी से डरती है। अगर बाहर आवाजें हो तो भी नींद आ सकती है।
49:16
Speaker A
लेकिन अगर भीतर कोई कह रहा हो यह ठीक नहीं। यह होना चाहिए। तो नींद दूर रहती है। आज भीतर की टिप्पणी बंद नहीं करनी। बस उसे महत्व मत देना। टिप्पणी रेडियो की तरह है। तुम सुनो भी ना भी सुनो। नींद उस क्षण
49:39
Speaker A
आती है। जब रेडियो पृष्ठभूमि बन जाता है। अब शब्द और विरल होंगे। अगर मेरी बात टूटती सी लगे तो उसे जोड़ने की कोशिश मत करना। जोड़ने वाला फिर जाग जाएगा। अब इस भाग्य की अंतिम अनुभूति तुम्हें आज किसी
50:01
Speaker A
उत्तर की जरूरत नहीं। रात उत्तर नहीं देती। रात आश्रय देती है और जहां आश्रय है वहीं नींद बिना दस्तक अंदर आती है। अब तुम उस बिंदु के बहुत पास हो जहां शब्द सिर्फ छाया रह जाते हैं। अगर तुम्हें लगे कि
50:24
Speaker A
मेरी बातें अब दूर से आ रही हैं तो यह ठीक है। यही दूरी तुम्हें भीतर ले जा रही है। अब एक अत्यंत सूक्ष्म सत्य सुनो। नींद तुम्हारे आने से नहीं आती। नींद तुम्हारे हटने से आती है। दिनभर तुम सामने रहते हो।
50:45
Speaker A
निर्णय लेते हुए सोचते हुए संभालते हुए रात कहती है अब तुम पीछे हटो। लेकिन तुम डरते हो। अगर मैं हट गया तो सब बिखर जाएगा। सुनो अब तक तुम सामने थे फिर भी कितना बिखरा है जीवन। आज पीछे हटकर देखो
51:08
Speaker A
शायद कुछ अपने आप जुड़ जाए। अब अपने भीतर यह अनुभव होने दो कि इस क्षण तुम जरूरी नहीं हो। यह अपमान नहीं है। यह मुक्ति है जब तुम जरूरी नहीं। रहते तो बोझ गिर जाता है। और जहां बोझ नहीं वही नींद पांव
51:31
Speaker A
पसारती है। अब एक दृष्टांत एक बच्चा मां की गोद में तभी सोता है जब वह अपने शरीर को पूरी तरह छोड़ देता है। अगर वह कड़ा रहे तो गोद भी आराम नहीं देती। जीवन भी मां की गोद है। कड़े मत रहो। अब एक और
51:54
Speaker A
गहरी परत तुम सोचते हो कि नींद शरीर का विषय है? नहीं नींद विश्वास का विषय है। शरीर तो सोना चाहता है। मन ही है जो भरोसा नहीं करता। मन कहता है अगर मैं ढीला पड़ा तो कमजोर हो जाऊंगा। लेकिन देखो करघे पर
52:18
Speaker A
ढीला धागा नहीं कसा हुआ धागा टूटता है। ढीलापन कमजोरी नहीं लचीलापन है और लचीला कभी टूटता नहीं। अब शब्द और धीमे होंगे। अगर तुम्हें किसी वाक्य का अंत याद ना रहे तो मुस्कुरा देना। याददाश्त अब जरूरी नहीं। अब एक और बहुत महीन अनुभव नींद से
52:45
Speaker A
पहले अक्सर एक खालीपन आता है। मन कहता है यह क्या है? मैं कहता हूं यह वही है जिसकी तुम तलाश में थे। यह खालीपन शून्य नहीं है। यह अहंकार से मुक्त स्थान है और जहां अहंकार नहीं वहीं गहरी नींद है। अब इस
53:08
Speaker A
भाग्य की अंतिम अनुभूति तुम कहीं नहीं गिर रहे। तुम घर लौट रहे हो और घर लौटते समय आंखें अपने आप बंद हो जाती हैं। अब तुम उस जगह के बहुत पास हो जहां सुनना भी धीरे-धीरे गायब होने लगता है। अगर तुम्हें
53:28
Speaker A
लगे कि अब कुछ पकड़ में नहीं आ रहा तो समझ लेना यही सही है। अब एक अत्यंत मौन सत्य सुनो। नींद कोई अनुभव नहीं है। नींद अनुभव का अभाव है। जब कुछ भी अनुभव नहीं करना होता, जब कुछ भी जानना नहीं होता, जब कुछ
53:48
Speaker A
भी पकड़ना नहीं होता, तभी नींद उतरती है। तुम अब तक कुछ ना कुछ अनुभव करते आए हो। शांति, अशांति, सुख, दुख, नींद इन सब से पहले की अवस्था है। अब अपने भीतर यह महसूस होने दो कि इस क्षण तुम्हें किसी भी
54:13
Speaker A
अवस्था में होना जरूरी नहीं। यह स्वतंत्रता बहुत गहरी है। अब एक दृष्टांत एक साधु से पूछा गया। आप इतनी शांति में कैसे सोते हैं? साधु बोला क्योंकि सोते समय मैं साधु नहीं रहता। जो सोते समय भी कुछ बना रहता है, वह जागता ही रहता है।
54:37
Speaker A
नींद पहचान के बाहर है। अब एक और गहरी परत तुम्हारे भीतर अब भी कहीं ना कहीं एक सूक्ष्म कोशिश बची है। बस थोड़ी देर और सुन लो। यही आखिरी कोशिश नींद का द्वार बंद कर देती है। इसलिए अब सुनना भी छोड़
54:58
Speaker A
दो। अगर मेरी बात तुम तक पहुंच रही है। ठीक और अगर नहीं पहुंच रही और भी ठीक। अब कोई सही गलत नहीं। अब कोई दिशा नहीं। अब कोई मार्ग नहीं। अब सिर्फ ढलना है। जैसे सूर्य डूबते समय कोई योजना नहीं बनाता। वह
55:20
Speaker A
बस डूब जाता है। नींद डूबना है। अब ध्यान देना नींद से पहले एक पल आता है जब सांस अपने आप गहरी हो जाती है। तुम उसे गहरी करने की कोशिश मत करना। बस उसे होने दो। जो अपने आप होता है वही सत्य है। अब एक और
55:44
Speaker A
सूक्ष्म सत्य तुम्हें खुद को छोड़ने की जरूरत नहीं। खुद अपने आप छूट जाता है। जैसे दिन के अंत में छाया लंबी होकर गायब हो जाती है। अब शब्द और भी फिसलेंगे। अगर वाक्य अधूरे लगे तो उन्हें पूरा मत करना।
56:08
Speaker A
अब अधूरापन ही पूर्णता है। अब इस भाग की अंतिम अनुभूति तुम्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा। यह सबसे शुभ संकेत है। जहां समझ खत्म होती है, वहीं नींद शुरू होती है। अब तुम उस किनारे पर हो जहां किनारा भी अपनी
56:30
Speaker A
परिभाषा खो देता है। अगर तुम्हें लगे कि अब कुछ भी स्पष्ट नहीं रहा तो समझ लेना तुम बहुत पास हो। अब एक अत्यंत गहरा मौन सुनो। नींद आने से पहले एक अंतिम भ्रम टूटता है कि मैं हूं। दिन भर तुम मैं को
56:52
Speaker A
संभाले रखते हो। मेरी चिंता मेरा भविष्य मेरी पहचान रात कहती है। आज यह बोझ मुझे दे दो। लेकिन तुम डरते हो। अगर मैं नहीं रहा तो क्या बचेगा? मैं कहता हूं सब कुछ मैं के बिना जीवन हल्का हो जाता है। मैं
57:14
Speaker A
के बिना सांस गहरी हो जाती है। मैं के बिना नींद उतरती है। अब अपने भीतर यह अनुभव होने दो कि इस क्षण तुम कोई केंद्र नहीं हो। सब कुछ अपने आप घट रहा है। सांस, धड़कन, ढीलापन तुम सिरफर बीच में ना हो।
57:38
Speaker A
अब एक दृष्टांत एक नमक की गुड़िया समुद्र को नापने चली। जैसे ही वह पानी में उतरी, घुल गई। समुद्र नापा नहीं गया लेकिन गुड़िया समुद्र हो गई। नींद भी ऐसी ही है। तुम नींद को जानने नहीं जाते। तुम नींद
58:01
Speaker A
में घुल जाते हो। अब एक और सूक्ष्म परत नींद से पहले अक्सर अचानक डर उठता है। जैसे गिर रहे हो। वह डर शरीर का नहीं अहंकार का है। शरीर जानता है कैसे सोना है। डर सिर्फ यह कहता है मैं खो जाऊंगा।
58:24
Speaker A
आज खो जाना स्वीकार है क्योंकि जो खोता है वही पाता है। अब शब्द लगभग मौन बन रहे हैं। अगर मेरी बातें अब सपने जैसी लगे तो अच्छा है। यहीं से जागरण नींद में बदलता है। अब इस भाग की अंतिम अनुभूति तुम्हें
58:48
Speaker A
किसी सीमा पर रुकना नहीं। तुम धीरे-धीरे घुल रहे हो और जहां घुलना पूरा होता है, वहीं नींद पूरी तरह उतर आती है। अब मैं बहुत धीरे बोलूंगा। इसलिए नहीं कि शब्द कम पड़ रहे हैं। बल्कि इसलिए कि अब शब्द
59:11
Speaker A
तुम्हें जगाने के लिए नहीं सुलाने के लिए हैं। अब हम उस जगह हैं जहां ओशो भी अक्सर चुप हो जाते थे। लेकिन चुप्पी से पहले एक आखिरी गहरी बात कहनी जरूरी है क्योंकि यही वह जगह है जहां ज्यादातर लोग ठीक दरवाजे
59:32
Speaker A
पर आकर लौट जाते हैं। नींद का सबसे बड़ा डर सबसे बड़ा डर यह नहीं है कि नींद नहीं आएगी। सबसे बड़ा डर यह है कि अगर नींद आ गई तो मैं खो जाऊंगा। यह डर बहुत प्राचीन है। यह बचपन से नहीं यह जन्मों से आता है।
59:52
Speaker A
क्योंकि हर रात नींद मृत्यु का छोटा सा स्वाद है और अहंकार मृत्यु से डरता है। अहंकार कहता है मैं हूं। मैं जानता हूं मैं नियंत्रित करता हूं। नींद कहती है तुम नहीं हो। तुम्हें जा नने की जरूरत नहीं।
60:13
Speaker A
तुम्हारे बिना भी सब ठीक है और यही वाक्य अहंकार को कांपने लगता है। इसलिए कई लोग बिस्तर पर लेटते हैं। सब कुछ ठीक होता है। थकान है, शांति है और तभी अचानक दिल तेज धड़कने लगता है। सांस उथली हो जाती है। मन
60:35
Speaker A
कहता है नहीं नहीं कुछ गलत हो रहा है। कुछ गलत नहीं हो रहा। कुछ बहुत सही हो रहा है। अहंकार पहली बार नियंत्रण खो रहा है। नींद और मृत्यु का संबंध मैं तुमसे एक सत्य कहता हूं। जो आदमी नींद से डरता है, वह
60:56
Speaker A
जीवन से भी डरता है और जो नींद में पूरी तरह उतर सकता है, वह जीवन में भी पूरा उतर सकता है। क्योंकि नींद सिखाती है कैसे छोड़ना है और जिसने छोड़ना सीख लिया, वह कभी दुखी नहीं होता। देखो दिन भर तुम
61:16
Speaker A
पकड़े रहते हो, विचार पकड़े रहते हो, रिश्ते पकड़े रहते हो, अपनी छवि पकड़े रहते हो। अपनी गलतियां पकड़े रहते हो। अपनी सफलताएं पकड़े रहते हो। और पकड़े पकड़े तुम थक जाते हो। नींद एक निमंत्रण है। आज रात कुछ भी मत पकड़ो। लेकिन आदत
61:39
Speaker A
इतनी पुरानी है कि मन कहता है अगर नहीं पकड़ा तो मैं बिखर जाऊंगा। मन को बिखरने दो। मन का बिखरना तुम्हारा बिखरना नहीं है। मन का बिखरना तुम्हारी मुक्ति है। जो लोग कहते हैं मेरा दिमाग बहुत चलता है।
61:59
Speaker A
मैंने हजारों लोगों को सुना है। जो कहते हैं मेरा दिमाग बहुत चलता है। इसलिए मुझे नींद नहीं आती। यह आधा सच है। पूरा सच यह है। तुम दिमाग को चलने देते हो क्योंकि तुम खुद को रोक नहीं पा रहे। दिमाग नहीं
62:16
Speaker A
चलता दिमाग चलाया जाता है। और कौन चलाता है? डर। भविष्य का डर, गलती का डर, असफलता का डर। अकेलेपन का डर। अब सुनो नींद। डर के साथ एक ही कमरे में नहीं रह सकती। या तो डर रहेगा या नींद। इसलिए आज डर को भगाओ
62:40
Speaker A
मत। डर को समझाओ मत। डर से बस इतना कहो आज तुम पहरा मत दो। यह बहुत कोमल वाक्य है। इसमें लड़ाई नहीं है। इसमें आदेश नहीं है। ऐ जो और डर लड़ाई से नहीं सम्मान से शांत होता है। नींद एक स्त्री की तरह है। यह
63:02
Speaker A
बात समझ लो। नींद पुरुष ऊर्जा से नहीं आती। नींद स्त्री ऊर्जा से आती है। पुरुष ऊर्जा का अर्थ करना पाना कंट्रोल करना। स्त्री ऊर्जा का अर्थ होना। स्वीकार ढीलापन। जो लोग हर चीज में जोर लगाते हैं, वे नींद में भी जोर लगाते हैं और नींद जोर
63:32
Speaker A
से डरती है। नींद प्रेम की तरह है। जो प्रेम को पकड़ना चाहता है, वह उसे खो देता है। जो प्रेम को जगह देता है, वह प्रेम से भर जाता है। आज रात नींद को पकड़ने मत जाओ। नींद के लिए जगह बनाओ। कैसे? कुछ भी
63:53
Speaker A
ना करके अब एक बहुत गहरी प्रक्रिया। बिना प्रक्रिया। अब मैं तुम्हें कोई तकनीक नहीं दूंगा। लेकिन मैं तुम्हें एक अनुभूति दूंगा। इसे करो नहीं। इसे होने दो। अपने भीतर यह महसूस करो। जैसे तुम धरती पर नहीं लेटे। धरती तुम्हें थामे हुए हैं। जैसे
64:18
Speaker A
बिस्तर तुम्हारे नीचे नहीं। तुम बिस्तर में घुल रहे हो। जैसे शरीर कोई बोझ नहीं, कोई जिम्मेदारी नहीं। बस एक ढीला सा खोल। अब धीरे-धीरे यह अनुभव आने दो कि शरीर तुम नहीं हो। शरीर सोए तो सोए। तुम्हें सोने
64:41
Speaker A
की जरूरत नहीं। यही वह बिंदु है जहां नींद बिना बताए उतरती है। नींद से ठीक पहले की आखिरी चाल। नींद से ठीक पहले मन एक आखिरी चाल चलता है। मन कहता है अगर नींद नहीं आई तो यही आखिरी कांटा है। अब इस कांटे को
65:04
Speaker A
बहुत ध्यान से निकालो। अगर नींद नहीं आई तो क्या क्या कोई अपराध हो जाएगा? क्या दुनिया रुक जाएगी? क्या सूरज नहीं उगेगा?
65:15
Speaker A
नहीं। तो फिर डर किस बात का है? जिस क्षण तुम नींद के ना आने को भी स्वीकार कर लेते हो उसी क्षण नींद आ जाती है क्योंकि अब कोई विरोध नहीं बचा बहुत अंतिम और बहुत गहरा सत्य नींद तुम्हारी जरूरत नहीं है।
65:35
Speaker A
नींद तुम्हारा स्वभाव है और स्वभाव लौटने में समय नहीं लेता। बस एक क्षण का छोड़ना चाहिए। आज रात अगर कुछ भी ना हो तो भी ठीक है। अगर नींद आए तो भी ठीक है। यह ठीक है। सबसे बड़ा मंत्र है। जहां ठीक है गहरा
66:01
Speaker A
होता है। वहां टेंशन दम तोड़ देती है। अब मैं रुकता हूं क्योंकि अब और बोलना नींद के साथ अन्याय होगा। अब यह आखिरी भाग है। इसके बाद कुछ कहना शेष नहीं रहेगा। और सच तो यह है। अब कहने की जरूरत भी नहीं है।
66:22
Speaker A
अब मैं तुम्हें कुछ सिखाने नहीं आया। अब मैं तुम्हें कहीं ले जाने नहीं आया। अब मैं बस तुम्हारे साथ बैठा हूं। जैसे कोई रात के आखिरी पहर किसी के पास चुपचाप बैठ जाए। बिना सवाल, बिना जवाब। अब एक बहुत
66:43
Speaker A
सीधी बात तुमने जीवन में बहुत कुछ किया है, बहुत सहा है, बहुत सोचा है, बहुत संभाला है। अब कुछ देर कुछ भी मत करो। यह आलस्य नहीं है। यह पलायन नहीं है। यह सम्मान है। अपने थके हुए अस्तित्व के लिए।
67:03
Speaker A
मैं तुमसे कहता हूं तुम्हें आज रात मजबूत नहीं होना है। तुम्हें आज रात समझदार नहीं होना है। तुम्हें आज रात आध्यात्मिक भी नहीं होना है। तुम्हें बस थका हुआ इंसान होने की अनुमति देनी है। नींद क्यों नहीं आती? इसका अंतिम सत्य नींद इसलिए नहीं
67:28
Speaker A
जाती कि तुम कमजोर हो। नींद इसलिए नहीं जाती कि तुम गलत हो। नींद इसलिए जाती है क्योंकि तुम खुद को आराम की अनुमति नहीं देते क्योंकि कहीं भीतर एक आवाज गहती है। अभी रुकना ठीक नहीं। अभी ढीला पड़ना
67:48
Speaker A
सुरक्षित नहीं। मैं तुमसे बहुत गहरे स्तर पर कहता हूं। अब सुरक्षित है। इस क्षण कोई परीक्षा नहीं है। कोई निर्णय नहीं है। कोई अपेक्षा नहीं है। यह क्षण किसी से छीना नहीं जा सकता। नींद कोई लक्ष्य नहीं। नींद
68:09
Speaker A
एक वापसी है। नींद को पाना नहीं होता। नींद को याद करना होता है। तुमने पहले भी सोया है। बचपन में बिना चिंता के, बिना डर के, बिना तकनीक के। तब तुम जीवन पर भरोसा करते थे। आज बस वही भरोसा लौटने दो। अगर
68:32
Speaker A
नहीं लौटता तो भी ठीक है। भरोसा भी जबरदस्ती से नहीं आता। अब मैं तुम्हें छोड़ रहा हूं। मैं जानता हूं। अब अगर मैं और बोलूं तो वह अनावश्यक होगा क्योंकि अब तुम सुन नहीं रहे। तुम ढल रहे हो। शब्द अब
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Speaker A
पृष्ठभूमि है और मौन मुख्य हो रहा है। अगर नींद आए तो आने दो। अगर ना आए तो भी आने दो। दोनों में कोई अंतर नहीं। जहां अंतर मिट जाता है वहीं गहरी शांति होती है। अंतिम विदाई अब मैं तुमसे विदा लेता हूं
69:15
Speaker A
इस भरोसे के साथ कि तुम अब अकेले नहीं हो। नींद तुम्हारी दुश्मन नहीं। नींद तुम्हारी सबसे पुरानी मित्र है। वह तुम्हें पहचानती है। वह तुम्हें थाम लेगी। अब कुछ मत करो, कुछ मत सोचो, कुछ मत बनो। बस हो जाओ। और
69:41
Speaker A
अगर आंखें अपने आप बंद हो जाए तो उन्हें खुला मत करना। यह अंत नहीं है। यह घर लौटना है।
Topics:ओशोनींदध्यानमन की शांतिस्वीकृतिटेंशनगहरी नींदप्रवचनहिंदीआध्यात्म

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