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#1306 Ekantik Vartalaap & Darshan/24-06-2026/ Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji

श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी द्वारा भजन मार्ग पर गृहस्थ जीवन, नाम जप और धर्म की महत्ता पर गहन चर्चा।

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Key Takeaways

  • गृहस्थ जीवन में भी विरक्ति और सेवा का संतुलन आवश्यक है।
  • नाम जप और सत्संग से ही जीवन में शांति और कल्याण संभव है।
  • धर्मपूर्वक कमाई और अधर्म से दूर रहना जीवन की उन्नति के लिए जरूरी है।
  • गुरु के वचनों पर विश्वास रखना आध्यात्मिक प्रगति का आधार है।
  • साधु संगत से संशय दूर होता है और मन की शांति मिलती है।

What the video covers

  • गृहस्थ जीवन में कर्तव्य और विरक्ति का संतुलन कैसे बनाए रखें, इस पर मार्गदर्शन।
  • नाम जप और सत्संग के महत्व को समझाया गया, जो जीवन के कल्याण का मूल है।
  • धर्मपूर्वक कमाई और अधर्म से विरक्ति की आवश्यकता पर बल दिया गया।
  • संतों और गुरुदेव के वचनों पर विश्वास रखने की प्रेरणा दी गई।
  • राम नाम और राधा नाम दोनों के समान महत्व और भक्तिपथ में उनकी भूमिका।
  • वृद्धावस्था में भी सत्संग और नाम जप से आध्यात्मिक उन्नति संभव है।
  • धार्मिक जीवन में पत्नी और परिवार की भूमिका और उनके साथ सामंजस्य।
  • अधर्म के प्रति सख्त रवैया अपनाने और न्याय की महत्ता पर चर्चा।
  • भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और विश्वास से जीवन की समस्याओं का समाधान।
  • साधु संगत का महत्व और संशय दूर करने के लिए सत्संग की निरंतरता।

Answers

Questions about this video

क्या गृहस्थ जीवन में विरक्ति संभव है?

हाँ, गृहस्थ जीवन में भी आंतरिक विरक्ति संभव है। नौकरी करते हुए भी भजन और नाम जप से विरक्ति की स्थिति बनाए रखी जा सकती है।

नाम जप का जीवन में क्या महत्व है?

नाम जप से मन की शांति मिलती है और यह जीवन के कल्याण का मूल मार्ग है। बिना नाम जप के अन्य साधन से भगवत प्राप्ति कठिन होती है।

गुरु के वचनों पर विश्वास क्यों जरूरी है?

गुरु के वचनों पर विश्वास रखने से आध्यात्मिक मार्ग में संशय दूर होता है और भक्त को सही दिशा मिलती है, जिससे उसका कल्याण होता है।

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00:12
Speaker A
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा हे राधा।
01:58
Speaker A
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की जय, जय समस्त संत हरि भक्तों की जय, वृंदावन धाम की जय, सदगुरुदेव भगवान की जय, अखिलेश जी राधा वल्लभ श्री हरिवंश, श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में
02:40
Speaker A
कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी, मुझ अधम के शरीर की धर्मपत्नी का भी दया वसान होने के बाद आप गुरुदेव से भगवत मार्ग की शरणागति प्राप्त हुई। मेरे परिवार में सिर्फ मात्र छोटा पुत्र है और मैं ही हूं। अन्य कोई
02:54
Speaker A
शेष नहीं रह गया। क्या मैं अभी गृहस्थ की श्रेणी में हूं? क्या मेरे लिए कोई कर्तव्य शेष रहेगा?
03:00
Speaker A
हां, बिलकुल। इसका थोड़ा पढ़ाई-लिखाई करके इसका ब्याह कर दीजिए। क्यों बच्चा? हैं? अच्छे कोई नौकरी में चले जाओ और बढ़िया ब्याह हो जाए तो ठीक रहेगा ना?
03:15
Speaker A
अभी तो पढ़ना है गुरु जी। पढ़ना है। पढ़ के फिर क्या करना है? सेवा करनी है। किसकी?
03:21
Speaker A
हां। उत्तम बात है। वो नौकरी से होगी। कोई न कोई अच्छी नौकरी करके अर्थ के द्वारा अपने पिता के जैसे धाम वास करना चाहे या विरक्त भाव से रहना चाहे, पर अभी आपका कर्तव्य है इसकी लाइन क्लियर करना। तो उस
03:37
Speaker A
पे आपको ध्यान देना है कि आप कैसे क्लियर कर सकते हो। विरक्त रहकर कैसे क्लियर कर सकते हो, गृहस्थ रहकर कैसे क्लियर कर सकते हो। ये आपको अंदर से देखना। अंदर से विरक्त रहकर, इसी स्थिति में रह के इसका ब्याह
03:50
Speaker A
तक आपका कर्तव्य विशेष है। जब इसकी नौकरी लग जाए या इसका व्यापार हो जाए और इसका ब्याह हो जाए और यह कह दे कि हमारा कर्तव्य जो आपका हमारे प्रति था, वो पूरा हो गया। अब हमारा कर्तव्य आपके प्रति चालू
04:06
Speaker A
होता है। आप जहां रहना चाहो आराम से रहो। मैं आपकी सेवा करूंगा। बहुत बढ़िया हो जाएगा। ठीक है? हां। तब तक के लिए अभी ये अबोध बालक है। इसको सत असत का निर्णय नहीं है। तो अभी इसको जरूरत है आपकी। इसलिए नाम
04:20
Speaker A
जप करते हुए भजन का। वैसे भी आप सरकारी आदमी हो, रिटायर तो अभी हुए नहीं। नहीं, अभी 18-17 साल बाकी हैं। अभी 18-17 साल नौ करिए। हां, तो फिर तब तक तो आ जाएगा अपने लाइन में, आ जाएगा इसके
04:34
Speaker A
बाद विरक्त हो जाओ, भजन करो। तो आंतरिक विरक्तता की जरूरत है। बाहरी तो नौकरी करो, तुम वर्दी धारण करके ठीक है। बाहरी तो अपनी ड्यूटी में रहो, अंदर से तो तुम भागवत हो ही, हम जानते हैं। किसी प्रमाण की तो जरूरत
04:48
Speaker A
है नहीं आपको। अंदर से तुम हो। जिस कार्य के लिए तुम चाहते हो ना, वो कार्य इसी में हो जाएगा। इसमें चिंता मत करो। बस तुम श्री जी से तो शरणागत हो ही चुके हो। अब तुम्हें वचनों पर विश्वास हो जाना चाहिए।
05:02
Speaker A
जो हम अभी बोल रहे हैं, ये नोट कर लो। हां, गुरु के वचन प्रतीति न जिसका गुरु के वचनों पर विश्वास नहीं, फिर उसे क्या? नारद वचन मैं परिह इससे वकालत हो सकती है भगवान के दरबार में कि हम तो कुछ नहीं, लेकिन जब
05:16
Speaker A
हमारे गुरु ने कह दिया तुम्हारा इसी से काम हो जाएगा, तो आपको काम करना पड़ेगा क्योंकि अपनो परण विशाल भगत को पूर्व परण निभाओ। ठीक है, आप प्रसन्न रहिए इसके कर्तव्य का पालन कीजिए और नाम जप करते हुए
05:28
Speaker A
हमारे जो भारत की सेवा में वर्दी धारण किए हो, सत सतभाव से रहना। कभी किसी से घूस मत लेना। कभी कोई अधर्म आचरण मत करना। और जो निर्दोष है उसको कभी दंड देने की भावना ना हो। जो दोषी है उसे कभी बख्शो मत। उसको दंड
05:44
Speaker A
देना यही पूजा होगी। अब हमारा बात समझना, भगत हृदय हो तो ऐसा ना हो कि दोषी को भी बख्श दिया जाए। नहीं, अगर वो दोषी है दंड पाएगा तो पवित्र होगा। आगे से सावधान रहेगा और निर्दोष को कभी दंड, कभी घूस मत
05:59
Speaker A
लेना। नहीं, इसकी उन्नति में बाधा पड़ जाएगी। हमारी बात समझना। अधर्म की कमाई से अपने संतान को या संतति को सुख प्रदान नहीं किया जा सकता। इसलिए कभी अधर्म की कमाई की तरफ हाथ मत उठाना। धर्म से जो
06:13
Speaker A
तुम्हें हमारी सरकार देती है वेतन, उसी से इसका पालन पोषण, उसी से इसकी पढ़ाई करना। क्यों? हां, बिल्कुल। इसी से मंगल हो जाएगी। यही विरक्ति है। अधर्म से विरक्त हो जाओ। अधर्म का नहीं। अधर्म नहीं। ना अधर्म आचरण
06:27
Speaker A
करने वाले को बख्शेंगे और ना अधर्म का हम आचरण करेंगे। बस इस नियम से चलोगे तो तुम्हारी भक्ति भी बनेगी और तुम्हारी संतान को भी उन्नति प्राप्त होगी। इसकी शांति, इसका हृदय उदार। जैसे आपने धर्म से चल रहे हो, तब आपके अंदर ऐसी भावना है। अगर
06:42
Speaker A
आप अधर्म आचरण करते होते तो आपके अंदर ऐसी भावना ना होती। तो ऐसे उसके अंदर धर्म किया अपनी कमाई की और सत की तो उसको पत्नी भी ऐसी मिलेगी जो सपोर्ट करने वाली मिले। अभी खूब सब व्यवस्था और मिल गई ऐसे दिमाग
06:56
Speaker A
की जो तुम्हारे घर में अशांति पैदा कर दे, तो चाहे वृंदावन रहो, चाहे जहां रहो, जलते रहोगे कि यार लड़का बड़ा दुखी है, उसके अनुकूल पत्नी नहीं मिली क्योंकि पत्नी हमारी बहुत धार्मिक थी जी, उसी में हमें रास्ते पर
07:10
Speaker A
जी जी। तो इसीलिए हम कह रहे हैं धर्मपूर्वक यदि धन कमाओगे तो इसको भी धार्मिक मिल जाएगी, जीवन सुखी हो जाएगा। नहीं, आज ऐसी भी पत्नियां होती हैं जो पूरे सजे-सजाए घर को बिल्कुल विध्वंस कर दें। हां, बहुत इसलिए
07:23
Speaker A
बड़ी कृपा भगवान की मनाए और धर्मपूर्वक चले तो सब भगवान व्यवस्था कर देते हैं। महावीर सिंह जी दिल्ली से राधे-राधे। स्वामी जी पूजनीय स्वामी जी, आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। स्वामी जी, हम चार पीढ़ी से राम जी के उपासक हैं।
07:39
Speaker A
राम नाम का जप करते हैं। यह शिक्षा हमें स्वर्गीय धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज जी से 90 वर्ष पहले मिली थी। लेकिन महाराज जी किसका प्रश्न? अच्छा, मैं दो वर्षों से आपका सत्संग एवं एकांतिक वार्तालाप सुन रहा हूं। महाराज जी, मैं
07:53
Speaker A
आपके सत्संग से प्रभावित होकर इस शंका का समाधान चाहता हूं कि मैं राम जी के और आपके बिना नहीं रह सकता। मेरा कल्याण मार्ग क्या रहेगा?
08:02
Speaker A
राम राम जपिए और हमें अपना दोस्त मानिए। हमें अपना मित्र मान लीजिए और राम राम जपिए। ठीक है? हां। खूब नाम जप कीजिए। इसी से मंगल हो जाएगा। और सत्संग सुनते रहिएगा। जब हम राधा बोले कि राधा राधा जपो
08:20
Speaker A
तब समझो हमारे लिए आदेश है, राम राम जपो। ठीक है? हां, आप संशय में मत पड़िए। रामे राधा मा में माधव, राम नाम में राधा माधव भी विराजमान है। आप राम राम जपिए। महाराज जी, यही संशय थी मेरे देवता। मैंने
08:34
Speaker A
कहा कभी हम उधर के रहना, उधर के नहीं। नहीं, नहीं, नहीं, ऐसा कभी नहीं हो सकता। साधु ते होए ना कारज हानि। साधु संग से कभी किसी का परमार्थ बिगड़ा है? क्या परमार्थ पुष्ट हुआ है? साधु ते होए ना कारज हानि। ऐसा नहीं
08:47
Speaker A
हो सकता कि साधु से संशय निवृत्ति होती है, ना कि संशय की प्रवृत्ति जग जाए। नहीं, साधु समागम के वचनों से कभी भी। आपने सुना होगा अगर पूरी बात सुनोगे तो संशय नहीं होगा। हमने फिर बाद में कहा आपको जो
09:01
Speaker A
गुरुदेव ने नाम दिया है या जो आपको प्रिय है। जब हमसे पूछा जाएगा तो हम कहेंगे राधा राधा जपो। और जब आपकी बात आएगी तब कहेंगे जो आपको प्रिय हो या आपको जो गुरुदेव ने दिया हो, वही नाम निरंतर जपिएगा। सब नाम एक
09:16
Speaker A
अनंत भगवान के हैं। महाराज की गुरुदेव जी के तो मैंने दर्शन ही नहीं किए। उनके तो मेरे पिताजी थे, उनके सामने। जी, और मेरे पिताजी ने ये कहा कि महाराज जी, मेरे पास ना तो मैं पढ़ा लिखा हूं,
09:29
Speaker A
ना मैं ज्ञान जानता, ना मैं भजन करना जानता। अब मेरे कल्याण का क्या मार्ग होगा? तो उन्होंने कहा कि बेटा, जो भी आपको मिले आप सबसे राम राम कहो तो आपका कल्याण हो जाएगा। और मेरे देवता, वह परिपाटी चार पीढ़ियों से
09:45
Speaker A
चली आ रही है। बस उसी को जाके कुल की जो रीति है गहे रहे सो तौन समझ रहे ना। जाके कुल की जो रीति है गहे रहे सो तौन। आप बस वही पकड़ लो, राम राम, राम कल्याण हो जाएगा।
10:01
Speaker A
अरे, कल्याण का कल्याण हो जाएगा। मंगल भवन भगवान का नाम है और उससे कल्याण का संशय नहीं। नाम लेत भव सिंधु सुखाह पार होने की बातें खत्म हो गई। नाम लेत भव सिंधु सुखाह करहु विचार सुजन मन माही।
10:27
Speaker A
सादर सुमिरन जे नर करह गोपद यू भवसागर तरह। कहूं कहां लगी नाम बढ़ाई। राम न सकह नाम गुण गाई भाई। अब तो क्या संशय? नाम ही तो सर्वोपरि। खूब गाओ राम राम राम। जी जो तू न जपी है तो तू कहूं जाए,
10:59
Speaker A
तहु ताप तप है चाहे जितना साधन कर लो। अगर नाम जप नहीं तो अन्य साधन से भगवत प्राप्ति होना बड़ा कठिन है, बड़ा कठिन है। छूटबे के जतन विशेष बांधे जाएो हो है विष भोजन जो सुधासा खाएगो। राम राम राम। जी जो तू न जप है तो तू कहूं जाए, तहु ताप तप है। खूब निरंतर नाम जप करो और सत्संग सुनते रहो। ठीक है? कोई संस एक परेशानी और है क्योंकि वृद्धावस्था है, 82 साल की उम्र है। अब यहां मैं हर महीने
11:22
Speaker A
तो आ नहीं सकता। नहीं तो हमने तुमसे कब कहा हर महीने आ जाओ। तो मेरी तो उत्कंठा है आपसे हर वक्त मिल। अगर उत्कंठा है तो मैं हर समय तुम्हारे दिमाग में हूं। देख लो ना मिलने की बात कह
11:40
Speaker A
रहे हो। तुम्हारे दिमाग में अगर उत्कंठा शब्द है तो हर समय दिमाग में तुम्हारे हम रहेंगे। तुम्हारे दूर की बात थोड़ी रहेगी। तुम्हारे दिमाग में रहेंगे। आप देखो, आप देखो ना। अगर उत्कंठा है तो जिसके प्रति उत्कंठा होती है वो हमारे दिमाग में बस
11:50
Speaker A
जाता है। पी मूरत नैन बसे तेह रस समाए। और अगर नयन में बस गया तो पास हो या दूर हो क्या फर्क पड़ता है? और नयन में नहीं बसा तो पास हो या दूर हो क्या फर्क पड़ता है?
12:07
Speaker A
दोनों बातें समझ लो महाराज जी। राम नाम जप के आप तो साकेत चले जाएंगे, आप तो वृंदावन रहेंगे। हमारा वहां कैसे मिलन होगा, वहां कैसे होगा? महाराज, हमारा काम है पोस्टमैन का, कहां किसको कहां बुक करना है, वह बुक कर देना है। अब जैसे पैसा पोस्टमैन
12:18
Speaker A
के पास आता है तो उसको जाके वहां- वहां देना पड़ता है। अब मान लो कोई जीव आ गया और उसकी लालसा है कि मैं साकेत सियाराम जी के प...
12:39
Speaker A
के पास आता है तो उसको जाके वहां वहां देना पड़ता है। अब मान लो कोई जीव आ गया और उसकी लालसा है कि मैं साकेत सियाराम जी के पास जाऊं। तो मुझे पता है मेरे राधेश्याम जी ही सियाराम जी कोई और थोड़ी
12:49
Speaker A
है। बस पोस्ट करना है। वो उधर पहुंच गया। अच्छा अगर ये देखना चाहते हैं कि ये रूप तो ये रूप सियाराम जी के पास नहीं मिलेगा। ये रूप राधेश्याम के पास मिलेगा। क्योंकि ये बिका हुआ गुलाम है। ये तो
13:07
Speaker A
राधेश्याम के पास में है वही हमारे ही सियाराम जी राधेश्याम और सियाराम में इतना अंतर नहीं वही है। पर जब सियाराम से मिलन करने की बात आएगी तो वहां यह नहीं मिलेगा। पर महाराज जी जाएगा तो दोनों में है मावे
13:22
Speaker A
की बर्फी में भी और रसगुल्ले में भी। ये प्राकृतिक उदाहरण चिदानंद में नहीं बैठेंगे। प्राकृतिक मावे की बर्फी और दूध की बर्फी यह सब प्राकृतिक उदाहरण चिदानंद में नहीं बैठेंगे। चिदानंद का उदाहरण सिर्फ चिदानंद है। प्राकृतिक नहीं आ पाएगा
13:40
Speaker A
नहीं आ पाएगा। जैसे गोस्वामी जी जब वृंदावन आए गोस्वामी तुलसीदास जी तो जिधर देखे उधर राधेश्याम जो मंदिर का दरवाजा खुले राधेश्याम तो ऐसे प्रणाम करके पंचांग और बोले साष्टांग तो नहीं करेंगे। साष्टांग तो तब करेंगे जब आप मुरली हटाकर
13:59
Speaker A
सारंग धनुष लेंगे और यह चंद्रिका हटाकर सियाजू रूप प्रियाजू बनेगी तो भगवान ने ऐसा ही किया भगवान के कर कमल से बंसी हटी और धनुष बा और जो चंद्रिका है वो हटी और मुकुट और प्रिया जो हो गए सियाजू और श्याम जी हो गए
14:20
Speaker A
रामजू साष्टांग दंडवत किए तो ये एक प्रियता होती है तुलसी मस्तक तब झुके जब धनुष बाण हो हाथ तो कत मुरली क चंद्रिका कद गोपियन के साथ वो अपने जन के कारण श्री श्याम भय रघुनाथ भगवान उसी समय धारण तो ये
14:37
Speaker A
चिदानंद बात है प्रेम की अब जैसे हृदय से पूछा जाए इतना भी अंतर ना राम जी में है ना श्याम जी में है ना प्रियाजू में ना सियाजू में पर प्रीति की बात जब आएगी तो फिर जहां प्रीति होती है वही मन भागता है
14:55
Speaker A
ना हां नहीं ये प्रियता का है तो वही हमारे प्रभु हमारे ही प्रभु सियाराम पर प्रियता प्रियता जहां आती है तो फिर वही ये तो प्रियता का देश है वही राम है वही श्याम है लेकिन जब प्रीति हो गई तुलसीदास
15:12
Speaker A
जी के गुरु भाई थे नंददास जी और नंददास जी श्याम जी के उपासक वल्लभाचार्य जी महाराज है ना तो जो श्रीनाथ जी हैं उनके आसक्त हो गए श्रीनाथ जी के तो तुलसीदास जी ने लिखा हमारे राम जी में क्या कमी थी जो तुमने
15:29
Speaker A
श्याम जी बोले कमी की बात नहीं उसने मुरली बजा के हमारा चित्त चुरा लिया है हमारा चित और बोले गुरु जी ने भी तो नाम रखा था नंददास तो नंददास तो नंद के लाड़ी ले ले हमारे चित्त को चुरा लिया नंददास जी गोस्वामी
15:44
Speaker A
तुलसीदास जी के गुरु भाई थे और श्री नाथ जी को पद सुनाते थे अष्ट आचार्यों में वो एक आचार्य हैं नंददास जी जैसे कुंभन दास जी सूरदास जी ऐसे गोविंद स्वामी जी चीत स्वामी जी ऐसे श्री नंद दास जी तो खूब
15:59
Speaker A
प्रीति करो जब तक जीवन है खूब नाम जप करो और सत्संग सुनते रहो बढ़िया आनंद रहेगा और साकेत में जब जाओगे तो वहां सियाराम जी हनुमान जी लक्ष्मण जी ये सब परिकर मिलेगा हां अब हमारी खोज करोगे तो वहां नहीं
16:14
Speaker A
मिलेगा फिर अब यहां तो मिल जाओगे जी यहां तो मिल ही रहे हैं आप तो बस यहीं से संतोष कर लो मनीष यादव जी बिहार से श्री हरिवंश श्री हरिवंश भगवन मेरा मन मुझे कभी-कभी निराश कर देता है कभी-कभी सामने विचार
16:32
Speaker A
रखने लगता है कि क्या पता श्री जी तुझे जानती भी होंगी या नहीं उनके ना जाने वैसे वैसे भी जब तक निर्विकार मन ना हो जाए तब तक ये विश्वसनीय नहीं ये तो श्री जी की बात करो किसी पर अविश्वास कर सकता
16:46
Speaker A
है तो एक क्षण भक्ति में लगेगा दूसरे क्षण भोग में लगेगा एक क्षण वो दूसरे को सुख देने की बात सोचेगा दूसरे क्षण दूसरे का सुख छीनने की बात करेगा यह विश्वसनीय अभी कोई स्थिति थोड़ी है और अगर आप राधा बोलते हैं तो श्री जी ने
17:04
Speaker A
आपको बोलने के लिए सौभाग्य दिया इसलिए बोल पा रहे हो आप अपनी तरफ से राधा नहीं बोल पा रहे हो श्री जी ने कृपा की तब राधा बोल पा रहे हो आप कृष्ण बोलते हो कृष्ण ने कृपा की तब कृष्ण हरिवंश कृपा हरिवंश कहां
17:18
Speaker A
है हरिवंश कहे हरिवंश लाए हरिवंश सुलाभ सदा तिनके सुख संपत्ति दंपति जो जिनके हमारी वाणी पर यदि राधा नाम आ रहा तो किशोरी जी ने हमें याद किया है किशोरी जी ने हम पर कृपा की तब हम राधा राधा बोल
17:33
Speaker A
पाते हैं ऐसा अविश्वास ना करें लाडली जू ने ही कृपा की तब राधा राधा जपते हो लाडली जो आपको अपनाया तब आप कहते हो हमारी लाडली जो तो आप बाद के बोलते हो पहले उधर से होता है समझ पा रहे हो
17:48
Speaker A
महाराज जी मेरे मन में और भक्तों के प्रति एक थोड़ा सा ऐसा भाव आता है ना हम आपको बोला ना यह कुछ भी आ सकता है अभी कोई आपका मन प्रमाणित मन थोड़ी हो गया है सिद्ध मन थोड़ी हो गया है ये तो पागल आदमी
18:01
Speaker A
कुछ भी बोल देगा अभी बाहर निकलो तो यहां के लिए आपको उददंडता पूर्वक कुछ चलता रहेगा उसकी बात अभी तो बिल्कुल नजर रखनी जैसे हॉस्पिटल में पागल वाले में किसी आदमी को बंद किया जाए तो उसकी बातों पर
18:15
Speaker A
थोड़ी ध्यान दिया जाता है अभी नजर रखनी है दवा खवाते रहना उस पर नजर रखनी है और दवा खातेखाते जब स्वस्थ स्वस्थ हो जाए तब बात उसकी सुनी जाती है कि ये स्वस्थ आदमी बोल रहा है। पागल आदमी की नहीं अभी मन पागल
18:26
Speaker A
है। अभी तो बस दवा खवाते रहो। राधा राधा राधा राधा राधा कोई सही बात कहे तो उस पर टिक लगा दो। हां हां तुम्हारी बात मानते हैं। उसकी बात को टालते रहो। उसकी बात को टालते रहो। वो विश्वसनीय नहीं है। अभी
18:39
Speaker A
एक भाव महाराज ऐसा आता है ना जैसे कि जैसे आप बोलते हैं कि भगवान के अनंत नाम है। आप कोई भी जो भी आपको प्रिय लगे वो आप जपो। मेरा भाव अंदर से कभी-कभी ऐसा लगता है अन्य भक्तों के प्रति कि आप राम राम जपो
18:52
Speaker A
कृष्ण कृष्ण जपो भगवान के बहुत सारे नाम है आप सब जपो बस राधा राधा मत जपने लग जाए क्योंकि ये मैं जपता हूं ना तो कहीं फिर जा भी जपने लगे अभी नहीं अभी-अभी भाव तुम्हारा सही नहीं आया जैसे जैसे हमको मानो जलेबी अच्छी लगी
19:10
Speaker A
तो हमारे जितने प्रिय लोग होंगे हमारा मन कहेगा कि यार सबको एक बार ये जलेबी खाएं बहुत जोर की चीज समझ में आएगा जब उदार मन होता है तो अपने को जो प्रिय लगता है वह सबको देने की
19:24
Speaker A
इच्छा होती है लेकिन ये अभी तभी तो कह रहे बीमार मन है जब ये मन आए तो ऐसा लगे कि पूरा विश्व राधा राधा जपे सबको सुख मिले किसी को ना रोग हो ना शोक हो ना संकट हो
19:36
Speaker A
ना विपत्ति हो भगवान सब पर कृपा करे सब सुखी हो तब ये स्वस्थ मन की बात है अभी तो अस्वस्थ मन है हां अभी इसके भावों को दबाते रहिएगा स्वस्थ मन यही होगा सबको सुख मिले जो मुझे सुख मिला भगवान सब पर कृपा
19:50
Speaker A
करें ऐसे सबको निहाल कर दे ऐसा आता है ना मेरे प्रभु जैसे हम कोई सुंदर चीज देखें तो अब हमको ये लगेगा कि यह चीज सबको दिखा दे यार सबको अच्छा सबका मंगल हो जाए सबको अच्छा लगे पर वो बिना भजन के देख नहीं
20:05
Speaker A
सकते इसलिए कहते हैं भाई भजन करो भजन करो भजन करो ये अभी एक माई आई थी जगन्नाथ पुरी की बड़े अच्छे संत हैं तो उन्होंने कहा कि आप कह दो कि आपको भगवत प्राप्ति हो जाएगी तो मुझे मुझे विश्वास हो जाएगा भगवत
20:17
Speaker A
प्राप्ति हो जाएगी। हम कहा अगर हमारे कहने से हो तो मैं कहता हूं सारे विश्व को भगवत प्राप्ति हो जाए। पर ऐसा नहीं हो सकता। जब तक आप भजन नहीं करेंगे तब तक भगवत प्राप्ति नहीं हो सकती। कहने से भगवत
20:28
Speaker A
प्राप्ति होती तो फिर बोलने की क्या जरूरत है? एक बार बोल देते सबको भगवत प्राप्ति हो जाए और हम चुपचाप भजन करते काहे को लगे रहते। लेकिन यह लगे इसीलिए कि जब तक आप भजन नहीं करोगे तब तक आपको भगवत प्राप्ति
20:40
Speaker A
नहीं होगी। तो अपने मन को दबाते रहो और सबको सुख देने की भावना रखो। सबको सुख देने की कि कैसे सबको सुख दें। कैसे सबको हम आनंद दें तो आप आनंदित रहोगे क्योंकि सब में भगवान विराजमान है। ठीक है सोनू
20:55
Speaker A
कुमार जी हां राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी गुरुदेव भगवान मुझे ईश्वर कृपा से बचपन से ही वेदांती गुरुदेव का सानिध्य प्राप्त हुआ। जिसके फल स्वरूप मुझे वेदांत सिद्धांत पर संशय विप्रेय रहित दृढ़ निश्चय तो हो गया। परंतु मलिन अंतःकरण के कारण मुझे शांति व
21:13
Speaker A
कृतकृत भाव का लेश मात्र भी अनुभव नहीं हुआ। अपितु समस्त काम क्रोध आदि विकार पूर्णतः बने रहे। और ज्ञान के इस मिथ्या अहंकार के कारण मेरी आध्यात्मिक यात्रा की अधोगति हो गई। महाराज जी इनका आगे प्रश्न है महाराज जी आपके श्री मुख से सुना है कि
21:28
Speaker A
स्वरूप बोध की जिज्ञासा वाले पथिक को सत व असत दोनों प्रकार के चिंतन का त्याग करना होता है। भगवन तब से मैं संशय में पड़ गया हूं कि हरि नाम तो सतचिंतन है। हे नाथ अपने देखो बात हां बात ये बच्चा
21:43
Speaker A
कि मार्ग जो ज्ञान का है उसकी बात है सत असत दोनों का चिंतन त्यागना वहां हरि और मैं ये दो नहीं है। ब्रह्म बोध में आत्म बोध में हरि और मैं दो नहीं है। वहां मैं ही मैं और यहां केवल हरि ही हरी है मैं नहीं
22:13
Speaker A
प्रेम गलियति सा तामे दोनों समय जब मैं था तब हरी नहीं अब हरी है मैं नहीं और उसमें हरि नहीं मैं ही मैं है अहम ब्रह्मा ज्ञान के पंथ कृपाण के धारा परत खगेश लगे नहीं 12 अब इतने बड़े तपस्वी तो हो नहीं
22:31
Speaker A
जितेंद्र तो हो नहीं तो दुर्दशा तो हो ही जाएगी इसलिए भगवान की शरण में होकर भगवान का नाम जप करो। आद्य गुरु भगवान शंकराचार्य जी से शिष्यों ने प्रश्न किया अपार संसार समुद्र मस्त दे इस अपार संसार समुद्र के बीच में मजतो मैं डूब रहा हूं
22:51
Speaker A
शरणम की मस्त किसकी शरण में जाऊं उनका विश्वेश्वर पादाज दीर्घ नौका गुरु कृपालु कृपया वधत श्री विश्वेश्वर पादामज दीर्घ नौका भगवान विश्वेश्वर विश्वनाथ जी के चरणारविंद का आश्रय ले लो और नाम जप करो अभी सब ठीक हो जाएगा। ज्ञान भी प्रकट होगा
23:14
Speaker A
निर्मल और भगवान की कृपा भी और भगवान रक्षा भी करते हैं। जब हम भगवान के आश्रित होकर भजन करते हैं तो भगवान रक्षा करते हैं। योगक्षिममहम कर सदा तिनके रखवारी जिम बालक राखे महतारी। अब वेदांत निष्ठा में जो हमें
23:31
Speaker A
चाहिए वह है नहीं आपके पास जिससे वेदांत फलीभूत हो वो है नहीं क्योंकि बिना सत असत का विवेक बिना लोक परलोक के भोगों से वैराग्य हुए बिना सम दम उपति तितक्षा समाधान मुमुक्षता इनके बिना खोखला है ज्ञानी केवल ज्ञान का वर्णन कर देना थोड़ी
23:53
Speaker A
ज्ञान होता है अनुभव की बात होती है मान लो आप बहुत अच्छे साधक हो पवित्र हो तो आप अपनी स्थिति का वर्णन कर रहे हो कि मेरी दुर्दशा है काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर तो अस्त्र क्या जो उस दुश्मन को
24:05
Speaker A
परास्त ना कर पावे नहीं कागज की तलवार से किसी की गर्दन तो नहीं काटी जा सकती। ऐसे ही वाचिक ज्ञान से माया का बंधन नहीं काटा जा सकता। अनुभव जन्य ज्ञान होना चाहिए। उसके लिए बच्चा भजन करो। अगर हमारी बात
24:21
Speaker A
मान जाओ तो भगवान की शरण में हो जाओ। मानी संख्या से सवाल हल हो जाएगा। माना जो परम ब्रह्म परमात्म तत्व भगवान श्री राम भगवान श्री हरि भगवान श्री कृष्ण भगवान शिव जहां तुम्हारी भावना बने और नाम जपना शुरू करो
24:39
Speaker A
और गीता जी है भागवत जी है इन ग्रंथों को अभी पढ़ो तो धीरे-धीरे जब आपकी बुद्धि प्रवीण होती चली जाएगी तो फिर बात समझ में आने लगेगी जैसे हम घर में अच्छे से छक जाए ना बाहर मन नहीं चलेगा ऐसे अंदर आंतरिक एक
24:57
Speaker A
आत्म सुख मिल जाए ना तो बहिर जो इंद्रिय जन भोगों की उसकी लालसा नहीं रह जाएगी। अभी क्या अंदर खाली सूखा है। अब ऊपर घी लगा के यहां से हम आवे और कह दे भाई हम हलवा पा के आ रहे हैं। तो हम हर चीज देख
25:11
Speaker A
के ललचा जाए क्योंकि भूखे हैं। केवल होठों में घी लगा लेने से हलवा खाने की तृप्ति थोड़ी हो जाएगी। वो तो हलवा खा के ही तृप्ति होगी। तो निज सुख बिन मन होए किथेरा जब तक निज सुख आत्म सुख परमात्म
25:26
Speaker A
सुख मन को नहीं मिलेगा तब तक वो बातों से शांत होने वाला नहीं बातें करोगे ब्रह्म ज्ञान की और क्रियाएं करोगे अज्ञानी वाली और अगर भगवान के शरण में हो गए तो फिर वो शुद्ध ज्ञान देते हैं वो शुद्ध भगवान
25:42
Speaker A
मार्ग दे देते हैं और जहां हम लड़खड़ाते हैं वहां में बचा लेते हैं कर सदा तिनके रखवारी जिम बालक राखे महतारी जी देखो सनक सनंदन सनातन सनत कुमार चारू ब्रह्म ज्ञानी महात्मा है ब्रह्म बोध संपन्न लेकिन हर समय क्या जपते रहते हैं हरि शरणम हरि शरणम
26:01
Speaker A
हरि शरण ये विचित्र माया है भगवान की बचा सकते हैं तो भगवान बचा सकते हैं इसलिए भगवान की शरण में हो जाओ नाम जप करो सच्चा ज्ञान यह है कि हम अभी मायाकृत शरीर में फंसे हुए हैं और इससे हटना बहुत कठिन है
26:17
Speaker A
आप देख रहे हो इसके आकर्षण से हटना बहुत कठिन है। तो फिर हम गुरु स्वरूप भगवान श्री हरि की शरण में और उनका नाम जप उनकी लीला कथा बहुत हृदय शीतल हो जाएगा। देखना भगवान मैंने गुरु मंत्र आपके ही YouTube
26:34
Speaker A
से सुनकर नाम का प्रताप सुनकर नाम जब से प्रारंभ हो जाए तो से मेरा मनोरा भी कम हो गया। हां हो जाएगा और बहुत शीतलता आने लगेगी। मतलब एक एक विश्राम जैसा लगने लगेगा। जब आपको भरोसा दृढ़ हो जाएगा ना प्रभु में कि मैं
26:51
Speaker A
कौन हूं मैं क्या हूं भगवान जाने मैं जैसा भी हूं भगवान का हूं और खूब डट के नाम जप करना है अपने आचरण पवित्र रखना है अब इसी से आपके अंदर वैराग्य और ज्ञान की उत्पत्ति होने लगेगी जैसे जैसे भगवान का
27:04
Speaker A
भजन करेंगे तो भगवान कृपा करके ज्ञान देते हैं। जो भगवत प्रदत्त ज्ञान होता है वही माया मुक्त होता है। जो पढ़ा लिखा ज्ञान होता है उससे माया मुक्त नहीं हुआ जा सकता। जड़ चेतन की ग्रंथि का जो भेदन है
27:18
Speaker A
वो भगवान की कृपा से प्राप्त ज्ञान से होता है। सोई जाने जे देव जनाई भगवान जिसे जना देते हैं वही जानता है। इसलिए खूब भजन करो अच्छे आचरण करो। दूसरों की सेवा करो। मानव जीवन है ना। हमको ये शरीर मिला है।
27:34
Speaker A
हम जो है सो तो है ही है। हमको करना क्या है? बस ये बात देखनी है। गंदे आचरण नहीं करने। पवित्र आचरण करना है। दूसरों की सेवा करनी है। खूब नाम जप करना है और भगवान से मिल जाना है। बस ये बात तो सब
27:48
Speaker A
ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, योग सब भगवान के पास जा रहे हैं। कोई उन्हें ब्रह्म कहता है, कोई परमात्मा कहता है, कोई भगवान कहता है। वही है। दूसरा तो है नहीं। कोई तत्व तो एक ही है ना। वही पहुंच चलेंगे। ऐसे
28:01
Speaker A
ज्ञान मार्ग में चलने पर बड़ी कठिनता है। उसमें सिद्ध होना बहुत कठिन है। एक काशी से महात्मा आए थे 65 70 वर्ष के। बड़े ईमानदार ईमानदार का मतलब अपनी बात कह देना जैसे तुमने कही ना तो आके बोले स्वामी जी
28:15
Speaker A
हम कुछ दिनों से आपका सत्संग सुन रहे हैं तो मुझे बहुत जलन हो रही है। बोले मैं वेदांत पढ़ता हूं। अपने काशी में रहता हूं। विश्वनाथ जी के रोज दर्शन करता हूं। जल चढ़ाता हूं। गंगा सब कुछ करता हूं। पर
28:28
Speaker A
कमी क्या है जो मुझे शांति नहीं। उनका भजन भजन की तो बोले आप जो बताओ उनका ऐसे ऐसे नाम जप करो फिर हमें आप बताना दूसरी बार फिर आए उन्होंने कहा बहुत कम दिनों में हमको बहुत आनंद क्योंकि तैयार भूमि है
28:45
Speaker A
भूमि तैयार है अब वेदांत चिंतन करने के बाद जो है फिर इसके बाद कहीं आस्था तो रहती नहीं बाहर और अपने लोगों की आस्था बहुत है अपने शरीर पर है सब देखो वो सही मार्ग कोई गलत मार्ग नहीं पर उसके लिए
29:01
Speaker A
जितनी पवित्रता चाहिए वो नहीं है। कलयुग है ना खानपान व्यवहार शरीरा अभिमान और नाना प्रकार के इससे ज्ञान नहीं होता वो सब खिचड़ी हो जाता है। शुद्ध ज्ञान के लिए पहले शरीर राग मारा जाता है। मैं शरीर नहीं हूं। तो इसका भूख प्यास भी मैं नहीं
29:19
Speaker A
हूं। इसकी सर्दी गर्मी भी मैं नहीं हूं। तो इसके काम क्रोध भी मेरे नहीं है। अभी निर्मल हूं। अभी निर्मल पर ऐसा नहीं है। जहां व्यथा मन मंथन करके प्रकट किए तो भूख भी मेरी, प्यास भी मेरी, क्रोध भी मेरे को
29:34
Speaker A
आ रहा तो दया अभिमानी जीव ज्ञान की बातें चाहे जितना कर ले लेकिन उससे मुक्त होना बहुत कठिन है। अब वही सरल मार्ग है भगवान की शरण में होकर नाम जप करते हुए वो भी मार्ग है। पर वो बहुत कठिन मार्ग है। और
29:48
Speaker A
उस मार्ग पर जो चल गया जो निर्विघ्न पंथ निर्भाई सो कैवल्य परम पद लाए और वही कैवल्य परम पद भक्ति में सहज स्वाभाविक आकर के भक्त के हृदय में प्रकाशित हो जाता है न सोचति ना कांक्षत ये कैवल्य परम पद
30:04
Speaker A
है ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा न सोचति ना का ना कोई चाह है ना किसी भी तरह की कोई सोच रह गई है तो भक्त को भी तो यही होता है सकल कामना हीन जे राम भगत रसलीन उसके भी अंदर कोई कामना नहीं रह जाती कोई चाह
30:19
Speaker A
नहीं रह जाती वो भी स्वरूप बोध को प्राप्त हो जाता है मम दर्शन फल परम अनुूपा जीव पाव निज सहज स्वरूपा बात एक ही है पर इसमें सहारा है भगवान का और बहुत सरल है और उसमें स्वयं चलना फिसले तो धम से गिरे
30:34
Speaker A
कोई पकड़ने वाला नहीं है इसमें भगवान का भरोसा है भगवान ये मैंने जैसे हरि का प्रणव के साथ जप करता हूं हरि ओम तो ये मंत्र कोटि में तो नहीं आएगा इसका जप कीर्तन कर सकते हैं अवस्था नहीं प्रणव आदि तो महान मंत्र ही
30:49
Speaker A
है। उदगीत है। बिना गुरु के इसका जप नहीं करना चाहिए। तो मेरे इष्ट श्री हरि है। तो फिर क्या श्री हरि है? मेरे इष्टों में क्या नहीं तो नाम जप करो भगवान के हां प्रणव को तभी जपना चाहिए या प्रणव लगे मंत्र को तभी
31:04
Speaker A
जपना चाहिए जब गुरु प्रदत्त हो। तभी वो सफल हो पाएगा। ऐसे नहीं है ऋषि परंपरा रही है तो अपने गुरुजनों से जो मंत्र मिलता है उसी से सिद्धा अवस्था प्राप्त होती है नहीं और विघ्न आ जाएगा मनमानी मंत्र जपने
31:18
Speaker A
से कामादि दोष प्रकट हो जाएंगे चित्रकूट में हम एक महात्मा रात्रि के समय देखा तो मंदाकिनी की एक शिला बीच में पड़ी हुई थी उस शिला में कंबल ओढ़े ठीक जेठ के महीने के बाद गर्मी जेष्ठ के महीने में बहुत
31:33
Speaker A
गर्मी होती है तपती हुई गर्मी के समय की बात वो ओढ़े तो हमें लगा कि यह मृत है क्या? तो जो वहां हमें लिवा गए थे उनका नाम युगल किशोर था। तो कहा युगल किशोर ये मृत है या जिंदा है? कहा जिंदा कहा जिंदा
31:49
Speaker A
और कंबल ओढ़े और ऐसे पत्थर के टुकड़े पर ऐसे रात्र भोले बड़े निरपेक्ष महापुरुष हैं। किसी से बात नहीं करते। जििद हमारी थी कि संतों के पीछे लगना उनसे बात पकड़ना। तो अब अपने बाबा जी बैठे हैं कभी तो निकलेंगे डिस्टर्ब नहीं करेंगे और
32:09
Speaker A
वो निकले दो ढ:30 बजे निकले जो ही निकले बस पीछे पड़े दंडवत महाराज जी दंडवत महाराज जी एक मिनट बस महाराज जी एक मिनट समय आप जैसे गुरुजन समय नहीं देंगे तो वो हेर भी नहीं रहे हम कहा आप जैसे गुरुजन
32:25
Speaker A
समय नहीं देंगे तो हम जैसे साधुकों का क्या होगा महाराज जी एक मिनट बस एक मिनट दे दीजिए जे पूछे पीछे मुड़े कमर हटा आया तो जैसे सूर्य उदय हो गया हो तेजोम में चेहरा क्योंकि अखंड ब्रह्मचारी और निरंतर
32:39
Speaker A
भजन परायण आधा भीजा हुआ कंबल नीचे का और नशे में आंखें भगवत अनुराग में भगवत अनुराग के नशे के आगे मदा घोर नेत्रम वो प्रेम के नेत्र अलग होते हैं रोम रोम एकदम कांप के आगे अरे ये तो बड़े दिव्य
32:56
Speaker A
महापुरुष महाराज जी महाराज जैसे किसी गरीब को धन मिल जाए तो कहा चल ना दे हम महाराज जी एक मिनट बैठ जाओ तुम मुझे संतोष हो जाए बैठ गए गले में कंठी थी वैष्णव कंठी ये वृंदास की तुलसी की तो इससे पहचान लगे कि
33:12
Speaker A
कोई जी आप वैष्णव हो तो महाराज जी पहला प्रश्न है कि आप शिला पर क्यों लेटते हैं रात्रि में ऐसी त्रिकोण शिला है तो उनका जन्म समाज से बचने के लिए आप कंबल बराबर उड़े रहते हैं बोले अभ्यास
33:29
Speaker A
है यह अभ्यास है महाराज जी कहते हैं मंत्र को पवित्र अवस्था में ही जपना चाहिए। अपवित्र अवस्था में जपने से दोष होता है। इसमें आपका क्या विचार है? तो उनका अपवित्र दशा में जब मंत्र जपा जाता है तो काम आदि वेग प्रचंड
33:46
Speaker A
होकर के उसको परास्त कर देते हैं। और गुरु मंत्र विमुख होकर जब मंत्रों को जपा जाता है तो उसे परास्त कर देते हैं। इसलिए गुरु प्रदत्त हो और पवित्र अवस्था में ही मंत्र जपा जाए और उठते बैठते चलते फिरते नाम जप
34:00
Speaker A
कर लेना चाहिए। महाराज जी एक प्रश्न और रह गया कि आप प्रसाद कहां पाते हैं? तो बोले बस एक बार चित्रकूट की गलियों में घूमता हूं ना मांगता हूं ना कुछ अगर किसी ने दे दिया तो पा लिया नहीं फिर आ के शिला पे
34:11
Speaker A
ऐसे रात दिन भजन परायण अब उन महापुरुषों को ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने में कोई कठिनता थोड़ी तो ब्रह्म स्वरूप ही हो जाते हैं। इसीलिए भगवान की शरण होकर भजन करो और नाम जप करो और जब प्रगट में किसी गुरु से
34:26
Speaker A
मंत्र मिल जाए उनके श्री मुख से तब फिर उसमें मिला हुआ है भगवान मिला हुआ मंत्र गुरु जी ने दे दिया है मंत्र प्रणव दे दिया हां तो खूब जपो उसको फिर जप तो जप में तो नहीं कर सकते ना चलते फिरते अपवित्र
34:41
Speaker A
अवस्था में तो हरि को श्री हरि हां हां प्रणव अपवित्र अवस्था में नहीं जपना चाहिए उसे चलते फिरते भी जप सकते हैं पर जब पवित्र हो वस्त्र पवित्र हो अपवित्र हो और पादुका ना हो जैसे चौथ लघु शंका आदि
34:55
Speaker A
की पादुका पादुका में ऐसे फिर मंत्र नहीं या तो नवीन पादुका हो जिसमें आप बाथरूम भी ना गए हो तो हमें लगता है कि प्रणव जपने के लिए पादुका की कोई आवश्यकता नहीं है। ऐसी समय जपे और जब पादुका इसमें चल रहा है
35:10
Speaker A
तो नाम जप करें नाम भगवान का महा महिमाम में है। नितिन तिवारी जी मुंबई से राधे राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी परब्रह्म परमेश्वर कौन है? शिव जी, विष्णु जी या ब्रह्मा जी?
35:28
Speaker A
एक है वह अनेक रूपों में प्रकट है। जिस रूप में मान लो आप जिस रूप में मान वो एक है। अनेक रूपों में प्रकट है। वो तो भगवान के स्वरूप है। पर यह भी सब भगवान के स्वरूप है। एक जगह कहीं
35:47
Speaker A
मान लो। जहां मान लोगे वहीं से अनुभव हो जाएगा। पाषाण में मान लिया तो कितने सिद्ध हो गए। काष्ट में मान लिया तो कितने सिद्ध हो गए। जल में मान लिया तो कितने सिद्ध हो गए। जहां मान लो वह एक है।
36:05
Speaker A
एक होते हुए अनेक रूप में है। अब जो मान लो आप सब में वही एक है। दूसरा कोई है ही नहीं। वही शिव है। वही सब है। पहुंच हो तो हमारी शब्दों को पकड़ना। श्रीमद् भागवत में जब वेन के शव का मंथन
36:27
Speaker A
हुआ तो भगवान का अवतार हो गया। दाहिनी भुजा में प्रथु भगवान और बाई भुजा से अर्च महारानी जो लक्ष्मी जी के अंश से है। मृत शरीर से भगवान का अवतार हो गया। प्रथु अवतार याद कर लो प्रथु अवतार वही शिव है
36:42
Speaker A
वही शव है। वही शक्ति है। वही शक्ति रहित है। जहां जिधर दृष्टि डालो वो ही वो है। अब तुम्हारी आस्था कहां जुड़ती है? खास बात यह है वह एक है। एक होते हुए अनेक है। समझ पा रहे हो आप? कोई संशय इसमें?
37:00
Speaker A
मुझे ऐसे ही लगता है कि जो आत्मा है वो परमात्मा से निकली हुई है। परमात्मा कौन है? इसी के बारे में ज्यादातर मेरा सवाल बस तुम अभी फिर नहीं अज्ञानी जीव कैसे समझ पाओगे। अभी ज्ञान की स्थिति तो है नहीं।
37:13
Speaker A
एक है वही अनेक है। अभी सारा किया इन्हीं में है। तो तुम में नहीं है क्या? आत्मा कौन है? आत्मा कौन है? परमात्मा का रूप है। फिर और किस परमात्मा की खोज कर रहे हो? अब अब क्या है कि अपने लोग बाहरी शरीर को मैं
37:32
Speaker A
मानते हैं। जैसे आपकी आयु कितनी है? 42 साल। 42 साल में 42 सेकंड भी आप अपने से नहीं मिले। 42 सेकंड भी आप अपने से नहीं मिले। 42 साल से इसी शरीर से खेल रहे हो और इसी शरीर
37:47
Speaker A
में रह रहे हो। लेकिन आप अपने से नहीं मिले और जिस दिन अपने को पा जाओगे तो किसी को पाना बाकी नहीं रहेगा। आप आपका जो स्वरूप है जिसे आत्मा कहते हैं उसे परमात्मा कहते हैं। वह केवल आत्मा और
38:02
Speaker A
परमात्मा का भेद केवल जो हम करते हैं ना वो शीशा और रूप को लेकर जैसे शीशा है तो दो दिखाई देंगे कि नहीं दिखाई देंगे? और शीशा हटा दो तो एक ही बचेगा ना। तो शरीर को लेकर के हम अनेकता में आते हैं। तत्व
38:18
Speaker A
में एक ही परमात्मा है। आपके अंदर आपके अंदर भी वही है। जैसे गंगाजल, एक चम्मच निकालो तो गंगाजल, एक टैंकर निकालो तो गंगाजल और पूरी धारा तो गंगाजल। कहोगे ना?
38:31
Speaker A
तो चींटी में भी वही आत्मा और विराट भगवान भी वही आत्मा। सब कुछ वही है। बिल्कुल सत्य मानिए। अज्ञान के कारण हम उस तत्व को नहीं समझ पा रहे हैं। शुद्ध ज्ञान जब होगा तो एक के सिवा कोई नहीं है। जैसे तरंग
38:50
Speaker A
समुद्र से ही उत्पन्न होती है। समुद्र में ही अट खेलियां करती है और वो समुद्र ही है और समुद्र में ही शांत हो जाती है। तो तरंग क्या है? समुद्र ही है। बोलो संशय है इसमें?
39:05
Speaker A
समुद्र से ही प्रकट होती है। समुद्र में ही अटखेलिया करती है और समुद्र में ही लय हो जाती है। तो तरंग है क्या? समुद्र ही तो है। केवल वायु विकार होने के कारण उसे तरंग कहा गया। ऐसे ही शरीर अभिमान और भोग
39:22
Speaker A
वासना से युक्त हो जाने के कारण उसे जीव कहा गया। जीवात्मा नहीं तो साक्षात परमात्मा है। और कोई दूसरा है ही नहीं। देखो हम बहुत सरल ढंग से जैसे बताते हैं उसको समझ जाए जीव। एक बिजली है। अगर आप
39:38
Speaker A
बिजली के महत्व को नहीं जानते हैं तो हम कहेंगे यह बिजली चल रही देखो यह बिजली तो आप केवल समझ पाएंगे कि बिजली चलाने का केवल काम करती है। लेकिन ये बिजली चमक रही है। देख रहे हो ना? यह बिजली ठंडा कर रही है।
39:54
Speaker A
एक बिजली गर्मी पैदा कर रही। तो यह हमको मिला के जीवन दे रहे हो। यही हमारा नाश कर देगी। छू जाए तो यही हमारे को मार देगी। बिजली ही जीवन देने वाली और बिजली ही जीवन लेने वाली। बिजली ही अंधकार, बिजली ही
40:09
Speaker A
प्रकाश। तो ऐसे ही परमात्मा ही सृष्टि रचने वाला, परमात्मा इस सृष्टि पालन करने वाला और परमात्मा इस सृष्टि का लय करने वाला और परमात्मा ही सृष्टि बनने वाला और परमात्मा इस सृष्टि बनाने वाला और परमात्मा सृष्टि का लय करने वाला। और पर
40:26
Speaker A
जिसका लय हो रहा है वह भी परमात्मा ही है। शुद्ध ज्ञान यह है। पर यहां तक पहुंचने के लिए साधना है। इतने मात्र से आप जान नहीं गए लेला। इतने जैसे इतना सुन लिया तो आपकी समझ में तो आ गया लेकिन जान नहीं लिया।
40:42
Speaker A
जिस दिन जान जाओगे उस दिन महान आत्मा हो जाओगे। कितना भेद होता है। देखो पाप करने वाले को क्या कहते हैं? पापत्मा। पुण्य वाले को क्या कहते हैं? पुण्य आत्मा। भजन करने वाले को क्या कहते हैं? महात्मा नहीं
40:55
Speaker A
कहते लेकिन सब में आत्मा तो एक ही है ना पाप आत्मा पुण्य आत्मा जीव आत्मा महान आत्मा परम आत्मा तो जो पीछे वाली बात है वो सब में एक ही है ना तो बस पीछे वाली बात देखो आगे वाली लाइन
41:15
Speaker A
आगे वाली तो क्रियाएं हैं एक पाप क्रिया करता है एक पुण्य क्रिया करता है एक भजन क्रिया करता है एक बुरी क्रिया करता है अंतर में जो बैठा हुआ है वो परमात्मा ही आत्मा है। दूसरा कोई नहीं। आत्मा और
41:27
Speaker A
परमात्मा में जो अभेद देखता है वही सच्चा ज्ञानी है। जो भेद देखता है अभी वह अज्ञानी है। अच्छा ये जब हम आपसे पूछे कि आपके अंदर आत्मा है? हां तो इनके अंदर भी आत्मा है तो यहां कितनी आत्माएं होंगी?
41:41
Speaker A
30-40 आत्माएं तो हो गई और वो एक है। तो यह कैसे पता चलेगा? इसमें तो 40 50 आत्माएं बैठ जाएंगी। नहीं बैठ जाएंगी। अब 100 घड़े रख दिए गए और सूर्य का प्रतिबिंब 100 घड़े में पड़ा तो सूर्य 100 थोड़ी हो
41:56
Speaker A
गए और घड़े फोड़ देने से सूर्य को कोई हानि हो जाएगी क्या? ऐसे शरीर नष्ट होने पर आत्मा का कुछ नहीं बिगड़ता। नैन छिनते शस्त्राण नैन दाति पावका न चैनम क्ल ये घड़े हैं। वो मिट्टी के घड़े हैं। ये मांस
42:12
Speaker A
के घड़े हैं। इसके अंदर जो तेज है वो परमात्मा का है। और उस तेज को आप नहीं देख पा रहे हैं। क्योंकि आपकी दृष्टि शरीर पे आ गई। आपका परिचय पूछे तो आप शरीर का परिचय बताएंगे और शरीर आप नहीं हैं पर इस
42:29
Speaker A
समय पूरे शरीर आप बने बैठे हैं। नहीं बैठे देखो बातें हम कुछ भी करें लेकिन लगता है ना मैं तो जब ये मैं तो आप अपने स्वरूप को नहीं जान पाए और जब उसको जान जाओगे तब ये मैं खत्म हो जाएगा और जब मैं खत्म हुआ तो
42:44
Speaker A
जन्म मरण खत्म हो जाएगा। बहुत बड़ा खेल है। जानते हुए भी नहीं जानने की स्थिति में माया रखती है। नहीं जानने की स्थिति में। अब जैसे आप सुन लिए तो आप यही बात दोहरा दो तो कोई कहेगा ये तो बहुत ब्रह्म
42:57
Speaker A
ज्ञानी है। लेकिन वास्तविक आपको अनुभव कुछ नहीं है। तो अनुभव जब तक ब्रह्म का ना हो तब तक ये बात केवल प्रवचन से नहीं समझ में आएगी। ना महात्मा प्रवचने नभ्या न मेदया ना बहुते बहुत सुनने से या बहुत प्रवचन
43:12
Speaker A
करने से कोई आत्मज्ञानी नहीं हो जाता। साधना करके जब अनुभव होता है तब वो साधना में लगना पड़ेगा। अब साधना क्या साधना हो रही कलयुगी प्राणी की समय से बाल भोग समय से राज दोपहर का भोग शयन भोग और मनमानी
43:28
Speaker A
भोगों का आचरण ये साधना हो रही ईमानदारी से देखो तो जो मन में आया सो कर बैठे तो इससे परमात्मा बोध तो नहीं होता है मन को मार ले फिर हो गया भजन मन को मार ले एक एक
43:41
Speaker A
तरंग उसकी मार दे एक एक वृत्त उसकी मार दे मन कहे कि अमुक हो नहीं फिर जो जलाए फिर उस समय मैं शरीर नहीं हूं तब बात समझ में आई ये तो बड़ी कहानी है इसलिए हमें लगता है नाम जप करो भगवान का खूब अधिक से अधिक
43:55
Speaker A
और पवित्र आचरण करो दूसरों को सुख पहुंचाओ इसी से काम बन जाएगा भगवान का नाम जप करो और पवित्र आचरण दूसरों को सुख पहुंचाओ सब में भगवान विराजमान है तो इसी से भगवान कृपा करेंगे तो ज्ञान भी हो सकता है प्रेम
44:10
Speaker A
भी हो सकता है कल्याण भी हो सकता है जगदीप सिंह जी राधेधे राधेधे महाराज जी महाराज जी मैंने ने और मेरी पत्नी ने नाम दाम की दीक्षा ली हुई है। सुबह शाम बैठकर कम ही समय मिल पाता है
44:23
Speaker A
कि नाम जप कर पाए। हम कहते हैं हम इस सिद्धांत को नहीं मानते कि सुबह शाम बैठकर के करना चाहिए। उठते बैठते चलते फिरते हर समय का अभ्यास करो। ऐसा थोड़ी कि सुबह शाम ही हमारी मृत्यु होगी। कभी भी हो सकती है और हमें फाइनल पर
44:38
Speaker A
आना है, जीतना है तो अगर हमारे सोच में बैठे हैं और उसी समय दिल फेल हो जाए तो हमारी दुर्गति हो जाएगी ना तो हम उस समय भी राधा राधा रटेंगे। हम एक सेकंड के लिए अवसर नहीं देंगे कि हमारी मृत्यु हो और
44:52
Speaker A
मुझे दुर्गति भोगना पड़े। उठते बैठते चलते फिरते हर समय नाम जप। मंत्र जप तो कुछ समय आसन में बैठकर करें, लेकिन नाम जप हर समय करने का अभ्यास करें। क्योंकि कभी भी धोखा हो सकता है अपने साथ। अपने को फाइनल पता
45:06
Speaker A
नहीं कब है। और पता नहीं किस स्थिति में फाइनल हो। बड़ी विचित्र दशा है। ऐसे ऐसे हुआ ऐसे ले ले पाए। उसी में गिर पड़े गए। वो देखो ना घटना है। नाच रहे नाचते नाचते गिर गए। मर गए। कुछ भरोसा नहीं किस समय
45:24
Speaker A
चले जाए। तो इसलिए हर स्थिति में हमें राधा राधा रचना है। क्योंकि नाम जपते हुए यदि शरीर छूटा तो निश्चित भगवत प्राप्ति होती है। इसमें कोई संशय नहीं। आप समझ पा रहे हैं? तो अभ्यास बनाइए और सबसे बढ़िया
45:38
Speaker A
बात है कि नाम में महत्व बुद्धि नहीं है। नाम दान तो लिया लेकिन उसमें महत्व बुद्धि नहीं है। महत्व बुद्धि हो जाए तो नाम छूटेगा ही कभी नहीं। जैसे रुपया की महत्व बुद्धि है और चेक आपको दे दे तो आपसे कहना
45:54
Speaker A
नहीं पड़ेगा कि संभाल के रखना आपका एक हाथ छक पर रहेगा नहीं रहेगा और भगवान के एक नाम की कीमत में पूरा त्रिभुवन नहीं है हम घंटों भूले हुए हैं किसके लिए रुपया के लिए भोग के लिए संसार के लिए तो मात्र
46:08
Speaker A
संसार का आया या भगवान का संसार का अभी हमारे अंदर सच्चा ज्ञान ये प्रकट नहीं हुआ कि एक भगवान के नाम की कीमत पूरा त्रिभुवन नहीं हम बोला राम अब एक राम नाम से पूरा बोला त्रिभुवन थोड़ी ये तो मायाकृत है
46:22
Speaker A
भगवान अधीन हो जाते हैं कहूं कहां लगी नाम बढ़ाई राम न सके नाम गुण गाई तो अभी महत्व बुद्धि नाम में नहीं इसलिए बोले हमसे होता नहीं है नहीं तो धन का चिंतन हर समय होता है बिना प्रयास के होता है महत्व बुद्धि
46:37
Speaker A
है तो बिना प्रयास के चिंतन होता है और अगर ऐसे ही धन बुद्धि हो गई हमारी नाम में तो बिना प्रयास के नाम जप होने लगेगा और यहां से जाना है और इस देश का सिक्का वहां जहां जाना है चल चलता नहीं है तो बेकार ही
46:52
Speaker A
तो है यार अपने घर जाना है आए तो हम परदेश में हैं और हमको लगता है यह हमारा घर है नहीं लगता है और यहां से जाना सब कोई जानता है जाना और एक रुपया साथ नहीं जाना एक व्यक्ति साथ नहीं जाना उसके लिए तो हम
47:07
Speaker A
इतना मर रहे हैं और जहां जाना उसके लिए एक पैसे की कमाई नहीं इसलिए कबीरा सब जग निर्धना धनवंता नहीं कोई धनवंता सोई जानिए जाके राम नाम धन हो खूब जो नाम जप कर नाम रूपी धन और अच्छा नाम का यह प्रभाव है कि
47:22
Speaker A
इस लोक और परलोक में दोनों जगह सुख मिलेगा इस लोक में भी सुख मिलेगा परलोक में भी सुख मिलेगा और ये आप करके देख लो मनुष्य जीवन मिला अच्छा इसमें पैसा तो लगता नहीं कि आप इतने रुपया भरो तो ये बात फ्री है
47:39
Speaker A
अंदर से बस शुरू कर दो राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा और जो तुम कर रहे हो उसमें पाप कर्म हटा दो पाप कर्म कर्म मत करो। फिर देखो आपका मंगल कैसे होता है। अब पाप कर्म करोगे तो गंगा स्नान
47:54
Speaker A
करके आए और फिर सब धूल लपेट लिए तो फायदा क्या हुआ? अब मान लो नाम जप कर रहे हो पाप भी कर रहे हो तो फिर चलनी में गया दुहे चलनी में गया दुहे और दोष द को दे हरि
48:07
Speaker A
गुरु कहो ना मान तो अपनो ही फल ले अब चलनी में गाय दुहे कह दे हमारे भाग्य में नहीं लिखा दूध नहीं उसमें छेद है आप ऐसे पात्र में धो जिसमें छेद ना हो तो पाप कर्म छेद है तुम नाम जप करोगे वो सब पाप कर्म के
48:21
Speaker A
द्वारा इसलिए पाप कर्म ना करो और नाम जप करो फिर देखो नाम का क्या महत्व प्रकट होता इस लोक में और परलोक में भी परमानंद का अनुभव होगा। हम ये कहते सुबह शाम जो करो तो करो ही लेकिन चलते फिरते उठते
48:35
Speaker A
बैठते का अभ्यास करो। जो नाम गुरुजी ने दिया है, उसका नाम जप करो।
Topics:नाम जपसत्संगगृहस्थ जीवनधर्मविरक्तिराम नामराधा राधागुरु वचनभजन मार्गआध्यात्मिक उन्नति

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