ओशो का हिंदी प्रवचन उम्मीद छोड़ने और सुकून पाने के गहरे रहस्यों पर आधारित प्रेरणादायक संदेश है।
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Key Takeaways
- उम्मीद छोड़ने से मानसिक शांति और सुकून प्राप्त होता है।
- उम्मीद और निराशा दोनों एक साथ जुड़ी होती हैं, इसलिए दोनों को समझना जरूरी है।
- वर्तमान क्षण में जीना ही सच्चा जीवन और मोक्ष है।
- बिना उम्मीद के किया गया कर्म सबसे शुद्ध और सुंदर होता है।
- उम्मीद छोड़ने से व्यक्ति अपनी पूरी ऊर्जा वर्तमान में केंद्रित कर सकता है।
What the video covers
- उम्मीद इंसान की सबसे बड़ी बेड़ी है जो उसे जंजीरों में जकड़े रखती है और बार-बार धोखा देती है।
- उम्मीद एक कल्पना है जो भविष्य की मूर्ति बनाकर वर्तमान को अस्वीकार करती है।
- उम्मीद और निराशा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जो दुख और तनाव की जड़ हैं।
- उम्मीद छोड़ने का मतलब त्याग नहीं, बल्कि एक गहरी समझ और वर्तमान में जीने की कला है।
- जब उम्मीद छोड़ दी जाती है, तो व्यक्ति बिना शर्त के वर्तमान में पूरी तरह उपस्थित होता है और सुकून पाता है।
- सुकून बाहरी चीज नहीं, बल्कि व्यक्ति की अपनी सहज अवस्था है, जैसे समुद्र की गहराई में शांति।
- उम्मीद छोड़ने से व्यक्ति कर्म को उसके शुद्धतम रूप में करता है, बिना फल की आशा के।
- उम्मीद मानसिक संरचना है जो चेतना पर हावी होकर वास्तविकता को देखने से रोकती है।
- समाज और संस्कृति ने उम्मीद को सकारात्मक बताया है, लेकिन यह एक प्यारा जहर भी हो सकता है।
- सच्चा सुकून आशा और निराशा दोनों से परे स्वीकृति में है, जहां जो है वही सही है।
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Speaker A
बहुत खूब। तुमने आज एक ऐसा सवाल पूछा है जो इंसान की सबसे गहरी पीड़ा और उसके सबसे बड़े सुख की कुंजी है। जिस दिन उम्मीद छोड़ दोगे, उसी दिन सुकून मिलेगा। यह बात बड़ी विरोधाभासी लगती है। क्योंकि हमें तो बचपन से यही सिखाया गया है कि उम्मीद पर दुनिया कायम है। उम्मीद का दामन कभी ना छोड़ो। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं, यही उम्मीद तुम्हारी सबसे बड़ी बेड़ी है। यही उम्मीद तुम्हें जंजीरों में जकड़े रखती है और यही उम्मीद तुम्हें बार-बार धोखा देती है। फिर भी तुम उसे थामे रहते हो क्योंकि उसके बिना तुम अकेले पड़ जाओगे। खोखले हो जाओगे। पर यही तो भूल है। तुम खोखले नहीं हो। तुम परिपूर्ण हो। तुम्हारा अस्तित्व स्वयं में इतना विशाल है कि उसे किसी उम्मीद की सहारे की जरूरत नहीं। जरा गौर से देखो, उम्मीद क्या है? उम्मीद एक कल्पना है। एक भविष्य की मूर्ति है जो तुमने अपने मन में बना ली है। तुम कहते हो कल ऐसा होगा, तब मुझे सुख मिलेगा। तुम कहते हो यह रिश्ता संवरेगा, तब मैं शांत हो जाऊंगा। तुम कहते हो ये बीमारी दूर होगी, तब मैं चैन से सांस लूंगा। तुम कहते हो पैसा आएगा, मान सम्मान मिलेगा, तब जीवन सार्थक होगा। लेकिन ये तब कभी नहीं आता। और जब वह क्षण आता भी है, तो तुम पाते हो कि वहां भी कोई नई उम्मीद पैदा हो गई है। कोई नया लक्ष्य, कोई नई चाह। यह एक अंतहीन दौड़ है। एक मृग तृष्णा का पीछा प्यासा व्यक्ति रेत के टीले पर पानी ढूंढता है। और जितना दौड़ता है, उतनी ही प्यास बढ़ती है। उम्मीद वही रेत है। वही सूखा मरुस्थल है। और इसी उम्मीद के साथ जुड़ी है निराशा का जन्म। याद रखो। उम्मीद और निराशा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब तक उम्मीद है, निराशा का बीज भी वहीं दबा है। तुम किसी से प्रेम करते हो और उम्मीद करते हो कि वो तुम्हें वैसा ही प्यार लौटाएगा। जब वो नहीं लौटाता, तो निराशा होती है। तुम एक व्यवसाय में पूंजी लगाते हो और उम्मीद करते हो कि वो फलेगा। जब वो नहीं फलता, तो दुख होता है। तुम अपने बच्चे से उम्मीद करते हो कि वो तुम्हारी बात मानेगा। जब वो नहीं मानता, तो क्रोध आता है। ये सारा दुख, ये सारा तनाव, ये सारा बेचैनी, इसकी जड़ में उम्मीद के अलावा और क्या है? तुम अपने ही हाथों से जाल बुनते हो और फिर उसी जाल में फंस कर चीखते हो। उम्मीद तुम्हारी अपनी रचना है। और तुम उसी से पीड़ित होते हो। अब मैं तुमसे कहता हूं, इस उम्मीद को छोड़ो। पर यह छोड़ना कोई त्याग नहीं है। कोई वैराग्य का दिखावा नहीं है। यह तो बस एक समझ है। एक आंख खुलने की बात है। जब तुम कहते हो मुझे यह मिलना चाहिए, तो तुम वर्तमान को अस्वीकार कर देते हो। तुम अभी को कल के लिए बलिदान कर देते हो। और जीवन तो केवल अभी में है। इसी क्षण में है। कल कभी नहीं आता। वो सदा एक कल्पना ही रहता है। जब तुम उम्मीद छोड़ देते हो, तो तुम भविष्य के भूत से मुक्त हो जाते हो। तुम यहां और अभी आ जाते हो पूरी तरह बिना किसी शर्त के। और जब तुम यहां और अभी होते हो, तो कोई दुख नहीं होता। क्योंकि दुख हमेशा अनुपस्थिति का अनुभव है। अनुपस्थिति उस चीज की जो तुम चाहते थे और जो नहीं मिली। लेकिन जब तुम किसी भी चीज की अपेक्षा नहीं रखते, तो जो है वही पर्याप्त है। वही पूर्ण है। कि सुकून क्या है? सुकून कोई बाहरी चीज नहीं है। कोई पुरस्कार नहीं है जो उम्मीद छोड़ने पर मिलता है। सुकून तो तुम्हारी अपनी सहज अवस्था है। जैसे समुद्र की गहराई में हमेशा शांति होती है। चाहे ऊपर कितनी भी लहरें उठें, वैसे ही तुम्हारे भीतर सुकून का एक महासागर है। पर तुम उन लहरों के साथ इतने व्यस्त हो गए हो। लहरें हैं, उम्मीदें, आकांक्षाएं, इच्छाएं कि तुम गहराई में उतरना ही भूल गए हो। जिस दिन उम्मीदें मिट जाती हैं, उस दिन वे लहरें शांत हो जाती हैं और तुम बिना किसी प्रयास के, बिना किसी योग के अपनी गहराई में पहुंच जाते हो। वहीं सुकून है, वहीं मोक्ष है, वहीं आनंद है। और सबसे रहस्यमई बात तो यह है। जब तुम उम्मीद छोड़ देते हो, तभी वह सब होने लगता है जिसकी तुम उम्मीद कर रहे थे। यह जीवन का विरोधाभास है। जब तुम जोर देते हो, तो वह तुमसे दूर भागता है। जब तुम्हें उसकी कोई परवाह नहीं होती, तो वह दरवाजे पर आ खड़ा होता है। तुमने नोटिस किया? जब तुम किसी व्यक्ति के पीछे दौड़ते हो, तो वह और दूर भागता है। जब तुम निश्चिंत हो जाते हो, तो वही व्यक्ति तुम्हारी ओर आकर्षित होता है। जब तुम धन की चिंता छोड़ देते हो, तो धन तुम्हारे पास आने लगता है। क्योंकि तब तुम सृजनशील होते हो। तुम अपनी पूरी शक्ति से काम करते हो, बिना किसी बोझ के। उम्मीद एक बोझ है। इतना भारी कि तुम्हारे पंख नहीं उड़ पाते। जब वह बोझ उतर जाता है, तो तुम ऊंची उड़ान भर सकते हो। और वही उड़ान ही तुम्हें वह सब कुछ देती है जो तुम चाहते थे। पर तब तुम्हें वह चाहिए नहीं होता क्योंकि तुम स्वयं वही हो गए हो जो तुम चाहना चाहते थे। मैं कहता हूं अपनी सारी उम्मीदों की सूची बनाओ। उन्हें एक-एक करके पढ़ो और हर एक के सामने लिखो, यह मेरी बेड़ी है। फिर उस कागज को जला दो। और देखो उस राख से कितनी हल्की, कितनी निर्मल, कितनी मुस्कुराती हुई सांस तुम्हारे भीतर उठती है। वही सुकून है। वो तुम्हारा जन्म सिद्ध अधिकार है। तुमने उसे गिरवी रख दिया था उम्मीदों के नाम पर और अब उसे वापस ले लो। यह कोई निष्क्रियता नहीं है। मत समझना। यह परम सक्रियता है। क्योंकि जब उम्मीद नहीं होती, तो तुम कर्म को उसके शुद्धतम रूप में करते हो, बिना किसी फल की आशा के। और ऐसा कर्म गीता का कर्म, बुद्ध का कर्म, वही तो सच्चा जीवन है। बिना उम्मीद के किया गया कर्म सुंदर होता है क्योंकि वो ध्यान बन जाता है। वो नृत्य बन जाता है। वो प्रार्थना बन जाता है। उसमें तुम विलीन हो जाते हो और उसी विलय में सुकून का जन्म होता है। तो आज शाम जब तुम अपने तकिए पर सिर रखो, तो अपने आप से कहना, मैं कल की कोई उम्मीद नहीं रखता। मुझे नहीं पता कि कल क्या होगा। मुझे कोई फिक्र नहीं। अगर कल सूरज निकला तो अच्छा, नहीं निकला तो भी अच्छा। अगर सांस चली तो ठीक, नहीं चली तो भी ठीक। देखना, इसी क्षण एक गहरी नींद, एक गहरी शांति जो नींद से भी गहरी है, तुम्हें घेर लेगी। वही सुकून है, वही ईश्वर है। वही तुम हो। अब और क्या कहूं? जितना कहूं उतना कम है। क्योंकि यह बात भाषा में नहीं आती। यह तो मौन में ही सुनाई देती है। चुप हो जाओ और उसे पा लो। जरा और बारीकी से समझो। उम्मीद केवल एक भावना नहीं है। यह पूरी जीवन दृष्टि है। एक मानसिक संरचना है जो तुम्हारी चेतना पर हावी हो गई है। तुम सुबह उठते हो और पहली चीज जो तुम्हारे मन में आती है, वो है, आज क्या होगा? यह क्या होगा? ही उम्मीद है। तुम चाय पीते हो और सोचते हो इस चाय से मुझे ताजगी मिलेगी। यह उम्मीद है। तुम दफ्तर जाते हो और सोचते हो आज मेरा काम पूरा होगा। बॉस खुश होगा। ये उम्मीद है। तुम दोस्तों से मिलते हो और सोचते हो वे मुझे समझेंगे। वे मेरी कद्र करेंगे। यह उम्मीद है। हर सांस के साथ, हर पल, हर क्रिया में उम्मीद एक छाया की तरह चिपकी हुई है। और तुम्हें पता भी नहीं है कि यह छाया तुम्हारे भीतर के सूर्य को ढक रही है। उम्मीद तुम्हारी आंखों पर पट्टी बांधे हुए है, जिससे तुम वास्तविकता को नहीं बल्कि अपने प्रक्षेपणों को देखते हो। यह प्रक्षेपण तुमने कहां से सीखा? समाज ने, संस्कृति ने, धर्म ने, तुम्हारे माता-पिता ने, तुम्हारे शिक्षकों ने सब ने मिलकर तुम्हें यह विष दिया है। वे कहते हैं आशावान बनो, निराशा मत करो। हमेशा अच्छे की उम्मीद रखो। यह सुनने में कितना प्यारा लगता है। है ना? पर यह प्यारा जहर है। यह तुम्हें क्षणिक उत्साह तो देता है, पर उसके बाद वही पुरानी गिरावट, वही पुरानी निराशा। तुम्हें किसी ने नहीं सिखाया कि आशा और निराशा दोनों एक ही सिक्के के पहलू हैं और इस सिक्के को स्वीकार करने का मतलब है दोनों को स्वीकार करना। उतार-चढ़ाव दोनों को। लेकिन जो सुकून की बात मैं कर रहा हूं, वो इन दोनों के पार है। वहां आशा नहीं है। निराशा नहीं है। वहां तो केवल एक स्वीकृति है। जो है वो है और वो जैसा है ठीक वैसा ही। और यह सुकून कोई उदासीनता नहीं है, कोई सुस्ती नहीं। अगर तुम यह सोचो कि उम्मीद छोड़ने का मतलब यह है कि अब मैं बिस्तर पर पड़ा रहूंगा, कुछ नहीं करूंगा, तो तुम गलत समझे। ये तो बिल्कुल विपरीत है। जब उम्मीद का बोझ नहीं रहता, तो तुम अभूतपूर्व ऊर्जा से भर जाते हो। क्योंकि अब तुम्हारी आधी ऊर्जा भविष्य की चिंता में नहीं खर्च होती। अब तुम्हारी आधी ऊर्जा बीते हुए कल के पछतावे में नहीं चलती। सारी ऊर्जा संपूर्ण चेतना यहां इसी क्षण उपलब्ध हो जाती है। और जब इतनी शक्ति एक बिंदु पर केंद्रित होती है, तो तुम असंभव को संभव कर सकते हो। लेकिन तुम उसे करते हो नाटक की तरह नहीं बल्कि नृत्य की तरह। जहां कोई लक्ष्य नहीं, वहां हर कदम अपने आप में पूर्ण होता है। सार्थक होता है, सुंदर होता है। मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं। एक बार एक बहुत बड़ा संत किसी गांव से गुजर रहे थे। उनके पीछे-पीछे उनका एक शिष्य चल रहा था जो बहुत परेशान था क्योंकि उसे अपनी ध्यान साधना में सफलता नहीं मिल रही थी। वो संत से बोला, गुरुदेव मुझे मोक्ष की कितनी उम्मीद है पर वो मिलता ही नहीं। मैं दिन-रात तप करता हूं। फिर भी शांति नहीं आती। संत उस समय एक नदी के किनारे बैठे थे। उन्होंने मुस्कुरा कर कहा, बेटा उस नदी को देखो। वो किसी सागर में पहुंचने की उम्मीद नहीं रखती। फिर भी वह बहती है। वो अपने रास्ते के पत्थरों से नहीं कहती, तुम मेरी राह क्यों रोकते हो? वो उन्हें प्यार से गले लगाती है। घुमाव लेती है लेकिन बहती रहती है। उसका प्रवाह ही उसकी पूर्णता है। पहुंचना कोई अलग चीज।
Speaker A
है कि उम्मीद पर दुनिया कायम है। उम्मीद का दामन कभी ना छोड़ो। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं यही उम्मीद तुम्हारी सबसे बड़ी बेड़ी है। यही उम्मीद तुम्हें जंजीरों में जकड़े रखती है और यही उम्मीद तुम्हें बार-बार धोखा देती है। फिर
Speaker A
भी तुम उसे थामे रहते हो क्योंकि उसके बिना तुम अकेले पड़ जाओगे। खोखले हो जाओगे। पर यही तो भूल है। तुम खोखले नहीं हो। तुम परिपूर्ण हो। तुम्हारा अस्तित्व स्वयं में इतना विशाल है कि उसे किसी उम्मीद की सहारे की जरूरत नहीं। जरा गौर
Speaker A
से देखो उम्मीद क्या है? उम्मीद एक कल्पना है। एक भविष्य की मूर्ति है जो तुमने अपने मन में बना ली है। तुम कहते हो कल ऐसा होगा तब मुझे सुख मिलेगा। तुम कहते हो यह रिश्ता संवरेगा। तब मैं शांत हो जाऊंगा।
Speaker A
तुम कहते हो ये बीमारी दूर होगी तब मैं चैन से सांस लूंगा। तुम कहते हो पैसा आएगा। मान सम्मान मिलेगा तब जीवन सार्थक होगा। लेकिन ये तब कभी नहीं आता। और जब वह क्षण आता भी है तो तुम पाते हो कि वहां भी
Speaker A
कोई नई उम्मीद पैदा हो गई है। कोई नया लक्ष्य, कोई नई चाह यह एक अंतहीन दौड़ है। एक मृग तृष्णा का पीछा प्यासा व्यक्ति रेत के टीले पर पानी ढूंढता है। और जितना दौड़ता है, उतनी ही प्यास बढ़ती है।
Speaker A
उम्मीद वही रेत है। वही सूखा मरुस्थल है। और इसी उम्मीद के साथ जुड़ी है निराशा का जन्म। याद रखो। उम्मीद और निराशा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब तक उम्मीद है, निराशा का बीज भी वहीं दबा है। तुम किसी
Speaker A
से प्रेम करते हो और उम्मीद करते हो कि वो तुम्हें वैसा ही प्यार लौटाएगा। जब वो नहीं लौटाता तो निराशा होती है। तुम एक व्यवसाय में पूंजी लगाते हो और उम्मीद करते हो कि वो फलेगा। जब वो नहीं फलता तो
Speaker A
दुख होता है। तुम अपने बच्चे से उम्मीद करते हो कि वो तुम्हारी बात मानेगा। जब वो नहीं मानता, तो क्रोध आता है। ये सारा दुख, ये सारा तनाव, ये सारा बेचैनी, इसकी जड़ में उम्मीद के अलावा और क्या है?
Speaker A
तुम अपने ही हाथों से जाल बुनते हो और फिर उसी जाल में फंस कर चीखते हो। उम्मीद तुम्हारी अपनी रचना है। और तुम उसी से पीड़ित होते हो। अब मैं तुमसे कहता हूं, इस उम्मीद को छोड़ो। पर यह छोड़ना कोई
Speaker A
त्याग नहीं है। कोई वैराग्य का दिखावा नहीं है। यह तो बस एक समझ है। एक आंख खुलने की बात है। जब तुम कहते हो मुझे यह मिलना चाहिए तो तुम वर्तमान को अस्वीकार कर देते हो। तुम अभी को कल के लिए बलिदान
Speaker A
कर देते हो। और जीवन तो केवल अभी में है। इसी क्षण में है। कल कभी नहीं आता। वो सदा एक कल्पना ही रहता है। जब तुम उम्मीद छोड़ देते हो तो तुम भविष्य के भूत से मुक्त हो जाते हो। तुम यहां और अभी आ जाते हो पूरी
Speaker A
तरह बिना किसी शर्त के और जब तुम यहां और अभी होते हो तो कोई दुख नहीं होता। क्योंकि दुख हमेशा अनुपस्थिति का अनुभव है। अनुपस्थिति उस चीज की जो तुम चाहते थे और जो नहीं मिली। लेकिन जब तुम किसी भी
Speaker A
चीज की अपेक्षा नहीं रखते तो जो है वही पर्याप्त है। वही पूर्ण है। कि सुकून क्या है? सुकून कोई बाहरी चीज नहीं है। कोई पुरस्कार नहीं है जो उम्मीद छोड़ने पर मिलता है। सुकून तो तुम्हारी अपनी सहज अवस्था है। जैसे समुद्र की गहराई में
Speaker A
हमेशा शांति होती है। चाहे ऊपर कितनी भी लहरें उठे वैसे ही तुम्हारे भीतर सुकून का एक महासागर है। पर तुम उन लहरों के साथ इतने व्यस्त हो गए हो। लहरें हैं, उम्मीदें, आकांक्षाएं, इच्छाएं कि तुम गहराई में उतरना ही भूल गए हो। जिस दिन
Speaker A
उम्मीदें मिट जाती हैं, उस दिन वे लहरें शांत हो जाती हैं और तुम बिना किसी प्रयास के, बिना किसी योग के अपनी गहराई में पहुंच जाते हो। वहीं सुकून है, वहीं मोक्ष है, वहीं आनंद है। और सबसे रहस्यमई बात तो
Speaker A
यह है। जब तुम उम्मीद छोड़ देते हो, तभी वह सब होने लगता है जिसकी तुम उम्मीद कर रहे थे। यह जीवन का विरोधाभास है। जब तुम जोर देते हो तो वह तुमसे दूर भागता है। जब तुम्हें उसकी कोई परवाह नहीं होती तो वह
Speaker A
दरवाजे पर आ खड़ा होता है। तुमने नोटिस किया? जब तुम किसी व्यक्ति के पीछे दौड़ते हो तो वह और दूर भागता है। जब तुम निश्चिंत हो जाते हो तो वही व्यक्ति तुम्हारी ओर आकर्षित होता है। जब तुम धन
Speaker A
की चिंता छोड़ देते हो तो धन तुम्हारे पास आने लगता है। क्योंकि तब तुम सृजनशील होते हो। तुम अपनी पूरी शक्ति से काम करते हो। बिना किसी बोझ के। उम्मीद एक बोझ है। इतना भारी कि तुम्हारे पंख नहीं उड़ पाते। जब
Speaker A
वह बोझ उतर जाता है तो तुम ऊंची उड़ान भर सकते हो और वही उड़ान ही तुम्हें वह सब कुछ देती है जो तुम चाहते थे। पर तब तुम्हें वह चाहिए नहीं होता क्योंकि तुम स्वयं वही हो गए हो जो तुम चाहना चाहते
Speaker A
थे। मैं कहता हूं अपनी सारी उम्मीदों की सूची बनाओ। उन्हें एक-एक करके पढ़ो और हर एक के सामने लिखो। यह मेरी बेड़ी है। फिर उस कागज को जला दो। और देखो उस राख से कितनी हल्की कितनी निर्मल कितनी मुस्कुराती हुई सांस
Speaker A
तुम्हारे भीतर उठती है। वही सुकून है। वो तुम्हारा जन्म सिद्ध अधिकार है। तुमने उसे गिरवी रख दिया था उम्मीदों के नाम पर और अब उसे वापस ले लो। यह कोई निष्क्रियता नहीं है। मत समझना। यह परम सक्रियता है।
Speaker A
क्योंकि जब उम्मीद नहीं होती तो तुम कर्म को उसके शुद्धतम रूप में करते हो बिना किसी फल की आशा के। और ऐसा कर्म गीता का कर्म बुद्ध का कर्म वही तो सच्चा जीवन है। बिना उम्मीद के किया गया कर्म सुंदर होता
Speaker A
है क्योंकि वो ध्यान बन जाता है। वो नृत्य बन जाता है। वो प्रार्थना बन जाता है। उसमें तुम विलीन हो जाते हो और उसी विलय में सुकून का जन्म होता है। तो आज शाम जब तुम अपने तकिए पर सिर रखो तो अपने आप से
Speaker A
कहना मैं कल की कोई उम्मीद नहीं रखता। मुझे नहीं पता कि कल क्या होगा। मुझे कोई फिक्र नहीं। अगर कल सूरज निकला तो अच्छा, नहीं निकला तो भी अच्छा, अगर सांस चली तो ठीक, नहीं चली तो भी ठीक। देखना इसी क्षण
Speaker A
एक गहरी नींद, एक गहरी शांति जो नींद से भी गहरी है, तुम्हें घेर लेगी। वही सुकून है, वही ईश्वर है। वही तुम हो। अब और क्या कहूं? जितना कहूं उतना कम है। क्योंकि यह बात भाषा में नहीं आती। यह तो मौन में ही
Speaker A
सुनाई देती है। चुप हो जाओ और उसे पा लो। जरा और बारीकी से समझो। उम्मीद केवल एक भावना नहीं है। यह पूरी जीवन दृष्टि है। एक मानसिक संरचना है जो तुम्हारी चेतना पर हावी हो गई है। तुम सुबह उठते हो और पहली
Speaker A
चीज जो तुम्हारे मन में आती है। वो है। आज क्या होगा? यह क्या होगा ही उम्मीद है। तुम चाय पीते हो और सोचते हो इस चाय से मुझे ताजगी मिलेगी। यह उम्मीद है। तुम दफ्तर जाते हो और सोचते हो आज मेरा काम
Speaker A
पूरा होगा। बॉस खुश होगा ये उम्मीद है। तुम दोस्तों से मिलते हो और सोचते हो वे मुझे समझेंगे। वे मेरी कद्र करेंगे। यह उम्मीद है। हर सांस के साथ, हर पल, हर क्रिया में उम्मीद एक छाया की तरह चिपकी
Speaker A
हुई है। और तुम्हें पता भी नहीं है कि यह छाया तुम्हारे भीतर के सूर्य को ढक रही है। उम्मीद तुम्हारी आंखों पर पट्टी बांधे हुए है। जिससे तुम वास्तविकता को नहीं बल्कि अपने प्रक्षेपणों को देखते हो। यह प्रक्षेपण तुमने कहां से सीखा? समाज ने,
Speaker A
संस्कृति ने, धर्म ने, तुम्हारे माता-पिता ने, तुम्हारे शिक्षकों ने सब ने मिलकर तुम्हें यह विष दिया है। वे कहते हैं आशावान बनो, निराशा मत करो। हमेशा अच्छे की उम्मीद रखो। यह सुनने में कितना प्यारा लगता है। है ना? पर यह प्यारा जहर है। यह
Speaker A
तुम्हें क्षणिक उत्साह तो देता है, पर उसके बाद वही पुरानी गिरावट, वही पुरानी निराशा। तुम्हें किसी ने नहीं सिखाया कि आशा और निराशा दोनों एक ही सिक्के के पहलू हैं और इस सिक्के को स्वीकार करने का मतलब है दोनों को स्वीकार करना। उतार चढ़ाव
Speaker A
दोनों को लेकिन जो सुकून की बात मैं कर रहा हूं वो इन दोनों के पार है। वहां आशा नहीं है। निराशा नहीं है। वहां तो केवल एक स्वीकृति है। जो है वो है और वो जैसा है ठीक वैसा ही। और यह सुकून कोई उदासीनता
Speaker A
नहीं है, कोई सुस्ती नहीं। अगर तुम यह सोचो कि उम्मीद छोड़ने का मतलब यह है कि अब मैं बिस्तर पर पड़ा रहूंगा, कुछ नहीं करूंगा तो तुम गलत समझे। ये तो बिल्कुल विपरीत है। जब उम्मीद का बोझ नहीं रहता तो
Speaker A
तुम अभूतपूर्व ऊर्जा से भर जाते हो। क्योंकि अब तुम्हारी आधी ऊर्जा भविष्य की चिंता में नहीं खर्च होती। अब तुम्हारी आधी ऊर्जा बीते हुए कल के पछतावे में नहीं चलती। सारी ऊर्जा संपूर्ण चेतना यहां इसी क्षण उपलब्ध हो जाती है। और जब इतनी शक्ति एक
Speaker A
बिंदु पर केंद्रित होती है तो तुम असंभव को संभव कर सकते हो। लेकिन तुम उसे करते हो नाटक की तरह नहीं बल्कि नृत्य की तरह। जहां कोई लक्ष्य नहीं वहां हर कदम अपने आप में पूर्ण होता है। सार्थक होता है, सुंदर
Speaker A
होता है। मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं। एक बार एक बहुत बड़ा संत किसी गांव से गुजर रहे थे। उनके पीछे-पीछे उनका एक शिष्य चल रहा था जो बहुत परेशान था क्योंकि उसे अपनी ध्यान साधना में सफलता नहीं मिल रही थी। वो संत से बोला गुरुदेव
Speaker A
मुझे मोक्ष की कितनी उम्मीद है पर वो मिलता ही नहीं। मैं दिन रात तप करता हूं। फिर भी शांति नहीं आती। संत उस समय एक नदी के किनारे बैठे थे। उन्होंने मुस्कुरा कर कहा। बेटा उस नदी को देखो। वो किसी सागर
Speaker A
में पहुंचने की उम्मीद नहीं रखती। फिर भी वह बहती है। वो अपने रास्ते के पत्थरों से नहीं कहती तुम मेरी राह क्यों रोकते हो?
Speaker A
वो उन्हें प्यार से गले लगाती है। घुमाव लेती है लेकिन बहती रहती है। उसका प्रवाह ही उसकी पूर्णता है। पहुंचना कोई अलग चीज नहीं है। तू भी ऐसे ही जी। उम्मीद मत रख कि कहीं पहुंचना है। बस बह बस जी बस हो।
Speaker A
उसी बहाव में सुकून है। सिर्फ समझ गया। वह रोया। उसने अपनी सारी उम्मीदें नदी में बहा दी और उसी क्षण उसे शांति मिली। यह कहानी कोई कल्पना नहीं। यह तुम्हारी ही कहानी है। अब उम्मीद का एक और पक्ष है।
Speaker A
तुम उसे लगाव के नाम से भी जानते हो। जब तुम किसी चीज से उम्मीद रखते हो तो स्वत ही तुम उससे लिपट जाते हो। तुम चाहते हो कि वह चीज तुम्हारे अनुसार हो। तुम्हारे नियंत्रण में हो। और यही लगाव दुख का सबसे
Speaker A
बड़ा कारण है। बुद्ध ने इसीलिए अनित्य और दुख का जो सूत्र दिया उसका सार यही है। तुमने एक ऐसी दुनिया को पकड़ने की उम्मीद रखी जो स्वभावत बदलने वाली है। तुमने एक रेत के महल को पकड़ने की कोशिश की और जब
Speaker A
वो बिखरा तो रोए। मैं नहीं कहता कि तुम महल मत बनाओ। बनाओ रचना करो, प्रेम करो। मगर यह याद रखो कि यह रेत का है। इसकी सुंदरता उसके बिखरने में भी है। जब तुम यह समझ लेते हो कि हर रचना विसर्जन के लिए
Speaker A
है। हर मिलन विछोह के लिए है। हर जन्म मृत्यु के लिए है तो तुम्हारी उम्मीद कमजोर नहीं होती। बल्कि वो अपनी जड़ से उखड़ जाती है। क्योंकि अब उसे पता है कि कोई अंतिम परिणाम नहीं है। बल्कि प्रत्येक
Speaker A
क्षण अपने आप में अंतिम है। इस सुकून को पाने के लिए एक और गहरी बात समझनी होगी। तुम्हारा मैं या अहंकार भी एक उम्मीद का जाल है। यूं मैं कहता है मुझे यह चाहिए। मुझे वो नहीं चाहिए। मैं ऐसा हूं। मैं ऐसा
Speaker A
बनूंगा। ये पूरा अहंकार उम्मीदों पर टिका है। यह भविष्य में जीता है। क्योंकि वर्तमान में अहंकार टिक नहीं सकता। जैसे ही तुम पूरी तरह वर्तमान में होते हो, मैं विलीन हो जाता है क्योंकि मैं तो एक विचार है और विचार हमेशा समय में यात्रा करता
Speaker A
है। तो जब तुम उम्मीद छोड़ते हो तो असल में तुम मैं को छोड़ रहे होते हो और उसी क्षण जो बचता है वो तुम्हारी असली पहचान है। शुद्ध चैतन्य बिना किसी नाम रूप की सीमा के वहां किसी को कोई शिकायत नहीं।
Speaker A
किसी को कोई शोक नहीं क्योंकि वहां कोई है ही नहीं जो शिकायत करे। वहां तो केवल एक खिली हुई चेतना है जो बादलों को देखती है। बारिश को सुनती है। पत्तों के कांपने को महसूस करती है। बिना किसी यह सोचे कि यह
Speaker A
अच्छा है या बुरा। यह सुखद है या दुखद। वह तो बस है और उस होने की अवस्था ही परम सुकून है। तो जब मैं कहता हूं कि उम्मीद छोड़ो तो मेरा मतलब है अपनी सारी जीवन योजनाएं, अपनी सारी सुरक्षा की चाह, अपनी
Speaker A
सारी पहचान, अपना सारा गर्व, अपनी सारी पीड़ा सब छोड़ दो। पर यह छोड़ना कोई क्रिया नहीं है। कोई करना नहीं है। अगर तुम करने की कोशिश करोगे तो वह एक नई उम्मीद बन जाएगी। उम्मीद की उम्मीद छोड़ने से सुकून मिलेगा। तो फिर तुम उसी जाल में
Speaker A
फंस गए। नहीं, यह कोई साधना नहीं, कोई उपाय नहीं। ये तो केवल एक गहरी अंतर्दृष्टि है। जब तुम देखते हो कि उम्मीद ने तुम्हें कभी कुछ नहीं दिया। सिवाय चिंता के, सिवाय भय के, सिवाय बेचैनी के। तो उस देखते ही वो झड़ जाती
Speaker A
है। जैसे सांप को देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं और कांपने लगते हैं। वैसे ही जब अंतर्दृष्टि की आंखें खुलती हैं, तो उम्मीद आपसे आप छूट जाती है। और तब पहली बार तुम सच्चे अर्थों में जीना शुरू करते
Speaker A
हो। तब तुम्हारे खाने का स्वाद अलग होता है। क्योंकि तुम यह नहीं सोच रहे कि अगला खाना कैसा होगा। तब तुम्हारी सांस गहरी होती है। क्योंकि तुम यह नहीं सोच रहे कि अगली सांस आएगी या नहीं। तब तुम जिससे बात
Speaker A
करते हो उसे तुम पूरी तरह सुनते हो। क्योंकि तुम यह नहीं सोच रहे कि वो तुम्हें क्या जवाब देगा या तुम्हें उससे क्या मिलेगा। यह जीवन इतना ताजा, इतना निर्मल, इतना काव्यमय हो जाता है, जैसे कोई नदी पहली बार बर्फ की गुफा से निकली
Speaker A
हो। और उस नदी में कोई मैल नहीं है। क्योंकि सारा मैल उम्मीदों का था, आकांक्षाओं का था। पिछली यादों और भविष्य के स्वपनों का था। मैं तुम्हें एक और बात बताऊं। यह सुकून कोई ठहराव नहीं है। कोई मुर्दा शांति नहीं है। वो तो इतना जीवंत
Speaker A
है कि तुम कांप उठोगे। वो इतना गहन है कि तुम्हारे आंसू बिना वजह बह सकते हैं। खुशी के आंसू जब तुम किसी फूल को देखते हो और उसके रंग में इतनी गहराई से विलीन हो जाते हो कि अपना शरीर भी भूल जाते हो तो वो
Speaker A
सुकून है। जब तुम किसी पक्षी की चहचहाट सुनते हो और उस ध्वनि में इतने खो जाते हो कि कोई विचार नहीं उठता तो वो सुकून है। यह सुकून तुम्हारी चारों ओर बिखरा पड़ा है। हर तिनके में, हर किरण में, हर बूंद
Speaker A
में, उम्मीद ने तुम्हारी आंखों पर धूल फेंक दी है। इसलिए तुम उसे देख नहीं पाते। जिस दिन वो धूल हट जाएगी उस दिन तुम पाओगे कि तुम जिस सुकून की तलाश में हिमालय जा रहे थे वो तो तुम्हारे आंगन में बैठा हुआ
Speaker A
है। तुम्हारी रसोई में खाना बना रहा है। तुम्हारे बच्चों के साथ खेल रहा है। लेकिन अगर तुम अब भी सोच रहे हो कि ये बहुत कठिन है। ये असंभव है। तो मैं कहता हूं ये सबसे आसान है। क्योंकि ये कोई कठिन साध्य नहीं
Speaker A
है। ये तुम्हारा स्वभाव है। तुम अपने स्वभाव को नहीं भूल सकते। तुम केवल उसे ढक सकते हो। उम्मीद एक पर्दा है। उसे हटा दो। बस इतना सा काम है और वो क्षण आ गया तो फिर इस जीवन में कोई समस्या नहीं रहती।
Speaker A
कोई दुविधा नहीं रहती, कोई भय नहीं रहता। तब तुम मृत्यु को भी उसी शांति से देखते हो जैसे एक परिपक्व फल पेड़ से गिरता है। बिना विरोध, बिना पछतावे, बिना उम्मीद कि मैं फिर से पेड़ पर लग जाऊं। और यही
Speaker A
मृत्यु भी सुंदर हो जाती है क्योंकि अब यह केवल एक रूप का अंत नहीं बल्कि अनंत में विलय है। मैं यहां रुकना चाहता हूं पर तुम कहते हो इसलिए मैं और बोलूंगा। इस विषय पर जितना कहा जाए कम है। यह ऐसा रहस्य है कि
Speaker A
इसे शब्दों में बांधना उस नदी को बांधने जैसा है जो सागर में मिलने जा रही है। फिर भी कुछ और आयाम खोलता हूं। मान लो तुम्हारी उम्मीदें केवल बड़ी चीजों तक सीमित नहीं है बल्कि वे छोटी-छोटी बातों में भी छिपी है। तुम सुबह सोते हो तो
Speaker A
उम्मीद करते हो कि तुम्हारी नींद अच्छी हो। तुम खाना खाते हो तो उम्मीद करते हो कि वो स्वादिष्ट हो। तुम बाहर जाते हो तो उम्मीद करते हो कि मौसम सुहाना हो। तुम अपने शरीर से उम्मीद करते हो कि वो बीमार
Speaker A
ना पड़े, बूढ़ा ना हो, मरे नहीं। ये छोटी-छोटी उम्मीदें एक जाल बनकर तुम्हें हर तरफ से घेर लेती हैं और तुम अंदर सांस लेने को तरस जाते हो। इसलिए मैं कहता हूं छोटी उम्मीदों से शुरू करो। आज रात जब सो
Speaker A
ये उम्मीद मत रखो कि सुबह होगी या नहीं। अगर होगी तो जागोगे नहीं तो इस जीवन की आखिरी नींद होगी। तो क्या हुआ? इस अनिश्चितता को गले लगाओ। जब तुम इस अनिश्चितता को स्वीकार करने लगोगे तो तुम्हारा भय घटेगा और भय के घटते
Speaker A
ही उम्मीद का आधार कमजोर होगा क्योंकि उम्मीद भय की बहन है। तुम किसी चीज की उम्मीद इसलिए करते हो क्योंकि तुम उसके ना मिलने से डरते हो। वो भय ही तुम्हें उम्मीद पर थामे रखता है। जब भय मिटता है
Speaker A
तो उम्मीद अपने आप विलीन होती है और सुकून अपने आप उत्पन्न होता है। जैसे सूरज निकलते ही अंधकार मिटता है। वैसे तुम कहते हो कि तो जीने का मतलब ही खत्म कर देगा। लेकिन तुम गलत हो। कि जीने को असली जीवन
Speaker A
बनाता है। अभी तुम सिर्फ अस्तित्व में हो। जीवन में नहीं। जीवन तो तब शुरू होता है जब तुम इतने स्वतंत्र हो कि हर पल का संपूर्ण आनंद उठा सको। बिना किसी चिंता के कि यह आनंद कब तक रहेगा? जब तुम पानी में
Speaker A
तैरते हो तो क्या तुम पूछते हो कि किनारा कितनी दूर है? अगर पूछते हो तो तैराकी का मजा खत्म हो जाता है। तुम्हारा पूरा शरीर तन जाता है और तुम डूबने लगते हो। लेकिन जो तैराक किनारे को भूल जाता है वो पानी
Speaker A
के साथ नृत्य करता है। वो उसका एक हिस्सा बन जाता है और उसी नृत्य में वो बिना थके बिना डरे किनारे तक पहुंच जाता है। यही उपमा है। उम्मीद वह किनारा है और सुकून वह नृत्य है जो किनारे को भूल जाता है। यहां
Speaker A
एक और सूक्ष्म बात है। तुम जिसे प्यार कहते हो वो भी उम्मीद से बैधा है। तुम किसी से प्यार करते हो और उम्मीद करते हो कि वह तुम्हारे प्यार को लौटाएं। अगर वह ना लौटाएं तो प्यार जहर बन जाता है।
Speaker A
ईर्ष्या बन जाता है। क्रोध बन जाता है। क्या ये प्यार है? नहीं। यह एक लेनदेन है। असली प्यार तो बिना शर्त का होता है। वो उम्मीद से मुक्त होता है। जब तुम किसी से इतना प्रेम करते हो कि उसके सुख-दुख दोनों
Speaker A
तुम्हारे लिए समान रूप से स्वीकार्य हो तब वो प्यार है। जब तुम किसी के रहने या जाने मुस्कुराने या रोने सफल होने या असफल होने पर समान रूप से शांत रहते हो तब वो प्रेम पराकाष्ठा पर है। और वही प्रेम तुम्हे उस
Speaker A
सुकून की ओर ले जाता है जिसकी हम बात कर रहे हैं। इसलिए सीखो उम्मीद मत रखो कि कोई तुमसे कैसा व्यवहार करें क्योंकि वह उसकी स्वतंत्रता है। उसे जैसा होना है वैसा होने दो। तुम तो बस प्रेम की धारा बनो।
Speaker A
बहती रहो। बिना शर्तों के बिना नियमों के, बिना अपेक्षाओं के। यह प्रेम ही तुम्हारा सबसे बड़ा सुकून बनेगा। क्योंकि अब किसी पर निर्भर नहीं होना पड़ता। सुकून सदा तुम्हारे भीतर है। किसी और की दया पर नहीं। अगर तुमने यह पा लिया तो तुम हर जगह
Speaker A
सुकून पाओगे। मंदिर में नहीं, मस्जिद में नहीं, गिरजा घर में नहीं बल्कि अपनी सांसों में, अपनी धड़कनों में, अपने खाली हाथों में तुम्हें कोई बाहरी स्थान नहीं खोजना पड़ेगा। तुम्हारा घर ही स्वर्ग हो जाएगा। तुम्हारा काम ही पूजा हो जाएगा।
Speaker A
तुम्हारा विश्राम ही समाधि हो जाएगी। यह कोई कल्पना नहीं है। यह उन सबका अनुभव है जिन्होंने एक बार अपनी उम्मीदों को देखा, उनकी मूर्खता को देखा और हंसते हुए उन्हें छोड़ दिया। वो हंसी ही सुकून की पहली किरण
Speaker A
है। और जब ये सुकून स्थिर हो जाता है। तुम क्या करते हो? तुम जीवन में कुछ भी कर सकते हो। क्योंकि अब तुम करता नहीं रहे। करता तो मर गया। अब तो केवल कर्म है। यह उस नर्तक जैसा है जो नृत्य में इतना खो
Speaker A
जाता है कि नर्तक रहता नहीं। केवल नृत्य बचता है। तुम्हारी सारी क्रियाएं ऐसी हो जाती है। सहज सुंदर पूर्ण तुम बिना उम्मीद के काम करते हो। इसलिए तुम्हारा हर काम प्रार्थना है। यही तो गीता में कृष्ण ने कहा कर्मणवाधिकारस्ते
Speaker A
मा फलेशु कदाचन फल पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं। मैं तो और गहरा कहता हूं। फल की उम्मीद भी मत करो। फल आएगा नहीं आएगा। कोई अंतर नहीं पड़ता। तुमने तो कर्म किया और वो कर्म अपने आप में इतना मूल्यवान है कि
Speaker A
उसे किसी फल की आवश्यकता नहीं। जब तुम किसी फूल को उसके सौंदर्य के लिए प्यार करते हो ना कि उसकी खुशबू के लिए तो वही प्यार सच्चा है। ठीक वैसे ही कर्म करो। मैं तुम्हें बताता हूं। इस दुनिया में सभी
Speaker A
दुख उम्मीद से पैदा होते हैं। भूख से दुख नहीं होता। दुख तो भूख मिटाने की उम्मीद से होता है। अगर भूख हो और पता ना हो कि खाना मिलेगा तो तुम बस भूख को स्वीकार कर लेते हो। और वो दुख नहीं रहती। प्यास से
Speaker A
दुख नहीं। प्यास बुझाने की उम्मीद से दुख है। गरीबी से दुख नहीं। अमीर होने की उम्मीद से दुख है। बुढ़ापे से दुख नहीं। जवान रहने की उम्मीद से दुख है। मृत्यु से दुख नहीं। अमर होने की उम्मीद से दुख है।
Speaker A
इसलिए जो भी दुख है वो उम्मीद की छाया है। उम्मीद जितनी बड़ी दुख उतना गहरा। तो क्या हम कहें कि छोटी उम्मीद रखो? नहीं। मैं कहता हूं उम्मीद ही मिटा दो। छोटी या बड़ी। दोनों जहर है। एक कम मात्रा में जहर
Speaker A
दूसरा अधिक मात्रा में। लेकिन दोनों मारते हैं। और जब उम्मीद मिटती है तो तुम्हारे भीतर एक अद्भुत शून्यता बनती है। खालीपन नहीं, शून्यता। यह अंतर बड़ा है। खालीपन में तुम्हें कमी महसूस होती है। शून्यता में परिपूर्णता छिपी होती है। यह शून्यता
Speaker A
उस आकाश की तरह है जो बादलों के हटने पर अपनी विशालता दिखाता है। यह शून्यता ध्यान है। यह शून्यता मौन है। यह शून्यता परमानंद का द्वार है। जितना तुम इस शून्यता में जीते हो, उतना ही तुम भय से
Speaker A
मुक्त होते हो। क्योंकि भय तो केवल तब होता है जब तुम्हारे पास कुछ है और तुम उसे खोने से डरते हो। जब तुम शून्य हो तो क्या खोना? कुछ नहीं। तब पूरा ब्रह्मांड तुम्हारा हो जाता है क्योंकि तुम्हारा कुछ
Speaker A
नहीं है और सब कुछ तुम्हारा है। यह विरोधाभास सुंदर है। जो कुछ नहीं चाहता उसके पास सब कुछ है। और अब इस सुकून का एक और आयाम जब उम्मीदें नहीं होती तो तुम अपने आसपास की दुनिया को बिल्कुल नई नजर
Speaker A
से देखते हो। तुम किसी पेड़ को नहीं कहते। तुम बड़े फल दो, तुम छाया दो, तुम लकड़ी दो। तुम बस उस पेड़ को उसकी सुंदरता के लिए देखते हो, उसके अस्तित्व के लिए। और जब तुम उस पेड़ के साथ कोई लेनदेन का
Speaker A
रिश्ता नहीं रखते, तो वो पेड़ तुमसे और भी बड़ा रिश्ता जोड़ता है। प्रेम का रिश्ता, कृतज्ञता का रिश्ता। वही रिश्ता तुम्हें दुनिया के सभी प्राणियों से जोड़ता है। और वही रिश्ता सुकून को स्थाई बनाता है। क्योंकि अब तुम इस दुनिया के मालिक नहीं
Speaker A
बनना चाहते। तुम तो इस दुनिया के प्रेमी बन जाते हो। मालिक हमेशा चिंतित रहता है। प्रेमी हमेशा शांत। अगर तुम यह सब समझ भी गए, तो यह अनुभव में ना आए, तो बेकार है। मैं तुम्हें एक प्रयोग बताता हूं। आज से
Speaker A
कुछ दिनों के लिए हर सुबह उठकर कुछ भी करने से पहले अपने मन से कहो आज मैं किसी चीज की उम्मीद नहीं रखूंगा। आज जो होगा होने दूंगा। फिर पूरा दिन इसी भावना में जियो। बिना किसी अपेक्षा के खाना खाओ।
Speaker A
बिना किसी अपेक्षा के काम करो। बिना किसी अपेक्षा के लोगों से मिलो। दिन के अंत में जब शाम को बैठो तो देखो तुमने कितनी ऊर्जा बचाई। कितने विचार बचे। कितनी चिंता कम हुई। तुम पाओगे कि सुकून तुम्हारे भीतर
Speaker A
बिना बुलाए आ गया है। यह एक छोटा सा प्रयोग हैं। लेकिन इसका प्रभाव बहुत गहरा है। यह जो मैं कह रहा हूं, यह कोई नया उपदेश नहीं है। बुद्ध ने इसे निर्वाण कहा, महावीर ने केवल ज्ञान कहा, कृष्ण ने योग
Speaker A
कहा, ईशा ने राज्य कहा, सूफियों ने फना कहा। सबने यह भी कहा है कि अपनी इच्छाओं का नाश अपनी आशाओं का त्याग ही मोक्ष का द्वार है। मैं बस उसी सनातन सत्य को तुम्हारी भाषा में तुम्हारी समझ के अनुकूल कह रहा हूं।
Speaker A
क्योंकि जब उम्मीदें मर जाती हैं तो तुम नहीं मरते। तुम तो पहली बार जीवित होते हो। उस जीवन को जीने का नाम ही सुकून है। ना स्वर्ग का लालच ना नर्क का भय बस यहां और अभी इस पल का आनंद
Speaker A
इससे बड़ा कोई धर्म नहीं। इससे बड़ा कोई साधना नहीं। क्या तुमने कभी किसी बच्चे को देखा है? उसमें उम्मीद होती है वो खिलौना छीन लो तो वो रोता है पर अगले ही पल किसी और खिलौने में मस्त हो जाता है। वो उम्मीद
Speaker A
नहीं रखता कि ये खिलौना हमेशा रहेगा। वो बस खेलता है। यही बचपन की सुंदरता है। यही जीवन की सच्चाई है। उम्मीदों का बोझ तुमने बड़े होते हुए अपने ऊपर लाद लिया। समाज ने तुम्हें सिखाया कि बचकाना मत बनो।
Speaker A
जिम्मेदार बनो। योजना बनाओ। परिणाम सोचो। और उसी दिन से तुम्हारा सुकून मर गया। मैं कहता हूं फिर से बच्चे बन जाओ वही सहजता वही निश्चिंतता वही हां और जब तुम बच्चे बन जाओगे तो तुम पाओगे कि उम्मीद की कोई
Speaker A
जरूरत नहीं क्योंकि इस वक्त इसी पल जीवन अपनी पूर्णता में उपलब्ध है। तो क्या करना है? कुछ नहीं। बस चुप हो जाओ। अपने मन की बकवास बंद करो। जो कह रही है ये होना चाहिए। वो नहीं होना चाहिए। इस बकवास को
Speaker A
रोको और देखो देखते ही वहां सुकून है। देखते ही वहां प्रकाश है। देखते ही वहां जीवन है। और जब तुम देख लोगे तो तुम हंसोगे कि कितनी बड़ी भूल कर रहे थे। कितनी व्यर्थ की दौड़ में लगे थे। वो हंसी
Speaker A
तुम्हारी मुक्ति होगी। मैं इतना ही कहूंगा। यह मेरा अनुभव है, मेरी साक्षी है। मैंने उम्मीदों को जलते देखा है और उसी जलन से सुकून को पनपते देखा है। यह कोई सिद्धांत नहीं। यह जीवन का रस है। अगर तुम इसे पी लो तो फिर कुछ और कहने की
Speaker A
जरूरत नहीं। इसलिए अब शब्द बंद हो सकते हैं। क्योंकि सत्य तो मौन में है। पर तुमने कहा तो मैं अभी और बोलूंगा और बहुत बोलूंगा। पर याद रखना हर शब्द तुम्हें उस मौन के करीब लाने के लिए है। दूर ले जाने
Speaker A
के लिए नहीं। क्योंकि आखिरी सत्य शब्दों से बैधता नहीं। शब्द तो सिर्फ उंगली है जो चांद की तरफ इशारा करती है। मेरी बातें सुनो पर उंगली को मत पकड़ो। चांद को देखो। वो चांद है। तुम्हारा सुकून। अब एक और
Speaker A
गहरी बात। जब तुम उम्मीद छोड़ते हो तो क्या होता है? क्या तुम बेहोश हो जाते हो?
Speaker A
नहीं। तुम होश के शिखर पर पहुंच जाते हो। क्योंकि उम्मीद एक प्रकार का गहन अज्ञान है। तुम जानते नहीं क्या होगा। फिर भी तुम कल्पना करते हो। जब यह कल्पना टूटती है तो तुम्हें अपनी अज्ञानता का एहसास होता है।
Speaker A
पर यह एहसास ही ज्ञान की पहली सीढ़ी है। और जैसे-जैसे तुम इस एहसास में डूबते हो तुम देखते हो कि जानना वास्तव में जानना नहीं बल्कि अज्ञान को स्वीकार करना है। यह स्वीकृति ही सुकून की नीव है। जो यह जान
Speaker A
लेता है कि वो कुछ नहीं जानता वही सब कुछ जानता है। क्योंकि ब्रह्मांड का नियम इतना विशाल है। इतना रहस्यमई है कि वो किसी छोटी बुद्धि के दायरे में नहीं आ सकता। जब तुम कहते हो मुझे पता है कि कल क्या होगा
Speaker A
तो तुम अपनी बुद्धि को ब्रह्मांड से बड़ा मान रहे हो। ये अहंकार है जब तुम कहते हो मुझे नहीं पता। और मुझे जानने की भी कोई उम्मीद नहीं। तो तुम ब्रह्मांड के समक्ष नतमस्तक हो जाते हो। और यही नम्रता
Speaker A
तुम्हें उसके संगीत से जोड़ती है। वो संगीत ही सुकून है। और सुकून ही क्यों? इस उम्मीद मुक्त अवस्था में तुम्हारी क्षमताएं भी अलौकिक हो जाती हैं। क्योंकि अब तुम्हारा मन शांत है। उसमें कोई हलचल नहीं है। इसलिए वो स्पष्ट दर्पण बन जाता
Speaker A
है। उस दर्पण में जो कुछ भी पड़ता है वो अपनी सच्चाई में प्रतिबिंबित होता है। विकृत नहीं। तुम लोगों को उनकी वास्तविकता में देखते हो। स्थितियों को उनके यथार्थ में देखते हो। अपने आप को अपनी नग्नता में देखते हो। और इस नग्न दृष्टि में कोई भ्रम
Speaker A
नहीं होता। इसलिए कोई निराशा नहीं होती। कोई दुख नहीं होता। यह वही है जिसे जैन कहते हैं। सूर्य की तरह स्पष्ट, आकाश की तरह विशाल। जब तुम इस अवस्था में होते हो तो तुम्हारा हर कार्य इतना सम्यक होता है
Speaker A
कि वो अपने आप में एक चमत्कार होता है। तो क्या किसी को यह सब अनुभव किया है? हां। हर उस व्यक्ति ने जो जागा है। तुम भी अपने जीवन में कुछ ऐसे क्षण तो याद करोगे। जब तुम किसी बड़े संकट में थे और अचानक तुमने
Speaker A
हार मान ली। सब उम्मीद छोड़ दी और फिर वहां से कुछ ऐसा घटित हुआ जो अप्रत्याशित था। वह क्षण जब तुम निराश होकर बैठ गए और दुनिया ने तुम्हें थाम लिया। वही तुम्हारा सुकून का झलक था। लेकिन तुमने उसे पकड़ा
Speaker A
नहीं। तुम फिर उम्मीदों में भाग गए। मैं कहता हूं उन क्षणों को याद करो। उस शून्यता को पहचानो और उसे अपने जीवन का आधार बनाओ। यह मुश्किल नहीं क्योंकि यह तुम्हारा अनुभव है। कोई पराई बात नहीं। और देखो
Speaker A
समाज राजनीति धर्म परिवार यह सारी व्यवस्थाएं तुम्हें उम्मीदों पर कायम रखना चाहती है क्योंकि उम्मीद से भरा इंसान ही नियंत्रण में रहता है। निराश इंसान खतरनाक होता है और उम्मीद मुक्त इंसान तो सबसे खतरनाक होता है। उसे अब कोई
Speaker A
डर नहीं होता। कोई लालच नहीं होता। उसे बेचा नहीं जा सकता। ठगा नहीं जा सकता। इसलिए यह सारी व्यवस्थाएं चाहती हैं कि तुम आशावान बने रहो ताकि तुम कल के लिए काम करते रहो। आज को अनदेखा करते रहो। और
Speaker A
तुम उसी जाल में फंसे हो। लेकिन जो आदमी अपनी उम्मीदें तोड़ लेता है वो किसी का गुलाम नहीं रहता। वो आजाद हो जाता है पूरी तरह आजाद और उस आजादी में सुकून तो मिलेगा ही बल्कि वो जीवन को एक नई दृष्टि से भी
Speaker A
देखता है जहां सब कुछ न्यायसंगत है। सब कुछ उचित है क्योंकि वहां कोई उचित और अनुचित का द्वंद्व ही नहीं रहता। यह द्वंद उम्मीद से ही पैदा होता है। तुम चाहते हो कि अच्छा हो इसलिए बुरा दिखता है। तुम सुख
Speaker A
चाहते हो इसलिए दुख दिखता है। जब तुम कुछ नहीं चाहते तो ना अच्छा है ना बुरा बस है। ये है इतना सुंदर है कि उसमें सब कुछ समाया है। सुख भी दुख भी जन्म भी मृत्यु भी। और वह सब मिलकर एक रस बन जाता है। उस
Speaker A
रस का नाम है परमानंद और वही परमानंद ही सुकून का पर्याय है। अब ये सब तुम्हें सिद्धांत लग सकता है। पर ये सिद्धांत नहीं ये तो साक्षात्कार है। इसे पाने के लिए तुम्हें कोई पहाड़ पर जाने की जरूरत नहीं। बस एक क्षण के लिए बैठो। अपनी
Speaker A
सांसे गिनो और देखो कि वे बिना किसी उम्मीद के आती जाती है। वे नहीं कहती मुझे अगली सांस मिलेगी। बस वे आती है। उसी विश्वास उसी समर्पण में डूब जाओ। यही तो उम्मीद छोड़ने का पहला कदम है। अपने शरीर
Speaker A
के उस हिस्से पर भरोसा करना जो बिना किसी उम्मीद के काम कर रहा है। मैं अब और आगे बढ़ता हूं। उम्मीदें न केवल बाहरी दुनिया से जुड़ी होती हैं, बल्कि वे तुम्हारे भीतर की दुनिया से भी जुड़ी होती हैं। तुम
Speaker A
उम्मीद करते हो कि तुम दयालु बनोगे, शांत बनोगे, ध्यान मग्न बनोगे। ये भी उम्मीद है। और ये उम्मीद भी तुम्हें बांधेगी। जब तुम ध्यान करने बैठते हो और मन शांत नहीं होता तो निराश होते हो। क्योंकि तुमने उम्मीद की थी कि आज मन शांत होगा।
Speaker A
यह सोचो जिस बात के लिए तुम बैठे हो उसी के विरोधी परिणाम से तुम क्यों परेशान होते हो? अगर तुम ध्यान में बैठकर यह उम्मीद ही ना रखो कि कुछ होगा तो जो होगा वही ध्यान है। जो हो रहा है उसका साक्षी
Speaker A
बनना ही ध्यान है। तो उम्मीद ने तुम्हारे ध्यान को भी बर्बाद कर दिया। इसलिए ध्यान में भी उम्मीद छोड़ो। प्रार्थना में भी उम्मीद छोड़ो। ईश्वर की खोज में भी उम्मीद छोड़ो। क्योंकि ईश्वर तो वही है जहां उम्मीद नहीं है। जहां उम्मीद है वहां
Speaker A
ईश्वर नहीं है। क्योंकि उम्मीद भविष्य में है। ईश्वर वर्तमान में है। यहां मैं एक और सूक्ष्म बात कहता हूं। उम्मीद छोड़ने का मतलब यह नहीं कि तुम जीवन में निर्देशित नहीं हो। निर्देशन और उम्मीद में अंतर है। निर्देशन एक कला है। तुम एक दिशा चुन सकते
Speaker A
हो। लेकिन उसके फल से मत जुड़ो। तुम एक पेड़ लगा सकते हो। उसे पानी दे सकते हो, खाद दे सकते हो लेकिन उसके फल आने की उम्मीद मत करो। क्योंकि हो सकता है कि मौसम उसके अनुकूल ना हो। हो सकता है कि
Speaker A
कोई कीड़ा लग जाए। हो सकता है कि पेड़ फल ना दे। फिर भी तुमने अपना कर्म किया। और कर्म करने में ही सुकून है। ना कि उसके फल में दिशा होने से तुम भटकते नहीं। लेकिन उम्मीद ना होने से तुम दुखी नहीं होते।
Speaker A
यही संतुलन है। एक साधु का कर्म, एक राजा का कर्म, एक गृहस्थ का कर्म, सभी एक जैसे हो जाते हैं, जब वे बिना उम्मीद के होते हैं। फिर चाहे तुम राजपाट करो या भिक्षाटन। दोनों में समान शांति होती है।
Speaker A
और जब ये शांति स्थाई हो जाती है तो वही तुम्हारी सच्ची पहचान होती है। अब तुम दूसरों से अपनी तुलना नहीं करते क्योंकि तुलना उम्मीद से पैदा होती है। मुझे भी वैसा बनना है। मुझे भी वो पाना है। जब
Speaker A
तुलना नहीं होती तो ईर्ष्या नहीं होती। प्रतिस्पर्धा नहीं होती। और ना ही कोई हीनता या श्रेष्ठता का भाव होता है। तुम बस हो। अपने पूरे स्वरूप में अपनी संपूर्णता में और संपूर्ण होने का एहसास ही सबसे बड़ा सुकून है। तब तुम किसी से यह
Speaker A
नहीं कहते तुम मुझे स्वीकार करो। क्योंकि तुम अपने आप को स्वीकार कर चुके हो। और यह आत्म स्वीकृति ही सुकून की जड़ है। अब जरा उल्टी बात करते हैं। क्या उम्मीद कभी काम आई है? क्या किसी उम्मीद ने सच में
Speaker A
तुम्हें सुख दिया है? एक बार तो नहीं। उम्मीद ने तुम्हें क्षणिक उत्तेजना दी। एक चमक दी। जैसे बिजली चमकती है और फिर अंधेरा और भी गहरा हो जाता है। वही उम्मीद की चमक थी। सच्चा सुकून तो वो है जो किसी चमक पर
Speaker A
निर्भर नहीं। जो स्थाई है जो बिना किसी कारण के उपस्थित है। क्या तुम बिना किसी कारण के खुश हो सकते हो? यही कसौटी है। जब तुम्हें पता हो कि आज मुझे कोई पुरस्कार मिलेगा। इसलिए मैं खुश हूं। तो यह खुशी
Speaker A
नहीं। ये एक लेनदेन है। असली खुशी तो वो है जो बिना किसी वजह के फूटे। जैसे फवारा बिना किसी बाहरी कारण के और वही खुशी सुकून है। इसे पाने के लिए तुम्हें अपनी सारी वजहों को, सारी शर्तों को, सारी
Speaker A
उम्मीदों को एक तरफ रखना होगा। ये जो मैं कह रहा हूं ये कोई उदासी का उपदेश नहीं है। ये तो परम उत्सव की घोषणा है। क्योंकि जब उम्मीद मरती है तो जीवन जन्मता है। असली जीवन जो रोज मरता नहीं। जो हर पल नया
Speaker A
होता है। और उस जीवन में हर दिन एक नया जन्म है। हर क्षण एक नई शुरुआत है। तुम बिना किसी बोझ के उठते हो। बिना किसी चिंता के खाते हो। बिना किसी भय के सोते हो। यही तो स्वर्ग है। और यह स्वर्ग कहीं
Speaker A
और नहीं यह तुम्हारे भीतर है। इसे ढूंढने के लिए बाहर मत भागो। बस भीतर उतरो। जहां उम्मीदें नहीं है। जहां केवल मौन है, केवल शून्यता है, केवल प्रकाश है। वहां तुम पाओगे कि सुकून तुम्हारा स्वभाव है। कोई बाहरी प्राप्ति नहीं। और तुम्हें हैरानी
Speaker A
होगी। जब तुम सुकून में जीने लगोगे तो तुम्हारे आसपास के लोग भी अजीब तरह से प्रभावित होंगे। क्योंकि सुकून संगामक है। जब कोई बिना उम्मीद के, बिना तनाव के, बिना चिंता के तुम्हारे सामने बैठता है तो तुम भी उसकी ऊर्जा को महसूस करते हो।
Speaker A
वह आदमी जो पूरी तरह वर्तमान में है, अपनी उपस्थिति से ही दूसरों को ठीक कर देता है। इसलिए यह सुकून केवल तुम्हारा निजी लाभ नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए एक वरदान है। तुम जितना शांत होगे, उतनी शांति तुम
Speaker A
चारों ओर बिखेरोगे। और यही तो सच्ची सेवा है, सच्ची भक्ति है, सच्ची करुणा है। बुद्ध शांत बैठे रहते थे। और उनकी शांति ही हजारों लोगों को बदल देती थी। उन्होंने कोई उपदेश नहीं दिया, कोई उम्मीद नहीं दी। बस उनका होना ही काफी
Speaker A
था। तुमने देखा होगा जीवन में कई बार ऐसा होता है कि जब तुम किसी चीज को पाने की पूरी कोशिश करते हो तो वह तुमसे दूर भागती है और जब तुम उसे छोड़ देते हो तब वो तुम्हारे पास आती है। यह कोई संयोग नहीं
Speaker A
है। यह जीवन का मूल नियम है। उम्मीद का अर्थ ही है। पकड़ने की कोशिश करना। और जो भी पकड़ा जाता है वो जीवित नहीं रहता। फूल को पकड़ने की कोशिश करो तो वह मुरझा जाता है। पानी को पकड़ने की कोशिश करो तो वह
Speaker A
उंगलियों से फिसल जाता है। जीवन को पकड़ने की कोशिश करो तो वो रुक जाता है। मृत हो जाता है। उम्मीद वही पकड़ है। वही दबाव है। इसलिए जिस दिन तुम यह दबाव छोड़ते हो उस दिन जीवन अपनी पूरी शक्ति के साथ
Speaker A
तुम्हारे भीतर प्रवाहित होता है। वो प्रवाह ही सुकून है। अब एक और बात ये सुकून जो उम्मीद छोड़ने पर मिलता है वो कोई निष्क्रिय अवस्था नहीं है। ये तो एक अत्यंत सक्रिय अवस्था है। जिसमें तुम अपने भीतर की सारी ऊर्जा के साथ जीवन को जीते
Speaker A
हो। बिना किसी रोक-टोक के तुमने कभी किसी नदी को देखा है? वो बिना किसी उम्मीद के सागर में मिलने की बहती है। पर रास्ते में वह पेड़ों को सींचती है। पत्थरों को निखारती है। खेतों को उपजाऊ बनाती है। वो
Speaker A
अपने कर्म में इतनी मग्न है कि उसे फल की चिंता नहीं। फिर भी उसका फल सबसे बड़ा होता है। वो सारी सृष्टि को जीवन देती है। ठीक वैसे ही जब तुम बिना उम्मीद के कर्म करते हो तो तुम्हारा कर्म न केवल तुम्हें
Speaker A
सुकून देता है बल्कि वो पूरे विश्व के लिए कल्याणकारी बन जाता है। यही तो गीता की शिक्षा है। लोक संग्रह लोगों का हित जो बिना आसक्ति के कर्म से ही संभव है। और आसक्ति क्या है? आसक्ति उम्मीद का ही दूसरा नाम है। जब तुम किसी
Speaker A
से आसक्त होते हो तो तुम उससे उम्मीद करते हो कि वो तुम्हें खुश करें। तुम्हारी जरूरतें पूरी करें। तुम्हारा अकेलापन दूर करें। जब वो ऐसा नहीं करता तो तुम दुखी होते हो। लेकिन अगर तुम बिना आसक्ति के प्रेम करो जिसे मैं प्रेम कहता हूं ना कि
Speaker A
लगाव। तो वहां कोई उम्मीद नहीं होती। तुम बस प्रेम करते हो क्योंकि प्रेम करना तुम्हारा स्वभाव है। जैसे सूरज का प्रकाश देना स्वभाव है। सूरज नहीं कहता मैं तुम्हें रोशनी दूंगा। बसशर्ते तुम मुझे वापस रोशनी दो। वो तो बस देता है। और उसी
Speaker A
देने में उसका सुकून है। जब तुम भी बिना शर्त के देना सीख जाते हो। चाहे वो प्रेम हो, समय हो, सेवा हो या ज्ञान तो तुम सुकून में रहते हो। क्योंकि अब कोई ऋण नहीं, कोई अपेक्षा नहीं, कोई निराशा नहीं।
Speaker A
यह बात सुनने में सरल है पर करने में अत्यंत कठिन लगती है। क्योंकि हमें अपने पूरे जीवन में यही सिखाया गया है कि लेनदेन ही रिश्तों का आधार है। पर सत्य यह है कि लेनदेन व्यापार है, प्रेम नहीं। और
Speaker A
जीवन व्यापार नहीं यह एक उत्सव है। उस उत्सव में भाग लेने के लिए तुम्हें अपने व्यापारिक मानसिकता को छोड़ना होगा। तुम्हें उस बच्चे की तरह बनना होगा, जो समुद्र के किनारे खड़ा होकर लहरों को देखता है। बिना यह सोचे कि लहरें उसे क्या
Speaker A
दे सकती हैं। बस उस दृश्य में खो जाना ही सुकून है। मुझे पता है। तुम सोचोगे ये तो बहुत कठिन है। हम इंसान हैं। हमें तो अपने कर्मों का फल चाहिए। हमें तो जीविका चलानी है। परिवार पालना है। मैं तुमसे कहता हूं।
Speaker A
यह सब ठीक है। पर इसे करते हुए उम्मीद मत रखो कि परिणाम तुम्हारे अनुकूल ही होगा। तुम अपना कर्तव्य निभाओ पूरी शिद्दत से, पूरी ईमानदारी से लेकिन फल को ईश्वर पर, विधाता पर या जिसे तुम मूर्ति कहते हो उस
Speaker A
पर छोड़ दो। यही तो समर्पण है। यही तो प्रार्थना है। प्रार्थना का मतलब यह नहीं कि तुम ईश्वर से कुछ मांगो। प्रार्थना का मतलब है अपनी सारी चिंताएं, सारी उम्मीदें उसके चरणों में रख देना और फिर शांत हो
Speaker A
जाना। प्रार्थना उम्मीद के विपरीत है। जो मांगता है वो व्यापारी है। जो समर्पित है वो भक्त है। और भक्त को सुकून मिलता है। व्यापारी को केवल लेनदेन। अब मैं तुम्हें उम्मीद की एक और जड़ से परिचित कराता हूं। वो है अतीत से तुलना।
Speaker A
तुम कहते हो पिछली बार ऐसा हुआ था तो अब ऐसा होना चाहिए यह उम्मीद है या पहले मुझे दुख मिला था अब सुख मिलना चाहिए यह भी उम्मीद है तुम अतीत को आधार बनाकर भविष्य का निर्माण करते हो पर अतीत तो मर चुका है
Speaker A
और भविष्य अभी पैदा नहीं हुआ तुम दोनों के बीच में फंसे हो बिल्कुल बीच में और वहां सुकून कैसे आ सकता है सुकून तो वर्तमान में है जहां अतीत की छाया नहीं भविष्य का बोझ नहीं यदि तुम अतीत की यादों को जाने दो और
Speaker A
भविष्य की चिंताओं को तो तुम पाओगे कि वर्तमान इतना विशाल है, इतना गहन है कि उसमें सुकून स्वतः विद्यमान है। यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है। क्या उम्मीद छोड़ने का मतलब यह है कि हम अपने लक्ष्यों को छोड़ दें? अपने सपनों को मार डालें?
Speaker A
नहीं। मैं यह नहीं कहता। सपने देखना मानव का स्वभाव है और वो सुंदर है। पर उन सपनों से चिपकना यह सोचना कि उनके बिना मेरा जीवन अधूरा है। ये उम्मीद है। तुम सपना देख सकते हो पर वो सपना तुम्हारे ऊपर हावी
Speaker A
ना हो। तुम दिशा चुन सकते हो। पर रास्ते में आने वाली बाधाओं और विचलनों को भी स्वीकार कर सकते हो। जो आदमी अपने सपने को इतनी मजबूती से पकड़ता है कि रास्ते की सुंदरता को भूल जाता है। वो सुकून खो देता
Speaker A
है। लेकिन जो सपना देखते हुए भी हर कदम का आनंद लेता है। उसे सुकून कभी नहीं छोड़ता। तुमने कभी यात्रा की है। कोई लंबी यात्रा?
Speaker A
यात्रा का आनंद तब है जब तुम मंजिल को भूलकर रास्ते के दृश्यों, गंधों, ध्वनियों का आनंद लो। यदि तुम बस यह सोचते हो कि मुझे जल्दी पहुंचना है, कितनी देर लगेगी तो तुम पूरी यात्रा को बर्बाद कर देते हो और जब
Speaker A
पहुंचते भी हो तो पाते हो कि वहां भी कुछ खास नहीं है। क्योंकि तुम मंजिल पर पहुंचकर फिर कोई नई यात्रा की उम्मीद करने लगते हो। यह अनंत दौड़ है। इसे तोड़ो। रास्ते को ही मंजिल बनाओ। उसी में सुकून
Speaker A
छिपा है। और ये सुकून का एक और रहस्य है। जब तुम उम्मीद छोड़ते हो तो तुम्हें आश्चर्यजनक रूप से बहुत कुछ मिलता है जिसकी तुमने उम्मीद भी नहीं की थी। क्योंकि ब्रह्मांड उदार है। वो सदा देता है। लेकिन जब तुम उम्मीदों से भरे होते
Speaker A
हो, तो तुम्हारा हाथ इतना भरा होता है कि ब्रह्मांड कुछ और रखने के लिए जगह नहीं पाता। जब तुम खाली हाथ होते हो तो ब्रह्मांड तुम्हें अमूल्य उपहारों से भर देता है। यही उसका नियम है। शून्यता ही ग्रहणशीलता है। जिसमें उम्मीदें नहीं वो
Speaker A
सब कुछ पा सकता है। इसलिए संत कहते हैं मैं खाली हूं इसलिए मैं भरा हूं। यह विरोधाभास तुम्हें समझना चाहिए। आइए अब हम थोड़ा गहरे उतरे। मनोविज्ञान के स्तर पर उम्मीद तुम्हारे मन का एक रक्षा तंत्र है। जब भी तुम अनिश्चितता का सामना करते हो
Speaker A
तुम उम्मीद को बुलाते हो। जैसे कोई बच्चा अंधेरे में किसी को पुकारता है। पर यह पुकार स्वयं ही अंधेरे को बढ़ाती है। जब तुम उम्मीद नहीं करते तो तुम अनिश्चितता को वैसे ही स्वीकार कर लेते हो। और वो
Speaker A
अनिश्चितता अब भयानक नहीं लगती। क्योंकि भय तो उम्मीद टूटने के डर से पैदा होता है। अगर उम्मीद ही नहीं तो टूटने का प्रश्न ही नहीं उठता। फिर कोई भी परिणाम स्वागत योग्य होता है। यह वही अवस्था है जिसे संतोष कहते हैं। पर संतोष कोई दबी
Speaker A
हुई आशा नहीं है। वो तो पूर्ण स्वीकृति है। जो भी हो उसे स्वीकार करने की क्षमता ही सुकून का आधार है। मैं तुम्हें एक और उदाहरण देता हूं। एक बीज को देखो। उसे कोई उम्मीद नहीं होती कि वह वृक्ष बनेगा। पर
Speaker A
वह अपनी पूरी क्षमता से अंकुरित होता है। उसे पता नहीं होता कि वह आम का पेड़ होगा या नीम का। पर वो बिना किसी हिचकिचाहट के उगता है। और अगर कोई पत्थर उसके ऊपर पड़ जाए तो वह पत्थर को हटाने की उम्मीद नहीं
Speaker A
करता बल्कि उसके चारों ओर से रास्ता निकाल लेता है। वो बीज हार नहीं मानता पर वो उम्मीद भी नहीं रखता। वह बस करता है अपना कर्म। वह प्रकृति के साथ सहयोग करता है। विरोध नहीं। इसलिए वह सफल होता है। तुम भी
Speaker A
वैसे ही बनो। बिना किसी उम्मीद के अपना कर्म करो और देखो कैसे तुम हर बाधा को पार कर जाते हो। यही जीवन की कला है। क्या तुमने कभी सोचा है कि उम्मीद तुम्हारी ऊर्जा को कैसे चूस लेती है? तुम एक काम
Speaker A
शुरू करते हो और उसके परिणाम के बारे में सोच-सच कर इतने थक जाते हो कि काम करने की शक्ति ही नहीं रहती और जब काम अधूरा रहता है तो उम्मीद और बढ़ जाती है कि कल पूरा कर लूंगा। ये एक दुश्चक्र है। इस दुचक्र
Speaker A
को तोड़ो। काम करो पर उसके परिणाम को भगवान को समर्पित करो। जैसे किसान खेती करता है, वह बीज बोता है, पानी देता है, निराई करता है पर फसल होगी या नहीं यह मौसम पर निर्भर है। वो मौसम से लड़ नहीं
Speaker A
सकता। वो तो बस अपना कर्म कर सकता है। और जब वो ऐसा करता है तो उसे सुकून रहता है। चाहे फसल अच्छी हो या खराब। यही किसान का ज्ञान है। यही जीवन का ज्ञान है। मैं यहां और कहूंगा तुम्हारी सबसे बड़ी उम्मीद
Speaker A
स्वयं तुम्हारी पहचान के साथ जुड़ी है। तुम उम्मीद करते हो कि लोग तुम्हें अच्छा, बुद्धिमान, सफल, सुंदर, प्रतिभाशाली माने। तुम इस अच्छे व्यक्ति के पीछे दौड़ते हो और जब कोई तुम्हारी आलोचना करता है तो तुम बिखर जाते हो। क्योंकि तुम्हारी उम्मीद
Speaker A
टूट गई। लेकिन जो व्यक्ति अपनी पहचान की उम्मीद छोड़ देता है यानी जो ना तो अच्छा बनना चाहता है ना बुरा। वो किसी के द्वारा चोट नहीं खा सकता। वो हर किसी के सामने नग्न सत्य की तरह खड़ा रहता है। उसे किसी की
Speaker A
वाहवाह नहीं चाहिए। किसी की निंदा से डर नहीं लगता। यही सच्ची स्वतंत्रता है। यही सुकून है। इसलिए अपनी सारी सामाजिक अपेक्षाओं को अपनी छवि को दीवार पर टांग कर रख दो। उसे तोड़ो। वहां कोई तुम्हारी उम्मीद नहीं। केवल तुम हो। जैसे हो वैसे
Speaker A
हो। और जैसे हो वैसे ही तुम परम सुंदर हो। और बात करें सुकून शब्द की यह एक सकारात्मक अनुभूति है पर यह रोमांच से अलग है। रोमांच तो एक आवेश है। एक हलचल है जो क्षणिक है और फिर समाप्त हो जाता
Speaker A
है। सुकून एक गहरा ठहराव है। एक ऐसी तरंग जो नीचे बहती है जहां कोई तूफान नहीं पहुंचता। जब तुम रोमांच के पीछे दौड़ते हो तो तुम हमेशा असंतुष्ट रहते हो। क्योंकि रोमांच कभी स्थाई नहीं होता। पर जब तुम
Speaker A
सुकून में बसते हो तो वो तुम्हारा घर बन जाता है। वहां हर दिन एक नया दिन होता है। फिर भी वो स्थाई होता है। इस सुकून को पाने के लिए तुम्हें बाहरी घटनाओं को बदलने की जरूरत नहीं। तुम्हें तो अपनी
Speaker A
आंतरिक प्रतिक्रिया को बदलना है। और वो प्रतिक्रिया बदलती है। जब तुम उम्मीदों को हटाते हो। यह सरल गणित है। कम उम्मीद, अधिक शांति, शून्य उम्मीद, अनंत शांति। अब मैं तुमसे एक और सवाल पूछता हूं। क्या तुमने कभी किसी ऐसे व्यक्ति को देखा है जो बहुत
Speaker A
बीमार था और उसने इलाज की सारी उम्मीद छोड़ दी? और फिर चमत्कारिक रूप से ठीक हो गया। ऐसा होता क्यों है? क्योंकि जब उम्मीद छूटती है तो तनाव छूटता है और तनाव ही रोग का प्रमुख कारण है। जब तुम उम्मीद
Speaker A
छोड़ते हो तो तुम्हारा शरीर रिलैक्स हो जाता है और उस रिलैक्सेशन में शरीर की अपनी उपचार शक्ति काम करने लगती है। यह कोई रहस्य नहीं यह चिकित्सा का सिद्धांत है। इसलिए मैं कहता हूं बीमारी से मत डरो उम्मीद से डरो। बीमारी शरीर को कमजोर करती
Speaker A
है, पर उम्मीद मन को कमजोर करती है। और मन कमजोर हो तो शरीर कैसे मजबूत रहे। तो उम्मीद छोड़ो। तब तुम्हारी जीवनी शक्ति स्वतः जागृत होगी और वही तुम्हें स्वस्थ भी करेगी और सुकून भी देगी। यह बात केवल
Speaker A
बीमारी पर ही लागू नहीं होती। रिश्तों, नौकरी, धन हर चीज पर लागू होती है। जब तुम किसी समस्या को सुलझाने के लिए उम्मीदों का सहारा लेते हो तो तुम उस समस्या को और जटिल बनाते हो। लेकिन जब तुम शांत होकर
Speaker A
बिना किसी उम्मीद के साक्षी भाव से उसे देखते हो तो समाधान स्वतः उभरता है। क्योंकि जब मन शांत होता है तो वो स्पष्ट होता है और स्पष्टता ही समाधान है। मैंने अपने जीवन में यह देखा है जितनी बार मैंने
Speaker A
किसी परिणाम को पाने की कोशिश की है, उतनी बार मुझे निराशा मिली। और जितनी बार मैंने कोई कोशिश छोड़ी है, बिना किसी उम्मीद के बस किया है, वहां सफलता ने मुझे ऐसे गले लगाया है जैसे मैं उसका कोई प्रिय हो। यह
Speaker A
अनुभव सार्वभौमिक है। इसे हर कोई जानता है। तो फिर इसे अपने जीवन में क्यों ना उतारा जाए। यह कोई तपस्या नहीं है। यह तो बस एक स्विच ऑफ करना है। तुम्हारे पास एक स्विच है। उम्मीद। जब तक वो ऑन है तब तक
Speaker A
दुखों का बल्ब जलता रहता है। जिस दिन उसे ऑफ कर दो उस दिन अंधकार छट जाता है। और प्रकाश वो सुकून स्वयं प्रकट हो जाता है। ये स्विच इतना पास है। तुम्हारे हाथ में है। बस एक निर्णय अब नहीं। अब मैं उम्मीदों से मुक्त
Speaker A
हूं। यह निर्णय कोई बड़ी क्रिया नहीं मांगता। बस एक आंतरिक घटना है। और वो घटना अभी इसी पल हो सकती है। क्यों ना हो। क्या कोई रोक रहा है? तुम्हारा मन कहेगा। रुको कल देखते हैं। अभी नहीं। लेकिन कल कभी
Speaker A
नहीं आता। अभी नहीं तो कभी नहीं। इसलिए अभी इसी स्वास के साथ इस उम्मीद को जाने दो। और देखो स्वासी में सुकून है। मैं तुम्हें एक छोटी कथा सुनाता हूं। एक बार एक राजा ने अपने दरबार में घोषणा की कि जो
Speaker A
भी व्यक्ति सच्चे सुकून का चित्र बनाएगा उसे बड़ा पुरस्कार मिलेगा। कई चित्रकार आए। उन्होंने सुंदर-सुंदर चित्र बनाए। हरेभरे बाघ बहती नदियां, सूर्यास्त, मुस्कुराते चेहरे। राजा को कोई चित्र पसंद नहीं आया। आखिर में एक गरीब चित्रकार ने आकर कागज पर एक चित्र बनाया। बहुत गहरे
Speaker A
पहाड़, उन पर बर्फ, आंधी चल रही थी। बिजली चमक रही थी। चित्र देखकर सब चौंक गए। यह तो सुकून नहीं है। यह तो तबाही है। पर जब उन्होंने ध्यान से देखा तो एक छोटी सी चट्टान के पीछे एक पक्षी बैठा था। अपनी
Speaker A
चोंच को अपने पंखों में छिपाएं। पूरी तरह शांत। उस आंधी और बिजली के बीच वह पक्षी बिल्कुल सुकून में था। राजा ने यही चित्र चुना। यह कथा बताती है। सुकून का मतलब बाहरी शांति नहीं है। बाहरी आंधी का न
Speaker A
होना नहीं है। सुकून तो आंतरिक शांति है जो आंधी के बीच भी अडिग रहती है। और वो शांति तब आती है जब तुम बाहरी परिणामों की उम्मीद नहीं रखते। वो पक्षी तूफान को रोकने की उम्मीद नहीं रखता। इसलिए वो शांत
Speaker A
है। यही तुम्हारी स्थिति है। तुम्हारा जीवन एक तूफान है। समस्याएं, असफलताएं, विरोध, नुकसान। पर जिस दिन तुम इन्हें रोकने की उम्मीद छोड़ दोगे, उस दिन तुम उस पक्षी की तरह सुकून में बैठे रहोगे। और सबसे बड़ी बात तूफान तुम्हें झझोर नहीं
Speaker A
पाएगा। क्योंकि तुम जानते हो कि तूफान तुम्हारा हिस्सा नहीं। यह तो बाहरी है। तुम तो उस साक्षी हो जो देखता है और साक्षी को कोई उम्मीद नहीं होती। वह तो बस देखता है। चाहे सुख आए चाहे दुख वो देखता
Speaker A
है और उसी देखने में उसका सुकून है। अब कुछ और धार्मिक ग्रंथों में तुमने ईश्वर पर भरोसा के बारे में सुना होगा। पर यह भरोसा अक्सर उम्मीद के रूप में ही समझा जाता है। ईश्वर मेरी इच्छा पूरी करेगा।
Speaker A
मुझे सुख देगा। ये गलत है। सच्चा भरोसा तो ये है ईश्वर जो करेगा वही ठीक होगा। चाहे वो मेरी इच्छा के अनुसार हो या ना हो। ये भरोसा उम्मीद नहीं है। ये तो समर्पण है। और इस समर्पण में कोई उम्मीद नहीं। इसलिए
Speaker A
कोई निराशा नहीं। तुम कह सकते हो तेरी इच्छा हो मेरी नहीं। यही सबसे बड़ी प्रार्थना है। इसलिए जो आदमी उम्मीद छोड़ देता है वही सच्चा धार्मिक है। बाकी सब तो मांगने वाले भिखारी हैं और भिखारी कभी सुकून में नहीं रहते। उन्हें तो सदा कुछ
Speaker A
ना कुछ चाहिए होता है। कुछ ना कुछ उम्मीद होती है। मैं कहता हूं धर्म का सार ही यह है कि तुम मांगना छोड़ दो। मांग ही उम्मीद है। जो मांगता है वो दीन है। जो देता है वो परमात्मा है। पर तुम यह मत समझ लेना कि
Speaker A
मांग छोड़ने का मतलब है। तुम निष्क्रिय हो जाओगे। नहीं तुम तो और भी सक्रिय हो जाओगे। पर अब तुम्हारी सक्रियता अपने फल से जुड़ी नहीं होगी। यही कर्म योग है और कर्म योग ही सबसे बड़ा सुकून पाता है
Speaker A
क्योंकि वह अपने कर्म से प्रेम करता है ना कि उस कर्म के फल से जब तुम कर्म से प्रेम करते हो तो वो कर्म एक कला बन जाता है। एक ध्यान बन जाता है। एक आनंद बन जाता है। और
Speaker A
उस आनंद में सुकून अपने आप समाया है। तो आज तुम किसी भी काम को करो। चाहे वो बर्तन धोना हो, बगीचे में पानी देना हो। दफ्तर में कागजात भरना हो उसे करो। पर बिना इस उम्मीद के कि वह काम तुम्हें क्या देगा।
Speaker A
बस करो क्योंकि करना तुम्हारा स्वभाव है क्योंकि करना तुम्हारी पूजा है और देखो कि कैसे हर छोटा सा काम एक नृत्य बन जाता है। कैसे हर सांस एक प्रार्थना बन जाती है। यही जीवन है। यही सुकून है। यही मुक्ति
Speaker A
है। मुझे पता है। तुम अभी भी सुनना चाहते हो। इसलिए मैं और कहता हूं। यह सुकून केवल मानसिक अवस्था नहीं है। यह शारीरिक भी है। जब उम्मीदें होती हैं तो तुम्हारा शरीर तन जाता है। तुम्हारी मांसपेशियां सिकुड़ जाती हैं। तुम्हारा ब्लड प्रेशर बढ़ जाता
Speaker A
है। तुम्हारी नींद उड़ जाती है। यह सब उम्मीद का दुष्परिणाम है। जब तुम उम्मीद छोड़ते हो तो तुम्हारा शरीर अपने सहज स्वाभाविक विश्राम में लौट आता है। तुम्हारी सांस गहरी होती है। तुम्हारी हृदय गति धीमी होती है। तुम्हारी आंखों
Speaker A
में चमक आती है। यह सब कोई रहस्य नहीं, यह विज्ञान है। तुम जिसे सुकून कहते हो वही शरीर की स्वास्थ्य अवस्था है। इसलिए जो आदमी सुकून में रहता है, वह रोगों से भी बचा रहता है। यह अप्रत्यक्ष लाभ है, पर
Speaker A
बहुत महत्वपूर्ण है। यहां एक और सूक्ष्म बात मैं तुम्हें बताता हूं। जब उम्मीद टूटती है तो तुम उसे निराशा कहते हो। और उस निराशा में तुम और भी अधिक उम्मीद लगा देते हो कि अब कोई और आएगा। कोई और चीज
Speaker A
होगी जो तुम्हें बचाएगी। यह एक खतरनाक चक्र है। पर मैं कहता हूं जब उम्मीद टूटे तो उसे वहीं मरने दो और उसकी जगह नई उम्मीद मत लगाओ। बस उस शून्य में उस खालीपन में देखो वहां एक अद्भुत शांति है।
Speaker A
वही शांति सुकून है। तुम उसे निराशा कहते हो। पर वो निराशा नहीं वो तो उम्मीद की मृत्यु है और मृत्यु के बाद ही तो नया जन्म होता है। जिस दिन तुम सीख जाओगे कि उम्मीद टूटना कोई दुख नहीं बल्कि
Speaker A
स्वतंत्रता है। उस दिन तुम जीवन के खेल को समझ गए। ये सुकून क्या ये स्थाई है?
Speaker A
यही सबसे बड़ा प्रश्न है। कोई भी अवस्था स्थाई नहीं है क्योंकि जीवन गतिशील है। पर यह सुकून एक गुण बन जाता है जो बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होता। जब तुम एक बार इस गुण को पा लेते हो तो ये
Speaker A
तुम्हारा हिस्सा बन जाता है। फिर चाहे तुम्हारी नौकरी छूट जाए, चाहे तुम्हारा प्रियजन चला जाए, चाहे तुम्हारा शरीर बीमार पड़ जाए, यह सुकून नहीं जाता। क्योंकि अब तुम्हें पता है यह सुकून कहीं बाहर नहीं। यह तो तुम्हारी आत्मा है और
Speaker A
आत्मा पर कोई आघात नहीं होता। वो अविनाशी है। इसलिए जब तुम इस सुकून को अपनी आत्मा के रूप में पहचान लेते हो तो तुम अमर हो जाते हो। अमर इस अर्थ में कि अब कोई दुख तुम्हें स्पर्श नहीं करता। कोई चिंता
Speaker A
तुम्हें घेर नहीं पाती। तो यह उम्मीद छोड़ना कोई नकारात्मक नहीं है। यह परम सकारात्मक है। यह एक खोज है। अपने आप को खोजने की, अपनी असली संपत्ति को खोजने की। और जब तुम अपने आप को खोज लेते हो तो तुम
Speaker A
पाते हो कि तुम वहीं हो जहां हमेशा थे। बस तुम उम्मीदों के पर्दे के पीछे छिपे हुए थे। उस पर्दे को हटाओ। और देखो सूर्य उग आया है। वो सूर्य तुम्हारा सुकून है। मैं कहता रहूंगा क्योंकि तुम कहते रहते हो। पर
Speaker A
जितना मैं कहूं उतना ही मैं देखता हूं कि शब्द कम पड़ते हैं। सत्य तो अनुभव में है। शब्दों में नहीं पर फिर भी चलो कुछ और गहराई में जाएं। क्योंकि यह विषय अनंत है जैसे सागर। तुमने ध्यान किया होगा कि
Speaker A
बच्चे अक्सर बहुत खुश रहते हैं बिना किसी कारण के। उन्हें किसी उम्मीद की जरूरत नहीं होती। ना कि कल स्कूल की छुट्टी होगी। ना कि उन्हें कोई उपहार मिलेगा। बस इस क्षण उनके पास एक पत्थर है। एक फूल है।
Speaker A
एक तितली है। और वे पूरे होते हैं। वो पूर्णता ही सुकून है। तुम भी वही बच्चे थे। तुम भी उसी सुकून में पैदा हुए थे। पर समाज ने, शिक्षा ने, अनुभवों ने तुम्हें सिखाया। यह काफी नहीं है और चाहिए और बड़ा
Speaker A
और बेहतर और तुम उसी और के पीछे दौड़ते चले गए। अब फिर से उस बचपन में लौटो। पर बचपन से बड़ा एक जागृत बचपन। जहां सब कुछ नया है, सब कुछ अद्भुत है और किसी उम्मीद की जरूरत नहीं। क्योंकि जो है वही
Speaker A
पर्याप्त है। यही वापसी सुकून है। मैं तुम्हें यह भी बताऊं। जब तुम उम्मीद छोड़ते हो तो कृतज्ञता का जन्म होता है। क्योंकि जब तुम अपेक्षा नहीं करते तो जो कुछ मिलता है वो एक उपहार लगता है। हर छोटी चीज एक कप चाय, एक मित्र का स्नेह,
Speaker A
एक पक्षी का गीत अनमोल हो जाती है। और कृतज्ञता ही सुकून की बहन है। जब तुम कृतज्ञ होते हो तो तुम खुश होते हो। जब तुम अकृतज्ञ होते हो तो दुखी होते हो। और अकृतज्ञता कहां से आती है? उम्मीद से।
Speaker A
मुझे और मिलना चाहिए था। जब यह और चला जाता है तो जो है पर्याप्त लगता है। और यह पर्याप्तता ही सुकून है। इसलिए हर सुबह उठकर यह कहो आज मुझे जो मिलेगा उसके लिए मैं कृतज्ञ हूं। जो नहीं मिलेगा उसके लिए
Speaker A
भी कृतज्ञ हूं। इस कृतज्ञता में उम्मीद मर जाती है और सुकून जीवित हो जाता है। अब मैं तुम्हें एक और प्रयोग बताता हूं जिसे तुम उम्मीद मुक्ति का प्रयोग कह सकते हो। आज रात सोने से पहले अपने जीवन की पांच
Speaker A
बड़ी उम्मीदों को कागज पर लिखो। मुझे यह मिलना चाहिए। मुझे वो होना चाहिए। यह व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार करे। मैं इतना सफल होऊ। मेरा स्वास्थ्य ऐसा रहे। फिर उस कागज को अपने हाथ में लो और एक-एक करके हर
Speaker A
उम्मीद को देखो और कहो अगर यह ना मिले तो भी मैं शांत हूं। और जब तुम यह कहो तो उस भावना को महसूस करो। फिर उस कागज को जला दो। प्रतीकात्मक रूप से उम्मीदों को जला दो। और फिर उस राख को हवा में उड़ा दो।
Speaker A
अगली सुबह जब तुम उठो तो देखो कि तुम कितने हल्के हो। मानो कोई बोझ उतर गया। उसी हल्केपन में पूरा दिन जियो। देखना वो दिन तुम्हारे जीवन के सबसे सुंदर दिनों में से एक होगा। क्योंकि तुमने अपने ऊपर
Speaker A
से उम्मीदों का बोझ उतार दिया और जगह सुकून ने ले ली। पर यह प्रयोग एक बार नहीं बार-बार करना होगा क्योंकि मन पुरानी आदतों में वापस जाता है। वो फिर से उम्मीदें बुनने लगता है क्योंकि उसे इसी दौड़ में मजा आता है। उसे अराजकता से
Speaker A
प्यार है। अव्यवस्था से प्यार है। पर तुम निरंतर सजग रहो। और हर बार जब भी कोई उम्मीद उठे उसे देखो और हंसो। हंसो कि अरे तुम फिर आ गई। मैं जानता हूं तुम्हें तुम धोखा देने वाली हो। तुम मुझे शांति नहीं
Speaker A
दोगी। तुम केवल चिंता दोगी। इस हंसी में उम्मीद कमजोर होती है और सुकून मजबूत होता है। धीरे-धीरे यह तुम्हारा स्वभाव बन जाता है। कि उम्मीदें आए पर वे तुम्हें प्रभावित ना करें। तुम उनके मालिक रहो। वे तुम्हारी नहीं।
Speaker A
और यही स्वामित्व स्वयं पर अपनी प्रतिक्रियाओं पर सुकून का आधार है। बहुत कुछ कहा। पर एक बात और जब तुम उम्मीद छोड़ते हो तो तुम दूसरों के प्रति भी निर्मम नहीं बल्कि अधिक करुणामय हो जाते हो। क्योंकि अब तुम्हें पता है कि
Speaker A
हर कोई उम्मीदों के जाल में फंसा है। हर कोई दुखी है। तुम उनकी पीड़ा को समझते हो और उन्हें क्षमा करते हो। क्योंकि वे जो करते हैं वह उनकी उम्मीदों का परिणाम है। तुम नाराज नहीं होते क्योंकि तुम्हें पता
Speaker A
है कि उन्होंने तुम्हें नहीं बल्कि अपनी उम्मीदों को धोखा दिया है। यह करुणा तुम्हारे सुकून को और गहरा बनाती है क्योंकि अब तुम अकेले नहीं हो। तुम पूरी मानवता के साथ एक हो गए हो। उसकी पीड़ा को उसके अज्ञान को समझते हो। और यह समझ ही
Speaker A
प्रेम है और यही प्रेम ही सुकून की पराकाष्ठा है। तो प्रिय है यही सार है। उम्मीद छोड़ो सुकून पाओ। ये इतना सरल है पर हम इसे जटिल बना लेते हैं। जीवन सरल है। मन जटिल है। मन को शांत करो और सुकून
Speaker A
मिलेगा। और मन को शांत करने का सबसे सीधा रास्ता है। उम्मीदों को मिटा देना। यह कोई रहस्य नहीं। यह तो प्रत्यक्ष सत्य है। मैंने जितना कहा, सब इसी एक सत्य की व्याख्या है। अब ये तुम पर निर्भर है। तुम
Speaker A
इसे जिओगे या सिर्फ सुनोगे। सुनना तो मैं भी कराता रहूंगा। पर जीना तुम्हें ही है। और जब तुम इसे जिओगे तो पाओगे कि यह सुकून तुम्हारी रगों में बहता है। तुम्हारी हर कोशिका में है। तब किसी और शब्द की जरूरत
Speaker A
नहीं रहेगी। फिर भी यदि तुम चाहो तो मैं और भी कह सकता हूं। क्योंकि इस विषय की कोई सीमा नहीं है। पर हर शब्द के साथ मैं तुम्हें मौन के और निकट लाने की कोशिश करता हूं। इसलिए अगली बार जब मैं बोलूं तो
Speaker A
शायद मेरे शब्द और भी कम हो और उनके बीच का मौन और भी बड़ा हो। क्योंकि वही मौन सुकून है जिसे शब्द नहीं बल्कि अनुभव समझ सकता है।
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