Speaker A
तुम्हें बचपन से एक झूठ सिखाया गया है कि अगर तुम अच्छे इंसान हो तो तुम्हें लोगों को बचाना चाहिए। अगर कोई टूट रहा है तो तुम्हें उसे संभालना चाहिए। अगर कोई बार-बार गलती कर रहा है तो तुम्हें उसे समझना चाहिए। अगर कोई तुम्हें दर्द दे रहा है तो तुम्हें और पेशेंस रखना चाहिए। लेकिन दुनिया की सबसे डेंजरस बात यह है कि कुछ लोग कभी बदलने के लिए तुम्हारे पास आते ही नहीं। वो सिर्फ इस्तेमाल करने आते हैं और जब तक तुम्हें यह [संगीत] समझ आता है तब तक वह तुम्हारी एनर्जी, तुम्हारा पीस, तुम्हारा कॉन्फिडेंस सब कंज्यूम कर चुके होते हैं। और शायद तुम्हारे साथ भी ऐसा हुआ होगा। किसी की मदद करते-करते तुम खुद थक [संगीत] गए होंगे। किसी को बार-बार संभालते-सालते एक दिन खुद अंदर से टूट गए होंगे। क्योंकि सच यह है अच्छे लोग अक्सर दूसरों को बचाने की कोशिश में सबसे ज्यादा खुद को खो देते हैं। निकोलोमा की हवेली ने इंसानों की एक ऐसी रियलिटी समझी थी जिसे ज्यादातर लोग एक्सेप्ट नहीं करना चाहते। हर इंसान मदद के लायक नहीं होता। कुछ लोग सच में टूटे होते हैं। लेकिन कुछ लोग टूटे होने का इस्तेमाल करते हैं। और अगर तुमने यह फर्क समय रहते नहीं समझा, तो एक दिन तुम इमोशनली इतने खाली हो जाओगे कि खुद को पहचानना मुश्किल हो जाएगा। आज हम उन चार तरह के लोगों की बात करेंगे जिन्हें बचाने की कोशिश तुम्हें कभी नहीं करनी चाहिए। यह हेट नहीं है। यह सर्वाइवल है। क्योंकि दया अच्छी चीज है। लेकिन बिना सीमा वाली दया धीरे-धीरे इंसान को अंदर से खत्म कर देती है। और पहला [संगीत] टाइप सबसे डेंजरस इसलिए है क्योंकि शुरुआत में वह तुम्हें इनोसेंट लगता है। टाइप एक केओस क्रिएटर। तुमने ऐसे लोग जरूर देखे होंगे जिनकी जिंदगी में हमेशा कुछ ना कुछ गलत चलता रहता है। हर हफ्ते नई प्रॉब्लम, हर महीने नया ड्रामा, कभी पैसे खत्म, कभी ब्रेकअप, कभी लड़ाई, कभी इमोशनल ब्रेकडाउन। और शुरुआत में तुम्हें उन पर सच में दया आती है। तुम सोचते हो यार, इस इंसान की लाइफ इतनी खराब क्यों है? फिर तुम हेल्प करना शुरू करते हो। कभी घंटों उनकी बातें सुनकर, कभी अपना काम छोड़कर, कभी पैसे देकर, कभी इमोशनल सपोर्ट देकर। और शायद तुमने खुद भी किसी के लिए ऐसा किया होगा। रात के 2:00 बजे तक किसी को [संगीत] समझाना, अपना स्ट्रेस साइड में रखकर किसी और को संभालना, बार-बार मोटिवेट करना। लेकिन फिर कुछ समय बाद तुम एक चीज नोटिस करते हो। प्रॉब्लम्स खत्म नहीं हो रही। बस बदल रही हैं। आज कुछ और, कल कुछ और। और धीरे-धीरे तुम्हें समझ आने लगता है यह बैड लक [संगीत] नहीं है। यह उनका पैटर्न है। कुछ लोग प्रॉब्लम्स में फंसते नहीं। वो अननोइंगली प्रॉब्लम्स [संगीत] क्रिएट करते रहते हैं। उनके डिसीजंस इंपल्सिव होते हैं। वो वार्निंग्स इग्नोर करते हैं। वो हर चीज इमोशंस में आकर करते हैं। लेकिन सबसे डेंजरस चीज वो कभी रिस्पांसिबिलिटी नहीं लेते। हर चीज की गलती किसी और की होती है। बॉस टॉक्सिक था, पार्टनर फेक था, फ्रेंड सेल्फिश थे, सिस्टम खराब था। बस एक चीज [संगीत] कभी गलत नहीं होती। वो खुद और यहीं अच्छे लोग फंस जाते हैं। क्योंकि उन्हें लगता है अगर मैं थोड़ा और सपोर्ट दूं तो शायद यह इंसान बदल जाए। लेकिन सच यह है जो इंसान खुद अपनी जिंदगी सुधारना नहीं चाहता उसे तुम अपनी पूरी एनर्जी देकर भी नहीं बदल सकते। धीरे-धीरे उसका केस तुम्हारी जिंदगी [संगीत] में घुसने लगता है। तुम मेंटली टायर्ड रहने लगते हो। तुम्हारा फोकस कम होने लगता है। तुम खुद स्ट्रेस में रहने लगते हो। और सबसे खतरनाक बात तुम्हें पता भी नहीं चलता कि तुम किसी और की जिंदगी उठाते उठाते अपनी जिंदगी गिरा रहे हो। कुछ लोग प्रॉब्लम सॉल्व नहीं करना चाहते। उन्हें प्रॉब्लम्स में अटेंशन मिलता है। जब वह विक्टिम बनते हैं, लोग उन्हें देते हैं। लोग उन्हें कंफर्ट देते हैं। लोग उन्हें बचाते हैं। और अगर हर बार तुम उन्हें बचाते रहोगे, तो तुम अनअवेयरली उनकी वीकनेस को रिवॉर्ड कर रहे हो। याद रखो हर बार रेस्क्यू करना काइंडनेस नहीं होता। कई बार वह सिर्फ इनेबलिंग होता है क्योंकि जब तक इंसान अपनी गलतियों का दर्द फील [संगीत] नहीं करता तब तक वह बदलता नहीं और अगर हर बार तुम शील्ड बन जाओगे तो वह कभी ग्रो नहीं करेगा और आखिर में उसका केओस तुम्हारी पीस [संगीत] खा जाएगा। इसलिए कुछ लोगों से दूरी बनाना गलत नहीं है। वो सेल्फ रिस्पेक्ट है। क्योंकि अगर तुम हर डूबते इंसान को बचाने निकलोगे तो एक दिन खुद तैरना [संगीत] भूल जाओगे। और अब दूसरा टाइप यह लोग शुरुआत में बहुत अच्छे लगते हैं। इतने अच्छे कि तुम्हें लगता है शायद यही वो लोग हैं [संगीत] जो सच में तुम्हारी वैल्यू करते हैं। लेकिन धीरे-धीरे तुम्हें एहसास होता है उन्हें तुमसे प्यार नहीं था। उन्हें तुम्हारी जरूरत थी। टाइप टू द बॉटमलेस पिट। यह वह लोग हैं जो शुरुआत में बहुत ग्रेटफुल दिखाई देते हैं। पहली बार मदद करो तो वह तुम्हें ऐसा फील करवाते हैं जैसे तुमने उनकी जिंदगी बदल दी हो। तुम नहीं होते तो मैं टूट जाता। सिर्फ तुम समझते हो मुझे। और सच बताओ ऐसी बातें सुनकर अच्छा लगता है। तुम्हें लगता है तुम किसी की जिंदगी में इंपॉर्टेंट हो। यहीं से ट्रैप शुरू होता है। धीरे-धीरे उनकी जरूरतें बढ़ने लगती हैं। पहले सिर्फ [संगीत] एडवाइस चाहिए, फिर टाइम चाहिए, फिर इमोशनल सपोर्ट, फिर कास्टेंट अटेंशन। और तुम नोटिस भी नहीं करते कि हेल्प धीरे-धीरे रिस्पांसिबिलिटी बन गई है। अब तुम उनकी आदत बन चुके हो। और सबसे डेंजरस चीज ऐसे लोग कभी डायरेक्टली नहीं बोलते कि वह तुम्हें यूज कर रहे हैं। वह इमोशनल तरीके से तुम्हें बांधते हैं। अगर तुम बिजी हो जाओ, रिप्लाई लेट कर दो या ना बोल दो तो उनका बिहेवियर बदलने लगता है। कोल्ड रिप्लाई, डिस्टेंस, इनडायरेक्ट गिल्ट। कोई बात नहीं मैं समझ गया। सब आखिर में छोड़ ही देते हैं। और तुम्हें अंदर से गिल्ट फील होने लगता है। तुम सोचते हो शायद मैं गलत हूं। लेकिन रुक कर सोचो। अगर किसी इंसान को तुम्हारा ना एक्सेप्ट नहीं होता तो उसका अटैचमेंट हेल्दी नहीं था। क्योंकि इमोशनली मैच्योर लोग बाउंड्रीज [संगीत] समझते हैं। लेकिन यूज़र्स बाउंड्रीज से नाराज हो जाते हैं। और शायद तुमने यह भी नोटिस किया होगा कुछ लोग सिर्फ तब तक अच्छे रहते हैं जब तक तुम उन्हें कुछ [संगीत] दे रहे हो। जैसे ही तुम पीछे हटते हो उनका प्यार भी कम होने लगता है। क्यों? क्यों क्योंकि उन्हें तुम नहीं चाहिए थे। उन्हें तुम्हारी [संगीत] एनर्जी चाहिए थी। तुम्हारा टाइम चाहिए था। तुम्हारा अटेंशन चाहिए था। तुम्हारा सपोर्ट चाहिए था और सबसे पेनफुल चीज तब होती है जब तुम रियलाइज करते हो। जिस इंसान के लिए तुमने इतना कुछ किया वो तुम्हें इंसान नहीं रिसोर्स की तरह देख रहा था और फिर भी अच्छे लोग वही गलती करते हैं। वो और ज्यादा देने लगते हैं। उन्हें लगता है शायद अगर मैं थोड़ा और अच्छा बन जाऊं तो सब ठीक हो जाएगा। लेकिन कुछ लोग कभी सेटिस्फाई [संगीत] नहीं होते। तुम टाइम दो और चाहिए। तुम सपोर्ट दो और चाहिए। तुम सैक्रिफाइस करो फिर भी काफी नहीं। क्योंकि प्रॉब्लम रिसोर्सेज की नहीं माइंडसेट की होती है। और एक पॉइंट के बाद तुम मेंटली एग्जॉस्ट होने लगते हो। तुम्हें लगने लगता है कि तुम हमेशा किसी का बोझ उठाए घूम रहे हो। लेकिन फिर भी तुम छोड़ नहीं पाते। क्योंकि तुम्हें डर लगता है। अगर मैंने पीछे हट गया तो यह इंसान टूट जाएगा। लेकिन सच सुनो। तुम किसी को बचाने के लिए पैदा नहीं हुए। तुम्हारा काम हर इंसान का इमोशनल ऑक्सीजन बनना नहीं है। कई बार किसी इंसान को बचाने की कोशिश करते-करते तुम खुद अंदर से खाली हो जाते हो। और सबसे डेंजरस बात ऐसे लोग तुम्हारी अच्छाई की रिस्पेक्ट नहीं करते। वो उसकी आदत बना लेते हैं। इसलिए याद रखो जहां तुम्हारी काइंडनेस एक्सपेक्टेड बन जाए, वहां से तुम्हारी वैल्यू खत्म होनी शुरू हो जाती है। और अब तीसरा टाइप यह लोग तुम्हें सीधे हर्ट नहीं करते लेकिन धीरे-धीरे तुम्हारा माइंड, तुम्हारी इमोशंस और तुम्हारी रियलिटी [संगीत] तक कंट्रोल करना शुरू कर देते हैं। टाइप तीन द प्रोफेशनल विक्टिम। इस दुनिया में दो तरह के दुखी [संगीत] लोग होते हैं। पहले वह जो सच में अपनी जिंदगी बदलना चाहते हैं और दूसरे वो जो अपने दर्द को अपनी पहचान बना लेते हैं। यही प्रोफेशनल विक्टिम है। यह लोग हमेशा खुद को पावरलेस दिखाते हैं। हर बात में ट्रॉमा, हर बात में सफरिंग, हर बात [संगीत] में इमोशनल ब्रेकडाउन और धीरे-धीरे तुम्हें ऐसा फील करवाया जाता है कि अगर तुमने इन्हें छोड़ा तो तुम बैड इंसान हो। यही उनका सबसे डेंजरस वेपन है सिंपैथी। क्योंकि सिंपैथी कई बार इंसान का लॉजिक बंद कर देती है। जब कोई बार-बार टूटे हुए अंदाज में बात करता है तो तुम उसकी रियलिटी नहीं देखते। तुम सिर्फ उसका दर्द देखते हो। और यहीं मैनपुलेशन शुरू हो जाती है। तुम सलू्यूशन देते हो। वो एक्सक्यूज देते हैं। तुम कहते हो नई शुरुआत करो। वो कहते हैं तुम मेरी सिचुएशन नहीं समझोगे। तुम कहते हो खुद को स्ट्रांग बनाओ। वो कहते हैं मैं मेंटली ब्रोकन हूं। तुम कहते हो रिस्पांसिबिलिटी लो। वो कहते हैं तुम इनसेंसिटिव हो। समझ रहे हो पैटर्न? उन्हें सॉल्यूशन नहीं चाहिए। उन्हें इमोशनल शेल्टर चाहिए। और शायद तुमने भी कभी किसी के लिए ऐसा फील किया होगा। तुम्हें लगा होगा अगर मैं इसे छोड़ दूं तो यह पूरी तरह टूट [संगीत] जाएगा। इसी फीलिंग का इस्तेमाल किया जाता है। धीरे-धीरे तुम उनकी प्रॉब्लम्स उठाने लगते हो। उनकी जिम्मेदारियां उठाने लगते हो। उनका इमोशनल दर्द भी अपने अंदर लेने लगते हो। और एक दिन तुम रियलाइज करते हो तुम खुद मेंटल











