ओशो का प्रेरणादायक भाषण अपने दम पर जीना सीखने और आत्मनिर्भरता की महत्ता पर केंद्रित है।
Key Takeaways
- अपने दम पर जीना आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता की कुंजी है।
- सहारा और प्रेम में अंतर समझना आवश्यक है, सहारा अधूरापन बढ़ाता है।
- अकेले समय बिताना और अपने डर का सामना करना आत्म-ज्ञान के लिए जरूरी है।
- जीवन में असली आजादी दूसरों पर निर्भर न रहकर अपने भीतर केंद्रित रहने में है।
- जो व्यक्ति अपने फैसलों का मालिक होता है, वही सच्चा जीवित और स्वतंत्र होता है।
What the video covers
- अपने दम पर जीना सीखना आवश्यक है, अन्य लोगों के सहारे निर्भर रहना जीवन में कमजोरी है।
- सहारा और प्रेम में अंतर समझना चाहिए; सहारा अधूरापन बढ़ाता है जबकि प्रेम दो पूरे लोगों का मिलन है।
- अपने भीतर जड़े लगाना और अकेले समय बिताना आत्म-ज्ञान और स्वतंत्रता की दिशा में पहला कदम है।
- अपने डर और कमजोरियों का सामना करना और उन्हें छुपाना नहीं बल्कि समझना जरूरी है।
- जीवन में असली आजादी बिना किसी सहारे के भी शांत और आनंदित रहने में है।
- दूसरों के फैसलों और समाज की अपेक्षाओं से मुक्त होकर अपनी जिम्मेदारी लेना जीवन को सशक्त बनाता है।
- जो व्यक्ति अपने भीतर केंद्रित होता है, उसे हर रिश्ता उत्सव और स्वतंत्रता की अनुभूति कराता है।
- डर और बेचैनी से भागने की बजाय उनके साथ चलना सीखना जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- सफलता, पहचान और भूमिका से ऊपर उठकर एक जीवित चेतना के रूप में जीना चाहिए।
- जीवन में जोखिम लेना और गलतियों से सीखना ही सच्ची स्वतंत्रता और विकास का मार्ग है।
Full Transcript — Download SRT & Markdown
Speaker A
अगर तुम अपने दम पर जीना नहीं सीखते तो पूरी जिंदगी किसी न किसी के कंधे तलाशते रहोगे। और जो आदमी कंधे तलाशता है, वह कभी अपने पैरों की ताकत नहीं जान पाता। बचपन से तुम्हें सिखाया गया, किसी का सहारा लो पहले।
Speaker A
मां-बाप फिर शिक्षक फिर समाज फिर पति-पत्नी फिर बच्चे और धीरे-धीरे तुम्हें इतना निर्भर बना दिया गया कि अकेले खड़े होने का विचार भी डर पैदा करने लगा लेकिन जरा सोचो क्या कोई पेड़ किसी दूसरे पेड़ के सहारे बढ़ता है? क्या सूरज किसी दूसरे
Speaker A
मां-बाप, फिर शिक्षक, फिर समाज, फिर पति-पत्नी, फिर बच्चे। और धीरे-धीरे तुम्हें इतना निर्भर बना दिया गया कि अकेले खड़े होने का विचार भी डर पैदा करने लगा। लेकिन जरा सोचो, क्या कोई पेड़ किसी दूसरे पेड़ के सहारे बढ़ता है? क्या सूरज किसी दूसरे
Speaker A
कि कोई आएगा और तुम्हें पूरा कर देगा। कोई नहीं आएगा। और अगर कोई आ भी गया तो वह तुम्हें पूरा नहीं करेगा। वो केवल तुम्हारे खालीपन को कुछ समय के लिए ढक देगा। याद रखना सहारा और प्रेम अलग बातें
Speaker A
सूरज से रोशनी मांगता है? क्या नदी किसी दूसरी नदी से पूछती है कि मुझे किस दिशा में बहना चाहिए? नहीं। अस्तित्व का नियम है। जो अपने भीतर खड़ा होना सीख गया, वही खेला। तुम्हारे जीवन का सबसे बड़ा भ्रम है
Speaker A
अपने जीवन को। तुम कितनी चीजों पर टिके हो। लोग क्या सोचेंगे? अगर वह छोड़ गया तो अगर नौकरी चली गई तो अगर मेरे पास यह चीज नहीं रही तो यह सारे डर बताते हैं कि तुमने अपनी जड़े बाहर लगा रखी और बाहर लगी
Speaker A
कि कोई आएगा और तुम्हें पूरा कर देगा। कोई नहीं आएगा। और अगर कोई आ भी गया तो वह तुम्हें पूरा नहीं करेगा। वो केवल तुम्हारे खालीपन को कुछ समय के लिए ढक देगा। याद रखना, सहारा और प्रेम अलग बातें
Speaker A
चुना ताकि भीतर की खाली आवाज सुनाई ना दे। लेकिन उसी खालीपन के पार तुम्हारा असली चेहरा बैठा है। एक दिन अकेले कमरे में बैठो। फोन मत उठाओ। कोई संगीत मत चलाओ। कुछ मत करो। बस बैठो और देखो कितनी बेचैनी
Speaker A
हैं। प्रेम खूबसूरत है। सहारा खतरनाक है। प्रेम में दो पूरे लोग मिलते हैं। सहारे में दो अधूरे लोग एक दूसरे से चिपक जाते हैं और दो अधूरे लोग मिलकर पूरा नहीं बनते। वे केवल बड़ा बोझ बन जाते हैं। देखो
Speaker A
तुम्हें किसी से कुछ लेने की जरूरत नहीं रहेगी। फिर संबंध भी बदल जाते हैं। तब तुम लोगों को पकड़ते नहीं। तब तुम कहते हो मैं पूरा हूं। तुम भी पूरे हो। चलो साथ चलते हैं और अगर कोई चला जाए तो दर्द होगा
Speaker A
अपने जीवन को। तुम कितनी चीजों पर टिके हो। लोग क्या सोचेंगे? अगर वह छोड़ गया तो, अगर नौकरी चली गई तो, अगर मेरे पास यह चीज नहीं रही तो। यह सारे डर बताते हैं कि तुमने अपनी जड़े बाहर लगा रखी हैं और बाहर लगी
Speaker A
कि मेरा केंद्र मेरे भीतर है। जो भीतर केंद्रित हो गया उसे दुनिया का हर रिश्ता उत्सव लगता है। और जो भीतर खाली है उसे हर रिश्ता जरूरत लगता है। इसलिए आज से एक छोटी शुरुआत करो। दिन में कुछ मिनट अपने
Speaker A
जड़े कभी सुरक्षित नहीं होतीं। जिस दिन हवा बदली, सब हिल जाएगा। अपने भीतर जड़े लगाओ। अपने साथ बैठना सीखो। अकेले चाय पीना सीखो। अकेले चलना सीखो। अकेले निर्णय लेना सीखो। पहले पहल कठिन लगेगा क्योंकि तुमने कभी अपने साथ समय बिताया ही नहीं। तुमने हमेशा शोर
Speaker A
भीतर बैठी थी और फिर एक दिन तुम्हें एक अजीब खोज होगी कि तुम्हारी आधी परेशानियां कभी थी ही नहीं। वे केवल इस डर से पैदा हुई थी कि कहीं मैं अकेला ना पड़ जाऊं। मनुष्य को दुख उतना नहीं देता जितना अकेले
Speaker A
चुना ताकि भीतर की खाली आवाज सुनाई ना दे। लेकिन उसी खालीपन के पार तुम्हारा असली चेहरा बैठा है। एक दिन अकेले कमरे में बैठो। फोन मत उठाओ। कोई संगीत मत चलाओ। कुछ मत करो। बस बैठो और देखो कितनी बेचैनी
Speaker A
साथ ना रहना पड़े। तुमने देखा होगा एक आदमी रोज शिकायत करता है कि उसकी नौकरी खराब है। लेकिन छोड़ता नहीं। एक स्त्री रोज रोती है कि रिश्ता उसे खत्म कर रहा है लेकिन निकलती नहीं। कोई कहता है मुझे यह
Speaker A
[संगीत] उठती है। वही बेचैनी तुम्हारी गुलामी है। लोग सोचते हैं आजादी का मतलब है जो मन करे वो करो। नहीं, असली आजादी है। बिना किसी सहारे के भी शांत रहना। जिस दिन तुम अकेले होकर भी आनंद में हो, उस दिन
Speaker A
वह जीवन नहीं वो मशीन है। तुम मशीन बनना चाहते हो या जीवित रहना चाहते हो। जीवित आदमी जोखिम लेता है। वह गिरता है, गलतियां करता है। लेकिन उसके फैसले [संगीत] उसके होते हैं। और अपने फैसलों की चोट में भी
Speaker A
तुम्हें किसी से कुछ लेने की जरूरत नहीं रहेगी। फिर संबंध भी बदल जाते हैं। तब तुम लोगों को पकड़ते नहीं। तब तुम कहते हो मैं पूरा हूं। तुम भी पूरे हो। चलो साथ चलते हैं। और अगर कोई चला जाए तो दर्द होगा,
Speaker A
स्वतंत्र हो जाता है। तुम्हें बचपन से कहा गया अच्छे नंबर लाओ। अच्छी नौकरी लो, अच्छा घर लो, अच्छी इमेज बनाओ। लेकिन किसी ने यह नहीं कहा खुद को जानो। अपने पैरों पर खड़े होना सीखो। अपने डर को देखो। अपने
Speaker A
लेकिन तुम्हारा अस्तित्व नहीं टूटेगा क्योंकि तुमने खुद को किसी के हाथ गिरवी नहीं रखा। अपने दम पर जीना कठोर होना नहीं है। यह अहंकार नहीं है। यह घोषणा नहीं कि मुझे किसी की जरूरत नहीं। नहीं, यह समझ है
Speaker A
लेकिन भावनात्मक रूप से भिखारी हैं। हर समय उन्हें किसी का अप्रूवल चाहिए। कोई तारीफ [संगीत] कर दे तो खुश। कोई नजरअंदाज कर दे तो टूट गए। सोचो अगर किसी के एक शब्द से तुम्हारा दिन खराब हो सकता है तो
Speaker A
कि मेरा केंद्र मेरे भीतर है। जो भीतर केंद्रित हो गया, उसे दुनिया का हर रिश्ता उत्सव लगता है। और जो भीतर खाली है, उसे हर रिश्ता जरूरत लगता है। इसलिए आज से एक छोटी शुरुआत करो। दिन में कुछ मिनट अपने
Speaker A
कहेगा, कुछ देखने को कहेगा। मत भागो। बैठे रहो। तुम पहली बार अपने मन को देखोगे और तुम चौंक जाओगे। तुम्हारा सबसे बड़ा मालिक बाहर नहीं बैठा। तुम्हारा मालिक तुम्हारा अपना मन है। वो कहता है यह करो वो बनो।
Speaker A
लिए रखो। कोई पहचान नहीं, कोई भूमिका नहीं, ना बेटा, ना बेटी, ना पति, ना पत्नी, ना सफल, ना असफल। बस एक जीवित चेतना। [संगीत] धीरे-धीरे तुम पाओगे। जिस ताकत को तुम बाहर खोज रहे थे, वो हमेशा से तुम्हारे
Speaker A
स्वतंत्रता बाहर की परिस्थिति नहीं भीतर की स्थिति है। और अब मैं तुमसे कुछ ऐसी बात कहूंगा जिसे सुनकर शायद तुम्हारा मन असहज हो जाए। क्योंकि मन हमेशा वही सुनना चाहता है जिससे उसकी पुरानी आदतें बची रहे। मन चाहता है कि कोई उसे दिशा दे। कोई
Speaker A
भीतर बैठी थी। और फिर एक दिन तुम्हें एक अजीब खोज होगी कि तुम्हारी आधी परेशानियां कभी थी ही नहीं। वे केवल इस डर से पैदा हुई थीं कि कहीं मैं अकेला ना पड़ जाऊं। मनुष्य को दुख उतना नहीं देता जितना अकेले
Speaker A
अकेले लड़ना नहीं यह दुनिया छोड़ देना नहीं यह लोगों से दूरी बनाना नहीं यह भीतर ऐसी जगह खोजना है जहां तुम्हारा अस्तित्व किसी दूसरे के होने या ना होने पर निर्भर ना करें तुम्हारा दुख कहां से आता है? तुम
Speaker A
होने का भय देता है। इसलिए लोग अजीब-अजीब समझौते करते हैं। गलत रिश्तों में रहते हैं। ऐसी नौकरी करते हैं जिसे वे नफरत करते हैं। ऐसे सपने जीते हैं जो उनके नहीं हैं। सिर्फ इसलिए कि कहीं उन्हें खुद के
Speaker A
मुझे दुख दिया। नहीं। दुख उसने नहीं दिया। दुख तुम्हारी पकड़ ने दिया। जीवन को मुट्ठी में पकड़ोगे तो रेत की तरह फिसलेगा। खुली हथेली रखोगे तो जो आएगा टिकेगा। जो जाएगा उसे जाने दोगे और तब पहली बार तुम जीना शुरू करोगे। देखो लोग
Speaker A
साथ ना रहना पड़े। तुमने देखा होगा एक आदमी रोज शिकायत करता है कि उसकी नौकरी खराब है। लेकिन छोड़ता नहीं। एक स्त्री रोज रोती है कि रिश्ता उसे खत्म कर रहा है, लेकिन निकलती नहीं। कोई कहता है मुझे यह
Speaker A
किसी और की वीडियो, फिर किसी और का भाषण और पूरी जिंदगी तुम उधार की आंख लेकर घूमते रहोगे। अपनी आंख पैदा करो। और अपनी आंख पैदा करने का एक ही तरीका है। अपने जीवन की जिम्मेदारी लेना। बहुत लोग
Speaker A
शहर पसंद नहीं, लेकिन वही रहता है। क्यों? क्योंकि दुख से ज्यादा डरावनी चीज उन्हें लगती है। अनिश्चितता। और जो अनिश्चितता से डर गया, वो जीवन से डर गया। क्योंकि जीवन का दूसरा नाम ही अनिश्चितता है। जो तय है,
Speaker A
हूं, यहां से आगे मेरी जिम्मेदारी है। उस दिन एक नई ऊर्जा पैदा होती है क्योंकि दोष देना आसान है। निर्माण करना कठिन है और जीवन हमेशा कठिन रास्तों पर फूल खिलाता है। तुमने कभी गौर किया? हमेशा तुम्हें कहा गया भीड़ में चलो। भीड़ गलत नहीं
Speaker A
वह जीवन नहीं, वो मशीन है। तुम मशीन बनना चाहते हो या जीवित रहना चाहते हो? जीवित आदमी जोखिम लेता है। वह गिरता है, गलतियां करता है। लेकिन उसके फैसले [संगीत] उसके होते हैं। और अपने फैसलों की चोट में भी
Speaker A
पूरी दुनिया ऐसी दौड़ में शामिल हो जाती है जिसका गंतव्य किसी को पता नहीं। तुम भी भाग रहे हो। कहां जा रहे हो?
Speaker A
एक आनंद है। दूसरों के फैसलों की सुरक्षा में एक धीमी मौत है। समाज तुम्हें सुरक्षित बनाना चाहता है। अस्तित्व तुम्हें जीवित बनाना चाहता है। इन दोनों में फर्क समझो। सुरक्षित आदमी धीरे-धीरे डरपोक हो जाता है। जीवित आदमी धीरे-धीरे
Speaker A
थक कर गिर जाते हैं क्योंकि अभिनय बहुत थका देता है। अपने दम पर जीने वाला आदमी अभिनय छोड़ देता है। उसके पास खोने को इमेज नहीं होती। वह जैसा है वैसा होता है। अगर रोना है तो रोता है। अगर हंसना है तो
Speaker A
स्वतंत्र हो जाता है। तुम्हें बचपन से कहा गया अच्छे नंबर लाओ। अच्छी नौकरी लो, अच्छा घर लो, अच्छी इमेज बनाओ। लेकिन किसी ने यह नहीं कहा खुद को जानो। अपने पैरों पर खड़े होना सीखो। अपने डर को देखो। अपने
Speaker A
होना भूल गए। सुनो। जो अपने दम पर जीना सीखता है, वह अपनी कमजोरी से नहीं भागता। वह उसे देखता है। वह अपने डर को छुपाता नहीं। वह उसके सामने बैठता है और धीरे-धीरे डर बदलने लगता है। क्योंकि डर
Speaker A
भीतर उतरना सीखो। क्योंकि अगर तुमने खुद को नहीं जाना तो चाहे तुम्हारे पास सब कुछ हो, तुम अंदर से उधार पर जी रहे हो। अपने दम पर जीना पैसे कमाने से भी गहरा है। बहुत लोग आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं।
Speaker A
कहता है। डर को देखकर गुजरना पड़ता है। भाग कर नहीं। और याद रखना अपने दम पर जीने का मतलब यह नहीं कि तुम्हें कभी सहारा नहीं मिलेगा सहारा आएगा लोग आएंगे प्रेम आएगा दोस्त आएंगे लेकिन अंतर इतना होगा अब
Speaker A
लेकिन भावनात्मक रूप से भिखारी हैं। हर समय उन्हें किसी का अप्रूवल चाहिए। कोई तारीफ [संगीत] कर दे तो खुश। कोई नजरअंदाज कर दे तो टूट गए। सोचो अगर किसी के एक शब्द से तुम्हारा दिन खराब हो सकता है तो
Speaker A
थी तुम बस दूसरों के शोर में उसकी आवाज नहीं सुन पा रहे थे और अब बात को थोड़ा और भीतर ले चलते क्योंकि अपने दम पर जीना केवल बाहर की स्वतंत्र ंत्रता नहीं है। घर छोड़ देना स्वतंत्रता नहीं। नौकरी छोड़
Speaker A
तुम्हारे जीवन की चाबी [संगीत] तुम्हारे पास नहीं है। वो दूसरों की जेब में है। और तुम कहते हो तुम स्वतंत्र हो, नहीं। तुम केवल सजावटी गुलामी में हो। अपने दम पर जीने का पहला कदम है। किसी से बात करने को
Speaker A
से मुक्त है वह बाजार के बीच में भी शांत रह सकता है। असल सवाल बाहर नहीं है। असल सवाल यह है तुम्हारे भीतर मालिक कौन है?
Speaker A
कहेगा, कुछ देखने को कहेगा। मत भागो। बैठे रहो। तुम पहली बार अपने मन को देखोगे और तुम चौंक जाओगे। तुम्हारा सबसे बड़ा मालिक बाहर नहीं बैठा। तुम्हारा मालिक तुम्हारा अपना मन है। वो कहता है यह करो, वो बनो।
Speaker A
आलोचना की। दुखी किसी ने ध्यान दिया। ऊर्जा आ गई। किसी ने नजरअंदाज किया। सब खाली यह जीवन नहीं है। यह रिमोट कंट्रोल है और रिमोट किसी और के हाथ में है। अपने दम पर जीना शुरू वहीं होता है जहां तुम यह
Speaker A
उससे बेहतर देखो। उससे आगे निकलो। और तुम दौड़ते रहते हो। कभी पूछा उससे क्यों? कहां जाना है? किस लिए? जिस दिन तुमने अपने मन से सवाल पूछना शुरू किया, उसी दिन अपने दम पर जीने की शुरुआत हो जाती है। क्योंकि
Speaker A
वास्तव में सामने वाले के शब्द चोट पहुंचा रहे हैं या तुम्हारे भीतर पहले से कोई घाव है? क्योंकि सुनो दुनिया केवल दबाती है। जो पहले से भीतर है वही बाहर आता है। अगर भीतर शांति हो तो अपमान भी भीतर जाकर मर
Speaker A
स्वतंत्रता बाहर की परिस्थिति नहीं, भीतर की स्थिति है। और अब मैं तुमसे कुछ ऐसी बात कहूंगा जिसे सुनकर शायद तुम्हारा मन असहज हो जाए। क्योंकि मन हमेशा वही सुनना चाहता है जिससे उसकी पुरानी आदतें बची रहें। मन चाहता है कि कोई उसे दिशा दे। कोई
Speaker A
से बाहर जीते आए हो। तुम्हें आईने में चेहरा दिखता है। लेकिन तुमने कभी आंख बंद करके अपना चेहरा देखा? तुम्हें अपनी आवाज सुनाई देती है। लेकिन तुम्हें पता है तुम्हारे भीतर कितनी आवाजें हैं। एक आवाज कहती है करो। दूसरी कहती है मत करो। एक
Speaker A
उसे बताए क्या सही, क्या गलत। कोई उसे भरोसा दे कि डरो मत, मैं हूं। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं जिस दिन तुम किसी के मैं हूं पर टिक गए, उसी दिन तुमने अपने मैं हूं को खो दिया। ध्यान से समझना। अपने दम पर जीना
Speaker A
भीतर की भीड़ को संभाल रहे हो। ध्यान का अर्थ क्या है? ध्यान का अर्थ किसी मंत्र को दोहराना नहीं। ध्यान का अर्थ है भीतर की भीड़ को देखना। कुछ मत करना। बस देखो मन भागेगा। उसे भागने दो। विचार आएंगे।
Speaker A
अकेले लड़ना नहीं है। यह दुनिया छोड़ देना नहीं है। यह लोगों से दूरी बनाना नहीं है। यह भीतर ऐसी जगह खोजना है जहां तुम्हारा अस्तित्व किसी दूसरे के होने या ना होने पर निर्भर ना करें। तुम्हारा दुख कहां से आता है? तुम
Speaker A
यह जान लिया [संगीत] कि वह अपने मन से अलग है उसे फिर किसी सहारे की जरूरत नहीं रहती। फिर अकेलापन भी बदल जाता है। सामान्य आदमी अकेला होता है तो बेचैन हो जाता है। जागा हुआ आदमी अकेला होता है तो
Speaker A
सोचते हो घटनाओं से? नहीं, दुख आता है अपेक्षा से। तुम किसी को पकड़ते हो और कहते हो तुम मुझे खुश रखोगे। तुम मुझे समझोगे। तुम मुझे कभी छोड़ोगे नहीं। तुम मेरे अनुसार रहोगे। और फिर एक दिन सामने वाला वैसा नहीं करता। और तुम कहते हो उसने
Speaker A
किसको क्या नहीं कौन तुमसे खुश है कौन नाराज है लेकिन कभी खुद से पूछा मुझे क्या पसंद है मैं बिना किसी पहचान के कौन हूं अगर सब कुछ छीन लिया जाए नाम पैसा रिश्ते काम तब क्या बचेगा यह प्रश्न खतरनाक है
Speaker A
मुझे दुख दिया। नहीं। दुख उसने नहीं दिया। दुख तुम्हारी पकड़ ने दिया। जीवन को मुट्ठी में पकड़ोगे तो रेत की तरह फिसलेगा। खुली हथेली रखोगे तो जो आएगा टिकेगा। जो जाएगा उसे जाने दोगे। और तब पहली बार तुम जीना शुरू करोगे। देखो लोग
Speaker A
काम करता है, प्रेम करता है, दोस्ती करता है, सपने देखता है। लेकिन उसके भीतर एक जगह होती है जहां कोई प्रवेश नहीं कर सकता। एक शांत केंद्र जहां वह अकेला है और पूर्ण है और तब जीवन बदल जाता है क्योंकि
Speaker A
कहते हैं मुझे मोटिवेशन चाहिए। मैं कहता हूं तुम्हें मोटिवेशन नहीं, स्पष्टता चाहिए। क्योंकि मोटिवेशन नशा है। आज मिला, कल उतर गया। आज किसी की बात सुनकर आग लग गई। कल वही आदमी नहीं मिला। आग बुझ गई। फिर क्या करोगे? फिर किसी और की तलाश, फिर
Speaker A
हिम्मत करते हैं क्योंकि यहां से तुम्हारे सारे भ्रम टूटने शुरू होते हैं। अब तक तुमने जीवन को ऐसे जिया जैसे तुम्हें कुछ बनना है। कुछ हासिल करना है। कुछ साबित करना है। कुछ इकट्ठा करना है। और तुमने कभी यह नहीं पूछा जो इकट्ठा कर रहा है वो
Speaker A
किसी और की वीडियो, फिर किसी और का भाषण। और पूरी जिंदगी तुम उधार की आंख लेकर घूमते रहोगे। अपनी आंख पैदा करो। और अपनी आंख पैदा करने का एक ही तरीका है। अपने जीवन की जिम्मेदारी लेना। बहुत लोग
Speaker A
वो कौन है ध्यान से देखो तुम्हारे जीवन की बहुत सी दौड़े तुम्हारी नहीं है वे तुलना से पैदा हुई है दूसरा आगे निकला दूसरे के पास ज्यादा है दूसरा ज्यादा पसंद किया जा रहा और तुम भागने लगे। लेकिन जो तुलना में
Speaker A
जिम्मेदारी से भागते हैं। क्योंकि जिम्मेदारी का मतलब है अब बहाना खत्म। अब दोष देने के लिए कोई नहीं। अब यह नहीं कह सकते। मां-बाप ऐसे थे, समाज ऐसा था, वक्त खराब था। लोगों ने मौका नहीं दिया। नहीं। जिस दिन तुम कहते हो जो भी हूं, जहां भी
Speaker A
जीने वाला आदमी तुलना छोड़ देता है। वो प्रतिस्पर्धा नहीं करता। वो खिलता है। फूल कभी एक दूसरे से प्रतियोगिता नहीं करते। गुलाब कभी कमल को देखकर दुखी नहीं होता। आसमान कभी समुद्र बनने की कोशिश नहीं करता। अस्तित्व में हर चीज अपनी जगह पूरी
Speaker A
हूं, यहां से आगे मेरी जिम्मेदारी है। उस दिन एक नई ऊर्जा पैदा होती है। क्योंकि दोष देना आसान है। निर्माण करना कठिन है। और जीवन हमेशा कठिन रास्तों पर फूल खिलाता है। तुमने कभी गौर किया? हमेशा तुम्हें कहा गया भीड़ में चलो। भीड़ गलत नहीं
Speaker A
खालीपन खड़ा है। इसलिए मैं तुमसे कहता हूं अपने दम पर जीना शुरू करना है तो एक दिन खुद से पूछो। अगर दुनिया में कोई मुझे देख नहीं रहा होता तो मैं क्या करता? अगर कोई मुझे जज नहीं कर रहा होता तो मैं कैसा
Speaker A
होती। लेकिन मैं पूछता हूं क्या भीड़ कभी जागी है? भीड़ सोचती नहीं। भीड़ दोहराती है। एक आदमी डरता है। हजार आदमी उसी डर को सच मान लेते हैं। एक आदमी भागता है। बाकी भी भागने [संगीत] लगते हैं। और धीरे-धीरे
Speaker A
झूठ शुरुआत में आराम देता है और बाद में कैद तुम्हारा सबसे बड़ा डर क्या है असफलता नहीं अगर गहराई में जाओगे तो पाओगे सबसे बड़ा डर है स्वीकार ना किया जाना लोग मुझे पसंद करेंगे या नहीं लोग मुझे
Speaker A
पूरी दुनिया ऐसी दौड़ में शामिल हो जाती है जिसका गंतव्य किसी को पता नहीं। तुम भी भाग रहे हो। कहां जा रहे हो?
Speaker A
हो। फिर एक दिन अकेले बैठते हो और महसूस होता है मैं हूं कौन? यहीं से खोज शुरू होती है और यह खोज किसी किताब में नहीं मिलेगी। किसी गुरु के पास नहीं मिलेगी। कोई तुम्हें रास्ता दिखा सकता है। चलना
Speaker A
रुको और पूछो यह सपना मेरा है या उधार का? यह इच्छा मेरी है या मुझे दी गई है? यह जीवन मैं जी रहा हूं या निभा रहा हूं? बहुत लोग जीते नहीं। वे किरदार निभाते हैं। सुबह उठते, चेहरा पहनते, बातें पहनते, हंसी पहनते और रात को
Speaker A
केवल जागना है। बस इतना क्योंकि जो जाग गया वो देखता है कि जीवन कोई युद्ध नहीं था। जीवन कोई परीक्षा नहीं था। जीवन कोई प्रोजेक्ट नहीं था। जीवन तो एक अवसर था खुद को जानने का। और जिस दिन तुमने खुद को
Speaker A
थक कर गिर जाते हैं। क्योंकि अभिनय बहुत थका देता है। अपने दम पर जीने वाला आदमी अभिनय छोड़ देता है। उसके पास खोने को इमेज नहीं होती। वह जैसा है वैसा होता है। अगर रोना है तो रोता है। अगर हंसना है तो
Speaker A
नहीं। इससे बड़ी शक्ति नहीं। इससे बड़ी स्वतंत्रता नहीं। क्योंकि जिस आदमी ने खुद का साथ सीख लिया उससे दुनिया कुछ छीन नहीं सकती। और अब उस अंतिम भ्रम की बात करते हैं जो सबसे गहरा है क्योंकि अपने दम पर
Speaker A
हंसता है। अगर नहीं पता तो कहता है। नहीं पता। और यहीं से उसकी ताकत जन्म लेती है। तुम्हें बचपन से परफेक्ट बनने की बीमारी दी [संगीत] गई। गलती मत करो। हार मत मानो। कमजोर मत दिखो। और इसी कोशिश में तुम असली
Speaker A
उम्र रिश्ते उपलब्धियां। लेकिन यह सब तुम्हारे बारे में जानकारी है। तुम नहीं। अगर तुम्हारा नाम बदल दिया जाए क्या तुम बदल जाओगे? अगर काम बदल जाए क्या तुम बदल जाओगे? अगर लोग तुम्हें भूल जाए क्या तुम खत्म हो जाओगे? नहीं। फिर
Speaker A
होना भूल गए। सुनो। जो अपने दम पर जीना सीखता है, वह अपनी कमजोरी से नहीं भागता। वह उसे देखता है। वह अपने डर को छुपाता नहीं। वह उसके
Speaker A
है मैं बहुत परेशान हूं। लेकिन अगर उसकी परेशानी छीन लो तो उसे लगेगा उसकी कहानी छीन गई। कोई कहता है मुझे कोई समझता नहीं। लेकिन भीतर कहीं वह इसी बात से अपनी विशेषता बना चुका है। हम अपने घावों से भी
Speaker A
पहचान बना लेते हैं और फिर उनसे बाहर नहीं निकलना चाहते। इसलिए मैं कहता हूं अपने दुखों को भी पकड़ कर मत बैठो। वे भी गुजरने वाली चीजें हैं। तुम उनसे बड़े हो। कई लोग अपने अतीत को ऐसे लेकर चलते हैं
Speaker A
जैसे वह उनका धर्म हो। किसी ने धोखा दिया, किसी ने अपमान किया, कुछ खो गया और सालों बाद भी वही कहानी दोहराते रहते। लेकिन समझो जो घटना खत्म हो चुकी उसे हर दिन याद करके तुम उसे फिर से जी रहे हो। दर्द घटना
Speaker A
में नहीं रहता। दर्द स्मृति से चिपके रहने में रहता है। अपने दम पर जीना मतलब अपनी कहानी से बाहर आना क्योंकि कहानी हमेशा अतीत होती है और जीवन हमेशा अभी है। अभी यही क्षण और मन को यही पसंद नहीं। मन कहता
Speaker A
है थोड़ा और सोचो, थोड़ा और योजना बनाओ, थोड़ा और तैयारी करो। थोड़ा और इंतजार करो। और देखतेदेखते पूरा जीवन तैयारी में निकल जाता है। जीना शुरू ही नहीं होता। तुम्हें लगता है जब पैसे होंगे तब जिऊंगा। जब सही इंसान मिलेगा तब जिऊंगा। जब समय
Speaker A
मिलेगा तब जिऊंगा। जब डर खत्म होगा तब जिऊंगा। लेकिन सुनो डर खत्म नहीं होता। डर के साथ चलना सीखना पड़ता है। समुद्र कभी शांत नहीं होता। नाविक चलना सीखता है और यही अपने दम पर जीना है। तूफान रुकने का
Speaker A
इंतजार मत करो। तूफान में संतुलन सीखो। एक और बात तुम हमेशा सोचते रहे कि शक्ति नियंत्रण में है। सब कंट्रोल हो जाए। सब तय हो जाए तभी सुरक्षित महसूस होगा। लेकिन जीवन नियंत्रण से नहीं खिलता। जीवन भरोसे से खिलता है। नियंत्रण डर से आता है।
Speaker A
भरोसा समझ से पेड़ पत्ते गिरने से नहीं डरता। उसे पता है फिर नए आएंगे। नदी मोड़ आने से नहीं डरती। उसे पता है बहना है। सूरज बादलों [संगीत] से नहीं लड़ता। उसे पता है फिर निकलना है। और तुम तुम हर छोटी
Speaker A
चीज पकड़ कर बैठे हो। यही मेरी पहचान, यही मेरा तरीका, यही मेरा इंसान, यही मेरी जगह। और जीवन कह रहा है छोड़ो बहू बदलो जियो जो पकड़ता है वह सिकुड़ता है जो बहता है वह बढ़ता है और एक दिन ऐसा आए जब तुम
Speaker A
सुबह उठो और पहली बार महसूस करो मुझे किसी को साबित नहीं करना मुझे किसी से आगे नहीं निकलना मुझे किसी की अनुमति नहीं चाहिए मैं यहां हूं मैं पर्याप्त हूं मैं जीवन को अनुभव करने आया हूं मालिक बनने नहीं और
Speaker A
उसी दिन तुम काम करोगे लेकिन काम तुम्हें नहीं खाएगा। तुम प्रेम करोगे लेकिन प्रेम तुम्हें गुलाम नहीं बनाएगा। तुम सफल होगे लेकिन सफलता तुम्हारी पहचान नहीं बनेगी। तुम हारोगे लेकिन हार तुम्हें तोड़ेगी नहीं। क्योंकि अब तुम पहली बार अपने भीतर
Speaker A
खड़े हो। और जिसने अपने भीतर खड़ा होना सीख लिया उसके लिए पूरी दुनिया बदल जाती है। क्योंकि तब उसे सहारा नहीं चाहिए। तब वह स्वयं एक सहारा बन जाता है और अब एक ऐसी जगह पर आते हैं जहां बहुत लोग वापस
Speaker A
मुड़ जाते हैं क्योंकि यहां आकर उन्हें पहली बार दिखने लगता है कि वे जिन चीजों को अपना जीवन समझ रहे थे वे केवल आदतें थी। तुमने कभी ध्यान दिया? तुम जो सबसे ज्यादा दोहराते हो धीरे-धीरे [संगीत] वही बन जाते हो। अगर तुम रोज शिकायत करते हो
Speaker A
तो एक दिन शिकायत तुम्हारा स्वभाव बन जाती है। अगर तुम रोज दूसरों से तुलना करते हो तो एक दिन तुम्हारी आंखें अपनी सुंदरता देखना बंद कर देती है। अगर तुम रोज सहारा ढूंढते हो तो एक दिन तुम्हें अपनी ताकत
Speaker A
दिखाई देना बंद हो जाती है। और यही सबसे बड़ा खतरा है। क्योंकि आदमी अपनी कैद का इतना आदि हो जाता है कि आजादी उसे डराने लगती है। एक पिंजरे में पैदा हुआ पक्षी जब पहली बार खुला आसमान देखता है तो हमेशा
Speaker A
उड़ नहीं जाता। कई बार वापस पिंजरे में लौट आता है। क्यों? क्योंकि पिंजरे में सुरक्षा है। आसमान में अज्ञात है। और याद रखना मन हमेशा ज्ञात को चुनता है। चाहे वह दुखी क्यों ना हो। इसलिए लोग पुराने दुख
Speaker A
छोड़ते नहीं। पुराने रिश्ते छोड़ते नहीं। पुराने डर छोड़ते नहीं। क्योंकि वहां परिचय है। वहां आदत है और आदत बहुत आराम देती लेकिन जीवन [संगीत] नहीं देती। जीवन हमेशा थोड़ा अनजान होता है। थोड़ा असुरक्षित थोड़ा नया। इसलिए अपने दम पर
Speaker A
जीना शुरू करने वाला आदमी एक चीज सीखता है। आराम से ऊपर सत्य को चुनना यह आसान नहीं। क्योंकि आराम मीठा होता है। सत्य शुरुआत में कड़वा लगता है। आराम कहता है। कल से शुरू करेंगे। सत्य कहता है अभी आराम
Speaker A
कहता है। पहले सब ठीक हो जाए। फिर सत्य कहता है कुछ कभी पूरी तरह ठीक नहीं होगा। चलो आराम कहता है किसी का इंतजार करो। सत्य कहता है खुद उठो और सुनो। खुद [नाक से की जाने वाली आवाज़] उठने का मतलब
Speaker A
यह नहीं कि तुम्हें सब पता होना चाहिए। बहुत लोग इसलिए शुरू नहीं करते क्योंकि उन्हें पूरा रास्ता दिख नहीं रहा। वे कहते हैं पहले निश्चित हो जाऊं। पहले गारंटी मिल जाए, पहले डर चला जाए, फिर कदम उठाऊंगा। लेकिन जीवन ऐसे नहीं चलता। जीवन
Speaker A
में रास्ता चलने से बनता है। बैठकर नहीं। अगर तुम पूरी सीढ़ी देखना चाहते हो तो शायद कभी पहला कदम नहीं लोगे। बस अगला कदम देखो। इतना काफी है। क्योंकि जो चलने लगता है उसके लिए रास्ते खुलते जाते हैं और जो
Speaker A
खड़ा रहता है उसके लिए दुनिया बंद होती जाती है। एक और बात समझो। तुम्हारे भीतर जो आवाज हर समय बोलती रहती है वो हमेशा सच नहीं होती। मन बहुत चालाक है। वो तुम्हें बचाना चाहता है। लेकिन कई बार बचाते बचाते
Speaker A
जीने नहीं देता। वो कहेगा मत बोलो मत कोशिश करो मत मत बदलो मत जोखिम लो। कहीं हार गए तो लेकिन मैं तुमसे पूछता हूं अगर कोशिश ही नहीं की तो जीतोगे कब? और अगर हार भी गए तो क्या सच में खत्म हो जाओगे?
Speaker A
नहीं तुम फिर उठ जाओगे। तुम उससे सीखोगे तुम और गहरे हो जाओगे। तुम्हारी जड़े और मजबूत होंगी। हारने से आदमी नहीं टूटता। दूसरों की शर्तों पर जीने से टूटता है और यह बात याद रखना जब तुम अपने दम पर जीना
Speaker A
शुरू करोगे कुछ लोग तुम्हें पसंद नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें तुम्हारा पुराना रूप पसंद था जो हर समय उपलब्ध था जो हर समय मान जाता था जो हर समय अनुमति मांगता था अब जब तुम अपने केंद्र से जीना शुरू
Speaker A
करोगे कुछ लोग कहेंगे तुम बदल गए हो मुस्कुरा देना क्योंकि बदलना ही जीवन है सिर्फ मृत चीजें नहीं बदलती लेकिन ध्यान रहे कठोर मत बन जाना स्वतंत्रता का मतलब दीवार नहीं स्वतंत्रता का मतलब खुलापन है। तुम प्रेम करो लेकिन खो मत। तुम साथ चलो
Speaker A
लेकिन खुद को छोड़ो मत। तुम दुनिया में रहो। लेकिन अपना घर भीतर बनाओ। ऐसा घर जहां कोई तूफान पहुंच ना सके। जहां तुम्हारी कीमत किसी की राय से तय ना हो। जहां तुम्हारी शांति किसी की मौजूदगी पर निर्भर ना हो। और जिस दिन यह घर बन गया उस
Speaker A
दिन पहली बार तुम समझोगे अपने दम पर जीना बोझ नहीं था। यह तो सबसे बड़ा उत्सव था क्योंकि तब तुम दुनिया से लेने नहीं दुनिया में होने आते।
Topics:ओशोप्रेरणास्वतंत्रताआत्मनिर्भरतामोटिवेशनजीवन दर्शनडर से मुक्तिसहारा और प्रेमआत्मज्ञानहिंदी भाषण











