मैं सबका अच्छा करता हूँ, फिर भी मेरे साथ हमेशा बुरा ही … — Transcript

एक राजा की कहानी जो बुराई से अपने कर्मों का निवारण सीखता है। संत के संदेश से जीवन में सुधार आता है।

Key Takeaways

  • बुराई करने वाले आपके बुरे कर्मों को काटते हैं।
  • संतों के संदेशों को समझना और स्वीकार करना जरूरी है।
  • अपने कर्मों का निवारण करना जीवन सुधार का मार्ग है।
  • बुराई से घबराने की बजाय उसका धन्यवाद करना चाहिए।
  • सच्चा सुधार आत्म-स्वीकृति और कर्म सुधार से आता है।

Summary

  • राजा जो नास्तिक था और दान-दक्षिणा नहीं देता था।
  • एक संत राजा से दान मांगता है, राजा मना कर देता है।
  • राजा के घोड़े ने ली कर दी, जिसे संत राजा से लेने पर मजबूर होता है।
  • संत राजा को ली का पहाड़ बनने का श्राप देता है जो बदबू फैलाता है।
  • राजा संत से माफी मांगता है और सुधार का वचन देता है।
  • संत राजा से कहता है कि वह अपनी बुराई फैलाए।
  • जब लोग राजा की बुराई करते हैं तो ली का पहाड़ साफ हो जाता है।
  • संत बताता है कि बुराई करने वाले राजा के बुरे कर्मों को काट रहे थे।
  • राजा सीखता है कि बुराई करने वालों का धन्यवाद करना चाहिए।
  • कहानी कर्म, प्रारब्ध और बुराई के सकारात्मक पहलुओं को दर्शाती है।

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Speaker A
मैं सबके लिए अच्छा करता हूं, लेकिन मेरे लिए लोग बुरा कर रहे हैं। तो इससे बहुत ज्यादा लोग परेशान हैं। तो इस पर एक छोटी सी कहानी सुनाता हूं। तो उसके बाद है ना, बुराई अच्छी लगने लग जाएगी। तो हुआ यूं,
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Speaker A
कि एक राजा थे। बड़े निर्मोही थे। हम नास्तिक थे। भगवान में कोई विश्वास नहीं था। हम कोई दान-दक्षिणा कुछ करना ही नहीं जीवन में। राजपाठ का आनंद ले रहे थे। तो एक दिन रथ पर आए। एक संत आए उनके
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Speaker A
सामने। संत रुके आकर के। संत को पता लगा इस तरह का राजा है। तो संत ने कहा राजा को कि मुझे आपसे दान चाहिए। तो राजा ने कहा कि यह मेरी नियति में नहीं है। मैं दान-वदान नहीं देता। फालतू के खर्चे मैं नहीं
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Speaker A
करता। तो संत ने कहा कि नहीं, मुझे तो आपसे दान चाहिए ही चाहिए। मेरी इच्छा है कि आपसे दान। तो राजा ने कहा कि भाई, मैंने कहा ना कि मेरे पास कुछ फालतू है ही नहीं देने के लिए।
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Speaker A
हम इसलिए मैं कुछ देता नहीं हूं। आप जाइए यहां से। हम तो संत ने कहा कि पर मुझे आपसे लेना है। हम इन बातों के बीच में क्या हुआ कि राजा के घोड़े ने जो रथ का घोड़ा था, उसने ली कर
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Speaker A
दी। तो संत ने देखा कि राजा के घोड़े ने लीद कर दी। तो संत ने राजा को कहा कि यह तो आपके किसी काम की नहीं है। तो आप यही उठा के दे दीजिए। पर मुझे आपके हाथ से
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Speaker A
लेना है कुछ ना कुछ। तो राजा ने कहा कि यह ऐसे तो पीछा छोड़ेगा नहीं। उठाकर वह ली अपने हाथ से दे दी कि जा। संत ने कहा कि हां, मैं खुश और खुश होकर के उन्होंने कहा कि जा और बढ़े। अगले दिन सुबह राजा बालकनी
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Speaker A
में बैठे अपने राजमहल की और बड़ी बदबू आ रही। सामने देखा कि ली का पहाड़ बना हुआ है। तो बुलाया अपने सैनिकों को कि क्या है? हटाओ इसको। वो हटवाया गया लेकिन वो फिर बन गया। बदबू फैलती जा रही है। समझ
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Speaker A
में नहीं आ रहा राजा के। तो राजा को ध्यान आया कि एक संत आया था। उसको घोड़े की ली थी और उसने कहा था कि और बढ़े। तो कहीं इस वजह से तो नहीं बढ़ रही है। तो राजा को
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Speaker A
जैसे ही यह ख्याल आया, राजा निकला महल से उस संत को ढूंढने के लिए। ढूंढते-ढूंढते संत के पास पहुंचा। जाकर के बोला कि आप कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं। मुझसे गलती हो गई। मैं माफी चाहता हूं। मेरे महल के
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Speaker A
बाहर इस तरह से घोड़े की ली का पहाड़ बन गया है। मुझे क्षमा करें। हम तो संत ने कहा कि भाई, वो तो आपके कर्म हैं। आप मुझे धन देते तो धन बढ़ता। आपने जो दिया मेरा तो कर्तव्य बनता है कि मैं आपको आशीर्वाद
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Speaker A
दूं। तो ये तो आपके कर्म हैं। आपको भोगने पड़ेंगे। तो राजा ने बड़ी रिक्वेस्ट की। राजा ने माफी मांगी। राजा ने कहा कि महाराज, मुझे क्षमा करें। मुझसे गलती हो गई। अब मेरे अंदर वो सुधार आ जाएगा। आप
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Speaker A
निश्चिंत रहें। मैं समझ गया हूं आपके संदेश को। हम तो कुछ तो निवारण होगा इसका। तो संत ने कहा कि हां, निवारण है लेकिन मुझसे कोई प्रश्न नहीं पूछेगा जब तक निवारण ना हो जाए। ओके। तो राजा ने कहा कि ठीक है। संत ने कहा कि
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Speaker A
जा अपनी प्रजा में कुछ ऐसा फैला दे कि लोग तेरी बुराई करने लग जाएं। राजा वापस आया। राजा ने बातें ऐसी फैलवा दी कि सब जगह राजा की बुराई हो रही है। सारी प्रजा राजा की बुराई कर रही है। इधर जब सुबह बालकनी
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Speaker A
में देखा तो पहाड़ जो है वो साफ हो चुका है। राजा को लगा कि हां, अब ये तो पहले जैसा हो गया है। वही सुगंध आ रही है जैसे पहले आती थी। कोई दुर्गंध नहीं आ रही। राजा फिर गया संत के पास। संत के पास जाकर
02:29
Speaker A
के बोला कि महाराज, पहाड़ तो साफ हो गया है। सब कुछ ठीक हो गया है। अब मैं प्रश्न पूछ सकता हूं। तो संत ने कहा कि हां, पूछो। बोला कि महाराज, ये हुआ कैसे? उस संत ने कहा कि जब लोग तुम्हारी बुराई कर रहे थे
02:40
Speaker A
ना तो तुम्हारे प्रारब्ध को काट रहे थे। तुम्हारे बुरे कर्मों के हिस्सेदार बन रहे थे। तो तुम्हारे सारे प्रारब्ध उन लोगों ने खत्म कर दिए। इसलिए ऐसा संभव हुआ। तो आज के बाद कभी कोई बुराई करे तो उनका
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Speaker A
धन्यवाद करना। वाह!
Topics:महादेवविष्णुकृष्णकहानीसंतराजाकर्मप्रारब्धबुराईधार्मिक कथा

Frequently Asked Questions

राजा को ली का पहाड़ क्यों बना?

राजा ने संत को दान नहीं दिया और घोड़े की ली संत को दी, जिससे संत ने ली का पहाड़ बनाकर बदबू फैलाई। यह राजा के कर्मों का परिणाम था।

संत ने राजा को क्या सलाह दी?

संत ने राजा को कहा कि वह अपनी बुराई फैलाए ताकि लोग उसकी बुराई करें और उसके बुरे कर्म कट जाएं।

बुराई करने वालों का राजा पर क्या प्रभाव पड़ा?

जब लोग राजा की बुराई करने लगे, तो उनके बुरे कर्म कट गए और ली का पहाड़ साफ हो गया, जिससे राजा को सुधार का संदेश मिला।

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