देवों के देव महादेव में प्रजापति दक्ष के यज्ञ और सती के प्रति उनके कठोर निर्णय की कथा।
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Key Takeaways
- प्रजापति दक्ष का यज्ञ और मूर्ति स्थापना धार्मिक मत और विचारधारा का प्रतीक है।
- सती के रुद्राक्ष पहनने को परिवार में विरोधी मत के रूप में देखा जाता है।
- प्रजापति दक्ष की कर्तव्यपरायणता सती को दंडित करने का कारण बनती है।
- सप्त ऋषि यज्ञ में शामिल होकर भी दोषपूर्ण मूर्ति स्थापना पर असहमत हैं।
- यह कथा भविष्य में होने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं का संकेत देती है।
What the video covers
- वीडियो में प्रजापति दक्ष के यज्ञ की तैयारी और मूर्ति स्थापना का वर्णन है।
- सती और रुद्राक्ष के संदर्भ में पारिवारिक और धार्मिक मतभेद दिखाए गए हैं।
- प्रजापति दक्ष भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापना को अपने मत का प्रतीक मानते हैं।
- सती को रुद्राक्ष पहनने से मना किया जाता है, जो विरोधी मत का प्रतीक है।
- प्रजापति दक्ष की कठोरता और कर्तव्यपरायणता के कारण सती को दंडित करने की संभावना जताई गई है।
- सप्त ऋषि यज्ञ में शामिल होते हैं, लेकिन कुछ ऋषि दोषपूर्ण मूर्ति स्थापना से असहमत हैं।
- प्रजापति दक्ष का यज्ञ और मूर्ति स्थापना भविष्य की घटनाओं का संकेत देती है।
- सामाजिक और धार्मिक नियमों के पालन पर बल दिया गया है।
- वीडियो में धार्मिक गीत और मंत्रों के माध्यम से माहौल निर्मित किया गया है।
- सती और प्रजापति दक्ष के बीच भावनात्मक और धार्मिक टकराव को दर्शाया गया है।
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Speaker A
अ।
Speaker A
[संगीत]
Speaker A
[संगीत]
Speaker A
[संगीत]
Speaker A
करपूर गौरम करुणावतारं संसार सारम भुजगेंद्र हारम।
Speaker A
करपूर गौरम करुणा अवतारम संसार सारम गुज केंद्र हारम।
Speaker A
सदा वसंतम हदर विंदे सदा वसंतम।
Speaker A
अरविंद भव भवानी सतम नमामि।
Speaker A
भव भवानी सतम नमाम।
Speaker A
[संगीत]
Speaker A
दीदी दीदी देखो मुझे क्या मिला।
Speaker A
सती है किसे? अरे पर क्यों? कितना सुंदर है।
Speaker A
तू जानती भी है यह क्या है?
Speaker A
यह रुद्राक्ष है।
Speaker A
हमारे विरोधी मत के लोग पहनते हैं इसे।
Speaker A
तो क्या हुआ? इसे रख लेने से मैं भी विरोधी मत की नहीं हो जाऊंगी सती।
Speaker A
रुद्राक्ष को स्पर्श करना भी हमारे लिए वर्जित है।
Speaker A
यदि ऐसा होता तो पिताजी मुझे अवश्य बताते।
Speaker A
सती तू इसे फेंक है या नहीं?
Speaker A
कुछ अपना के त्याग देना सती का स्वभाव नहीं।
Speaker A
पिताजी के लाड़ प्यार ने बिगाड़ दिया है इसे सती।
Speaker A
हो सकता है पिताजी ने तुम्हें यह पहले ना बताया हो।
Speaker A
और इस कारण व तुम्हें क्षमा भी कर दे।
Speaker A
परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि तुम्हारी इस भूल से उन्हें कष्ट अवश्य होगा।
Speaker A
आदिति तुझे यहां रहकर इसके साथ समय नष्ट करना है तो कर।
Speaker A
वहां पिताजी मूर्ति अभिषेक के लिए हमारी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।
Speaker A
[संगीत]
Speaker A
पिताजी के दुख का कारण मैं बनू ऐसा संभव ही नहीं।
Speaker A
[संगीत]
Speaker A
[संगीत]
Speaker A
[संगीत]
Speaker A
शवा वायव स्पाय वस् देवो वसता पपय शजन माय रमण।
Speaker A
पायम देव भाग पूज स्वस्ति प्रजापति रमया।
Speaker A
[संगीत]
Speaker A
[संगीत]
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
सप्त ऋषि पधार रहे हैं।
Speaker A
इस शुभ अवसर पर सप्त ऋषियों की उपस्थिति मेरे लिए सम्मान की बात है।
Speaker A
मूर्ति के अनावरण की अनुमति दे मुनिवर।
Speaker A
अनुमति है।
Speaker A
प्रजापति आप अपने देश में सफल।
Speaker A
[संगीत]
Speaker A
हो।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
जय प्रजापति दक्ष की।
Speaker A
जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
[संगीत]
Speaker A
प्रजापति ने यह क्या कर दिया है?
Speaker A
इस अधूरी मूर्ति की स्थापना कैसे होगी?
Speaker A
प्रजापति दक्ष की।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
जीवित रहने के लिए भोग तो पशु बक्षी भी करते हैं।
Speaker A
अपने हित अपने स्वार्थ के लिए वे भी जी लेते हैं।
Speaker A
मनुष्य एक ऐसा जीव है जिसे ईश्वर ने अपने हित के साथ-साथ संसार की भलाई और औरों के उद्धार के बारे में चिंतन करने की क्षमता प्रदान की है।
Speaker A
इसी कारण सभी विधि विधान सामाजिक और निजी जीवन व्यतीत करने की हर रीति नीति इसकी स्थापना करके मैंने इस सभ्यता की स्थापना की है।
Speaker A
किंतु आज जो मैं कार्य संपन्न करने जा रहा हूं वो मेरी कर्तव्य परायणता की पराकाष्ठा होगी।
Speaker A
उस भव्य मंदिर का निर्माण और उसमें भगवान श्री विष्णु की मूर्ति की स्थापना।
Speaker A
यह सदैव प्रतीक होगा हमारे मत का, हमारे विश्वास का, हमारी विचारधारा का।
Speaker A
और इस सत्य का देवों में देव यदि कोई है तो वो भगवान श्री विष्णु।
Speaker A
केवल भगवान विष्णु ही पूजनीय है।
Speaker A
केवल भगवान विष्णु ही दर्शनीय है।
Speaker A
उसके अतिरिक्त और कोई नहीं।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
दक्ष की जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
मूर्तिकार तुमने बहुत सुंदर मूर्ति बनाई है।
Speaker A
तुम्हारी कला और तुम्हारा समर्पण सराहनीय है।
Speaker A
[संगीत]
Speaker A
नहीं प्रजापति, इस मूर्ति को बनाने का सौभाग्य ही मेरा सबसे बड़ा पुरस्कार है।
Speaker A
प्रणाम।
Speaker A
[संगीत]
Speaker A
प्रजापति।
Speaker A
प्रजापति मूर्ति के प्रस्थान का समय हो चुका है।
Speaker A
[प्रशंसा]
Speaker A
[संगीत]
Speaker A
यदि अनुमान होता कि प्रजापति ऐसी दोषपूर्ण मूर्ति की स्थापना करने वाले हैं तो इसके अनावरण में सम्मिलित ही नहीं होते।
Speaker A
क्षमा कीजिएगा ऋषि कश, किंतु मैं इस पाप का भागीदार नहीं बन सकता।
Speaker A
मुझे आज्ञा दीजिए ऋषिवर।
Speaker A
इस प्रकार प्रजापति दक्ष के इस यज्ञ से आपका चले जाना उचित नहीं है।
Speaker A
काल के जिस समय खंड पर हम इस प्रक्रिया के साक्षी हैं, अवश्य ही यह भविष्य की किसी महान घटना का संकेतक है।
Speaker A
[संगीत]
Speaker A
[संगीत]
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
भगवान विष्णु की।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
भगवान विष्णु की जय।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
भगवान विष्णु की।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
Speaker A
भगवान विष्णु की।
Speaker A
प्रजापति दक्ष की जय।
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