**सतलुज से किसे होगा सियासी फायदा? BJP या अकाली दल — Transcript & Summary | SozAI**
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दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज के विवाद और पंजाब 1995 की सियासी पृष्ठभूमि की गहराई से पड़ताल।

## Key Takeaways

- सतलुज फिल्म पंजाब के एक संवेदनशील और विवादित दौर को उजागर करती है।
- फिल्म सेंसरशिप और राजनीतिक दबाव के कारण भारत में रिलीज़ नहीं हो पाई।
- पंजाब की दोहरी सच्चाई - खुशहाली और उग्रवाद - को फिल्म ने बखूबी दिखाया है।
- सिस्टम के अंदरूनी भ्रष्टाचार और मनमानी को फिल्म ने बेबाकी से प्रस्तुत किया है।
- फिल्म के विवाद ने सियासी और सामाजिक विमर्श को जन्म दिया है।

## What the video covers

- 3 जुलाई 2026 को दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज बिना प्रचार के Zee5 पर रिलीज हुई और जल्दी ही भारत से हटा दी गई।
- फिल्म की कहानी 1995 के पंजाब की राजनीतिक और सामाजिक अस्थिरता पर आधारित है, जिसमें एक बैंक क्लर्क की गुमशुदगी और सिस्टम से टकराव दिखाया गया है।
- फिल्म का मूल नाम घल्लूघारा था, जिसे सेंसर बोर्ड ने कई कट्स और नाम बदलने के दबाव में रखा गया।
- फिल्म को भारत में रिलीज़ नहीं होने दिया गया जबकि विदेशों में भी कई बार स्क्रीनिंग रद्द हुई।
- सतलुज फिल्म में पंजाब के दो पहलुओं को दिखाया गया है: एक जहां खुशहाली है और दूसरा जहां उग्रवाद और पुलिस अत्याचार है।
- 1980 के दशक से लेकर 1990 के दशक तक पंजाब में उग्रवाद, ऑपरेशन ब्लैक थंडर और पुलिस की कथित मनमानी की पृष्ठभूमि समझाई गई है।
- फिल्म के विवाद में जसवंत सिंह खालड़ा और केपीएस गिल जैसे राजनीतिक और पुलिस अधिकारियों के संदर्भ शामिल हैं।
- फिल्म की रिलीज़ पर खालड़ा परिवार ने अपनी मंजूरी दी, हालांकि नाम बदला गया था।
- फिल्म की कहानी में दिखाया गया है कि किस तरह सिस्टम में हत्या और अन्याय को सामान्य माना जाता था।
- यह वीडियो इस पूरे विवाद के दोनों पक्षों की बातों और पंजाब की सियासी जटिलताओं को विस्तार से समझाता है।

Answers

## Questions about this video

फिल्म सतलुज को भारत में रिलीज़ क्यों नहीं किया गया?

फिल्म में पंजाब के संवेदनशील राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को दिखाने के कारण सेंसर बोर्ड ने कई कट्स मांगे और नाम बदलने को कहा। इसके बावजूद भी फिल्म को भारत में रिलीज़ नहीं किया गया।

फिल्म सतलुज की कहानी किस पर आधारित है?

फिल्म 1995 के पंजाब की राजनीतिक अस्थिरता, उग्रवाद और पुलिस अत्याचार की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जिसमें एक बैंक क्लर्क की गुमशुदगी और सिस्टम से टकराव की कहानी है।

फिल्म का नाम क्यों तीन बार बदला गया?

फिल्म का मूल नाम घल्लूघारा था, जो सिख इतिहास के नरसंहारों को दर्शाता है। सेंसर बोर्ड और अन्य दबावों के कारण नाम पंजाब 95 और फिर सतलुज रखा गया ताकि विवाद कम हो सके।

## Full Transcript — Download SRT & Markdown

00:00

Speaker A

3 जुलाई 2026 की रात एक फिल्म चुपचाप रिलीज होती है। दिलजीत दोसांझ की सतलुज Zee5 पर। अगली सुबह उस फिल्म का हीरो खुद Instagram पर लाइव आकर हंसते हुए कहता है, "देख ली तो ठीक, नहीं देखी तो कोई बात नहीं। डाउनलोड कर लो, पता नहीं कब गायब हो जाए।" लोग हंसते हैं, मजाक समझते हैं। फिर रविवार की शाम आती है और फिल्म भारत से गायब कर दी जाती है। कई दर्शकों ने लिखा, "वो फिल्म देख ही रहे थे कि स्क्रीन अचानक काली हो गई।" हीरो की बात सच निकली। तो आज हम यही समझेंगे कि एक एक्टर को पहले से कैसे पता था। यह फिल्म हटाई क्यों गई? इसका जसवंत सिंह खालड़ा और केपीएस गिल से क्या रिश्ता है? और इस पूरे विवाद के दोनों पक्ष असल में कहते क्या हैं? अब आम धारणा यह है कि फिल्में बैन इसलिए होती हैं क्योंकि उनमें कुछ गलत दिखाया गया कि सरकार डर गई या किसी नेता को बुरा लगा। यही सोचकर लोग स्क्रोल कर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन असली कहानी इतनी सीधी नहीं है। इस फिल्म को बैन करने वाले भी पूरी तरह गलत नहीं हैं और इसका समर्थन करने वाले भी पूरी तरह सही नहीं हैं। यहां एक कमरे में एक नहीं, कई हाथी खड़े हैं और आज हम एक-एक करके सबको देखेंगे। यह कहानी सिर्फ एक फिल्म की नहीं है। यह 1995 के पंजाब की है। एक बैंक क्लर्क की है जो सिस्टम से टकरा गया और एक अफसर की है जिसकी दो तस्वीरें हैं। हम शुरू करेंगे उस सुबह से जहां से यह सब शुरू हुआ था। फिर समझेंगे 1980 के दशक का पंजाब, फिर फिल्म की असली कहानी, फिर केपीएस गिल की दोनों छवियां और आखिर में वो बहस जो आज पूरे देश में चल रही है। तो चलिए 31 साल पीछे चलते हैं। एक ऐसी सुबह तक जहां से यह पूरी कहानी शुरू हुई थी। 6 सितंबर 1995, अमृतसर का कबीर पार्क इलाका। एक आदमी अपने घर के बाहर खड़ा गाड़ी धो रहा है। धूप निकली है। गली में बच्चे खेल रहे हैं। बिल्कुल आम सी सुबह। तभी कुछ गाड़ियां आकर रुकती हैं। कुछ लोग उतरते हैं और वह आदमी दिन दहाड़े अपने ही घर के सामने से हमेशा के लिए गायब कर दिया जाता है। 31 साल बीत चुके हैं। उसकी लाश आज तक नहीं मिली और उसका कसूर सिर्फ इतना था कि उसने हजारों गुमशुदा लोगों का हिसाब मांगा था। जो फिल्म 48 घंटे में गायब कर दी गई वह इसी आदमी की कहानी थी। नाम सतलुज। ओटीटी प्लेटफार्म Zee5 पर बिना किसी प्रचार के यह फिल्म रिलीज हुई और लोग सन्न रह गए। सोशल मीडिया पर लिखा गया कि यह हाल के सालों की सबसे ताकतवर हिंदी फिल्मों में से एक है। दिलजीत दोसांझ के करियर की सबसे बड़ी परफॉर्मेंस बताई गई। लेकिन इससे पहले कि आप समझें कि यह फिल्म हटी क्यों? आपको यह जानना होगा कि यह फिल्म बनी कैसे? क्योंकि इस फिल्म की किस्मत में भी वही लिखा था जो इसके हीरो की किस्मत में था। लड़ाई। 2022 में डायरेक्टर हनी त्रिहान ने यह फिल्म पूरी की। इसका पहला नाम था घल्लूघारा यानी कत्लेआम। सिखों के इतिहास में यह शब्द तीन बड़े नरसिंहारों के लिए इस्तेमाल होता है। 1746, 1762 और 1984। नाम से ही साफ था कि फिल्म किस जख्म को छूने जा रही है। फिल्म सेंसर बोर्ड पहुंची और यहीं से इसकी कैद शुरू हुई। पहले 21 कट मांगे गए और नाम बदलने को कहा गया। नाम बदलकर हुआ पंजाब 95। मेकर्स कट्स के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट गए। इसी बीच फिल्म को टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में दिखाए जाने का न्योता मिला और स्क्रीनिंग से एक दिन पहले फिल्म वहां से वापस खींच ली गई। असली वजह आज तक किसी ने नहीं बताई। फिर कट्स की बाढ़ आ गई। 21 से बढ़कर आंकड़ा 120 पार कर गया। कुछ रिपोर्ट्स तो 127 कट्स तक बताती हैं। मांगे सुनिए। हीरो का नाम बदलो। पंजाब पुलिस का नाम हटाओ। तिरंगे वाला सीन हटाओ। यानी इस कहानी में से कहानी ही निकाल दो। फिर दिखाओ। डायरेक्टर हनी त्रिहान ने बताया कि एक लिस्ट निपटाते तो अगली आ जाती। एक वक्त उन्होंने कहा, "मैं फिल्म से अपना नाम हटा लूंगा पर कट नहीं लगाऊंगा।" दिलजीत भी अड़ गए। फिल्म पूरी आएगी या नहीं आएगी। 2025 की शुरुआत में फिल्म के दुनिया भर में रिलीज होने का ऐलान हुआ। भारत को छोड़कर हर जगह तारीख आई, तारीख गई, रिलीज टल गई। फिल्म भारत में तो दूर कहीं भी थिएटर में नहीं आई। और फिर 3 जुलाई 2026 को चुपके से रास्ता निकला। ओटीटी का फिल्म Zee5 पर आई। पूरी की पूरी। एक भी सीन काटे बिना कीमत सिर्फ नाम की चुकानी पड़ी। एक फिल्म तीन नाम, घल्लूघारा फिर पंजाब 95 और आखिर में सतलुज। और यहां वह बात आती है जो इस पूरी बहस का सबसे बड़ा जवाब है। रिलीज के दिन खुद जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर खाल ने बयान दिया कि बरसों की रुकावटों के बाद इस फिल्म का आना उनके लिए सुकून की बात है। खालड़ा परिवार ने साफ कहा, "ओटीटी पर आया यही वर्जन परिवार की मंजूरी वाला वर्जन है। सिर्फ नाम बदला, एक भी सीन नहीं।" अब वह पहेली सुलझती है। दिलजीत को कैसे पता था? क्योंकि दिलजीत ने सिर्फ किरदार नहीं जिया था। इस फिल्म की किस्मत भी जी थी। जिस फिल्म का नाम तीन बार बदला गया। जिसने 4 साल हर लिस्ट, हर कट, हर टलती तारीख देखी। उसे रिलीज के दो दिन भी ना मिलना शायद कोई हैरानी की बात नहीं थी। लेकिन यह तो सिर्फ फिल्म की किस्मत की कहानी है। असली सवाल यह है कि इस फिल्म में दिखाया क्या गया जिससे इतना डर लगा और उसे समझने के लिए हमें एक और पंजाब देखना होगा। वह पंजाब जो हम सब ने कभी पर्दे पर नहीं देखा। अब आपको समझना होगा कि फिल्म का नाम पंजाब 95 क्यों रखा गया। 1995 वही साल है जिस साल हिंदी सिनेमा की सबसे प्यारी फिल्म आई थी। पंजाब के सरसों के लहलहाते खेतों वाली जहां हीरोइन दौड़कर हीरो के गले लगती थी। पूरे देश ने उस पंजाब से मोहब्बत की। लेकिन इत्तेफाक देखिए। उसी साल उन्हीं खेतों के पीछे रातों को पुलिस की जीपें दौड़ रही थीं। श्मशानों के रजिस्टर लावारिस नामों से भरते जा रहे थे। एक ही पंजाब, एक ही साल, मगर दो कहानियां। एक जो दिखाई गई, एक जो छिपाई गई। सतलुज वही दूसरी कहानी है। और शायद इसीलिए इस फिल्म में एक भी सरसों का खेत नहीं है। इस कहानी को समझने के लिए हमें थोड़ा और पीछे जाना होगा। 1980 के दशक में पंजाब राजनीतिक और सामाजिक अस्थिरता से गुजर रहा था। सिख पहचान को अलग करने की मांगे उठ रही थीं। जर्नल सिंह भिंडरा वाले जैसा नेता उभरा और धीरे-धीरे पंजाब उग्रवाद की तरफ बढ़ने लगा। टारगेटेड किलिंग्स, बम धमाके, जबरन वसूली आम बात हो गई। 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ। स्वर्ण मंदिर परिसर में सेना का ऑपरेशन जिसमें भिंडरा वाले मारा गया मगर आम नागरिक भी मारे गए। कुछ महीनों बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई। उसके बाद 1984 के सिख विरोधी दंगे हुए। भारत के इतिहास का एक बेहद काला अध्याय जिसमें बड़ी संख्या में निर्दोष सिख मारे गए। इसके बाद पंजाब में उग्रवाद और तेज हो गया। 1985 में एयर इंडिया फ्लाइट 182 की बमबारी में 329 लोग मारे गए। ट्रेनों और बसों में यात्रियों की पहचान करके हत्याएं की गईं। खासकर हिंदू नागरिकों को निशाना बनाया गया ताकि वे पंजाब छोड़ दें। जो सिख उग्रवाद के खिलाफ बोलते थे उन्हें भी नहीं बख्शा गया। चाहे वे पत्रकार हों, कवि हों या पुलिस अधिकारी। मानवाधिकार संगठनों ने बाद में दर्ज किया कि इस लगभग एक दशक लंबे संघर्ष में अनुमानतः 21 से 25,000 लोगों की जान गई। राज्य ने इस उग्रवाद को कुचलने के लिए जिस अफसर को आगे किया, वो नाम था केपीएस गिल। 1988 में उन्हीं की अगुवाई में ऑपरेशन ब्लैक थंडर हुआ, जिसमें स्वर्ण मंदिर से उग्रवादियों को बिना मंदिर को नुकसान पहुंचाए निकाला गया। और इसकी दुनिया भर में तारीफ हुई। इसी कामयाबी के लिए 1989 में गिल को पद्मश्री भी दिया गया। 1993 तक आते-आते पंजाब में उग्रवाद लगभग खत्म हो चुका था। स्कूल खुल रहे थे, बाजार गुलजार हो रहे थे। लेकिन इसी सफाई अभियान की आड़ में वर्दी के भीतर के कुछ लोग एक और धंधा चला रहे थे। हर मारे गए उग्रवादी पर इनाम था। तरक्की थी, मेडल था। तो नुस्खा आसान हो गया। बंदा उठाओ, आतंकवादी का ठप्पा लगाओ, एनकाउंटर दिखाओ, इनाम ले लो। बंदा सच में आतंकवादी है या नहीं, यह पूछने वाला कोई नहीं था। यह वह दुनिया है जिसमें फिल्म की कहानी शुरू होती है और इसी दुनिया में रहता है हमारी कहानी का असली हीरो। यह समझना जरूरी था क्योंकि इसके बिना अगला हिस्सा अधूरा लगेगा। अब बात करते हैं उस आदमी की जिसने इसी दुनिया के सामने अकेले खड़े होने की हिम्मत की। अब बात करते हैं फिल्म की क्योंकि इसका पहला ही सीन इतना खतरनाक है कि दिल में डर बैठ जाए। एक अंधेरी रात, पंजाब की सुनसान सड़कें, दूर तक फैले खेत जिनमें कोई रोशनी नहीं। और उस अंधेरे को चीरती हुई एक पुलिस जीप दौड़ रही है। अंदर बैठे सिपाही आपस में गप लड़ रहे हैं। घर की बातें, शादी ब्याह के किस्से, ठिठोली। बिल्कुल वैसा माहौल जैसा किसी रात की गश्त में होता है। फिर जीप रुकती है। पीछे से कुछ बंधे हुए, सहमे हुए लोगों को उतारा जाता है। कोई पूछताछ नहीं, कोई मुकदमा नहीं, कोई आखिरी बात नहीं। एक सुनसान जगह और पास से गोली मार दी जाती है। वही जीप, वही सिपाही। वहीं से छूटी हुई गपशप फिर शुरू कर देते हैं। एक सिपाही कहता है कि उसकी शादी इसलिए नहीं हो पा रही क्योंकि मंगेतर ने कहा है, "इंस्पेक्टर बनोगे तभी शादी होगी।" बगल वाला दो और गोलियां दागता है और हंसकर कहता है, "लो तुम्हारा कोटा पूरा हुआ। अब इंस्पेक्टर बन जाओगे।" इस सीन की सबसे डरावनी बात गोली नहीं, वह गपशप है क्योंकि गुस्से में किया गया कत्ल जुर्म कहलाता है। लेकिन बिना गुस्से के, आदत में किया गया कत्ल सिस्टम कहलाता है। पहले ही सीन में डायरेक्टर बता देता है कि आप उस दुनिया में दाखिल हो चुके हैं जहां हत्या ड्यूटी है। अब इस दुनिया के बीचोंबीच रहता है हमारी।

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Speaker A

डाउनलोड कर लो पता नहीं कब गायब हो जाए। लोग हंसते हैं, मजाक समझते हैं। फिर रविवार की शाम आती है और फिल्म भारत से गायब कर दी जाती है। कई दर्शकों ने लिखा वो फिल्म देख ही रहे थे कि स्क्रीन अचानक

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Speaker A

काली हो गई। हीरो की बात सच निकली। तो आज हम यही समझेंगे कि एक एक्टर को पहले से कैसे पता था। यह फिल्म हटाई क्यों गई?

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Speaker A

इसका जसवंत सिंह खालड़ा और केपीएस गिल से क्या रिश्ता है? और इस पूरे विवाद के दोनों पक्ष असल में कहते क्या है? अब आम धारणा यह है कि फिल्में बैन इसलिए होती हैं क्योंकि उनमें कुछ गलत दिखाया गया कि

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Speaker A

सरकार डर गई या किसी नेता को बुरा लगा। यही सोचकर लोग स्क्रोल कर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन असली कहानी इतनी सीधी नहीं है। इस फिल्म को बैन करने वाले भी पूरी तरह गलत नहीं है और इसका समर्थन करने वाले भी

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Speaker A

पूरी तरह सही नहीं है। यहां एक कमरे में एक नहीं कई हाथी खड़े हैं और आज हम एक-एक करके सबको देखेंगे। यह कहानी सिर्फ एक फिल्म की नहीं है। यह 1995 के पंजाब की है। एक बैंक क्लर्क की है जो सिस्टम से

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Speaker A

टकरा गया और एक अफसर की है जिसकी दो तस्वीरें हैं। हम शुरू करेंगे उस सुबह से जहां से यह सब शुरू हुआ था। फिर समझेंगे 1980 के दशक का पंजाब, फिर फिल्म की असली कहानी, फिर केपीएस गिल की दोनों छवियां और

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Speaker A

आखिर में वो बहस जो आज पूरे देश में चल रही है। तो चलिए 31 साल पीछे चलते हैं। एक ऐसी सुबह तक जहां से यह पूरी कहानी शुरू हुई थी। 6 सितंबर 1995 अमृतसर का कबीर पार्क इलाका। एक आदमी अपने घर के बाहर

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Speaker A

खड़ा गाड़ी धो रहा है। धूप निकली है। गली में बच्चे खेल रहे हैं। बिल्कुल आम सी सुबह। तभी कुछ गाड़ियां आकर रुकती हैं। कुछ लोग उतरते हैं और वह आदमी दिन दहाड़े अपने ही घर के सामने से हमेशा के लिए गायब

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Speaker A

कर दिया जाता है। 31 साल बीत चुके हैं। उसकी लाश आज तक नहीं मिली और उसका कसूर सिर्फ इतना था कि उसने हजारों गुमशुदा लोगों का हिसाब मांगा था। जो फिल्म 48 घंटे में गायब कर दी गई वह इसी आदमी की

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Speaker A

कहानी थी। नाम सतलुज। ओटीटी प्लेटफार्म Zee5 पर बिना किसी प्रचार के यह फिल्म रिलीज हुई और लोग सन्न रह गए। सोशल मीडिया पर लिखा गया कि यह हाल के सालों की सबसे ताकतवर हिंदी फिल्मों में से एक है।

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Speaker A

दिलजीत दोसा के करियर की सबसे बड़ी परफॉर्मेंस बताई गई। लेकिन इससे पहले कि आप समझें कि यह फिल्म हटी क्यों? आपको यह जानना होगा कि यह फिल्म बनी कैसे? क्योंकि इस फिल्म की किस्मत में भी वही लिखा था जो

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Speaker A

इसके हीरो की किस्मत में था। लड़ाई। 2022 में डायरेक्टर हनी त्रिहान ने यह फिल्म पूरी की। इसका पहला नाम था घल्लूघारा यानी कत्लेआम। सिखों के इतिहास में यह शब्द तीन बड़े नरसिंहारों के लिए इस्तेमाल होता है। 1746, 1762 और 1984।

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Speaker A

नाम से ही साफ था कि फिल्म किस जख्म को छूने जा रही है। फिल्म सेंसर बोर्ड पहुंची और यहीं से इसकी कैद शुरू हुई। पहले 21 कट मांगे गए और नाम बदलने को कहा गया। नाम बदलकर हुआ पंजाब 95। मेकर्स कट्स के खिलाफ

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Speaker A

बॉम्बे हाईकोर्ट गए। इसी बीच फिल्म को टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में दिखाए जाने का न्योता मिला और स्क्रीनिंग से एक दिन पहले फिल्म वहां से वापस खींच ली गई। असली वजह आज तक किसी ने नहीं बताई। फिर कट्स की

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Speaker A

बाढ़ आ गई। 21 से बढ़कर आंकड़ा 120 पार कर गया। कुछ रिपोर्ट्स तो 127 कट्स तक बताती हैं। मांगे सुनिए। हीरो का नाम बदलो। पंजाब पुलिस का नाम हटाओ। तिरंगे वाला सीन हटाओ। यानी इस कहानी में से कहानी ही

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Speaker A

निकाल दो। फिर दिखाओ। डायरेक्टर हनी त्रिहान ने बताया कि एक लिस्ट निपटाते तो अगली आ जाती। एक वक्त उन्होंने कहा मैं फिल्म से अपना नाम हटा लूंगा पर कट नहीं लगाऊंगा। दिलजीत भी अड़ गए। फिल्म पूरी आएगी या नहीं आएगी। 2025 की शुरुआत में

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Speaker A

फिल्म के दुनिया भर में रिलीज होने का ऐलान हुआ। भारत को छोड़कर हर जगह तारीख आई, तारीख गई, रिलीज टल गई। फिल्म भारत में तो दूर कहीं भी थिएटर में नहीं आई। और फिर 3 जुलाई 2026 को चुपके से रास्ता

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Speaker A

निकला। ओटीटी का फिल्म Zee5 पर आई। पूरी की पूरी। एक भी सीन काटे बिना कीमत सिर्फ नाम की चुकानी पड़ी। एक फिल्म तीन नाम घलू घारा फिर पंजाब 95 और आखिर में सतलुज। और यहां वह बात आती है जो इस पूरी बहस का

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Speaker A

सबसे बड़ा जवाब है। रिलीज के दिन खुद जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर खाल ने बयान दिया कि बरसों की रुकावटों के बाद इस फिल्म का आना उनके लिए सुकून की बात है। खालला परिवार ने साफ कहा ओटीटी पर

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आया यही वर्जन परिवार की मंजूरी वाला वर्जन है। सिर्फ नाम बदला एक भी सीन नहीं। अब वह पहेली सुलझती है। दिलजीत को कैसे पता था? क्योंकि दिलजीत ने सिर्फ किरदार नहीं जिया था। इस फिल्म की किस्मत भी जी

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थी। जिस फिल्म का नाम तीन बार बदला गया। जिसने 4 साल हर लिस्ट, हर कट, हर टलती तारीख देखी। उसे रिलीज के दो दिन भी ना मिलना शायद कोई हैरानी की बात नहीं थी। लेकिन यह तो सिर्फ फिल्म की किस्मत की

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Speaker A

कहानी है। असली सवाल यह है कि इस फिल्म में दिखाया क्या गया जिससे इतना डर लगा और उसे समझने के लिए हमें एक और पंजाब देखना होगा। वह पंजाब जो हम सब ने कभी पर्दे पर नहीं देखा। अब आपको समझना होगा कि फिल्म

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का नाम पंजाब 95 क्यों रखा गया। 1995 वही साल है जिस साल हिंदी सिनेमा की सबसे प्यारी फिल्म आई थी। पंजाब के सरसों के लहलहाते खेतों वाली जहां हीरोइन दौड़कर हीरो के गले लगती थी। पूरे देश ने उस

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पंजाब से मोहब्बत की। लेकिन इत्तेफाक देखिए। उसी साल उन्हीं खेतों के पीछे रातों को पुलिस की जीपें दौड़ रही थी। श्मशानों के रजिस्टर लावारिस नामों से भरते जा रहे थे। एक ही पंजाब एक ही साल मगर दो कहानियां। एक जो दिखाई गई एक जो

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Speaker A

छिपाई गई। सतलुज वही दूसरी कहानी है। और शायद इसीलिए इस फिल्म में एक भी सरसों का खेत नहीं है। इस कहानी को समझने के लिए हमें थोड़ा और पीछे जाना होगा। 1980 के दशक में पंजाब राजनीतिक और सामाजिक

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Speaker A

अस्थिरता से गुजर रहा था। सिख पहचान को अलग करने की मांगे उठ रही थी। जर्नल सिंह भिंडरा वाले जैसा नेता उभरा और धीरे-धीरे पंजाब उग्रवाद की तरफ बढ़ने लगा। टारगेटेड किलिंग्स, बम धमाके, जबरन वसूली आम बात हो गई। 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ।

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Speaker A

स्वर्ण मंदिर परिसर में सेना का ऑपरेशन जिसमें भिंडरा वाले मारा गया मगर आम नागरिक भी मारे गए। कुछ महीनों बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई। उसके बाद 1984 के सिख विरोधी दंगे हुए। भारत के इतिहास का एक बेहद काला अध्याय

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Speaker A

जिसमें बड़ी संख्या में निर्दोष सिख मारे गए। इसके बाद पंजाब में उग्रवाद और तेज हो गया। 1985 में एयर इंडिया फ्लाइट 182 की बमबारी में 329 लोग मारे गए। ट्रेनों और बसों में यात्रियों की पहचान करके हत्याएं की गई। खासकर हिंदू नागरिकों को निशाना

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Speaker A

बनाया गया ताकि वे पंजाब छोड़ते। जो सिख उग्रवाद के खिलाफ बोलते थे उन्हें भी नहीं बख्शा गया। चाहे वे पत्रकार हो, कवि हो या पुलिस अधिकारी। मानवाधिकार संगठनों ने बाद में दर्ज किया कि इस लगभग एक दशक लंबे

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Speaker A

संघर्ष में अनुमानतः 21 से 25,000 लोगों की जान गई। राज्य ने इस उग्रवाद को कुचलने के लिए जिस अफसर को आगे किया वो नाम था केपीएस गिल। 1988 में उन्हीं की अगुवाई में ऑपरेशन ब्लैक थंडर हुआ। जिसमें स्वर्ण

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Speaker A

मंदिर से उग्रवादियों को बिना मंदिर को नुकसान पहुंचाए निकाला गया। और इसकी दुनिया भर में तारीफ हुई। इसी कामयाबी के लिए 1989 में गिल को पद्मश्री भी दिया गया। 1993 तक आते-आते पंजाब में उग्रवाद लगभग खत्म हो चुका था। स्कूल खुल रहे थे,

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Speaker A

बाजार गुलजार हो रहे थे। लेकिन इसी सफाई अभियान की आड़ में वर्दी के भीतर के कुछ लोग एक और धंधा चला रहे थे। हर मारे गए उग्रवादी पर इनाम था। तरक्की थी, मेडल था। तो नुस्खा आसान हो गया। बंदा उठाओ,

08:58

Speaker A

आतंकवादी का ठप्पा लगाओ, एनकाउंटर दिखाओ, इनाम ले लो। बंदा सच में आतंकवादी है या नहीं, यह पूछने वाला कोई नहीं था। यह वह दुनिया है जिसमें फिल्म की कहानी शुरू होती है और इसी दुनिया में रहता है हमारी

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Speaker A

कहानी का असली हीरो। यह समझना जरूरी था क्योंकि इसके बिना अगला हिस्सा अधूरा लगेगा। अब बात करते हैं उस आदमी की जिसने इसी दुनिया के सामने अकेले खड़े होने की हिम्मत की। अब बात करते हैं फिल्म की क्योंकि इसका पहला ही सीन इतना खतरनाक है

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Speaker A

कि दिल में डर बैठ जाए। एक अंधेरी रात, पंजाब की सुनसान सड़कें, दूर तक फैले खेत जिनमें कोई रोशनी नहीं। और उस अंधेरे को चीरती हुई एक पुलिस जीप दौड़ रही है। अंदर बैठे सिपाही आपस में गप लड़ा रहे हैं। घर

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Speaker A

की बातें, शादी ब्याह के किस्से, ठिठोली। बिल्कुल वैसा माहौल जैसा किसी रात की गश्त में होता है। फिर जीप रुकती है। पीछे से कुछ बंधे हुए सहमे हुए लोगों को उतारा जाता है। कोई पूछताछ नहीं, कोई मुकदमा नहीं, कोई आखिरी बात नहीं। एक सुनसान जगह

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Speaker A

और पास से गोली मार दी जाती है। वही जीप, वही सिपाही। वहीं से छूटी हुई गपशप फिर शुरू कर देते हैं। एक सिपाही कहता है कि उसकी शादी इसलिए नहीं हो पा रही क्योंकि मंगेतर ने कहा है इंस्पेक्टर बनोगे तभी

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Speaker A

शादी होगी। बगल वाला दो और गोलियां दागता है और हंसकर कहता है लो तुम्हारा कोटा पूरा हुआ। अब इंस्पेक्टर बन जाओगे। इस सीन की सबसे डरावनी बात गोली नहीं वह गपशप है क्योंकि गुस्से में किया गया कत्ल जुर्म

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Speaker A

कहलाता है। लेकिन बिना गुस्से के आदत में किया गया कत्ल सिस्टम कहलाता है। पहले ही सीन में डायरेक्टर बता देता है कि आप उस दुनिया में दाखिल हो चुके हैं जहां हत्या ड्यूटी है। अब इस दुनिया के बीचोंबीच रहता

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Speaker A

है हमारी कहानी का हीरो जसवंत सिंह खालड़ा। तरन तारण जिला दिलजीत दोसांझ ने यह किरदार निभाया है। बैंक में नौकरी, घर में पत्नी परमजीत कौर जिसे गीतिका विद्या ने निभाया है। दो बच्चे, बूढ़े मां-बाप, सुबह बैंक, शाम को घर, गुरुद्वारे में

11:10

Speaker A

आस्था, मोहल्ले में इज्जत, ना कोई नेता, ना कोई क्रांतिकारी। फिल्म जानबूझकर लंबे समय तक जसवंत को एक बिल्कुल आम इंसान की तरह दिखाती है। बच्चों से लाड़, बीवी से नोकझोंक ताकि आगे जब यह जिंदगी टूटे तो दर्शक के अंदर भी कुछ टूटे। यह किरदार कोई

11:29

Speaker A

सुपर हीरो नहीं है। यह आप है। यह आपका पड़ोसी है। फिर एक दिन यह भ्रम टूटता है। जसवंत का करीबी दोस्त कृपाल सिंह अचानक लापता हो जाता है। कोई गिरफ्तारी नहीं, कोई एफआईआर नहीं। बस आदमी था और अब नहीं

11:44

Speaker A

है। कृपाल की बूढ़ी मां थानेथाने भटकती है। दरवाजे पीटती है। मेरा बेटा कहां है?

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Speaker A

जिंदा है तो सामने लाओ। मर गया तो लाश दो। और फिर फिल्म वो करती है जो सांस रोक देती है। वह लड़ती हुई बूढ़ी मां भी खुद गायब हो जाती है। जसवंत से यह सन्नाटा बर्दाश्त नहीं होता। वह थाने जाता है पूछने।

12:06

Speaker A

थानेदार बेझिझक कृपाल को आतंकवादी बताते हुए कहता है, सड़ी हुई फसल थी काटना जरूरी था। जसवंत बिना आवाज ऊंची किए जवाब देता है। फसल में सड़न कहीं भी लगे खेत तो किसान का अपना ही होता है ना साहब। भटका

12:22

Speaker A

हुआ भी हमारा ही बेटा है। लेकिन जसवंत के कान में एक बात अटक जाती है। शहर के श्मशानों में लावारिस लाशों की गिनती बढ़ती जा रही है। वह पूछना शुरू करता है, इतनी लाशें क्यों? किसकी लाशें हैं और

12:36

Speaker A

लेकर आता कौन है? वह श्मशान घाटों के चक्कर लगाने लगता है। पहले चौकीदारों से दुआ सलाम, फिर भरोसा, फिर बातें। पुराने धूल खाए रजिस्टर सामने आते हैं। जिनमें एक ही शब्द बार-बार लिखा है। लावारिस, लावारिस, लावारिस। एक बैंक क्लर्क का

12:55

Speaker A

दिमाग हिसाब किताब में चलता है। लाश चलाने के लिए लकड़ी चाहिए होती है। लकड़ी की खरीद की रसीद बनती है। लाशें छिप सकती हैं। रसीदें नहीं छिप सकती। इस मेहनत में उसे एक अनपेक्षित साथी मिलता है। सीनियर कांस्टेबल सतनाम सिंह जिसे सौरभ सचदेवा ने

13:13

Speaker A

निभाया है। वर्दी के भीतर एक ऐसा आदमी जिसका जमीर पूरी तरह मरा नहीं है। वह चुपकेच-चुपके जसवंत तक खबरें पहुंचाने लगता है। कौन उठाया गया? कहां रखा गया?

13:25

Speaker A

किस रात कौन सी जीप निकली? सिर्फ तीन श्मशान घाटों, पट्टी, दुर्ग्याना और तरन-तारन की जांच में जसवंत को 2000 से ज्यादा ऐसे नाम मिलते हैं, जिनके आगे लावारिस लिखा था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुई सीबीआई जांच में, अकेले

13:43

Speaker A

तरन-तारन जिले में 2000 से ऊपर अंतिम संस्कार सरकारी तौर पर पक्के होते हैं। ये किसी की कल्पना नहीं थी। यह सरकारी जांच में साबित हुआ सच था। और सबसे बड़ा सबूत यह था कि ज्यादातर लाशें खुद पुलिस लेकर

13:59

Speaker A

आई थी। अब सवाल यह है कि लावारिस लाशों को पुलिस खुद क्यों लाएगी? यहां लाने वाला ही मारने वाला था। जसवंत की जांच और बात की तमाम रिपोर्टों में यह गिनती 25,000 गुमशुदा लोगों तक जाती है। करीब एक पूरा

14:16

Speaker A

शहर कागजों से मिटा दिया गया। बिना मुकदमे, बिना सजा सुनाए बिना आखिरी अरदास के। वह यह सबूत लेकर अदालत जाता है। प्रेस के सामने रखता है। पंजाब पुलिस का छिपा हुआ कत्लखाना दुनिया के सामने, तारीख और गिनती समेत। जवाब में एक जाना पहचाना ताना

14:36

Speaker A

उछाला जाता है कि यह मानवाधिकार वाले विदेशी पैसों पर पलने वाले लोग हैं जो देश को बदनाम कर रहे हैं। तरन-तारन के विधायक तक जसवंत को समझाते हैं। भाई, घर की बात दुनिया को बताने की क्या जरूरत? जसवंत का

14:51

Speaker A

जवाब उसके काम में है। वह चुप नहीं होता। फिर सलाह की जगह उसे डराया जाता है। घर के बाहर पुलिस की गाड़ियां रात भर खड़ी रहती हैं। फोन उठाओ तो सामने धमकियां। पत्नी डरी रहती है। बच्चे सहमे रहते हैं। पड़ोसी

15:06

Speaker A

रास्ता बदलने लगते हैं। एक सुबह जसवंत को पता चलता है कि रात भर पुलिस वाले उसके घर के बाहर पहरा दे रहे थे। तो वह चीखता नहीं, गुस्सा नहीं करता। वह अंदर से चाय बनाकर लाता है और उन्हीं जासूसों को

15:21

Speaker A

पिलाता है। कहते हुए थक गए होंगे कप अंदर रखवा दीजिएगा। जसवंत की आवाज देश की सीमा पार कर जाती है। असल जिंदगी में उन्होंने कनाडा की संसद के सामने यह पूरा मामला रखा था और वहीं वह बात कही जो इस पूरी कहानी

15:38

Speaker A

की रूह है। एक पुरानी कहानी का हवाला जिसमें डूबता सूरज पूछता है कि उसके बाद रोशनी कौन करेगा? और दूर किसी झोपड़ी का एक नन्हा दिया जवाब देता है। मैं करूंगा मैं अंधेरे को चुनौती देता हूं। फिर आता

15:54

Speaker A

है 6 सितंबर 1995 वही सुबह जहां से हमने कहानी शुरू की थी। जो आदमी 25,000 गुमशुदा लोगों का हिसाब मांग रहा था वह खुद गुमशुदा हो जाता है। दिन दहाड़े अपने ही घर के सामने से। परिवार जिस थाने दौड़ता

16:11

Speaker A

है, वही रटा रटाया जवाब मिलता है। हमें नहीं पता हमने नहीं उठाया। लेकिन इस बार शिकारी एक बात भूल गया। सोच नहीं मारी जा सकती। जसवंत अब अकेला नहीं था। उसकी आवाज हजारों घरों तक अदालतों की फाइलों तक सात

16:28

Speaker A

समंदर पार संसद तक पहुंच चुकी थी। गायब होने से पहले मीडिया के सामने आखिरी बार जसवंत ने कहा था अगर मैं गायब होता हूं मारा जाता हूं तो इसका जिम्मेदार एसएसपी होगा। यहीं से फिल्म में एंट्री होती है

16:44

Speaker A

सीबीआई अफसर समुद्रा की जिसे अर्जुन रामपाल ने निभाया है। दिल्ली से आया एक बाहरी आदमी जिसे पंजाब के इस दलदल में उतर कर एक गुमशुदा आदमी का सच ढूंढना है। दिलचस्प बात यह है कि पूरी फिल्म में दिलजीत और अर्जुन रामपाल का एक भी सीन साथ

17:01

Speaker A

नहीं है। क्योंकि जहां दिलजीत की कहानी खत्म होती है, वहीं से अर्जुन की कहानी शुरू होती है। फिर भी दोनों एक ही धागे से बंधे हैं। सच के धागे से। जांच में हर सबूत पर पर्दा है। हर फाइल अधूरी है। जो

17:15

Speaker A

गवाह हिम्मत करता है, वह सुनवाई से पहले हट जाता है या किसी हादसे में मारा जाता है। जो अदालत तक पहुंचता है, वह बयान से पलट जाता है। क्योंकि पिछली रात उसके घर कोई मिलने आया था। बीवी बच्चों का हाल-चाल

17:30

Speaker A

जानने। एक सीन में खुद सीबीआई अफसर कोर्ट में फट पड़ता है। सच सबको पता है पर सिस्टम चुप है। फिर मिलता है एसपीओ कुलजीत सिंह। सिस्टम का सबसे छोटा सबसे बेबस पुर्जा जो कभी सवाल नहीं करता सिर्फ हुक्म

17:46

Speaker A

बजाता है। इसी किरदार की आंखों से फिल्म का सबसे बड़ा झटका सामने आता है। क्योंकि इसी शख्स ने सब कुछ अपनी आंखों से देखा था। और वह सीन भी है जो शायद फिल्म की सबसे दर्दनाक कड़ी है। सतनाम सिंह के घर

18:01

Speaker A

पर। सुगगा और उसकी टीम पहुंचते हैं। दो निर्दोष लोगों को घर लाकर मार देते हैं और फिर सतनाम से पूछते हैं तूने मदद की थी इसकी? सतनाम चुप रहता है। कुछ नहीं बोलता। अगली सुबह अखबार में छपता है कि वह पुलिस

18:16

Speaker A

वाला खुद खालिस्तानी था। उसके घर हथियार मिले। यानी जिसने अपना जमीर जिंदा रखा मरने के बाद उसे ही आतंकवादी बना दिया गया। अंततः सच बाहर आता है और उसी छोटे किरदार की गवाही की बदौलत 2005 में पंजाब पुलिस के छह अफसरों को खाल के अपहरण और

18:35

Speaker A

हत्या के जुर्म में दोषी ठहराया जाता है। 2007 में हाईकोर्ट पांच की सजा उम्र कैद तक बढ़ा देता है। एक अफसर बरी हो जाता है और 2011 में सुप्रीम कोर्ट बचे हुए चार अफसरों की उम्र कैद पर मुर लगाता है।

18:51

Speaker A

लेकिन गौर करने वाली बात यह है, सिर्फ छह जूनियर पुलिसकर्मियों पर मुकदमा चला। हुक्म देने वाले हाथ ऊपर तक कभी नहीं पहुंचे। 31 साल बाद भी परमजीत कौर खालड़ा इंसाफ की राह देख रही हैं। क्योंकि उन्हें पति की लाश तक नहीं दी गई। सीबीआई की

19:09

Speaker A

फाइलों के मुताबिक हत्या के बाद जसवंत की लाश हरी के इलाके की नहर में फेंकी गई थी। वह जगह जहां सतलुज और ब्यास नदियां आपस में मिलती हैं। जिस दरिया ने पंजाब की धरती सींची उसी दरिया में पंजाब का एक

19:23

Speaker A

बहादुर बेटा हमेशा के लिए गुम कर दिया गया। इसीलिए जब सेंसर बोर्ड ने फिल्म से नाम छीना मेकर्स ने वह नाम चुना जो खुद पूरी कहानी कह देता है सतलुज। लेकिन जसवंत की कहानी अधूरी है अगर हम उस आदमी को ना

19:39

Speaker A

समझें जिसके नाम पर यह पूरा सिस्टम चल रहा था। और यहीं यह कहानी सबसे उलझी हुई हो जाती है। फिल्म में जिस डीजीपी के किरदार को लेकर सबसे ज्यादा विवाद है, वह असल जिंदगी में केपीएस गिल है। केपीएस गिल की

19:54

Speaker A

दो छवियां हैं और यही इस पूरी बहस को मुश्किल बनाता है। एक छवि कि इस अफसर ने पंजाब से आतंकवाद का लगभग सफाया कर दिया। वो काम किया जो सेना नहीं कर पाई थी। दूसरी छवि जो इस फिल्म में दिखाई गई कि

20:09

Speaker A

आतंकवाद खत्म करने के नाम पर कई निर्दोष लोग भी मार दिए गए। गिल के समर्थक कहते हैं कि 1988 में जब उन्हें पहली बार पंजाब पुलिस की कमान मिली तब फोर्स पूरी तरह डीमोरलाइज थी। अदालतें और जज तक धमकियों

20:24

Speaker A

के साए में थे। तब पारंपरिक कानूनी प्रक्रिया संभव ही नहीं थी। यह लड़ाई एक जंग की तरह लड़ी गई। अपराध की तरह नहीं। और आखिरकार यही रणनीति काम आई। 1993 तक आते-आते हिंसा में भारी गिरावट आ चुकी थी।

20:40

Speaker A

फिल्म के आलोचकों का कहना है कि जिस आदमी ने पंजाब को बर्बादी से बचाया उसे सिर्फ खलनायक की तरह दिखाना उस दौर की उसकी सेवा को नकारना है। दूसरी तरफ ह्यूमन राइट्स वॉच एमनेस्टी इंटरनेशनल और भारत की अपनी

20:56

Speaker A

नागरिक अधिकार संस्थाओं ने भी दर्ज किया है कि आतंकवाद खत्म करने की इस प्रक्रिया में पुलिस की तरफ से मानवाधिकार उल्लंघन हुए। गुमशुदगियों के जिन मामलों की बात हो रही है, उनमें केपीएस गिल पर व्यक्तिगत रूप से अदालत में कभी कोई जुर्म साबित

21:12

Speaker A

नहीं हुआ। यह भी उतना ही सच है। यानी एक आदमी दो तस्वीरें। आधे देश के लिए हीरो, आधे के लिए विलेन। और इस कहानी को मुश्किल यही बनाता है कि शायद दोनों तरफ सच है और अफसोस दोनों तरफ लाशें भी हैं। तो अब जब

21:29

Speaker A

आप जसवंत की कहानी भी जानते हैं और गिल की दोनों तस्वीरें भी। अब समय है उस असली बहस तक पहुंचने का जिसके लिए हम यहां तक आए। फिल्म हटते ही देश दो खेमों में बट गया। एक तरफ वो लोग हैं जो पूछ रहे हैं आखिर

21:44

Speaker A

किस बात का डर था? जो फिल्म विदेशों में देखी जा सकती है वह हिंदुस्तान में क्यों नहीं? किसके कहने पर हटाई गई? क्या इसमें कोई ऐसा सच था जो सामने नहीं आना चाहिए था? कुछ लोग यह भी सवाल उठाते हैं कि जिस

21:56

Speaker A

दौर की यह घटना है तब पंजाब और केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी? तो आज की सरकार को इससे इतनी परेशानी क्यों? दूसरी तरफ वह खेमा है जो इस फिल्म का ही विरोध करता है। उनका कहना है कि फिल्म पूरी कहानी नहीं

22:10

Speaker A

दिखाती। वह कहते हैं कि उस दौर में उग्रवाद ने भी हजारों बेगुनाहों की जान ली। हिंदू नागरिक, देशभक्त, सिख, पत्रकार, पुलिसकर्मी और उनके परिवार सबको निशाना बनाया गया। फिल्म में यह हिस्सा लगभग नहीं दिखाया गया। उनका आरोप यह भी है कि खुद

22:26

Speaker A

खालड़ा को लेकर फिल्म पूरी बात नहीं बताती कि वे भिंडरा वाले को एक बड़ा नेता मानते थे। जबकि भिंडरा वाले वही शख्स था जिसने खुलेआम हिंदुओं को निशाना बनाने की धमकियां दी थी। आलोचकों का यह भी कहना है

22:40

Speaker A

कि 25,000 का आंकड़ा पुख्ता तौर पर साबित नहीं है और हर लावारिस लाश को फर्जी एनकाउंटर का शिकार मान लेना जल्दबाजी होगी क्योंकि उस दौर में शिनाख्त बेहद मुश्किल थी। फिल्म का बचाव करने वाले जवाब देते हैं। फिल्म जो कुछ भी कहती है, अदालती

22:56

Speaker A

रिकॉर्ड के सहारे कहती है। छह पुलिसकर्मियों को अदालत ने दोषी ठहराया और सुप्रीम कोर्ट तक चार को उम्र कैद बरकरार रही। यह कोई फिल्मी कल्पना नहीं थी और अधूरा सच कहना और झूठ बोलना दो अलग बातें हैं। पर यहां एक बड़ी दिक्कत है। यह पूरी

23:12

Speaker A

बहस उस फिल्म पर हो रही है जिसे भारत में अब कोई देख ही नहीं सकता। जब कोई देख ही नहीं सकता तो कैसे फैसला होगा कि सही कौन है गलत कौन एक बात दोनों पक्ष शायद मानेंगे कमजोर या अधूरी फिल्में रोज रिलीज

23:28

Speaker A

होते देखी हैं लेकिन 2 दिन में हटते नहीं देखा तो फिल्म हटी किस वजह से इसका जवाब ना सरकार ने दिया ना Zee5 ने और जब तक जवाब नहीं आता हर किसी का अपना-अपना मतलब निकलता रहेगा। क्रिटिक्स ने ज्यादातर इस

23:43

Speaker A

फिल्म को पांच में से चार से ज्यादा स्टार दिए और इसे साल की बेहतरीन हिंदी फिल्मों में गिना। दिलजीत के काम को उनके करियर का सबसे मुश्किल और सबसे ताकतवर रोल बताया गया और सबसे बड़ी गवाही खुद खालड़ा परिवार

23:57

Speaker A

ने दी कि यही सच है यही वर्जन है। तो अब आप जानते हैं कि दिलजीत को कैसे पता था यह फिल्म तीन बार नाम बदलकर 4 साल की लड़ाई के बाद क्यों आई और 2 दिन में क्यों गई?

24:10

Speaker A

जसवंत सिंह खालड़ा कौन थे और उनकी लड़ाई क्या थी? केपीएस गिल की दोनों तस्वीरें क्या है और इस विवाद के दोनों पक्ष असल में क्या कह रहे हैं जो शुरुआत में एक हाथी वाला कमरा लग रहा था अब आपके लिए साफ

24:23

Speaker A

हो चुका है। जब सतलुज पर बैन लगा सोशल मीडिया पर सिर्फ एक लाइन गूंज रही थी। मैं अंधेरे को चुनौती देता हूं। वो लाइन जो 1995 में एक अकेले आदमी की थी। आज 2026 में लाखों लोग उसे अपना बनाकर दोहरा रहे

24:40

Speaker A

हैं। 1995 में एक दिया बुझाया गया था। 2026 में लाखों दिए जल उठे। जिन्होंने दिया बुझाया वो शायद एक बात नहीं समझ पाए। दिए से दिया जलाया जा सकता है। Zee5 ने कहा कि सतलुज फिलहाल थम गई है। लेकिन जो

24:57

Speaker A

बातचीत इसने शुरू की है, वह नहीं थमेगी। तो आखिर सतलुज बैन क्यों हुई? जिस मुल्क में इंसाफ मांगने वाला आदमी गायब कर दिया गया, उसी मुल्क में 31 साल बाद उसकी कहानी भी गायब कर दी गई। लेकिन दरिया वालों से

25:13

Speaker A

पूछ लीजिए, पानी में फेंकी गई चीज डूबती नहीं, वह बहती है और बहते-बहते किनारों तक पहुंच जाती है। यह सिर्फ एक फिल्म की कहानी नहीं है। यह इस सवाल की कहानी है कि किसी देश को अपना अधूरा दर्दनाक अतीत

25:28

Speaker A

देखने का हक होना चाहिए या नहीं। चाहे वह अतीत कितना भी असहज क्यों ना हो। अगर आपको लगता है कि यह कहानी हर घर तक पहुंचनी चाहिए तो जिम्मेदारी अब आपकी है। हमने अपना काम किया। अब आप तय कीजिए। आप अंधेरे

25:43

Speaker A

में रहना पसंद करेंगे या अंधेरे को चुनौती देंगे?

Topics: सतलुज दिलजीत दोसांझ पंजाब 1995 घल्लूघारा केपीएस गिल जसवंत सिंह खालड़ा पंजाब उग्रवाद फिल्म सेंसरशिप Zee5 पंजाबी इतिहास


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