**What Happened to Philips? 😡 Rise and Fall of Philips | Case Study | Live Hindi — Transcript & Summary | SozAI**
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फिलिप्स की स्थापना से लेकर उसकी सफलता और वर्तमान में गिरावट की कहानी, जिसमें कंपनी के इतिहास और विवादों पर चर्चा की गई है।

## Key Takeaways

- फिलिप्स ने तकनीकी नवाचार और रिसर्च के माध्यम से विश्वसनीय ब्रांड बनाया।
- कंपनी ने कॉम्पैक्ट कैसेट जैसी क्रांतिकारी तकनीक विकसित की और उसे साझा किया।
- द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान फिलिप्स ने सामाजिक जिम्मेदारी निभाई।
- वर्तमान में फिलिप्स का ब्रांड नाम उपयोग हो रहा है, लेकिन उत्पादों की गुणवत्ता और उत्पादन में गिरावट आई है।
- सुरक्षा खामियों के कारण 2021 में बड़ी संख्या में मशीनें वापस मंगानी पड़ीं, जिससे कंपनी की छवि प्रभावित हुई।

## What the video covers

- फिलिप्स की शुरुआत 1891 में नीदरलैंड्स में जेरार्ड फिलिप्स और उनके पिता ने की थी।
- कंपनी ने पेटेंट सिस्टम का फायदा उठाकर प्रतिस्पर्धियों की तकनीक को अपनाया और 1914 में अपनी रिसर्च लैब शुरू की।
- 1939 में दुनिया का पहला रोटरी इलेक्ट्रिक शेवर 'फिलिशव' बनाया गया।
- द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कंपनी ने जर्मन कब्जे में भी फैक्ट्री को चलाया और यहूदी कर्मचारियों की जान बचाई।
- 1963 में फिलिप्स ने दुनिया की पहली कॉम्पैक्ट कैसेट विकसित की, जिसे बिना रॉयल्टी के अन्य कंपनियों को भी लाइसेंस दिया।
- फिलिप्स ने भारत में 1930 में सेल्स ऑफिस खोला और 1938 में कोलकाता में पहली लैंप फैक्ट्री स्थापित की।
- कंपनी ने वर्षों तक भरोसेमंद इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पाद बनाए, जैसे रेडियो, बल्ब, मिक्सर, और शेवर।
- हालांकि, वर्तमान में फिलिप्स ज्यादातर उत्पाद बनाना बंद कर चुका है और केवल नाम का उपयोग हो रहा है।
- 2021 में फिलिप्स को 1.5 करोड़ से अधिक मशीनें वापस मंगानी पड़ीं, जिनसे कई लोगों की मौतें हुईं।
- वीडियो में फिलिप्स के इतिहास, सफलता, नवाचार, और वर्तमान संकट की पूरी कहानी विस्तार से बताई गई है।

Answers

## Questions about this video

फिलिप्स कंपनी की शुरुआत कब और कैसे हुई थी?

फिलिप्स की शुरुआत 1891 में नीदरलैंड्स के आइंटावन शहर में जेरार्ड फिलिप्स और उनके पिता ने की थी, जिन्होंने सस्ते और भरोसेमंद बल्ब बनाने का सपना देखा था।

फिलिप्स ने कॉम्पैक्ट कैसेट क्यों और कब बनाई?

1963 में लू ऑट्स और उनकी टीम ने एक छोटा, सस्ता और आसानी से इस्तेमाल होने वाला टेप रिकॉर्डर बनाने के लिए कॉम्पैक्ट कैसेट विकसित की, जो बाद में विश्वभर में लोकप्रिय हुआ।

2021 में फिलिप्स को अपनी मशीनें वापस क्यों मंगवानी पड़ीं?

2021 में फिलिप्स को 1.5 करोड़ से ज्यादा मशीनें वापस मंगवानी पड़ीं क्योंकि इनका उपयोग करने वाले कई सौ लोगों की मौतें रिपोर्ट हुई थीं, जिससे कंपनी की विश्वसनीयता प्रभावित हुई।

## Full Transcript — Download SRT & Markdown

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Speaker A

1968 में एक आदमी ने अपनी पूरी 2 महीने की सैलरी जोड़कर एक Philips का रेडियो खरीदा था। लेकिन शायद उसने भी नहीं सोचा होगा कि करीब 58 साल बाद वो रेडियो आज भी चलेगा और इतने सालों में उसे सिर्फ दो बार सर्विस की जरूरत पड़ेगी। इसी तरह किसी के घर का बल्ब, किसी का पुराना ग्रामोफोन तो किसी का मिक्सर सालों से चल रहा है। मतलब Philips सिर्फ एक ब्रांड नहीं बल्कि पूरी जनरेशन का भरोसा बन चुका है। लेकिन अब मैं आपका दिल तोड़ने जा रहा हूं। क्योंकि सच यह है कि आज Philips ज्यादातर चीजें बनाता ही नहीं है। चाहे वह एलईडी बल्ब हो, टीवी हो या फिर किचन में डेली यूज होने वाले मिक्सर और ग्राइंडर। आज Philips का सिर्फ नाम यूज करके हमें उल्लू बनाया जा रहा है। यहां तक कि 2021 में Philips को अपने ही 1.5 करोड़ से ज्यादा मशीनंस वापस मंगवानी पड़ गई क्योंकि इनको यूज़ करने वाले कई सौ लोगों की डेथ्स की रिपोर्ट आ चुकी थी। अब यह पूरा मामला क्या है? इस पर तो हम जल्दी ही आएंगे। लेकिन पूरी स्टोरी को सही से समझने के लिए हमें पहले यह जानना होगा कि आखिर कंपनी ने लोगों के बीच इतना बड़ा भरोसा बनाया कैसे और फिर उसी भरोसे को कैसे अपने ही हाथों तोड़ दिया। तो दोस्तों 1891 में दुनिया अंधेरे से रोशनी की तरफ बढ़ रही थी क्योंकि इलेक्ट्रिसिटी धीरे-धीरे लोगों के घरों तक पहुंचने लगी। इसी टाइम नीदरलैंड्स के आइंटावन शहर में एक इंजीनियर ने सस्ते और भरोसेमंद बल्ब बनाने का सपना देखा और यहीं से शुरू हो गई फिलिप्स की कहानी। जेरार्ड फिलिप्स ने अपने पापा के साथ मिलकर इस बिजनेस को शुरू किया और 1852 में कार्बन फिलामेंट बल्ब बनाने लगी। वैसे हम आपको बताते चलें फिलिप्स इस दौड़ में अकेली नहीं थी। उस टाइम जर्मनी की दो बड़ी कंपनीज़ एईजी और सीमेंस एंड हास्के पहले से इस मार्केट पर अपना दबदबा बना चुकी थी। लेकिन फिलिप्स के लिए एक चीज उसके फेवर में थी कि उस टाइम तक नीदरलैंड्स में पेटेंट सिस्टम लागू नहीं था। यानी अगर किसी का इनोवेशन कोई दूसरी कंपनी यूज करती थी ना तो फिर उस पर लीगली कोई रोक नहीं थी। फिलिप्स ने भी इसका पूरा फायदा उठाया। उसने अपने कॉम्पिटिटर्स की फैक्ट्रीज देखी। उनकी प्रोडक्शन टेक्निक समझी और फिर उन्हें अपनी फैक्ट्री में अप्लाई करना शुरू कर दिया। लेकिन सिर्फ टेक्निक कॉपी कर लेने से जीत नहीं मिलती। Philips अभी बहुत छोटी कंपनी थी। जबकि उनके सामने सालों पुराने दिग्गज खड़े थे। नतीजा यह हुआ कि 1895 आते-आते कंपनी बंद होने के कगार पर पहुंच गई। लेकिन यहीं जेरार्ड ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने फिलिप्स की किस्मत ही बदल दी। उन्होंने अपने से 16 साल छोटे भाई एंटन को भी बिजनेस में पार्टनर बना लिया। जेरार्ड को मैन्युफैक्चरिंग आता था और एंटन मार्केटिंग में एक्सपर्ट थी और यही जोड़ी फिलिप्स की सबसे बड़ी ताकत बन गई। क्योंकि अगले 10 सालों में ही कंपनी की प्रोडक्शन करीब 20 गुना बढ़ चुकी थी। और हां एंटन के आने के बाद से फिलिप सिर्फ बड़ी नहीं हुई बल्कि उसकी सोच भी बदल गई। कंपनी ने सिर्फ प्रोडक्ट बेचने की बजाय अब नई टेक्नोलॉजीस खुद बनानी शुरू कर दी और 1914 में अपनी खुद की रिसर्च लैब शुरू की। यहीं से एक के बाद एक नए-नए इनोवेशंस आते गए और देखते ही देखते Philips सिर्फ बल्ब बनाने वाली कंपनी नहीं बल्कि इलेक्ट्रॉनिक्स की दुनिया का सबसे बड़ा नाम बन गई। 1917 में Philips ने रेडियो ट्यूब्स बनाना शुरू किया और जब कंपनी को यह टेक्निक खुद बनाने आ गई तो उसने 1927 में अपना खुद का रेडियो सेट भी बना दिया और फिर महज 6 सालों में ही Philips दुनिया की सबसे बड़ी रेडियो बनाने वाली कंपनी बन चुकी थी। लेकिन दोस्तों Philips की कहानी सिर्फ रेडियो या बल्ब बनाने तक सीमित नहीं रही। इसी रिसर्च लैब से 1939 में एक ऐसा इनोवेशन निकला जिसका असर आज भी हमारी डेली लाइफ में दिखता है। Philips का पहला इलेक्ट्रिक सेवर। इस प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी फिलिप्स के इंजीनियर एलेक्जेंडर के पास में थी जो अक्सर साइकिल के डायनेमो को देखते रहते। अरे भाई वही छोटा सा डिवाइस जो टायर के साथ घूमकर रात में साइकिल के लाइट के लिए बिजली बनाता था। उन्हें यहीं से आईडिया आया कि अगर यही घूमने वाला मैकेनिज्म इलेक्ट्रिक शेवर में भी यूज किया जाए तो शेविंग पहले से ज्यादा आसान और सुरक्षित हो जाएगी। उन्होंने शेवर के ऊपर बिल्कुल छल्ली जैसा मेटल प्लेट लगा दिया और अब दाढ़ी के बाल उस होल के अंदर चले जाते थे। लेकिन स्किन बाहर ही सेफ रहती थी। इसीलिए नीचे घूमता हुआ ब्लेड बाल तो काट देता था लेकिन स्किन तक नहीं पहुंच पाता। और बस इसी आईडिया से 1939 में दुनिया का पहला रोटरी इलेक्ट्रिक सेवर बना जिसे फिलिप्स ने फिलिशव का नाम दिया। लेकिन बैड लक तो देखिए जिस साल फिलिशव आया ना उसी साल ही सेकंड वर्ल्ड वॉर भी शुरू हो गई। अब वॉर की वजह से कुछ टाइम के लिए इसके प्रोडक्शन पर ब्रेक जरूर लगा लेकिन जंग खत्म होते ही फिलिशेसेप की भी वापसी हो गई और फिर इसके बाद से जो इसने रफ्तार पकड़ी ना वह कभी भी नहीं रुकी। करीब 85 साल बाद आज भी हर घंटे ऑन एन एवरेज 700 से भी ज्यादा फिलिश यूनिट्स बिकती हैं। वैसे यहां मैं एक बात क्लियर करते हुए आगे बढ़ना चाहता हूं कि जेराड जिन्होंने Philips कंपनी शुरू की थी वो 1922 में ही रिटायर हो चुके थे। इसीलिए अब उनके छोटे भाई एंटन और उनके बच्चे कंपनी की जिम्मेदारियों को संभाल रहे थे। अब जैसा कि मैंने आपको पहले ही बताया सेकंड वर्ल्ड वॉर शुरू हो चुका था और नीदरलैंड्स पर खतरा लगातार ही बढ़ता जा रहा था और फिर इसी बीच जब 9 मई 1940 को खबर आई कि अगले ही दिन जर्मनी हमला करने वाली है तब एंटन अपने परिवार के साथ में अमेरिका निकल गए। लेकिन एंटन के बेटे फ्रिड्स ने बिल्कुल उल्टा फैसला लिया। जब पूरा परिवार देश छोड़ रहा था ना तब वह वापस आइंठ लौट आए और वहीं रहकर फिलिप्स की फैक्ट्री संभालने लगे। हालांकि कुछ ही दिनों के बाद जर्मन ने नीदरलैंड्स पर कब्जा कर लिया और अब फिलिप्स की फैक्ट्री को मजबूरन जर्मन सेना के लिए इक्विपमेंट बनाना पड़ रहा था। अब दोस्तों ऐसे टाइम पर ज्यादातर लोग अपनी जान बचाकर भागने की सोचते ना लेकिन फ्रिड्स अपने एंप्लाइजस को छोड़कर कहीं नहीं गए। फैक्ट्री में 382 यहूदी एंप्लाइज भी थे और उस दौर में नाजी सेना यहूदियों को पकड़ कर जेल भेजती और उन्हें जान से मार देती थी। लेकिन फ्रिड्स ने जर्मन अधिकारियों को समझाया कि यह लोग प्रोडक्शन के लिए बहुत जरूरी हैं और अगर इन्हें आपने मार दिया ना तो फिर फैक्ट्री बंद हो जाएगी और आपको ही नुकसान उठाना पड़ेगा। अब फ्रिट्स की बात मानकर जर्मन ऑफिसर्स ने सभी को छोड़ दिया जिससे 382 लोगों की जान बच गई। हालांकि इसकी कीमत फ्रिट्स को ही चुकानी पड़ गई क्योंकि कुछ टाइम के बाद उन्हीं को ही अरेस्ट करके कैंप में डाल दिया गया था और जिस फैक्ट्री को वह बचाने की कोशिश कर रहे थे उसी के कई सारे हिस्सों पर ब्रिटिश एयरफोर्स ने बॉम्बिंग कर दी जिससे Philips कंपनी को बहुत बड़ा लॉस हुआ। हालांकि वॉर खत्म होने के बाद एंटन भी अपने देश वापस लौट आए और फ्रेड्स को भी जेल से छोड़ दिया गया था। जिसके बाद सभी ने मिलकर जी तोड़ मेहनत की और दोबारा फिलिप्स को पटरी पर ला दिया। और फिर करीब 20 साल के बाद जब सब कुछ नॉर्मल हो गया तब फिलिप्स एक बिल्कुल अलग प्रॉब्लम सॉल्व करने में लग गई टेप रिकॉर्डर्स की प्रॉब्लम। उस टाइम म्यूजिक सुनने के लिए बड़े-बड़े टेप रिकॉर्डर्स यूज़ होते थे। भारी होते थे, महंगे होते थे और चलाने में भी झंझट वाली। तभी एक रात फिलिप्स के लू ऑट्स खुद ऐसे ही एक मशीन से परेशान हो गए। और फिर अगली सुबह ऑफिस पहुंचते ही उन्होंने अपनी टीम से कहा कि अब एक ऐसा टेप रिकॉर्डर बनाना है जो छोटा हो, सस्ता हो और जिसे हर कोई आसानी से यूज कर सके। लेकिन डिजाइन कैसा होगा? इसका जवाब भी ऑट्स ने बड़े ही मजेदार तरीके से ढूंढा। उन्होंने एक लकड़ी का टुकड़ा उठाया और उसे तब तक घिसते रहे जब तक वह उनकी जैकेट के जेब में आराम से फिट नहीं हो गया और बस यही आगे बनने वाली कैसेट का टारगेट साइज बन गया और फिर कई महीनों की मेहनत के बाद अगस्त 1963 में फिलिप्स ने दुनिया की पहली कॉम्पैक्ट कैसेट पेश कर दी। लेकिन असली कहानी तो इसके बाद से शुरू हुई। फिलिप समझ चुकी थी कि अगर यह सिर्फ उनकी ही टेक्नोलॉजी बनी रही ना तो शायद यह कभी भी हर घर तक नहीं पहुंच पाएगी। इसीलिए उसने दूसरी कंपनीज को भी इसे बनाने की इजाजत दे दी बिना किसी रॉयल्टी के और यही वजह थी कि आगे चलकर दुनिया भर में करीब 100 अरब कॉम्पैक्ट कैसेट्स बिके थे। अगले कई दशकों तक यही कॉम्पैक्ट कैसेट्स दुनिया का सबसे बड़ा ऑडियो फॉर्मेट बन गई। सॉन्ग्स, स्कूल्स रिकॉर्डिंग, लैंग्वेज कोर्सेज, इंटरव्यू यहां तक कि कंप्यूटर डाटा भी इन्हीं कैसेट्स में स्टोर किए जाने लगे। तो दोस्तों अब तक जो भी कुछ हमने देखा बल्ब, शेवर, रेडियो और कैसेट्स इन सभी ने Philips को दुनिया के सबसे भरोसेमंद ब्रांड में ला खड़ा किया। लेकिन हम इंडियंस के लिए इसकी असली कहानी 1930 में शुरू हुई जब Philips की शुरुआत कोलकाता के एक छोटे से सेल्स ऑफिस से हुई थी। जहां विदेशों से मंगाए गए बल्ब बेचे जाते थे। लेकिन कुछ ही सालों में Philips ने इंडिया को सिर्फ एक मार्केट की तरह नहीं बल्कि मैन्युफैक्चरिंग बेस की तरह देखना शुरू कर दिया। 1938 में कोलकाता में इसकी पहली लैंप फैक्ट्री लगी और 1948 में यही Philips के रेडियोज़ भी बनने लगे। यानी आपके दादाजी या फिर पापा जो Philips का रेडियो यूज करते थे ना वो सिर्फ किसी फॉरेन ब्रांड का प्रोडक्ट नहीं था। वो सच में इंडिया में बना हुआ रेडियो था। इ

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Speaker A

की जरूरत पड़ेगी। इसी तरह किसी के घर का बल्ब, किसी का पुराना ग्रामोफोन तो किसी का मिक्सर सालों से चल रहा है। मतलब Philips सिर्फ एक ब्रांड नहीं बल्कि पूरी जनरेशन का भरोसा बन चुका है। लेकिन अब मैं

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Speaker A

आपका दिल तोड़ने जा रहा हूं। क्योंकि सच यह है कि आज Philips ज्यादातर चीजें बनाता ही नहीं है। चाहे वह एलईडी बल्ब हो, टीवी हो या फिर किचन में डेली यूज होने वाले मिक्सर और ग्राइंडर। आज Philips का सिर्फ

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Speaker A

नाम यूज करके हमें उल्लू बनाया जा रहा है। यहां तक कि 2021 में Philips को अपने ही 1.5 करोड़ से ज्यादा मशीनंस वापस मंगवानी पड़ गई क्योंकि इनको यूज़ करने वाले कई सौ लोगों की डेथ्स की रिपोर्ट आ चुकी थी। अब

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Speaker A

यह पूरा मामला क्या है? इस पर तो हम जल्दी ही आएंगे। लेकिन पूरी स्टोरी को सही से समझने के लिए हमें पहले यह जानना होगा कि आखिर कंपनी ने लोगों के बीच इतना बड़ा भरोसा बनाया कैसे और फिर उसी भरोसे को

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कैसे अपने ही हाथों तोड़ दिया। तो दोस्तों 1891 में दुनिया अंधेरे से रोशनी की तरफ बढ़ रही थी क्योंकि इलेक्ट्रिसिटी धीरे-धीरे लोगों के घरों तक पहुंचने लगी। इसी टाइम नीदरलैंड्स के आइंटावन शहर में एक इंजीनियर ने सस्ते और

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भरोसेमंद बल्ब बनाने का सपना देखा और यहीं से शुरू हो गई फिलिप्स की कहानी। जेरार्ड फिलिप्स ने अपने पापा के साथ मिलकर इस बिजनेस को शुरू किया और 1852 में कार्बन फिलामेंट बल्ब बनाने लगी। वैसे हम आपको बताते चलें फिलिप्स इस दौड़ में अकेली

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नहीं थी। उस टाइम जर्मनी की दो बड़ी कंपनीज़ एईजी और सीमेंस एंड हास्के पहले से इस मार्केट पर अपना दबदबा बना चुकी थी। लेकिन फिलिप्स के लिए एक चीज उसके फेवर में थी कि उस टाइम तक नीदरलैंड्स में

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पेटेंट सिस्टम लागू नहीं था। यानी अगर किसी का इनोवेशन कोई दूसरी कंपनी यूज करती थी ना तो फिर उस पर लीगली कोई रोक नहीं थी। फिलिप्स ने भी इसका पूरा फायदा उठाया। उसने अपने कॉम्पिटिटर्स की फैक्ट्रीज देखी। उनकी प्रोडक्शन टेक्निक समझी और फिर

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उन्हें अपनी फैक्ट्री में अप्लाई करना शुरू कर दिया। लेकिन सिर्फ टेक्निक कॉपी कर लेने से जीत नहीं मिलती। Philips अभी बहुत छोटी कंपनी थी। जबकि उनके सामने सालों पुराने दिग्गज खड़े थे। नतीजा यह हुआ कि 1895 आते-आते कंपनी बंद होने के

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कगार पर पहुंच गई। लेकिन यहीं जेरार्ड ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने फिलिप्स की किस्मत ही बदल दी। उन्होंने अपने से 16 साल छोटे भाई एंटन को भी बिजनेस में पार्टनर बना लिया। जेरार्ड को मैन्युफैक्चरिंग आता था और एंटन

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मार्केटिंग में एक्सपर्ट थी और यही जोड़ी फिलिप्स की सबसे बड़ी ताकत बन गई। क्योंकि अगले 10 सालों में ही कंपनी की प्रोडक्शन करीब 20 गुना बढ़ चुकी थी। और हां एंटन के आने के बाद से फिलिप सिर्फ बड़ी नहीं हुई

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बल्कि उसकी सोच भी बदल गई। कंपनी ने सिर्फ प्रोडक्ट बेचने की बजाय अब नई टेक्नोलॉजीस खुद बनानी शुरू कर दी और 1914 में अपनी खुद की रिसर्च लैब शुरू की। यहीं से एक के बाद एक नए-नए इनोवेशंस आते गए और देखते ही

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देखते Philips सिर्फ बल्ब बनाने वाली कंपनी नहीं बल्कि इलेक्ट्रॉनिक्स की दुनिया का सबसे बड़ा नाम बन गई। 1917 में Philips ने रेडियो ट्यूब्स बनाना शुरू किया और जब कंपनी को यह टेक्निक खुद बनाने आ गई तो उसने 1927 में अपना खुद का रेडियो

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सेट भी बना दिया और फिर महज 6 सालों में ही Philips दुनिया की सबसे बड़ी रेडियो बनाने वाली कंपनी बन चुकी थी। लेकिन दोस्तों Philips की कहानी सिर्फ रेडियो या बल्ब बनाने तक सीमित नहीं रही। इसी रिसर्च लैब से 1939 में एक ऐसा इनोवेशन निकला

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जिसका असर आज भी हमारी डेली लाइफ में दिखता है। Philips का पहला इलेक्ट्रिक सेवर। इस प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी फिलिप्स के इंजीनियर एलेक्जेंडर के पास में थी जो अक्सर साइकिल के डायनेमो को देखते रहते। अरे भाई वही छोटा सा डिवाइस जो टायर के

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Speaker A

साथ घूमकर रात में साइकिल के लाइट के लिए बिजली बनाता था। उन्हें यहीं से आईडिया आया कि अगर यही घूमने वाला मैकेनिज्म इलेक्ट्रिक शेवर में भी यूज किया जाए तो शेविंग पहले से ज्यादा आसान और सुरक्षित हो जाएगी। उन्होंने शेवर के ऊपर बिल्कुल

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छल्ली जैसा मेटल प्लेट लगा दिया और अब दाढ़ी के बाल उस होल के अंदर चले जाते थे। लेकिन स्किन बाहर ही सेफ रहती थी। इसीलिए नीचे घूमता हुआ ब्लेड बाल तो काट देता था लेकिन स्किन तक नहीं पहुंच पाता। और बस

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इसी आईडिया से 1939 में दुनिया का पहला रोटरी इलेक्ट्रिक सेवर बना जिसे फिलिप्स ने फिलिशव का नाम दिया। लेकिन बैड लक तो देखिए जिस साल फिलिशव आया ना उसी साल ही सेकंड वर्ल्ड वॉर भी शुरू हो गई। अब वॉर

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की वजह से कुछ टाइम के लिए इसके प्रोडक्शन पर ब्रेक जरूर लगा लेकिन जंग खत्म होते ही फिलिशेसेप की भी वापसी हो गई और फिर इसके बाद से जो इसने रफ्तार पकड़ी ना वह कभी भी नहीं रुकी। करीब 85 साल बाद आज भी हर घंटे

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ऑन एन एवरेज 700 से भी ज्यादा फिलिश यूनिट्स बिकती हैं। वैसे यहां मैं एक बात क्लियर करते हुए आगे बढ़ना चाहता हूं कि जेराड जिन्होंने Philips कंपनी शुरू की थी वो 1922 में ही रिटायर हो चुके थे। इसीलिए

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अब उनके छोटे भाई एंटन और उनके बच्चे कंपनी की जिम्मेदारियों को संभाल रहे थे। अब जैसा कि मैंने आपको पहले ही बताया सेकंड वर्ल्ड वॉर शुरू हो चुका था और नीदरलैंड्स पर खतरा लगातार ही बढ़ता जा रहा था और फिर इसी बीच जब 9 मई 1940 को

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Speaker A

खबर आई कि अगले ही दिन जर्मनी हमला करने वाली है तब एंटन अपने परिवार के साथ में अमेरिका निकल गए। लेकिन एंटन के बेटे फ्रिड्स ने बिल्कुल उल्टा फैसला लिया। जब पूरा परिवार देश छोड़ रहा था ना तब वह

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Speaker A

वापस आइंठ लौट आए और वहीं रहकर फिलिप्स की फैक्ट्री संभालने लगे। हालांकि कुछ ही दिनों के बाद जर्मन ने नीदरलैंड्स पर कब्जा कर लिया और अब फिलिप्स की फैक्ट्री को मजबूरन जर्मन सेना के लिए इक्विपमेंट बनाना पड़ रहा था। अब दोस्तों ऐसे टाइम पर

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Speaker A

ज्यादातर लोग अपनी जान बचाकर भागने की सोचते ना लेकिन फ्रिड्स अपने एंप्लाइजस को छोड़कर कहीं नहीं गए। फैक्ट्री में 382 यहूदी एंप्लाइज भी थे और उस दौर में नाजी सेना यहूदियों को पकड़ कर जेल भेजती और उन्हें जान से मार देती थी। लेकिन फ्रिड्स

05:25

Speaker A

ने जर्मन अधिकारियों को समझाया कि यह लोग प्रोडक्शन के लिए बहुत जरूरी हैं और अगर इन्हें आपने मार दिया ना तो फिर फैक्ट्री बंद हो जाएगी और आपको ही नुकसान उठाना पड़ेगा। अब फ्रिट्स की बात मानकर जर्मन ऑफिसर्स ने सभी को छोड़ दिया जिससे 382

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Speaker A

लोगों की जान बच गई। हालांकि इसकी कीमत फ्रिट्स को ही चुकानी पड़ गई क्योंकि कुछ टाइम के बाद उन्हीं को ही अरेस्ट करके कैंप में डाल दिया गया था और जिस फैक्ट्री को वह बचाने की कोशिश कर रहे थे उसी के कई

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Speaker A

सारे हिस्सों पर ब्रिटिश एयरफोर्स ने बॉम्बिंग कर दी जिससे Philips कंपनी को बहुत बड़ा लॉस हुआ। हालांकि वॉर खत्म होने के बाद एंटन भी अपने देश वापस लौट आए और फ्रेड्स को भी जेल से छोड़ दिया गया था।

06:02

Speaker A

जिसके बाद सभी ने मिलकर जी तोड़ मेहनत की और दोबारा फिलिप्स को पटरी पर ला दिया। और फिर करीब 20 साल के बाद जब सब कुछ नॉर्मल हो गया तब फिलिप्स एक बिल्कुल अलग प्रॉब्लम सॉल्व करने में लग गई टेप

06:13

Speaker A

रिकॉर्डर्स की प्रॉब्लम। उस टाइम म्यूजिक सुनने के लिए बड़े-बड़े टेप रिकॉर्डर्स यूज़ होते थे। भारी होते थे, महंगे होते थे और चलाने में भी झंझट वाली। तभी एक रात फिलिप्स के लू ऑट्स खुद ऐसे ही एक मशीन से

06:25

Speaker A

परेशान हो गए। और फिर अगली सुबह ऑफिस पहुंचते ही उन्होंने अपनी टीम से कहा कि अब एक ऐसा टेप रिकॉर्डर बनाना है जो छोटा हो, सस्ता हो और जिसे हर कोई आसानी से यूज कर सके। लेकिन डिजाइन कैसा होगा? इसका

06:38

Speaker A

जवाब भी ऑट्स ने बड़े ही मजेदार तरीके से ढूंढा। उन्होंने एक लकड़ी का टुकड़ा उठाया और उसे तब तक घिसते रहे जब तक वह उनकी जैकेट के जेब में आराम से फिट नहीं हो गया और बस यही आगे बनने वाली कैसेट का टारगेट

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Speaker A

साइज बन गया और फिर कई महीनों की मेहनत के बाद अगस्त 1963 में फिलिप्स ने दुनिया की पहली कॉम्पैक्ट कैसेट पेश कर दी। लेकिन असली कहानी तो इसके बाद से शुरू हुई। फिलिप समझ चुकी थी कि अगर यह सिर्फ उनकी

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Speaker A

ही टेक्नोलॉजी बनी रही ना तो शायद यह कभी भी हर घर तक नहीं पहुंच पाएगी। इसीलिए उसने दूसरी कंपनीज को भी इसे बनाने की इजाजत दे दी बिना किसी रॉयल्टी के और यही वजह थी कि आगे चलकर दुनिया भर में करीब

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Speaker A

100 अरब कॉम्पैक्ट कैसेट्स बिके थे। अगले कई दशकों तक यही कॉम्पैक्ट कैसेट्स दुनिया का सबसे बड़ा ऑडियो फॉर्मेट बन गई। सॉन्ग्स, स्कूल्स रिकॉर्डिंग, लैंग्वेज कोर्सेज, इंटरव्यू यहां तक कि कंप्यूटर डाटा भी इन्हीं कैसेट्स में स्टोर किए जाने लगे। तो दोस्तों अब तक जो भी कुछ

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Speaker A

हमने देखा बल्ब, शेवर, रेडियो और कैसेट्स इन सभी ने Philips को दुनिया के सबसे भरोसेमंद ब्रांड में ला खड़ा किया। लेकिन हम इंडियंस के लिए इसकी असली कहानी 1930 में शुरू हुई जब Philips की शुरुआत कोलकाता के एक छोटे से सेल्स ऑफिस से हुई

07:45

Speaker A

थी। जहां विदेशों से मंगाए गए बल्ब बेचे जाते थे। लेकिन कुछ ही सालों में Philips ने इंडिया को सिर्फ एक मार्केट की तरह नहीं बल्कि मैन्युफैक्चरिंग बेस की तरह देखना शुरू कर दिया। 1938 में कोलकाता में इसकी पहली लैंप फैक्ट्री लगी और 1948 में

08:00

Speaker A

यही Philips के रेडियोज़ भी बनने लगे। यानी आपके दादाजी या फिर पापा जो Philips का रेडियो यूज करते थे ना वो सिर्फ किसी फॉरेन ब्रांड का प्रोडक्ट नहीं था। वो सच में इंडिया में बना हुआ रेडियो था। इसके

08:10

Speaker A

बाद से Philips लगातार बढ़ती चली गई। 1959 में पुणे के पास दूसरी फैक्ट्री शुरू हुई और 3 अप्रैल 1965 को इंडिया में बना Philips का 10 लाखवां रेडियो तैयार हो गया। और दोस्तों, यह सिर्फ फैक्ट्री खोलने की बात नहीं थी। उस वक्त इंडिया नया-नया

08:25

Speaker A

आजाद हुआ था और अपने पैरों पर खड़ा होने की सीख रहा था। ऐसे टाइम में Philips ने यहां इन्वेस्ट करना शुरू किया और इंडिया को अपना लॉन्ग टर्म बेस बना लिया और शायद यही वजह थी कि Philips भारत में सिर्फ कभी

08:37

Speaker A

एक फॉरेन ब्रांड जैसा लगा ही नहीं। धीरे-धीरे यह लोगों के दिलों में बस गया और हर घर का हिस्सा बन गया। उस दौर में तो कंपनी प्रोडक्ट्स इस तरह से बनाती थी कि सालों तक चलती रहे और अगर खराब भी हो तो

08:48

Speaker A

उन्हें फेंकना नहीं बल्कि रिपेयर करना आसान हो और शायद यही वजह है कि आज भी कई सारे पुराने Philips रेडियो और ऑडियो सिस्टम वर्किंग कंडीशंस में मिल जाते हैं। लेकिन दोस्तों Philips की सबसे बड़ी ताकत नए प्रोडक्ट्स बनाना नहीं था बल्कि उसकी

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Speaker A

असली ताकत थी दुनिया को एक नया स्टैंडर्ड देना और इसका सबसे बड़ा एग्जांपल कुछ साल बाद ही देखने को मिला। कैसेट्स के बाद से लू ऑटेंस एक नई प्रॉब्लम पर काम कर रहे थे और इस बार आवाज को टेप पर नहीं बल्कि एक

09:14

Speaker A

चमकती हुई डिस्क पर लेजर की मदद से स्टोर करने का आईडिया था। लेकिन एक दिक्कत थी Philips को डिस्क बनाने तो आता था लेकिन आवाज को सही तरीके से डिजिटल कोड में बदलना नहीं। दूसरी तरफ जापान की कंपनी

09:26

Speaker A

Sony के पास डिजिटल ऑडियो का लंबा एक्सपीरियंस था लेकिन डिस्क बनाने की टेक्नोलॉजी नहीं थी। अब जब फिजिकल डिस्क पूरी तरह से तैयार थी तब मार्च 1989 में Philips अपना प्रोटोटाइप लेकर जापान पहुंच गई। अब यहां ज्यादातर कंपनीज़ ने तो इसे

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Speaker A

सीरियसली नहीं लिया लेकिन Sony ने इसका फ्यूचर पहचान लिया और फिर कई सारे मीटिंग्स के बाद दोनों एक दूसरे के साथ मिलकर काम करने लगे और फिर जो कॉम्पैक्ट डिस्क तैयार हुआ ना उसने तो रिवोल्यूशन ही ला दिया। क्योंकि 2002 आते-आते दुनिया की

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Speaker A

पूरी म्यूजिक इंडस्ट्री में हर 100 में से करीब 96 सेल्स अकेले सीडी की ही थी। यानी इसने कैसेट टेप्स को पूरी तरह से रिप्लेस कर दिया था। और हां, उस टाइम Sony और Philips ने मिलकर फैसला लिया था कि वह इसी

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Speaker A

डिज़ाइन पर CD और CD प्लेयर बनाने की परमिशन हर कंपनी को दे देंगे। यही वजह है कि टेक्नोलॉजी Sony और Philips की अपनी होने के बाद भी हर घर में CD प्लेयर पहुंच पाए और हम सभी ने खूब इसका यूज किया।

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Speaker A

लेकिन दोस्तों Philips हर बार सही साबित नहीं हुई। CD की कामयाबी के कुछ साल के बाद ही Philips ने वीडियो 2000 नाम से अपना वीडियो कैसेट फॉर्मेट भी ल्च किया था। अब टेक्निकली यह वीएचएस से बेहतर माना जाता था। लेकिन मार्केट ने वीएचएस को ही

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चुना और Philips को अपनी जर्नी में सबसे बड़ी हारों में से एक का सामना करना पड़ा। लेकिन इसी बीच फिलिप्स ने एक ऐसा फैसला लिया जिसे आज पीछे मुड़कर देखने पर फिलिप्स की सबसे बड़ी बेवकूफी मानी जाती है। असल में 1953 में फिलिप्स ने

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सेमीकंडक्टर्स यानी कि इलेक्ट्रॉनिक चिप बनाने का एक छोटा सा बिजनेस शुरू किया था। अब शुरुआत में यही चिप्स Philips अपने प्रोडक्ट्स में यूज करती थी। लेकिन धीरे-धीरे यह बिजनेस इतना बड़ा हो गया कि 1987 तक यह यूरोप का सबसे बड़ा

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सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरर बन चुका था। लेकिन 2005 में फिलिप्स ने तय किया कि अब उसे चिप बनाने की बजाय उन प्रोडक्ट्स पर ज्यादा ध्यान देना है जो सीधे लोगों तक पहुंचते हैं। जैसे पर्सनल केयर, किचन एप्लायंसेस और मेडिकल डिवाइसेस। असल में

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फिलिप्स ने हेल्थ केयर पर अब बड़ा दांव खेलना शुरू कर दिया था। जैसे कि 2007 में उसने अमेरिका की रेस्टोरॉनिक्स नाम की कंपनी खरीदी ताकि वह हॉस्पिटल्स में यूज होने वाली इमेजिन मशीनें, पेशेंट मॉनिटरिंग सिस्टम और दूसरे मेडिकल

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इक्विपमेंट के बिजनेस में अपनी पकड़ मजबूत बना सके। और फिर इसी सोच की वजह से 1 साल पहले ही यानी 2006 में Philips ने अपने सेमीकंडक्टर बिजनेस का ज्यादातर हिस्सा बेच दिया और इससे एक नई कंपनी बनी थी एनxp

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और यही सबसे इंटरेस्टिंग बात निकल कर सामने आती है। आज वही एनxp दुनिया की सबसे बड़ी सेमीकंडक्टर कंपनीज में गिनी जाती है। और मजेदार बात सिर्फ इतनी ही नहीं थी। 1984 में Philips ने एएसएम इंटरनेशनल के साथ मिलकर एएसएमएल नाम की एक नई कंपनी भी

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शुरू की थी। लेकिन 10 साल के बाद Philips अपना हिस्सा धीरे-धीरे बेचकर पूरी तरह से अलग हो गई। पर पता है आज वही एएसएमएल लिथोग्राफी मशीनंस बनाती है जिसके बिना Apple, एनीवडिया, AMD, Qualcomm, Intel या TSMC जैसी कंपनीज़ दुनिया की सबसे एडवांस

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चिप नहीं बना सकती। लिथोग्राफी मशीन में बेसिकली चिप का मैप बनाया जाता है जिसको चिप प्रिंटर भी कहते हैं। और दोस्तों, यही पैटर्न आगे भी बार-बार दिखने वाला था। Philips एक-एक करके अपने सबसे मजबूत बिजनेसेस को अलग करती चली गई ताकि वह बाकी

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बिजनेसेस पर पूरा फोकस लगा सके। 2011 आते-आते Philips का टीवी बिजनेस भी लगातार घाटे में जा रहा था क्योंकि HDTV की सेल्स गिर रही थी और फिर नतीजा यह हुआ कि उसी साल Philips ने अपना पूरा टीवी डिवीजन एक

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हांगकांग के कंपनी TPV टेक्नोलॉजी को सौंप दिया। शुरुआत में Philips ने 30% हिस्सा अपने पास रखा। लेकिन 2014 आते-आते वो बचा हुआ हिस्सा भी बेचकर निकल गया। और आज Philips टीवी सिर्फ नाम की वजह से Philips टीवी है क्योंकि बनाती तो टीपीवी है। इसके

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अलावा Philips के ऑडियो वीडियो बिजनेस की स्टोरी में तो अलग ही लेवल का ड्रामा चल रहा था। हालांकि हम उसमें घुसने वाले नहीं है। लेकिन बस रिजल्ट आप जान लीजिए कि जिस Philips के स्पीकर कभी आपके घर के पार्टी

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में बजते थे। हेडफोनस जो कॉलेज जाते टाइम आप अपने कानों में लगाए रहते थे और वह छोटा सा पोर्टेबल रेडियो जो हर सफर में आपके साथ चलता था। वह वाला डिवीजन भी कई सारी कंपनियों के पास इधर-उधर जाने के बाद

13:21

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में लास्ट में टीपीवी का ही पार्ट बन गया। इसी तरह से 2016 में लाइटिंग बिजनेस भी अलग होकर सिग्निफाई बन गया और 2021 में मिक्सर ग्राइंडर, आयरन, एयर फ्रायर और कॉफी मेकर जैसे डोमेस्टिक एप्लायंसेस बिजनेस भी हिलस कैपिटल को बेच दिए गए।

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लेकिन सबसे इंटरेस्टिंग बात तो यह थी कि प्रोडक्ट बदल गए, कंपनीज़ बदल गई। लेकिन नाम वही रहा Philips। मतलब आज अगर आप Philips का एलईडी बल्ब, टीवी या मिक्सर ग्राइंडर खरीदते हैं, तो वह Philips बनाते ही नहीं है। लेकिन दोस्तों, बिजनेसेस को

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बेच देना Philips की सबसे बड़ी गलती नहीं थी। असली झटका लगना तो अभी बाकी ही था क्योंकि अब पहली बार सवाल उसके प्रोडक्ट पर नहीं बल्कि उस भरोसे पर उठने वाला था जिसे बनाने में उसे 100 साल से भी ज्यादा

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लगे हुए थे। एक्चुअली 2010 में Philips को अपनी स्लीप एप्रिया मशीनंस को लेकर पहली कंप्लेन मिली। लोगों का कहना था कि मशीनंस के अंदर लगा फॉर्म टूट रहा है और उसके छोटे-छोटे पार्टिकल्स सांस के साथ शरीर में जा रहे हैं। असल में Philips ने 2007

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में अमेरिका की रेस्प्रोनिक्स नाम की कंपनी खरीदी थी। यह तो हमने पहले भी बताया था आपको क्योंकि उस समय Philips का मानना था कि फ्यूचर हेल्थ केयर का है। लेकिन आगे चलकर यही एक्विजिशन उसकी सबसे बड़ी मुसीबत बन गई। धीरे-धीरे पार्टिकल्स वाली

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Speaker A

शिकायतें बढ़ने लगी। 2018 तक Philips के अपने इंजीनियर्स ही कह चुके थे कि यह प्रॉब्लम सच में एकिस्ट करती है। लेकिन इसके बावजूद कंपनी ने तुरंत कोई बड़ा कदम नहीं उठाया। अब जब शिकायतें लगातार बढ़ती गई और प्रशासन भी टाइट हो गई तो फिर जून

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Speaker A

2021 में Philips को अपनी 1.5 करोड़ मशीनंस वापस मंगवानी पड़ गई और अब ज्यादातर लोगों ने इस कंपनी पर ट्रस्ट करना ही छोड़ दिया। तो दोस्तों अब सवाल उठता है कि इतनी बड़ी क्राइसिस झेलने के बाद से आज की डेट में Philips कहां पर

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Speaker A

खड़ा है? देखिए 2021 में रिकॉल से ठीक पहले Philips की मार्केट वैल्यू करीब ₹2.4 लाख करोड़ थी। लेकिन यह हेल्थ मशीन वाली क्राइसिस के बाद 2022 में यह गिरकर 1.1 लाख करोड़ के रह गई थी। यानी सिर्फ एक साल

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में ही कंपनी की मार्केट वैल्यू आधी रह गई। जिसके बाद 2022 में जब नए सीईओ रॉय जैकब्स ने कमान संभाली तो उन्होंने पूरी दुनिया के सामने माफी मांगी और कंपनी के अंदर कई सारे मेजर चेंजेस किए। Philips ने

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कई सारे नॉन एसेंशियल्स खर्चे कम कर दिए। हजारों जॉब्स कट कर दी। सप्लाई चैन सुधारने पर काम किया और अपना पूरा फोकस हेल्थ टेक्नोलॉजी पर डाल दिया। साथ ही कंपनी ने पेशेंट सेफ्टी और प्रोडक्ट क्वालिटी को सबसे ऊपर रखा ताकि लोगों और

15:40

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इन्वेस्टर्स का भरोसा वापस पा सके। अब इन फैसलों का असर 2023 में दिखना भी शुरू हो गया क्योंकि प्रॉफिट्स सुधर गए और इन्वेस्टर्स का भरोसा वापस आ गया और अगले 2 सालों में ही Philips की मार्केट वैल्यू फिर से करीब 2.35 लाख करोड़ तक पहुंच गई।

15:55

Speaker A

अब दोस्तों आज Philips पहले जैसी टेक्नोलॉजी कंपनी नहीं रही। अब उसका पूरा फोकस हेल्थ टेक्नोलॉजी पर है। कंपनी का ज्यादातर रेवेन्यू हॉस्पिटल्स में यूज़ होने वाली इमेजिन मशीनंस, अल्ट्रासाउंड, एक्सरे सिस्टम्स और दूसरे मेडिकल इक्विपमेंट से आता है। इसके अलावा

16:10

Speaker A

कंज्यूमर प्रोडक्ट्स में भी अब Philips मुख्य रूप से शेवर, ट्रिमर और ओरल केयर जैसी कैटेगरीज पर ही काम करती है। लेकिन एक डर अभी भी Philips को सताता है। क्योंकि रेस्पेरॉनिक्स वाले मामले की जांच अमेरिका का डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस आज भी

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Speaker A

कर रहा है। तो दोस्तों Philips की पूरी कहानी को अगर एक लाइन में समझे ना तो Philips को सबसे बड़ा नुकसान उसके कंपटीिटर्स ने नहीं बल्कि उसने खुद पहुंचाया। शुरुआत में उसने बड़ी-बड़ी कंपनीज़ को पीछे छोड़ा। दो वर्ल्ड वॉर झेले

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और दुनिया के सबसे भरोसेमंद ब्रांड में शामिल हो गई। लेकिन आगे चलकर Philips को हराने वाला कोई कंपटीिटर नहीं था बल्कि उसके अपने ही फैसले थे। क्योंकि किसी भी ब्रांड की सबसे बड़ी ताकत उसके प्रोडक्ट्स नहीं होते बल्कि लोगों का भरोसा होता है।

16:50

Speaker A

क्योंकि प्रोडक्ट तो दोबारा बनाया जा सकता है ना। लेकिन एक बार भरोसा अगर टूट जाए ना तो उसे वापस कमाने में सालों लग जाते हैं। यही वजह है कि Philips का नाम आज भी पूरी दुनिया में बिकता है। लेकिन वो भरोसा

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Speaker A

जिसने कभी एक इंसान को अपनी 2 महीने की पूरी सैलरी जोड़कर Philips का रेडियो खरीदने पर मजबूर किया था, वह अब नहीं बचा है। वैसे आपके साथ में Philips का एक्सपीरियंस कैसा रहा है? हमें कमेंट करके जरूर बताइएगा।

Topics: फिलिप्स इलेक्ट्रॉनिक्स कॉम्पैक्ट कैसेट रोटरी शेवर ब्रांड इतिहास नीदरलैंड्स द्वितीय विश्व युद्ध भारत में फिलिप्स उत्पाद सुरक्षा कंपनी संकट


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