**Rise and Fall of the Mughal Empire | Babur, Bahadur Shah Zafar | Why the Empire Actually Collapsed? — Transcript & Summary | SozAI**
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मुगल साम्राज्य के उत्थान और पतन की कहानी, बाबर से शाहजहां तक बादशाहों की जीवनशैली और उनकी कमजोरियों का विश्लेषण।

## Key Takeaways

- मुगल बादशाहों की शराब और नशे की आदतें साम्राज्य के पतन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईं।
- शासकों की ऐशो-आराम की जीवनशैली ने शासन की स्थिरता को कमजोर किया।
- बाबर से शाहजहां तक के बादशाहों के चरित्र और व्यवहार में गिरावट आई।
- राजनीतिक संघर्षों के साथ-साथ व्यक्तिगत कमजोरियां भी मुगल साम्राज्य के अंत का कारण बनीं।
- ताजमहल जैसी भव्य इमारतों के निर्माण के लिए जनता पर भारी कर लगाए गए।

## What the video covers

- मुगल बादशाहों की ऐशो-आराम और शराब, अफ़ीम, नाच-गाने की आदतें साम्राज्य के पतन का कारण बनीं।
- बाबर ने पानीपत की लड़ाई जीतकर मुगल सल्तनत की स्थापना की, जो रंगीन मिजाज और शराब के शौकीन थे।
- हुमायूं की जिंदगी संघर्षों से भरी रही, लेकिन वह भी शराब और नाच-गाने का शौकीन था।
- अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक नया धर्म स्थापित किया, जिसमें शराब और ऐशो-आराम को अनुमति दी गई।
- जहांगीर शराब और अफ़ीम का आदि था, जिसकी वजह से उसका मिजाज अस्थिर रहता था।
- शाहजहां ने मुमताज महल की याद में ताजमहल बनवाया, लेकिन भारी टैक्स और खर्चों ने जनता को प्रभावित किया।
- मुगल बादशाहों के हरम में हजारों महिलाएं और नर्तकियां थीं, जो दरबार की महफिलों को सजाती थीं।
- शराब, नशे और ऐशो-आराम की आदतों ने मुगल शासकों की कमजोरियां बढ़ाईं और शासन कमजोर हुआ।
- मुगल साम्राज्य की 330 साल की हुकूमत में बादशाहों के चरित्र और जीवनशैली ने इतिहास में विवाद पैदा किया।
- वीडियो में मुगल बादशाहों की व्यक्तिगत और राजनीतिक कमजोरियों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

Answers

## Questions about this video

मुगल बादशाहों की शराब और नशे की आदतें साम्राज्य पर कैसे प्रभाव डालती थीं?

मुगल बादशाहों की शराब, अफ़ीम और नशे की आदतों ने उनके निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित किया और शासन में कमजोरी आई, जिससे साम्राज्य का पतन हुआ।

अकबर ने दीन-ए-इलाही क्या था और इसका क्या महत्व था?

अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक नया धर्म स्थापित किया जो इस्लाम, हिंदू, ईसाई, सिख समेत कई धर्मों का मिश्रण था, जिसमें शराब और ऐशो-आराम की अनुमति थी। यह मुगल साम्राज्य में धार्मिक सहिष्णुता का प्रयास था।

शाहजहां ने ताजमहल क्यों बनवाया था?

शाहजहां ने अपनी प्रिय पत्नी मुमताज महल की याद में ताजमहल बनवाया था, जो प्रेम और शोक का प्रतीक है। मुमताज महल 14वें बच्चे को जन्म देते हुए मृत्यु को प्राप्त हुई थीं।

## Full Transcript — Download SRT & Markdown

00:01

Speaker A

[संगीत] एक मुगल बादशाह ने अपने घोड़े को वजीर बना दिया था। घोड़ा शाही लिबास पहनकर दरबार में लाया जाता। एक मुगल बादशाह ने तवाइफ के कहने पर मुसाफिरों से भरी कश्ती जमुना में उलटवा दी थी। बाबर कहता था कि दुनिया में आए हो तो ऐश कर लो। जिंदगी दोबारा नहीं मिलेगी। औरंगजेब को एक कनीज ने शराब पीने पर मजबूर किया और औरंगजेब की काया ही पलट गई। शहजादा सलीम जब बादशाह बना तो शराब पिए बिना उसकी आंखें ही नहीं खुलती थी। शाहजहां ने जिस मुमताज के लिए करोड़ों रुपए का ताजमहल बनवाया, वो मुमताज 14वें बच्चे को जन्म देते हुए मरी थी। वो मुगल अपनी महबूबाओं को भी बगैर कपड़ों के दरबार में लाता। खुद औरतों के कपड़े पहनता था। मुगल बादशाह अहमद शाह बहादुर नाम का बादशाह था। हुकुम एक ख्वाजा सरा का चलता था। जी हां। और यह तो सिर्फ ट्रेलर है। मुगल बादशाहों ने 330 साल हुकूमत में ऐसे काम किए कि शर्म भी घूंघट में मुंह छुपा ले। शराब, शबाब और कबाब के रसिया मुगल शहजादे जब तख्त पर बैठते तो कैसी-कैसी घिनौनी कहानियां वजूद में आती थी। आज हम आपको सब कुछ बयान करेंगे। लेकिन उससे पहले हमारे चैनल को लाइक और सब्सक्राइब जरूर कर लें। तो चलिए पोल खोलते हैं मुगल बादशाहों की अय्याशियों और ढीले करैक्टर की। तो चलिए चलते हैं 500 साल पहले पानीपत के मैदान में। [संगीत] [संगीत] जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर ने 21 अप्रैल 1526 को पानीपत में इब्राहिम लोदी को हराया। यूं हिंदुस्तान में अजीमो शान मुगल सल्तनत की बुनियाद रखी। उसने बाद में भी बहुत जंगे की। मगर वो सिर्फ तलवार या लड़ाई के मैदान का आदमी नहीं था बल्कि रंगीन मिजाज आदमी था। बाबर ने अपनी ऑटोबायोग्राफी बाबरनामा में 1519 का एक वाक्या पूरी सच्चाई के साथ बयान किया है। वो लिखता है कि एक दिन बाजार से गुजरते हुए उसकी नजर एक खूबसूरत लड़के पर पड़ी। उसके हुस्नो जवानी ने दिल में हलचल मचा दी। बाबर ने उसके करीब जाना चाहा तो भीड़ की वजह से वो आंखों से ओझल हो गया। वो क्या ओझल हुआ? बाबर की आंखों से नींद ओझल हो गई। बाबर उसके बाद कई दिन तक उसकी याद में बेचैन तड़पता रहा। यह वाकया बाबर को होमोसेक्सुअल तो साबित नहीं करता। मगर लड़कों की तरफ से उसकी कशिश का इशारा जरूर देता है। इसी तरह बाबर ने शराब पीने का भी खुले लफ्जों में एतराफ किया है। वो रोज शराब पीता था और वो भी सादा नहीं बल्कि अफ्यूम मिलाकर। यानी डबल नशा। हिंदुस्तान फतह करने से पहले भी वो शराब पीता था। मगर 1526 में पानीपत की लड़ाई से पहले उसने मन्नत मानी थी कि जीत गया तो शराब छोड़ देगा। सोने और चांदी के प्याले गरीबों में बांट दिए थे। शराब के सब बर्तन तोड़ डाले थे। बजाहिर तो पक्की तौबा कर ली थी मगर बाद में तौबा ही टूट गई। हिंदुस्तान का तख्त जीत लिया तो बाबर ने लाल परी का दामन फिर थाम लिया। भंग भी इसे खास तौर पर पसंद थी। नाच गाने की महफिलों का भी बहुत शौक था। शोख चलचल हसीनाएं रात भर अपनी अदाओं से महफिल गरमाती। बाबर रुबाब बजाता और गज़लें पढ़ता। महफिल में शराब और खूबसूरत लड़के भी होते थे। यह कोई कहानी या इल्जाम नहीं बल्कि वो तफसीलात हैं जो बाबर ने खुद अपनी ऑटोबायोग्राफी में बयान की हैं। खुद इसका कॉल था कि बाबर बे ऐश कौश के आलम दोबारा नीज़ यानी ए बाबर ऐश कर ले जिंदगी दोबारा नहीं मिलेगी। बाबर ने इन महफिलों का जिक्र तो किया मगर यह नहीं बताया कि उसके हरम में कितनी औरतें थी। तारीख की किताबों में चार से छह बीवियों का जिक्र मिलता है। अगर कनीजों और खादमाओं को भी शामिल कर लिया जाए तो हरम में मौजूद औरतों की तादाद शायद चंद दर्जन तक पहुंचती हो। मगर यकीन से कुछ नहीं कहा जा सकता। बाबर के बाद तख्त पर उसका बेटा नसीरुद्दीन हुमायूं बैठा। वो भी राग रंग और रूप का रसिया था। असल में उसकी सारी जिंदगी तख्त छीन जाने के बाद फरार और फिर तख्त की वापसी के लिए लड़ाई में गुजरी। समझे जिंदगी ने जिंदगी भर गम ही दिए थे। तो वह यह गम भुलाने के लिए शराब के जाम पीता था और शबाब की आगोश में जीता था। हुआ यह था कि बाबर के बाद 1530 में वो बादशाह तो बन गया मगर जंग का कोई तजुर्बा नहीं था। ऐसे में 1540 में अफगानिस्तान से शेरशाह सूरी घोड़े दौड़ाता हुआ आया और दिल्ली पर कब्जा कर लिया। हुमायूं दिल पर पत्थर रखकर वहां से दौड़ा और सिंध, बलोचिस्तान और अफगानिस्तान से होते हुए ईरान में पनाह ली। मगर ऐसे हालात में भी उसके अंदर का आशिक डट कर खड़ा रहा। 1541 में ईरान जाते हुए सिंध में वह एक ईरानी खानदान की लड़की हमीदा बानो पर दिल हार बैठा। उस वक्त हुमायूं की उम्र 33 बरस थी और हमीदा बानो सिर्फ 14 साल की थी। हुमायूं ने उससे शादी की और उसे मरियम मकानी का लकब दिया। मरियम मकानी ने सिंध के शहर उमरकोट में मुगल आजम जलालुद्दीन अकबर को जन्म दिया। खैर ईरान से 15 साल बाद वापसी हुई और हुमायूं एक बार फिर दिल्ली का बादशाह बना। अब फिर रोजाना नाच गाने की महफिलें जमती। रात भर जाम छलकते। इस सबके बावजूद हुमायूं दीन से गाफिल नहीं था। वो रोजे भी रखता था और नमाजों का भी एतमाम करता था। दिल्ली वापसी को एक साल हुआ था। एक दिन वो अपनी लाइब्रेरी में बैठा था कि अजान की आवाज आई। नमाज़ के लिए उठा मगर जल्दी में सीढ़ियों से फिसल गया। सर पर शदीद चोट आई। 3 दिन तक जिंदगी और मौत की कशमकश में रहा और फिर दुनिया से रुखसत हुआ। [संगीत] हुमायूं की अचानक मौत के बाद मुगल तख्त इसके बेटे जलालुद्दीन अकबर के हिस्से में आया। तब उसकी उम्र सिर्फ 14 बरस थी। बचपन में बादशाह बन जाने वाला यह लड़का वक्त के साथ-साथ ऐशोरत और शराब का आदि होता चला गया। इब्तदा में अकबर को एक पक्का मुसलमान कहा जाता है। वो रोजे रखता था। नमाज पढ़ता था। हत्ता कि एक बार हज पर जाने की तैयारी भी कर ली थी। मगर दरबारियों ने इसे डराया कि इतने दिन मुल्क से बाहर रहे तो मुमकिन है वापसी पर तख्त इसके हाथ में ना रहे। अकबर डर गया और हज का इरादा छोड़ दिया। मगर वक्त के साथ वो मजहब से दूर होता गया। 1581 में उसने दीन इलाही के नाम से एक नया मजहब पेश किया। जो दरअसल इस्लाम, हिंदू मत, ईसाइयत, सिख मत और दीगर मजहबों का मिलाजुला रूप था। उसमें नमाज रोजी की पाबंदी नहीं थी। शराब को हलाल कर दिया गया था और ऐशोरत के भी रास्ते खोल दिए गए थे। अकबर का एक रतन अबुल फसल अकबरनामा में लिखता है कि बादशाह ने दारुल शराब के नाम से एक बार बनवाया था जहां देसी और विलायती हर किस्म की शराब होती थी। अकबर रोज वहां जाकर पीता मगर मदहोशी की हद तक नहीं। 1580 में उसने शराब छोड़ने की कोशिश भी की। मगर वो कहते हैं ना छूटती नहीं है मुंह से यह काफिर लगी हुई। तो मुगल आजम शराब तो ना छोड़ सके। मगर उसके साथ-साथ अफ्यूम और भंग के मजे भी लेते रहे और नाच गाना भी उनकी कमजोरी थी। अक्सर महफिलें सजती, तानसेन गाता, रक्कासाएं नाचती और जाम से जाम टकराते। अकबर का हरम भी कम मशहूर नहीं। बीवियों, कनीजों और रक्कासाओं समेत वहां 300 से जायद औरतें थी। उनके लिए उसने ऐश महल के नाम से एक अलग इमारत बनवाई। जहां हिंदुस्तान भर की हसीन लड़कियां जमा की जाती थी। दरबार में नाचने वाली कोई डांसर अगर पसंद आ जाए तो इसे भी हरम में शामिल कर लिया जाता। कहा जाता है कि अकबर की 30 बीवियां थी। मगर उन सब में जोधाबाई को खास मकाम हासिल था। वही जोधाबाई जो शहजादा सलीम यानी शहंशाह जहांगीर की मां बनी। अकबर के तीनों बेटे मुराद, दानियाल और जहांगीर शराब के आदि थे। मुराद और दानियाल को यही लत लेटू दी। मगर दो जवान भाइयों की मौत भी जहांगीर को ना रोक सकी। वो इस कदर पीता था कि अक्सर मदहोश हो जाता। तो उसके जहांगीरी में वह खुद लिखता है कि जवानी में दिन भर में 20-20 प्याले शराब पी जाता था। बादशाह बनने के बाद उसने थोड़ी कम कर दी थी। यानी पांच से सात प्याले। मगर यह आदत आखिरी सांस तक साथ रही। शराब ने उसका जिगर बर्बाद कर दिया। फिर भी उसने पीना ना छोड़ा। बीमारी ने फिर इतना कमजोर कर दिया कि प्याला मुंह तक नहीं ले जा सकता था। तब शराब के चंद कतरे उसके मुंह में टपकाए जाते तो उसे कुछ राहत मिलती। शराब के साथ वह अफ्यूम का भी आदि था। दिन में कई बार अफ्यूम खाता। जहांगीर का हरम भी बहुत बड़ा था। 300 कनीज, 1000 से ज्यादा रक्कासाएं और खादमाएं कश्मीर, पंजाब और बंगाल समेत पूरे मुल्क से हसीन लड़कियां लाई गई थीं। कहा जाता है कि हर रात एक नई लड़की उसके पास ले जाई जाती थी। इतनी ज्यादा शराब पीने की वजह से जहांगीर का मिजाज पल-पल बदलता था। कभी तोला, कभी माशा। कभी बहुत मेहरबान तो कभी इंतहाई बेरहम। यही वजह है कि जहांगीर ने अपने बेटे खुसरो को भी नहीं बख्शा था। बगावत के इल्जाम में उसने उसकी आंखें निकलवा दी थीं। जहांगीर के बादशाहत शहाबुद्दीन मोहम्मद शाहजहां के हिस्से में आई। वह बादशाह जिसका नाम सुनते ही ताजमहल आंखों के सामने आ जाता है। यह अजीम मकबरा उसने अपनी महबूब और चहीती बीवी मुमताज महल की याद में बनवाया था। वही मुमताज महल जो शादी के 19वें बरस में 14वें बच्चे को जन्म देते हुए [संगीत] जान से गई थी। मोहब्बत की यह यादगार जितनी हसीन थी, उतनी ही महंगी भी। फ्रांसीसी मोरेक फ्रांसिस बर्नियर अपनी किताब ट्रैवल्स इन द मुगल एंपायर में लिखता है कि ताजमहल की तामीर पर उस वक्त के 3 करोड़ से ज्यादा खर्च हुए थे। कहा जाता है उस दौर का हिंदुस्तान दो तबकों में बंट चुका था। एक बेहद अमीर जिनके पास महल, सोने चांदी के ढेर और दर्जनों नौकर चाकर थे और दूसरा बेहद गरीब जिनके लिए दो वक्त की रोटी भी ख्वाब बन चुकी थी। शाहजहां को शानदार इमारतें तामीर कराने का बहुत शौक था और उन पर दौलत पानी की तरह बाई जाती थी। खर्चे पूरे करने के लिए जनता पर भारी टैक्स लगे। ब्यूरोक्रेसी करप्शन मे

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Speaker A

में आए हो तो ऐश कर लो। जिंदगी दोबारा नहीं मिलेगी। औरंगजेब को एक कनीज ने शराब पीने पर मजबूर किया और औरंगजेब की काया ही पलट गई। शहजादा सलीम जब बादशाह बना तो शराब पिए बिना उसकी आंखें ही नहीं खुलती

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Speaker A

थी। शाहजहां ने जिस मुमताज के लिए करोड़ों रुपए का ताजमहल बनवाया, वो मुमताज 14वें बच्चे को जन्म देते हुए मरी थी। वो मुगल अपनी महबूबाओं को भी बगैर कपड़ों के दरबार में लाता। खुद औरतों के कपड़े पहनता था। मुगल बादशाह अहमद शाह बहादुर

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Speaker A

नाम का बादशाह था। हुकुम एक ख्वाजा सरा का चलता था। जी हां। और यह तो सिर्फ ट्रेलर है। मुगल बादशाहों ने 330 साल हुकूमत में ऐसेसे काम किए कि शर्म भी घूंघट में मुंह छुपा ले। शराब, शबाब और कबाब के रसिया

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Speaker A

मुगल शहजादे जब तख्त पर बैठते तो कैसी-कैसी घिनौनी कहानियां वजूद में आती थी। आज हम आपको सब कुछ बयान करेंगे। लेकिन उससे पहले हमारे चैनल को लाइक और सब्सक्राइब जरूर कर लें। तो चलिए पोल खोलते हैं मुगल बादशाहों की अय्याशियों और

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Speaker A

ढीले करैक्टर की। तो चलिए चलते हैं 500 साल पहले पानीपत के मैदान में। [संगीत] [संगीत] जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर ने 21 अप्रैल 1526 को पानीपत में इब्राहिम लोदी को हराया। यूं हिंदुस्तान में अजीमो शान मुगल सल्तनत की बुनियाद रखी। उसने बाद में भी

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Speaker A

बहुत जंगे की। मगर वो सिर्फ तलवार या लड़ाई के मैदान का आदमी नहीं था बल्कि रंगीन मिजाज आदमी था। बाबर ने अपनी ऑटोबायोग्राफी बाबरनामा में 1519 का एक वाक्या पूरी सच्चाई के साथ बयान किया है। वो लिखता है कि एक दिन बाजार से गुजरते

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Speaker A

हुए उसकी नजर एक खूबसूरत लड़के पर पड़ी। उसके हुस्नो जवानी ने दिल में हलचल मचा दी। बाबर ने उसके करीब जाना चाहा तो भीड़ की वजह से वो आंखों से ओझल हो गया। वो क्या ओझल हुआ? बाबर की आंखों से नींद ओझल

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Speaker A

हो गई। बाबर उसके बाद कई दिन तक उसकी याद में बेचैन तड़पता रहा। यह वाकया बाबर को होमोसेक्सुअल तो साबित नहीं करता। मगर लड़कों की तरफ से उसकी कशिश का इशारा जरूर देता है। इसी तरह बाबर ने शराब पीने का भी

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Speaker A

खुले लफ्जों में एतराफ किया है। वो रोज शराब पीता था और वो भी सादा नहीं बल्कि अफ्यूम मिलाकर। यानी डबल नशा हिंदुस्तान फतह करने से पहले भी वो शराब पीता था। मगर 1526 में पानीपत की लड़ाई से पहले उसने

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Speaker A

मन्नत मानी थी कि जीत गया तो शराब छोड़ देगा। सोने और चांदी के प्याले गरीबों में बांट दिए थे। शराब के सब बर्तन तोड़ डाले थे। बजाहिर तो पक्की तौबा कर ली थी मगर बाद में तौबा ही टूट गई। हिंदुस्तान का

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Speaker A

तख्त जीत लिया तो बाबर ने लाल परी का दामन फिर थाम लिया। भंग भी इसे खास तौर पर पसंद थी। नाच गाने की महफिलों का भी बहुत शौक था। शोख चलचल हसीनाएं रात भर अपनी अदाओं से महफिल गरमाती। बाबर रुबाब बजाता और

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Speaker A

गज़ें पढ़ता। महफिल में शराब और खूबसूरत लड़के भी होते थे। यह कोई कहानी या इल्जाम नहीं बल्कि वो तफसीलात हैं जो बाबर ने खुद अपनी ऑटोबायोग्राफी में बयान की हैं। खुद इसका कॉल था कि बाबर बे ऐश कौश के आलम

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Speaker A

दोबारा नीज़ यानी ए बाबर ऐश कर ले जिंदगी दोबारा नहीं मिलेगी। बाबर ने इन महफिलों का जिक्र तो किया मगर यह नहीं बताया कि उसके हरम में कितनी औरतें थी। तारीख की किताबों में चार से छह बीवियों का जिक्र

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Speaker A

मिलता है। अगर कनीजों और खादमाओं को भी शामिल कर लिया जाए तो हरम में मौजूद औरतों की तादाद शायद चंद दर्जन तक पहुंचती हो। मगर यकीन से कुछ नहीं कहा जा सकता। बाबर के बाद तख्त पर उसका बेटा नसीरुद्दीन

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Speaker A

हुमायूं बैठा। वो भी राग रंग और रूप का रसिया था। असल में उसकी सारी जिंदगी तख्त छीन जाने के बाद फरार और फिर तख्त की वापसी के लिए लड़ाई में गुजरी। समझे जिंदगी ने जिंदगी भर गम ही दिए थे। तो वह

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Speaker A

यह गम भुलाने के लिए शराब के जाम पीता था और शबाब की आगोश में जीता था। हुआ यह था कि बाबर के बाद 1530 में वो बादशाह तो बन गया मगर जंग का कोई तजुर्बा नहीं था। ऐसे में 1540 में अफगानिस्तान से शेरशाह सूरी

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Speaker A

घोड़े दौड़ाता हुआ आया और दिल्ली पर कब्जा कर लिया। हुमायूं दिल पर पत्थर रखकर वहां से दौड़ा और सिंध, बलोचिस्तान और अफगानिस्तान से होते हुए ईरान में पनाह ली। मगर ऐसे हालात में भी उसके अंदर का आशिक डट कर खड़ा रहा। 1541 में ईरान जाते

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Speaker A

हुए सिंध में वह एक ईरानी खानदान की लड़की हमीदा बानो पर दिल हार बैठा। उस वक्त हुमायूं की उम्र 33 बरस थी और हमीदा बानो सिर्फ 14 साल की थी। हुमायूं ने उससे शादी की और उसे मरियम मकानी का लकब दिया। मरियम

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Speaker A

मकानी ने सिंध के शहर उमरकोट में मुगल आजम जलालुद्दीन अकबर को जन्म दिया। खैर ईरान से 15 साल बाद वापसी हुई और हुमायूं एक बार फिर दिल्ली का बादशाह बना। अब फिर रोजाना नाच गाने की महफिलें जमती। रात भर

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Speaker A

जाम छलकते। इस सबके बावजूद हुमायूं दीन से गाफिल नहीं था। वो रोजे भी रखता था और नमाजों का भी एतमाम करता था। दिल्ली वापसी को एक साल हुआ था। एक दिन वो अपनी लाइब्रेरी में बैठा था कि अजान की आवाज

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Speaker A

आई। नमाज़ के लिए उठा मगर जल्दी में सीढ़ियों से फिसल गया। सर पर शदीद चोट आई। 3 दिन तक जिंदगी और मौत की कशमकश में रहा और फिर दुनिया से रुखसत हुआ। [संगीत] हुमायूं की अचानक मौत के बाद मुगल तख्त

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Speaker A

इसके बेटे जलालुद्दीन अकबर के हिस्से में आया। तब उसकी उम्र सिर्फ 14 बरस थी। बचपन में बादशाह बन जाने वाला यह लड़का वक्त के साथ-साथ ऐशोरत और शराब का आदि होता चला गया। इब्तदा में अकबर को एक पक्का मुसलमान

05:55

Speaker A

कहा जाता है। वो रोजे रखता था। नमाज पढ़ता था। हत्ता कि एक बार हज पर जाने की तैयारी भी कर ली थी। मगर दरबारियों ने इसे डराया कि इतने दिन मुल्क से बाहर रहे तो मुमकिन है वापसी पर तख्त इसके हाथ में ना रहे।

06:09

Speaker A

अकबर डर गया और हज का इरादा छोड़ दिया। मगर वक्त के साथ वो मजहब से दूर होता गया। 1581 में उसने दीन इलाही के नाम से एक नया मजहब पेश किया। जो दरअसल इस्लाम, हिंदू मत, ईसाइयत, सिख मत और दीगर मजहबों का

06:23

Speaker A

मिलाजुला रूप था। उसमें नमाज रोजी की पाबंदी नहीं थी। शराब को हलाल कर दिया गया था और ऐशोरत के भी रास्ते खोल दिए गए थे। अकबर का एक रतन अबुल फसल अकबरनामा में लिखता है कि बादशाह ने दारुल शराब के नाम

06:36

Speaker A

से एक बार बनवाया था जहां देसी और विलायती हर किस्म की शराब होती थी। अकबर रोज वहां जाकर पीता मगर मदहोशी की हद तक नहीं। 1580 में उसने शराब छोड़ने की कोशिश भी की। मगर वो कहते हैं ना छूटती नहीं है मुंह से यह

06:51

Speaker A

काफिर लगी हुई। तो मुगल आजम शराब तो ना छोड़ सके। मगर उसके साथ-साथ अफ्यूम और भंग के मजे भी लेते रहे और नाच गाना भी उनकी कमजोरी थी। अक्सर महफिलें सजती, तानसेन गाता, रक्कासाएं नाचती और जाम से जाम

07:06

Speaker A

टकराते। अकबर का हरम भी कम मशहूर नहीं। बीवियों, कनीजों और रक्कासाओं समेत वहां 300 से जायद औरतें थी। उनके लिए उसने ऐश महल के नाम से एक अलग इमारत बनवाई। जहां हिंदुस्तान भर की हसीन लड़कियां जमा की जाती थी। दरबार में नाचने वाली कोई डांसर

07:23

Speaker A

अगर पसंद आ जाए तो इसे भी हरम में शामिल कर लिया जाता। कहा जाता है कि अकबर की 30 बीवियां थी। मगर उन सब में जोधाबाई को खास मकाम हासिल था। वही जोधाबाई जो शहजादा सलीम यानी शहंशाह जहांगीर की मां बनी।

07:38

Speaker A

अकबर के तीनों बेटे मुराद, दानियाल और जहांगीर शराब के आदि थे। मुराद और दानियाल को यही लत लेटू दी। मगर दो जवान भाइयों की मौत भी जहांगीर को ना रोक सकी। वो इस कदर पीता था कि अक्सर मदहोश हो जाता। तो उसके

07:52

Speaker A

जहांगीरी में वह खुद लिखता है कि जवानी में दिन भर में 2020 प्याले शराब पी जाता था। बादशाह बनने के बाद उसने थोड़ी कम कर दी थी। यानी पांच से सात प्याले। मगर यह आदत आखिरी सांस तक साथ रही। शराब ने उसका

08:07

Speaker A

जिगर बर्बाद कर दिया। फिर भी उसने पीना ना छोड़ा। बीमारी ने फिर इतना कमजोर कर दिया कि प्याला मुंह तक नहीं ले जा सकता था। तब शराब के चंद कतरे उसके मुंह में टपकाए जाते तो उसे कुछ राहत मिलती। शराब के साथ

08:21

Speaker A

वह अफ्यूम का भी आदि था। दिन में कई बार अफ्यूम खाता। जहांगीर का हरम भी बहुत बड़ा था। 300 कनी 1000 से ज्यादा रक्कासाइन और खादमाएं कश्मीर, पंजाब और बंगाल समेत पूरे मुल्क से हसीन लड़कियां लाई गई थी। कहा

08:37

Speaker A

जाता है कि हर रात एक नई लड़की उसके पास ले जाई जाती थी। इतनी ज्यादा शराब पीने की वजह से जहांगीर का मिजाज पल-पल बदलता था। कभी तोला कभी माशा। कभी बहुत मेहरबान तो कभी इंतहाई बेरहम। यही वजह है कि जहांगीर

08:53

Speaker A

ने अपने बेटे खुसरो को भी नहीं बख्शा था। बगावत के इल्जाम में उसने उसकी आंखें निकलवा दी थी। जहांगीर के बादशाहत शहाबुद्दीन मोहम्मद शाहजहां के हिस्से में आई। वह बादशाह जिसका नाम सुनते ही ताजमहल आंखों के सामने आ जाता है। यह अजीम मकबरा

09:09

Speaker A

उसने अपनी महबूब और चहीती बीवी मुमताज महल की याद में बनवाया था। वही मुमताज महल जो शादी के 19वें बरस में 14वें बच्चे को जन्म देते हुए [संगीत] जान से गई थी। मोहब्बत की यह यादगार जितनी हसीन थी, उतनी

09:25

Speaker A

ही महंगी भी। फ्रांसीसी मोरेक फ्रांसिस बर्नियर अपनी किताब ट्रैवल्स इन द मुगल एंपायर में लिखता है कि ताजमहल की तामीर पर उस वक्त के 3 करोड़ से ज्यादा खर्च हुए थे। कहा जाता है उस दौर का हिंदुस्तान दो

09:37

Speaker A

तबकों में बंट चुका था। एक बेहद अमीर जिनके पास महल, सोने चांदी के ढेर और दर्जनों नौकर चाकर थे और दूसरा बेहद गरीब जिनके लिए दो वक्त की रोटी भी ख्वाब बन चुकी थी। शाहजहां को शानदार इमारतें तामीर

09:50

Speaker A

कराने का बहुत शौक था और उन पर दौलत पानी की तरह बाई जाती थी। खर्चे पूरे करने के लिए जनता पर भारी टैक्स लगे। ब्यूरोक्रेसी करप्शन में डूब गई। इलीट क्लास लालच में पड़ गई थी। बाहर के हमलावरों ने इसी

10:04

Speaker A

कमजोरी का फायदा उठाया। 1632 में पुर्तगालियों ने मुगल सल्तनत की एक अहम बंदरगाह पर कब्जा कर लिया और ईरानियों ने कंधार छीन लिया। शाहजहां कुछ ना कर सका। शराब वो भी पीता था मगर कम। इसे मुगल बादशाहों में सबसे कम शराब पीने वाला कहा

10:20

Speaker A

जाता है। अलबत्ता जो मशरूफ पीता सोने के बर्तनों में पीता था। तारीख में उसकी तीन बीवियों का जिक्र मिलता है। मुमताज महल, कंधारी बेगम और अकबर आबादी महल। मगर उनके अलावा हरम में कनीज़ें भी थी। वो भी रक्स

10:35

Speaker A

और मौसी का शौकीन था। रात के वक्त किला रोशनियों से जगमगाता था। महफिलें सच थी और शाहजहां तख्त ताऊस पर बैठकर लुफ लेता। यह तख्त उसने 1635 में ₹1 करोड़ की लागत से बनवाया था। जिसमें कोहिनूर समेत कीमती

10:50

Speaker A

हीरे जवाहरात जड़े थे। ऐशो आराम वाली जिंदगी चल रही थी कि मुमताज महल की मौत ने शाहजहां को अंदर से तोड़ दिया। वो बिल्कुल बदल गया। सफेद लिबास पहनने लगा। मौसी की और शराब छोड़ दी और फिर कोई शादी नहीं की।

11:05

Speaker A

1658 में उसके बेटे औरंगजेब ने तख्त छीन लिया और उसे कैद कर दिया। जिंदगी के आखिरी 7 बरस शाहजहां ने इसी कैदखाने में गुजारे जहां से वो रोज ताजमहल को देखता और खामोशी से रोता रहता। औरंगजेब आलमगीर जिसे तारीख

11:21

Speaker A

मुगल सल्तनत का सबसे मजहबी बादशाह कहती है। मगर वो हमेशा से ऐसा नहीं था। फिर कुछ ऐसा हुआ कि वो बिल्कुल बदल गया। कहानी उस वक्त शुरू हुई [संगीत] जब उसने नौजवानी में एक हिंदू रक्कासा हीराबाई को देखा।

11:34

Speaker A

मौलाना अबुल कलाम आजाद गुबार खातिर में लिखते हैं कि वह औरंगजेब की खाला की कनीज थी। वही नाचती गाती थी। एक दिन औरंगजेब खाला के घर आया। वहां एक नजर हीराबाई पर पड़ी और वो संभल ना सका। पहली ही झलक में

11:48

Speaker A

दिल जिगर ऐसे घायल हुए कि होश साथ छोड़ गया। औरंगजेब ने हीराबाई को खाला से मांग लिया। महल में ले आया और उसका नाम रखा ज़ैनाबादी। फिर दिन और रात इसी के नाम हो गए। औरंगजेब नमाज और रोजे का पाबंद था।

12:02

Speaker A

मगर ज़ैनाबादी के इश्क में यह सब पीछे रह गया। दिन रात रक्स और मौसी की महफिलें सजती। किताब मा असुरुल उमरा में लिखा है कि औरंगजेब ज़ैनबादी के इश्क में इस हद तक डूब गया था कि अपने हाथ से शराब का प्याला

12:16

Speaker A

भरकर महबूबा को पेश करता और नशे और सुरूर में डूबी हुई उसकी अदाएं देखता। एक दिन ज़ैनाबादी ने खुद इसके हाथ में शराब का प्याला थमा दिया। औरंगजेब ने नरमी से कहा कि इसे मजबूर ना करें। वो शराब नहीं पीता।

12:29

Speaker A

मगर वह अपनी ज़िद पर अड़ी रही। जैसे ही औरंगजेब ने प्याला लबों के करीब किया, ज़ैनाबादी ने प्याला छीन लिया और मुस्कुरा कर बोली, "मेरा मकसद शराब पिलाना नहीं था। तुम्हारे इश्क का इम्तिहान लेना था।" यह किस्सा दरबार तक भी पहुंचा। बड़े भाई दारा

12:44

Speaker A

शिकू ने बादशाह को सब कुछ बताते हुए कहा, "देखिए, "इसका पाखंड एक लौंडी के लिए खुद को बर्बाद कर रहा है।" इस वाक्य के कुछ अरसे बाद ऐन जवानी में ज़ैन आबादी का इंतकाल हो गया। मौलाना आजाद लिखते हैं कि

12:58

Speaker A

इस सदमे ने औरंगजेब को तोड़ कर रख दिया। यहीं से कहानी का रुख बदल जाता है। ज़नाबादी की मौत के बाद औरंगजेब का रिश्ता दोबारा मजहब से जुड़ गया। उसने नमाज की पाबंदी शुरू की। शराब और मौसी से तौबा कर

13:11

Speaker A

ली। बाद में वो कहा करता था कि ज़ैनाबादी की मौत खुदा का एहसान थी। इसी इश्क ने मुझे बुराइयों में डाल रखा था। बादशाह बनने के बाद वो इश्क मोहब्बत के चक्कर में नहीं पड़ा। हां, तीन बार शादियां जरूर की।

13:22

Speaker A

मगर वो सब सियासी या खानदानी नौयत की थी। उसके हरम में ना कनी थी ना रक्कासाएं। उसके दौर में शराब पर मुकम्मल पाबंदी लगा दी गई। महल का शराबखाना भी बंद करवा दिया गया। बर्तन तक तोड़ दिए गए। दरबार में

13:36

Speaker A

पानी या शरबत के सिवा कुछ नहीं पिया जाता था। अफ्यूम और भंग भी मना करार पाए। रक्स और मौसी पर पाबंदी लग गई। तानसेन के वारिसों को पेंशन देकर फारिक कर दिया गया। औरंगजेब की अपनी जिंदगी भी सादगी की मिसाल

13:49

Speaker A

बन गई। मट्टी के बर्तनों में सादा खाना खाता। सोने चांदी के बर्तन खजाने में जमा करवा दिए थे। आलमगीरनामा में लिखा है कि वह रात 2:00 बजे उठता, तहज्जुद अदा करता, कुरान पढ़ता यूं एक रक्कासा की मोहब्बत और

14:03

Speaker A

फिर उसकी अचानक मौत ने औरंगजेब आलमगीर को तारीख में एक रिलीजियस यानी मजहबी बादशाह का मुकाम दिया। औरंगजेब के बाद मुगल सल्तनत ऐसे लड़खड़ाई कि फिर संभल ना सकी। अगले 150 बरस में 14 बादशाह आए। मगर सब एक

14:18

Speaker A

से बढ़कर एक। ज्यादातर अय्याश, कमजोर और दूसरों के इशारों पर चलने वाले। औरंगजेब के बाद ताज औरंगजेब के तीसरे बेटे बहादुर शाह अव्वल के सर सजा। उसका असल नाम कुतुबुद्दीन मोहम्मद मुअज्जम था। इख्तेदार की ख्वाहिश उसके दिल में बहुत पहले से पल

14:35

Speaker A

रही थी। बाप को हटाने के लिए उसने कई साजिशें की। हर बार पकड़ा गया और हर बार औरंगजेब ने माफ कर दिया। कभी कैद में डाला तो कभी कोई ओदा देकर खुश करने की कोशिश की। मगर बाप के इंतकाल के बाद मंजर बदल

14:49

Speaker A

गया। दूसरे दो भाइयों ने भी तख्त का दावा किया। मोअज़म ने फैसला कुन वार किया। दोनों भाइयों को और उनके बेटों को भी कत्ल करवा दिया। फिर वो बहादुर शाह के नाम से तख्त पर बैठ गया। इख्तेदार मिलते ही उसकी

15:02

Speaker A

कमजोरियां खुलकर सामने आने लगी। ना अहलियत थी ना तजुर्बा। ऊपर से तकब्बुर ऐसा कि संभालना मुश्किल। शराब शबाब और मौसी की उसकी कमजोरियां बन गई। वह खुशामदियों और चापलूसों में घिरा रहता और उन्हीं की बातों पर फैसले करता। समझदार लोग मायूस

15:19

Speaker A

होकर दरबार से अलग होते चले गए। बहादुर शाह अव्वल की हुकूमत सिर्फ 4 साल और आठ माह चली। मुद्दत मुख्तसर थी मगर असरात गहरे। वो मर तो गया मगर जाते-जाते मुगल सल्तनत की बुनियादें हिला गया। और यह लज़िश

15:33

Speaker A

आने वाले बरसों में पूरे इख्तेदार को बहा ले गई। बहादुर शाह अव्वल के बाद उसका बेटा जदार शाह तख्त पर बैठा। मगर तख्त संभालने से पहले ही वो एक गाने वाली लाल कंवर के इश्क में ऐसे डूब चुका था कि किसी चीज

15:47

Speaker A

[संगीत] का होश नहीं था। 1712 में बादशाह बना तो लाल कंवर को ब्याह कर लाल किले में ले आया। इम्तियाज महल का खिताब दिया। कीमती लिबास और हीरे जवाहरात बख्शे और सालाना ₹ करोड़ का वजीफा मुकरर कर दिया।

16:01

Speaker A

जदार शाह उसकी मोहब्बत में अंधा हो चुका था। लाल कंवर की हर फरमाइश हुकुम बन जाती। उसके भाई नियामत खान को मुल्तान का गवर्नर बनाया गया और बाकी भाइयों को महल और नौकर चाकर मिल गए। हद तो ये हुई कि एक दिन

16:15

Speaker A

जमुना के किनारे झरोखे में बैठी लाल कंवर ने नाज से कहा हमने कभी कश्ती डूबते नहीं देखी। बादशाह ने ताली बजाई और सामने से गुजरती कश्ती डुबोने का हुकुम दे दिया। अगर बाज रिवायतें कहती हैं कि वजीर जुल्फिकार खान ने यह हुकुम रुकवा दिया था।

16:31

Speaker A

मुख्तसिर यह कि जंदार शाह का दरबार ऐशोइरत का अड्डा बन चुका था। हर रात नाच गाने शराबो शबाब की महफिलें सजती। उसकी कमजोरी का फायदा जदार के भतीजे फर्रुख सीर ने उठाया और इख्तेदार छीन लिया। जदार शाह का

16:46

Speaker A

सर काट कर फर्रुख सीर के सामने पेश किया गया। और लाल कंवर को सुहाग पूरा भेज दिया गया। फर्रुख सीर बादशाह तो बन गया लेकिन उसमें भी बादशाहों वाली कोई खुसूसियत नहीं थी। वो हर वक्त खुशामदियों के घेरे में

16:59

Speaker A

रहता। यह फर्रुख सीर ही था जिसने एक शाही फरमान के जरिए ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, गुजरात और हैदराबाद में ड्यूटी फ्री तजारत की इजाजत दी थी। यही वो मोड़ था जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने हिंदुस्तान पर कब्जे के ख्वाब देखना शुरू कर दिए। सीर

17:14

Speaker A

पूरे दौरे इख्तेदार में सैयद बरादरान के हाथों कठपुतली बना रहा। यह दो भाई थे जो सल्तनत में अहम रोल अदा कर रहे थे। मुगलिया तारीख में उन्हें किंग मेकर भी कहा जाता है। इन्हीं की कोशिशों से फर्रुख सीर को हुकूमत मिली। इसीलिए वो उनके एहसान

17:29

Speaker A

तले दबा हुआ था। सैयद बिरादरान को भी अंदाजा था कि फर्रुख सीर उनके बगैर कुछ नहीं। वो भाई इतने ताकतवर थे कि जब फर्रुख सीर ने उनसे छुटकारा पाने की कोशिश की तो उन्होंने उसे कत्ल करवा दिया। उसकी जगह

17:42

Speaker A

उसके 19 साला कज़ रफी दराजात को तख्त पर बिठा दिया। लेकिन तीन माह बाद ही उसका इंतकाल हो गया। इसके बाद उसके भाई रफीउद्दौला को हुकूमत दी गई। वो पहले ही बीमार था। चंद माह बाद उसकी भी मौत हो गई।

17:59

Speaker A

सैयद बरादरान ने अब औरंगजेब के पोते मोहम्मद शाह रंगीला को तख्त पर बिठाया। वो 1719 में बादशाह बना। एक दरबारी कुली खान ने अपनी किताब मुरक्का-ए देहली में लिखा कि वो बादशाह ऐशो हिजरत की जिंदगी गुजारता। जब उख्ता जाता तो सीधा दरगाहों

18:15

Speaker A

का रुख करता। वहां से दिल भर जाता तो फिर से रंगेनियों भरी जिंदगी में लौट जाता। एक दिन अपने पसंदीदा घोड़े को वजीर बना दिया। घोड़े को बाकायदा शाही लिबास पहनाकर दरबार में लाया जाता। वह दूसरे वजीरों के साथ

18:27

Speaker A

खड़ा होता और उसे पूरे प्रोटोकॉल से नवाजा जाता। रंगीले बादशाह के दिन रात का आलम यह था कि सुबह के वक्त महल की खिड़की में बैठकर बटेरों, कुत्तों या हाथियों की लड़ाई से दिल बहलाता। दोपहर के खाने के

18:41

Speaker A

बाद मस्करों और बाजीगरों के तमाशे देखता। शाम में नाच गाने की महफिलों का लुत्फ उठाता। और हां, वो औरतों के कपड़े पहनने का शौकीन था। भड़कीले रंगों वाले लिबास पहनकर वह दरबार में भी आता और हुकुम देता कि सब दरबारी लेडीज ड्रेस में आए। सब

18:57

Speaker A

हुकुम की पाबंदी करती क्योंकि इंकार का मतलब था कि सर काट दिया जाता। इसी दौरान यह अफवाह भी फैल गई कि बादशाह नामर्द है। इस तासुर को दूर करने के लिए उसने एक पेंटिंग बनवाई जिसमें इसे एक कनीज के साथ

19:09

Speaker A

इंतहाई काबिले एतराज हालत में दिखाया गया। पेंटिंग का मकसद यह बताना था कि वह नामर्द नहीं है। इस पेंटिंग को कुछ लोग मुगल पोर्न आर्ट भी कहते हैं। रंगीला की रियासत का दस्तूर था कि वहां की हर खूबसूरत औरत

19:22

Speaker A

शहंशाह की मिल्कियत और अमानत है। जिसने भी इसमें खयानत की उसकी गर्दन उड़ा दी जाएगी। अब आप खुद सोचें कि जब मुगल सल्तनत का बादशाह इस हद तक गिर जाए, तो फिर उसकी हुकूमत का लेवल क्या होगा? यही वजह है कि

19:35

Speaker A

अवध, बंगाल और दक्कन जैसे मालदार सूबों के नवाबों ने खुद को अपने-अपने इलाके का बादशाह डिक्लेअर कर दिया। जुलूब में मराठे सर उठाने लगे। सल्तनत तैमूरिया डामाडोल होने लगी। ऐसे में ईरान से नादिर शाह आया और उसने रही सही कसर पूरी कर दी। कहा जाता

19:50

Speaker A

है कि मोहम्मद शाह को जब भी बताया जाता कि नादिर शाह की फौजें आगे बढ़ रही हैं तो वो कहता हुनूस दिल्ली दूरस्त यानी अभी दिल्ली दूर है। फिक्र की कोई बात नहीं। जब नादिर शाह दिल्ली से 100 मील दूर पहुंच गया तब

20:04

Speaker A

मजबूरन मुगल बादशाह को फौज तैयार करना पड़ी। तादाद तो लाखों में थी मगर उनमें बवर्ची, माशकी, कुली, खिदमतगार, खजांची और सिविलियंस ज्यादा थे। फौज की तादाद बम मुश्किल 1 लाख के लगभग थी। नादिर शाह के पास सिर्फ 55,000 फौजी थे। लेकिन वो

20:19

Speaker A

प्रोफेशनल आर्मी थी। 3 घंटे में ही नादिर शाह को फतह मिल गई। वो फाते बनकर दिल्ली में दाखिल हुआ और मोहम्मद शाह रंगीला को कैदी बना लिया। [संगीत] 56 दिन दिल्ली पर काबिज रहा। मकसद यहां हुकूमत करना नहीं खजाना लूटना था। शहर के

20:37

Speaker A

बड़े-बड़े अमीरों और रईसों की जेबें भी खाली कर गया। जाते-जाते वो तख्त ताऊस भी ले गया जो शाहजहां ने अपनी शानो शौकत दिखाने के लिए तैयार करवाया था। कोहिनूर हीरा भी इसी तख्त में जड़ा हुआ था। नादिर शाह के जाने के बाद भी मोहम्मद शाह रंगीला

20:51

Speaker A

को होश ना आया। ऐशो-इए-उइशरत की जिंदगी दोबारा शुरू कर दी। लेकिन खजाना खाली था। इसीलिए अब वो पहले वाली बात नहीं थी। शराबनशी और अफयूम की आदत ने मोहम्मद शाह रंगीला और उसकी सल्तनत दोनों को अंदर से खोखला कर दिया। 1748 में वो 46 साल का था

21:07

Speaker A

कि अचानक चक्कर आए और गिर पड़ा। तबीबों ने हर नुस्खा आजमाया मगर बचा ना सके। शराब से उसके गुर्दे और जिगर नकारा हो चुके थे। रात भर बेहोश रहने के बाद अगली सुबह वो चल बसा। मोहम्मद शाह रंगीला के मरते ही उसका 22

21:27

Speaker A

साला बेटा अहमद शाह बहादुर तख्त पर बिठा दिया गया। मगर यह लड़का बादशाहत के नाम पर एक मजाक था। कमजोर, नासमझ और फैसले की ताकत से खाली। उसकी मां उधम बाई जो खुद एक नाचने वाली रह चुकी थी। बेटे की नालायकी

21:40

Speaker A

को खूब जानती थी। उसने हुकूमत की बागडोर अहमद शाह के हाथ से लेकर महल के एक ख्वाजा सरा जावेद खान को दे दी। हुकुम उधम बाई का होता और अमल जावेद खान का आता। जावेद खान इतना बासर हो गया कि हरम में रातें

21:53

Speaker A

गुजारने लगा जो मुगल तारीख में पहले कभी नहीं हुआ था। उधर अहमद शाह बहादुर ने सल्तनत से मुंह मोड़ लिया। उसकी दुनिया अब सिर्फ शराब, भंग, चर्स और औरतों तक सिमट चुकी थी। जावेद खान ने उस कमजोरी को खूब

22:07

Speaker A

इस्तेमाल किया। वो बादशाह को नशे में रखता, हरम को औरतों से भरता और दरबार में अपने मुखालिफिन को एक-एक करके दूर करता गया। जागीर या ओदा देना हो या वापस लेना, खजाना संभालना हो या टैक्स वसूल करना सब

22:21

Speaker A

कुछ जावेद खान के हाथ में था। खजाना खाली होने लगा। यहां तक कि दरबानों की तनख्वाहें भी रुक गई। महल का कीमती सामान बेचकर खर्चा पूरा किया जाने लगा। मगर बादशाह की अय्याशी कम ना हुई। हद तो तब हो

22:34

Speaker A

गई जब अहमद शाह ने अपने तीन साला बेटे को पंजाब का गवर्नर और एक साला बच्चे को नायब बना दिया। सल्तनत तकरीबन बिखर चुकी थी। आखिरकार वजीर इमादुल मलिक ने अहमद शाह बहादुर को तख्त से उतार दिया। नए बादशाह

22:47

Speaker A

के हुकुम पर अहमद शाह और उसकी मां उधम बाई दोनों की आंखें निकाल ली गई। अहमद शाह बहादुर बाकी जिंदगी कैद में गुजार कर 49 बरस की उम्र में मर गया। जहांगीर शाह के बेटे अजीजुद्दीन ने तख्त पर बैठते ही अपने लिए आलमगीर सानी का लकब

23:06

Speaker A

चुन लिया। ऐलान किया कि वह औरंगजेब की तरह दीनदार बादशाह होगा। मगर हकीकत यह थी कि उसकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा कैदखाने में गुजरा था। 55 बरस की उम्र में वो जब बादशाह बना तो हुकूमत चलाने का इसे कोई

23:18

Speaker A

तजुर्बा नहीं था। बादशाह तो वो था मगर असल ताकत वजीर इमादुल मलिक के हाथ में थी। सल्तनत पहले ही कमजोर हो चुकी थी। इसी कमजोरी को देखकर अफगानिस्तान से अहमद शाह अब्दाली बार-बार हिंदुस्तान पर हमले करता लूटता और वापस चला जाता। कोई रोकने वाला

23:34

Speaker A

नहीं था। कुछ ही अरसे में बादशाह और वज़र के ताल्लुकात बिगड़ गए। अंजाम यह हुआ कि इमादुल मलिक ने आलमगीर सानी को कत्ल करवा दिया और एक शहजादे को तख्त पर बिठा दिया। मगर असल वारिस आलमगीर सानी का बेटा आली

23:47

Speaker A

गौहर था। इसने 1 साल के अंदर ताकत जमा की। दिल्ली पर चढ़ाई की, हरीफ को हटाया और खुद बादशाह बन बैठा। उसने अपने लिए नाम चुना शाह आलम सानी। शाह आलम सानी को ऐसी सल्तनत मिली जिसमें ना खजाना था ना फौज। एक तरफ

24:00

Speaker A

मराठे ताकतवर हो रहे थे। दूसरी तरफ ईस्ट इंडिया कंपनी जड़े मजबूत कर रही थी। बादशाह खुद आरामपसंद, खुशामत का आदी और ऐशो-ोइशरत में डूबा हुआ था। हुकूमत नाम की रह गई थी। असल इख्तियार दूसरों के हाथ में था। यहां तक नौबत आ गई कि 1787 में सिर्फ

24:16

Speaker A

2000 सिपाहियों के साथ गुलाम कादिर रोहिला नामी सरदार लाल किले में घुसाया। खजाने का पूछा, बादशाह ने इंकार किया। तो इसने गुस्से में शाह आलम सानी की आंखें निकाल ली और इसे कैद कर डाला। कुछ अरसे बाद मराठों ने गुलाम कादिर रोहिला को मार

24:32

Speaker A

दिया। और अंधे बादशाह को फिर तख्त पर बिठा दिया। आंखों के बगैर भी शाह आलमसानी हुकूमत करता रहा। मगर अब अकल भी साथ नहीं दे रही थी। दरबारियों ने इसे यकीन दिलाया कि वो पलक झपकते ही मक्का मदीना पहुंच

24:45

Speaker A

सकता है। बादशाह वाकई यह मान बैठा। पीरी मुरीदी शुरू हुई। वजीफे बटने लगे और खजाना मजीद खाली होता चला गया। 1806 में उसका अंजाम भी आ गया। उसके बाद उसका बेटा अकबर शाह सानी तख्त पर बैठा। मुगल सल्तनत

24:59

Speaker A

सिमटकर सिर्फ दिल्ली और लाल किले तक रह गई थी। बादशाह नाम का था। असल इख्तियार अंग्रेजों के पास था। अकबर शाहानी अंग्रेजों के वजी पर पलता रहा। शायरी, शतरंज और मौसी में वक्त गुजारता रहा। और 31 बरस तक इसी हालत में तख्त पर बैठा रहा।

25:16

Speaker A

1837 में वो भी दुनिया से रुखसत हो गया। [संगीत] अकबर शाह सानी के बाद अंग्रेजों ने मुगल खानदान के सबसे कमजोर और ऐश पसंद फर्द को तख्त पर बिठाया। उसका नाम था मोहम्मद सिराजुद्दीन। उमर 62 बरस बादशाह बना तो

25:35

Speaker A

उसने खुद को बहादुर शाह कहलाना शुरू किया। शायरी का शौक था। इसीलिए तखल्लुस रखा जफर। तख्त पर बैठते वक्त उसकी सिर्फ एक बीवी थी। मगर बादशाह बनते ही अय्याशियों का दरवाजा खुल गया। 65 साल की उम्र में उसने

25:49

Speaker A

19 साला लड़की से शादी की और इसे जीनत महल का खिताब दिया। वो आखिर तक उसकी पसंदीदा रही। 71 बरस की उम्र में एक और शादी की। फिर 72 साल में एक गाने वाले की आवाज सुनकर उससे भी शादी कर ली। उसके बाद भी

26:02

Speaker A

शादियां हुई। हरम भरता चला गया और महल साजिशों का अड्डा बन गया। यह सब उस वक्त हो रहा था जब मुगल सल्तनत सिमट कर सिर्फ लाल किले तक रह गई थी। बादशाह नाम का था। गुजारा अंग्रेजों के वजीफे पर था। मगर

26:15

Speaker A

अय्याशी का आलम यह था रात भर या तो मुशायरे होते या नाच गाने की महफिलें। फजर के वक्त दरबार सोता था और उसी वक्त अंग्रेजों के फौजी मैदान में परेड कर रहे होते थे। जिस दौर में सल्तनत को किसी

26:26

Speaker A

अकलमंदी और कायदे से चलाने की जरूरत थी, इसी दौर में बादशाह शायरी और मौसी में डूबा हुआ था। वो अपनी बेबसी को शायरी में बयान करता था। मगर बदलने की हिम्मत किसी में नहीं थी। 1857 की जंगे आजादी में उसे

26:39

Speaker A

सिर्फ नाम का रहनुमा बनाया गया। ना वो फौज संभाल सका ना जंग। दिल्ली का मुहाजरा हुआ तो इसे जान बचाकर फरार होना पड़ा। हुमायूं के मकबरे में छुपा। जान बखशने के वादे पर अपने बेटों समेत गिरफ्तारी दी। अंग्रेजों

26:52

Speaker A

ने उसकी जान तो बखश दी मगर उसके दोनों बेटों मिर्जा मुगल, मिर्जा खिस और पोते मिर्जा अबू बकर को कत्ल कर दिया। उनकी लाशें पुराने किले के काबिली दरवाजे पर लटकाई गई। यह दरवाजा अब खूनी दरवाजा कहलाता है। बाद में उनके सर काटकर थाल में

27:08

Speaker A

रखकर आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को पेश किए गए। बहादुर शाह जफर को एक और शहजादे जमा बख्त के साथ रंगून जिला वतन कर दिया गया। यूं 300 साला मुगल सल्तनत अपने आखिरी बादशाह के साथ हमेशा के लिए खत्म हो

27:22

Speaker A

गई और हिंदुस्तान पर अंग्रेजों का मुकम्मल कब्जा हो गया। मुगलों की सल्तनत का खात्मा यह पैगाम दे गया कि जिस देश के हुक्मरान अय्याशी में मस्त हो जाए वहां के लोग विदेशी लोगों के गुलाम बन जाते हैं। आपकी

27:34

Speaker A

इस बारे में क्या राय है? हमें कमेंट्स करके जरूर बताइए।

Topics: मुगल साम्राज्य बाबर हुमायूं अकबर जहांगीर शाहजहां ताजमहल शराब नशा इतिहास


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