**किसी को अपनी कमी महसूस कैसे कराएं | भूलना क्यों मुश्किल? | OSHO HINDI SPEECH — Transcript & Summary | SozAI**
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इस वीडियो में बताया गया है कि किसी को अपनी कमी महसूस कराना कैसे संभव है और क्यों कुछ लोग वर्षों बाद भी याद रहते हैं।

## Key Takeaways

- कमी महसूस होना केवल दूरी या उपेक्षा से नहीं, बल्कि गहरे अनुभव से होता है।
- असली उपस्थिति वही है जो जीवन में स्थायी प्रभाव छोड़ती है।
- दूरी तभी अर्थपूर्ण होती है जब वह आत्मसम्मान से प्रेरित हो।
- ईर्ष्या से उत्पन्न वापसी स्थायी नहीं होती, सम्मान और प्रेम से ही संबंध टिकते हैं।
- अपने जीवन और आत्मसम्मान की ओर लौटना ही किसी की कमी महसूस कराना संभव बनाता है।

## What the video covers

- किसी की कमी महसूस होना तब होता है जब उसकी उपस्थिति जीवन में गहरा प्रभाव छोड़ती है, न कि केवल आदत या उपलब्धता से।
- अभिनय या मनोवैज्ञानिक चाल से कमी महसूस कराना अस्थायी होता है, वास्तविक कमी जीवन की गुणवत्ता से उत्पन्न होती है।
- सच्ची दूरी आत्मसम्मान से होती है, न कि किसी को तड़पाने या नियंत्रण के डर से।
- अधिक प्रेम देने और हर समय उपलब्ध रहने से व्यक्ति की उपस्थिति सामान्य लगने लगती है, जिससे उसकी कमी महसूस नहीं होती।
- ईर्ष्या से वापसी स्थायी नहीं होती, सम्मान और अनुभव से ही वास्तविक कमी महसूस होती है।
- सच्चे संबंध वे होते हैं जहाँ व्यक्ति अपने असली रूप में स्वीकार किया जाता है और बिना भय के अपने मन की बात कर सकता है।
- जब व्यक्ति अपने जीवन की ओर लौटता है और आत्मसम्मान बनाता है, तभी उसकी उपस्थिति का मूल्य समझा जाता है।
- किसी की कमी महसूस होना एक अनुभव है, जो केवल दूरी या उपेक्षा से नहीं बल्कि गहरे संबंध से उत्पन्न होता है।
- मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी उपस्थिति है, और इसे सम्मान देना आवश्यक है।
- कुछ लोग वर्षों बाद भी इसलिए याद रहते हैं क्योंकि उन्होंने जीवन में एक स्थायी, जीवित स्पर्श छोड़ा होता है।

## Chapters

1. 00:00 किसी को अपनी कमी महसूस कराने की इच्छा और सामान्य प्रश्न
2. 03:07 आदत और वास्तविक कमी में अंतर
3. 06:22 ईर्ष्या और सम्मान में फर्क
4. 09:34 प्रेम, त्याग और आत्मसम्मान का महत्व
5. 15:56 सच्ची दूरी और आत्मसम्मान
6. 22:46 संबंधों में संतुलन और स्थिरता
7. 29:03 स्मृति में जीवित रहने वाले संबंध
8. 32:02 असली उपस्थिति और जीवन की गुणवत्ता

Answers

## Questions about this video

किसी को अपनी कमी महसूस कराना क्यों मुश्किल होता है?

क्योंकि कमी महसूस होना केवल दूरी या उपेक्षा से नहीं होता, बल्कि उस व्यक्ति की उपस्थिति के गहरे अनुभव से उत्पन्न होता है जो जीवन में स्थायी प्रभाव छोड़ता है।

क्या दूरी बनाना हमेशा किसी की कमी महसूस कराने का सही तरीका है?

नहीं, दूरी तभी अर्थपूर्ण होती है जब वह आत्मसम्मान से प्रेरित हो, न कि किसी को तड़पाने या नियंत्रण के डर से। अभिनय से बनी दूरी अस्थायी होती है।

ईर्ष्या से किसी की कमी महसूस कराना क्यों स्थायी नहीं होता?

क्योंकि ईर्ष्या से उत्पन्न वापसी केवल स्वामित्व की रक्षा पर आधारित होती है, न कि उस व्यक्ति के मूल्य और उपस्थिति की सच्ची समझ पर।

## Full Transcript — Download SRT & Markdown

00:00

Speaker A

तुम्हारे भीतर कभी यह इच्छा अवश्य उठी होगी कि जिसे तुमने पूरे मन से चाहा, जिसने कभी तुम्हारी उपस्थिति को सामान्य समझ लिया, जिसे यह लगने लगा कि तुम तो हमेशा उसके जीवन में रहोगे, वह एक दिन रुक कर तुम्हें याद करें। तुम्हारी अनुपस्थिति को महसूस करें और उसके भीतर यह प्रश्न उठे कि मेरे जीवन में जो व्यक्ति चुपचाप साथ था, उसकी कीमत मैंने समय रहते क्यों नहीं समझी। इसी इच्छा से एक बहुत सामान्य प्रश्न जन्म लेता है। किसी को अपनी कमी कैसे महसूस कराई जाए? अधिकांश लोग इस

00:17

Speaker A

प्रश्न का उत्तर किसी चाल, किसी मनोवैज्ञानिक खेल, किसी दूरी, किसी उपेक्षा या किसी ऐसी युक्ति में खोजते हैं जिससे सामने वाला बेचैन हो जाए। कोई कहता है संदेश भेजना बंद कर दो। कोई कहता है उसे जलाओ। कोई सलाह देता है कि अचानक बदल

00:35

Speaker A

जाओ। कोई कहता है कि उसे भी वही दर्द दो जो उसने तुम्हें दिया। बाहर से यह उपाय कुछ समय के लिए प्रभावशाली दिखाई दे सकते हैं। लेकिन मैंने जीवन में एक बात बार-बार देखी है। जिस कमी को अभिनय से पैदा किया जाता है, वह उतनी ही जल्दी समाप्त भी हो

00:52

Speaker A

जाती है। केवल वही व्यक्ति लंबे समय तक याद रहता है जिसने किसी के जीवन में वास्तव में कोई जीवित स्पर्श छोड़ा हो। इसलिए यदि इस प्रश्न को केवल किसी को तड़पाने की युक्ति बनाकर समझा जाएगा तो उत्तर बहुत छोटा रह जाएगा। लेकिन यदि इसे

01:09

Speaker A

मनुष्य के हृदय की गहराई से देखा जाए तब यह प्रश्न बदल जाता है। तब प्रश्न यह नहीं रहता कि मैं किसी को अपनी कमी कैसे महसूस कराऊं? तब प्रश्न यह बन जाता है कि किसी मनुष्य की उपस्थिति इतनी अर्थपूर्ण कैसे हो जाती है कि उसकी अनुपस्थिति अपने आप

01:24

Speaker A

महसूस होने लगे। मनुष्य किसी वस्तु की कमी तब नहीं महसूस करता जब वो केवल उसके पास थी। वह उसकी कमी तब महसूस करता है जब उस वस्तु या उस व्यक्ति ने उसके जीवन में कोई ऐसी जगह छू ली हो जिसे कोई दूसरा सहजता से नहीं भर सकता। यही कारण है कि संसार में

01:43

Speaker A

हजारों लोग प्रतिदिन मिलते हैं, बातचीत करते हैं, साथ काम करते हैं, मुस्कुराते हैं। फिर भी कुछ ही लोग वर्षों बाद भी स्मृति में जीवित रहते हैं। कारण यह नहीं कि वे सबसे सुंदर थे, सबसे बुद्धिमान थे या सबसे अधिक सफल थे। कारण यह है कि उनके

02:02

Speaker A

साथ होने पर मनुष्य स्वयं को किसी अलग रूप में अनुभव करता था। किसी के साथ बैठकर पहली बार उसने बिना भय के अपने मन की बात कही। किसी के सामने पहली बार उसने रोने में शर्म महसूस नहीं की। किसी ने उसकी सफलता से अधिक उसके संघर्ष को देखा। किसी

02:19

Speaker A

ने उसके शब्दों से अधिक उसकी चुप्पी को सुना। ऐसे लोग केवल जीवन का हिस्सा नहीं बनते। वे भीतर की किसी शांत जगह से जुड़ जाते हैं। जब वे दूर जाते हैं तब खालीपन इसलिए नहीं बनता कि व्यक्ति चला गया। बल्कि इसलिए कि उसके साथ जुड़ा हुआ हमारा

02:35

Speaker A

एक अनुभव भी चला गया। यही मनुष्य एक बहुत बड़ी भूल करता है। उसे लगता है कि यदि मैं स्वयं को दुर्लभ बना दूं, उत्तर देना बंद कर दूं, सामने वाले को प्रतीक्षा कराऊं तो वह मेरी कमी महसूस करेगा। कुछ परिस्थितियों में ऐसा हो सकता है कि सामने

02:51

Speaker A

वाला बेचैन हो जाए। लेकिन बेचैनी और कमी एक ही बात नहीं। कोई व्यक्ति इसलिए भी तुम्हें खोज सकता है क्योंकि उसकी आदत टूट गई। वह इसलिए भी संदेश भेज सकता है क्योंकि उसका अहंकार स्वीकार नहीं कर पा रहा कि तुमने दूरी बना ली। वह इसलिए भी

03:07

Speaker A

लौट सकता है क्योंकि उसे नियंत्रण खोने का डर है। इन सब का अर्थ यह नहीं कि उसने तुम्हारे मूल्य को समझ लिया। आदत टूटने से जो बेचैनी पैदा होती है, वह कुछ समय बाद समाप्त हो जाती है। लेकिन किसी जीवित उपस्थिति की कमी बहुत लंबे समय तक रहती

03:24

Speaker A

है। क्योंकि वह आदत नहीं अनुभव थी। मैंने अनेक संबंधों में देखा है कि लोग प्रेम कम और उपलब्धता अधिक देते हैं। वे हर समय उपस्थित रहते हैं। हर समस्या का समाधान बन जाते हैं। हर क्षण दूसरे की सुविधा के अनुसार स्वयं को ढाल लेते हैं। धीरे-धीरे

03:40

Speaker A

उनका अपना कोई केंद्र नहीं बचता। सामने वाला उनसे प्रेम करता है या नहीं यह अलग बात है। लेकिन वह उनकी उपस्थिति का अभ्यस्त हो जाता है। जैसे घर की दीवार, जैसे रोज का सूर्योदय, जैसे नल से आने वाला पानी। जब कोई चीज बिना रुके मिलती रहती

03:58

Speaker A

है, मन उसे विशेष नहीं मानता। यह मनुष्य की कमजोरी नहीं, उसका स्वभाव है। इसलिए कुछ लोग सोचते हैं कि दूरी ही समाधान है। लेकिन दूरी तभी अर्थपूर्ण होती है जब उसके पीछे आत्मसम्मान हो, अभिनय नहीं। यदि तुम केवल इसलिए दूर हो रहे हो कि सामने वाला

04:19

Speaker A

घबरा जाए तो तुम्हारा मन उसी की प्रतिक्रिया पर निर्भर रहेगा। तुम बाहर से चुप रहोगे। भीतर हर क्षण यही देखोगे कि उसने संदेश भेजा या नहीं। यह दूरी नहीं। एक और प्रकार की निर्भरता है। सच्ची दूरी तब जन्मती है जब मनुष्य पहली बार अपने

04:37

Speaker A

जीवन की ओर लौटता है। वो दूसरे को सजा देने के लिए नहीं स्वयं को वापस पाने के लिए पीछे हटता है। उसने वर्षों तक अपना समय, अपनी ऊर्जा, अपनी भावनाएं केवल एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द बांध दी थी। अब वह फिर से अपने भीतर लौटना शुरू करता है। वो

04:56

Speaker A

अपने अधूरे सपनों को देखता है। अपने काम में अर्थ खोजता है। अपने शरीर का ध्यान रखता है। पुराने मित्रों से मिलता है। प्रकृति के साथ समय बिताता है। मौन में बैठता है। धीरे-धीरे उसके भीतर ऐसी शांति जन्म लेने लगती है जो किसी दूसरे की

05:15

Speaker A

प्रतिक्रिया पर आधारित नहीं। यही वो क्षण है जहां एक अद्भुत परिवर्तन होता है। अब यदि सामने वाला उसकी अनुपस्थिति महसूस करता है तो वह इसलिए नहीं कि उसे तड़पाने का खेल खेला गया बल्कि इसलिए कि जिस व्यक्ति को वह हमेशा उपलब्ध मानता था वो

05:31

Speaker A

अब अपने जीवन में उपस्थित हो गया है। मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी उपस्थिति है। और सबसे बड़ी भूल यह है कि वह स्वयं अपनी उपस्थिति का सम्मान करना छोड़ देता है। जो व्यक्ति स्वयं को लगातार छोटा करता है, अपनी सीमाएं मिटा देता है, हर अपमान

05:48

Speaker A

सहकर भी केवल इसलिए संबंध में बना रहता है कि कहीं दूसरा चला ना जाए। उसकी उपस्थिति धीरे-धीरे हल्की पड़ने लगती है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रेम में त्याग नहीं होना चाहिए। त्याग सुंदर है। लेकिन जहां त्याग के साथ आत्मसम्मान समाप्त हो जाए, वहां

06:05

Speaker A

संबंध धीरे-धीरे असंतुलित हो जाता है। सामने वाला तुम्हें बुरा व्यक्ति समझकर नहीं बल्कि स्वाभाविक रूप से सामान्य मानने लगता है क्योंकि तुमने स्वयं अपने जीवन का केंद्र छोड़ दिया। यहीं एक और गहरा भ्रम टूटता है। लोग सोचते हैं कि किसी को अपनी कमी महसूस कराने का सबसे आसान तरीका ईर्ष्या जगाना है। किसी

06:22

Speaker A

और के साथ तस्वीरें डालो। किसी और से अधिक बात करो। ऐसा दिखाओ कि तुम बहुत खुश हो। इससे कभी-कभी सामने वाले का ध्यान अवश्य आता है। लेकिन ध्यान और सम्मान में बहुत अंतर है। ईर्ष्या से जन्मी वापसी स्थाई नहीं होती। जो व्यक्ति केवल इसलिए लौटे कि

06:44

Speaker A

कहीं कोई और तुम्हें ना पाले, वो अभी भी तुम्हारे मूल्य से अधिक अपने स्वामित्व की रक्षा कर रहा है। वास्तविक कमी तब महसूस होती है जब मनुष्य शांत होकर यह स्वीकार करता है कि तुम्हारे होने से मेरे जीवन में कुछ ऐसा था जो अब नहीं है। यह स्वीकार

07:02

Speaker A

ईर्ष्या से नहीं, अनुभव से जन्मता है। जीवन में कुछ लोग ऐसे मिलते हैं जिनके साथ बैठकर समय का बोझ हल्का हो जाता है। वे कोई बड़ा उपदेश नहीं देते। कोई चमत्कार नहीं करते। लेकिन उनके साथ मन स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है। वे तुम्हें बदलने

07:20

Speaker A

की जल्दी नहीं करते। तुम्हारी बात पूरी सुनते हैं। तुम्हारी सफलता पर प्रसन्न होते हैं। तुम्हारी असफलता में तुम्हें छोटा नहीं करते। ऐसे लोग अपनी उपस्थिति से किसी के भीतर एक घर बना देते हैं। जब वे दूर होते हैं तब उनकी कमी इसलिए नहीं

07:37

Speaker A

महसूस होती कि उन्होंने दूरी बनाई। इसलिए महसूस होती है क्योंकि उनके साथ जो अपनापन था उसका स्थान कोई दूसरा तुरंत नहीं ले पाता। यह कमी किसी रणनीति से नहीं जीवन की गुणवत्ता से पैदा होती है। और शायद यही इस पूरे विषय का पहला और सबसे महत्वपूर्ण

07:53

Speaker A

द्वार खुलता है। यदि तुम्हारा पूरा ध्यान इस बात पर है कि सामने वाला तुम्हें याद करें, तुम्हारे बिना बेचैन हो, तुम्हारी कीमत समझे तो अभी भी तुम्हारे जीवन का केंद्र वही व्यक्ति है। तुम अपनी कमी महसूस कराने की कोशिश नहीं कर रहे। तुम अब

08:12

Speaker A

भी उसकी स्वीकृति मांग रहे हो। लेकिन जिस दिन तुम अपने भीतर लौटना शुरू कर देते हो, अपने जीवन को फिर से अर्थ देना शुरू कर देते हो, अपनी उपस्थिति का सम्मान करने लगते हो, उसी दिन एक अदृश्य परिवर्तन होता है। अब तुम्हारा मूल्य किसी की

08:29

Speaker A

प्रतिक्रिया से तय नहीं होता। और यही वह क्षण है जहां अक्सर वही लोग जिन्होंने तुम्हें सामान्य मान लिया था, पहली बार रुक कर तुम्हारी अनुपस्थिति को महसूस करने लगते हैं क्योंकि उन्हें धीरे-धीरे समझ में आता है कि वे केवल एक व्यक्ति से नहीं

08:45

Speaker A

उस शांति, उस स्नेह, उस सहारे और उस जीवित उपस्थिति से दूर हो गए हैं जिसे उन्होंने लंबे समय तक बिना देखे अपने जीवन का हिस्सा मान लिया था। लेकिन यह समझ अभी केवल आरंभ है। इसके पीछे मनुष्य के मन की और भी गहरी परतें छिपी हैं। जहां यह

09:01

Speaker A

स्पष्ट होगा कि आखिर किसी की कमी वास्तव में कब महसूस होती है। क्यों कुछ लोग वर्षों बाद भी भुलाए नहीं जा सकते और क्यों कुछ लोग दूर चले जाने के बाद भी स्मृति में जीवित रहते हैं? और जब यह समझने की यात्रा आगे बढ़ती है कि आखिर

09:19

Speaker A

किसी की कमी वास्तव में कब महसूस होती है। क्यों कुछ लोग वर्षों बाद भी भुलाए नहीं जा सकते और क्यों कुछ लोग दूर चले जाने के बाद भी स्मृति में जीवित रहते हैं? तब मनुष्य के मन की एक अत्यंत सूक्ष्म परत सामने आती है। हम प्रायः यह मान लेते हैं

09:34

Speaker A

कि लोग उसी व्यक्ति को सबसे अधिक याद करते हैं जिसने उनसे सबस...

09:50

Speaker A

कि लोग उसी व्यक्ति को सबसे अधिक याद करते हैं जिसने उनसे सबसे अधिक प्रेम किया था। लेकिन जीवन हमेशा इतना सीधा नहीं होता। कई बार लोग उस व्यक्ति को नहीं भूल पाते जिसने उन्हें पहली बार स्वयं से मिलवाया था। कोई मनुष्य तुम्हारे जीवन में आया।

10:07

Speaker A

उसने तुम्हें बदला नहीं। तुम्हें अपने अनुसार ढालने की कोशिश नहीं की। लेकिन उसके साथ रहते हुए तुम अपने भीतर का एक ऐसा रूप जी पाए जिसे तुमने पहले कभी नहीं जाना था। उसके साथ तुम अधिक सहज थे, अधिक सच्चे थे, अधिक जीवित थे। यही कारण है कि

10:25

Speaker A

उसकी अनुपस्थिति केवल व्यक्ति की अनुपस्थिति नहीं रहती। उसके साथ जुड़ा हुआ तुम्हारा अपना एक रूप भी जैसे खो जाता है। इसलिए कमी हमेशा दूसरे की नहीं होती। कभी-कभी अपने उसी खोए हुए स्वरूप की भी होती है। यही कारण है कि किसी की कमी

10:41

Speaker A

महसूस कराने का प्रयास कभी सफल नहीं होता यदि उसमें कृत्रिमता हो। मनुष्य बाहर से जितना भी अभिनय कर ले भीतर का भाव उसके व्यवहार में उतर ही जाता है। यदि तुम दूरी इसलिए बना रहे हो कि सामने वाला बेचैन हो जाए तो तुम्हारे मौन में भी प्रतीक्षा

10:58

Speaker A

होगी। तुम हर दिन यह देखोगे कि उसने संदेश भेजा या नहीं। उसने तुम्हारी कोई बात देखी या नहीं। वह तुम्हारे बारे में पूछ रहा है या नहीं। बाहर से तुम शांत दिखाई दोगे। भीतर से तुम्हारा मन उसी व्यक्ति के चारों ओर घूमता रहेगा। ऐसी दूरी सामने वाले से

11:16

Speaker A

पहले तुम्हें थका देती है क्योंकि तुमने अपने जीवन का केंद्र नहीं बदला केवल व्यवहार बदला है। मन अब भी उसी दरवाजे पर बैठा है जहां से किसी उत्तर की प्रतीक्षा है। लेकिन जिस दिन मनुष्य सचमुच अपने भीतर लौटता है। उस दिन उसके व्यवहार में बिना

11:32

Speaker A

प्रयास के परिवर्तन दिखाई देने लगता है। पहले वह हर बात पर तुरंत उत्तर देता था। अब वह उत्तर देता है पर अपनी गति से। पहले वह हर समय उपलब्ध रहता था। अब उसके जीवन में अपने लिए भी समय है। पहले वह हर छोटी बात पर स्पष्टीकरण देता था। अब उसे हर

11:51

Speaker A

निर्णय का बचाव करने की आवश्यकता नहीं लगती। पहले वो केवल दूसरे के मन का ध्यान रखता था। अब अपने मन की थकान भी सुनता है। यह परिवर्तन किसी तकनीक का परिणाम नहीं, आत्मसम्मान का परिणाम है। और यही परिवर्तन सबसे गहरा प्रभाव छोड़ता है। क्योंकि

12:10

Speaker A

मनुष्य केवल शब्द नहीं पढ़ता। वह ऊर्जा भी अनुभव करता है। उसे धीरे-धीरे महसूस होने लगता है कि सामने वाला अब पहले जैसा नहीं रहा। उसमें एक स्थिरता आ गई है। एक शांत गरिमा आ गई है जो पहले नहीं थी। बहुत बार लोग प्रेम के नाम पर अपनी पूरी पहचान

12:27

Speaker A

दूसरे व्यक्ति में विलीन कर देते हैं। उन्हें यह भ्रम हो जाता है कि जितना अधिक मैं स्वयं को भूल जाऊंगा, उतना अधिक सामने वाला मुझे प्रेम करेगा। लेकिन जीवन बार-बार एक अलग सत्य दिखाता है। जिस व्यक्ति का अपना कोई केंद्र नहीं रहता,

12:43

Speaker A

उसका सम्मान धीरे-धीरे कम होने लगता है। प्रेम और दया में बहुत सूक्ष्म अंतर है। यदि कोई व्यक्ति लगातार अपनी आवश्यकताओं को दबाता रहे, अपनी सीमाओं को मिटाता रहे, हर अपमान के बाद भी केवल इसलिए लौटता रहे कि कहीं संबंध टूट ना जाए, तो सामने वाला

13:01

Speaker A

कभी-कभी उसे प्रेम से अधिक दया की दृष्टि से देखने लगता है। दया में अपनापन हो सकता है, लेकिन आकर्षण नहीं। सम्मान के बिना प्रेम धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है। मनुष्य की स्मृति भी बहुत विचित्र है। वो हर घटना को समान रूप से नहीं रखती। जिन

13:19

Speaker A

क्षणों में भावनाएं गहरी होती हैं, वे भीतर अधिक गहराई से अंकित हो जाते हैं। यदि तुम्हारी उपस्थिति ने किसी के जीवन में सुरक्षा दी, कठिन समय में सहारा दिया, उसकी टूटन को बिना निर्णय के सुना, उसके आत्मविश्वास को लौटाया, तो तुम्हारा स्थान

13:36

Speaker A

केवल एक परिचित व्यक्ति का नहीं रहेगा। ऐसे अनुभव स्मृति में लंबे समय तक जीवित रहते हैं। लेकिन यदि तुम्हारा पूरा संबंध केवल उपलब्ध रहने, मनाने, समझाने और स्वयं को सिद्ध करने में बीता, तो तुम्हारी अनुपस्थिति पहले कुछ समय तक महसूस होगी।

13:54

Speaker A

फिर धीरे-धीरे आदत बदल जाएगी। इसलिए किसी की कमी इस बात से नहीं बनती कि तुमने उसके लिए कितना किया। बल्कि इस बात से बनती है कि तुम्हारी उपस्थिति में उसने स्वयं को कितना सच्चा अनुभव किया। यही एक और भ्रम टूटता है। लोग सोचते हैं कि यदि मैं स्वयं

14:11

Speaker A

को दुर्लभ बना लूंगा तो मेरा मूल्य बढ़ जाएगा। कुछ सीमा तक यह सामाजिक व्यवहार में दिखाई दे सकता है। लेकिन गहरे संबंधों में दुर्लभता नहीं वास्तविकता काम करती है। यदि कोई व्यक्ति केवल इसलिए कम उपलब्ध हो गया क्योंकि उसे सिखाया गया कि ऐसा

14:28

Speaker A

करने से लोग पीछे भागते हैं तो उसके भीतर निरंतर गणना चलती रहेगी। उसने कब संदेश भेजा? मैंने कब उत्तर दिया? अब कितनी देर रुकना चाहिए, कितना मौन रखना चाहिए। यह संबंध नहीं, रणनीति है। रणनीति से ध्यान मिल सकता है। विश्वास नहीं। विश्वास वहां

14:47

Speaker A

जन्मता है जहां मनुष्य अभिनय छोड़ देता है। मैंने ऐसे लोगों को भी देखा है जो किसी को खोने के बाद अचानक स्वयं को बदल लेते हैं। वे पहले अपने स्वास्थ्य की परवाह नहीं करते थे। अब करते हैं। पहले अपने काम में अर्थ नहीं खोजते थे। अब पूरी

15:03

Speaker A

लगन से जीते हैं। पहले हर समय शिकायत करते थे। अब जीवन को स्वीकार करना सीखते हैं। बाहर से देखने वाले सोचते हैं कि यह सब उन्होंने सामने वाले को अपनी कमी महसूस कराने के लिए किया। लेकिन भीतर की सच्चाई अलग होती है। वे पहली बार अपने जीवन की

15:20

Speaker A

जिम्मेदारी लेने लगे और यही परिवर्तन कभी-कभी उस व्यक्ति तक भी पहुंचता है जो उनसे दूर जा चुका होता है। उसे महसूस होता है कि जिसे मैं हमेशा टूटा हुआ समझता था वह अब भीतर से मजबूत हो गया है। यह मजबूती दिखाने की चीज नहीं जीने की चीज है। यह भी

15:39

Speaker A

समझना आवश्यक है कि हर व्यक्ति तुम्हारी कमी महसूस करेगा ही ऐसा कोई नियम नहीं। कुछ लोग इतने अपने अहंकार में जीते हैं कि वे अपनी गलती स्वीकार नहीं कर पाते। कुछ लोग अपनी भावनाओं से ही कटे हुए होते हैं। कुछ लोग नया संबंध बना लेते हैं और अपने

15:56

Speaker A

भीतर उठती हर स्मृति को दबा देते हैं। यदि तुम्हारा पूरा जीवन इस आशा पर टिका है कि एक दिन वह अवश्य लौटेगा। अवश्य पछताएगा। अवश्य मेरी कीमत समझेगा तो तुमने फिर अपने सुख की चाबी किसी और के हाथ में दे दी। आत्मसम्मान का अर्थ यह नहीं कि सामने वाला

16:14

Speaker A

अवश्य बदलेगा। उसका अर्थ यह है कि चाहे वह बदले या ना बदले मैं अपने जीवन को अधूरा नहीं छोडूंगा। कभी-कभी सबसे गहरी कमी तब महसूस होती है जब बहुत देर हो चुकी होती है। मनुष्य किसी की उपस्थिति का मूल्य उसी समय नहीं समझता जब वह साथ होता है। उसे

16:33

Speaker A

लगता है यह व्यक्ति तो हमेशा रहेगा। फिर एक दिन वह सचमुच चला जाता है। उसके बाद जीवन अपनी गति से चलता रहता है। लेकिन कुछ छोटे-छोटे क्षण अचानक उसकी याद ले आते हैं। कोई गीत, कोई सड़क, कोई मौसम, कोई आदत, कोई वाक्य, कोई ऐसी स्थिति जहां पहले

16:53

Speaker A

वह व्यक्ति साथ होता था। तब मनुष्य को पहली बार समझ में आता है कि किसी ने मेरे जीवन में कितनी शांति जोड़ रखी थी। यह स्मृति किसी योजना से पैदा नहीं होती। यह जीवन के अनुभवों से स्वयं उठती है। मैंने यह भी देखा है कि जिन लोगों ने संबंध में

17:10

Speaker A

स्वयं को पूरी तरह खो दिया था, वे जब अपने भीतर लौटते हैं तो उनके चेहरे पर एक अलग प्रकार की शांति आ जाती है। अब उन्हें हर समय यह सिद्ध नहीं करना कि मैं अच्छा हूं। मैं योग्य हूं। मुझे मत छोड़ो। वे अपने भीतर टिकना सीखने लगते हैं। यही शांति

17:27

Speaker A

उन्हें पहले से अधिक आकर्षक बना देती है। क्योंकि मनुष्य केवल सुंदर चेहरे की ओर नहीं खींचता। वह उस व्यक्ति की ओर भी खींचता है जिसके भीतर स्थिरता हो। जिस व्यक्ति का सुख पूरी तरह दूसरे पर निर्भर नहीं उसके साथ रहना हल्का लगता है। उसके

17:44

Speaker A

प्रेम में पकड़ कम होती है। सम्मान अधिक। धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगता है कि किसी को अपनी कमी महसूस कराने का सबसे गहरा मार्ग कभी भी दूसरे को नियंत्रित करने से नहीं जाता। वह स्वयं को इतना सच्चा इतना जीवंत और इतना संतुलित बनाने से जाता है

18:02

Speaker A

कि तुम्हारी उपस्थिति किसी के जीवन में केवल सुविधा ना रह जाए बल्कि एक ऐसी अनुभूति बन जाए जिसे वो अपने भीतर लेकर चले। जो व्यक्ति तुम्हारे साथ रहते हुए स्वयं को बेहतर मनुष्य महसूस करता है, वह तुम्हें आसानी से नहीं भूलता। लेकिन यदि

18:18

Speaker A

तुम्हारी पूरी ऊर्जा केवल उसे बांधे रखने में लगी थी, तो उसके जाने के बाद तुम्हारे पास भी कुछ नहीं बचेगा। यहीं से इस विषय की अगली और अधिक गहरी परत खुलती है। क्योंकि किसी की कमी केवल दूरी से नहीं बनती बल्कि उस आंतरिक गुणवत्ता से बनती है

18:36

Speaker A

जिसके साथ तुम किसी के जीवन में उपस्थित होते हो। जब मनुष्य अपने भीतर स्थिर हो जाता है तब उसका प्रेम पकड़ नहीं बनता। सहारा बनता है। उसकी निकटता बोझ नहीं बनती। विश्राम बनती है। उसकी चुप्पी भय नहीं जगाती। भरोसा जगाती है और यही वह

18:56

Speaker A

बिंदु है जहां यह समझना आवश्यक हो जाता है कि प्रेम, आत्मसम्मान, मौन, स्वतंत्रता और आंतरिक पूर्णता का आपस में क्या संबंध है। क्योंकि जब तक मनुष्य स्वयं अपने भीतर पूर्ण नहीं होता तब तक वह किसी को अपनी कमी महसूस कराने की कोशिश तो

19:14

Speaker A

कर सकता है। लेकिन ऐसी उपस्थिति नहीं बन सकता जिसकी अनुपस्थिति स्वयं बोलने लगे। और जब यह समझ सामने आती है कि केवल दूरी बना लेने से कोई मनुष्य वास्तव में याद नहीं किया जाता बल्कि उसकी आंतरिक गुणवत्ता ही उसकी अनुपस्थिति को अर्थ देती

19:30

Speaker A

है। तब प्रेम का पूरा दृष्टिकोण बदलने लगता है। तब प्रश्न यह नहीं रह जाता कि मैं सामने वाले के मन में अपनी जगह कैसे बनाए रखूं। बल्कि यह हो जाता है कि मैं अपने भीतर ऐसा क्या विकसित करूं कि मेरी उपस्थिति किसी के जीवन में शांति, विश्वास

19:47

Speaker A

और सहजता का स्रोत बन जाए। क्योंकि संसार में ऐसे असंख्य लोग हैं जो हर समय उपलब्ध रहते हैं। हर समय प्रेम जताते हैं। हर समय अपना महत्व सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। फिर भी उनकी अनुपस्थिति बहुत गहराई से महसूस नहीं होती। दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे

20:05

Speaker A

होते हैं जिनकी उपस्थिति बहुत साधारण होती है। वे ऊंची बातें नहीं करते। अपने प्रेम का प्रदर्शन नहीं करते। किसी पर अधिकार नहीं जताते। लेकिन जब वे दूर हो जाते हैं तो जीवन के अनेक छोटे-छोटे क्षण उन्हें याद दिलाने लगते हैं। इसका कारण यह नहीं

20:23

Speaker A

कि उन्होंने कोई विशेष कला सीख ली थी। कारण केवल इतना है कि उन्होंने संबंध में स्वयं को खोया नहीं था। इसलिए उनकी उपस्थिति जीवित थी। मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह प्रेम को पकड़ लेने की प्रक्रिया बना देता है। उसे लगता है कि

20:40

Speaker A

यदि सामने वाला हर समय मेरे बारे में सोचता रहे। हर समय मेरी चिंता करे हर समय मेरी कमी महसूस करे तभी मेरा प्रेम सफल है। लेकिन जिस प्रेम में हर समय चिंता हो वहां स्वतंत्रता नहीं रहती। और जहां स्वतंत्रता नहीं वहां धीरे-धीरे थकान जन्म

20:58

Speaker A

लेने लगती है। कोई भी मनुष्य ऐसा संबंध लंबे समय तक सहजता से नहीं जी सकता जिसमें उसे हर क्षण यह सिद्ध करना पड़े कि वो कितना प्रेम करता है। इसलिए जो लोग बार-बार यह जानना चाहते हैं कि क्या तुम्हें मेरी याद आई? क्या तुम्हें मेरी

21:14

Speaker A

कमी महसूस हुई? क्या तुमने मुझे याद किया? वे अनजाने में अपने प्रेम को परीक्षा बना देते हैं। प्रेम परीक्षा नहीं है। प्रेम वह स्थान है जहां दोनों मनुष्य बिना भय के सांस ले सके। यही मौन का महत्व समझ में आता है। मौन का अर्थ केवल बोलना बंद कर

21:32

Speaker A

देना नहीं। बहुत लोग क्रोध में मौन हो जाते हैं। वे बात नहीं करते ताकि सामने वाला बेचैन हो। यह मौन नहीं दंड है। वास्तविक मौन वो है जहां मनुष्य स्वयं के भीतर लौटता है। वह अपनी पीड़ा को समझता है। अपनी अपेक्षाओं को देखता है। अपने डर

21:50

Speaker A

को पहचानता है। जब वह ऐसे मौन से लौटता है तो उसके शब्दों में शिकायत कम और स्पष्टता अधिक होती है। ऐसे व्यक्ति की अनुपस्थिति भी अलग प्रकार की होती है। उसमें धमकी नहीं होती। उसमें गरिमा होती है। सामने वाला उसे इसलिए याद नहीं करता कि वह गायब

22:08

Speaker A

हो गया। बल्कि इसलिए कि उसके साथ रहने का अनुभव भीतर अब भी जीवित है। मैंने अनेक बार देखा है कि संबंधों में सबसे अधिक आकर्षण उन लोगों का बना रहता है जो स्वयं के जीवन से जुड़े रहते हैं। उनका प्रेम गहरा होता है। लेकिन उनका पूरा अस्तित्व

22:26

Speaker A

केवल संबंध नहीं बन जाता। उनके अपने सपने होते हैं। अपना काम होता है। अपनी रुचियां होती हैं। अपनी आंतरिक दुनिया होती है। वे दूसरे को प्रेम करते हैं। लेकिन अपने जीवन का केंद्र खोते नहीं। यही संतुलन उन्हें भीतर से स्थिर बनाता है। जब वे किसी के

22:45

Speaker A

साथ होते हैं तो पूरी उपस्थिति के साथ होते हैं और जब अपने काम में होते हैं तो वहां भी पूरी तरह उपस्थित होते हैं। ऐसे व्यक्ति के साथ रहने पर सामने वाले को कभी यह अनुभव नहीं होता कि वह बोझ है या कैद है। इसलिए उसकी अनुपस्थिति खालीपन छोड़ती

23:02

Speaker A

है क्योंकि उसने संबंध में घुटन नहीं विस्तार दिया था। इसके विपरीत जो व्यक्ति हर समय दूसरे के चारों ओर घूमता रहता है, उसकी दुनिया का हर निर्णय उसी पर निर्भर होता है। वह धीरे-धीरे अपने ही मूल्य को कम कर देता है। सामने वाला उसे छोड़ना

23:19

Speaker A

नहीं चाहता। लेकिन उसके बिना रहना भी सीख जाता है। क्योंकि संबंध में रहकर भी उसने अपने जीवन की सारी दिशाएं बंद कर दी थी। मनुष्य उस व्यक्ति की अधिक कमी महसूस करता है जो अपने साथ जीवन लेकर आता है ना कि उस व्यक्ति की जो अपना पूरा जीवन छोड़कर केवल

23:37

Speaker A

उसके पीछे चलने लगता है। यहीं प्रेम और आवश्यकता का अंतर भी स्पष्ट होता है। आवश्यकता कहती है। मुझे तुम्हारी जरूरत है क्योंकि तुम्हारे बिना मैं अधूरा हूं। प्रेम कहता है मैं अपने भीतर पूर्ण होने की यात्रा पर हूं और उसी पूर्णता से

23:54

Speaker A

तुम्हारे साथ चलना चाहता हूं। आवश्यकता में भय अधिक होता है। वहां खोने की चिंता रहती है। वहां हर दूरी असुरक्षा बन जाती है। प्रेम में भी दर्द होता है। विरह होता है। लेकिन वहां पकड़ कम होती है। जो मनुष्य भीतर से जितना स्थिर होता जाता है,

24:12

Speaker A

उसका प्रेम उतना ही मुक्त होता जाता है। और आश्चर्य की बात यह है कि मुक्त प्रेम की कमी सबसे अधिक महसूस होती है। क्योंकि उसने कभी बंधन नहीं बनाया। इसलिए उसकी अनुपस्थिति भी बंधन नहीं। एक शांत रिक्तता छोड़ती है। बहुत लोग यह समझते हैं कि यदि

24:30

Speaker A

मैं बदल जाऊं, अधिक सफल हो जाऊं, अधिक आकर्षक दिखूं तब सामने वाला मेरी कमी महसूस करेगा। बाहरी परिवर्तन का अपना महत्व है। मनुष्य अपने शरीर, अपने काम, अपने व्यक्तित्व का ध्यान रखें यह आवश्यक है। लेकिन यदि यह सब केवल किसी को वापस

24:49

Speaker A

लाने के लिए किया जा रहा है तो भीतर की निर्भरता वहीं बनी रहती है। तुम अपने आप को नहीं बदल रहे। तुम अपनी छवि बदल रहे हो और छवि का प्रभाव सीमित होता है। वास्तविक परिवर्तन तब होता है जब मनुष्य का दृष्टिकोण बदलता है। वह स्वयं को दूसरों

25:08

Speaker A

की स्वीकृति से नहीं अपने जीवन की सच्चाई से देखने लगता है। तब उसका चेहरा भी बदलता है। उसकी आंखों की बेचैनी कम हो जाती है। उसकी बातचीत में आग्रह कम हो जाता है। लोग ऐसे परिवर्तन को बिना शब्दों के महसूस कर लेते हैं। स्मृति भी केवल घटनाओं से नहीं

25:27

Speaker A

बनती, अनुभूतियों से बनती है। यदि किसी ने तुम्हारे साथ रहते हुए स्वयं को सम्मानित महसूस किया, सुरक्षित महसूस किया, स्वीकार किया हुआ महसूस किया तो वह अनुभव उसके भीतर बहुत गहराई तक चला जाता है। समय बीतने के बाद भी जब जीवन में वैसी ही कोई

25:45

Speaker A

परिस्थिति आती है तो उसे तुम्हारी याद आ सकती है। लेकिन यदि उसने तुम्हारे साथ अधिकतर तनाव, शिकायत, अपराध बोध और दबाव ही अनुभव किया, तो तुम्हारी अनुपस्थिति पहले कुछ समय तक खलेगी। फिर वह उससे बाहर निकल आएगा। इसलिए किसी की स्मृति में

26:04

Speaker A

जीवित रहने का सबसे बड़ा मार्ग यह नहीं कि तुम कितनी बार याद दिलाते हो कि मैं हूं बल्कि यह कि तुम्हारी उपस्थिति में उसने स्वयं को कैसा महसूस किया। और यहां एक बहुत गहरी आध्यात्मिक बात समझने योग्य है। जब तक मनुष्य स्वयं अपने

26:21

Speaker A

भीतर अकेले बैठने में असमर्थ है तब तक वह हर संबंध को अपने खालीपन की दवा बना देता है। फिर वह चाहता है कि दूसरा उसे लगातार महत्व दे। उसकी कमी महसूस करें। उसे खोने से डरे। लेकिन जिस दिन वह अपने भीतर बैठना सीख लेता है। तब उसे पहली बार समझ में आता

26:40

Speaker A

है कि प्रेम किसी से भीख मांगने की वस्तु नहीं। प्रेम बांटा जा सकता है, जिया जा सकता है, लेकिन मांगा नहीं जा सकता। जो प्रेम मांगा जाता है, उसमें भय रहता है। जो प्रेम भीतर से बहता है, उसमें स्वतंत्रता रहती है। मैंने जीवन में यह भी

26:57

Speaker A

देखा है कि कुछ लोग दूर जाने के बाद इसलिए याद नहीं आते क्योंकि उन्होंने कभी स्वयं को जिया ही नहीं। वे हमेशा वही बने रहे जो सामने वाला चाहता था। उन्होंने अपनी असली हंसी छिपा दी। अपनी रुचियां छोड़ दी। अपने सपनों को टाल दिया। अपने विचार दबा दिए।

27:15

Speaker A

धीरे-धीरे उनका अपना चेहरा ही गायब हो गया। जब वे चले गए तो सामने वाले को यह भी समझ नहीं आया कि वास्तव में खोया क्या है। लेकिन जो व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप में जीता है। उसकी अपनी एक सुगंध होती है। वो किसी की नकल नहीं करता। वो प्रसन्न है

27:33

Speaker A

तो सच्चा है। दुखी है तो भी अभिनय नहीं करता। उसकी उपस्थिति अलग होती है। ऐसे लोग भुलाए नहीं जाते क्योंकि वे किसी भूमिका में नहीं अपने वास्तविक अस्तित्व में जीते हैं। धीरे-धीरे ये स्पष्ट होने लगता है कि किसी की कमी महसूस कराना कोई क्रिया नहीं।

27:52

Speaker A

एक परिणाम है। परिणाम किसका? उस जीवन का जो तुम जीते हो। उस प्रेम का जो तुम देते हो। उस सम्मान का जो तुम स्वयं को देते हो। उस शांति का जो तुम्हारे भीतर जन्म लेती है। यदि तुम्हारे भीतर लगातार भय है तो तुम्हारा संबंध भी उसी भय से रंग

28:11

Speaker A

जाएगा। यदि तुम्हारे भीतर विश्वास है तो तुम्हारी उपस्थिति भी विश्वास का अनुभव कराएगी। और विश्वास की कमी बहुत गहराई से महसूस होती है। यहीं से एक और महत्वपूर्ण सत्य सामने आता है। यदि कोई व्यक्ति तुम्हारी अनुपस्थिति महसूस ही नहीं करता

28:29

Speaker A

तब भी तुम्हारा जीवन व्यर्थ नहीं हो जाता। क्योंकि तुम्हारे मूल्य का निर्णय किसी एक मनुष्य की स्मृति से नहीं होता। यह समझ बहुत कठिन है। लेकिन यही मुक्ति का द्वार है। जब तुम अपने जीवन का सम्मान करने लगते हो तब तुम्हें किसी की याद में जीवित रहने

28:47

Speaker A

की उतनी चिंता नहीं रहती। और आश्चर्य यह है कि उसी समय तुम्हारी उपस्थिति सबसे अधिक प्रभावशाली हो जाती है। क्योंकि अब तुम किसी को प्रभावित करने के लिए नहीं जी रहे। तुम अपने सत्य में जी रहे हो। और यही वह भूमि है जहां इस विषय की अगली परत

29:03

Speaker A

खुलती है। क्योंकि जब मनुष्य अपने भीतर इतना स्थिर हो जाता है कि उसका प्रेम आग्रह नहीं उपहार बन जाता है तब उसके संबंध भी बदलने लगते हैं। तब वह किसी को खोने के भय से नहीं। उसे समझने की करुणा से जोड़ता है। तब उसकी दूरी भी क्रोध नहीं

29:21

Speaker A

होती और उसकी निकटता भी बोझ नहीं बनती। इसी अवस्था में पहली बार यह समझ संभव होती है कि वास्तविक कमी कभी बनाई नहीं जाती। वह अपने आप जन्म लेती है। जब किसी मनुष्य की उपस्थिति दूसरे के जीवन में केवल साथ नहीं बल्कि आंतरिक परिवर्तन का अनुभव बन

29:38

Speaker A

चुकी होती है। उसी परिवर्तन की अंतिम गहराई को समझे बिना इस विषय का उत्तर पूरा नहीं हो सकता। और जब यह स्पष्ट हो जाता है कि वास्तविक कमी कभी बनाई नहीं जाती बल्कि किसी मनुष्य की उपस्थिति से अपने आप जन्म लेती है तब जीवन एक और गहरी दिशा खोलता

29:57

Speaker A

है। अब प्रश्न यह नहीं रह जाता कि सामने वाला मुझे कब याद करेगा? बल्कि यह हो जाता है कि मेरी उपस्थिति का स्वभाव क्या है? क्या मैं किसी के जीवन में शांति लेकर जाता हूं या केवल अपेक्षाएं? क्या मेरे साथ होने पर सामने वाला स्वयं

30:12

Speaker A

को स्वीकार किया हुआ महसूस करता है? या हर समय किसी परीक्षा में खड़ा हुआ। क्या मेरे प्रेम में स्वतंत्रता है या लगातार भय? क्योंकि मनुष्य अंततः शब्दों को नहीं अनुभवों को याद रखता है। कोई व्यक्ति तुम्हें इसलिए नहीं भूलता कि तुमने उससे

30:28

Speaker A

हजार बार कहा था कि मैं तुमसे प्रेम करता हूं। वह इसलिए नहीं भूलता क्योंकि तुम्हारे साथ रहते हुए उसने अपने जीवन का एक दुर्लभ अनुभव किया था। उसे लगा था कि पहली बार कोई उसे बदलने की कोशिश नहीं कर रहा। पहली बार कोई उसे सुन रहा है। पहली

30:43

Speaker A

बार कोई उसकी सफलता से अधिक उसके संघर्ष को समझ रहा है। ऐसे अनुभव मनुष्य के भीतर बहुत गहरे उतरते हैं। यही कारण है कि कई बार लोग वर्षों बाद अचानक किसी पुराने व्यक्ति को याद करने लगते हैं। बाहर से देखने पर कोई कारण दिखाई नहीं देता। जीवन

31:02

Speaker A

आगे बढ़ चुका होता है। नए लोग आ चुके होते हैं। परिस्थितियां बदल चुकी होती हैं। फिर भी किसी शाम, किसी शांत क्षण, किसी पुराने गीत, किसी परिचित रास्ते या किसी ऐसी घटना के बीच जिसकी कोई विशेष योजना नहीं थी। अचानक एक चेहरा स्मृति में उभर आता है।

31:24

Speaker A

ऐसा इसलिए नहीं होता कि वह व्यक्ति जानबूझकर अपनी याद दिला रहा है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जीवन ने कोई ऐसा अनुभव दोबारा सामने रखा है जिसने भीतर सोई हुई स्मृति को जगा दिया। स्मृति कभी-कभी शब्दों से नहीं अनुभूतियों से जागती है।

31:41

Speaker A

जिस अपनापन जिस सम्मान जिस सहजता या जिस सुरक्षा का अनुभव कभी किसी के साथ हुआ था वही अनुभव किसी नई परिस्थिति में फिर छू जाता है और मन बिना बुलाए उस व्यक्ति तक पहुंच जाता है। लेकिन यदि तुम्हारा पूरा ध्यान इसी बात पर लगा रहे कि वो मुझे कब

32:00

Speaker A

याद करेगा। कब लौटेगा, कब पछताएगा तो तुम्हारा अपना जीवन वहीं रुक जाता है। बहुत से लोग वर्षों तक अपने वर्तमान को इसलिए नहीं जी पाते क्योंकि उनका मन अतीत के किसी एक व्यक्ति के निर्णय में अटका रहता है। वे बाहर से आगे बढ़ते दिखाई देते

32:17

Speaker A

हैं। लेकिन भीतर उनका समय रुक चुका होता है। वे हर नई घटना को उसी पुराने संबंध की दृष्टि से देखते हैं। यदि किसी ने उनकी प्रशंसा की तो वे सोचते हैं काश वह देखता। यदि उन्हें सफलता मिली तो मन कहता है अब उसे पता चलेगा। यदि वे दुखी हुए तो भीतर

32:35

Speaker A

से आवाज आती है। शायद अब वह लौट आए। इस प्रकार उनका वर्तमान भी उसी व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। ऐसी अवस्था में वे स्वयं को स्वतंत्र समझते हैं। जबकि उनका मन अब भी उसी पुराने बंधन में बैधा होता है। सच्चा परिवर्तन तब आता है जब

32:51

Speaker A

मनुष्य यह स्वीकार कर लेता है कि सामने वाला मुझे याद करें या ना करे। मेरा जीवन फिर भी अर्थपूर्ण हो सकता है। यह स्वीकार हार नहीं है। यह अपने जीवन की बागडोर वापस अपने हाथ में लेना है। क्योंकि जिस दिन तुम्हारा सुख किसी दूसरे के पछतावे पर

33:08

Speaker A

निर्भर हो जाता है। उसी दिन तुम्हारी स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है। तुम जी नहीं रहे होते। प्रतीक्षा कर रहे होते हो। प्रतीक्षा का भी अपना स्थान है। लेकिन यदि पूरी जीवन यात्रा प्रतीक्षा बन जाए, तो मनुष्य अपने वर्तमान का सबसे सुंदर समय खो

33:24

Speaker A

देता है। मैंने देखा है कि जो लोग अपने भीतर लौट आते हैं, वे धीरे-धीरे बदलने लगते हैं। वे अब पहले की तरह हर समय स्वयं को समझाने की कोशिश नहीं करते। उन्हें हर विवाद में जितना आवश्यक नहीं लगता। उन्हें हर व्यक्ति से स्वीकृति लेने की भूख नहीं

33:42

Speaker A

रहती। वे अपने जीवन को अधिक ध्यान से देखने लगते हैं। अपने स्वास्थ्य का सम्मान करते हैं। अपने काम में अर्थ खोजते हैं। अपने परिवार के साथ वास्तविक समय बिताते हैं। अपने भीतर उठती भावनाओं से भागते नहीं। और सबसे महत्वपूर्ण बात वे अकेले

33:58

Speaker A

होने से डरना छोड़ देते हैं। जो मनुष्य अकेले होने से नहीं डरता उसका प्रेम भी बदल जाता है। अब वो किसी को पकड़ कर नहीं रखता। वह संबंध को कैद नहीं बनाता। वह जानता है कि प्रेम का अर्थ किसी को बांध लेना नहीं बल्कि उसके साथ जागरूक होकर

34:14

Speaker A

चलना है। यही आत्मसम्मान की वास्तविक परिभाषा सामने आती है। बहुत लोग आत्मसम्मान को कठोरता समझ लेते हैं। उन्हें लगता है कि अब मैं कभी पहले संदेश नहीं भेजूंगा। कभी माफ नहीं करूंगा। कभी झुकूंगा नहीं। यह आत्मसम्मान नहीं। कई बार

34:33

Speaker A

घायल अहंकार होता है। आत्मसम्मान का अर्थ है कि मैं स्वयं का अपमान स्वीकार नहीं करूंगा लेकिन प्रेम करने से भी नहीं डरूंगा। यदि मुझे अपनी गलती दिखेगी तो मैं क्षमा भी मांगूंगा। यदि सामने वाला ईमानदारी से लौटेगा तो मैं सुनूंगा भी।

34:49

Speaker A

लेकिन मैं केवल इस भय से अपने मूल्य नहीं छोडूंगा कि कहीं कोई मुझे छोड़ ना दे। यही संतुलन मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि सामने वाला सचमुच लौट आता है। वो वर्षों बाद समझता है कि उसने क्या खोया? लेकिन तब एक बहुत

35:06

Speaker A

महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है। क्या वो इसलिए लौटा है क्योंकि उसे सचमुच तुम्हारा मूल्य समझ में आया या इसलिए कि उसका नया सहारा टूट गया। क्या उसने अपने भीतर कुछ बदला है या केवल परिस्थितियां बदल गई हैं। इसी प्रकार तुम्हें भी अपने भीतर देखना

35:22

Speaker A

होगा। क्या तुम उसे इसलिए स्वीकार करना चाहते हो क्योंकि प्रेम अब भी जीवित है या केवल इसलिए कि तुम्हें अकेलापन डराता है? यदि इन प्रश्नों को देखे बिना संबंध फिर शुरू होगा तो पुराना चक्र दोबारा लौट सकता है। इसलिए वापसी से अधिक महत्वपूर्ण है

35:40

Speaker A

परिवर्तन। यदि परिवर्तन नहीं तो लौटना केवल पुराने घामों का पुनारंभ हो सकता है। और यदि वह कभी लौट कर नहीं आता तब भी जीवन अधूरा नहीं रह जाता। यह बात सुनने में सरल लगती है, लेकिन जीने में समय लगता है। मनुष्य धीरे-धीरे समझता है कि कुछ लोग

35:59

Speaker A

हमारे जीवन में हमेशा रहने के लिए नहीं आते। वे हमें अपने बारे में कुछ सिखाने आते हैं। कोई हमें आत्मसम्मान सिखाता है। कोई धैर्य, कोई सीमाएं तय करना। कोई यह कि प्रेम केवल देने का नाम नहीं। कोई यह कि अपने भीतर लौटे बिना कोई भी संबंध पूर्ण

36:20

Speaker A

नहीं हो सकता। जब सीख पूरी हो जाती है तब व्यक्ति चला भी जाए तो उसके जाने का अर्थ केवल खोना नहीं रहता। वह हमारे भीतर कुछ नया छोड़ जाता है। यहीं एक और सूक्ष्म बात दिखाई देती है। जिस व्यक्ति को अपनी कमी महसूस कराने की सबसे अधिक चिंता रहती है,

36:39

Speaker A

वह अक्सर स्वयं अपनी कमी महसूस करता रहता है। उसे लगता है कि मैं पर्याप्त नहीं हूं। मुझे और सुंदर होना चाहिए और सफल होना चाहिए और रोचक होना चाहिए। तभी लोग मुझे महत्व देंगे। लेकिन जिस दिन वह अपने भीतर इस कमी की भावना को पहचान लेता है

36:58

Speaker A

उसी दिन बाहर की दौड़ धीमी होने लगती है। उसे समझ में आता है कि मैं वर्षों से दूसरों से वह मांग रहा था जो मुझे स्वयं अपने भीतर देना था। स्वीकृति, सम्मान और अपनापन। जिस दिन यह भीतर जन्म लेने लगता है उसी दिन संबंधों का पूरा स्वर बदल जाता

37:16

Speaker A

है। तब प्रेम एक व्यापार नहीं रह जाता। पहले मन कहता था मैं इतना दूंगा तो सामने वाला भी उतना देगा। मैं दूर जाऊंगा तो वह पास आएगा। मैं चुप रहूंगा तो वह बोलेगा। यह सब गणना है। जहां गणना है वहां मन हर समय परिणाम देखता रहता है। लेकिन जहां

37:37

Speaker A

प्रेम है वहां मनुष्य अपना सर्वश्रेष्ठ देता है। क्योंकि वही उसका स्वभाव बन चुका है। यदि सामने वाला उसे समझता है, तो संबंध गहरा होता है। यदि नहीं समझता, तो वह स्वयं को नष्ट करके वहां नहीं रुकता। वो दुखी होता है, लेकिन टूटता नहीं। यही

37:55

Speaker A

परिपक्वता है। धीरे-धीरे यह भी समझ में आने लगता है कि किसी की कमी महसूस कराना वास्तव में किसी दूसरे पर प्रभाव डालने की कला नहीं। स्वयं को खोने से बचाने की साधना है। जो मनुष्य स्वयं के साथ जुड़ा रहता है, उसकी उपस्थिति में एक प्रकार की

38:12

Speaker A

गरिमा होती है। वो हर समय बोलकर अपनी जगह नहीं बनाता। उसे हर क्षण अपनी उपयोगिता सिद्ध नहीं करनी पड़ती। वह जानता है कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसका सच्चा होना है और सच्चा मनुष्य कभी बहुत शोर नहीं करता। उसकी उपस्थिति ही पर्याप्त होती है। जब

38:29

Speaker A

जीवन इस बिंदु तक पहुंचता है तब एक अद्भुत परिवर्तन होता है। अब यदि कोई तुम्हें याद करता है तो तुम्हें प्रसन्नता होती है। लेकिन तुम्हारा जीवन उसी पर निर्भर नहीं। यदि कोई नहीं भी याद करता तब भी तुम्हारे भीतर की शांति बनी रहती है। तुम किसी के

38:47

Speaker A

लौटने की प्रतीक्षा में अपना वर्तमान नहीं खोते। तुम नए संबंधों से डरते नहीं। पुराने संबंधों से भागते नहीं। तुम जीवन को उसके पूरे विस्तार के साथ स्वीकार करने लगते हो। और यही इस विषय की अंतिम भूमि सामने आती है। क्योंकि अंततः किसी को अपनी

39:04

Speaker A

कमी महसूस कराने का सबसे गहरा उत्तर किसी मनोवैज्ञानिक उपाय में नहीं। बल्कि मनुष्य की आंतरिक परिपक्वता में छिपा है। जब तुम्हारे भीतर प्रेम अधिकार से मुक्त हो जाता है। जब आत्मसम्मान अहंकार से अलग हो जाता है। जब मौन दंड नहीं बल्कि आत्मबोध

39:22

Speaker A

बन जाता है। जब तुम्हारी उपस्थिति किसी के जीवन में शांति विश्वास और स्वतंत्रता का अनुभव बन जाती है। तब तुम्हारी अनुपस्थिति अपने आप बोलने लगती है। उस समय तुम्हें किसी को अपनी याद दिलाने की आवश्यकता नहीं रहती। जीवन स्वयं तुम्हारी ओर से बोलता है

39:39

Speaker A

और यही समझ इस पूरे विषय का सबसे गहरा द्वार खोलती है जहां यह स्पष्ट होता है कि वास्तविक कमी कभी मांगी नहीं जाती कभी बनाई नहीं जाती बल्कि एक ऐसे जीवन से जन्म लेती है जो स्वयं अपने सत्य में स्थिर हो चुका होता है और जब मनुष्य स्वयं अपने

39:57

Speaker A

सत्य में स्थिर होने लगता है तब उसे पहली बार यह समझ में आता है कि वास्तविक कमी किसी तकनीक का परिणाम नहीं बल्कि एक जिए हुए जीवन की सुगंध है। फूल कभी यह प्रयास नहीं करता कि लोग उसकी खुशबू को याद रखें। वह केवल खिलता है। उसकी सुगंध अपने आप हवा

40:16

Speaker A

में फैलती है। जो उसके पास से गुजरते हैं, वे उसे अपने भीतर लेकर चले जाते हैं। कुछ देर बाद फूल दिखाई नहीं देता लेकिन उसकी महक स्मृति में बनी रहती है। मनुष्य का जीवन भी कुछ ऐसा ही है। यदि उसकी उपस्थिति में करुणा है, सम्मान है, सच्चाई है और

40:35

Speaker A

आत्मसम्मान है तो उसके दूर हो जाने के बाद भी उसका प्रभाव बना रहता है। लेकिन यदि वह केवल ध्यान खींचने की कला सीखता रहा, लोगों को बांधने की युक्तियां अपनाता रहा, तो उसका प्रभाव उतनी ही जल्दी समाप्त हो जाता है जितनी जल्दी किसी कृत्रिम सुगंध

40:52

Speaker A

की गंध उड़ जाती है। यही प्रेम का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है। जितना अधिक तुम किसी को अपनी कमी महसूस कराने की कोशिश करते हो, उतना ही तुम उसके मन पर निर्भर हो जाते हो। और जितना अधिक तुम अपने भीतर लौटते हो, उतना ही तुम्हारी

41:09

Speaker A

उपस्थिति स्वाभाविक रूप से मूल्यवान होती जाती है। यह बात पहली बार सुनने पर उल्टी लगती है क्योंकि मन का स्वभाव बाहर भागना है। वह हमेशा सोचता है कि समाधान सामने वाले के व्यवहार में छिपा है। यदि वह बदल जाए तो मैं प्रसन्न हो जाऊंगा। यदि वह लौट

41:27

Speaker A

आए तो मैं शांत हो जाऊंगा। यदि वह मेरी कीमत समझ ले तो मैं पूर्ण हो जाऊंगा। लेकिन जीवन धीरे-धीरे यह सिखाता है कि जो शांति किसी दूसरे के निर्णय पर टिकी हो, वह स्थाई नहीं हो सकती। क्योंकि दूसरा मनुष्य भी अपने भय, अपनी उलझनों और अपनी

41:45

Speaker A

सीमाओं के साथ जी रहा है। मैंने देखा है कि जब कोई व्यक्ति अपने भीतर सचमुच बदल जाता है, तब उसके पुराने संबंध भी नए अर्थ लेने लगते हैं। पहले वह हर अस्वीकृति को अपने मूल्य का निर्णय मानता था। अब वह समझने लगता है कि कभी-कभी लोग हमें इसलिए

42:02

Speaker A

खो देते हैं क्योंकि वे उस समय हमें समझने की अवस्था में ही नहीं थे। जैसे कोई बच्चा हीरे और कांच के टुकड़े में अंतर नहीं जानता। वैसे ही जीवन में कई लोग उस समय किसी सच्चे संबंध की कीमत नहीं पहचान पाते जब वह उनके पास होता है। इसका अर्थ यह

42:17

Speaker A

नहीं कि वे बुरे हैं। वे केवल अभी उस परिपक्वता तक नहीं पहुंचे जहां प्रेम को देखा जा सके। इसलिए यदि किसी ने तुम्हारी कदर नहीं की तो हर बार इसका अर्थ यह नहीं कि तुम्हारे भीतर कोई कमी थी। कई बार इसका अर्थ केवल इतना होता है कि सामने वाले की

42:35

Speaker A

दृष्टि अभी तैयार नहीं थी। यही समझ मनुष्य को कड़वाहट से बचाती है। अन्यथा वह सोचने लगता है कि अब मैं भी किसी से प्रेम नहीं करूंगा। अब मैं भी किसी के लिए उपलब्ध नहीं रहूंगा। अब मैं भी लोगों को वही दर्द दूंगा जो मुझे मिला। लेकिन जो व्यक्ति ऐसा

42:53

Speaker A

करता है, वह अपने घावों को अपने स्वभाव में बदल देता है। फिर वह केवल एक व्यक्ति से नहीं पूरे जीवन से बदला लेने लगता है। उसके भीतर विश्वास धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। वह हर संबंध को संदेह से देखता है। हर प्रेम में छल खोजता है। हर निकटता

43:11

Speaker A

में खतरा देखता है। बाहर से वह सुरक्षित दिखाई देता है। भीतर से वह लगातार अकेला होता जाता है। सच्ची परिपक्वता का अर्थ है कि दुख तुम्हें कठोर ना बनाए बल्कि अधिक समझदार बना दे। यदि किसी ने तुम्हारी उपस्थिति का मूल्य नहीं समझा तो तुम स्वयं

43:28

Speaker A

अपनी उपस्थिति का सम्मान करना सीखो। यदि किसी ने तुम्हारे प्रेम को हल्के में लिया तो तुम प्रेम करना बंद मत करो। केवल यह सीखो कि प्रेम और आत्मविस्मृति एक बात नहीं है। यदि किसी ने तुम्हें छोड़ दिया तो तुम अपने जीवन को मत छोड़ो। यही वो

43:46

Speaker A

स्थान है जहां मनुष्य टूट कर भी बिखरता नहीं। उसका दुख वास्तविक होता है। लेकिन वह उसी दुख से एक नई समझ भी जन्म देता है। धीरे-धीरे तुम्हें यह भी दिखाई देने लगता है कि संसार में सबसे दुर्लभ लोग वे नहीं है जो सबसे सुंदर हैं। सबसे धनी है या

44:05

Speaker A

सबसे प्रसिद्ध हैं। सबसे दुर्लभ वे हैं जिनके साथ रहकर तुम्हें अपने होने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता। जिनके सामने तुम्हें अभिनय नहीं करना पड़ता। जिनके पास बैठकर तुम्हारा मन शांत हो जाता है। जिनके साथ मौन भी असहज नहीं लगता। ऐसे लोग बहुत

44:23

Speaker A

कम मिलते हैं। और जब वे दूर चले जाते हैं तब उनकी कमी केवल इसलिए नहीं महसूस होती कि वे चले गए। बल्कि इसलिए कि उनके साथ तुम्हारे जीवन का एक शांत आकाश भी चला गया। लेकिन यदि तुम्हारा अपना आकाश ही खाली है तो कोई भी मनुष्य उसे हमेशा के

44:41

Speaker A

लिए भर नहीं सकता। यही इस पूरे विषय का सबसे गहरा बोध है। हम अक्सर किसी दूसरे को अपनी खुशी का स्रोत बना देते हैं। फिर उसके जाने पर लगता है कि सब कुछ समाप्त हो गया। वास्तव में समाप्त वो नहीं हुआ। समाप्त वो भ्रम हुआ

44:58

Speaker A

कि मेरा जीवन किसी एक व्यक्ति पर टिका है। यह भ्रम टूटता है तो बहुत पीड़ा होती है। लेकिन इसी पीड़ा से एक नया जन्म भी संभव होता है। अब तुम पहली बार अपने भीतर लौटते हो। तुम स्वयं से मिलते हो। तुम देखते हो कि तुम्हारी प्रसन्नता, तुम्हारी

45:15

Speaker A

रचनात्मकता, तुम्हारी करुणा, तुम्हारी शक्ति, किसी दूसरे की अनुमति पर निर्भर नहीं। यहीं से प्रेम का रूप भी बदल जाता है। अब तुम किसी से इसलिए नहीं जुड़ते कि वह तुम्हारी कमी पूरी करें। तुम इसलिए जुड़ते हो क्योंकि तुम्हारे भीतर जो

45:31

Speaker A

सौंदर्य है उसे बांटना चाहते हो। अब तुम किसी को खोने से डरकर उसके पीछे नहीं भागते। यदि वह साथ चलना चाहता है तो तुम पूरे हृदय से उसका हाथ पकड़ते हो। यदि वह जाने का निर्णय करता है तो तुम्हें दुख होता है। लेकिन तुम अपने अस्तित्व को उसके

45:49

Speaker A

साथ बहा नहीं देते। यह उदासीनता नहीं परिपक्वता है। यहां प्रेम समाप्त नहीं होता बल्कि और अधिक निर्मल हो जाता है। कभी-कभी जीवन बहुत अद्भुत ढंग से उत्तर देता है। जिस व्यक्ति को तुम वर्षों तक अपनी कमी महसूस कराना चाहते थे वही एक दिन

46:08

Speaker A

अचानक तुम्हें याद करने लगता है। वह लौटना भी चाहता है। लेकिन तब तक तुम्हारे भीतर बहुत कुछ बदल चुका होता है। अब तुम्हारा निर्णय उसकी बेचैनी से नहीं अपनी स्पष्टता से निकलता है। यदि तुम्हें लगता है कि दोनों सचमुच बदल चुके हैं तो तुम फिर साथ

46:26

Speaker A

चल सकते हो। यदि तुम्हें दिखाई देता है कि केवल परिस्थितियां बदली हैं मन नहीं तो तुम शांत होकर आगे बढ़ सकते हो। अब तुम्हारे निर्णय का आधार भय नहीं विवेक है। और यदि वह कभी नहीं लौटता तब भी तुम्हारे जीवन की कहानी अधूरी नहीं रहती।

46:45

Speaker A

क्योंकि अब तुम्हें यह समझ आ चुकी होती है कि किसी का तुम्हें याद करना तुम्हारे मूल्य का प्रमाण नहीं और किसी का तुम्हें भूल जाना तुम्हारी असफलता नहीं। हर मनुष्य अपनी समझ अपने घावों और अपनी चेतना के स्तर से संबंधों को जीता है। तुम किसी के

47:01

Speaker A

निर्णय को नियंत्रित नहीं कर सकते। लेकिन तुम अपने जीवन की गुणवत्ता को अवश्य बदल सकते हो। अंततः किसी को अपनी कमी महसूस कराने का सबसे गहरा मार्ग यह नहीं कि तुम उससे दूर चले जाओ। उसे जलाओ, उसे प्रतीक्षा कराओ या उसके भीतर असुरक्षा

47:18

Speaker A

पैदा कर दो। सबसे गहरा मार्ग यह है कि तुम ऐसा मनुष्य बनो जिसकी उपस्थिति लोगों को अपने बेहतर रूप से मिला दे। तुम्हारे साथ रहकर लोग स्वयं को छोटा नहीं, बड़ा महसूस करें। तुम्हारे साथ उन्हें भय नहीं, भरोसा मिले। तुम्हारे शब्दों में अधिकार नहीं,

47:36

Speaker A

अपनापन हो। तुम्हारी निकटता में घुटन नहीं, विस्तार हो। और तुम्हारे जाने के बाद उन्हें यह अनुभव हो कि जीवन में कुछ बहुत शांत बहुत सच्चा और बहुत मूल्यवान था जो अब दिखाई नहीं देता। लेकिन जिसकी छाप अब भी उनके भीतर जीवित है। यही वास्तविक

47:55

Speaker A

कमी है। इसे कोई युक्ति पैदा नहीं कर सकती। इसे कोई अभिनय बना नहीं सकता। यह उस जीवन से जन्म लेती है जो अपने भीतर ईमानदार हो। अपने संबंधों में सम्मान रखता हो। अपने प्रेम में स्वतंत्रता देता हो और अपने अस्तित्व को किसी दूसरे की स्वीकृति

48:13

Speaker A

पर न टिकाता हो। ऐसा मनुष्य किसी को बांधता नहीं। फिर भी लोग उसे आसानी से भूल नहीं पाते। क्योंकि उसने लोगों के जीवन में केवल समय नहीं बिताया होता। उसने उनके भीतर एक अनुभव जगाया होता है और अनुभव समय से अधिक लंबे जीवित रहते हैं। वे वर्षों

48:32

Speaker A

बाद भी किसी शांत शाम, किसी अनकहे क्षण, किसी पुराने गीत या किसी गहरी सांस के साथ लौट आते हैं। तब मनुष्य समझता है कि कुछ लोग हमारे जीवन से चले तो जाते हैं, पर हमारे भीतर से कभी पूरी तरह नहीं जाते। वे स्मृति बनकर नहीं बल्कि हमारे व्यक्तित्व

48:52

Speaker A

का एक शांत हिस्सा बनकर जीवित रहते हैं। और शायद किसी मनुष्य की सबसे सुंदर उपस्थिति वही है जो उसके चले जाने के बाद भी हमारे भीतर प्रेम, गरिमा, आत्मसम्मान और करुणा को थोड़ा और जीवित छोड़ चाय।

Topics: कमी महसूस करना उपस्थिति का महत्व संबंध और आत्मसम्मान दूरी और प्रेम ईर्ष्या और सम्मान मनोवैज्ञानिक खेल जीवन की गुणवत्ता स्मृति और यादें भावनात्मक संबंध ओशो हिंदी भाषण

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