**Imran Khan & Altaf Hussain | The Similarities Nobody Wants to Talk About — Transcript & Summary | SozAI**
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इमरान खान और अल्ताफ हुसैन की सियासत की समानताएं और उनके राजनीतिक उतार-चढ़ाव पर एक विश्लेषण।

## Key Takeaways

- इमरान खान और अल्ताफ हुसैन ने सत्ता के खिलाफ बगावत कर युवाओं में लोकप्रियता हासिल की।
- दोनों ने पारिवारिक राजनीतिक नियुक्तियों से दूरी बनाई।
- मीडिया से दोनों को समर्थन और विरोध दोनों का सामना करना पड़ा।
- दोनों की राजनीतिक पार्टियां एक समय में बड़ी ताकत बनीं लेकिन बाद में कमजोर हुईं।
- उनकी राजनीतिक गलतियों और विवादों ने उनके करियर को प्रभावित किया।

## What the video covers

- इमरान खान और अल्ताफ हुसैन दोनों ने पाकिस्तान में सत्ता के खिलाफ बगावत की और युवाओं में लोकप्रियता हासिल की।
- दोनों नेताओं ने अपने परिवार के सदस्यों को राजनीतिक पदों पर नियुक्त नहीं किया, जिससे उनकी मौरूसी सियासत से दूरी दिखी।
- एमकेएम और पीटीआई दोनों ने शुरुआती दौर में इस्टैब्लिशमेंट का समर्थन पाया और बाद में बड़ी राजनीतिक ताकत बनीं।
- दोनों नेताओं को मीडिया से समर्थन और शिकायतें दोनों मिलीं, और दोनों ने मीडिया के कुछ बड़े समूहों का बहिष्कार भी किया।
- अल्ताफ हुसैन की 2016 की विवादित टेलीफोनिक भाषण के बाद एमकेएम पर सख्त कार्रवाई हुई और उनकी राजनीतिक स्थिति कमजोर हुई।
- इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद पीटीआई के कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर प्रदर्शन किए, जिससे राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी।
- दोनों नेताओं की राजनीतिक पार्टियां एक समय में तीसरी सबसे बड़ी ताकत बन गईं, लेकिन बाद में दोनों के राजनीतिक करियर में गिरावट आई।
- एमकेएम के अंदर भी बगावत हुई और नई पार्टी एमकेएम हकीकी बनी, जिससे शहर में राजनीतिक टकराव बढ़ा।
- दोनों नेताओं ने सत्ता के खिलाफ आवाज उठाई, लेकिन अंततः दोनों की राजनीतिक स्थिति कमजोर हो गई।
- वीडियो में दोनों नेताओं की समानताओं, मीडिया के साथ उनके संबंधों और राजनीतिक उतार-चढ़ाव का विस्तार से विश्लेषण किया गया है।

Answers

## Questions about this video

इमरान खान और अल्ताफ हुसैन की राजनीतिक समानताएं क्या हैं?

दोनों नेताओं ने सत्ता के खिलाफ बगावत की, युवाओं में लोकप्रियता हासिल की, और अपने परिवार के सदस्यों को राजनीतिक पदों पर नियुक्त नहीं किया।

एमकेएम और पीटीआई की शुरुआती सफलता का कारण क्या था?

दोनों पार्टियों को इस्टैब्लिशमेंट का समर्थन मिला, जिससे वे जल्दी लोकप्रिय हुईं और राजनीतिक ताकत बन गईं।

अल्ताफ हुसैन की 2016 की टेलीफोनिक भाषण का क्या असर हुआ?

उनकी विवादित भाषण के बाद एमकेएम पर सख्त कार्रवाई हुई, पार्टी के कई कार्यालय बंद हुए और अल्ताफ हुसैन की राजनीतिक स्थिति कमजोर हो गई।

## Full Transcript — Download SRT & Markdown

00:01

Speaker A

एक शख्स जिसकी आवाज़ पर कराची की सड़कें वीरान हो जाती थीं और दूसरा जिसके नाम पर लाखों का समंदर सड़कों पर उमड़ आता था। [संगीत] एक की पतंग बुलंदियों पर थी। मजलूमों का साथी है अल्ताफ। तो दूसरे का बल्ला हर गेंद पर मार रहा था। [संगीत] एक को कायदे तैरीक कहा गया तो दूसरा कप्तान कहलाया। दोनों वन मैन शो थे। लेकिन नौजवानों में मकबूल थे। दोनों खुद परस्त थे लेकिन ताकतवरों के लाडले थे। एक का ठिकाना बनी काला था तो दूसरे का नाइंजीर। एक ने हुकूक की बात की तो दूसरे ने तब्दीली के ख्वाब दिखाए। लेकिन फिर वही रियासत, वही ताकत, वही निजाम, एक अल्ताफ हुसैन से बनी एमकेएम बन गया तो दूसरा इमरान खान से बनी पीटीआई कहलाने लगा। यह कहानी है उन दो मकबूल तरीन सियासी लीडरों की जो हर वक्त मीडिया पर छाए रहते थे। और आज यही मीडिया उनका नाम लेने तक से कतराता है। आज की इस वीडियो में हम बात करेंगे अल्ताफ हुसैन और इमरान खान की। जिनकी सियासत का अंदाज अगरचा अलग-अलग हो मगर अंजाम शायद एक जैसा हो रहा है। दोनों ने रिकॉर्ड तोड़ मकबूलियत हासिल की लेकिन फिर दोनों ने एक जैसी गलती की। वो आउट ऑफ कंट्रोल हो गए। अब एक लंदन के घर में तन्हा हो गया तो दूसरा अडियाला जेल की कोठरी में कैद। आपसे गुजारिश है कि हमारे चैनल को जरूर सब्सक्राइब कर लें और वीडियो पसंद आए तो उसे लाइक और शेयर करना मत भूलिएगा। एमकेएम ने जब आंख खोली तो उस वक्त मुल्क पर वडेरा शाही और जागीरदाराना निजाम की हुक्मरानी थी। अल्ताफ हुसैन ने इस हुक्मरानी को न सिर्फ ललकारा बल्कि उसके खिलाफ बगावत का परचम लहरा दिया। उन्होंने महाजिरों के हुकूक का नारा लगाया और सियासत के एक ऐसे मैदान में उतर गए जहां कामयाबी उनके इंतजार में बैठी हुई थी। दूसरी तरफ जब इमरान खान ने पीटीआई बनाने का ऐलान किया तो यह वह दौर था जब कभी पीपल्स पार्टी की हुकूमत होती थी तो कभी नून लीग की। इमरान खान उन दोनों के सामने दीवार बनकर खड़े हो गए। का नाम व्याया का नस्ताईन आपने किसी इंसान के सामने नहीं झुकना। बाद में ही सही लेकिन कामयाबी उन्हें भी मिली। इमरान अहमद नयाजी साहब ने 176 वोट हासिल किए। अल्ताफ हुसैन और इमरान खान में एक बड़ी सिमिलरिटी यह थी कि उन्होंने मुल्क में स्टेटस को के खिलाफ बगावत की और लोग उनकी तरफ खींचे चले आए। दोनों में एक और चीज भी मिलती जुलती थी वो यह कि दोनों ही मौरूसी सियासत के खिलाफ थे। [संगीत] और सिर्फ जबानी दावों से नहीं दोनों ने प्रैक्टिकली यह साबित भी किया। दोनों ने कभी अपने किसी रिश्तेदार को किसी ओदे पर नहीं बिठाया। अल्ताफ हुसैन तो सिर्फ अपनी पार्टी के कायद बने रहे। कोई सियासी या तंजीमी ओदा हो या फिर काउंसलर, असेंबली, [संगीत] सेनेट, मेयर और गवर्नर की सीट। ना कभी खुद इस पर बैठे और ना कभी अपने रिश्तेदार को बिठाया। सिर्फ एक बार कुछ अरसे के लिए उनके ससुर फैसल कबूल मुशीर वज़ीर आला सिंध रहे। लेकिन उन्हें भी जल्द हटा दिया गया था। सियासत में बिल्कुल यही रवैया इमरान खान का भी था। वो खुद तो वज़ीर-ए-आज़म के ओदे तक पहुंचे। मगर अपने किसी रिश्तेदार को किसी सियासी या सरकारी ओदे के लिए नॉमिनेट नहीं किया। उनकी बहन अलीमा खान भाई की गिरफ्तारी के बाद जद्दोजहद करती नजर आ रही हैं। मगर उनके पास भी पार्टी का कोई ओदा नहीं है। एक नजर दोनों पार्टियों के उरूज पर डालते हैं। एमकेएम बनने के फौरन बाद ही मकबूल हो गई थी। सिर्फ 4 साल बाद ही वो इतनी पॉपुलर हो चुकी थी कि 1988 के जनरल इलेक्शन में मुल्क की तीसरी बड़ी सियासी कुत बनकर उभरी। 2013 के इलेक्शन में तीसरी बड़ी सियासी कुत बनने का एजाज पीटीआई को भी मिला। यह अलग बात है कि इसे यहां तक पहुंचने में 17 साल लगे। पीटीआई की तीसरी कुत बनने के बाद एमक्यूएम चौथे पायदान पर चली गई। कहा जाता है कि इन दोनों जमातों को एक लंबे अरसे तक इस्टैब्लिशमेंट की आशीर्वाद हासिल थी। भुट्टो की फांसी के बाद उस वक्त के आमिर जियाउल हक को एक ऐसी ताकत की जरूरत थी जो सिंध में पीपल्स पार्टी का जोर तोड़ सके। उसके लिए उन्होंने मुबईना तौर पर एमकेएम को फ्री हैंड दिया। नतीजा यह निकला कि एमकेएम जल्द ही सिंध के शहरी इलाकों की मकबूल जमात बन गई। जियाउल हक के बाद 2002 में एक और आमिर जनरल परवेज मुशरफ ने तो एमकेएम के सर पर बकायदा हाथ रख दिया। मुशर्रफ का दौर तो एमकेएम के लिए गोल्डन पीरियड था। ऐसा ही सीन पीटीआई के साथ भी था। कहा जाता है कि इमरान खान शुरू से ही इस्टैब्लिशमेंट के फेवरेट थे। लेकिन 2010 तक हाथ हल्का रखा गया था। 2011 इमरान खान के उरूज का साल साबित हुआ। पीटीआई के जलसे अचानक भरे जाने लगे। खुर्शीद महमूद कुसूरी, शाह महमूद कुरैशी, जावेद हाशमी, बाबर अवान, फिरदौस आशिक अवान और ओवैस लारी जैसे नाम पीटीआई की कश्ती में सवार होने लगे। लोग साथ आते गए और कारवा बनता गया। बढ़ता गया। अक्टूबर 2011 की लाहौर और दिसंबर 2011 की कराची के अजीमो शान जलसों ने सबको हिला कर रख दिया। आज कराची वालों आपको बहुत मुबारक हो। यह सब मुबयना तौर पर ऊपर वालों के आशीर्वाद का रिजल्ट था। अल्ताफ हुसैन और इमरान खान में एक मुशाबत यह भी थी कि दोनों को मीडिया ने खूब कवरेज दी। लेकिन दोनों को मीडिया से शिकायतें भी थीं। एमकेएम जब बनी तो शुरू में तो किसी अखबार ने इसे लिफ्ट नहीं कराई। लेकिन जब 8 अगस्त 1986 के नश्तर पार्क जलसे में अल्ताफ हुसैन ने अपनी पावर शो की तो अखबारात ने फौरन उन्हें सर आंखों पर बिठा लिया। धड़ाधड़ उनकी जमात की खबरें छपने लगीं। फिर 1987 के बलियाती इलेक्शन में एमपीएम ने कराची और हैदराबाद में क्लीन स्वीप किया और 1988 के आम इंतखाबादत के बाद जब वो मुल्क की तीसरी बड़ी ताकत बनकर उभरी तो उसके बाद तो अल्ताफ हुसैन मीडिया पर छा गए। लेकिन उन्हें फिर भी अखबारात से शिकवा रहा कि वो एमकेएम की ठीक से कवरेज नहीं करते। इस इल्जाम पर उन्होंने नववें की दहाई में रोजनामा जंग का बॉयकॉट कर दिया था। इस बॉयकॉट के बाद शहर में जगह-जगह जंग से नफरत, अमन से मोहब्बत की वॉल चौकिंग भी की गई थी। दूसरी तरफ सहाफियों की भी एमपीएम की तरफ से जब्र, धौंस, धमकी और तशद्दुद की शिकायतें सामने आने लगीं। अल्ताफ हुसैन की तरह इमरान खान को भी मीडिया ने शुरू में इग्नोर किया। लेकिन फिर 2011 में वो वक्त भी आया जब न्यूज़ चैनलों ने भी उनकी मकबूलियत बढ़ाने में साथ दिया और फिर उनकी मकबूलियत को खूब कैश भी किया। न्यूज़ चैनलों पर इमरान खान की शोहरत को प्रोडक्ट की तरह बेचा जाने लगा। लेकिन जिस तरह अल्ताफ हुसैन को मीडिया से शिकायतें थीं, ठीक उसी तरह के शिकवे इमरान खान को भी मीडिया से थे। 2014 में इमरान खान ने रोजनामा जंग और Jio न्यूज़ का बॉयकॉट कर दिया। इल्जाम लगाया कि जंग और Jio ने 2013 के जनरल इलेक्शन में मुबईना धांधली में किरदार अदा किया था। अल्ताफ हुसैन और इमरान खान दोनों एक ही कश्ती के सवार थे। दोनों के पास शोहरत थी। वोट बैंक था। मीडिया की सपोर्ट थी। सर पर ऊपर वालों का हाथ था। ऐसे में अचानक दोनों एक जैसी गलती कर बैठे। 22 अगस्त 2016 को कराची प्रेस क्लब के बाहर एमकेएम के कारकुन एतेजाज कर रहे थे। अल्ताफ हुसैन ने इन एतजाज करने वाले कारकुनों से टेलीफोनिक खिताब किया। लेकिन यह खिताब उनके मुस्तकबिल के लिए खुदकुश हमला साबित हुआ। उन्होंने इस खिताब में रियासत के खिलाफ ऐसी-ऐसी बातें कीं कि इदारे इसका सख्त नोटिस लेने पर मजबूर हो गए। उसकी तफसील आप हमारी इस वीडियो में देख सकते हैं। बहरहाल अल्ताफ हुसैन की इस कंट्रोवर्शियल तकरीर पर सख्त एक्शन हुआ। 90 को सील कर दिया गया। यूनिट और सेक्टर ऑफिसों को गैरकानूनी और कब्जा कह कर सफाया कर दिया गया। एमकेएम के दफ्तरों पर ताले लगा दिए गए। कई कारकुनों को गिरफ्तार कर लिया गया। अगले रोज यानी 23 अगस्त को डॉक्टर फारूक सत्तार ने एमकेएम से अल्ताफ हुसैन को माइनस करने का ऐलान कर दिया। अल्ताफ हुसैन साहब से हमारा मुकम्मल कतह ताल्लुक है। यूं एमकेएम तो बच गई लेकिन अल्ताफ हुसैन की सियासत रूल बैक हो गई। अल्ताफ हुसैन एमकेएम के कायद से एकदम बानी एमकेएम बन गए। मीडिया पर उनका नाम लेना या उनकी तस्वीर दिखाने तक पर गैर ऐलानिया पाबंदी लग गई। एमकेएम के सारे मरकजी रहनुमाओं ने अल्ताफ हुसैन से दामन छुड़ा लिया। 10 साल हो गए मगर अल्ताफ हुसैन से ताल्लुक रखने वाले किसी भी शख्स को पाकिस्तान में पॉलिटिकल एक्टिविटी की इजाजत नहीं। ठीक उसी तरह 9 मई 2023 पीटीआई के ज़वाल का दिन बन गया। उस रोज इमरान खान को अलकादिर ट्रस्ट केस में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तार करके इमरान खान को गाड़ी ले गई है। जी। गिरफ्तारी की खबर फैलते ही पीटीआई के कारकुन एतजाज करते हुए सड़कों पर निकल आए। कई शहरों में पुर ततशद्दुद मुजायरे हुए। मुख्तलिफ सरकारी और अस्करी तसीबात पर हमले किए गए। तोड़फोड़ और आग लगाने जैसे वाक्यात हुए। हुकूमत और इदारों ने इसे कौमी सलामती पर हमला करार दिया और उसका जिम्मेदार इमरान खान को करार दिया गया। पीटीआई के रहनुमाओं और कारकुनों की बड़ी तादाद में पकड़-धकड़ शुरू हो गई। कई रहनुमाओं ने तो पार्टी से अलग होकर सियासत ही छोड़ दी। इमरान खान भी चेयरमैन पीटीआई से बानी पीटीआई बन गए। अल्ताफ हुसैन और इमरान खान दोनों की पार्टियों को तोड़ने की कोशिश भी की गई। यह अलग बात है कि ये कोशिशें नाकाम साबित हुईं। हुआ यह कि 1992 के ऑपरेशन से कुछ पहले एमकेएम के अंदर बगावत हुई। एमक्यूएम के अफाक अहमद और आमिर खान ने पार्टी से अलग होकर नई पार्टी एमकेएम हकीकी की बुनियाद रखी। 92 के ऑपरेशन में इस्टैब्लिशमेंट ने उनके सर पर हाथ रख दिया। यह नया धड़ा एमकेएम को तो नुकसान न पहुंचा सका लेकिन शहर में उन दोनों के मुसल्ला तसादुम शुरू हो गए जिसमें सैकड़ों लोगों

00:24

Speaker A

रहा था। [संगीत] एक को कायदे तैरीक कहा गया तो दूसरा कप्तान कहलाया। दोनों वन मैन शो थे। लेकिन नौजवानों में मकबूल थे। दोनों खुद परस्त थे लेकिन ताकतवरों के लाडले थे। एक का ठिकाना बनी काला था तो दूसरे का नाइंजीर।

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Speaker A

एक ने हुकूक की बात की तो दूसरे ने तब्दीली के ख्वाब दिखाए। लेकिन फिर वही रियासत, वही ताकत, वही निजाम, एक अल्ताफ हुसैन से बानी एमकेएम बन गया तो दूसरा इमरान खान से बानी पीटीआई कहलाने लगा। यह कहानी है उन दो मकबूल तरीन

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Speaker A

सियासी लीडरों की जो हर वक्त मीडिया पर छाए रहते थे। और आज यही मीडिया उनका नाम लेने तक से कतराता है। आज की इस वीडियो में हम बात करेंगे अल्ताफ हुसैन और इमरान खान की। जिनकी सियासत का अंदाज अगरचा

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Speaker A

अलग-अलग हो मगर अंजाम शायद एक जैसा हो रहा है। दोनों ने रिकॉर्ड तोड़ मकबूलियत हासिल की लेकिन फिर दोनों ने एक जैसी गलती की। वो आउट ऑफ कंट्रोल हो गए। अब एक लंदन के घर में तन्हा हो गया तो दूसरा अडियाला जेल

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Speaker A

की कोठरी में कैद। आपसे गुजारिश है कि हमारे चैनल को जरूर सब्सक्राइब कर लें और वीडियो पसंद आए तो उसे लाइक और शेयर करना मत भूलिएगा। एमकेएम ने जब आंख खोली तो उस वक्त मुल्क पर वडेरा शाही और जागीरदाराना निजाम की

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Speaker A

हुक्मरानी थी। अल्ताफ हुसैन ने इस हुक्मरानी को ना सिर्फ ललकारा बल्कि उसके खिलाफ बगावत का परचम लहरा दिया। उन्होंने महाजिरों के हुकूक का नारा लगाया और सियासत के एक ऐसे मैदान में उतर गए जहां कामयाबी उनके इंतजार में बैठी हुई थी।

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Speaker A

दूसरी तरफ जब इमरान खान ने पीटीआई बनाने का ऐलान किया तो यह वह दौर था जब कभी पीपल्स पार्टी की हुकूमत होती थी तो कभी नून लीग की। इमरान खान उन दोनों के सामने दीवार बनकर खड़े हो गए।

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Speaker A

का नाम व्याया का नस्ताईन आपने किसी इंसान के सामने नहीं झुकना। बाद में ही सही लेकिन कामयाबी उन्हें भी मिली। इमरान अहमद नयाजी साहब ने 176 वोट हासिल किए। अल्ताफ हुसैन और इमरान खान में एक बड़ी सिमिलरिटी यह थी कि उन्होंने मुल्क में

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Speaker A

स्टेटस को के खिलाफ बगावत की और लोग उनकी तरफ खींचे चले आए। दोनों में एक और चीज भी मिलती जुलती थी वो यह कि दोनों ही मौरूसी सियासत के खिलाफ थे [संगीत] और सिर्फ जबानी दावों से नहीं दोनों ने प्रैक्टिकली

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Speaker A

यह साबित भी किया। दोनों ने कभी अपने किसी रिश्तेदार को किसी ओदे पर नहीं बिठाया। अल्ताफ हुसैन तो सिर्फ अपनी पार्टी के कायद बने रहे। कोई सियासी या तंजीमी ओदा हो या फिर काउंसलर, असेंबली, [संगीत] सेनेट, मेयर और गवर्नर की सीट। ना कभी खुद

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Speaker A

इस पर बैठे और ना कभी अपने रिश्तेदार को बिठाया। सिर्फ एक बार कुछ अरसे के लिए उनके ससुर फैसल कबूल मुशीर वज़रआला सिंध रहे। लेकिन उन्हें भी जल्द हटा दिया गया था। सियासत में बिल्कुल यही रवैया इमरान खान का भी था। वो खुद तो वज़र एआज़म के ओदे

03:24

Speaker A

तक पहुंचे। मगर अपने किसी रिश्तेदार को किसी सियासी या सरकारी ओदे के लिए नॉमिनेट नहीं किया। उनकी बहन अलीमा खान भाई की गिरफ्तारी के बाद जद्दोजहद करती नजर आ रही हैं। मगर उनके पास भी पार्टी का कोई ओदा

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Speaker A

नहीं है। एक नजर दोनों पार्टियों के उरूज पर डालते हैं। एमकेएम बनने के फौरन बाद ही मकबूल हो गई थी। सिर्फ 4 साल बाद ही वो इतनी पॉपुलर हो चुकी थी कि 1988 के जनरल इलेक्शन में मुल्क की तीसरी बड़ी सियासी कुत बनकर

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Speaker A

उभरी। 2013 के इलेक्शन में तीसरी बड़ी सियासी कुत बनने का एजाज पीटीआई को भी मिला। यह अलग बात है कि इसे यहां तक पहुंचने में 17 साल लगे। पीटीआई की तीसरी कुत बनने के बाद एमक्यूएम चौथे पायदान पर

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Speaker A

चली गई। कहा जाता है कि इन दोनों जमातों को एक लंबे अरसे तक इस्टैब्लिशमेंट की आशीर्वाद हासिल थी। भुट्टो की फांसी के बाद उस वक्त के आमिर जियाउल हक को एक ऐसी ताकत की जरूरत थी जो सिंध में पीपल्स

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Speaker A

पार्टी का जोर तोड़ सके। उसके लिए उन्होंने मुबईना तौर पर एमकेएम को फ्री हैंड दिया। नतीजा यह निकला कि एमकेएम जल्द ही सिंध के शहरी इलाकों की मकबूल जमात बन गई। जियाउल हक के बाद 2002 में एक और आमिर

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Speaker A

जनरल परवेज मुशरफ ने तो एमकेएम के सर पर बकायदा हाथ रख दिया। मुशर्रफ का दौर तो एमकेएम के लिए गोल्डन पीरियड था। ऐसा ही सीन पीटीआई के साथ भी था। कहा जाता है कि इमरान खान शुरू से ही इस्टैब्लिशमेंट के

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Speaker A

फेवरेट थे। लेकिन 2010 तक हाथ हल्का रखा गया था। 2011 इमरान खान के उूज का साल साबित हुआ। पीटीआई के जलसे अचानक भरे जाने लगे। खुर्शीद महमूद कुसूरी, शाह महमूद कुरैशी, जावेद हाशमी, बाबर अवान, फिरदौस आशिक अवान और ओवैस लारी जैसे नाम पीटीआई

05:04

Speaker A

की कश्ती में सवार होने लगे। लोग साथ आते गए और कारवा बनता गया। बढ़ता गया। अक्टूबर 2011 की लाहौर और दिसंबर 2011 की कराची के अजीमो शान जलसों ने सबको हिला कर रख दिया। आज कराची वालों आपको बहुत मुबारक हो।

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Speaker A

यह सब मुबयना तौर पर ऊपर वालों के आशीर्वाद का रिजल्ट था। अल्ताफ हुसैन और इमरान खान में एक मुशाबत यह भी थी कि दोनों को मीडिया ने खूब कवरेज दी। लेकिन दोनों को मीडिया से शिकायतें भी थी। एमकेएम जब बनी तो शुरू में तो किसी अखबार

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Speaker A

ने इसे लिफ्ट नहीं कराई। लेकिन जब 8 अगस्त 1986 के नश्तर पार्क जलसे में अल्ताफ हुसैन ने अपनी पावर शो की तो अखबारात ने फौरन उन्हें सर आंखों पर बिठा लिया। धड़ाधड़ उनकी जमात की खबरें छपने लगी। फिर

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Speaker A

1987 के बलियाती इलेक्शन में एमपीएम ने कराची और हैदराबाद में क्लीन स्वीप किया और 1988 के आम इंतखाबादत के बाद जब वो मुल्क की तीसरी बड़ी ताकत बनकर उभरी तो उसके बाद तो अल्ताफ हुसैन मीडिया पर छा गए। लेकिन उन्हें फिर भी अखबारात से शिकवा

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Speaker A

रहा कि वो एमकेएम की ठीक से कवरेज नहीं करते। इस इल्जाम पर उन्होंने नववें की दहाई में रोजनामा जंग का बॉयकॉट कर दिया था। इस बॉयकॉट के बाद शहर में जगह-जगह जंग से नफरत, अमन से मोहब्बत की वॉल चौकिंग भी

06:23

Speaker A

की गई थी। दूसरी तरफ सहाफियों की भी एमपीएम की तरफ से जब्र, धौस, धमकी और तशद्दुद की शिकायतें सामने आने लगी। अल्ताफ हुसैन की तरह इमरान खान को भी मीडिया ने शुरू में इग्नोर किया। लेकिन फिर 2011 में वो वक्त भी आया जब न्यूज़

06:38

Speaker A

चैनलों ने भी उनकी मकबूलियत बढ़ाने में साथ दिया और फिर उनकी मकबूलियत को खूब कैश भी किया। न्यूज़ चैनलों पर इमरान खान की शोहरत को प्रोडक्ट की तरह बेचा जाने लगा। लेकिन जिस तरह अल्ताफ हुसैन को मीडिया से

06:51

Speaker A

शिकायतें थी, ठीक उसी तरह के शिकवे इमरान खान को भी मीडिया से थे। 2014 में इमरान खान ने रोजनामा जंग और Jio न्यूज़ का बॉयकॉट कर दिया। इल्जाम लगाया कि जंग और Jio ने 2013 के जनरल इलेक्शन में मुबईना

07:04

Speaker A

धांधली में किरदार अदा किया था। अल्ताफ हुसैन और इमरान खान दोनों एक ही कश्ती के सवार थे। दोनों के पास शोहरत थी। वोट बैंक था। मीडिया की सपोर्ट थी। सर पर ऊपर वालों का हाथ था। ऐसे में अचानक दोनों एक जैसी

07:18

Speaker A

गलती कर बैठे। 22 अगस्त 2016 को कराची प्रेस क्लब के बाहर एमकेएम के कारकुन एतेजाज कर रहे थे। अल्ताफ हुसैन ने इन एतजाज करने वाले कारकुनों से टेलीफोनिक खिताब किया। लेकिन यह खिताब उनके मुस्तकबिल के लिए खुदकुश हमला साबित हुआ। उन्होंने इस खिताब में

07:39

Speaker A

रियासत के खिलाफ ऐसीऐसी बातें की कि इदारे इसका सख्त नोटिस लेने पर मजबूर हो गए। उसकी तफसील आप हमारी इस वीडियो में देख सकते हैं। बहरहाल अल्ताफ हुसैन की इस कंट्रोवर्शियल तकरीर पर सख्त एक्शन हुआ। 90 को सील कर दिया गया। यूनिट और सेक्टर

07:54

Speaker A

ऑफिसों को गैरकानूनी और कब्जा कह कर सफाया कर दिया गया। एमकेएम के दफ्तरों पर ताले लगा दिए गए। कई कारकुनों को गिरफ्तार कर लिया गया। अगले रोज यानी 23 अगस्त को डॉक्टर फारूक सत्तार ने एमकेएमसी अल्ताफ हुसैन को माइनस करने का ऐलान कर दिया।

08:08

Speaker A

अल्ताफ हुसैन साहब से हमारा मुकम्मल कतह ताल्लुक है। यूं एमकेएम तो बच गई लेकिन अल्ताफ हुसैन की सियासत रूल बैक हो गई। अल्ताफ हुसैन एमकेएम के कायद से एकदम बानी एमकेएम बन गए। मीडिया पर उनका नाम लेना या उनकी

08:28

Speaker A

तस्वीर दिखाने तक पे गैर ऐलानिया पाबंदी लग गई। एमकेएम के सारे मरकजी रहनुमाओं ने अल्ताफ हुसैन से दामन छुड़ा लिया। 10 साल हो गए मगर अल्ताफ हुसैन से ताल्लुक रखने वाले किसी भी शख्स को पाकिस्तान में पॉलिटिकल एक्टिविटी की इजाजत नहीं।

08:47

Speaker A

ठीक उसी तरह 9 मई 2023 पीटीआई के ज़वाल का दिन बन गया। उस रोज इमरान खान को अलकादिर ट्रस्ट केस में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तार करके इमरान खान को गाड़ी ले गई है। जी। गिरफ्तारी की खबर फैलते ही पीटीआई के

09:01

Speaker A

कारकुन एतजाज करते हुए सड़कों पर निकल आए। कई शहरों में पुर ततशद्दुद मुजायरे हुए। मुख्तलिफ सरकारी और अस्करी तसीबात पर हमले किए गए। तोड़फोड़ और आग लगाने जैसे वाक्यात हुए। हुकूमत और इदारों ने इसे कौमी सलामती पर हमला करार दिया और उसका

09:16

Speaker A

जिम्मेदार इमरान खान को करार दिया गया। पीटीआई के रहनुमाओं और कारकुनों की बड़ी तादाद में पकड़-धकड़ शुरू हो गई। कई रहनुमाओं ने तो पार्टी से अलग होकर सियासत ही छोड़ दी। इमरान खान भी चेयरमैन पीटीआई से बानी पीटीआई बन गए। अल्ताफ हुसैन और

09:30

Speaker A

इमरान खान दोनों की पार्टियों को तोड़ने की कोशिश भी की गई। यह अलग बात है कि ये कोशिशें नाकाम साबित हुई। हुआ यह कि 1992 के ऑपरेशन से कुछ पहले एमकेएम के अंदर बगावत हुई। एमक्यूएम के अफाक अहमद और आमिर

09:44

Speaker A

खान ने पार्टी से अलग होकर नई पार्टी एमकएम हकीकी की बुनियाद रखी। 92 के ऑपरेशन में इस्टैब्लिशमेंट ने उनके सर पर हाथ रख दिया। यह नया धड़ा एमकेएम को तो नुकसान ना पहुंचा सका लेकिन शहर में उन दोनों के

09:56

Speaker A

मुसल्ला तसादुम शुरू हो गए जिसमें सैकड़ों लोगों की जाने गई। इस मारधाड़ के अलावा एमकेएम हकीकी कोई खास परफॉर्मेंस ना दिखा सकी और आज खुद गुमनामी के अंधेरों में पड़ी है। मार्च 2016 में एक और कोशिश के तौर पर मुस्तफा कमाल और अनीस कायम खानी

10:11

Speaker A

मैदान में उतरे। उन्होंने पीएसपी यानी पाक सरजमीन पार्टी बनाने का ऐलान किया। मगर जल्द ही उसके गुब्बारे से भी हवा निकल गई। आज पीएसपी का वजूद ही नहीं क्योंकि उस पार्टी के लोग दोबारा एमकेएम पाकिस्तान को प्यारे हो चुके हैं। एमकेएम में मजीद

10:26

Speaker A

धड़ेबाजियों की तफसील आप इस वीडियो में देख सकते हैं। खैर, एमकेएम की तरह पीटीआई को भी तोड़ने की कोशिश की गई। 9 मई के वाक्य के एक माह बाद 8 जून 2023 को आईपीपी यानी इस्तेकाम पाकिस्तान पार्टी बनाई गई।

10:39

Speaker A

जहांगीर खान ने नई सियासी जमात बना ली। प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस्तेहकाम पाकिस्तान पार्टी के कयाम का ऐलान कर दिया। इसकी बुनियाद पीटीआई के साबिक रहनुमाओं जहांगीर तरीन और अब्दुल अलीम खान ने रखी। बाद में आमिर महमूद कयानी, इमरान इस्माइल, फिरदौस

10:56

Speaker A

आशिक अवान और ऑन चौधरी जैसे बड़े नाम भी शामिल हो गए। उस वक्त सियासी हलकों का ख्याल था कि पीटीआई से अलग होने वाले इलेक्टेबल्स को एक नए प्लेटफार्म पर जमा किया जा रहा है ताकि एक नई सियासी कुत बन

11:08

Speaker A

सके। लेकिन आईपीबी रहनुमाओं का कहना था कि नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं। हम तो बस मुल्क में माशी हिस्से काम और सियासी एतदाल के लिए आए हैं। 2024 के इलेक्शन में आईपीपी ने कौमी असेंबली की सीटों के लिए

11:21

Speaker A

दो दर्जन से ज़ायद उम्मीदवार मैदान में उतारे। जिनमें से पार्टी सदर अब्दुल अलीम खान समेत तीन उम्मीदवारों के सिवा कोई भी जीत ना सका। जहांगीर तरीन तक को शिकस्त हो गई। और वो इस शिकस्त से इतने बदिल हो गए

11:33

Speaker A

कि पार्टी तो क्या सियासत को भी हमेशा के लिए टाटा बाय-बाय कर दिया। अल्ताफ हुसैन और इमरान खान दोनों ने इस्टैब्लिशमेंट से टक्कर ली और दोनों का अंजाम भी एक जैसा हुआ। अल्ताफ हुसैन पिछले 34 साल से लंदन में खुद साख्ता जिला वतनी

11:51

Speaker A

काट रहे हैं। वो शख्स जो कभी किंग मेकर कहलाता था। वो जिस पार्टी की हिमायत कर दे उसका बंदा वजीर आजम बन जाता था। आज उसका पाकिस्तान की सियासत से कोई लेना देना नहीं रहा। वो शख्स जिसके इर्द-गिर्द जान

12:05

Speaker A

न्योछावर करने वालों का हुजूम लगा रहता था। आज बिल्कुल अलग-थलग तनहाई में जिंदगी गुजार रहा है। ऐसा ही कुछ अंजाम इमरान खान का भी हुआ। तकरीबन 3 साल से वह जेल की सलाखों के पीछे हैं। अपने बच्चों तक से

12:18

Speaker A

फोन पर बात करने के लिए इजाजत के मोहताज हैं। [संगीत] ऐसा नहीं है कि अल्ताफ हुसैन और इमरान खान की सारी बातें एक जैसी हैं। नहीं। बहुत कुछ यक्सा होने के बावजूद बहुत कुछ डिफरेंट भी है। बिल्कुल अपोजिट। मसलन

12:37

Speaker A

एमकेएम की जब 18 मार्च 1984 को बुनियाद रखी गई तब अल्ताफ हुसैन की उम्र सिर्फ 31 साल थी। जबकि 25 अप्रैल 1996 को पीटीआई के कयाम के वक्त इमरान खान 44 साल के थे। अल्ताफ हुसैन ने जब सियासत में कदम रखा तब

12:51

Speaker A

वह पब्लिक फिगर नहीं थे। उनका कोई पॉलिटिकल बैकग्राउंड नहीं था। जबकि इमरान खान सियासी मैदान में उतरे तो वह एक सेलिब्रिटी थे। उनके पीछे [संगीत] इंटरनेशनल क्रिकेट का 20 साल का भरपूर करियर और उसके बाद 4 साल की कैंसर अस्पताल

13:07

Speaker A

के लिए चंदा मुहिम थी जिसने उन्हें मुल्क में ही नहीं इंटरनेशनलली भी पॉपुलर बना दिया था। इसी तरह एमकेएम जब 1988 में पाकिस्तान की तीसरी बड़ी सियासी जमात बनी तब अल्ताफ हुसैन उम्र के 35वें साल में थे। इमरान खान ने जब 2013 में पीटीआई को

13:22

Speaker A

तीसरी बड़ी जमात बनाया तब तक वो 61 बरस के हो चुके थे। अच्छा, दोनों पार्टियां मुल्क की तीसरी बड़ी सियासी कुत जरूर बनी। मगर यहां एक फर्क था। एमकेएम ने यह एजाज सिर्फ कराची, हैदराबाद और सिंध के महाजिराबादियों की बुनियाद पर हासिल किया।

13:36

Speaker A

जबकि पीटीआई मुल्क भर में अपनी मकबूलियत के झंडे गाड़ कर तीसरी बड़ी सियासी कुत बनी थी। और फिर बाद में तो सबसे बड़ी सियासी पार्टी भी बनी। अल्ताफ हुसैन की एमकेएम और इमरान खान की पीटीआई में एक फर्क यह भी है कि एमकेएम में आमतौर पर नए

13:51

Speaker A

चेहरे होते थे। वो भी मिडिल क्लास से ताल्लुक रखने वाले। इलेक्शन में भी ऐसे ही लोगों को खड़ा किया जाता था। उसके बिल्कुल उलट इमरान खान की पीटीआई तब्दीली के नारे के साथ जरूर आई थी। मगर उसने पीपल्स

14:03

Speaker A

पार्टी, नून लीग, काफ लीग, जेयूआई और एमकेएम से निकले या निकाले गए लोगों को अपनी पार्टी में शामिल किया। एमकेएम गरीब और मुतवस्स तबके को एवानों में भेजती थी। लेकिन पीटीआई में मालदारों की अहमियत है। जैसे कि जहांगीर तरीन और अलीम खान वगैरह।

14:17

Speaker A

अल्ताफ हुसैन और इमरान खान में एक बड़ा फर्क आज भी है। अल्ताफ हुसैन भले 1992 से लंदन में जिला वतन है लेकिन आजाद हैं। अपनी मर्जी से घूम फिर सकते हैं। जिससे चाहे मिल सकते हैं। उसके बरक्स इमरान खान

14:31

Speaker A

जेल की चार दीवारियों में हैं। अपनी मर्जी से सूरज की रोशनी तक नहीं देख सकते। अपनी मर्जी से दोस्तों, रिश्तेदारों यहां तक कि अपने वकीलों तक से नहीं मिल सकते। अब बात करते हैं अल्ताफ हुसैन और इमरान खान के ताल्लुकात की। वो ताल्लुकात जो आज

14:53

Speaker A

तक ऊपर नीचे हो रहे हैं। 17 दिसंबर 1996 को इमरान खान ने एमकेएम के मरकज 90 का दौरा किया और वहां अलताफ हुसैन के भाई और भतीजे के कत्ल पर ताज़ियत दी। इस मौके पर इमरान खान ने अल्ताफ हुसैन को सच्चा

15:06

Speaker A

मोहब्बे वतन करार दिया। लेकिन फिर यही इमरान खान थे जिन्होंने 12 मई 2007 के वाक्यात के बाद अपनी तोपों का रुख अल्ताफ हुसैन की तरफ कर लिया और बगल में मुबईना सबूतों की फाइलें दबाए लंदन पहुंच गए ताकि

15:20

Speaker A

वहां उनके खिलाफ मुकदमा दायर करके उन्हें लंदन से पाकिस्तान ला सकें। इमरान खान की यह मुहिम पूरी तरह नाकाम हुई। लेकिन इस हरकत पर एमकेएम वालों की इमरान खान से हट गई और उन्होंने उनके कराची में दाखिले पर

15:33

Speaker A

गैर ऐलानिया पाबंदी लगा दी। शहर भर में उनके खिलाफ वॉल चॉकिंग हुई। उसके बाद इमरान खान ने अपनी तवज्जो अलताफ हुसैन से हटा ली और अपनी पार्टी को आगे बढ़ाने पर मशरूफ हो गए। यहां तक कि 2011 में इमरान

15:45

Speaker A

खान ने कराची में एक बड़ा जलसा किया। तो उसमें अलताफ हुसैन के खिलाफ एक लफज़ तक नहीं कहा। एमकेएम ने भी यह बात नोट की और जवाब में कामयाब जलसे पर इमरान खान को मुबारकबाद दी। लेकिन फिर वक्त ने करवट ली

15:58

Speaker A

और इमरान खान ने अल्ताफ हुसैन को दहशतगर्द कहना शुरू कर दिया। हमारा सबसे बड़ा दहशत गर्द जिसने हजारों लोगों को कत्ल करवाया है वो अल्ताफ हुसैन लंदन में बैठा है। अल्ताफ हुसैन की तरफ से भी टिका कर जवाब

16:09

Speaker A

आया। गौर से सुन लीजिए सबसे बड़ा दहशतगर्द इमरान खान है। और ये जो बार-बार मुझे कहता रहता है दहशतगर्द दहशतगर्द। इसको दरअसल मेरे फलसफे मेरे नजरिए से दहशत है। इमरान खान ने अल्ताफ हुसैन की गैर संजीदा बातों पर भी तनकीद की। मैं तो कहता हूं कि

16:30

Speaker A

अल्ताफ हुसैन को किसी इंडियन फिल्म रोल दे दे। कोई वुड विलन का रोल दे दें। अब हमारे से आजाद करवाएं इसको क्योंकि ये एक वहां बैठ के तकरीरें कर रहा है दो-दो घंटे कोई किसी को समझ आ रही है। कभी कोई बातें कर

16:42

Speaker A

रहा है। कभी गाने गा रहा है। उसका जवाब भी अल्ताफ हुसैन ने इसी मज़ाई अंदाज में दिया। अब मैं ये पूछता हूं। तुम घड़ी घड़ी [चीखने की आवाज़] अल्ताफ हुसैन का बड़े जोश हो गौच से हर जगह नाम

16:54

Speaker A

[चीखने की आवाज़] लेते हो। कहीं ऐसा ना हो कि बताओ क्या हो जाए। बोलो कैसा लगा? लगा इस बयानबाजी से यह हुआ कि दोनों पार्टियों में दूरियां बढ़ती चली गई। इमरान खान वज़र आजम नहीं रहे। मैं अपने ओदे से इस्तीफा देता हूं।

17:13

Speaker A

मुस्तफी होने का ऐलान कर रहे हैं। लेकिन जब 2022 में इमरान खान को तहरीक अदम एतमाद के नतीजे में हटा दिया गया और पीटीआई पर बुरा वक्त आया तो हैरतंगेज तौर पर अल्ताफ हुसैन ने उनके बारे में फिकरमंदी जाहिर की।

17:26

Speaker A

मैं इमरान खान की तरफ से भी फिकरमंद हूं के अल्लाह उनको अजबान में रखे। सिर्फ यही नहीं उन्होंने इमरान खान के विज़न की भी तारीफ की। मेरे लिए उन्होंने कभी अच्छे अल्फाज़ इस्तेमाल नहीं किए अपनी तकारीर में। लेकिन

17:41

Speaker A

इमरान खान साहब ने एक काम किया है कि उन्होंने बैनुल अकवामी सुपर ताकतों का जो पाकिस्तान पर एक हाकिमियत की तरह से हुक्मरानी है उसको उन्होंने ललकारा है और यह बड़ी जुर्रत और हिम्मत की बात है। लेकिन इसके बावजूद इमरान खान का या

18:04

Speaker A

तहरीकसाफ के किसी रहनुमा का अल्ताफ हुसैन की हिमायत में ऐसा कोई बयान अब तक सामने नहीं आया। बहरहाल अल्ताफ हुसैन और इमरान खान की सियासी जिंदगी को एक दूसरे के सामने रखें तो यूं लगता है कि बहुत सी

18:16

Speaker A

चीजें एक जैसी हैं। एक ने अपनी पतंग खुद ही काट दी तो दूसरे ने अपना बल्ला खुद ही अपनी विकेट पर दे मारा। दोनों मैदान से बाहर हैं। एक लंदन में तनहाइयों की जिंदगी जी रहा है तो दूसरा अडियाला जेल में बैठा

18:27

Speaker A

अपने दिन गुजार रहा है। आगे क्या होगा? कोई नहीं जानता। वैसे आपका क्या ख्याल है?

18:32

Speaker A

क्या इमरान खान और अल्ताफ हुसैन दोबारा मुल्की सियासत में कोई किरदार अदा कर सकेंगे? हमें कमेंट करके जरूर बताइए। [संगीत]

Topics: इमरान खान अल्ताफ हुसैन एमकेएम पीटीआई पाकिस्तान राजनीति मीडिया कवरेज राजनीतिक उतार-चढ़ाव सत्ता के खिलाफ बगावत कराची राजनीति पारिवारिक राजनीति


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