**The End of Dubai? How Saudi Arabia is Stealing the Crown | Saudi Arabia vs UAE | Full Documentary — Transcript & Summary | SozAI**
Source: https://sozai.app/transcript/end-dubai-saudi-arabia-stealing-crown/

सऊदी अरब और यूएई के बीच राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक टकराव की कहानी, जो मिडिल ईस्ट की ताकत का नया समीकरण बना रहा है।

## Key Takeaways

- सऊदी अरब और यूएई का गठबंधन अब टूट चुका है और दोनों क्षेत्रीय नेतृत्व के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।
- मोहम्मद बिन सलमान ने अपनी विदेश नीति में स्वतंत्रता और सऊदी प्रभुत्व को प्राथमिकता दी है।
- यूएई ने यमन और क़तर मामलों में सऊदी से अलग रणनीतियाँ अपनाई हैं।
- दुबई का मिडिल ईस्ट का वित्तीय केंद्र के रूप में स्थान सऊदी अरब के नए आर्थिक लक्ष्यों के लिए चुनौती बन गया है।
- मिडिल ईस्ट की राजनीतिक स्थिरता पर दोनों देशों के बीच बढ़ती टकराव का गहरा प्रभाव पड़ रहा है।

## What the video covers

- सऊदी अरब और यूएई के बीच दोस्ती से प्रतिस्पर्धा में बदलते रिश्तों का इतिहास।
- 1971 में यूएई की आजादी के बाद दोनों देशों के बीच गठबंधन और सहयोग।
- ईरान की बढ़ती ताकत के खिलाफ दोनों देशों का एकजुट होना।
- अरब स्प्रिंग के बाद राजनीतिक बदलाव और सियासी इस्लाम के खिलाफ साझा नीति।
- मोहम्मद बिन सलमान और मोहम्मद बिन जाहिद के बीच मेंटर-शागिर्द से प्रतिस्पर्धा तक का सफर।
- यमन युद्ध में दोनों देशों के अलग-अलग हित और रणनीतियाँ।
- 2017 में क़तर संकट में दोनों देशों की अलग-अलग सोच।
- 2021 में अल उला समझौते के बाद रिश्तों में दरार और सऊदी अरब की स्वतंत्र विदेश नीति।
- यूएई और सऊदी अरब के बीच आर्थिक और राजनीतिक टकराव, खासकर दुबई के वित्तीय हब के खिलाफ सऊदी कदम।
- मिडिल ईस्ट में शक्ति संतुलन और क्षेत्रीय नेतृत्व के लिए दोनों देशों की जंग।

## Chapters

1. 00:00 सऊदी अरब और यूएई के बीच प्रारंभिक रिश्ते और नेतृत्व
2. 00:55 मिडिल ईस्ट में सऊदी-यूएई दोस्ती और ईरान का प्रभाव
3. 01:57 यूएई की स्वतंत्रता और सऊदी अरब की भूमिका
4. 02:54 गल्फ कॉरपोरेशन काउंसिल और क्षेत्रीय सहयोग
5. 03:54 अरब स्प्रिंग और राजनीतिक बदलाव
6. 04:54 मोहम्मद बिन सलमान और मोहम्मद बिन जाहिद का संबंध
7. 05:49 यमन युद्ध में सऊदी-यूएई गठबंधन और विभाजन
8. 06:40 क़तर संकट और सऊदी-यूएई के मतभेद
9. 07:16 अल उला समझौता और रिश्तों में दरार
10. 07:59 आर्थिक और राजनीतिक टकराव: दुबई बनाम रियाद

Answers

## Questions about this video

सऊदी अरब और यूएई के बीच विवाद की मुख्य वजह क्या है?

मुख्य वजह दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय नेतृत्व और आर्थिक प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा है, जिसमें यमन युद्ध, क़तर संकट और विदेश नीति के मतभेद शामिल हैं।

मोहम्मद बिन सलमान और मोहम्मद बिन जाहिद का रिश्ता कैसे बदला?

शुरुआत में मेंटर-शागिर्द का रिश्ता था, लेकिन जैसे-जैसे मोहम्मद बिन सलमान की ताकत बढ़ी, दोनों के बीच राजनीतिक और रणनीतिक मतभेद उभरे।

अल उला समझौते का सऊदी-यूएई रिश्तों पर क्या प्रभाव पड़ा?

अल उला समझौते में सऊदी अरब ने क़तर के साथ संबंध बहाल किए बिना यूएई को शामिल नहीं किया, जिससे यूएई में भरोसा टूट गया और दोनों देशों के बीच दरार बढ़ी।

## Full Transcript — Download SRT & Markdown

00:00

Speaker A

यह कहानी है दो लीडरों की। एक तजुर्बेकार खिलाड़ी और एक नौजवान क्राउन प्रिंस। एक वक्त था जब मोहम्मद बिन जाहिद को रीजन का सबसे शातिर दिमाग समझा जाता था और मोहम्मद बिन सलमान को उनका शागिर्द। मगर शागिर्द हमेशा शागिर्द नहीं रहता। कभी ना

00:18

Speaker A

कभी वो खुद भी उस्ताद बनना चाहता है। फिर शुरू होता है बड़ा मुकाबला। ऐसा ही हुआ है सऊदी अरब और यूएई के बीच। जहां दो ताकतवर अफराद में रीजन [संगीत] को लीड करने और इकोनॉमिक पावर बढ़ाने की जंग हो रही है।

00:31

Speaker A

यह जंग टैंकों और मिसाइलों से नहीं लड़ी जा रही ना उसमें बकायदा ऐलान जंग हुआ है। मगर फिर भी यह जंग है ऑयल प्रोडक्शन में, इंटरनेशनल ट्रेड में और डिप्लोमेटिक फील्ड में। मगर इस खामोश जंग की चिंगारी कहां से

00:43

Speaker A

उठी? दो दोस्त आपस में दुश्मन कैसे बन गए? इंकलाब पर आज हम इसी टॉपिक पर बात करेंगे। आपसे रिक्वेस्ट है कि हमारा चैनल अगर अभी तक आपने सब्सक्राइब नहीं किया हुआ तो इसे सब्सक्राइब जरूर कर लें और बेल आइकॉन भी

00:55

Speaker A

जरूर दबा दें। तो आइए मिडिल ईस्ट चलते हैं। [संगीत] एक जमाना था जब सऊदी अरब और यूएई की दोस्ती को मिडिल ईस्ट में स्टेबिलिटी का सिंबल समझा जाता था। ईरान की बढ़ती हुई ताकत और इन्फ्लुएंस के मुकाबले में यह

01:12

Speaker A

दोनों रियासतें एक मजबूत दीवार समझी जाती थी। इसीलिए उन्हें वाशिंगटन और यूरोपी मुल्कों की आशीर्वाद भी हासिल थी। पूरा वेस्ट ईरान के मुकाबले में सऊदी यूएई अलायंस को सपोर्ट करता था। मगर आज ही अलायंस यह इत्तहाद तारीख बन चुका है और

01:27

Speaker A

उसकी जंग एक ऐसे मुकाबले ने ले ली है जिसमें दोनों मुल्क एक ही मैदान में है मगर अब शाना बशाना नहीं बल्कि एक दूसरे के मद्दे मुकाबिल है। मिडिल ईस्ट की कहानी में आने वाले इस ट्विस्ट को समझने के लिए

01:40

Speaker A

हमें उन मुल्कों के लीडरों को भी समझना होगा क्योंकि जदीद मिडिल ईस्ट में फैसले इदारे कम और अफराद ज्यादा करते हैं। सऊदी वली अहद मोहम्मद बिन सलमान और इमाराती सदर शेख मोहम्मद बिन जायद। यह दो नाम दरअसल इस पूरे पॉलिटिकल एवोल्यूशन की

01:57

Speaker A

कुंजी हैं। 2 दिसंबर 1971 को यूएई को ब्रिटेन से मुकम्मल आजादी मिली। उस वक्त सऊदी अरब पूरे रीजन का अनडिस्प्यूटेड लीडर था। तेल की दौलत से मालामाल। शाह फैसल बिन अब्दुल अजीज की लीडरशिप में पूरे अरब वर्ल्ड के लिए रोल मॉडल। इमारात उस वक्त

02:12

Speaker A

एक छोटी मगर उभरती हुई रियासत थी। जिसे अपनी डेवलपमेंट और स्टेबिलिटी के लिए सऊदी अरब की पॉलिटिकल सपोर्ट चाहिए थी। दोनों मुल्कों के दरमियान 1974 में जद्दा एग्रीमेंट हुआ। सऊदी अरब ने यूएई को आजाद मुल्क माना। कुछ लोग कुछ दो के तहत बॉर्डर

02:27

Speaker A

के ज्यादातर झगड़े निपटा लिए गए। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था। 1981 में गल्फ कॉरपोरेशन काउंसिल बनाई गई जो दोनों मुल्कों को और करीब ले आई। इस काउंसिल का मकसद डिफेंस, इकोनॉमिक्स और दूसरे शोबों में ताल्लुकात को बढ़ाना था। 1979 में

02:42

Speaker A

ईरान में आने वाले इस्लामिक इंकलाब ने पूरे गल्फ रीजन को हिला कर रख दिया था। ईरान के खौफ ने सऊदी अरब और इमारत के रिलेशन को मजबूत किया। यह क्लोजनेस गल्फ की जंग अमेकी फौज की रीजन में तायनाती और

02:54

Speaker A

फिर नाइन 111 के बाद के हालात में भी बरकरार रही। सऊदी अरब और यूएई में छोटे-मोटे इख्तलाफात जरूर थे। मगर ऐसे जैसे दो भाइयों में होते हैं। जब मिल बैठते हैं तो सब गिले शिकवे दूर हो जाते हैं और लीडर दोबारा गले मिल जाते हैं। असल

03:07

Speaker A

तब्दीली 2010 के बाद आई। जब अरब स्प्रिंग के मूवमेंट [संगीत] ने अरब दुनिया में ताकत के पुराने स्ट्रक्चर को चैलेंज किया। ट्यूनिस, मिस्र, लीबिया, शाम और यमन में आवामी बगावतों ने बादशाहतों और फौजी हुकूमतों दोनों को खौफजदा कर दिया। इस

03:23

Speaker A

मरहले पर सऊदी अरब और यूएई एक पॉलिसी पर मुत्तफिक हुए। सियासी इस्लाम, अखवानुल मुस्लिमून और आवामी सियासत को हर कीमत पर रोकना होगा। यही वो दौर था जब यूएई के शेख मोहम्मद बिन जाहिद का किरदार गैर मामूली अहमियत इख्तियार कर गया। वह बरसों से

03:39

Speaker A

इमारात की असल ताकत समझे जाते थे। अगरचा बाजाप्ता तौर पर सदर नहीं थे। मगर उनके पास ना सिर्फ मिलिट्री एक्सपीरियंस था बल्कि वेस्टर्न वर्ल्ड में गहरे कनेक्शन भी थे। वाशिंगटन में उन्हें एक जिम्मेदार, समझदार और भरोसे के काबिल पार्टनर समझा

03:54

Speaker A

जाता था। 2015 में शाह सलमान सऊदी अरब के बादशाह बने और मोहम्मद बिन सलमान तेजी से पावर सेंटर [संगीत] में नुमाया हुए। शेख मोहम्मद बिन जायद इसी वक्त समझ गए कि यह नौजवान रीजन का लीडर साबित हो सकता है। इस

04:06

Speaker A

वक्त मोहम्मद बिन सलमान कम उम्र ना तजुर्बेकार थे और वेस्ट में उन्हें कोई पहचानता नहीं था। शेख मोहम्मद बिन ज़द और यूएई की दूसरी लीडरशिप ने ना सिर्फ मोहम्मद बिन सलमान को पॉलिटिकल गाइडेंस दी बल्कि वेस्टर्न मीडिया और पॉलिसी मेकरों

04:22

Speaker A

में उनकी इमेज बिल्डिंग में भी अहम किरदार अदा किया। यही वजह है कि बहुत से एनालिस्ट मोहम्मद बिन ज़हिद के और मोहम्मद बिन सलमान के ताल्लुक को मेंटोर और शागिर्द का रिश्ता [संगीत] करार देते थे। मोहम्मद बिन ज़द वाशिंगटन में मोहम्मद बिन सलमान के

04:35

Speaker A

सबसे बड़े सिफारिशी बन गए। यमन की जंग हो या क़तर का बॉयकॉट दोनों लीडर एक ही सफ में खड़े दिखाई देते थे। उस वक्त सऊदी यूएई अलायंस अपनी मजबूत तरीन हालत में था। यमन की जंग इस अलायंस की सबसे क्लियर

04:49

Speaker A

मिसाल थी। मार्च 2015 में जब सऊदी अरब ने यमन में फौजी कार्रवाइयों का ऐलान किया तो यूएई ना सिर्फ इस अलायंस में शामिल हुआ बल्कि उसने जमीनी और समंदरी महाज पर अहम किरदार अदा किया। शुरू में दोनों का मकसद

05:01

Speaker A

एक था होसियों को पीछे धकेलना और यमन में अपनी पसंद की हुकूमत बहाल करना। लेकिन जैसे-जैसे जंग लंबी होती गई, दोनों मुल्कों की प्रेफरेंसेस बदलने लगी। सऊदी अरब के बॉर्डर यमन से डायरेक्ट मिले हुए हैं। इसीलिए मामला उनकी सलामती और खुद

05:15

Speaker A

मुख्तारी का भी मसला था। वह किसी सूरत में एक टूटा हुआ यमन नहीं चाहता था क्योंकि उसका मतलब होता कि उसके सदर्न बॉर्डर पर मुस्तकिल अनस्टेबिलिटी रहती। उधर यूएई की दिलचस्पी जूबी यमन की पोर्ट्स, समंदरी रास्तों और स्ट्रेटेजिक जगहों में बढ़ती

05:28

Speaker A

चली गई। यूएई ने सदर्न ट्रांजैक्शनल कंसिल जैसे ग्रुपों को सपोर्ट करना शुरू कर दिया जो यमन को तोड़ना चाहते थे। यह वो पहला मोड़ था जहां से सऊदी अरब और यूएई के रास्ते अलग होना शुरू हुए और दोनों

05:40

Speaker A

मुख्तलिफ समतों में चलने लगे। अगरचा उस वक्त तक ये डिफरेंसेस खुलकर सामने नहीं आए थे। मगर बीज बो दिया गया था। 2017 में सऊदी अरब यूएई अलायंस का एक और इम्तिहान सामने आया। सऊदी अरब, यूएई, मिस्र और बहरेन ने क़तर पर दहशतगर्दी की सपोर्ट और

05:56

Speaker A

ईरान से करीबी ताल्लुकात कायम करने का इल्जाम लगाया और क़तर का सोशल बॉयकॉट कर दिया। इस पर डिप्लोमेटिक और इकोनॉमिक पाबंदियां लगा दी गई। मोहम्मद बिन सलमान और मोहम्मद बिन जाद इस फैसले में एक साथ नजर आए। मगर अंदरूनी तौर पर सोच का फर्क

06:10

Speaker A

था। इमारात क़तर को मुकम्मल तौर पर कुचलना चाहता था। जबकि सऊदी अरब इसे दबाव में रखकर बातें मनवाना चाहता था। यही फर्क जनवरी 2021 में अल उला मुयदे के जरिए खुलकर सामने आ गया। सऊदी अरब ने इस एग्रीमेंट के जरिए अचानक क़तर के साथ

06:24

Speaker A

रिलेशन बहाल करने का ऐलान किया। यह फैसला मोहम्मद बिन सलमान ने मोहम्मद बिन जाहिद को एतमाद में लिए बगैर किया था। भाइयों के बीच दरार बढ़ गई। अबू धाबी में इसे ना सिर्फ एक सिफारती झटका बल्कि भरोसा तोड़ने

06:36

Speaker A

वाले अमल के तौर पर देखा गया। यही वो लम्हा था जहां मोहम्मद बिन सलमान ने पहली बार यह क्लियर कर दिया कि अब वह अपनी फॉरेन पॉलिसी में किसी के साए में नहीं रहना चाहते। वो अपने फैसले खुद करेंगे। अल

06:46

Speaker A

उला मोयदे के बाद सऊदी अरब ने एक इंडिपेंडेंट और सोवरन फॉरेन पॉलिसी अपनाना शुरू की। ईरान के साथ बातचीत, तुर्की से ताल्लुकात की बहाली और रीजन में नए बैलेंस ऑफ पावर की कोशिश उसका हिस्सा थी। दूसरी तरफ अमरात अपनी हार्ड लाइनर पॉलिसी पर

07:01

Speaker A

कायम रहा। सोच और अप्रोच का यही फर्क वक्त के साथ मोहम्मद बिन सलमान और मोहम्मद बिन जाहिद में [संगीत] जाती दूरियां बढ़ाने लगा। 2021 के बाद मोहम्मद बिन सलमान ने सऊदी अरब के इंटरनल मामलात में अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी। रॉयल फैमिली के अंदर उनकी

07:16

Speaker A

मुखालफत करने वाला कोई नहीं था और वह खुद को पूरे रीजन का अनडिस्प्यूटेड लीडर समझने लगे थे। इसी दौर में उन्होंने खुद को यूएई के इन्फ्लुएंस से निकालने का अमल तेज कर दिया। यही अमल आगे चलकर ओपन कंफ्रेशन यानी

07:28

Speaker A

खुले झगड़े की बुनियाद बना। अलला एग्रीमेंट बजाहिर गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल के अंदर दरारें भरने के लिए किया गया था। मगर हकीकत में इस एग्रीमेंट ने सऊदी अरब और यूएई के दरमियान ताल्लुकात की खराबी को एक्सट्रीम लेवल पर पहुंचा दिया था। कतर के

07:41

Speaker A

साथ सऊदी अरब के रिलेशन दोबारा कायम होने से उनका कॉमन एनिमी खत्म हो गया था और दोनों मुल्क पहली बार एक दूसरे के सामने खड़े हो चुके थे। अब अलायंस के लिए रीजन में कोई फरी थ्रेट [संगीत] नहीं था।

07:51

Speaker A

इसीलिए दबे हुए इख्तलाफात पूरी शिद्दत के साथ उभरने लगे। अल उला के बाद यमन में भी खुलकर कंफ्रेशन होने लगा। अगरचे दोनों मुालिक ने फॉर्मली एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी नहीं की। मगर ग्राउंड रियलिटी [संगीत] यह थी कि सऊदी अरब और यूएई अब यमन

08:05

Speaker A

में मुख्तलिफ जंगे लड़ रहे थे। सऊदी अरब यमन को यूनाइटेड रखना चाहता था। जबकि यूएई सदरन यमन में अपने इन्फ्लुएंस को मुस्तकिल बनाना चाहता था। वो अदन अल मुकल्ला और अरबियन सी के साहिली इलाकों में अपने सपोर्टेड ग्रुप की हुकूमत देखना चाहता था।

08:19

Speaker A

2021 में मुकल्ला और अदन के आसपास होने वाली झड़पों में सऊदी सपोर्टेड ग्रुप और यूएई की सपोर्ट वाली सदर्न ट्रांजिशन कंसिल के जंगजू आमने-सामने आए। अगरच सऊदी अरब और यूएई की फौज में डायरेक्ट लड़ाई नहीं हुई मग

08:35

Speaker A

इस जंग में अब दोनों मुल्क अलाइड नहीं रहे। यही वो मोमेंट था जब मोहम्मद बिन सलमान ने ज्यादा शिद्दत से महसूस किया कि यूएई अब रीजन में एक अल्टरनेट पावर बन चुका है और अपने इंटरेस्ट के लिए सऊदी अरब

08:46

Speaker A

के खिलाफ भी खड़ा हो सकता है। इसी दौरान ओपेक प्लस ने ऑयल प्रोडक्शन के मामले पर भी इख्तलाफात खुलकर सामने आ गए। जुलाई 2021 में इमारात ने ओपेक के प्रोडक्शन कोटे पर ऐतराज उठाया और सऊदी पॉलिसी की मुखालफत की। यह एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी बात थी

09:01

Speaker A

क्योंकि गल्फ के मुल्क आमतौर पर ऑयल प्रोडक्शन के मामले में एक जबान होते हैं ताकि उनकी मोनोपोली बनी रहे। मगर अब यूएई अलग राग अलाप रहा था। उसका कहना था कि हमारी प्रोडक्शन कैपेसिटी बढ़ गई है। इसीलिए पुराना कोटा लागू करना नाइंसाफी

09:16

Speaker A

है। सऊदी अरब ने कहा यूएई ने कोटे की पाबंदी तोड़ी तो यह कलेक्टिव डिसिप्लिन के खिलाफ होगा। जाहिर है असल इख्तलाफ तेल पर नहीं था। यह तो असल में यूएई की बगावत का ऐलान था कि वह अब सऊदी लीडरशिप को तस्लीम

09:29

Speaker A

करने पर तैयार नहीं। शायद यही वो लम्हा था जब दोनों मुल्कों के रिलेशन में बचा कुचा भरोसा भी खत्म हो गया। मई 2022 में मोहम्मद बिन जाहिद यूएई के प्रेसिडेंट बन गए। दोनों मुल्कों के फासले कम होने के

09:42

Speaker A

बजाय बढ़ गए। दिसंबर 2022 में रियाज में सफियों के साथ इनफॉर्मल मीटिंग में मोहम्मद बिन सलमान ने कहा था कि इमारात ने सऊदी अरब की पीठ में छुरा घोंपा है। अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जनरल ने इसे हेडलाइन के तौर पर छापा। इसके बाद से

09:55

Speaker A

दोनों लीडरों के दरमियान डायरेक्ट राब्ता खत्म हो गया और वो एक दूसरे के मुल्कों में होने वाली इंपॉर्टेंट कॉन्फ्रेंसों में भी शरीक नहीं हुए। इकोनॉमिक फ्रंट पर दोनों मुल्कों का तनाव सऊदी अरब के एक और फैसले से भी हुआ था। 2021 में ही सऊदी अरब

10:09

Speaker A

ने ऐलान किया कि 2024 के बाद सिर्फ वही गैर मुल्की कंपनियां सरकारी ठेके हासिल कर सकेंगी [संगीत] जिनके रीजनल हेड क्वार्टर सऊदी अरब में होंगे। यह ऐलान दरअसल दुबई के खिलाफ एक डायरेक्ट चैलेंज था जो 40 साल से मिडिल ईस्ट का फाइनेंसियल हब बना हुआ

10:22

Speaker A

था। हर मल्टीनेशनल कंपनी का रीजनल हेड क्वार्टर दुबई में ही था। यही वजह है कि यूएई में सऊदी अरब के इस फैसले को खुली इकोनमिक वॉर समझा गया। मगर सरकारी लेवल पर डायरेक्ट कोई जवाब नहीं दिया गया। 2025 के

10:35

Speaker A

स्टैट्स बताते हैं कि 600 से ज्यादा इंटरनेशनल कंपनियां दुबई छोड़कर रियाज़ शिफ्ट हो चुकी हैं जो कि इमारती इकॉनमी के लिए एक बड़ा झजका है। यह जंग सिर्फ कंपनियों की मुंतकिली तक लिमिटेड नहीं बल्कि टूरिज्म और एनर्जी के शोबों में भी

10:49

Speaker A

फैल चुकी है। सऊदी अरब के 800 बिलियन के नियम और रेड सी जैसे प्रोजेक्ट यूएई की टूरिज्म इंडस्ट्री के लिए चैलेंज साबित होने जा रहे हैं। असल में मोहम्मद बिन सलमान का विज़न 2030 सिर्फ इकोनॉमिक रिफॉर्म्स का प्रोजेक्ट नहीं बल्कि रीजन

11:04

Speaker A

में बैलेंस ऑफ पावर शिफ्ट करने का प्लान है। वह चाहते हैं कि दुबई की जगह रियाज़ गल्फ रीजन में इकोनॉमिक फाइनेंस और डिप्लोमेटिक हब [संगीत] बने। इस विज़न की राह में सबसे बड़ी रुकावट है यूएई क्योंकि दोनों मुल्कों के गोल टारगेट और इकोनॉमिक

11:18

Speaker A

मॉडल एक ही हैं। यह राइवलरी लॉजिस्टिक्स, एिएशन और बंदरगाहों तक भी फैल चुकी है। सऊदी अरब ने अपनी पोर्ट्स की कैपेसिटी को बढ़ाना शुरू किया। नियोम और जद्दा को इंटरनेशनल ट्रांजिट हब बनाने के मंसूबेब भी सामने आए। जबकि इमारत पहले ही जब अली,

11:31

Speaker A

अबू धाबी और फजेरा के जरिए इंटरनेशनल ट्रेड का अहम खिलाड़ी है। इसीलिए अब ताुन के दरवाजे बंद हो गए और मुकाबले की दौड़ [संगीत] तेज हो गई। डिप्लोमेटिक साइट पर भी दोनों मुालिक के रास्ते अलग हो चुके हैं। सऊदी अरब ने ईरान के साथ डायरेक्ट

11:44

Speaker A

डायलॉग शुरू किए। फिर 2023 में ईरान के साथ डिप्लोमेटिक रिलेशन रिस्टोर भी कर लिया। इमारात ने अगरचा ईरान के साथ तजारत बहुत पहले से जारी रखी थी। मगर इसने ईरान के रीजनल रोल पर कभी नरम रवैया इख्तियार नहीं किया। यहां मोहम्मद बिन सलमान और

11:57

Speaker A

मोहम्मद बिन जाहिद के पर्सनल रिलेशन का किरदार फिर नुमाया हो जाता है। एक वक्त था जब मोहम्मद बिन जाहिद मोहम्मद बिन सलमान के लिए पॉलिटिकल गाइडेंस का जरिया समझे जाते थे। मगर जैसे-जैसे मोहम्मद बिन सलमान की ताकत बढ़ी वैसे-वैसे यह रिलेशन कमजोर

12:12

Speaker A

होता गया। अब मोहम्मद बिन सलमान किसी मेंटोर को कबूल करने के लिए तैयार नहीं थे। वो खुद को ख्ते का ऐसा लीडर साबित करना चाहते थे जो किसी की उंगली पकड़ कर नहीं चलता। जबकि मोहम्मद बिन जायद एक

12:23

Speaker A

तजुर्बकार स्ट्रेटजिस्ट के तौर पर पीछे हटने को तैयार नहीं थे। वो चाहते थे कि मोहम्मद बिन सलमान उनके विज़न के मुताबिक पॉलिसियां बनाए। यह जाती फैसला प्रैक्टिकल मैदान में भी नजर आने लगा। रीजनल क्राइसिस पर दोनों की मुलाकातें कम हो गई। जॉइंट

12:37

Speaker A

डिक्लेरेशन फॉर्मल होते चले गए। उनके करीबी रिलेशन की गर्मजशी दिखाई देना बंद हो गई। साथ ही बैक डोर कांटेक्ट भी खत्म हो गए जो डिप्लोमेटिक रिलेशन में एक अहम टूल होते हैं। इन बदलते हुए रिलेशन का असर सूडान में भी नजर आया। सूडानी क्राइसिस

12:51

Speaker A

में सऊदी अरब और यूएई दोनों ने मुख्तलिफ ग्रुपों को सपोर्ट किया। मगर उनके मकसद एक जैसे नहीं थे। यूएई पर इल्जाम लगता रहा कि वो हमीदती जैसे मलेशिया लीडरों को सपोर्ट कर रहा है। जबकि सऊदी अरब खुद को मेडिएटर

13:02

Speaker A

के तौर पर पेश करता रहा। यह डिफरेंस भी दोनों मुल्कों की राइवलरी का नतीजा था। सऊदी अमराती तनाव में अलियासाद के समंदरी इलाकों पर कॉन्फ्लिक्ट से भी इजाफा हुआ। यूएई ने इस इलाके को महफूज समुंदरी इलाका करार दिया। यानी कोई वहां से तेल नहीं

13:17

Speaker A

निकाल सकता। जबकि सऊदी अरब का कहना था कि 1974 के मुताबिक अली आसाद के चार जजीरे इसकी मलकियत है। सऊदी अरब ने यूएन में इमारात के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई। उधर इमारात का कहना था कि 1974 के एग्रीमेंट

13:30

Speaker A

में अली आसाद के चार जजीरे शामिल नहीं थे। असल में यह इलाका ना सिर्फ स्ट्रेटेजिक लिहाज से अहम है बल्कि यहां तेल और गैस के भी बड़े जखाय हो सकते हैं। अली असाद का कॉन्फ्लिक्ट भी बताता है कि अब दोनों

13:42

Speaker A

मुल्कों की राइवलरी सिर्फ पॉलिटिकल बयानों तक महदूद नहीं बल्कि जमीन और समंदर की मलकियत [संगीत] की बुनियादी सवालों तक फैल चुकी है। जहां दोनों मुल्क अपने नक्शों और सरहदों को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। दोनों मुल्कों के दरमियान टेंशन

13:55

Speaker A

इस वक्त भी हाईएस्ट लेवल पर पहुंच गई थी। जब दिसंबर 2025 में सऊदी फिजाइया ने यमन की बंदरगाह मकल्ला पर डायरेक्ट बमबारी की थी। सऊदी अरब ने इस हमले का रीजन देते हुए क्लेम किया था कि इमारती बंदरगाह फजेरा से

14:07

Speaker A

आने वाले बहरी जहाज यमन के सदर्न ट्रांजिशन काउंसिल को असला फराहम कर रहे थे जो सऊदी अरब के खिलाफ लड़ रही है। सऊदी फॉरेन मिनिस्ट्री ने इसे अपने नेशनल सिक्योरिटी के लिए रेड लाइन करार देते हुए वाज़ कर दिया है कि वो अपने बॉर्डर पर

14:20

Speaker A

इमारती सपोर्टेड मलेशियाओं की कारवाइयां अब मजीद बर्दाश्त नहीं करेगा। इस वाक्य से पहले एक और डेवलपमेंट भी हुई जब सितंबर 2025 में सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ एक हिस्टोरिक डिफेंस डील साइन की। दी स्ट्रेटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट

14:32

Speaker A

कितना अहम है और इसका रीजन पर क्या असर हो सकता है यह आप हमारी इस वीडियो में देख सकते हैं। बहरहाल इस अहम एग्रीमेंट में यूएई को शामिल करने की कोई तजवीज पेश नहीं की गई और दिसंबर के इवेंट के बाद तो यह

14:44

Speaker A

मजीद मुश्किल हो गया है। तो आज की सुरते हाल यह है कि सऊदी अरब और यूएई खुले दुश्मन तो नहीं मगर अब पहले जैसे अलाय भी नहीं रहे। दोनों मुल्कों के रिलेशन ऐसे लेवल पर आ गए हैं जहां हर कदम फूंक-फूंक

14:56

Speaker A

कर उठाया जाता है। दोनों जानते हैं कि डायरेक्ट क्लैश या कंफ्रेशन नुकसानदेह होगा। मगर यह भी हकीकत है कि अब कोई एक दूसरे की सुपरमेसी तस्सीम करने को तैयार नहीं। फ्यूचर आउटलुक और पेचीदा नजर आता है। अगर मोहम्मद बिन सलमान का विज़न कामयाब

15:11

Speaker A

होता है और रियाज़ वाकई दुबई का सब्सीट्यूट बन जाता है तो यह इमारात के लिए एक स्ट्रेटेजिक झजका होगा। दूसरी तरफ अगर यूएई अपनी इकॉनमिक सुपरमेसी बरकरार रखता है तो सऊदी अरब को अपनी स्ट्रेटजी और प्लान बदलने पड़ेंगे। यही वजह है कि कहानी

15:24

Speaker A

अभी खत्म नहीं हुई। दोस्ती से दूरी तक का सफर दरअसल मिडिल ईस्ट में एक नए दौर की शुरुआत है। जहां गल्फ कंट्रीज अब कलेक्टिव आइडेंटिटी से निकलकर इंडिविजुअल पावर हासिल करने की तरफ बढ़ रहे हैं। सऊदी अरब और इमारात इस दौर के एक नए लीडिंग

15:39

Speaker A

कररेक्टर हैं। आप बताएं आपका क्या ख्याल है? कभी दोस्त रहने वाले यह मुल्क दोबारा दोस्ती और भाईचारे की तरफ जाएंगे या उनके दरमियान दूरियां और बढ़ती जाएंगी।

Topics: सऊदी अरब यूएई मोहम्मद बिन सलमान मोहम्मद बिन जाहिद मिडिल ईस्ट यमन युद्ध क़तर संकट अरब स्प्रिंग राजनीतिक टकराव आर्थिक प्रतिस्पर्धा


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