**Dark Truth Of Hero-Honda Split 💔 Reason Behind Hero Honda Partnership Failure | Live Hindi — Transcript & Summary | SozAI**
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हीरो होंडा की साझेदारी की असली वजह और भारत में उनके अलग होने की कहानी। जानिए कैसे हीरो ने होंडा से अलग होकर सफलता हासिल की।

## Key Takeaways

- हीरो होंडा की साझेदारी तकनीकी और बाज़ार की जरूरतों के चलते शुरू हुई थी।
- होंडा पर इंजन की निर्भरता और मार्केट एक्सपैंशन की सीमाओं ने रिश्तों में दरार डाली।
- होंडा ने भारत में अलग कंपनी बनाकर हीरो होंडा के खिलाफ प्रतिस्पर्धा शुरू की।
- हीरो ने इंजन निर्माण में निवेश कर अपनी स्वतंत्रता हासिल की।
- अलग होने के बाद भी हीरो मोटोकॉर्प ने भारतीय और वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत स्थिति बनाई।

## What the video covers

- हीरो होंडा की शुरुआत 1984 में हुई जब हीरो ने होंडा के साथ मिलकर मोटरसाइकिल निर्माण शुरू किया।
- हीरो एक साइकिल निर्माता कंपनी थी जिसने 1956 में स्थापना की और 1986 तक दुनिया की सबसे बड़ी साइकिल निर्माता कंपनी बन गई।
- भारत में मोटरसाइकिल बाजार तेजी से बढ़ रहा था, लेकिन हीरो के पास इंजन तकनीक नहीं थी, इसलिए होंडा से साझेदारी की।
- हीरो बाइक के लिए बॉडी बनाता था और होंडा इंजन सप्लाई करता था, साथ ही दोनों ने एक एनओसी साइन किया था कि वे एक-दूसरे के मुकाबले प्रोडक्ट नहीं लॉन्च करेंगे।
- हीरो होंडा की बाइक भारत में मिडिल और लोअर मिडल क्लास के लिए अफॉर्डेबल और माइलेज में बेहतर थी, जिससे यह बहुत लोकप्रिय हुई।
- जापानी करेंसी के उछाल और स्पेयर पार्ट्स की महंगाई ने हीरो होंडा को प्राइस कंट्रोल में दिक्कतें दीं।
- होंडा ने 1999 में भारत में अपनी अलग कंपनी शुरू कर हीरो होंडा के मुकाबले बाइक लॉन्च की, जिससे दोनों के बीच दरार बढ़ी।
- हीरो ने इंजन निर्माण में निवेश करना शुरू किया ताकि होंडा पर निर्भरता कम हो सके।
- 2010 में हीरो और होंडा की साझेदारी खत्म हुई, होंडा ने अपने शेयर हीरो को बेच दिए और हीरो ने हीरो मोटोकॉर्प के रूप में अपना कारोबार जारी रखा।
- आज हीरो मोटो दुनिया की सबसे बड़ी मोटरसाइकिल निर्माता कंपनियों में से एक है, जो होंडा के बिना भी सफल है।

Answers

## Questions about this video

हीरो होंडा की साझेदारी क्यों खत्म हुई?

हीरो होंडा की साझेदारी इसलिए खत्म हुई क्योंकि होंडा ने भारत में अपनी अलग कंपनी बनाकर हीरो होंडा के मुकाबले बाइक लॉन्च की और दोनों कंपनियों के बीच व्यापारिक मतभेद बढ़ गए।

हीरो होंडा की शुरुआत कैसे हुई थी?

हीरो होंडा की शुरुआत 1984 में हुई जब हीरो ने होंडा के साथ मिलकर मोटरसाइकिल बनाने का समझौता किया, जिसमें हीरो बाइक की बॉडी बनाता था और होंडा इंजन सप्लाई करता था।

हीरो ने होंडा से अलग होकर क्या कदम उठाए?

हीरो ने इंजन निर्माण में भारी निवेश किया ताकि होंडा पर निर्भरता कम हो और 2010 में होंडा के शेयर खरीदकर हीरो मोटोकॉर्प के नाम से अपना कारोबार जारी रखा।

## Full Transcript — Download SRT & Markdown

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Speaker A

कि हीरो होंडा 90s के समय से लेकर आज तक यह नाम हर किसी के जुबान पर छाया रहता है, जो कि हीरो और होंडा के कोलोबरेशन से बनी यह कंपनी दुनिया में सबसे अच्छी टू व्हीलर विकल्प बनाती थी। लेकिन कंपनी प्रॉफिटेबल होने के बाद भी अलग युद्ध और कैसे होंडा ने भारत की कंपनी हीरो के पीठ में छुरा घोंपा, आज के इस वीडियो में हम सबको जानने वाले हैं। असल में हीरो एक साइकिल बनाने वाली कंपनी थी, जिसकी नींव बृजमोहन लाल मुंजाल ने 1956 में रखी थी, और 1975 तक आते-आते यह भारत की सबसे बड़ी साइकिल बनाने वाली कंपनी बन गई। इसके बाद उन्होंने अपनी साइकिल्स को बड़े लेवल पर विदेशों में भी बेचना शुरू कर दिया, और इस तरह साल 1986 आने तक यह कंपनी सिर्फ इंडिया ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की सबसे बड़ी साइकिल बनाने वाली कंपनी में शुमार की जाने लगी। लेकिन उसी दौरान उन्होंने देखा कि फौरन मार्केट में मोटरसाइकिल बिजनस भी काफी तेजी से एक्सटेंड कर रहा है, लेकिन इंडिया में तो लोगों के पास सिर्फ स्कूटर और मोपेड ही ऑप्शन है। इसे क्विज़ गैप को फोल्ड करने के लिए इंडियन मार्केट में मोटरसाइकिल उतारना चाहते थे, लेकिन उस वक्त हीरो के साथ प्रॉब्लम यह थी कि उनके पास इंजन बनाने की टेक्नोलॉजी ही नहीं थी, जिसकी वजह से मोटरसाइकिल बनाना उनके लिए तो मुमकिन ही नहीं था। इसलिए आपने इस प्लान को एक्शन में लाने के लिए उन्होंने किसी विदेशी कंपनी के साथ में कैलीबरेशन करने के बारे में सोचा। अब उस वक्त भारत में लिब्रलाइजेशन भले ही नहीं आया था, लेकिन उस टाइम गवर्नमेंट इंडियन कंपनीज को यह छुट्टी देती थी कि अगर वह चाहे तो किसी भी विदेशी कंपनी के साथ में टाइप करके इंडिया में अपना बिजनेस एक्सप्लेन कर सकते हैं। इसे लिए ब्रिज मोहन लाल ने हीरो के थ्रू दुनिया की सबसे बड़ी मोटरसाइकिल बनाने वाली जापानी कंपनी होंडा के पास में अपना प्रपोजल भेजा। अब क्योंकि उस समय कोई भी विदेशी कंपनी भारत में डाइरैक्टली अपना बिजनस स्टार्ट नहीं कर सकती थी, ऐसे में इस प्रपोजल के जरिए होंडा को इंडियन मार्केट में एंटर करने का एक अच्छा मौका मिल गया। जैसे कि होंडा कंपनी खुद भी नहीं गंवाना चाहता था, इसलिए इन दोनों कंपनियों ने 1984 में एक दूसरे के साथ हाथ मिला लिया। हीरो और होंडा के बीच उस टाइम यह एग्रीमेंट हुआ था कि हीरो बाइक के लिए बॉडी बनाएगा और होंडा उसके लिए इंजन सप्लाई करेगा। इसके अलावा उन्होंने एक एनओसी भी साइन की थी, जिसके अकॉर्डिंग दोनों कंपनीज फ्यूचर में कभी भी एक दूसरे के मुकाबले में अपना कोई प्रोडक्ट लांच नहीं करेंगे। और दोस्तों, दोनों ही कंपनीज इन कंडीशन से सेटिस्फाइड थी, जिसके बाद से यह डील फाइनल हो गई और यहीं से हीरो होंडा की शुरुआत हुई। अब कागजी कार्यवाही पूरी करने के बाद से हीरो होंडा का सबसे पहला प्लांट हरियाणा में बनाया गया, जहां से हीरो और होंडा ने मिलकर तुरंत ही बाइक की मैन्युफैक्चरिंग स्टार्ट कर दी। 1985 में जब उन्होंने अपनी पहली बाइक से जरा इंच की, तो फिर यह बहुत तेजी से पॉपुलर हुई क्योंकि इंडियन मार्केट में एक तो बाइक का कांसेप्ट ही नहीं था और दूसरा इस बाइक का माइलेज बहुत ही कमाल का था। इसके अलावा उन्होंने अपनी बाइक को प्राइस सेगमेंट पर लांच किया था, जो कि हर मिडल क्लास फैमिली के लिए अफॉर्डेबल हुआ करता था। साथ ही उन्होंने अपना मार्केट कैंपेन ज्योति प्रभावी तरीके से तैयार किया था, जहां इनके टैगलाइन थे "एफिडेविट शर्ट फॉर ग्रेट", यानि कि इसमें पेट्रोल फील करके भूल जाइए। इस पाइपलाइन का भी लोगों पर काफी ज्यादा असर हुआ और लोग इस बाइक के दीवाने हो गए थे क्योंकि उन्हें स्कूटर वाला माइलेज बाइक में मिल रहा था। लेकिन उसी दौरान जापानी करेंसी में उछाला गया, जिसकी वजह से जितने भी स्पेयर पार्ट्स जापान से आते थे, वह काफी ज्यादा मांग होने लगी और हीरो होंडा को अपनी बाइक अफॉर्डेबल बनाने में काफी दिक्कतें आने लगीं। असल में यह प्रॉब्लम यह भी थी कि उस वक्त हीरो होंडा के कई सारे कंपटीटर इंडियन मार्केट में आ चुके थे, जैसे सुजुकी, यामाहा, बजाज ऑटो और टीवीएस। लेकिन यह सारे ब्रांड सिर्फ शहरी इलाकों में रहने वाले एलजी कस्टमर पर ही फोकस करते थे। लेकिन वहीं अगर हीरो होंडा को देखा जाए तो उनका मेन फोकस इंडिया के मिडिल और लोअर मिडल क्लास कस्टमर पर था, जो कि एक अफॉर्डेबल सलूशन चाहते थे। और यही वजह थी कि हीरो होंडा की बाइक सिर्फ शहरों में ही नहीं बल्कि पूरे भारत में ही सबसे ज्यादा रोती थी। और यही सब देखते हुए कंपनी अपनी बाइक का प्राइस नहीं बढ़ाना चाहती थी। यहां पर कि इसी की वजह से कंपनी को काफी लंबे अरसे तक लाश का भी सामना करना पड़ा। लेकिन 1990 में जब डॉलर का एक्शन जो प्राइस रेगुलेटर हुआ, तो फिर हालात थोड़े सुधरने शुरू हो गए। और देखते ही देखते कुछ इस समय हीरो होंडा एक बार फिर से अपनी बाइक पर प्रॉफिट कमाने लगा और अगले कुछ सालों में कंपनी का प्रॉफिट 10 मिलीयन डॉलर्स को भी क्रॉस कर गया, जो कि उस जमाने में एक बहुत बड़ा नंबर था। अब यहां तक तो चीजें ऊपर ऊपर से काफी अच्छी नजर आ रही थी, लेकिन अंदर से सिचुएशन बहुत पहले से ही खराब होनी शुरू हो गई थी। दरअसल कंपनी के मैनेजमेंट में शुरू से ही कई तरह की प्रॉब्लम चल रही थी, जैसे कि होंडा तो अपनी बाइक से अमेरिका और रूस जैसे डेवलप्ड कंट्री में सेल कर रहा था, लेकिन हीरो होंडा को होंडा की तरफ से फौरन अपनी बाइक को सेल करने की परमिशन नहीं थी। यानी एक तरफ तो हीरो साइकिल मैन्युफैक्चर के तौर पर उस समय दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी थी, यहां तक कि गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी इनका नाम दर्ज था। वहीं दूसरी तरफ होंडा की वजह से वह अपनी बाइक फौरन मार्केट में सेल नहीं कर पा रही थी। असल में इंडिया के बाहर हीरो होंडा को सिर्फ नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसी आसपास की कंट्रीज तक अपनी बाइक को सपोर्ट करना था, जिसकी वजह से हीरो कंपनी इंटरनेशनल मार्केट में जो पोजीशन चाहती थी, वह से नहीं मिल पा रही थी। अब एक तरफ तो होंडा काफी तेजी से ग्रो कर रहा था, लेकिन वहीं दूसरी तरफ हीरो एक लिमिटेड स्पेस में सीमित होकर रह गया था, जिसकी वजह से इन दोनों कंपनीज के आपसी रिश्ते खराब होने लगे। इसके अलावा कॉन्ट्रैक्ट के एकॉर्डिंग हीरो बाइक्स की बॉडी बनती और होंडा इंजन, अगर हीरो को अपना बिजनेस एक्सटेंड करने के लिए अलग भी होना पड़ता तो फिर वह ऐसा नहीं कर सकते थे क्योंकि वह इंजन के लिए पूरी तरह से होंडा पर ही डिपेंड थे। हालांकि अब हीरो को यह समझ आ चुका था कि अगर उसे होंडा से अलग होना है तो फिर खुद इंजन मैन्युफैक्चर करना ही पड़ेगा। इसीलिए हीरो होंडा से अपने हिस्से का जितना भी प्रॉफिट मिलता था, वह उसके एक बड़े हिस्से को इंजन बनाने में खर्च करने लगा, जिसकी वजह से होंडा और हीरो के बीच में दरार और भी ज्यादा बड़ी हो गई। अब जैसा कि उन्होंने कोयला प्रेषण के टाइम एनओसी साइन किया था कि यह एक दूसरे के मुकाबले में कभी भी बाइक नहीं लांच करेंगे, लेकिन होंडा ने इसके खिलाफ जाकर साल 1999 में इंडिया के अंदर अपनी एक सिगरेट कंपनी होंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर इंडिया स्टार्ट कर दी और फिर उसी प्राइस सेगमेंट में ही बाइक लॉन्च करना शुरू कर दिया, जिसमें पहले से हीरो होंडा की बाइक मौजूद थी। इस तरह अगर देखा जाए तो इंडियन मार्केट के अंदर होंडा ने अपनी बाइक को हीरो होंडा के मुकाबले में लाकर खड़ा कर दिया था, जिसकी वजह से हीरो होंडा के कस्टमर्स डिवाइड हो गए। और इसके कुछ साल बाद होंडा ने एक्टिवा को लॉन्च करके स्कूटर सेगमेंट में भी एंटर कर लिया था। अब अगर देखा जाए तो इस पूरे मामले में होंडा की पांचों उंगलियां घी में थीं कि गोविंदा की हीरो होंडा से तो रनिंग हुई रही थी ताकि अपनी सेपरेट बाइक कंपनी से भी उसका अच्छा खासा प्रॉफिट जनरेट हो रहा था। और दोस्तों, इन्हीं सभी प्रॉब्लम्स को देखते हुए हीरो ने इससे अलग होने का फैसला कर लिया और फिर 2010 में जाकर दोनों ही कंपनियां हमेशा के लिए अलग हो गईं। हीरो होंडा में इन दोनों कंपनियों के 26-26 परसेंट शेयर थे, जिसके चलते होंडा मोटर्स ने अपने हिस्से के सारे 26 परसेंट हीरो कंपनी को ही बेचने का फैसला किया। और दोस्तों, हीरो कंपनी के प्रमोटर ब्रजमोहन मुंजाल ने होंडा के यह शेयर्स 1.2 अरब डालर में खरीद कर अपना खुद का कारोबार हीरो मोटोकॉर्प के नाम से आगे बढ़ाया। अब जब यह दोनों कंपनी से अलग हुई थीं, अब ज्यादातर लोगों ने यह कहा था कि होंडा के बिना हीरो मार्केट में कभी भी सरवाइव नहीं कर पाएगी। लेकिन अगर आज की बात करें तो इस समय हीरो मोटो को आपको दुनिया की सबसे बड़ी मोटरसाइकिल बनाने वाली कंपनियों में शुमार किया जाता है। बाकी आज की हमारी इस वीडियो में बस इतना ही था। यह वीडियो आपको कैसी लगी, हमें कमेंट करके जरूर बताइएगा। आपका बहुमूल्य समय देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

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Speaker A

होने के बाद भी अलग युद्ध और कैसे होंडा ने भारत की कंपनी हीरो के पीठ में छुरा घोंपा आज के इस वीडियो में हम सबको जानने वाले हैं असल में हीरो एक साइकिल बनाने वाली कंपनी थी जिसकी नींव बृजमोहन लाल

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Speaker A

मुंजाल ने 1956 में रखी थी और 1975 तक आते-आते यह भारत की सबसे बड़ी साइकिल बनाने वाली कंपनी बन गई इसके बाद उन्होंने अपनी साइकिल्स को बड़े लेवल पर विदेशों में भी बेचना शुरू कर दिया और इस तरह साल

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Speaker A

1986 आने तक यह कंपनी सिर्फ इंडिया ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की सबसे बड़ी साइकिल बनाने वाली कंपनी में शुमार की जाने लगी लेकिन उसी दौरान उन्होंने देखा कि फौरन मार्केट में मोटरसाइकिल बिजनस भी काफी तेजी से एक्सटेंड कर रहा है लेकिन

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Speaker A

इंडिया में तो लोगों के पास सिर्फ स्कूटर और मोपेड ही ऑप्शन है इसे क्विज़ गैप को फोल्ड करने के लिए इंडियन मार्केट में मोटरसाइकिल उतारना चाहते थे लेकिन उस वक्त हीरो के साथ प्रॉब्लम यह थी कि उनके पास

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Speaker A

इंजन बनाने की टेक्नोलॉजी ही नहीं थी जिसकी वजह से मोटरसाइकिल बनाना उनके लिए तो मुमकिन ही नहीं था इसलिए आपने इस प्लान को एक्शन में लाने के लिए उन्होंने किसी विदेशी कंपनी के साथ में कैलीबरेशन करने के बारे में सोचा अब उस वक्त भारत में

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Speaker A

लिब्रलाइजेशन भले ही नहीं आया था लेकिन उस टाइम गवर्नमेंट इंडियन कंपनीज को यह छुट्टी देती थी अगर वह चाहे तो किसी भी विदेशी कंपनी के साथ में टाइप करके इंडिया में अपना बिजनेस एक्सप्लेन कर सकते हैं इसे लिए ब्रिज मोहन लाल ने हीरो के थ्रू

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Speaker A

दुनियां की सबसे बड़ी मोटरसाइकिल बनाने वाली जापानी कंपनी होंडा के पास में अपना प्रपोजल भेजा अब क्योंकि उस समय कोई भी विदेशी कंपनी भारत में डाइरैक्टली अपना बिजनस स्टार्ट नहीं कर सकती थी ऐसे में इस प्रपोजल के जरिए हौंडा को इंडियन मार्केट

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Speaker A

में एंटर करने का एक अच्छा मौका मिल गया जैसे कि हौंडा कंपनी खुद भी नहीं गंवाना चाहता था इसलिए इन दोनों कंपनियों ने 1984 में एक दूसरे के साथ हाथ मिला लिया हीरो और होंडा के बीच उस टाइम यह एग्रीमेंट हुआ

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Speaker A

था हीरो बाइक के लिए बॉडी बनाएगा और हौंडा उसके लिए इंजन सप्लाई करेगा इसके अलावा उन्होंने एक एन ओ सी भी साइन की थी जिसके अकॉर्डिंग दोनों कंपनीज फ्यूचर में कभी भी एक दूसरे के मुकाबले में अपना कोई

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Speaker A

प्रोडक्ट लांच नहीं करेंगे और दोस्तों दोनों ही कंपनीज इन कंडीशन से सेटिस्फाइड थी जिसके बाद से यह डील फाइनल हो गई और यहीं से हीरो हौंडा की शुरुआत हुई अब कागजी कार्यवाही पूरी करने के बाद से हीरो होंडा का सबसे पहला प्लांट हरियाणा में

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बनाया गया जहां से हीरो और होंडा ने मिलकर तुरंत ही बाइक की मैन्युफैक्चर नहीं करने स्टार्ट कर दी 1985 में जब उन्होंने अपनी पहली बाइक से जरा इंच की तो फिर यह बहुत तेजी से पॉपुलर हुई क्योंकि इंडियन

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मार्केट में एक तो बाइक का कांसेप्ट ही नहीं था और दूसरा इस बाइक का माइलेज बहुत ही कमाल का था इसके अलावा उन्होंने अपनी बाइक को प्राइस सेगमेंट पर लांच किया था जो कि हर मिडल क्लास फैमिली के लिए

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Speaker A

अफॉर्डेबल हुआ करता था साथ इन्होंने अपना मार्केट कैंपेन ज्योति प्रभावी तरीके से तैयार किया था जहां इनके टैगलाइन थे एफिडेविट शर्ट फॉर ग्रेट यानि कि इसमें पेट्रोल फील करके भूल जाइए इस पाइपलाइन का भी लोगों पर काफी ज्यादा असर हुआ और लोग

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इस बाइक के दीवाने हो गए थे क्योंकि उन्हें स्कूटर वाला माइलेज बाइक में मिल रहा था लेकिन उसी दौरान जापानी करेंसी में उछाला गया जिसकी वजह से जितने भी स्पेयर पार्ट्स जापान से आते थे वह काफी ज्यादा मांग होने लगी और हीरो होंडा को अपनी बाइक

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अफॉर्डेबल बनाने में काफी दिक्कतें आने लगी असल में यह प्रॉब्लम यह भी थी कि उस वक्त हीरो हौंडा के कई सारे कंपटीटर से इंडियन मार्केट में आ चुके थे जैसे सुजुकी यामाहा बजाज ऑटो और टीवीएस लेकिन यह सारे

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ब्रांड सिर्फ शहरी इलाकों में रहने वाले एलजी कस्टमर पर ही फोकस करते थे लेकिन वहीं अगर हीरो हौंडा को देखा जाए तो उनका मेन फोकस इंडिया के मिडिल और लोअर मिडल क्लास कस्टमर पर था जो कि एक अफॉर्डेबल

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सलूशन चाहते थे और यही वजह थी कि हीरो होंडा की बाइक सिर्फ शहरों में ही नहीं बल्कि पूरे भारत में ही सबसे ज्यादा रोती थी और यही सब देखते हुए कंपनी अपनी बाइक का प्राइस नहीं बढ़ाना चाहती थी यहां पर

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कि इसी की वजह से कंपनी को काफी लंबे अरसे तक लाश का भी सामना करना पड़ा लेकिन 1990 में जब डॉलर का एक्शन जो प्राइस रेगुलेटर हुआ तो फिर हालात थोड़े सुधरने शुरू हो गए और देखते ही देखते कुछ इस समय हीरो हौंडा

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एक बार फिर से अपनी बाइक पर प्रॉफिट कमाने लगा और अगले कुछ सालों में कंपनी का प्रॉफिट 10 मिलीयन डॉलर्स को भी क्रॉस कर गया जो कि उस जमाने में एक बहुत बड़ा नंबर था अब यहां तक तो चीजें ऊपर ऊपर से काफी

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अच्छी नजर आ रही थी लेकिन अंदर से सिचुएशन बहुत पहले से ही खराब होनी शुरू हो गई थी दरअसल कंपनी के मैनेजमेंट में शुरू से ही कई तरह की प्रॉब्लम चल रही थी जैसे कि होंडा तो अपनी बाइक से अमेरिका और रूस

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Speaker A

जैसे डेवलप्ड कंट्री में सेल कर रहा था लेकिन हीरो होंडा को होंडा की तरफ से फौरन मैं अपनी बाइक को सेल करने की परमिशन नहीं थी यानी एक तरफ तो हीरो साइकिल मैन्युफैक्चर के तौर पर उस समय दुनिया की

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सबसे बड़ी कंपनी थी यहां तक कि गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड पीस में भी इनका नाम दर्ज था वहीं दूसरी तरफ होंडा की वजह से वह अपनी बाइक फौरन मार्केट में सेल नहीं कर पा रही थी असल में इंडिया के बाहर हीरो हौंडा को

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Speaker A

सिर्फ नेपाल भूटान और बांग्लादेश जैसी आसपास की कंट्रीज तक कि अपनी बाइक को सपोर्ट करना है लास्ट था जिसकी वजह से हीरो कंपनी इंटरनेशनल मार्केट में जो पोजीशन चाहती थी वह से नहीं मिल पा रही थी अब एक तरफ तो हौंडा काफी तेजी से ग्रो कर

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Speaker A

रहा था लेकिन वहीं दूसरी तरफ हीरो एक लिमिटेड स्पेस में सीमित होकर रह गया था जिसकी वजह से इन दोनों कंपनीज के आपसी रिश्ते खराब होने लगी इसके अलावा कॉन्ट्रैक्ट के एकॉर्डिंग हीरो बाइक्स की बॉडी बनती और हौंडा इंजन अगर हीरो को अपना

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बिजनेस एक्सटेंड करने के लिए अलग भी होना पड़ता तो फिर वह ऐसा नहीं कर सकते थे क्योंकि वह इंजन के लिए पूरी तरह से होंडा पर ही डिपेंड थे हालांकि अब हीरो को यह समझ आ चुका था कि अगर उसे होंडा से अलग

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होना है तो फिर खुद इंजन मैन्युफैक्चर करना ही पड़ेगा इसीलिए हीरो होंडा से अपने हिस्से का जितना भी प्रॉफिट मिलता था वह उसके एक बड़े हिस्से को इंजन बनाने में खर्च करने लगा जिसकी वजह से होंडा और हीरो

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के बीच में दरार और भी ज्यादा बड़ी हो गई अब जैसा कि इन्होने कोयला प्रेषण के टाइम एनओसी साइन किया था कि यह एक दूसरे के मुकाबले में कभी भी बाइक नहीं लांच करेंगे लेकिन होंडा ने इसके खिलाफ जाकर साल 1999

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में इंडिया के अंदर अपनी एक सिगरेट कंपनी होंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर इंडिया स्टार्ट कर दी और फिर उसी प्राइस सेगमेंट में ही बाइक लॉन्च करना शुरू कर दिया जिसमें पहले से हीरो होंडा की बाइक मौजूद थी इस तरह अगर देखा जाए तो इंडियन मार्केट

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के अंदर गोंडा ने अपनी बाइक को हीरो होंडा के मुकाबले में लाकर खड़ा कर दिया था जिसकी वजह से हीरो होंडा के कस्टमर्स डिवाइड हो गए और इसके कुछ साल बाद होंडा ने एक्टिवा को लॉन्च करके स्कूटर सेगमेंट

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में भी एंटर कर लिया था अब अगर देखा जाए तो इस पूरे मामले में होंडा की पांचों उंगलियां घी में थी कि गोविंदा की हीरो होंडा से तो रनिंग हुई रही थी ताकि अपनी सेपरेट बाइक कंपनी से भी उसका अच्छा खासा

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प्रॉफिट जनरेट हो रहा था और दोस्तों इन्हीं सभी प्रॉब्लम्स को देखते हुए ही रोने इससे अलग होने का फैसला कर लिया और फिर 2010 में जाकर दोनों ही कंपनीस हमेशा के लिए अलग हो गई हीरो होंडा में इन दोनों

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1.2 अरब डालर में खरीद कर अपना खुद का कारोबार हीरो मोटोकॉर्प के नाम से आगे बढ़ाया अब जब यह दोनों कंपनी से अलग हुई थी अब ज्यादातर लोगों ने यह कहा था कि हौंडा के बिना हीरो मार्केट में कभी भी

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सरवाइज नहीं कर पाएगी लेकिन अगर आज की बात करें तो इस समय हीरो मोटो को आपको दुनिया की सबसे बड़ी मोटरसाइकिल बनाने वाली कंपनियों में शुमार किया जाता है बाकी आज की हमारी इस वीडियो में बस इतना ही था यह

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Speaker A

वीडियो आपको कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बताइएगा आपका बहुमूल्य समय देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

Topics: हीरो होंडा हीरो मोटोकॉर्प होंडा मोटरसाइकिल भारत मोटरसाइकिल बाजार साझेदारी विफलता ब्रिजमोहन लाल मुंजाल इंजन निर्माण भारतीय टू-व्हीलर बाइक मार्केटिंग


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