**Dalda (डालडा) Vanaspati Ghee 📉 Saddest Story 😭 The Rise And Fall | Business Case Study | Live Hindi — Transcript & Summary | SozAI**
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डालडा वनस्पति घी की 94 साल पुरानी कहानी, इसके उदय, लोकप्रियता और भारत में गिरावट का विस्तृत बिजनेस केस स्टडी।

## Key Takeaways

- डालडा वनस्पति घी ने भारतीय मिडिल क्लास के लिए सस्ता और भरोसेमंद घी विकल्प प्रदान किया।
- मजबूत मार्केटिंग और वितरण नेटवर्क डालडा की सफलता के मुख्य कारण थे।
- स्वास्थ्य संबंधी विवादों और प्रतिस्पर्धा के कारण डालडा की लोकप्रियता भारत में कम हुई।
- सरकार ने दूध की कमी के कारण वनस्पति घी को प्रमोट किया, जिससे डालडा को बढ़ावा मिला।
- डालडा का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, यह एशिया के कई देशों में प्रसिद्ध हुआ।

## What the video covers

- डालडा वनस्पति घी की शुरुआत 1930 में नीदरलैंड की कंपनी द्वारा सस्ते देसी घी के विकल्प के रूप में हुई।
- लीवर ब्रदर्स (यूनिलीवर) ने डालडा के राइट्स खरीदकर भारत में इसे लोकप्रिय बनाया।
- डालडा को मार्केट में पहचान दिलाने के लिए 1939 में भारत का पहला मल्टीमीडिया एड कैंपेन चलाया गया।
- डालडा वनस्पति घी ने मिडिल और लोअर मिडिल क्लास भारतीयों के लिए सस्ता और भरोसेमंद विकल्प साबित किया।
- 1940-50 के दौरान सरकार ने दूध और घी की कमी के कारण वनस्पति घी को प्रमोट किया।
- 1980 तक डालडा बाजार में अकेला था, लेकिन बाद में कई नए ब्रांड्स के आने से प्रतिस्पर्धा बढ़ी।
- डालडा के खिलाफ 1950 के दशक में स्वास्थ्य और मिलावट को लेकर विरोध शुरू हुआ, जो संसद तक पहुंचा।
- डालडा की लोकप्रियता भारत में कम हुई, लेकिन पाकिस्तान, अफगानिस्तान और म्यांमार जैसे देशों में अभी भी इसका उपयोग होता है।
- कंपनी ने विभिन्न पैकेजिंग साइज और मजबूत वितरण नेटवर्क के जरिए मार्केट में अपनी पकड़ बनाई।
- स्वाद और सुगंध की चुनौतियों के बावजूद डालडा ने मार्केटिंग रणनीतियों से उपभोक्ताओं का विश्वास जीता।

Answers

## Questions about this video

डालडा वनस्पति घी की शुरुआत कब और कैसे हुई थी?

डालडा वनस्पति घी की शुरुआत 1930 में नीदरलैंड की एक कंपनी द्वारा भारत में सस्ते देसी घी के विकल्प के रूप में हुई थी। बाद में लीवर ब्रदर्स ने इसके राइट्स खरीदकर इसे लोकप्रिय बनाया।

डालडा की लोकप्रियता में गिरावट के मुख्य कारण क्या थे?

डालडा की लोकप्रियता में गिरावट के मुख्य कारण स्वास्थ्य संबंधी विवाद, मिलावट के आरोप, और बाजार में नए प्रतिस्पर्धी ब्रांड्स का आना थे। इसके अलावा लोगों की पसंद में बदलाव भी एक कारण था।

डालडा ने अपने उत्पाद को बाजार में कैसे प्रमोट किया?

डालडा ने 1939 में भारत का पहला मल्टीमीडिया एड कैंपेन चलाया, जिसमें सिनेमा घरों में शॉर्ट फिल्में दिखाई गईं, पेंफलेट्स बांटे गए, कुक बुक निकाली गई और सड़क पर वैन चलाकर लोगों का ध्यान आकर्षित किया गया।

## Full Transcript — Download SRT & Markdown

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Speaker A

खजूर छाप डालडा, इसे ही तो कहते थे हम गरीब भारतीयों का असली घी। कुछ सालों पहले तक हम सभी के घरों में यह पैकेट जरूर देखने को मिल जाता था, असली वनस्पति डालडा। आज भी ममता की कसौटी पर खरा, चाहे पूड़ी कचौड़ी बनानी हो या फिर मीठे पकवान, डालडा में ना बने तो स्वाद ही नहीं आता। लेकिन उस टाइम पर हर मिडिल क्लास इंडियंस का सबसे पसंदीदा यह वनस्पति घी आज गायब कहां हो गया? क्या लोगों ने इसे इसलिए खाना बंद कर दिया क्योंकि इसमें जानवर की चर्बी का यूज होता था? वेल, सब कुछ हम डिटेल में जानने वाले हैं आज की इस वीडियो में। अब दोस्तों, आप दिल्ली के चांदनी चौक में पराठे वाले गली की बात करें या किसी मशहूर हलवाई की गरमागरम मिठाइयों की, आज से कुछ साल पहले तक ज्यादातर चीजों को डालडा में ही बनाया जाता था। लेकिन इस ब्रांड की शुरुआत हो गई थी 94 साल पहले ही, जब 1930 के टाइम पर नीदरलैंड की एक कंपनी डाटा भारत में देसी घी के सस्ते अल्टरनेटिव के रूप में वनस्पति घी बेचा करती थी। क्योंकि ब्रिटिश राज में इंडियंस की जेबें इतनी हल्की हो गई थी कि देसी घी मिडिल और लोअर मिडिल क्लास घरों से पूरी तरह से गायब हो गया था और यह सिर्फ नवाबों या शाही खानदान की रसोइयों की शान हुआ करता था। अब उस समय आज की तरह इतने सारे वेजिटेबल ऑयल्स के ऑप्शंस नहीं थे। ऐसे में घी ने जो अमीरी और गरीबी के बीच गैप क्रिएट कर दिया था, उसे भरने के लिए वनस्पति घी की जरूरत महसूस होने लगी। इस तरह से डाड एंड कंपनी का यह हाइड्रोजेनेटेड वनस्पति घी देश में इंपोर्ट होने लगा, जिसे कि डाडा वनस्पति के नाम से बेचा जाता था। अब आप सोच रहे होंगे कि वनस्पति घी तो सुना है, लेकिन यह हाइड्रोजेनेटेड वनस्पति घी क्या है? असल में यह एक मेथड है, जिसके अंदर कुकिंग ऑयल या फिर किसी भी वेजिटेबल ऑयल में हाइड्रोजन ऐड कर दिया जाता है ताकि वह सॉलिड फॉर्म में कन्वर्ट हो जाए। और एक टाइम पर हम सभी का पसंदीदा डालडा भी इसी तरह से ही बनाया जाता था। अब इधर एक ब्रिटिश मैन्युफैक्चरिंग कंपनी लीवर ब्रदर्स, जिसे कि आज हम यूनिलीवर के नाम से जानते हैं, उसकी नजर डाडा के वनस्पति घी पर पड़ी। इस समय तक यह लोग ब्यूटी प्रोडक्ट्स की कैटेगरी में काफी सक्सेस हो गए थे और यूरोप के अंदर फूड प्रोडक्ट बिजनेस में भी एंटर कर चुके थे। ऐसे में उन्होंने सोचा कि क्यों ना इंडिया में वनस्पति घी से शुरुआत की जाए क्योंकि यह एक बहुत ही प्रॉफिटेबल मार्केट नजर आ रही थी। यही सोचकर लीवर ब्रदर्स ने डाड एंड कंपनी से इस वनस्पति घी को बनाने के राइट्स खरीद लिए। लेकिन डाड एंड कंपनी की एक शर्त यह थी कि आगे भी ब्रांडिंग प्रोडक्ट के सेम नेम यानी कि डाड से ही होगी। हालांकि लीवर ब्रदर्स भी अपने नाम को इस ब्रांड के साथ में जोड़ना चाहते थे। इसीलिए वो इस एग्रीमेंट से डिसएग्री कर जाते हैं और फिर आखिरकार बीच का समाधान यह निकल कर आता है कि डाडा नाम के बीच में लीवर ब्रदर्स का एल डाल दिया जाए और इस तरह से डाडा नाम चेंज होकर डालडा बन गया। इसके राइट्स खरीदने के बाद से वनस्पति घी बनाने की तैयारी शुरू हो गई, जिसके लिए उन्होंने हिंदुस्तान वनस्पति मैन्युफैक्चरिंग लिमिटेड नाम की एक कंपनी बनाई और शिवरी में एक फैक्ट्री सेटअप की गई, जो कि आज मुंबई का पार्ट है। वनस्पति घी को बनाने के लिए बहुत से लोगों को हायर किया गया, मशीनरी लगाई गई और कई सारे पड़ाव को पार करते हुए आखिरकार 1937 में ल्ड को लॉन्च कर दिया गया। अब यह देसी घी का एक अच्छा अल्टरनेटिव तो था ही, साथ ही इसकी मार्केट डिमांड भी काफी ज्यादा थी। ऐसे में डालडा को पहचान बनाने में ज्यादा समय तो नहीं लगना चाहिए था ना। लेकिन इसमें एक बहुत बड़ी प्रॉब्लम थी कि इस घी से एक अजीब सी स्मेल आती थी, जिसे कि इंडियंस बिल्कुल भी पसंद नहीं करते थे। इसीलिए स्वाद और सुगंध के मामले में देसी घी के सामने डालडा को खड़ा करना कंपनी के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया। डालडा को मार्केट में लॉन्च हुए 2 साल हो गए थे, लेकिन अभी भी वह अपनी पहचान बनाने के लिए स्ट्रगल कर रहा था। कंपनी भी परेशान थी कि आखिर वह ऐसा क्या करें कि लोग इनके प्रोडक्ट को खरीदने लगे। और दोस्तों, यहीं पर एंट्री होती है एडवर्टाइज एजेंसी लिंटास की, जो कि अपनी शानदार मार्केटिंग स्ट्रेटेजी के लिए आज भी जाना जाता है। लिंटास में काम करने वाले हार्वे डंकन ने डाल्ड के ऐड कैंपेन का चार्ज संभाला और उन्होंने 1939 में भारत का पहला मल्टीमीडिया ऐड कैंपेन क्रिएट किया। यह बेसिकली एक शॉर्ट फिल्म थी, जिसे सिनेमा घरों में फिल्म स्टार्ट होने से पहले या फिर इंटरवल के दौरान दिखाया जाता था। इसके अलावा लाखों की संख्या में पेंफलेट्स बांटे गए, न्यूज़पेपर और मैगजींस में ऐड प्रिंट कराए गए, जिसमें दिखाया गया था कि जो मां अपने बच्चों की केयर करती हैं, वह डालडा का इस्तेमाल करती हैं। इसके अलावा कंपनी ने डालडा की कुक बुक भी निकाली, जिससे लोग तरह-तरह की नई-नई रेसिपीज सीखते थे, साथ ही उससे डालडा का प्रमोशन भी हो जाता था। अब दोस्तों, प्रमोशंस के यह सारे तरीके पढ़े-लिखे लोगों के लिए तो बिल्कुल परफेक्ट थे, लेकिन उनका क्या जो ना तो सिनेमा घरों में जाते थे और ना ही पढ़ना लिखना जानते थे? इसके लिए लिंटास ने एक बहुत ही कमाल का आईडिया निकाला, जिसमें वह डालडा के टिन के जैसे दिखने वाली एक गोल वैन को सड़कों पर घुमाने लगे ताकि वह लोगों का अटेंशन हासिल कर सकें। और हां, डालडा के मार्केटिंग टीम ने जगह-जगह पर स्टॉल्स लगवाने शुरू कर दिए, जहां खड़े होकर लोग डालडा को छूकर उसके टक्चर को देसी घी से मैच करवा पाते थे और इससे बने हुए फूड्स को भी टेस्ट कर पाते थे। और दोस्तों, इतना करीब से जानने के बाद से लोगों के मन में डालडा को लेकर विश्वास बनने लगा। ऊपर से 100% शुद्ध वनस्पति घी से बना जैसी टैगलाइन ने लोगों का भरोसा जीतने का काम किया। साथ ही पीले रंग के डिब्बे पर बने पाम ट्री के फोटो ने लोगों के बचे कुचे डाउट्स भी क्लियर कर दिए। इस तरह से धीरे-धीरे लोग देसी घी के इस सस्ते अल्टरनेटिव का इस्तेमाल करने लगे और डालडा की मार्केट एक्सपेंड होती चली गई। कंपनी ने हर तरह के कस्टमर्स की नीड को फुलफिल करने के लिए एक नई स्ट्रेटेजी बनाई, जिसके तहत उन्होंने अलग-अलग साइज में डालडा के पैकेट मार्केट में उतारने शुरू कर दिए। जैसे कि कम खपत वाले घरों के लिए 1 किलो वाला छोटा प्लास्टिक या फिर टिन का पैकेट निकाला, बड़ी फैमिलीज के लिए बड़े प्लास्टिक के कंटेनर्स निकाले और रेस्टोरा या फिर ढाबों के लिए चौकोर और बड़ा टिन का कंटेनर। अब दोस्तों, लीवर ब्रदर्स के पास पहले से ही स्ट्रांग डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क तो था ही, इसी का ही यूज करके उन्होंने डाल्ड को देश के हर कोने में पहुंचा दिया। और कुछ इस तरह से डालडा वनस्पति घी ने मार्केट में जोर पकड़ लिया और यह भारतीय घरों में शुद्ध देसी घी का भरोसेमंद अल्टरनेटिव बन गया था। डालडा की कीमत देसी घी के मुकाबले बहुत कम थी, इसीलिए गरीब और मिडिल क्लास वाले लोगों के लिए डालडा खरीदना कम खर्चीला साबित होता था। इसके अलावा इसे कुछ इस तरह से एडवर्टाइज किया गया था, जिससे लोगों को लगने लगा कि यह स्वाद के साथ-साथ सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद है। 1940 और 1950 के दौरान दूध और घी की कमी की वजह से सरकार ने भी वनस्पति घी को काफी प्रमोट किया, जिससे डालडा की रा और भी आसान हो गई। शुरुआती 40 सालों तक ल्ड के सामने मार्केट में कोई भी ब्रांड नहीं था और 1980 तक तो यह कंपनी बाजार में अकेले ही कब्जा करके रही। और हां, कमाल की बात तो यह है कि डालडा सिर्फ भारत में ही फेमस नहीं हुआ, बल्कि इसकी पॉपुलर एशिया के और भी कई सारे देशों में देखने को मिली। अब दोस्तों, पिछले कुछ सालों में हम सभी को पता है कि इंडियन मार्केट के अंदर डालडा की डिमांड में काफी कमी आई है, लेकिन पाकिस्तान, अफगानिस्तान और म्यांमार जैसे देशों में आज भी डालडा का खूब इस्तेमाल किया जाता है। पर दोस्तों, सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि भारत में इसकी पॉपुलर कम होती चली गई? असल में दोस्तों, आजादी के बाद से डाल्ड के नक्शे कदम पर चलते हुए कई सारे और भी ब्रांड्स ने मार्केट में एंट्री ले ली, जैसे कि गंगा, रथ, जमिनी, सुहाना, अशोका और पनघट। मार्केट में बढ़ते कंपटीशन की वजह से ल्ड का मार्केट शेयर कम होने लगा। पर क्योंकि यह एक पुरानी और पैसे वाली कंपनी थी, इसलिए कंपटीशन से आगे निकलना इसके लिए कोई मुश्किल का काम नहीं था। सबसे बड़ा चैलेंज डालडा के लिए यह था कि अपने खिलाफ उठ रही आवाज को शांत कैसे किया जाए। क्योंकि 1950 के एंड तक डालडा एक बहुत बड़े विवाद में फंस गया था। असल में इस दौरान डालडा को बैन करने की मांग उठने लगी थी। बात इतनी बढ़ गई कि यह मुद्दा संसद तक पहुंच गया। क्योंकि उस समय एक बहुत बड़ा तबका डालडा के खिलाफ था और इसे वह विलायती घी और असली घी का नकली रूप कहा करते थे। विरोध इतना बढ़ गया कि लोग शादी विवाह में खाना खाने से कतरा नहीं लगे कि कहीं ऐसा तो नहीं कि खाना विलायती घी से बना हो। डालडा को लेकर एक अजीब तरह की हिट फैलने शुरू हो गई। लोग इसे मिलावटी और सेहत के लिए हानिकारक मानने लगे थे। वनस्पति घी को लेकर लोगों के मन में बढ़ते हुए कंसर्न को देखकर उस समय के लोकसभा मेंबर ठाकुरदास भार्गवा ने एक बिल पेश किया था कि सरकार को वनस्पति घी का उत्पादन और बिक्री देश में बंद कर देना चाहिए। कई सारे लोग इस बिल के समर्थन में थे, लेकिन फिर भी इसे पास नहीं किया गया। अब इसका पहला रीजन था कि उस टाइम पर देश में दूध की भारी कमी थी और दूसरा यह कि हर आदमी देसी घी का इस्तेमाल नहीं कर सकता था। ऐसे में डालडा को बैन करना बिल्कुल भी सही नहीं होता। इसके अलावा बैन ना करने का एक मेन रीजन था एंप्लॉयमेंट भारत अभ...

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Speaker A

बनानी हो या फिर मीठे पकवान डालडा में ना बने तो स्वाद ही नहीं आता लेकिन उस टाइम पर हर मिडिल क्लास इंडियंस का सबसे पसंदीदा यह वनस्पति घी आज गायब कहां हो गया क्या लोगों ने इसे इसलिए खाना बंद कर

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Speaker A

दिया क्योंकि इसमें जानवर की चर्बी का यूज होता था वेल सब कुछ हम डिटेल में जानने वाले हैं आज की इस वीडियो में अब दोस्तों आप दिल्ली के चांदनी चौक में पराठे वाले गली की बात करें या किसी

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Speaker A

मशहूर हलवाई की गरमागरम मिठाइयों की आज से कुछ साल पहले तक ज्यादातर चीजों को डालडा में ही बनाया जाता था लेकिन इस ब्रांड की शुरुआत हो गई थी 94 साल पहले ही जब 1930 के टाइम पर नीदरलैंड की एक कंपनी डाटा

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Speaker A

भारत में देसी घी के सस्ते अल्टरनेटिव के रूप में वनस्पति घी बेचा करती थी क्योंकि ब्रिटिश राज में इंडियंस की जेबें इतनी हल्की हो गई थी कि देसी घी मिडिल और लोअर मिडिल क्लास घरों से पूरी तरह से गायब हो

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Speaker A

गया था और यह सिर्फ नवाबों या शाही खानदान की रसोइयों की शान हुआ करता था अब उस समय आज की तरह इतने सारे वेजिटेबल ऑयल्स के ऑप्शंस नहीं थे ऐसे में घी ने जो अमीरी और गरीबी के बीच गैप क्रिएट कर दिया था उसे

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Speaker A

भरने के लिए वनस्पति घी की जरूरत महसूस होने लगी इस तरह से डाड एंड कंपनी का यह हाइड्रोजेनेटेड वनस्पति की देश में इंपोर्ट होने लगा जिसे कि डाडा वनस्पति के नाम से बेचा जाता था अब आप सोच रहे होंगे

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कि वनस्पति घी तो सुना है लेकिन यह हाइड्रोजेनेटेड वनस्पति घी क्या है असल में यह एक मेथड है जिसके अंदर कुकिंग ऑयल या फिर किसी भी वेजिटेबल ऑयल में हाइड्रोजन ऐड कर दिया जाता है ताकि वह सॉलिड फॉर्म में कन्वर्ट हो जाए और एक

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Speaker A

टाइम पर हम सभी का पसंदीदा डालडा भी इसी तरह से ही बनाया जाता था अब इधर एक ब्रिटिश मैन्युफैक्चरिंग कंपनी लीवर ब्रदर्स जिसे कि आज हम यूनिलीवर के नाम से जानते हैं उसकी नजर डाडा के वनस्पति घी पर

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पड़ी इस समय तक यह लोग ब्यूटी प्रोडक्ट्स की कैटेगरी में काफी सक्सेस हो गए थे और यूरोप के अंदर फूड प्रोडक्ट बिजनेस में भी एंटर कर चुके थे ऐसे में उन्होंने सोचा कि क्यों ना इंडिया में वनस्पति घी से शुरुआत

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Speaker A

की जाए क्योंकि यह एक बहुत ही प्रॉफिटेबल मार्केट नजर आ रही थी यही सोचकर लिवर ब्रदर्स ने डाड एंड कंपनी से इस वनस्पति घी को बनाने के राइट्स खरीद लिए लेकिन डाड एंड कंपनी की एक शर्त यह थी कि आगे भी

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ब्रांडिंग प्रोडक्ट के सेम नेम यानी कि डाड से ही होगी हालांकि लीवर ब्रदर्स भी अपने नाम को इस ब्रांड के साथ में जोड़ना चाहते थे इसीलिए वो इस एग्रीमेंट से डिसएग्री कर जाते हैं और फिर आखिरकार बीच का समाधान यह निकल कर आता है कि डाडा नाम

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के बीच में लीवर ब्रदर्स का एल डाल दिया जाए और इस तरह से डाडा नाम चेंज होकर डालडा बन गया इसके राइट्स खरीदने के बाद से वनस्पति घी बनाने की तैयारी शुरू हो गई जिसके लिए उन्होंने हिंदुस्तान वनस्पति

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मैन्युफैक्चरिंग लिमिटेड नाम की एक कंपनी बनाई और शिवरी में एक फैक्ट्री सेटअप की गई जो कि आज मुंबई का पार्ट है वनस्पति घी को बनाने के लिए बहुत से लोगों को हायर किया गया मशीनरी लगाई गई और कई सारे पड़ाव

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Speaker A

को पार करते हुए आखिरकार 1937 में ल्ड को लॉन्च कर दिया गया अब यह देसी घी का एक अच्छा अल्टरनेटिव तो था ही साथ ही इसकी मार्केट डिमांड भी काफी ज्यादा थी ऐसे में डालडा को पहचान बनाने में ज्यादा समय तो

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Speaker A

नहीं लगना चाहिए था ना लेकिन इसमें एक बहुत बड़ी प्रॉब्लम थी कि इस घी से एक अजीब सी स्मेल आती थी जिसे कि इंडियंस बिल्कुल भी पसंद नहीं करते थे इसीलिए स्वाद और सुगंध के मामले में देसी घी के

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Speaker A

सामने डालडा को खड़ा करना कंपनी के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया डालडा को मार्केट में लॉन्च हुए 2 साल हो गए थे लेकिन अभी भी वह अपनी पहचान बनाने के लिए स्ट्रगल कर रहा था कंपनी भी परेशान थी कि आखिर वह ऐसा

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क्या करें कि लोग इनके प्रोडक्ट को खरीदने लगे और दोस्तों यहीं पर एंट्री होती है एडवर्टाइज एजेंसी लिंटास की जो कि अपनी शानदार मार्केटिंग स्ट्रेटेजी के लिए आज भी जाना जाता है लिंटास में काम करने वाले हार्वे डंकन ने डल्ड के ऐड कैंपेन का

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Speaker A

चार्ज संभाला और उन्होंने 1939 में भारत का पहला मल्टीमीडिया ऐड कैंपेन क्रिएट किया यह बेसिकली एक शॉर्ट फिल्म थी जिसे सिनेमा घरों में फिल्म स्टार्ट होने से पहले या फिर इंटरवल के दौरान दिखाया जाता था इसके अलावा लाखों की संख्या में

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Speaker A

पेंफलेट्स बांटे गए न्यूज़पेपर और मैगजींस में ऐड प्रिंट कराए गए जिसमें दिखाया गया था कि जो मां अपने बच्चों की केयर करती हैं वह डालडा का इस्तेमाल करती हैं इसके अलावा कंपनी ने डालडा की कुक बुक भी निकाली जिससे लोग तरह-तरह की नई-नई

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रेसिपीज सीखते थे साथ ही उससे डालडा का प्रमोशन भी हो जाता था अब दोस्तों प्रमोशंस के यह सारे तरीके पढ़े-लिखे लोगों के लिए तो बिल्कुल परफेक्ट थे लेकिन उनका क्या जो ना तो सिनेमा घरों में जाते थे और ना ही पढ़ना लिखना जानते थे इसके

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लिए लिंटास ने एक बहुत ही कमाल का आईडिया निकाला जिसमें वह डालडा के टिन के जैसे दिखने वाली एक गोल वैन को सड़कों पर घुमाने लगे ताकि वह लोगों का अटेंशन हासिल कर सकें और हां डालडा के मार्केटिंग टीम

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ने जगह-जगह पर स्टॉल्स लगवाने शुरू कर दिए जहां खड़े होकर लोग डालडा को छूकर उसके टक्चर को देसी घी से मैच करवा पाते थे और इससे बने हुए फूड्स को भी टेस्ट कर पाते थे और दोस्तों इतना करीब से जानने के बाद

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Speaker A

से लोगों के मन में डालडा को लेकर विश्वास बनने लगा ऊपर से 100% शुद्ध वनस्पति घी से बना जैसी टैगलाइन ने लोगों का भरोसा जीतने का काम किया साथ ही पीले रंग के डिब्बे पर बने पाम ट्री के फोटो ने लोगों के बचे

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Speaker A

कुचे डाउट्स भी क्लियर कर दिए इस तरह से धीरे-धीरे लोग देसी घी के इस सस्ते अल्टरनेटिव का इस्तेमाल करने लगे और डालडा की मार्केट एक्सपेंड होती चली गई कंपनी ने हर तरह के कस्टमर्स की नीड को फुलफिल करने

05:26

Speaker A

के लिए एक नई स्ट्रेटेजी बनाई जिसके तहत उन्होंने अलग-अलग साइज में डालडा के पैकेट मार्केट में उतारने शुरू कर दिए जैसे कि कम खपत वाले घरों के लिए 1 किलो वाला छोटा प्लास्टिक या फिर टिन का पैकेट निकाला

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Speaker A

बड़ी फैमिलीज के लिए बड़े प्लास्टिक के कंटेनर्स निकाले और रेस्टोरा या फिर ढाबों के लिए चौकोर और बड़ा टिन का कंटेनर अब दोस्तों लीवर ब्रदर्स के पास पहले से ही स्ट्रांग डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क तो था ही इसी का ही यूज करके उन्होंने डल्ड को देश

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Speaker A

के हर कोने में पहुंचा दिया और कुछ इस तरह से डालडा वनस्पति घी ने मार्केट में जोर पकड़ लिया और यह भारतीय घरों में शुद्ध देसी घी का भरोसेमंद अल्टरनेटिव बन गया था डालडा की कीमत देसी घी के मुकाबले बहुत कम

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Speaker A

थी इसीलिए गरीब और मिडिल क्लास वाले लोगों के लिए डालडा खरीदना कम खर्चीला साबित होता था इसके अलावा इसे कुछ इस तरह से एडवर्टाइज किया गया था जिससे लोगों को लगने लगा कि यह स्वाद के साथ-साथ सेहत के

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Speaker A

लिए भी बहुत फायदेमंद है 1940 और 1950 के दौरान दूध और घी की कमी की वजह से सरकार ने भी वनस्पति घी को काफी प्रमोट किया जिससे डालडा की रा और भी आसान हो गई शुरुआती 40 सालों तक ल्ड के सामने मार्केट

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Speaker A

में कोई भी ब्रांड नहीं था और 1980 तक तो यह कंपनी बाजार में अकेले ही कब्जा करके रही और हां कमाल की बात तो यह है कि डालडा सिर्फ भारत में ही फेमस नहीं हुआ बल्कि इसकी पॉपुलर एशिया के और भी कई सारे देशों

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Speaker A

में देखने को मिली अब दोस्तों पिछले कुछ सालों में हम सभी को पता है कि इंडियन मार्केट के अंदर डालडा की डिमांड में काफी कमी आई है लेकिन पाकिस्तान अफगानिस्तान और म्यांमार जैसे देशों में आज भी डालडा का

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Speaker A

खूब इस्तेमाल किया जाता है पर दोस्तों सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि भारत में इसकी पॉपुलर कम होती चली गई असल में दोस्तों आजादी के बाद से डल्ड के नक्शे कदम पर चलते हुए कई सारे और भी ब्रांड्स

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Speaker A

ने मार्केट में एंट्री ले ली जैसे कि गंगा रथ जमिनी सुहाना अशोका और पनघट मार्केट में बढ़ते कंपटीशन की वजह से ल्ड का मार्केट शेयर कम होने लगा पर क्योंकि यह एक पुरानी और पैसे वाली कंपनी थी इसलिए

07:23

Speaker A

कंपटीशन से आगे निकलना इसके लिए कोई मुश्किल का काम नहीं था सबसे बड़ा चैलेंज डालडा के लिए यह था था कि अपने खिलाफ उठ रही आवाज को शांत कैसे किया जाए क्योंकि 1950 के एंड तक डालडा एक बहुत बड़े विवाद

07:36

Speaker A

में फंस गया था असल में इस दौरान डालडा को बैन करने की मांग उठने लगी थी बात इतनी बढ़ गई कि यह मुद्दा संसद तक पहुंच गया क्योंकि उस समय एक बहुत बड़ा तबका डालडा के खिलाफ था और इसे वह विलायती घी और असली

07:49

Speaker A

घी का नकली रूप कहा करते थे विरोध इतना बढ़ गया कि लोग शादी विवाह में खाना खाने से कतरा नहीं लगे कि कहीं ऐसा तो नहीं कि खाना विलायती घी से बना हो डालडा को लेकर एक अजीब तरह की हिट फैलने शुरू हो गई लोग

08:02

Speaker A

इसे मिलावटी और सेहत के लिए हानिकारक मानने लगे थे वनस्पति घी को लेकर लोगों के मन में बढ़ते हुए कंसर्न को देखकर उस समय के लोकसभा मेंबर ठाकुरदास भार्गवा ने एक बिल पेश किया था कि सरकार को वनस्पति घी

08:15

Speaker A

का उत्पादन और बिक्री देश में बंद कर देना चाहिए कई सारे लोग इस बिल के समर्थन में थे लेकिन फिर भी इसे पास नहीं किया गया अब इसका पहला रीजन था कि उस टाइम पर देश में दूध की भारी कमी थी और दूसरा यह कि हर

08:27

Speaker A

आदमी देसी घी का इस्तेमाल नहीं कर सकता था ऐसे में डालडा को बैन करना बिल्कुल भी सही नहीं होता इसके अलावा बैन ना करने का एक मेन रीजन था एंप्लॉयमेंट भारत अभी-अभी आजाद हुआ था और खड़ा होने की कोशिश कर रहा

08:40

Speaker A

था बेरोजगारी अपने चरम पर थी और सरकार के ऊपर नौकरी देने का प्रेशर भी बढ़ता ही जा रहा था ऐसे में अगर वह वनस्पति घी के उत्पादन और बिक्री को बैन कर देते तो फिर हजारों की संख्या में लोग बेरोजगार हो

08:52

Speaker A

जाते क्योंकि उस समय तक देश में वनस्पति घी के 47 कारखाने थे जहां 300 से भी ज्यादा लोग काम कर रहे थे और उन सबको बेरोजगार करना देश की इकॉनमी पर बहुत बड़ा इंपैक्ट डाल सकता था इस विवाद को लेकर उस

09:06

Speaker A

टाइम के प्राइम मिनिस्टर जवाहरलाल नेहरू ने एक सर्वे कराया ताकि इस पूरे मामले पर जनता की भी राय ली जा सके लेकिन इससे भी कोई क्लियर रिजल्ट नहीं निकला और विवादों के बीच ही सही पर डालडा देश में बिकता रहा

09:18

Speaker A

लेकिन फिर आगे चलकर 1990 के दशक में एक बार फिर से डालडा के खिलाफ आवाज उठी और इस बार इसका रीजन था एक रिसर्च जो कि ह्यूमन बॉडी पर होने वाले ट्रांस फैट के प्रभाव पर की गई थी कमाल की बात तो यह है कि इस

09:31

Speaker A

रिसर्च के लिए खुद यूनिलीवर ने फंडिंग की थी जो कि बाद में जाकर उसी के गले की हड्डी बन गई क्योंकि इस रिसर्च से पता चला कि ट्रांस फैट से हमारी सेहत पर कितना बुरा असर पड़ता है यह बॉडी में बैड

09:43

Speaker A

कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाता है और गुड कोलेस्ट्रॉल को कम कर देता है जिसके चलते हर्ट से रिलेटेड बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है अब वैसे तो यह ट्रांस फैट कुछ नेचुरल फैट्स में भी पाए जाते हैं पर बहुत ही कम क्वांटिटी में लेकिन जैसा कि हमने

09:57

Speaker A

पहले ही डिस्कस किया था कि डालडा वनस्पति को बनाने के लिए हाइड्रोजेनेशन टेक्निक का इस्तेमाल किया जाता था इसीलिए उसमें ट्रांस फैट बहुत ही ज्यादा मात्रा में पाया जाता था इसी को देखते हुए यूएसए के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने एक

10:11

Speaker A

रेगुलेशन बना दिया कि कंपनीज अपने फूड प्रोडक्ट पर लेबल करें कि उसमें कितना ट्रांस फैट अवेलेबल है इस पहल के बाद से यूएस में वनस्पति घी का इस्तेमाल कम होने लगा और कई सारे देशों ने तो इसे बैन भी कर

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Speaker A

दिया इधर इंडिया में भी लोग इस रिसर्च के बाद से थोड़े जागरूक होने लगे और डालडा का कम इस्तेमाल करने लगे लेकिन दोस्तों इससे भी कंपनी को उतना नुकसान नहीं हुआ जितना कि अफवाहों ने उसे पहुंचाया असल में 1990

10:36

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के दौरान डालडा पर यह इल्जाम भी लगाया जाने लगा कि इसमें जानवरों का फैट मिलाया जाता है अब वनस्पति घी तो हमारे देश में काफी समय से विवाद का एक विषय था और इसे बैन करने की मांग भी रह-रह कर उठती आ रही

10:49

Speaker A

थी ऐसे में इस अफवा को लोगों ने सच मानने में जरा भी देरी नहीं की इसके अलावा भारत में एक बहुत बड़ी पापुलेशन वेजिटेरियन है जिन्हें जानवर की चर्बी मिलने वाली बात ने बुरी तरह से हिट किया और दोस्तों जो लोग

11:01

Speaker A

वेजिटेरियन नहीं भी थे उनके मन में भी शंका आने लगी कि पता नहीं इसमें किस जानवर का फैट मिला होगा इसी लिए बिना किसी तर्क के लोगों ने इसके इस्तेमाल से साफ इंकार कर दिया हालांकि कंपनी ने लोगों की

11:13

Speaker A

रसोइयों तक पहुंचने का भी खूब प्रयास किया लेकिन इसका कुछ भी फायदा नहीं हुआ क्योंकि इस समय तक अब बहुत सारे रिफाइंड ऑयल ब्रांड मार्केट में आ चुके थे जो कि वनस्पति घी के मुकाबले ज्यादा हेल्दी थे ऐसे में लोगों का रुझान इन नए ऑयल्स की

11:28

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तरफ बढ़ने लगा और धीरे धीरे डालडा उनकी ग्रोसरी लिस्ट से हमेशा के लिए बाहर हो गया डालडा ने अपनी वापसी की भरपूर कोशिश की लेकिन ना ही वह अपने ग्राहकों का विश्वास जीत पाया और ना ही अपने गिरते

11:40

Speaker A

मार्केट शेयर को बचा सका और दोस्तों आखिरकार इससे तंग आकर हिंदुस्तान यूनिलीवर ने 2003 में इसे एक अमेरिकन फूड कंपनी बंज को बेज दिया इस तरह से डालडा जिसका कभी इंडियन मार्केट में मोनोपोली हुआ करता था अपने विवादों और नए कंपटीसन टिक नहीं सका

11:57

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और मार्केट से ऑलमोस्ट पूरी तरह से गायब हो गया वहीं दूसरी तरफ इंडिया में वनस्पति घी के बाकी ब्रांड्स के लिए भी नए-नए रिफाइंड ऑयल ब्रांड्स के सामने सरवाइव करना मुश्किल हो गया था इसीलिए इनमें कुछ ब्रांड इंटरनेशनल कंपनीज के साथ में मर्ज

12:11

Speaker A

हो गए और कुछ को तो इमामी एग्रो अडानी विल्मर और इन जैसी इंडियन कंपनीज ने एक्वायर कर लिए अब दोस्तों अगर आज की बात करें तो बंज ने ल्ड ब्रांड को दोबारा खड़ा करने के लिए अपनी पूरी जी जान लगा दी है

12:23

Speaker A

कंपनी ने पहली बार 2007 में ल्ड ब्रांड नेम के अंडर ही एडिबल ऑयल की काफी रेंज लॉन्च की थी जिसे कि हस्बैंड चॉइस टैगलाइन के साथ में पेश किया गया नया डालडा हस्बैंड चॉइस रिफाइंड ऑयल स्वाद लो एक्टिव

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रहो लेकिन कंपनी को जल्द एहसास हो गया कि उनकी यह टैगलाइन काम नहीं कर रही है और ना ही वह मार्केट तक अपनी पहुंच बनाने में कामयाब हो पा रहे हैं इसीलिए 2013 में बंज ने डब्बा खाली पेट फुल इस टैगलाइन के साथ

12:50

Speaker A

में अपने प्रोडक्ट लाइनअप को फिर से लॉन्च किया क्योंकि मां हमेशा जानती है कि जब डालडा रिफाइंड ऑयल के साथ खाना बने इतना स्वादिष्ट बने कि हर रोज डब्बा खाली पेट फुल डब्बा खाली पेट फुल डब्बा खाली पेट

13:04

Speaker A

फुल डल्ड रिफाइंड ऑयल साथी ब्रांड को नई पोजीशन देने के लिए कंपनी ने कई तरह के कैंपस रन किए जिसका असर यह हुआ कि आज बहुत से घरों में डल्ड के एडिबल ऑयल ने अपनी जगह बना ली है लेकिन दोस्तों डालडा

13:17

Speaker A

वनस्पति घी का क्या हुआ कमाल की बात यह है कि डालडा का वनस्पति घी भी अब समय की मांग को देखते हुए काफी बदल चुका है क्योंकि अब आप उसके पैकेट के ऊपर साफ-साफ लिखा हुआ देख सकते हैं ट्रांस फैट फ्री जब खाना बने

13:31

Speaker A

नई ट्रांस फैट फ्री डालडा वनस्पति के साथ नया डालडा वनस्पति है ट्रांस फैट फ्री यानी खाना बने स्वाद में बेहतर और सेहत में रिफाइंड ऑयल के बराबर तो हुआ ना सेहत में वा स्वाद में पर सवाल यह है कि ट्रांस

13:47

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फैट फ्री हुआ कैसे असल में इसे बनाने के लिए अब हाइड्रोजेनेशन नहीं बल्कि एक अलग तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसे इंटरेस्टेरिफिकेशन कहा जाता है इस प्रोसेस में वनस्पति घी को बनाने के लिए ए इम्स का

14:00

Speaker A

इस्तेमाल किया जाता है यानी कि शुद्ध देसी घी का अल्टरनेटिव डालडा जिस पर अनहेल्दी का टैग लगा हुआ था वह पहले जैसा हानिकारक नहीं रहा हालांकि ज्यादातर लोग अभी भी इससे अनजान हैं और डालडा को पहले की तरह

14:12

Speaker A

अनहेल्दी मानते हैं यही वजह है कि इंडियन मार्केट अब वनस्पति घी को दोबारा अपनाए गी या नहीं यह अभी भी बड़ा सवाल बना हुआ है वैसे डालडा का यूज आपके घरों में होता था या फिर नहीं हमें कमेंट करके जरूर बताइएगा

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